ज्योतिष समाधान

Wednesday, 14 February 2018

मुहूर्त का विचार आदि काल से ही होता आया है। हमारे शास्त्रों में भी ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं जिनसे इस तथ्य का पता चलता है। श्रीकृष्ण का कंस के वध हेतु उचित समय की प्रतीक्षा करना आदि इस तथ्य को पुष्ट करते हैं। तिथि फल - एक गुणा नक्षत्र फल - चार गुणा वार फल - आठ गुणा करण फल - सोलह गुणा योग फल - बत्तीस गुणा तारा फल - एक सौ आठ गुणा

एक पौराणिक कथा के अनुसार माना जाता है कि पांच पांडवों में सहदेव मुहूर्त शास्त्र के ज्ञाता थे। महाभारत के युद्ध से पहले स्वयं दुर्योधन महाराज धृतराष्ट्र के कहने पर युद्ध में कौरवों की विजय हेतु शुभ मुहूर्त निकलवाने सहदेव के पास गए और सहदेव ने उन्हें शुभ मुहूर्त बताया।

इस बात का पता जब भगवान कृष्ण को चला तब उन्होंने इस मुहूर्त को टालने हेतु व पांडवों की विजय के मुहूर्त हेतु अर्जुन को मोह से मुक्त करने के लिए उपदेश दिया था।

इन सारे तथ्यों का उल्लेख श्रीमद्भगवत गीता में मिलता है।

अथर्ववेद में शुभ मुहूर्त में कार्य आरंभ करने का निर्देश है ताकि मानव जीवन के सभी पक्षों पर शुभता का अधिकाधिक प्रभाव पड़ सके।

आचार्य वराहमिहिर भी इसकी अनुशंसा करते हैं।

मुहूर्त के संदर्भ में रामचरितमानस में एक स्थान पर उल्लेख है कि युद्ध के पश्चात्‌ जब रावण मरणासन्न अवस्था में था तब श्रीराम ने लक्ष्मण को उससे तिथि व मुहूर्त ज्ञान की शिक्षा लेने भेजा था।

इस कथा से भी मुहूर्त अर्थात शुभ पल के महत्व का पता चलता है।

मुहूर्त का विचार आदि काल से ही होता आया है। हमारे शास्त्रों में भी ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं जिनसे इस तथ्य का पता चलता है।

श्रीकृष्ण का कंस के वध हेतु उचित समय की प्रतीक्षा करना आदि इस तथ्य को पुष्ट करते हैं।

आज के इस वैज्ञानिक युग में भी वैज्ञानिक किसी परीक्षण हेतु उचित समय का इंतजार करते हैं। राजनेता चुनाव के समय नामांकन के लिए मुहूर्त निकलवाते हैं।

इन सारे तथ्यों से मुहूर्त की उपयोगिता का पता चलता है। यहां एक तथ्य स्पष्ट कर देना उचित है कि लग्न की शुद्धि अति महत्वपूर्ण और आवश्यक है।

इससे कार्य की सफलता की संभावना १००० गुणा बढ़ जाती है।

मुहूर्त विचार में तिथियों, नक्षत्रों, वारों आदि के फलों का मात्रावार विवरण सारणी में प्रस्तुत है। अक्सर प्रश्न पूछा जाता है कि क्या शुभ मुहर्त में कार्यारंभ कर भाग्य बदला जा सकता है?

यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि ऐसा संभव नहीं है। हम जानते हैं कि गुरु वशिष्ठ ने भगवान राम के राजतिलक के लिए शुभ मुहूर्त का चयन किया था, किंतु उनका राजतिलक नहीं हो पाया।

तात्पर्य यह कि मनुष्य सिर्फ कर्म कर सकता है। सही समय पर कर्म करना या होना भी भाग्य की ही बात है। कार्य आरंभ हेतु मुहूर्त विश्लेषण आवश्यक जरूर है परंतु इसी पर निर्भर रहना गलत है।

यदि किसी व्यक्ति को शल्य चिकित्सा करानी पड़े तो वह मुहूर्त का इंतजार नहीं करेगा क्योंकि मुहूर्त से ज्यादा उसे अपनी जान व धन इत्यादि की चिंताएं लगी रहेंगी।

परंतु मुहूर्त के अनुसार कार्य करने से हानि की संभावना को तो कम किया ही जा सकता है।

तिथि फल - एक गुणा
नक्षत्र फल - चार गुणा
वार फल - आठ गुणा
करण फल - सोलह गुणा
योग फल - बत्तीस गुणा
तारा फल - एक सौ आठ गुणा
चंद्र फल - सौ गुणा
लग्न फल - एक हजार गुणा

आइए जानते हैं कि यज्ञ के कुंडों की क्या महत्ता है.... यज्ञ से वर्षा होती है,  वर्षा से अन्न पैदा होता है,  जिससे संसार का जीवन चलता है।  वायुमंडल में मंत्रों का प्रभाव पड़ता है जो प्राकृतिक घटनाएं जैसे-  भूकंप, ओलावृष्टि, हिंसात्मक घटनाओं का शमन होता है, क्योंकि यज्ञ शब्दब्रह्म है। जानिए यज्ञ के नौ कुंडों की विशेषता


पुत्र प्राप्ति के लिए योनिकुँड,

भूत प्रेत और ग्रहबाधा-विनाश के लिए पंचास्र

अथवा धनुर्ज्यावृति,

अभिचारदोष का शमन करने के लिए सप्तास्र इत्यादि।

सूक्ष्म दृष्टि से विचार कर ऊपर कुँड और यन्त्र का साम्य भी कुछ झलकता है

जैसे यंत्र देवता का शरीर भाग जाता है वैसे ही कुँड भी देवता का शरीर ही है ऐसा मान लें तो कोई आपत्ति नहीं।

स्तम्भन करने के लिये पूर्व दिशा में चतुरस्र,

भोगप्राप्ति के लिए अग्निकोण में योनि के आकारवाला

मारण के लिए दक्षिण दिशा में

अर्धचन्द्र अथवा नैऋत्यकोण में त्रिकोण,

शान्ति के लिए पश्चिम में वृत्त,

उच्चाटन के लिए वायव्यकोण में

षडस्र पौष्टिक कर्म के लिए उत्तर में

पद्मकृति और मुक्ति के लिये ईशान में

अष्टास्र कुँड हितावह है।

 यज्ञौवैश्रेष्ठतरं कर्मः स यज्ञः स विष्णुः॥ ॥ यज्ञात्भवति पर्जन्यः पर्जन्याद्अन्नसम्भवः॥ ॥

सत्यं परम धीमहि, 
धरम न दूसर सत्य समाना 
आगम निगम पुराण बखाना।।।

आइए जानते हैं कि यज्ञ के कुंडों की क्या महत्ता है....

यज्ञ से वर्षा होती है, 
वर्षा से अन्न पैदा होता है, 
जिससे संसार का जीवन चलता है। 
वायुमंडल में मंत्रों का प्रभाव पड़ता है जो प्राकृतिक घटनाएं जैसे- 
भूकंप, ओलावृष्टि, हिंसात्मक घटनाओं का शमन होता है, क्योंकि यज्ञ शब्दब्रह्म है।

जानिए यज्ञ के नौ कुंडों की विशेषता

* सभी प्रकार की मनोकामना पूर्ति के लिए प्रधान चतुरस्त्र कुंड का महत्व होता है।

* पुत्र प्राप्ति के लिए योनि कुंड का पूजन जरूरी है।

* ज्ञान प्राप्ति के लिए आचार्य कुंड यज्ञ का आयोजन जरूरी होता है।

* शत्रु नाश के लिए त्रिकोण कुंड यज्ञ फलदाई होता है।

* व्यापार में वृद्धि के लिए वृत्त कुंड करना लाभदाई होता है।

* मन की शांति के लिए अर्द्धचंद्र कुंड किया जाता है।

* लक्ष्मी प्राप्ति के लिए समअष्टास्त्र कुंड, विषम अष्टास्त्र कुंड, विषम षडास्त्र कुंड का विशेष महत्व होत

यज्ञ कुंड मुख्यत:

आठ प्रकार के होते हैं और सभी का प्रयोजन अलग अलग होताहैं ।

1. योनी कुंड – योग्य पुत्र प्राप्ति हेतु ।

2. अर्ध चंद्राकार कुंड – परिवार मे सुख शांति हेतु । पर पतिपत्नी दोनों को एक साथ आहुति देना पड़ती हैं ।

3. त्रिकोण कुंड – शत्रुओं पर पूर्ण विजय हेतु ।

4. वृत्त कुंड – जन कल्याण और देश मे शांति हेतु ।

5. सम अष्टास्त्र कुंड – रोग निवारण हेतु ।

6. सम षडास्त्र कुंड – शत्रुओ मे लड़ाई झगडे करवाने हेतु ।

7. चतुष् कोणास्त्र कुंड – सर्व कार्य की सिद्धि हेतु ।

8. पदम कुंड – तीव्रतम प्रयोग और मारण प्रयोगों से बचने हेतु ।

मण्डपों के निर्माण में

द्वार, 
खम्भे, 
तोरण द्वार, 
ध्वजा,
शिखर, 
छादन, 
रङ्गीन वस्त्र आदि वर्णन हैं ।

इनके वस्तु भेद, 
रङ्ग भेद, 
नाप दिशा आदि के विधान बताए गए हैं ।

मण्डपों के नाम भी अलग- अलग-प्रयोग विशेष के आधार पर लिखे गये हैं ।

कुण्डों में चतुरस्र कुण्ड, 
योनि कुण्ड, 
अर्ध चन्द्र कुण्ड, 
अष्टास्त्र कुण्ड, 
सप्तास्त्र कुण्ड, 
पञ्चास्त्र कुण्ड, 
आदि अनेक प्रकार के कुण्डों के खोदने के अनेक विधान हैं ।
कुण्डों के साथ में योनियाँ लगाने का वर्णन है ।

योनियों के भेद-उपभेद एवं अन्तरों का विवेचन है ।

इन सबका उपयोग बहुत बड़े यज्ञों में ही सम्भव है ।
इसी प्रकार अनेक देव-देवियाँ यज्ञ मण्डप के मध्य तथा दिशाओं में स्थापित की जाती हैं ।

साधारण यज्ञों को सरल एवं सर्वोपयोगी बनाने के लिए मोटे आधार पर ही काम करना होगा ।

मण्डप की अपने साधन और सुविधाओं की दृष्टि से पूरी-पूरी सजावट करनी चाहिये और उसके बनाने में कलाप्रियता, कारीगरी एवं सुरुचि का परिचय देना चाहिए ।

रंगीन वस्त्रों, 
रंगीन कागजों, 
केले के पेड़ों आम्र पल्लवों, 
पुष्पों, खम्भों, 
द्वारों, चित्रों, ध्वजाओं, आदर्श वाक्यों, फल आदि के लटकनों से उसे भली प्रकार सजाना चाहिए ।

वेदी का कुण्ड जो कुछ भी बनाया जाय, टेका-तिरछा न हो ।

उसकी लम्बाई-चौड़ाई तथा गोलाई सधी हुई हो ।

कुण्ड या वेदी को रंगविरंगे चौक पूर कर सुन्दर बनाना चाहिये ।

पिसी हुई मेंहदी से हरा रंग, पिसी हल्दी से पीला रंग, आटे से सफेद रंग, गुलाल या रोली से लाल रंग की रेखाएँ खींचकर, चौक को सुन्दर बनाया जा सकता है ।

सर्वतोभद्र, देव-स्थापना की चौकियाँ या वेदियाँ, कलश, जल घट, आसन आदि को बनाने या रखने में भी सौन्दर्य एवं शोभा का विशेष ध्यान रखना चाहिए । 
जिस प्रकार देव मन्दिरों में भगवान की प्रतिमा नाना प्रकार के वस्त्रों, आभूषणों, एवं श्रंङ्गारों से सजाई जाती है, उसी प्रकार यज्ञ भगवान की शोभा के लिए भी पूरी तत्परता दिखाई जानी चाहिये ।

कुण्ड और मण्डप-निर्माण के विधि-विधानों में जहाँ विज्ञान का समावेश है, वहाँ शोभा, सजावट, कला एवं सुरुचि प्रदर्शन भी एक महत्वपूर्ण कारण है ।

कुण्ड और मण्डपों के सम्बन्ध में इस प्रकार के उल्लेख ग्रन्थों में मिलते है

ः- बड़े यज्ञों में ३२ हाथ (४८ फुट) ३६ फुट अर्थात १६ = २४ फुट का चौकोर मण्डप बनाना चाहिये ।

मध्यम कोटि के यज्ञों में १४ (१८ फुट) हाथ अथवा १२ हाथ (१८ फुट) का पर्प्याप्त है ।

छोटे यज्ञों में १० हाथ (१५ फुट ) या ८ (१२ फुट) हाथ की लम्बाई चौडाई का पर्याप्त है ।

मण्डप की चबूतरी जमीन से एक हाथ या आधा हाथ ऊँची रहनी चाहिए ।

बड़े मण्डपों की मजबूती के लिए १६ खंभे लगाने चाहिये ।

खम्भों को रङ्गीन वस्त्रों से लपेटा जाना चाहिए । मण्डप के लिये प्रतीक वृक्षों की लकड़ी तथा बाँस का प्रयोग करना चाहिए ।

मण्डप के एक हाथ बाहर चारों दिशाओं में ४ तोरण द्वार होते हैं,

यह ७ हाथ (१० फुट ६ इंच) उँचे और ३.५ चौड़े होने चाहिए ।

इन तोरण द्वारों में से पूर्व द्वार पर शङ्क,

दक्षिण वाले पर चक्र,

पच्छिम में गदा

और उत्तर में पद्म बनाने चाहिए ।

इन द्वारों में पूर्व में पीपल,

पच्छिम में गूलर

-उत्तर में पाकर,

दक्षिण में बरगद की लकड़ी लगाना चाहिए,

यदि चारों न मिलें तो इनमें से किसी भी प्रकार की चारों दिशाओं में लगाई जा सकती है ।

पूर्व के तोरण में लाल वस्त्र, 
दक्षिण के तोरण में काला वस्त्र, 
पच्छिम के तोरण में सफेद वस्त्र, 
उत्तर के तोरण में पीला वस्त्र लगाना चाहिए ।

सभी दिशाओं में तिकोनी ध्वजाएँ लगानी चाहिये ।

पूर्व में पीली, 
अग्निकोण में लाल, 
दक्षिण में काली, 
नैऋत्य में नीली,
पच्छिम में सफेद, 
वायव्य में धूमिल, 
उत्तर में हरी, 
ईशान में सफेद लगानी चाहिये ।

दो ध्वजाएँ ब्रह्मा और अनन्त की विशेष होती है,

ब्रह्मा की लाल ध्वजा ईशान में

और अनन्त की पीली ध्वजा

नैऋत कोण में लगानी चाहिए ।

इन ध्वजाओं में सुविधानुसार वाहन और आयुध भी चित्रित किये जाते हैं ।

ध्वजा की ही तरह पताकाएं भी लगाई जाती है इन पताकाओं की दिशा और रङ्ग भी ध्वजाओं के समान ही हैं ।

पताकाएं चौकोर होती हैं ।

एक सबसे बड़ा महाध्वज सबसे उँचा होता है ।

मण्डप के भीतर चार दिशाओं में चार वेदी बनती हैं ।

ईशान में ग्रह वेदी,

अग्निकोण में योगिनी वेदी,

नैऋत्य में वस्तु वेदी

और वायव्य में क्षेत्रपाल वेदी,

प्रधान वेदी पूर्व दिशा में होनी चाहिए ।

एक कुण्डी यज्ञ में मण्डप के बीच में ही कुण्ड होता है ।

उसमें चौकोर या कमल जैसा पद्म कुण्ड बनाया जाता हैं । 

कामना विशेष से अन्य प्रकार के कुण्ड भी बनते हैं ।

पंच कुण्डी यज्ञ में आचार्य कुण्ड बीच में,

चतुरस्र पूर्व में,

अर्थचन्द्र दक्षिण में,

वृत पच्छिम में

और पद्म उत्तर में होता है ।

नव कुण्डी यज्ञ में आचार्य कुण्ड मध्य में

चतुररसा्र कुण्ड पूर्व में,

योनि कुण्ड अग्नि कोण में,

अर्धचन्द्र दक्षिण में,

त्रिकोण नैऋत्य में

वृत पच्छिम में,

षडस्र वायव्य में,

पद्म उत्तर में,

अष्ट कोण ईशान में होता है ।

प्रत्येक कुण्ड में ३ मेखलाएं होती हैं ।

ऊपर की मेखला ४ अंगुल,

बीच की ३ अंगुल,

नीचे की २ अँगुल होनी चाहिए ।

ऊपर की मेखला पर सफेद रङ्ग

मध्य की पर लाल रङ्ग

और नीचे की पर काला रङ्ग करना चाहिए ।

५० से कम आहुतियों का हवन करना हो तो कुण्ड बनाने की आवश्यकता नहीं ।

भूमि पर मेखलाएं उठाकर स्थाण्डिल बना लेना चाहिए ।

५० से ९९ तक आहुतियों के लिए २१ अंगुल का कुण्ड होना चाहिए ।

१०० से ९९९ तक के लिए २२.५अँगुल का,

एक हजार आहुतियों के लिए २ हाथ=(१.५)फुट का,

तथा एक लाख आहुतियों के लिए ४ हाथ (६ फुट)का कुण्ड बनाने का प्रमाण है ।

यज्ञ-मण्डप में पच्छिम द्वार से साष्टाङ्ग नमस्कार करने के उपरान्त प्रवेश करना चाहिए ।

हवन के पदार्थ चरु आदि पूर्व द्वार से ले जाने चाहिए ।

दान की सामग्री दक्षिण द्वार से और पूजा प्रतिष्ठा की सामग्री उत्तर द्वार से ले जानी चाहिए ।

कुण्ड के पिछले भाग में योनियों बनाई जाती है ।

इनके सम्बन्ध में कतिपय विद्वानों का मत है कि वह वामार्गी प्रयोग है ।

योनि को स्त्री की मूत्रेन्दि्रय का आकार और उसके उपरिभाग में अवस्थित किये जाने वाले गोलकों को पुरुष अण्ड का चिह्न बना कर वे इसे अश्लील एवं अवैदिक भी बताते हैं ।

अनेक याज्ञिक कुण्डों में योनि-निर्माण के विरुद्ध भी हैं

और योनि-रहित कुण्ड ही प्रयोग करते हैं ।

योनि निर्माण की पद्धति वेदोक्त है या अवैदिक, इस प्रश्न पर गम्भीर विवेचना अपेक्षणीय है ।

लम्बाई, चौड़ाई, सब दृष्टि से चौकोर कुण्ड बनाने का कुण्ड सम्बन्धी ग्रन्थों में प्रमाण है । अनेक स्थानों पर ऐसे कुण्ड बनाये जाते हैं, जो लम्बे चौड़े और गहरे तो समान लम्बाई के होते हैं, पर वे तिरछे चलते हैं और नीचे पेंदे में जाकर ऊपर की अपेक्षा चौथाई-चौड़ाई में रह जाते हैं । इसके बीच में भी दो मेखलाएं लगा दी जाती हैं ।

इस प्रकार बने हुए कुण्ड अग्नि प्रज्ज्वलित करने तथा शोभा एवं सुविधा की दृष्ठि से अधिक उपयुक्त हैं ।

होरा शास्त्र को शुभ और अशुभ कर्म फल की प्राप्ति के लिये उपयोग करते हैं। लग्न और राशि के आधे भाग (१५ अंश) की होरा संज्ञा होती है. सारांश:- भदावरी ज्योतिष सूर्य की होरा राजसेवा के लिये उत्तम है। चन्द्रमा की होरा सर्व कार्य सिद्ध करने के लिये शुभ है। मंगल की होरा युद्ध, कलह, विवाद, लडाई झगडे के लिये,बुध की होरा ज्ञानार्जन के लिये शुभ है। गुरु की होरा विवाह के लिये, शुक्र की होरा विदेशवास के लिये, शनि की होरा धन और द्रव्य इकट्ठा करने के लिये शुभ है. होरा मुहूर्त एवं राहुकाल विचार होरा मुहूर्त एवं राहुकाल विचार होरा मुहूर्त अचूक माने गए हैं। इन मुहूर्तों में किया जाने वाला हर कार्य सिद्ध होता है। सात ग्रहों के सात होरा- हैं, जो दिन रात के 24 घंटों में घूमकर मनुष्य को कार्य सिद्धि के लिए अशुभ समय में भी शुभ अवसर प्रदान करते हैं। सात ग्रहों के सात होरा राज सेवा के लिए सूर्य का होरा यात्रा के लिए शुक्र का होरा ज्ञानार्जन के लिए बुध का होरा सभी कार्यों की सिद्धि के लिए चंद्र का होरा द्रव्य संग्रह के लिए शनि का होरा विवाह के लिए गुरु का होरा युद्ध, कलह और विवाद में विजय के लिए मंगल का होरा प्रत्येक होरा एक घंटे का होता है। जिस दिन जो वार होता है, उस वार के सूर्योदय के समय 1 घंटे तक उसी वार का होरा रहता है। उसके बाद एक घंटे का दूसरा होरा उस वार से छठे वार का होता है।

विद्वान लोग होरा शास्त्र को शुभ और अशुभ कर्म फल की प्राप्ति के लिये उपयोग करते हैं। लग्न और राशि के आधे भाग (१५ अंश) की होरा संज्ञा होती है.

सारांश:-

भदावरी ज्योतिष सूर्य की होरा राजसेवा के लिये उत्तम है।

चन्द्रमा की होरा सर्व कार्य सिद्ध करने के लिये शुभ है।

मंगल की होरा युद्ध, कलह, विवाद, लडाई झगडे के लिये

,बुध की होरा ज्ञानार्जन के लिये शुभ है।

गुरु की होरा विवाह के लिये,

शुक्र की होरा विदेशवास के लिये,

शनि की होरा धन और द्रव्य इकट्ठा करने के लिये शुभ है.

होरा मुहूर्त एवं राहुकाल विचार होरा मुहूर्त एवं राहुकाल विचार होरा मुहूर्त अचूक माने गए हैं।

इन मुहूर्तों में किया जाने वाला हर कार्य सिद्ध होता है।

सात ग्रहों के सात होरा- हैं, जो दिन रात के 24 घंटों में घूमकर मनुष्य को कार्य सिद्धि के लिए अशुभ समय में भी शुभ अवसर प्रदान करते हैं।

सात ग्रहों केसात होरा राज सेवा के लिएसूर्य का होरा

यात्रा के लिएशुक्र का होरा

ज्ञानार्जन के लिएबुध का होरा

सभी कार्यों की सिद्धि के लिएचंद्र का होरा

द्रव्य संग्रह के लिएशनि का होरा

विवाह के लिएगुरु का होरा

युद्ध, कलह और विवाद में विजय के लिएमंगल का होरा

प्रत्येक होरा एक घंटे का होता है। जिस दिन जो वार होता है, उस वार के सूर्योदय के समय 1 घंटे तक उसी वार का होरा रहता है

उसके बाद एक घंटे का दूसरा होरा उस वार से छठे वार का होता है।

इसी प्रकार दूसरे होरे के वार से छठे वार का होरा तीसरे घंटे तक रहता है।

इस क्रम से 24 घंटे में 24 होरा बीतने पर अगले वार के सूर्योदय के समय उसी (अगले) वार का होरा आ जाता है।

यहां प्रत्येक वार के 24 घंटों का होरा चक्र दिया गया है:

होरा चक्रम उदाहरण के लिए मान लें आज गुरुवार है और आज ही आपको कहीं जाना है।

ऊपर बताया गया है कि शुक्र का होरा यात्रा के लिए श्रेष्ठ होता है।
अतः मालूम करना है कि आज गुरुवार को शुक्र का होरा किस-किस समय रहेगा।

चक्र में गुरुवार के सामने वाले खाने में देखें तो पाएंगे कि चैथे और ग्यारहवें घंटे में शुक्र का होरा है।

बिना सारणी के होरा ज्ञात करने की विधि:-

किसी भी वार का प्रथम होरा उसी वार से प्रारंभ होता है।

उस वार से विपरीत क्रम से वारों को एक-एक के अंतर से गिनें।
जैसे बुधवार को प्रथम होरा बुध का,
तत्पश्चात विपरीत क्रम से मंगल को छोड़कर चंद्र का होरा
एवं रवि को छोड़कर शनि का होरा होगा।

इसी क्रम से आगे शेष 21 होरा उस दिन व्यतीत होंगे।

होरा शास्त्र कार्य सिद्धि का अचूक शास्त्रीय माध्यम है

किसी भी व्यक्ति को विशेष कार्य की शुरुआत करनी हो तो वो उसे विशेष मुहूर्त मे ही काम करना चाहता है.ज्योतिष शास्त्र मे होरा चक्र का निर्माण किया गया है जिसे आप स्वयं देख कर किसी भी कार्य की शुरुआत कर सकते है

जिससे आप का कार्य सफल हो जायेकभी कभी बहुत ज़रूरी होने पर हम पंडितजी के पास नही जा पाते या कोई अन्य काम पड़ जाता हैं जिससे हम समय पर काम करने का सही व उचित समय नही जान पाते, इन सभी परेशानियो को ध्यान में रखकर ज्योतिषशास्त्र में होरा चक्र का निर्माण किया गया,जिससे आप किसी भी दिन स्वयं होरा देखकर कोई भी काम कर सकते हैं |

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक होरा (दिन-रात)में २४ होराएँ होती हैं जिन्हें हम २४ घंटो के रूप में जानते हैं जिसके आधार पर हर एक घंटे की एक होरा होती हैं जो किसी ना किसी ग्रह की मानी जाती हैं|

प्रत्येक वार की प्रथम होरा उस ग्रह की होती हैं जिसका वो वार होता हैं

जैसे यदि रविवार हैं तो पहली होरा सूर्य की ही होगी|
होराओ का क्रम- प्रत्येक ग्रह की पृथ्वी से जो दुरी हैं उस हिसाब से ही होरा चक्र बनाया गया हैं आईये देखते हैं की होरा कैसे देखी जातीं हैं

|मान लेते हैं की हमें रविवार के दिन किसी भी ग्रह की होरा देखनी हो तो हम उसे इस प्रकार से देखेंगे|

पहली होरा -सूर्य ग्रह की होगी

दूसरी होरा -शुक्र ग्रह की होगी
तीसरी होरा -बुध ग्रह की होगी
चौथी होरा-चंद्र ग्रह की होगी
पांचवी होरा -शनि ग्रह की होगी
छठी होरा -गुरु ग्रह की होगी
सातवी होरा -मंगल ग्रह की होगी
आठवी होरा फ़िर से सूर्य की ही होगी

तथा यह क्रमश: ऐसे ही चलता रहेगा| इस प्रकार जो भी वार हो उसी वार की होरा से आगे की होरा निकाली जा सकती हैं तथा अपने महत्वपूर्ण कार्य किए जा सकते हैं| विभिन्न ग्रहों की होरा में कुछ निश्चित कार्य किए जाए तो सफलता निश्चित ही प्राप्त होती हैं |

सूर्य की होरा – सरकारी नौकरी ज्वाइन करना,चार्ज लेना और देना,अधिकारी से मिलना,टेंडर भरना व मानिक रत्न धारण करना|

चंद्र की होरा – यह होरा सभी कार्यो हेतु शुभ मानी जाती हैं|

मंगल की होरा- पुलिस व न्यायालयों से सम्बंधित कार्य व नौकरी ज्वाइन करना, जुआ सट्टा लगाना,क़र्ज़ देना, सभा समितियो में भाग लेना,मूंगा एवं लहसुनिया रत्न धारण करना| बुध की होरा– नया व्यापार शुरू करना,लेखन व प्रकाशन कार्य करना,प्रार्थना पत्र देना,विद्या शुरू करना,कोष संग्रह करना,पन्ना रत्न धारण करना |

गुरु की होरा – बड़े अधिकारियो से मिलना,शिक्षा विभाग में जाना व शिक्षक से मिलना,विवाह सम्बन्धी कार्य करना,पुखराज रत्न धारण करना |

शुक्र की होरा – नए वस्त्र पहनना,आभूषण खरीदना व धारण करना,फिल्मो से सम्बंधित कार्य करना ,मॉडलिंग करना,यात्रा करना,हीरा व ओपल रत्न पहनना|

शनि की होरा – मकान की नींव खोदना व खुदवाना,कारखाना शुरू करना,वाहन व भूमि खरीदना,नीलम व गोमेद रत्न धारण करना|

इस प्रकार ग्रह की होरा में कार्य सफलता हेतु किए जा सकते हैं | इस प्रकार विभिन्न ग्रह की होरा में विभिन्न कार्य सफलता हेतु किए जा सकते हैं।

राहुकाल विचार:-

प्रत्येक दिन दिनमान अर्थात सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के कुल समय का आठवां भाग राहुकाल कहलाता है।

इस भाग का स्वामी राहु होता है इसे बहुत अनिष्टकारी मानते हैं। इसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। निम्न सारणी में प्रत्येक वार के नीचे उसका गुणक दिया गया है, जिसके आधार पर राहुकाल का समय ज्ञात किया जा सकता है।

राहुकाल ज्ञात करने की विधि-

स्थानीय दिनमान ज्ञात करके उसके आठ समान भाग करें।
अभीष्ट वार के गुणक से अष्टमांश को गुणा करके उसे सूर्योदय में काल जोड़ दें तो राहुकाल का आरंभ मालूम होगा।
उसमें दिनमान के 1/8 भाग के समय को जोड़ने पर जो समय आएगा, उतने बजे तक राहुकाल रहेगा।
राहुकाल गुणक उदाहरणस्वरूप–
17 जून 1999को कानपुर में सूर्योदय 05 बजकर 14मिनट पर एवं सूर्यास्त 18 बजकर 48 मिनट पर हुआ।

अतः 18.48 – 5 14 बराबर 13.34 घंटे दिनमान हुआ।
इस दिनमान में 08 से भाग दिया तो लगभग 01 घंटा 42मिनट का 01 भाग हुआ। अब 17 जून को सोमवार होने में गुणक 01 है। 01 घंटा 42 मिनट में 01 का गुणा किया तो 01 घंटा 42मिनट ही आया।

फिर सूर्योदय 5.14 में 01 घंटा 42 मिनट जोड़ा तो समय आया 6 घंटा 56 मिनट। अतः 16 जून सोमवार को राहुकाल का आरंभ 6 बजकर56 मिनट पर हुआ।

इसमें 01 घंटा 42 मिनट का एक भाग जोड़ दिया तो समय आया 08 घंटा 38 मिनट। अतः 17 जून 1996 सोमवार को राहुकाल का समय प्रातः6 बजकर 56 मिनट से 8 बजकर 38 मिनट तक रहा।

उत्तर भारत में चैघड़िया, मिथिला एवं बंगाल में यामार्ध एवं दक्षिण भारत में राहुकाल को देखकर ही शुभ कार्य करने की प्रथा है।

अतः अशुभ यामार्ध, राहुकाल में यात्रा,धन-निवेश, कार्यारंभ आदि तो वर्जित है।

इस समय लोग हवन की पूर्णहुति भी नहीं देते।

होरा कुण्डली:-

इस कुण्डली से जातक के पास धन-सम्पत्ति का आंकलन किया जाता है.
इस कुण्डली को बनाने के लिए 30 अंश को दो बराबर भागों में बाँटेंगें. 15 -15अंश के दो भाग बनते हैं.
कुण्डली को दो भागों में बाँटने पर ग्रह केवल सूर्य या चन्द्रमा की होरा में आएंगें.

कुण्डली दो भागों, सूर्य तथा चन्द्रमा की होरा में बँट जाती है.

समराशि में 0 से 15 अंश तक चन्द्रमा की होरा होगी.
15 से 30 अंश तक सूर्य की होरा होगी .

विषम राशि में यह गणना बदल जाती है. 0 से 15अंश तक सूर्य की होरा होगी. 15 से 30 अंश तक चन्द्रमा की होरा होगी.

माना मिथुन लग्न 22 अंश का है. यह विषम लग्न है.

विषम लग्न में लग्न की डिग्री 15 से अधिक है तब होरा कुण्डली में चन्द्रमा की होरा उदय होगी अर्थात होरा कुण्डली के प्रथम भाग में कर्क राशि आएगी और दूसरे भाग में सूर्य की राशि सिंह आएगी.

अब ग्रहों को भी इसी प्रकार स्थापित किया जाएगा. माना बुध 17 अंश का मकर राशि में जन्म कुण्डली में स्थित है.
मकर राशि समराशि है और बुध 17 अंश का है.

समराशि में 15 से 30अंश के मध्य ग्रह सूर्य की होरा में आते हैं तो बुध सूर्य की होरा में लिखा जाएगा.

सिंह राशि में बुध को लिख देगें.

Gurudev Bhubaneswar
Kasturba nagar
Parnkuti guna
9893946810

Monday, 12 February 2018

चोरी का पता लगता है, उस समय को नोट कर लीजिये, प्रश्न कुंडली बनायें।

जब भी चोरी का पता लगता है, उस समय को नोट कर लीजिये, प्रश्न कुंडली बनायें।
मेष या वृषभ लग्न- पूर्व दिशा
मिथुन लग्न- अग्नि कोण
कर्क लग्न- दक्षिण
सिंह लग्न- नैरित्य कोण
कन्या लग्न- उत्तर दिशा
तुला और वृश्चिक लग्न- पश्चिम दिशा
धनु लग्न- वायव्य कोण
मकर और कुम्भ लग्न- उत्तर दिशा
मीन लग्न- इशान कोण

उपरोक्त लग्नों में खोयी वस्तु, उसके दिखाए गए लग्नो के सामने की दिशा में गयी है। चोरी करने वाला कौन हो सकता है ? नीचे लिखे लग्नों के आधार पर पता लगाया जा सकता है।

मेष लग्न- ब्राह्मण या सम्मानीय भद्र पुरुष
वृषभ लग्न- क्षत्रिय
मिथुन लग्न- वेश्य
कर्क लग्न- शुद्र या सेवक वर्ग
सिंह लग्न- स्वजन या आत्मीय व्यक्ति
कन्या लग्न- कुलीन स्त्री ,घर की बहू -बेटी या बहन
तुला लग्न- पुत्र ,भाई या जमाता
वृश्चिक लग्न- इतर जाति का व्यक्ति
धनु लग्न- स्त्री
मकर लग्न- वेश्य या व्यापारी

चोरी हुई वस्तु कहां छिपाई गयी?
-लग्नेश और सप्तमेश का आपस में परिवर्तन या दोनों एक ही भाव में हो तो वस्तु घर में ही कहीं छुपी या छुपाई गयी है।

-चंद्रमा अगर लग्न में हो तो वस्तु पूर्व दिशा में होगी और अगर सप्तम में हो तो वस्तु पश्चिम में मिलेगी।

चंद्रमा अगर दशम ने हो तो दक्षिण और चतुर्थ में हो तो वस्तु उत्तर दिशा में मिलेगी। -

अगर लग्न में अग्नितत्व राशि ( मेष, सिंह, धनु ) हो तो वस्तु घर के पूर्व, अग्नि -स्थान, रसोई घर में ही मिल जाती है।

-लग्न में अगर पृथ्वी -तत्व राशि ( वृषभ, कन्या, मकर ) हो तो वस्तु दक्षिण दिशा में भूमि में दबी मिलेगी।

-अगर लग्न में वायु -तत्व राशि ( मिथुन, तुला, कुम्भ ) हो तो वस्तु पश्चिम दिशा में हवा में लटकाई गयी है। -लग्न में जल-तत्व राशि ( कर्क, वृश्चिक, कुम्भ ) हो तो वस्तु जलाशय के पास या उसके आस-पास उत्तर दिशा में मिलेगी।

महाशिवरात्रि व्रत में निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी ग्राह्य है। इस वर्ष तिथि त्रयोदशी तथा चतुर्दशी दोनो दिन निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी प्राप्त होने से दिनद्वय महाशिवरात्रि व्रत का योग है। किन्तु ऐसी स्थिति में स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, स्मृतिग्रन्थ आदि के वचनों के अनुसार जया (त्रयोदशी) युक्त तथा भद्रा युक्त निशीथ  व्यापिनी चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि व्रत करना चाहिए ।

महाशिवरात्रिव्रत निर्णय/-

महाशिवरात्रि व्रत में निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी ग्राह्य है।
इस वर्ष तिथि त्रयोदशी तथा चतुर्दशी दोनो दिन निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी प्राप्त होने से दिनद्वय महाशिवरात्रि व्रत का योग है। किन्तु ऐसी स्थिति में स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, स्मृतिग्रन्थ आदि के वचनों के अनुसार जया (त्रयोदशी) युक्त तथा भद्रा युक्त निशीथ  व्यापिनी चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि व्रत करना चाहिए ।

त्रयोदशी यदा देवी
दिनयुक्ति प्रमाणतः।।
जागरे शिवरात्रि:स्मानिशि
पूर्णा चतुर्दशी।।
जयन्ती शिवरात्रिश्च
कार्ये भद्राजयान्विते ।।(स्कन्दपुराण)

भवेद्यत्र त्र्योदश्यां
भूतव्याप्ता महानिशा।। 
शिवरात्रि व्रतं तत्र
कुर्याजागरणमं तथा।।
(स्मृति)
ि फाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि होती है।
परन्तु इसके निर्णय के प्रसंग में कुछ आचार्य प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी तो कुछ निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी में महाशिवरात्रि मानते है।
परन्तु अधिक वचन निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी के पक्ष में ही प्राप्त होते है।
कुछ आचार्यों जिन्होने प्रदोष काल व्यापिनी को स्वीकार किया है वहाॅं उन्होने प्रदोष का अर्थ ‘अत्र प्रदोषो रात्रिः’ कहते हुए रात्रिकाल किया है।

ईशान संहिता में स्पष्ट वर्णित है कि ‘‘

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्याम् आदि देवो महानिशि।
शिवलिंगतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः।।

तत्कालव्यापिनी ग्राहृा शिवरात्रिव्रते तिथिः।।’

फाल्गुनकृष्ण चतुर्दशी की मध्यरात्रि में आदिदेव भगवान शिव लिंग रूप में अमितप्रभा के साथ उद्- भूूूत हुए अतः अर्धरात्रि से युक्त चतुर्दशी ही शिवरात्रि व्रत में ग्राहृा है।

धर्मशास्त्रीय उक्त वचनों के अनुसार इस वर्ष

दिनांक 13/02/2018 ई. को चतुर्दशी का आरम्भ रात्रि 10ः 22 बजे हो रहा है
तथा इसकी समाप्ति अग्रिम दिन दिनांक 14/02/2017 ई. को रात्रि 12: 17 मिनट पर हो रही है।

अतः ‘एकैक व्याप्तौ तु निशीथ निर्णयः’’

शास्त्र वचनों के अनुसार 13 फरवरी 2018 मंगलवार को  ही शिवरात्रि व्रत करना उचित है l

Sunday, 11 February 2018

जानिए महाशिवरात्रि निर्णय (13 को मनायें या 14 को)

जानिए महाशिवरात्रि निर्णय (13 को मनायें या 14 को)

सनातन धर्म में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व प्रतिपादित है। भगवान शिव की आराधना का यह विशेष पर्व माना जाता है।
पौराणिक तथ्यानुसार आज ही के दिन भगवान शिव की लिंग रूप में उत्पत्ति हुई थी।
प्रमाणान्तर से इसी दिन भगवान शिव का देवी पार्वती से विवाह हुआ है।
अतः सनातन धर्मावलम्बियों द्वारा यह व्रत एवं उत्सव दोनों में अति हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
वैसे तो सम्पूर्ण भारतवर्ष में इसकी महिमा प्रथित है परन्तु भगवान आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित द्वादश ज्योतिर्लिगों के क्षेत्र में तथा उनमें भी तीनों लोकों से अलग शिवलोक के रूप में प्रतिष्ठित काशी एवं यहाँ पर विराजमान भगवान विश्वेश्वर के सान्निध्य में तो भक्ति एवं उत्सव का समवेत स्वरूप देखते ही बनता है ।

वैसे तो प्रतिवर्ष शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है परन्तु इस वर्ष कुछ पंंचांगकारोंं एवं धर्माधिकारियों के द्वारा इस पर्व की तिथि को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है।
इस सम्बन्ध में कुछ लोग 13 फरवारी तो कुछ लोग 14 फरवरी को इसके आयोजन एवं अनुष्ठान का उपदेश कर रहे हैं।
परन्तु हमारी सनातन व्यवस्था में इसका ठीक-ठीक निर्धारण ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र के सामञ्जस्य से ही सम्भव है।
विचार विमर्शपूर्वक देखा गया कि फाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि होती है।
परन्तु इसके निर्णय के प्रसंग में कुछ आचार्य प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी तो कुछ निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी में महाशिवरात्रि मानते है।
परन्तु अधिक वचन निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी के पक्ष में ही प्राप्त होते है।
कुछ आचार्यों जिन्होने प्रदोष काल व्यापिनी को स्वीकार किया है वहाॅं उन्होने प्रदोष का अर्थ ‘अत्र प्रदोषो रात्रिः’ कहते हुए रात्रिकाल किया है।

ईशान संहिता में स्पष्ट वर्णित है कि ‘‘

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्याम् आदि देवो महानिशि।
शिवलिंगतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः।।

तत्कालव्यापिनी ग्राहृा शिवरात्रिव्रते तिथिः।।’

फाल्गुनकृष्ण चतुर्दशी की मध्यरात्रि में आदिदेव भगवान शिव लिंग रूप में अमितप्रभा के साथ उद्- भूूूत हुए अतः अर्धरात्रि से युक्त चतुर्दशी ही शिवरात्रि व्रत में ग्राहृा है।

धर्मशास्त्रीय उक्त वचनों के अनुसार इस वर्ष

दिनांक 13/02/2018 ई. को चतुर्दशी का आरम्भ रात्रि 10ः 22 बजे हो रहा है
तथा इसकी समाप्ति अग्रिम दिन दिनांक 14/02/2017 ई. को रात्रि 12: 17 मिनट पर हो रही है।

अतः ‘एकैक व्याप्तौ तु निशीथ निर्णयः’’

इस धर्मशास्त्रीय वचन के अनुसार चतुर्दशी 13 फरवरी को निशीथ काल एवं 14 फरवरी को प्रदोष काल में प्राप्त हो रही है ऐसे स्थिति में निशीथ के द्वारा ही इस वर्ष शिवरात्रि का निर्णय किया जाएगा।

निशीथ का अर्थ सामान्यतया लोग अर्धरात्रि कहते हुए 12 बजे रात्रि से लेते है परन्तु निशीथ काल निर्णय हेतु भी दो वचन मिलते है माधव ने कहा है कि रात्रिकालिक चार प्रहरों में द्वितीय प्रहर की अन्त्य घटी एवं तृतीय प्रहर के आदि की एक घटी को मिलाकर दो घटी निशीथ काल होते है।

मतान्तर से रात्रि कालिक पन्द्रह मुहूर्त्तो्ं में आठवां मुहूर्त निशीथ काल होता है।

अतः इस वर्ष 13 फरवरी को निशीथकाल 11: 34:30 से 12: 26: 00 तक तथा 14 फरवरी 11:35:38 से 12:27:02  तक तथा प्रमाणान्तर दोनों दिवसों में रात्रि 11 बजे से 01 बजे तक हो रहा है।

अतः ‘‘
पूरे द्युः प्रागुक्तार्धरात्रस्यैकदेशव्याप्तौ पूर्वेद्युः ’’

वचन के अनुसार 14 फरवरी को (रात्रि 11:35:38 से 12: 27: 02 बजे तक) पूर्ण निशीथ काल के पूर्व 12:17 मिनट पर चतुर्दशी समाप्त हो जाने से पूर्ण निशीथ व्यापिनी नहीं मानी जा सकती।

अत एव स्पष्ट से धर्मशास्त्रीय वचनानुसार दिनांक 13 फरवरी को ही महाशिवरात्रि व्रतोत्सव मनाया जाएगा।

इसी आशय से काशी के महत्वपूर्ण पंचाङगो मे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित श्रीविश्वपञ्चाग एवं शिवमूर्ति हृषीकेशपंचांगो आदि में भी दिनांक 13 फरवरी को ही महाशिवरात्रि लिखा गया है।

अत: दिनांक 13 फरवरी को ही महाशिवरात्रि  मनायी जायेगी

गुरुदेव
Bhuvnesh we
Kasturba nagar
Par kuti guna
9893946810