ज्योतिष समाधान

Sunday, 28 December 2025

पंचांग

भारतीय पञ्चाङ्ग की वैज्ञानिकता 

'पंचांग' भारतीयों द्वारा माना जाने वाला वैज्ञानिक कैलेंडर है। 

पंचांग (पंच + अंग = पांच अंग) वैदिक काल-गणना की रीति से निर्मित पारम्परिक कैलेण्डर या कालदर्शक को कहते हैं। 
पंचांग नाम पाँच प्रमुख भागों से बने होने के कारण है, यह है- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। 
वैदिक गणना के आधार पर पंचांग की तीन धाराएँ हैं-
 पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित  पद्धति। 

एक साल में १२ महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में १५ दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में २७ नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं। १२ मास का एक वर्ष और ७ दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। यह १२ राशियाँ बारह सौर मास हैं। जिस दिन सूर्य जिस राशि मे प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र मे होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से ११ दिन ३ घड़ी ४८ पल छोटा है। इसीलिए हर ३ वर्ष मे इसमे एक महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मास कहते हैं।

== तिथि ==15/12/1990

एक दिन को तिथि कहा गया है जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक की होती है। चंद्र मास में ३० तिथियाँ होती हैं, जो दो पक्षों में बँटी हैं। शुक्ल पक्ष में एक से चौदह और फिर पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा सहित कुल मिलाकर पंद्रह तिथि। कृष्ण पक्ष में एक से चौदह और फिर अमावस्या आती है। अमावस्या सहित पंद्रह तिथि।

तिथियों के नाम निम्न हैं- पूर्णिमा (पूरनमासी), 
प्रतिपदा (पड़वा), 
द्वितीया (दूज), 
तृतीया (तीज), 
चतुर्थी (चौथ), 
पंचमी (पंचमी), 
षष्ठी (छठ), 
सप्तमी (सातम), 
अष्टमी (आठम), 
नवमी (नौमी), 
दशमी (दसम), 
एकादशी (ग्यारस), 
द्वादशी (बारस), 
त्रयोदशी (तेरस), 
चतुर्दशी (चौदस) 
और अमावस्या (अमावस)।

== वार == day एक सप्ताह में सात दिन होते हैं:-
सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार और रविवार

== नक्षत्र ==14!40

आकाश में तारामंडल के विभिन्न रूपों में दिखाई देने वाले आकार को नक्षत्र कहते हैं। मूलत: नक्षत्र 27 माने गए हैं। 
ज्योतिषियों द्वारा एक अन्य अभिजित नक्षत्र भी माना जाता है। चंद्र

Friday, 19 December 2025

विवाह में वर्जित नक्षत्र

"विवाह-मुहूर्त में वर्जित तारा (नक्षत्र)" 

✓•भूमिका: भारतीय वैदिक परम्परा में विवाह केवल सामाजिक अनुबन्ध नहीं, अपितु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की समन्वित साधना का प्रारम्भिक संस्कार है। इसी कारण विवाह को षोडश संस्कारों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

गृह्यसूत्र, स्मृतियाँ तथा ज्योतिष-ग्रन्थ स्पष्ट करते हैं कि विवाह कालविशेष में सम्पन्न होना चाहिए, क्योंकि काल स्वयं दैव-शक्ति का मूर्त रूप है। इसी काल का सूक्ष्म विभाजन नक्षत्र (तारा) द्वारा किया गया है। अतः विवाह-मुहूर्त में तारा-शुद्धि का विशेष विचार अनिवार्य माना गया है।

✓•तारा (नक्षत्र) का शास्त्रीय स्वरूप:
ऋग्वेद से लेकर सिद्धान्त ज्योतिष तक नक्षत्रों को दैवी शक्तियों के अधिष्ठान के रूप में स्वीकार किया गया है।
तैत्तिरीय ब्राह्मण (१.५.१) में कहा गया है—

“नक्षत्राणि वै देवानां गृहाः।”

अर्थात् नक्षत्र देवताओं के निवास-स्थल हैं।
अतः जिस नक्षत्र में विवाह होता है, उसी के अनुरूप दैव-फल दाम्पत्य जीवन में प्रकट होता है।

✓•विवाह में तारा-विचार का आधार:
विवाह में नक्षत्रों का विचार निम्न आधारों पर किया जाता है—
•१. स्वभाव (उग्र, मृदु, ध्रुव आदि)
•२. दोषजनक प्रवृत्ति (मृत्यु, संघर्ष, शोक)
•३. गृहस्थ-धर्म के अनुकूलता-विरोध
•४. सन्तान, आयु एवं सौभाग्य पर प्रभाव

✓•शास्त्रों में विवाह हेतु वर्जित नक्षत्र:
•१. आर्द्रा नक्षत्र
स्वभाव – उग्र
अधिदेवता – रुद्र
बृहत्संहिता (मुहूर्ताध्याय) कहती है—

 “आर्द्रायां विवाहः शोक-कलहप्रदः।”

आर्द्रा का रुद्रात्मक स्वरूप अश्रु, वेदना, विछोह और मानसिक अस्थिरता उत्पन्न करता है।
अतः विवाह जैसे सौम्य संस्कार के लिए यह नक्षत्र वर्जित है।

•२. आश्लेषा नक्षत्र:
स्वभाव – दारुण, विषद
अधिदेवता – नाग
मुहूर्तचिन्तामणि में कहा गया है—

 “आश्लेषायां कृतो विवाहो दम्पत्ये विषसदृशः।”

आश्लेषा का प्रभाव छल, अविश्वास, दाम्पत्य विषाद एवं षड्यन्त्र की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है।
विशेषतः स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में यह नक्षत्र अत्यन्त घातक माना गया है।

•३. ज्येष्ठा नक्षत्र:
स्वभाव – उग्र
अधिदेवता – इन्द्र
नारदसंहिता में उल्लेख है—

 “ज्येष्ठायां न विवाहः कार्यः, ज्येष्ठत्वात् कलहप्रदा।”

‘ज्येष्ठ’ का अर्थ ही है प्रधानता और अहंकार।
इस नक्षत्र में विवाह होने पर दाम्पत्य में अधिकार-संघर्ष, स्वाभिमान-टकराव और वर्चस्व-युद्ध उत्पन्न होता है।

•४. मूल नक्षत्र:
स्वभाव – तीक्ष्ण, विध्वंसक
अधिदेवता – निर्ऋति
बृहत्संहिता (८७.२८)—

 “मूले न विवाहो नोपनयनं च।”

मूल नक्षत्र को सर्वाधिक अशुभ माना गया है।
यह नक्षत्र वंश-नाश, आयु-क्षय, अकाल वैधव्य और सन्तान-दोष से सम्बन्धित है।

•५. पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र:
स्वभाव – उग्र
अधिदेवता – आपः
यद्यपि कुछ ग्रन्थ इसे सामान्यतः शुभ कहते हैं, किन्तु विवाह हेतु—
मुहूर्तमार्तण्ड स्पष्ट करता है—

 “पूर्वाषाढायां विवाहे दम्पत्ये पराभवः।”

यह नक्षत्र दाम्पत्य में पराजय-भाव, वैचारिक संघर्ष और परस्पर असन्तोष उत्पन्न करता है।

•६. कृत्तिका नक्षत्र (विशेष परिस्थितियों में वर्जित):
स्वभाव – तीक्ष्ण
अधिदेवता – अग्नि
कृत्तिका में विवाह करने पर—
 अग्नि-तत्त्व की अधिकता से क्रोध, ताप और दाम्पत्य दहन की सम्भावना मानी गई है।
विशेषतः यदि मंगल, सूर्य अथवा शनि का प्रभाव हो, तो कृत्तिका पूर्णतः वर्ज्य मानी जाती है।

✓•विवाह में ग्राह्य नक्षत्र (संक्षेप):
तुलनात्मक दृष्टि से शास्त्रों ने निम्न नक्षत्रों को विवाह के लिए श्रेष्ठ बताया है—
•रोहिणी
•मृगशिरा
•उत्तराफाल्गुनी
•हस्त
•स्वाति
•अनुराधा
•उत्तराषाढ़ा
•रेवती

✓•तारा-दोष का दाम्पत्य जीवन पर प्रभाव:
शास्त्रों के अनुसार विवाह में वर्जित तारा होने पर—
वैवाहिक जीवन में अकाल कलह
सन्तान-विघ्न
आर्थिक अस्थिरता
मानसिक असन्तुलन
वैधव्य अथवा दाम्पत्य विच्छेद
जैसे परिणाम प्रकट हो सकते हैं।

✓•गृह्यसूत्रीय दृष्टिकोण:
पारस्कर गृह्यसूत्र (१.४.१४) कहता है—

 “शुभे नक्षत्रे विवाहः कार्यः।”

यह सूत्र स्पष्ट करता है कि विवाह केवल शुभ नक्षत्र में ही सम्पन्न होना चाहिए; अन्यथा संस्कार निष्फल हो जाता है।

✓•निष्कर्ष:
विवाह-मुहूर्त में तारा-विचार कोई गौण या लोकाचार नहीं, बल्कि वैदिक, स्मार्त और ज्योतिषीय परम्परा का मूल स्तम्भ है।
आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा तथा परिस्थितिजन्य कृत्तिका जैसे नक्षत्रों में विवाह करने से दाम्पत्य जीवन में शोक, संघर्ष, अस्थिरता और क्लेश की सम्भावना शास्त्रसम्मत रूप से स्वीकारी गई है।
अतः विवेकपूर्ण ज्योतिषीय दृष्टि से कहा जा सकता है कि—
 “विवाह का काल जितना शुद्ध, दाम्पत्य उतना ही स्थिर और सौभाग्यपूर्ण होता है.    
                            

Wednesday, 17 December 2025

गोत्र

ब्राह्मण वंशावली (गोत्र प्रवर परिचय)
सरयूपारीण ब्राह्मण या सरवरिया ब्राह्मण या सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के पूर्वी तरफ बसे हुए ब्राह्मणों को कहा जाता है। यह कान्यकुब्ज ब्राह्मणो कि शाखा है। श्रीराम ने लंका विजय के बाद कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से यज्ञ करवाकर उन्हे सरयु पार स्थापित किया था। सरयु नदी को सरवार भी कहते थे। ईसी से ये ब्राह्मण सरयुपारी ब्राह्मण कहलाते हैं। सरयुपारी ब्राह्मण पूर्वी उत्तरप्रदेश, उत्तरी मध्यप्रदेश, बिहार छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में भी होते हैं। मुख्य सरवार क्षेत्र पश्चिम मे उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या शहर से लेकर पुर्व मे बिहार के छपरा तक तथा उत्तर मे सौनौली से लेकर दक्षिण मे मध्यप्रदेश के रींवा शहर तक है। काशी, प्रयाग, रीवा, बस्ती, गोरखपुर, अयोध्या, छपरा इत्यादि नगर सरवार भूखण्ड में हैं।

एक अन्य मत के अनुसार श्री राम ने कान्यकुब्जो को सरयु पार नहीं बसाया था बल्कि रावण जो की ब्राह्मण थे उनकी हत्या करने पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए जब श्री राम ने भोजन ओर दान के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रित किया तो जो ब्राह्मण स्नान करने के बहाने से सरयू नदी पार करके उस पार चले गए ओर भोजन तथा दान समंग्री ग्रहण नहीं की वे ब्राह्मण सरयुपारीन ब्राह्मण कहे गए।

सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव : 

गर्ग (शुक्ल- वंश)

गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज  कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|

(१) मामखोर (२) खखाइज खोर  (३) भेंडी  (४) बकरूआं  (५) अकोलियाँ  (६) भरवलियाँ  (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार  गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं।

उपगर्ग (शुक्ल-वंश):

उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|
(१)बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार
यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।

गौतम (मिश्र-वंश):

गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|
(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी
इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।

उप गौतम (मिश्र-वंश):

उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|
(१)  कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े  (६) कपीसा
इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति  मानी जाति है।

वत्स गोत्र (मिश्र- वंश):

वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|
(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा
बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।

कौशिक गोत्र (मिश्र-वंश):

तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है।
(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी

वशिष्ठ गोत्र (मिश्र-वंश):

इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है।
(१) बट्टूपुर  मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी

शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश) 

शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं।

(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ  (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है।
इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे  राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है। 

उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश):

इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं।
(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा
भार्गव गोत्र (तिवारी  या त्रिपाठी वंश):
भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें  चार गांवों का उल्लेख मिलता है|
(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक  (३) चेतियाँ  (४) मदनपुर।

भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश):

भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बाये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|
(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार

कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन  इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा  बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गादी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें। सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।

सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)

सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं| 

(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी) 

सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)

सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बाते जाते हैं|

(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ

कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)

इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।

(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ  (३) ढडमढीयाँ 

ओझा वंश 
इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।

(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां 

चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)

इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है।

(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां 

एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है।

ब्राह्मणों की वंशावली
भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से दोनों कुरुक्षेत्र वासनी
सरस्वती नदी के तट पर गये और कण् व चतुर्वेदमय सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें 
वरदान दिया। वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका  क्रमानुसार नाम था👉

उपाध्याय,
दीक्षित,
पाठक,
शुक्ला,
मिश्रा,
अग्निहोत्री,
दुबे,
तिवारी,
पाण्डेय,
और
चतुर्वेदी।

इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने अपनी कन्याए प्रदान की।
वे क्रमशः

उपाध्यायी,
दीक्षिता,
पाठकी,
शुक्लिका,
मिश्राणी,
अग्निहोत्रिधी,
द्विवेदिनी,
तिवेदिनी
पाण्ड्यायनी,
और
चतुर्वेदिनी कहलायीं।

फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम -

कष्यप,
भरद्वाज,
विश्वामित्र,
गौतम,
जमदग्रि,
वसिष्ठ,
वत्स,
गौतम,
पराशर,
गर्ग,
अत्रि,
भृगडत्र,
अंगिरा,
श्रंगी,
कात्याय,
और
याज्ञवल्क्य।

इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।
मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-

(1) तैलंगा,
(2) महार्राष्ट्रा,
(3) गुर्जर,
(4) द्रविड,
(5) कर्णटिका,
यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाय जाते हैं। तथा विंध्यांचल के उत्तर मं पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण

(1) सारस्वत,
(2) कान्यकुब्ज,
(3) गौड़,
(4) मैथिल,
(5) उत्कलये,
उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं। वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।
ऐसी संख्या मुख्य 115 की है। शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है।
यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं। जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,
फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के लगभग है। तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है। उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है 81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है -

(1) गौड़ ब्राम्हण,
(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)
(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,
(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,
(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,
(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,
(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,
(8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,
(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,
(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,
(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),
(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,
(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,
(14) रायकवाल ब्राम्हण,
(15) गोमित्र ब्राम्हण,
(16) दायमा ब्राम्हण,
(17) सारस्वत ब्राम्हण,
(18) मैथल ब्राम्हण,
(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,
(20) उत्कल ब्राम्हण,
(21) सरवरिया ब्राम्हण,
(22) पराशर ब्राम्हण,
(23) सनोडिया या सनाड्य,
(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,
(25) कपिल ब्राम्हण,
(26) तलाजिये ब्राम्हण,
(27) खेटुवे ब्राम्हण,
(28) नारदी ब्राम्हण,
(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,
(30)वलादरे ब्राम्हण,
(31) गयावाल ब्राम्हण,
(32) ओडये ब्राम्हण,
(33) आभीर ब्राम्हण,
(34) पल्लीवास ब्राम्हण,
(35) लेटवास ब्राम्हण,
(36) सोमपुरा ब्राम्हण,
(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,
(38) नदोर्या ब्राम्हण,
(39) भारती ब्राम्हण,
(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,
(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,
(42) भार्गव ब्राम्हण,
(43) नार्मदीय ब्राम्हण,
(44) नन्दवाण ब्राम्हण,
(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,
(46) अभिल्ल ब्राम्हण,
(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,
(48) टोलक ब्राम्हण,
(49) श्रीमाली ब्राम्हण,
(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,
(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण 
(52) तांगड़ ब्राम्हण,
(53) सिंध ब्राम्हण,
(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,
(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,
(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,
(57) गौभुज ब्राम्हण,
(58) अट्टालजर ब्राम्हण,
(59) मधुकर ब्राम्हण,
(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,
(61) खड़ायते ब्राम्हण,
(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(64) लाढवनिये ब्राम्हण,
(65) झारोला ब्राम्हण,
(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,
(67) गालव ब्राम्हण,
(68) गिरनारे ब्राम्हण

ब्राह्मण गौत्र और गौत्र कारक 115 ऋषि 

(1). अत्रि, (2). भृगु, (3). आंगिरस, (4). मुद्गल, (5). पातंजलि, (6). कौशिक,(7). मरीच, (8). च्यवन, (9). पुलह, (10). आष्टिषेण, (11). उत्पत्ति शाखा, (12). गौतम गोत्र,(13). वशिष्ठ और संतान (13.1). पर वशिष्ठ, (13.2). अपर वशिष्ठ, (13.3). उत्तर वशिष्ठ, (13.4). पूर्व वशिष्ठ, (13.5). दिवा वशिष्ठ, (14). वात्स्यायन,(15). बुधायन, (16). माध्यन्दिनी, (17). अज, (18). वामदेव, (19). शांकृत्य, (20). आप्लवान, (21). सौकालीन,  (22). सोपायन, (23). गर्ग, (24). सोपर्णि, (25). शाखा, (26). मैत्रेय, (27). पराशर, (28). अंगिरा, (29). क्रतु, (30. अधमर्षण, (31). बुधायन, (32). आष्टायन कौशिक, (33). अग्निवेष भारद्वाज, (34). कौण्डिन्य, (34). मित्रवरुण,(36). कपिल, (37). शक्ति, (38). पौलस्त्य, (39). दक्ष, (40). सांख्यायन कौशिक,  (41). जमदग्नि, (42). कृष्णात्रेय, (43). भार्गव, (44). हारीत, (45). धनञ्जय, (46). पाराशर, (47). आत्रेय, (48). पुलस्त्य, (49). भारद्वाज, (50). कुत्स, (51). शांडिल्य, (52). भरद्वाज, (53). कौत्स, (54). कर्दम, (55). पाणिनि गोत्र, (56). वत्स, (57). विश्वामित्र, (58). अगस्त्य, (59). कुश, (60). जमदग्नि कौशिक,  (61). कुशिक, (62). देवराज गोत्र, (63). धृत कौशिक गोत्र, (64). किंडव गोत्र, (65). कर्ण, (66). जातुकर्ण, (67). काश्यप, (68). गोभिल, (69). कश्यप, (70). सुनक, (71). शाखाएं, (72). कल्पिष, (73). मनु, (74). माण्डब्य, (75). अम्बरीष, (76). उपलभ्य, (77). व्याघ्रपाद, (78). जावाल, (79). धौम्य, (80). यागवल्क्य, (81). और्व, (82). दृढ़, (83). उद्वाह, (84). रोहित, (85). सुपर्ण, (86). गालिब, (87). वशिष्ठ, (88). मार्कण्डेय, (89). अनावृक, (90). आपस्तम्ब, (91). उत्पत्ति शाखा, (92). यास्क, (93). वीतहब्य, (94). वासुकि, (95). दालभ्य, (96). आयास्य, (97). लौंगाक्षि, (98). चित्र, (99). विष्णु, (100). शौनक, (101).पंचशाखा, (102).सावर्णि, (103).कात्यायन, (104).कंचन, (105).अलम्पायन, (106).अव्यय, (107).विल्च, (108). शांकल्य, (109). उद्दालक, (110). जैमिनी, (111). उपमन्यु, (112). उतथ्य, (113). आसुरि, (114). अनूप और (110). आश्वलायन।

कुल संख्या 108 ही हैं, लेकिन इनकी छोटी-छोटी 7 शाखा और हुई हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर इनकी पूरी सँख्या 115 है।

ब्राह्मण कुल परम्परा के 11  कारक 

(1) गोत्र👉  व्यक्ति की वंश-परम्परा जहाँ और  से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। इन गोत्रों के मूल ऋषि :– विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप। इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भरद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। 

(2) प्रवर👉 अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हैं। अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए, वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि कुल परम्परा में गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे।

(3) वेद👉 वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है। इनको सुनकर  कंठस्थ किया जाता है। इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया, इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे, तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक  का अपना एक विशिष्ट वेद होता है, जिसे वह अध्ययन-अध्यापन करता है। इस परम्परा के अन्तर्गत जातक, चतुर्वेदी, त्रिवेदी, द्विवेदी आदि कहलाते हैं। 

(4) उपवेद👉 प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट  उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये। 

(5) शाखा👉 वेदों के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है।  कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था, तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होंने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।

6) सूत्र👉 प्रत्येक वेद के अपने 2 प्रकार के सूत्र हैं। श्रौत सूत्र और ग्राह्य सूत्र यथा शुक्ल यजुर्वेद का कात्यायन श्रौत सूत्र और पारस्कर ग्राह्य सूत्र है।

(7) छन्द 👉 उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परा सम्मत  छन्द का  भी  ज्ञान  होना  चाहिए।

(8) शिखा👉 अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा-चुटिया को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बाँधने  की परम्परा शिखा कहलाती है।

(9)पाद👉 अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन करते हैं। ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है। अपने-अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं।

(10) देवता👉 प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते हैं, वही उनका कुल देवता यथा भगवान् विष्णु, भगवान् शिव, माँ दुर्गा, भगवान् सूर्य इत्यादि देवों में से कोई एक आराध्‍य देव हैं। 

(11)द्वार👉 यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता)  जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है, वही उस गोत्र वालों की द्वार या दिशा  कही जाती है।

सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में सेयर करे हम क्या है इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये।
ब्राह्मण बिना धरती की कल्पना ही नहीं की जा सकती इसलिए ब्राह्मण होने पर गर्व करो और अपने कर्म और धर्म का पालन कर सनातन संस्कृति की रक्षा करे
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Tuesday, 25 November 2025

भूमि पूजन सामग्री

1】हल्दीः------------------20ग्राम
२】कलावा(आंटी)----------01गोले
३ धूप बत्ती--------------     1 पैकिट
४】कपूर----------------   10ग्राम
5) कच्चा सूत ------------ 01 छोटा गोला
6)उन ------------------ छोटा गोला
७】यज्ञोपवीत -------------   05नग्
८】चावल----------------- 500ग्राम
९】अबीर------------------10ग्राम
१०】गुलाल, ---------------20ग्राम
11) सरसों ------------------10रुपए की
१२】सिंदूर -------------------20ग्राम
१३】रोली, -------------------20 ग्राम
१४】गोल सुपारी, ( बड़ी)---  50 ग्राम
१५】नारियल ------------  3 नग्
१६】असली गूगल -----------20 ग्राम
१७】पंच मेवा--------------100 ग्राम
१८】शहद (मधु)------------ 50 ग्राम
१९】शकर-----------------100ग्रांम
२०】घृत (शुद्ध घी)---------  100 ग्राम
२१】इलायची (छोटी)--------05ग्राम
२२】लौंग -----------------05ग्राम
२३】इत्र की शीशी-------------1 नग्
२4】तांबे का लौटा 01
=============
25】दूर्वा
26】पुष्प 
27】हार मोगरा के फूल के  5
28】ऋतुफल पांच प्रकार के -----1 किलो
29) पान के पत्ते ,5

(30)मिट्टी का कलश (ढक्कन सहित)
(31)सप्त मृत्तिका (सात प्रकार की मिट्टी)
(31)गंगाजल, 
(32)गुलाब जल,
(33)हल्दी की गांठ,----------  05नग् 
(33) नारियल (पानी वाला ) बड़ा01नग 
(34)चांदी का नाग-नागिन जोड़ा,-------01
(34) चांदी का कछुआ, ---------01 नग 
(35)मछली चांदी की-----------01नग
(36)नवरत्न
(37) पंचधातु 
(38)वास्तु यंत्र---------------04
(39)लोहे की कीलें,-----------04
 (40)काले रंग के पत्थर----------01
(41) ईंटे ------------------09
लाख का टुकड़ा
सिर के वाल
किसी बच्चे का नाल केवल लड़का हो तो
खोटा सिक्का -------------01 नग
गोमती चक्र---------------05 नग 
कोड़ी------------------- 05 नग् 




41)तगाड़ी ....2
42)फडुआ ....2
43) गेंती........1


घर से उपलब्ध समान

44】लाल कपड़ा  या पीला  कपड़ा
1)आसन बैठने के लिये
2)चौकी2×2
3)थाली 2 पूजा के लिये 
4)कटोरी 5
5)हाथ पोछ्ने के लिये टाविल 
6)दूध
7)दही
8)माचिस
10)रुई
11)आटा  चोक पूरने  के लिये 100 ग्राम
12)प्रशाद  अनुमानित
13) घर की तुलसी की मिट्टी
14) घर से गणेश भगवान की मूर्ति
15)पूजा के लिये फुटकर पैसे
16) गाय का गोबर
17)आम के गुच्छे- 5 
18)गाय का मूत्र
19)गंगा जल
20)तुलसी दल 

Gurudev 
bhubneshwar
Parnkuti ashram
9893946810

Monday, 17 November 2025

गृह प्रवेश सामग्री


1】हल्दीः------------------20ग्राम
२】कलावा(आंटी)----------10गोले
३ धूप बत्ती--------------     1 पैकिट
४】कपूर----------------   100ग्राम
5) कच्चा सूत ------------ 01 छोटा गोला
6)उन ------------------ छोटा गोला
७】यज्ञोपवीत -------------   05नग्
८】चावल----------------- 10किलो ग्राम
९】अबीर------------------10ग्राम
१०】गुलाल, ---------------20ग्राम
11) सरसों ------------------10रुपए की
१२】सिंदूर -------------------50ग्राम
१३】रोली, -------------------20 ग्राम
१४】गोल सुपारी, ( बड़ी)---  500 ग्राम
१५】नारियल ------------  15 नग्
१६】असली गूगल -----------20 ग्राम
१७】पंच मेवा--------------100 ग्राम
१८】शहद (मधु)------------ 50 ग्राम
१९】शकर-----------------02किलोग्रांम
२०】घृत (शुद्ध घी)---------  02किलो ग्राम
२१】इलायची (छोटी)--------05ग्राम
२२】लौंग -----------------05ग्राम
२३】इत्र की शीशी-------------1 नग्
२4】तांबे का लौटा 01
     तीली का तेल -----------01 लीटर 
रंग लाल 
रंग पीला
रंग कला
रंग हरा
पीतांबरी  500 ग्राम
=============
25】दूर्वा
26】पुष्प 
27】हार मोगरा के फूल के  5
28】ऋतुफल पांच प्रकार के -----1 किलो
29) पान के पत्ते ,5

(30)मिट्टी का कलश (ढक्कन सहित)
(31)सप्त मृत्तिका (सात प्रकार की मिट्टी)
(31)गंगाजल, 
(32)गुलाब जल,
(33)हल्दी की गांठ,----------  05नग् 
(33) नारियल (पानी वाला ) बड़ा01नग 
(34)चांदी का नाग-नागिन जोड़ा,-------01
(34) चांदी का कछुआ, ---------01 नग 
(35)मछली चांदी की-----------01नग
(36)नवरत्न
(37) पंचधातु 
(38)वास्तु यंत्र---------------04
(39)लोहे की कीलें,-----------04
 (40)काले रंग के पत्थर----------01
(41) लाख का टुकड़ा
 (42) सिर के वाल
 (43) किसी बच्चे का नाल केवल लड़का हो तो
  (44) खोटा सिक्का -------------01 नग
(45)गोमती चक्र---------------05 नग 
(46)कोड़ी------------------- 05 नग् 




41) कपड़ा लाल -----01 मीटर
42) कपड़ा सफेद-------02मीटर
43) कपड़ा पीला -------- 03मीटर
    कपड़ा हरा -----------01 मीटर 
44】 पीला कला---------03 मीटर

घर से उपलब्ध करने वाला सामान 
1)आसन बैठने के लिये
2)चौकी2×2
3)थाली 2 पूजा के लिये 
4)कटोरी 5
5)हाथ पोछ्ने के लिये टाविल 
6)दूध
7)दही
8)माचिस
10)रुई
11)आटा  चोक पूरने  के लिये 100 ग्राम
12)नया चादर 01
13) घर की तुलसी की मिट्टी
14) घर से गणेश भगवान की मूर्ति और लड्डू गोपाल
15)पूजा के लिये फुटकर पैसे
16) गाय का गोबर
17)आम के गुच्छे-45 
18)गाय का मूत्र
19)गंगा जल
20)तुलसी दल 
Gurudev 
bhubneshwar
Parnkuti ashram
9893946810

Sunday, 16 November 2025

विबाह के लिए लगने वाली आबश्यक सामग्री लिस्ट

पर्णकुटी ज्योतिष केंद्र
विबाह के लिए लगने वाली आबश्यक सामग्री लिस्ट
   ------ //-- (   पीली चिट्टी पूजा के लिए  )--- //--------
१】श्री गणेश जी
२】पांच हल्दी की गाँठ
३】पांच गोलसुपारि
४】 पिले चावल
५】गोबर के गणेश जी
६】बतासे
७】  दूर्वा
८】कलश एक मिटटी का
९】दीपक
१०】रुई
११】माचिस
पूजा की थाली सामग्री सहित 
नाई(खबॉस )को किराया बतौर दक्षिणा
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बत्तीसी  झिलाने की सामग्री-

32 लड़डू,
32 रुपया
मेवा,
शकर,
चावल,
गुड़ की भेली,
लाल कपड़ा,
हार,
फुल,
बताशा,
नारियल
और जवारी का रुपया।

विधि-

इसमे भाई पटिये पर बैठता है और बहन उसकी गोद मे पूरा सामान रख़कर आरती उतारती है सभी भाई अपनी बहन को साड़ी और जीजाजी को जवारी देकर बिदा करते है।

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सभी प्रकार की जटिल समस्याओ के समाधान हेतु   शीघ्र सम्पर्क करे एबम  अपनी कुंडली दिखाकर  उचित मार्ग दर्शन प्राप्त करे ।

सम्पर्क सूत्र

पंडित जी श्री परमेस्वर दयाल जी शास्त्री

तिलकचोक मधुसुदनगण

मोबाइल नंबर 09893397835

(पूजन समग्री कम  और  ज्यादा कर  सकते है )

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श्री गणेश पूजन  सहित अन्य पूजन के लिए
सभी पूजन में उपयोग के लिए यही सामग्री में से ले सकते है
०】आटा हल्दी  चोक पुरने के लिए
1】हल्दीः--------------------------50 ग्राम
२】कलावा(आंटी)-------------100 ग्राम
३】अगरबत्ती-------------------     3पैकिट
४】कपूर-------------------------  - 50 ग्राम
५】केसर-------------------------   -1डिव्वि
६】चंदन पेस्ट --------------------- 50 ग्राम
७】यज्ञोपवीत ---------------------   11नग्
८】चावल-------------------------- 05 किलो
९】अबीर-----------------------------50 ग्राम
१०】गुलाल, ----------------------10 0ग्राम
११】अभ्रक---------------------------10ग्राम
१२】सिंदूर ------------------------100 ग्राम
१३】रोली, -------------------------100ग्राम
१४】सुपारी, ( बड़ी)-----------  200 ग्राम
१५】नारियल ----------------------  11 नग्
१६】सरसो--------------------------50 ग्राम
१७】पंच मेवा---------------------100 ग्राम
१८】शहद (मधु)------------------ 50 ग्राम
१९】शकर-------------------------0 1किलो
२०】घृत (शुद्ध घी)--------------  01किलो
२१】इलायची (छोटी)--------------10ग्राम
२२】लौंग मौली---------------------10ग्राम
२३】इत्र की शीशी--------------------1 नग्
२४】तिली--------------------------२००ग्राम
२५】जौ-----------------------------१००ग्राम
२६】माचिस -------------------------१पैकिट
२७】रुई-------------------------------२०ग्राम
२८】नवग्रह समिधा------------------१पैकेट
२९】धुप बत्ती ------------------------२पैकिट
३०】लाल कपड़ा --------------------२मीटर
३१】सफेद कपडा-------------------२मीटर
३२】समिधा हवन के लिए ---------५किलो
33) तिली ------- ---------------------1किलो
34)जौ-----------------------------200 ग्राम

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                     अन्य सामग्री

१】पान
२】 पुष्प
३】पुष्पहार
४】दूर्वा
५】विल्वपत्र
६】दोना गड्डी
७】बताशे या प्रशाद
८】फल
९】आम के पत्ते
१०】समिधा हवन के लिए
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           माता पूजन सामग्री

१】झंडियां लाल
२】पूड़ी
३】ताव
४】खारक
५】बदाम
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               मंडप पूजन सामग्री

१】मानक खम्भ
२】पटली लकड़ी की
३】नींव में रखने का सामान
४】जैसे  लाख का टुकड़ा
५】सर के वाल
६】कोयला
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अगर  गंगाजली पूजन  हो तो ---------कही कही होती है
ऊपर दी गयी पूजा  सामग्री में से लेबे

१】खाजा
२】खारक
३】वादाम
४】लाल कपड़ा 3 मीटर
५】श्री फल (नारियल)
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          जनेऊ (यज्ञनोपवित) संस्कार

१】मूँज की जनेऊ
२】खड़ाऊ
३】डण्डा(दंड)
४】भिक्षा पात्र "कमण्डल
५】गुरुपूजन की सामग्री
६】जैसे =बस्त्र नारियल जनेऊ गोलसुपारी आदि
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१】बर के निमित्त बस्त्र
२】फल
३】नारियल
४】आभूषण आदि
५】जनेऊ
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गनाना 
पूजन सामग्री ऊपर दी गयी  उसी में से पूजन थाली तैयार होगी
लड़के वालो की तरफ से दुल्हन के निमित्त
१】 बस्र
२】आभूषण श्रृंगार दानी
३】कुलदेवी प्रतिमा टिपारी
४】मोहर दुल्हन के सर पर बाँधने का
५】पिछौड़ा 
६】सिंधोडा
७】सिंधोड़ि
८】कंकण
९】 बतासे
१०】नारियल या नारियल गोला
11)तस्वीर राम विबाह शिव विबाह
12)रगवारै के लोटा
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फेरे के समय  लड़की वालों के यहाँ। पूजन सामग्री  ऊपर दी है उसके
अलावा

१】लाजा
२】सूप
३】मधुपर्क
४】हथलेवा
५】सिंदुर्दानी
६】डाभ
७】मधुपर्क 
८】गुड़
९】बतासे
१०】हल्दी पिसी पॉब पुजाई के लिए
११】समिधा हवन के लिए फेरे के समय
११】विछुड़ी

संपर्क
गुरुदेब भुबनेश्वर
कस्तूरवानगर पर्णकुटी गुना
मो।९८९३९४६८१०

Saturday, 8 November 2025

दुर्गा अष्टमी

#दुर्गाष्टमी व्रत की विशेष #जानकारी ...........
==============================
जिनको पुत्र संतानें हैं, वे दुर्गाष्टमी व्रत #उपवास नहीं करें। जिनकी पुत्र संतानें नहीं हैं,वे दुर्गाष्टमी व्रत उपवास करें।
उस आलेख पर सभी सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यों?क्या इसका कोई #शास्त्रीय प्रमाण है? हमलोग परम्परा वश तो दुर्गाष्टमी उपवास व्रत करते आ रहे हैं। शास्त्र प्रमाण के आधार पर धार्मिक कृत्य करने चाहिए।
इसी प्रमाण को यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
सबसे पहले यह जान लिजिए कि सप्तमी युक्त #अष्टमी व्रत नहीं करना चाहिए.............
शरन्महाष्टमी पूज्या नवमी संयुता सदा।
सप्तमी संयुता नित्यं शोकसंतापकारिणीम्।।
सप्तमी युक्त अष्टमी शोक संताप देने वाली होती है। इसे शल्य कहा जाता है : ---
सप्तमी कलया यत्र परतश्चाष्टमी भवेत्।
तेन शल्यमिदं प्रोक्तं पुत्र पौत्र क्षयप्रदम्।।
शल्य युक्त #अष्टमी कंटक अष्टमी है , जो पुत्र पौत्रादि का क्षय करता है। आगे और भी स्पष्ट है : -- 
#पुत्रान् हन्ति पशून हन्ति राष्ट्र हन्ति सराज्यकम्।
हन्ति जातानजातांश्च सप्तमी सहिताष्टमी।।
सप्तमी सहित अष्टमी व्रत पुत्रों को नाश करती है , पशुओं को नाश करती है, राष्ट्र / देश तथा राज्य का नाश करती है। और , उत्पन्न हुए और न उत्पन्न हुए का नाश करती है।
सप्तमी वेध संयुता यैः कृता तु महाष्टमी ।
पुत्रदार धनैर्हीना भ्रमयन्तीह पिशाचवत्।।
#सप्तमी वेध से युक्त महा - अष्टमी को करने से लोग इस संसार में पुत्र , स्त्री तथा धन से हीन होकर पिशाच के सदृश भ्रमण करते हैं तथा : ---
सप्तमीं शैल्यसंयुक्तां मोहादज्ञानतोऽपि वा ।
महाष्टमीं प्रकुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते।।
मोह - अज्ञान से शल्य युक्त / सप्ती से युक्त महाष्टमी को जो करता है , वह नरक में जाता है। इसलिए, स्पष्ट है कि सप्तमी युक्त #अष्टमी उपवास व्रत नहीं करना चाहिए। 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(02)
लेकिन , #दुर्गाष्टमी उपवास किसे करना चाहिए और किसे नहीं करना चाहिए, यह जानना अत्यावश्यक है : ---
कालिका पुराण में स्पष्ट कहा गया है , जो निर्णय सिन्धु पृष्ठ संख्या 357 में उद्धृत है :---
अष्टम्युपवाश्च पुत्रवाता न कार्यः।
उपवासं महाष्टम्यां पुत्रवान्न समाचरेत्।
यथा तथा वा पूतात्मा व्रतीं देवीं प्रपूज्येत्।।
अर्थात अष्टमी तिथि में उपवास #पुत्रवाला न करे। जैसे - तैसे पवित्र आत्मा वाला व्रती देवी की पूजा करे। यानि स्पष्ट है कि जिनके पुत्र संतान हैं वे लोग दुर्गाष्टमी को उपवास व्रत नहीं करें।
लेकिन, वैसे लोग जिनके #पुत्र संतान नहीं हैं , वे सभी भक्त गण पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से दुर्गाष्टमी का उपवास व्रत करें। महाभागवत ( देवीपुराण ) अध्याय 46 श्लोक संख्या 30 एवं 31 में स्पष्टतः देवी का आदेश है :--- 
महाष्टम्यां मम प्रीत्यै उपवासः सुरोत्तमाः। 
कर्तव्यः पुत्रकामैस्तु लोकैस्त्रैलोक्यवासिभिः।।
स्वयं माँ #भगवती कहती हैं कि मेरी संतुष्टि के लिए तीनों लोकों में रहने वाले लोगों को महाष्टमी के दिन पुत्र की कामना से उपवास करना चाहिए । ऐसा करने से उन्हें सर्वगुण सम्पन्न पुत्र की प्राप्ति अवश्य होगी। 
अवश्यं भविता पुत्रस्तेषां सर्वगुण समन्वितः।
लेकिन, उस दिन पुत्रवान लोगों को उपवास व्रत नहीं करना चाहिए :---
#पुत्रवद्भिर्न कर्तव्य उपवासस्तु तद्दिने।।
माँ भगवती जगत् जननी सब का कल्याण करें , यही #प्रार्थना है।।

                   

Monday, 27 October 2025

दीपावली पर पांच दिन के मुहूर्त 2025

गुरुदेव भुवनेश्वर जी महाराज पर्णकुटी आश्रम गुना के अनुसार पर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है और समापन भाई दूज पर। इन पांच दिनों में मुख्य आकर्षण माता महालक्ष्मी की पूजा होती है, जो कार्तिक अमावस्या की रात में की जाती है। इस दिन लोग घर-आंगन में दीप जलाकर अंधकार को दूर करते हैं और धन-समृद्धि की देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा करते हैं। आइए जानते हैं, इस साल धनतेरस, छोटी दिवाली, महालक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा और भाई दूज के शुभ मुहूर्त 
 इस साल धनतेरस शनिवार 18 अक्टूबर को है।

त्रयोदशी के दिन क्षीर सागर से प्रकट हुयीं थीं तथा उन्होंने दीवाली के दिन अपने पति के रूप में भगवान विष्णु का वरण किया था। इसीलिये दीवाली अमावस्या को धन और समृद्धि की देवी को प्रसन्न करने हेतु सर्वाधिक उपयुक्त दिन माना जाता है। इस दिन लोहे के सामान नहीं खरीदना चाहिए गुरुदेव भुवनेश्वर जी के अनुसार इस दिन धातु खरीदना चाहिए जैसे सोना, चांदी तांबा पीतल आदि लोहे के बरतन भी नहीं खरीदना चाहिए 

सभी प्रकार की खरीदारी का शुभ समयः दोपहर 12:00बजे से दोपहर 03:00 बजे तक
 एवं अभिजित मुहूर्त 11:43 से 12:43 तक
 विजय मुहूर्त के अनुसार 
अपरान्ह काल 02:01 बजे से 02:43 तक शुभ रहेगा
 धनतेरस पर सोना, चांदी, पीतल, तांबे के बर्तन, झाडू, गोमती चक्र, सूखा धनिया, नमक और लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, घर की सजावट की वस्तुएँ खरीदना बहुत शुभ माना जाता है।
 X क्या न खरीदेंः धनतेरस पर चाकू, कैंची, पिन या कोई भी धारदार वस्तु खरीदना अशुभ माना जाता है।



धनतेरस पर शाम के समय भगवान धन्वंतरि, कुबेर महाराज और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। 


त्रयोदश्यां तु या रात्रिः शनिवारे विशेषतः।
धन्वन्तरिप्रसादेन दरिद्र्यं तस्य नश्यति॥”

अर्थात —
जब त्रयोदशी तिथि (धनतेरस) शनिवार को आए,
तो उस दिन धन्वंतरि पूजन से दरिद्रता सदा के लिए नष्ट हो जाती है।


शनिवारे जगद्धात्रि कोट्यावृत्तिफलं ध्रुवम्॥” 


त्रयोदश्यां यमदीपं तु कुर्यादायुर्यमोदितम्।
दारिद्र्यनाशनं सर्वं सौभाग्यं तत् प्रयच्छति॥



अर्थ:
कार्तिक मास की त्रयोदशी (धनतेरस) के दिन यदि यमराज के लिए दीपदान किया जाए,
तो वह आयु और सौभाग्य प्रदान करता है तथा दारिद्र्य का नाश करता है।


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🌕 २. धर्मसिंधु (दीपमालिका विधिः)

> धनत्रयोदश्यां दीपदानं यमदीपं विशेषतः।
कृत्वा प्रातःस्नानसमये धनं धान्यं च वर्धते॥



अर्थ:
धनत्रयोदशी के दिन दीपदान (विशेषकर यमराज हेतु) करने से धन और धान्य की वृद्धि होती है।


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🌕 ३. कालिकापुराण (दीपदान फलवर्णन)

> यः कुर्याद् दीपदानं तु धनत्रयोदश्यां निशि।
तस्य धन्यं च आयुश्च भवेत् संततिवर्धनम्॥



अर्थ:
जो धनत्रयोदशी की रात्रि में दीपदान करता है,
उसका धन, आयु और संतति (वंश) तीनों बढ़ते हैं।





धनतेरस पर मृत्यु के देवता यमराज का सम्मान भी किया जाता है।
 शाम के समय घर के बाहर दक्षिण दिशा में चौमुखी दीपक जलाकर यमराज से लंबी आयु की कामना की जाती है।

त्रयोदशी तिथि आरंभ: 18 अक्टूबर दोपहर 12:18 बजे

त्रयोदशी तिथि समाप्त: 19 अक्टूबर दोपहर 1:51 बजे

दीपदान समय:::::::::::

(1)धनतेरस पूजा मुहूर्त: शाम 7:16 से 8:20 बजे तक  शुभ रहेगा
(2)प्रदोष काल: सायंकाल 5:48  –रात्रि  8:20 तक शुभ रहेगा

(3)वृषभ लग्न :सायंकाल 7:16 – रात्रि 9:11 तक शुभ रहेगा 

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भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर पर विजय का प्रतीक। 
 2025 में छोटी दिवाली सोमवार 19 अक्टूबर को पड़ेगी।

अभ्यंग स्नान मुहूर्त - प्रात: 05:13 से प्रात: 06:25  

नरक चतुर्दशी के दिन चन्द्रोदय का समय - : प्रात:05:13 

अभ्यंग स्नान महत्व
शास्त्रों के अनुसार, नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय के पूर्व शरीर पर उबटन लगाकर स्नाने करने की प्रक्रिया को अभ्यंग स्नान कहा जाता है. जिसमें हल्दी, दही, तिल का तेल, बेसन, चंदन, जड़ी-बूटियों का लेप किया जाता है. इस लेप से पूरे शरीर की मालिश की जाती है.

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दिवाली का आवश्यक अंग, श्राद्ध कर्म भी है जोकि 20 तारीख़ को कुतुप काल में संभव नहीं है इसलिए 20 में कर्म का लोप हो रहा है। इस स्थिति में 20 में  दिवाली मनाए और 21 में अभ्यंग स्नान, श्राद्ध और पूर्वजो को मशाल प्रज्वलित करके पितरों को मार्ग का दर्शन अवश्य करायें। जिससे शात्र विधि पूरी हो सके
दीपावली शाम को लक्ष्मी और गणेश पूजा होती है। 2025 में महालक्ष्मी पूजन सोमवार 20 अक्टूबर को होगा।

अमावस्या तिथि आरंभ:

 20 अक्टूबर दोपहर 3:44 बजे

अमावस्या तिथि समाप्त:

 21 अक्टूबर शाम 5:54 बजे


गुरुदेव भुवनेश्वर जी महाराज पर्णकुटी वालो के अनुसार अमावस्या की रात स्थिर लग्न में महालक्ष्मी की पूजा करने से घर में मां लक्ष्मी की स्थिरता बनी रहती है। वैसे तो चार स्थिर लग्न है, 

वृष, सिंह, वृश्चिक, और कुंभ।

  1. वृश्चिक लग्न - दीवाली के दिन प्रातःकाल वृश्चिक लग्न प्रबल होता है। मन्दिरों, अस्पतालों, होटलों, विद्यालयों और महाविद्यालयों के लिये वृश्चिक लग्न के समय लक्ष्मी पूजा सर्वाधिक उपयुक्त होती है। विभिन्न टीवी और फिल्म कलाकारों, शो एन्करों, बीमा अभिकर्ताओं तथा जो लोग सार्वजनिक मामलों एवं राजनीति से जुड़े हैं, उन्हें भी वृश्चिक लग्न के दौरान देवी लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिये।
  2. कुम्भ लग्न - दीवाली के दिन मध्यान्ह के समय कुम्भ लग्न प्रबल होता है। जो रोगग्रस्त एवं ऋणग्रस्त हैं, भगवान शनि के दुष्प्रभाव से मुक्ति प्राप्त करने के इच्छुक हैं, जिनके व्यापार में धन हानि हो रही है तथा व्यापार में भारी ऋण में है, उनके लिये कुम्भ लग्न में लक्ष्मी पूजा करना उत्तम होता है।
  3. वृषभ लग्न - दीवाली के दिन सायाह्नकाल में वृषभ लग्न प्रबल होता है। गृहस्थ, विवाहित, सन्तानवान, मध्यम वर्गीय, निम्न वर्गीय, ग्रामीण, किसान, वेतनभोगी तथा जो सभी प्रकार के व्यवसायों में संलिप्त व्यापारी हैं, उनके लिये वृषभ लग्न लक्ष्मी पूजा का सर्वोत्तम समय है। वृषभ लग्न को दीवाली पर लक्ष्मी पूजा हेतु सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त माना जाता है।
  4. सिंह लग्न - दीवाली के दिन मध्य रात्रि के समय सिंह लग्न प्रबल होता है। सिंह लग्न का मुहूर्त, साधु-सन्तों, सन्यासियों, विरक्तों एवं तान्त्रिकों के लिये लक्ष्मी पूजा एवं देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम मुहूर्त होता है।
Settingलक्ष्मी पूजा मुहूर्त स्थिर लग्न पर आधारित गुना, मध्यप्रदेश, भारत के लिये

इनमें से किसी भी  लग्न का उपयोग लक्ष्मी पूजा व्यापार पूजा में कर सकते है

(1)वृश्चिक लग्न मुहूर्त 
प्रात:- 08:28 से 10:45 तक

(2)कुम्भ लग्न मुहूर्त
 (अपराह्न) - 03:44 से 04:06 

(3)वृषभ लग्न मुहूर्त
 (सन्ध्या) - 07:14 से 09:12 

(4)निशिता मुहूर्त: रात 11 बजकर  41 मिनट से 12 बजकर 31 मिनट तक

(5)सिंह लग्न मुहूर्त
 (मध्यरात्रि) - 01:43  से 03:56 21 अक्टूबर 



चोघडिया, मुहूर्त दुकान फैक्ट्री व्यापार के लिए उपयोग कर सकते हो

प्रात: काल अमृत 06:22 से 07:48 शुभ

प्रात: काल  शुभ 09:14 से 10:40 शुभ

मध्यान्ह काल चर 01:31 से 02:57 शुभ

दोपहर      लाभ 02:57 से- 04:23 शुभ

सायंकाल।  अमृत 04:23 से 05:48 शुभ

संध्याकाल लक्ष्मी पूजा के लिए विशेष मुहूर्त

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दिन ओर रात्रि के संक्रमण काल को गो धूली बेला कहते है

(1)गोधूली मुहूर्त सायंकाल 5:50से सायंकाल 06:15 तक

(2)लक्ष्मी पूजा मुहूर्त: शाम 7:08 से 8:18 बजे तक 

(3)प्रदोष काल: सायंकाल 5:46  –से  रात्रि 8:18  तक

4)वृषभ काल: सायंकाल 7:14से – रात्रि 9:012 अति शुभ मुहूर्त

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प्रदोष काल कब होता है

(1)प्रदोषोऽस्तसमयादूर्ध्वं घटिकाद्वयमिष्यते।त्र्यंशेन तस्य कालस्य यः पूज्यः स प्रदोषकः

अस्त (सूर्यास्त) के समय से ऊपर (बाद में) दो घटी का जो समय होता है, वही प्रदोषकाल कहलाता है। उस काल के तृतीयांश (एक तिहाई भाग) में जो लक्ष्मी की पूजा की जाती है, वही प्रदोषपूजा मानी जाती है।

(2)सूर्यास्तं यावत् कालं प्रदोषः संप्रकीर्तितः।

तस्य तृतीयभागस्थे पूजां कुर्यात् प्रदोषिकाम्॥

(3)अस्ताचलगतादर्कात् पूर्वं द्विघटिकापर्यन्तं च प्रदोषकालः।

अथास्तमितभानोरनन्तरं द्विघटीकान्तः स प्रदोषः परिकीर्तितः

जब सूर्य अस्ताचल (पश्चिम पर्वत) की ओर अग्रसर होता है, तो सूर्यास्त से दो घटी (लगभग 48 मिनट) पहले से लेकर सूर्यास्त के दो घटी बाद तक का जो काल होता है, वही प्रदोषकाल कहलाता है।

➡️ सूर्यास्त से 48 मिनट पूर्व आरंभ होकर

➡️ सूर्यास्त के 48 मिनट बाद तक

कुल चार घटी (लगभग 1 घंटा 36 मिनट) का काल प्रदोषकाल माना गया है।

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प्रतिपदा तिथि आरंभ: 21 अक्टूबर शाम 5:54 बजे

प्रतिपदा तिथि समाप्त: 22 अक्टूबर शाम 8:16 बजे

(1)गोवर्धन पूजा प्रातःकाल मुहूर्त: 6:26 से प्रात:  09:14तक

(2)प्रात: काल 10:39से से 12:05 तक 

सायाह्नकाल मुहूर्त: 3:29 – से सायंकाल 5:44 

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भाई दूज:  भाई दूज गुरुवार 23 अक्टूबर को है।

द्वितीया तिथि आरंभ: 22 अक्टूबर रात 8:16 बजे

द्वितीया तिथि समाप्त: 23 अक्टूबर रात 10:46 बजे

प्रात: काल 10;39से अपरान्ह 02:56 तक

+++++++++++++++++++++++++++++गुरुदेव 

भुवनेश्वर जी महाराज 
पर्णकुटी आश्रम गुना 
9893946810

एकादशी निर्णय 2025

कार्तिक शुक्ल (हरिप्रबोधिनी) एकादशी व्रत कब करें??
जानिए शास्त्रीय समाधान, 
इस वर्ष कार्तिक शुक्ल द्वादशी का क्षय हुआ है। इस स्थिति में धर्मशास्त्र निर्णयानुसार स्मार्त्त (सभीगृहस्थी) लोगों को पहिली दशमीविद्धा एकादशी वाले दिन 1 नवम्बर, 2025 शनिवार को तथा वैष्णवों (संन्यासी, विधवा स्त्री, वानप्रस्थ और वैष्णव सम्प्रदाय वाले) को 2 नवम्बर, 2025 के दिन उपवास करना चाहिए। यहाँ आगे स्पष्टीकरण दे रहे हैं-'धर्मसिन्धुकार' अनुसार एकादशी तिथि मुख्यतः दो प्रकार की होती है- (i) विद्धा और (ii) शुद्धा। (i) सूर्योदयकाल में दशमी का वेध हो अथवा अरुणोदयकाल (सूर्योदय से लगभग 4 घड़ी पूर्व) में एकादशी तिथि दशमी द्वारा विद्वा हो, तो वह (एकादशी) विद्वा कहलाती है। (ii) अरुणोदयकाल में दशमी तिथि के वेध से रहित एकादशी शुद्धा मानी जाती है।
प्रायः सभी शास्त्रों में दशमी से युक्त एकादशी व्रत करने का निषेध माना गया है। परन्तु द्वादशी का क्षय हो जाने पर स्मार्तों (गृहस्थियों) को दशमीयुता एवं वैष्णव सम्प्रदाय वालों को द्वादशी-त्रयोदशीयुता एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। पद्मपुराण अनुसार भी-
एकादशी द्वादशी च रात्रिशेषे त्रयोदशी।
उपवासं न कुर्वीत पुत्रपौत्रसमन्वितः ।।' उपरोक्त प्रमाणानुसार 11, 12, 13 तिथियों से मिश्रित दिन में स्मार्तों (गृहस्थियों)
के व्रत का निषेध और वैष्णवों के व्रत का विधान है। 'वृद्धशातातप' का भी यहाँ वचन है-'दशम्यैकादशीविद्धा द्वादशी च क्षयं गता। क्षीणा सा द्वादशी ज्ञेया नक्तं तु गृहिणः स्मृतम् ।..... गृहिणः पूर्वत्रोपवासः ।।'
ध्यान दें-यहाँ धर्मशास्त्रों में सूर्योदयवेधवती दशमी के दिन स्मार्तों को व्रत करने की आज्ञा दी है, जोकि कण्वस्मृति के सामान्य नियम 'उदयोपरि विद्धा तु दशम्यैकादशी यदि। दानवेभ्यः प्रीणनार्थं दत्तवान् पाकशासनः ।।' के बिल्कुल विरुद्ध है। परन्तु शास्त्रों द्वारा स्मार्तों के लिए त्रयोदशी में पारणा भी सर्वथा वर्जित मानी गई है। यदि द्वादशी तिथि के क्षय की स्थिति में स्मार्तों (गृहस्थियों) तथा वैष्णवों का व्रत एक ही दिन कर दिया जाए तो स्मार्तों को भी व्रत की पारणा त्रयोदशी में करने की स्थिति आ पड़ेगी।
इसीलिए निर्णयसिन्ध में 'ऋष्यश्रृंग' ने अन्य विकल्प के अभाव में तथा जब स्मार्तों को त्रयोदशी में पारणा करने की नौबत आ पड़े तब दशमीमिश्रिता एकादशी में ही व्रत करने की अनुमति दी है-
'पारणाहे न लभ्येत द्वादशी कलयाऽपि चेत् ।
तदानीं दशमीविद्वाऽपि-उपोष्यै-एकादशी तिथिः ।।' 
इस प्रकार उपरोक्त शास्त्र-विवेचन से पाठक समझ गए होंगे कि इस वर्ष एकादशी-द्वादशी-त्रयोदशी-इन तिथियों का एकत्र (एक ही वार में संगम) होने के कारण स्मार्तों (गृहस्थियों) का 'देवप्रबोधिनी एकादशी व्रत' विशेष नियमानुसार 1 नवम्बर, 2025 ई. को सूर्योदय-वेधवती दशमी के दिन शनिवार को लिखा गया है, जो सर्वथा शास्त्रीय है, जबकि वैष्णवों का व्रत 2 नवम्बर, रविवार को होगा।
भीष्मपंचक प्रारम्भ/समाप्त (1 से 5 नवम्बर)
कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक का काल (अवधि) 'भीष्मपंचक' कहलाता है। शास्त्रों में भीष्मपंचक व्रत का अनुष्ठान केवल पाँच दिन (का. शु. ११ से पूर्णिमा तक) निर्दिष्ट है। इन पाँच दिनों में व्रताचरणपूर्वक पूर्वाण में विष्णुपूजा और मध्याह्न में भीष्मपितामह के लिए एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया जाता है। यदि शुद्धा एकादशी से उदयकालिक पूर्णिमा तक की अवधि में कोई तिथि क्षय हो जाए और भीष्मपंचकों के दिनों की संख्या चार ही रह जाए, तब शास्त्रकारों ने यह परामर्श दिया है कि दशमीविद्धा एकादशी से ही यह व्रत प्रारम्भ करके शुद्ध (जिसमें चतुर्दशी का वेध न हो) उदयकालिक पूर्णिमा के दिन ही इसे समाप्त कर लेना चाहिए। इसी प्रकार, यदि इन पाँच तिथियों में से किसी एक तिथि की वृद्धि हो जाने से भीष्मपंचकों के 6 दिन बनते हो, तो शुद्ध एकादशी वाले दिन से प्रारम्भ करके चतुर्दशी-विद्धा, पूर्णिमा के दिन ही भीष्मपंचकों को समाप्त करना चाहिए। इस बारे 'धर्मसिन्धु' का वचन है-
"एकादश्यादि-दिनपंचके भीष्मपंचकव्रतमुक्तम्। तच्च शुद्धेकादश्यामारम्य चतुर्दश्यविद्वौदयिक-पौर्णमास्यां समापनीयम्। यदि शुद्धेकादश्यमारम्भे क्षयवशेन पौर्णमास्यां पंचदिनात्मकव्रतसमाप्तिर्न घटते, तदा विर्द्धकादश्यामपि आरम्भः ।।"
इस वर्ष कार्तिक शुक्लपक्ष में द्वादशी का क्षय हो जाने से भीष्मपंचक के दिन केवल चार ही बच रहे हैं। अतः उपरोक्त नियमानुसार यहाँ दशमीविद्धा एकादशी (1 नवम्बर, 2025 ) से भीष्मपंचक का आरम्भ माना गया है। स्पष्ट है, इससे पूर्णिमा तक के दिन पाँच हो गए हैं।
तुलसी विवाह (2 नवम्बर, रविवार)
कार्तिक शुक्ल एकादशी (हरिप्रबोधिनी एकादशी) की पारणा वाले दिन प्रबोधोत्सव मनाया जाता है। इसी दिन अथवा इससे अग्रिम चार (द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा वाले) दिनों में किसी भी दिन विवाह-नक्षत्र में तुलसी विवाह किया जा सकता हे 
ऐसा शास्त्रविधान है-एकादश्यादि पूर्णिमान्ते यत्र क्वापि दिने कार्तिक शुक्लान्तर्गत-विवाह-नक्षत्रेषु वा विधानादनेक कालत्वं तथापि पारणाहे प्रबोधोत्सव कर्मणा सह
- परन्तु प्रबोधोत्सव के साथ एकादशी व्रत पारणा वाले दिन पूर्वरात्रि में (अर्धरात्रि से पहिले ही रात्रिकाल में) तुलसी विवाह करने की परम्परा है-ऐसा 'धर्मसिन्धुकार' का निर्देश है-
'रात्रि प्रथमभागे प्रशस्तः।' यदि पारणा के दिन पूर्वरात्रिकाल में विवाह-नक्षत्र न हो तो दिन के समय प्राप्त विवाहनक्षत्र में, यदि वहाँ भी न मिले तो उसके बिना भी पूर्वरात्रि में तुलसी-विवाह पारणा के दिन कर लेना चाहिए।
इस वर्ष 2 नवम्बर, 2025 को प्रबोधोत्सव है। इसदिन पूर्वरात्रि में विवाह-नक्षत्र उ.भा. भी है। अतः इसदिन 'तुलसी विवाह' शास्त्रविहित है।
नोट-ध्यान रहे-कुछ शास्त्रकार व्यतीपात/वैधृति योग में, द्वादशी तिथि एवं रविवार को तुलसी-दल का स्पर्श एवं तोड़ने का निषेध मानते हैं-
वैधृतौ
च व्यतीपाते भौमभार्गवभानुषु ।
पर्व द्वये च संक्रान्तौ द्वादश्यां सूतके द्वयोः ।। (निर्णयसिन्धु)
अतएव हमारे विचारानुसार श्री तुलसी विवाह उत्सव 3 नवम्बर, सोमवार को मनाना अधिक शास्त्र सम्मत होगा। क्योंकि यहाँ प्रदोष में विवाह नक्षत्र रेवती भी विद्यमान होगा

Thursday, 16 October 2025

दीपावली निर्णय 2025

"सूर्यसिद्धान्त और दीपावली का तिथि-निर्णय: गणितीय और शास्त्रीय विश्लेषण"
 2025 में अमावस्या तिथि की गणना निम्नलिखित है:

✓•1.अमावस्या तिथि का गणितीय निर्धारण:

   - सूर्यसिद्धान्त के अनुसार, अमावस्या तब होती है जब चन्द्रमा और सूर्य की कोणीय दूरी 0° से 12° के बीच होती है।

   - मान लें कि 20 अक्टूबर 2025 को प्रातः 6:00 बजे चन्द्रमा और सूर्य की कोणीय दूरी 0° है (अमावस्या का प्रारम्भ)।

   - चन्द्रमा की सूर्य के सापेक्ष गति 12.1908° प्रति दिन है। अतः, अमावस्या तिथि की अवधि होगी:
     
अवधि= 12°/12.1908°/दिन≈ 0.984  दिन ≈23 घंटे 37  मिनट
   
   - इस आधार पर, अमावस्या 21 अक्टूबर को दोपहर बाद लगभग 4:00 बजे समाप्त होगी (6:00 AM + 23 घंटे 37 मिनट ≈ 4:37 PM)।

✓•2. सूर्यास्त और प्रदोष काल की गणना:

   - भारत में सूर्यास्त का समय सामान्यतः सायं 6:00 बजे के आसपास होता है (स्थानीय भौगोलिक स्थिति के आधार पर ±15 मिनट)।

   - प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद 2 घटी (48 मिनट) तक माना जाता है, अर्थात् लगभग 6:00 PM से 6:48 PM तक।

   - निशीथ काल मध्यरात्रि (लगभग 11:30 PM से 12:30 AM) तक माना जाता है।

   - 21 अक्टूबर को सूर्यास्त (6:00 PM) के समय अमावस्या तिथि समाप्त हो चुकी होगी, क्योंकि यह 4:00 PM के आसपास समाप्त हो रही है।

✓•3. 20 अक्टूबर की स्थिति:

   - 20 अक्टूबर को सूर्यास्त (6:00 PM), प्रदोष काल (6:00 PM से 6:48 PM), निशीथ काल (11:30 PM से 12:30 AM), और सम्पूर्ण रात्रि में अमावस्या तिथि विद्यमान होगी।

   - गणितीय रूप से, 20 अक्टूबर को प्रातः 6:00 बजे से अमावस्या तिथि प्रारम्भ होने के बाद, यह पूरे दिन और रात्रि तक प्रभावी रहेगी।

✓•निष्कर्ष: सूर्यसिद्धान्त की गणितीय गणना के आधार पर, 20 अक्टूबर 2025 को ही दीपावली मनाना शास्त्रसम्मत है, क्योंकि इस दिन सूर्यास्त, प्रदोष, और निशीथ काल में अमावस्या तिथि उपस्थित है।

✓•सूर्यसिद्धान्त बनाम दृक्-सिद्ध गणना: गणितीय तुलना: दृक्-सिद्ध गणनाएं आधुनिक वेधशालाओं और उपकरणों पर आधारित हैं, जो ग्रहों की वास्तविक स्थिति को प्रत्यक्ष अवलोकन द्वारा मापती हैं। उदाहरण के लिए, दृक्-सिद्ध गणना में अमावस्या का समय सूर्य और चन्द्रमा की वास्तविक खगोलीय स्थिति पर आधारित होता है, जो GPS और अन्य उपकरणों द्वारा मापा जाता है। सूर्यसिद्धान्त, इसके विपरीत, प्राचीन गणितीय मॉडल पर आधारित है, जो दीर्घकालिक औसत गति (mean motion) को आधार मानता है।

✓•उदाहरण:

- दृक्-सिद्ध गणना: मान लें कि 21 अक्टूबर 2025 को वेधशाला द्वारा मापी गई चन्द्रमा और सूर्य की कोणीय दूरी 0° दोपहर 2:00 बजे है। चूंकि चन्द्रमा की गति 12.1908° प्रति दिन है, अमावस्या तिथि 4:00 PM तक समाप्त हो सकती है।

- सूर्यसिद्धान्त गणना: सूर्यसिद्धान्त में दीर्घकालिक औसत गति के आधार पर तिथि की गणना की जाती है, जो 20 अक्टूबर को सूर्यास्त तक अमावस्या की उपस्थिति को सुनिश्चित करती है।

✓•निर्णयसिन्धु में स्पष्ट है:

"अदृष्ट-फल-सिध्यर्थ यथार्कगणितं कुरु।
 गणितं यदि दृष्टार्थ त‌दृष्ट्युद्भव तस्सदा।।"

✓•अर्थात्, धार्मिक कर्मों (अदृष्ट फल) के लिए सूर्यसिद्धान्त का प्रयोग करें, जबकि दृष्ट प्रयोजनों (जैसे वैज्ञानिक अनुसंधान) के लिए दृक्-सिद्ध गणना उपयुक्त है।

✓•निर्णयसिन्धु और धर्मसिन्धु का महत्व
निर्णयसिन्धु और धर्मसिन्धु भारतीय पञ्चाङ्गों के लिए सर्वमान्य ग्रन्थ हैं। आचार्य कमलाकर भट्ट ने निर्णयसिन्धु में दृक्-सिद्ध गणनाओं को नकारते हुए सूर्यसिद्धान्त को प्रामाणिक माना है। पण्डित सदाशिव शास्त्री ने धर्मसिन्धु की टीका में सूर्यसिद्धान्त की प्रामाणिकता को स्थापित किया। सूर्यसिद्धान्त को भ्रमजाल मानने वाले विद्वानों को निर्णयसिन्धु और धर्मसिन्धु  का भी त्याग करना होगा, जो तार्किक रूप से असंगत है।

✓•कालिदास और ज्योतिर्विदाभरण
कालिदास ने ज्योतिर्विदाभरण में लिखा है:

"श्रीसूर्यसिद्धान्तमतोद्भवार्कात् साध्यौ तदा तावधिकक्षयौ। 
मासौ तदा संक्रमकाल एव साध्यः सदा हौरिकशास्त्रविद्भिः।।"

✓•यह स्पष्ट करता है कि अधिकमास, क्षयमास, और संक्रान्ति की गणना सूर्यसिद्धान्त के आधार पर ही की जानी चाहिए।

✓•शंकराचार्यों की भूमिका:
दीपावली जैसे पर्वों के तिथि-निर्णय में एकरूपता के लिए चारों शंकराचार्य पीठों को सूर्यसिद्धान्त के आधार पर समवेत घोषणा करनी चाहिए। यह धार्मिक एकता और परम्पराओं के संरक्षण के लिए आवश्यक है।

✓••निष्कर्ष: सूर्यसिद्धान्त की गणितीय और शास्त्रीय प्रामाणिकता प्राचीन ग्रन्थों और विद्वानों द्वारा सिद्ध है। दीपावली 2025 के लिए गणितीय गणना के आधार पर 20 अक्टूबर ही शास्त्रसम्मत है। सूर्यसिद्धान्त को भ्रमजाल मानने वाले विद्वानों को निर्णयसिन्धु और धर्मसिन्धु‌का भी त्याग करना होगा, जो असंगत है। शंकराचार्यों को सूर्यसिद्धान्त को आधार मानकर तिथि-निर्णय में एकरूपता लानी चाहिए।

✓•सन्दर्भ:
1. स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज, कुम्भ तिथ्यादि निर्णय.
2. आचार्य कमलाकर भट्ट, निर्णयसिन्धु.
3. पण्डित सदाशिव शास्त्री मुसलगाँवकर, धर्मसिन्धु टीका.
4. कालिदास, ज्योतिर्विदाभरण.
5. स्कन्दपुराण, कलिमाहात्म्य.
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्

दीपावली पर पठाके का प्रमाण

#दीपावली में #आतिशबाजी-स्कन्द तथा पद्म पुराण में दीपावली उत्सव का वर्णन है। असुर राजा #बलि इसी दिन पाताल गये थे, उस उपलक्ष्य में दीपावली का पालन होता है। सन्ध्या को स्त्रियों द्वारा लक्ष्मी पूजा के बाद दीप जलाते हैं तथा #उल्का (आतिशबाजी) करनी चाहिये। उल्का तारा गणों के प्रकाश का प्रतीक है। आधी रात को जब लोग सो जायें तब जोर से शब्द होना चाहिये (पटाखा) जिससे #अलक्ष्मी भाग जाये। #विस्फोटक को बाण कहते थे और इनकी उपाधि ओड़िशा में बाणुआ तथा महाबाणुआ है। #ओड़िशा के क्षत्रियों की उपाधि प्रुस्ति का भी यही अर्थ है। (प्रुषु दाहे, पाणिनीय धातु पाठ, १/४६७)
#तिथितत्त्वे अमावास्या प्रकरणे...............
तुलाराशिं गते भानौ अमावस्यां नराधिपः।
#स्नात्वा देवान् पितॄन् भक्त्या संयुज्याथ प्रणम्य च॥
#कृत्वा तु पार्वणश्राद्धं दधिक्षीरगुड़ादिभिः।
 ततो ऽपराह्ण समये घोषयेन्नगरे नृपः॥
#लक्ष्मीः संपूज्यतां लोका उल्काभिश्चापि वेष्ट्यताम्॥
भारत मञ्जरी (१/८९०)-
#प्रकाशिताग्राः पार्थेन ज्वलदुल्मुक पाणिना।
स्कन्द पुराण (२/४/९)- 
त्वं ज्योतिः श्री #रवीन्द्वग्नि विद्युत्सौवर्ण तारकाः। 
#सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपज्योतिः स्थिते नमः॥८९॥ 
या #लक्ष्मीर्दिवसे पुण्ये दीपावल्यां च भूतले। 
गवां गोष्ठे तु कार्तिक्यां सा लक्ष्मीर्वरदा मम॥९०॥ 
#दीपदानं ततः कुर्यात्प्रदोषे च तथोल्मुकम्।
 भ्रामयेत्स्वस्य शिरसि सर्वाऽरिष्टनिवारणम्॥९१॥ 
पद्म पुराण (६/१२२)-त्वं ज्योतिः श्री रविश्चंद्रो विद्युत्सौवर्ण तारकः। 
#सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपज्योतिः स्थिता तु या॥२३॥
या लक्ष्मीर्दिवसे पुण्ये दीपावल्यां च भूतले।
#गवां गोष्ठे तु कार्तिक्यां सा लक्ष्मीर्वरदा मम॥२४॥
शंकरश्च भवानी च क्रीडया द्यूतमास्थितौ।
#भवान्याभ्यर्चिता लक्ष्मीर्धेनुरूपेण संस्थिता॥२५॥
गौर्या जित्वा पुरा शंभुर्नग्नो द्यूते विसर्जितः॥ 
#अतोऽयं शंकरो दुःखी गौरी नित्यं सुखे स्थिता॥२६॥
प्रथमं विजयो यस्य तस्य संवत्सरं सुखम्। 
एवं गते #निशीथे तु जने निद्रार्ध लोचने॥२७॥
तावन्नगर नारीभिस्तूर्य डिंडिम वादनैः।
#निष्कास्यते प्रहृष्टाभिरलक्ष्मीश्च गृहां गणात्॥२८॥

              गुरुदेव
Bhubneshwar 
Parnkuti ashram guna
9893946810

Sunday, 12 October 2025

दीपावली पर दीपदान महत्व

दीपदानात् सदा लक्ष्मीः स्थिरा भवति सर्वदा।
दीपैर्नीराजनं तस्मात् दीपावली स्मृता।।”

🔹 अर्थ:
दीपदान करने से लक्ष्मी सदा स्थिर (स्थायी) होती हैं।
इसी कारण दीपों से नीराजन करने का विधान है, और इसी से यह तिथि दीपावली कहलाती है।स्कन्दपुराण, कार्तिकमाहात्म्य में दीपदान (दीयों का दान और प्रज्वलन) केवल दीपावली पर ही नहीं, बल्कि कार्तिक मास के संपूर्ण काल में अत्यंत पुण्यकारी बताया गया है स्कन्दपुराण, कार्तिकमाहात्म्य में
  1. दीपदानात् सदा लक्ष्मीः स्थिरा भवति सर्वदा।
    दीपैर्नीराजनं तस्मात् दीपावली स्मृता।।

    ➤ अर्थ: दीपदान करने से लक्ष्मी स्थिर होती हैं। इसी कारण दीपों से आराधना कर इस तिथि को दीपावली कहा गया।


  1. पद्मपुराण, कार्तिकमाहात्म्य

    यः कार्तिके मासि नरोऽभ्युपेतो
    दीपं ददात्यायनवस्त्रसङ्गम्।
    तेनाक्षयं पुण्यमवाप्य लोके
    विष्णोः पदं याति सुखेन पुंसाः।।

    ➤ अर्थ: जो कार्तिक मास में दीपदान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और अंततः वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है।


  1. नारदपुराण

    दीपं यः प्रयतो दद्यात् कार्तिके मासि भक्तितः।
    स याति विष्णुसायुज्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते।।

    ➤ अर्थ: जो कार्तिक मास में भक्ति से दीपदान करता है, वह विष्णुसायुज्य को प्राप्त होता है और समस्त पापों से मुक्त होता है।


  1. गृह्यसूत्रवचन

    दीपदानं तु यः कुर्यात् संध्यायां वा निशामुखे।
    तस्य पापं विनश्येत् दीपवत् तिमिरं यथा।।

    ➤ अर्थ: जो संध्या या रात्रि के आरंभ में दीपदान करता है, उसके पाप वैसे ही नष्ट होते हैं जैसे दीप से अंधकार


🔱 दीपदान माहात्म्य (महत्व)

✴️ शास्त्रवचन:

> दीपं यो यः प्रयच्छेत् कार्तिके मासि मानवः।
तेन जातं महत् पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।।
(स्कन्दपुराण, कार्तिकमाहात्म्य)



अर्थ:
जो मनुष्य कार्तिक मास में दीपदान करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।


---

> दीपदानं हि यः कुर्यात् प्रदोषे भक्तिसंयुतः।
तस्य लोकाः परं यान्ति दीपवत् सर्वतः शुभाः।।
(नारदपुराण)



अर्थ:
जो संध्याकाल में दीपदान करता है, वह स्वयं प्रकाशमय लोकों को प्राप्त होता है।


---

> दीपदानात् सदा लक्ष्मीः स्थिरा भवति सर्वदा।
दीपैर्नीराजनं तस्मात् दीपावली स्मृता।।
(स्कन्दपुराण)



अर्थ:
दीपदान करने से लक्ष्मी सदा स्थिर रहती हैं। इसी कारण दीपों से आराधना कर इसे दीपावली कहा गया है।




2. दीपावली की रात्रि:

प्रदोषकाल — सूर्यास्त से लगभग 72 मिनट तक का समय सर्वश्रेष्ठ माना गया है।


5. मंत्र बोलें —

> “दीपं देहि जगन्नाथ त्रैलोक्यं तमोनुदम्।
नमस्ते दीपदेवेति प्रज्वालयामि सर्वदा।।




6. दीप जलाने के बाद प्रार्थना करें —
“दीपज्योतिर्विनाशाय पापानां संसारसागरात्।
दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते नमोऽस्तु ज्योतिरेश्वरि।।”









🔱

दीपावली निर्णय 2025

मार्तण्ड की चुप्पी भादवमाता पंचांग की लीपापोती दिवाकर आदि पंचांग द्वारा सूत्र ही गलत, एवं अन्य पंचांगकर्ताओं को चुनौती: शास्त्र विरुद्ध दीपावली निर्णय पर विमर्श

मार्तण्ड पंचांग के निर्माताओं और अन्य सभी पंचांगकर्ताओं ने 21 अक्टूबर, 2025 को दीपावली मनाने का जो निर्णय लिया है, वह शास्त्रों के विरुद्ध है। यह एक गंभीर त्रुटि है, जिसका कारण शास्त्रों वचनों का गलत विश्लेषण है।

मार्तण्ड की चुप्पी और उनके निर्णय की त्रुटियाँ👉
मार्तण्ड पंचांग के विद्वान, यद्यपि वे सम्मानित हैं, इसपर पर मौन हैं और इसका कोई शास्त्रीय उत्तर नहीं दे पा रहे हैं। उनका मौन ही उनकी स्वीकृति है कि उनके द्वारा लिया गया निर्णय शास्त्रसम्मत नहीं है। यदि वे उत्तर देंगे, तो उन्हें शास्त्रों की व्याख्या को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना पड़ेगा, क्योंकि जिस सूत्र के आधार पर उन्होंने 21 अक्टूबर को दीपावली घोषित की है, उसका खंडन स्वयं धर्मसिंधु ग्रंथकार ने किया है। 

अहंकार बनाम स्वीकार्यता: 👉गलती किसी से भी हो सकती है, और उसे स्वीकार करने से कोई छोटा नहीं हो जाता। परंतु यहाँ अहंकार आड़े आ रहा है। 

दोषपूर्ण तर्क:👉 सौ से अधिक पंचांगों ने भी 21 अक्टूबर की तिथि तय की है। उनका तर्क है कि जब इतने सारे पंचांग एक ही निर्णय पर पहुँचे हैं, तो यह सही है। यह हमारे तर्कों का उत्तर नहीं है, यह तो केवल एक-दूसरे का समर्थन करना है, एक दूसरे की पीठ खुजलाने से सिद्धान्त स्थापित नहीं होते शास्त्रीय प्रमाण से होते हैं और जो प्रमाण आप लोगों के द्वारा प्रदत्त है उसमें दोषदर्शन हम करा चुके हैं।  

भादवमाता वालों का अनुचित तर्क👉
भादवमाता वालों की स्थिति तो और भी हास्यास्पद है। वे सभी पंचांगकर्ताओं की तरह एक सूत्र का उपयोग करते हैं: "एतन्मते उभयत्र प्रदोषाव्याप्तिपक्षेऽपि परत्र दर्शस्य सार्धयामत्रयाधिकव्यापित्वात् परैव युक्तेति भाति।" 

वे इस सूत्र का अर्थ यह लगा रहे हैं कि "यदि दोनों दिन प्रदोष व्याप्त हो, तब"। जबकि इसका सही अर्थ है: "यदि दोनों दिन प्रदोष व्याप्त न हो, तब"। यहाँ 'अव्याप्ति' पद का स्पष्ट उल्लेख है, जिसे वे संस्कृत के अज्ञान से व्याप्ति बता रहे हैं अथवा जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं। 

उनका अतार्किक बचाव हास्यास्पद है, जब उन्हें बताया गया कि उनके ही सूत्र से उनका मत खंडित हो जाता है, तो उनका अद्भुत तर्क था कि "संस्कृत कोई प्रमाण नहीं है।" उन्होंने यह भी कहा कि यदि संस्कृत को प्रमाण मानेंगे तो बौद्ध धर्म के ग्रंथ भी मानने पड़ेंगे क्योंकि वे भी संस्कृत में हैं। यह एक असाधारण और हास्यास्पद तर्क है, जो उनके ज्ञान की कमी को दर्शाता है। 

पुरुषार्थचिंतामणि और धर्मसिंधु का वास्तविक मत

अधिकांश पंचांगकर्ता पुरुषार्थचिंतामणि के सूत्र को धर्मसिंधु द्वारा सिद्धांत के रूप में ग्रहण किया हुआ मान रहे हैं, जो कि एक और भ्रम है। 

पुराणसमुच्चय का उद्धरण: पुरुषार्थचिंतामणि ने वास्तव में पुराणसमुच्चय के वचन को उद्धृत किया है: "त्रियामगा दर्शतिथिर्भवेच्चेत्सार्धत्रियामा प्रतिपद्विवृद्धौ। दीपोत्सवे ते मुनिभिः प्रदिष्टे अतोऽन्यथा पूर्वयुते विधेये॥" 

धर्मसिंधु का खंडन: धर्मसिंधु के लेखक इसी मत का खंडन करते हैं और स्पष्ट करते हैं कि पुरुषार्थचिंतामणि का मत केवल तभी लागू होता है जब दोनों दिन प्रदोष-व्याप्ति न हो👉

"एतन्मते उभयत्र प्रदोषाव्याप्तिपक्षेऽपि परत्र दर्शस्य सार्धयामत्रयाधिकव्यापित्वात् परैव युक्तेति भाति।" 

सही अर्थ: "इस मत (पुरुषार्थचिंतामणि के मत) के अनुसार, जिस पक्ष में दोनों ही दिन प्रदोष-व्याप्ति न हो, उसमें भी यदि दूसरे दिन अमावस्या साढ़े तीन प्रहर (लगभग 10.5 घंटे) से अधिक व्याप्त हो, तो 'परा' (बाद वाली) तिथि ही उचित है, ऐसा प्रतीत होता है।" 

यह स्पष्ट है कि धर्मसिंधु ने इस मत को पूर्वपक्ष में उठाया है, सिद्धांत के रूप में नहीं। उन्होंने इसे केवल एक विशेष परिस्थिति में लागू करने की बात कही है, अन्य समय में नहीं। 

दिवकारपंचांगकार तो इस सूत्र को ही गलत उठा लेते हैं वे कहते हैं कि 👉

एतन्मते उभयत्र प्रदोषव्याप्तिपक्षेऽपि परत्र दर्शस्य सार्धयामत्रयाधिकव्यापित्वात् परैव युक्तेति भाति।

उन्होंने उभयत्र प्रदोषाव्याप्तिपक्षेऽपि को ही उभयत्र प्रदोषव्याप्तिपक्षेऽपि करके अव्याप्ति को व्याप्ति करके अपना निर्णय 21 का कर दिया।  

इसप्रकार ये सारे पंचांगकर्ता शास्त्रों के गलत अर्थ, उनके प्रकरणविरुद्ध सूत्रों के प्रयोग आदि से अपना वचन सिद्ध करने के कारण खण्डनयोग्य हैं अत: ये यदि ये पंचांगकर्ता इन स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद अपने अहंकार के कारण निर्णय नहीं बदलते, तो वे जनता को भ्रमित करने वाले और शास्त्रों का हनन करने वाले ही सिद्ध होंगे।

और यदि ये हमारे द्वारा प्रदत्त खण्डन का खण्डन कर यह सिद्ध करे दें कि धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्घुकार के निर्णय से 21 को अक्तूबर को दीपावली सिद्ध होती है तो हम सहर्ष इनके निर्णय को स्वीकार कर लेंगे।
साभार - तंत्र गुरुकुल

Tuesday, 30 September 2025

पान दशहरा

#दशहरा पर बीड़ा चबाने की #परम्परा भी है।.....
बीड़ा ताम्बूलवीटिका के घटक द्रव्य हैं सुपारी , इलायची, कत्था, कपूर।
#पूग्येलाखदिराढ्यं_तु_ताम्बूलं।
बाण ने कादम्बरी में कई बार ताम्बूलवीटिका का प्रयोग किया है। सिंहासनबत्तीसी में भी बीड़ा दिये जाने का वर्णन है।
#दे_बीरा_रघुनाथ_पठाये ...
बीड़ा पान ताम्बूल  किसी कार्य को पूरा करने का संकल्प लेना - बीड़ा उठाना ।
"सुपारी लेना" का भाव वही जो बीड़ा उठाने का.
सुपारी और पान का साथ सदा से ही है ।
देव पूजन में प्रयोग होता है ।
किसी सत्कर्म के उद्देश्य से ही पान, सुपारी का शगुन होता था । किन्तु आजकल हत्या करने जैसे जघन्य अपराध के लिये "सुपारी लेना" या देना का प्रचलन हो गया ।
#शब्दों की यही विडम्बना है , काल के साथ अर्थ एवं भाव परिवर्तन हो जाता है ।
पान सुपारी खाये जाने का चलन बहुत पुराना है,
आज भी लोग एक बटुआ में सरौता , कत्था, सुपारी, चूना रखे हुये मिल जायेंगे ।
आजकल #गुटखा के चलन ने सब दूषित और विकृत कर दिया है । तम्बाकू युक्त गुटखा पर प्रतिबन्ध होते हुये भी , तम्बाकू अलग पाउच में साथ में मिलने से निष्प्रभावी है ।
गुटखा में बहुत से हानिकारक केमिकल और पत्थर का चूरा भी मिला होता है ।

पहले #विप्रों और राजसामंतों के दाँत ताम्बूलरंजित होते थे। बल्लालकृत भोजप्रबन्ध में एक प्रसंग है। कवियों को अकूतधन देने वाले राजा भोज के दरबार में कविकर्म से रहित वेदशास्त्रज्ञाता विद्वान पहुँचे। द्वारपाल ने इन लोगों का सूक्ष्म निरीक्षण किया। दरबार में जाकर उसने उन वैदिक विद्वानों का परिचय इस प्रकार दिया -
#राजमाषनिभैर्दन्तैः_कटिविन्यस्त_पाणयः।
#द्वारतिष्ठन्ति_राजेन्द्र_छादन्साः_श्लोकशत्रावः॥ 
हे राजा ! द्वार पर राजमा के समान दाँतों वाले, श्लोकशत्रु, वेदज्ञ कमर पर हाथ रखे खड़े हैं।

एक श्लोक है -
#शुक्लदन्ताः_जिताक्षश्च_मुंडाः_काषायवाससः।
#शुद्धाधर्म_वदिष्यन्ति_शाठ्यबुद्धयोपजीविनः॥
सफेद दाँत वाले' शठबुद्धि से जीविका चलाने वाले निन्दा के पात्र हैं, वे शुद्धअधर्म की बात करते हैं |
आभास कुमार गांगुली जिन्हें गायक किशोर कुमार के नाम से जाना जाता है, पान की प्रशंसा में एक कविता रची थी
#पान सो पदारथ, सब जहान को सुधारत
गायन को बढ़ावत जामे चूना चौकसाई है
सुपारिन के साथ साथ,मसाला मिले भांत भांत
जामे कत्थे की रत्ती भर थोड़ी सी ललाई है
बैठें है सभा मांहि बात करे भांत भांत
थूकन जात बार बार जाने का बड़ाई है
कहें कवि 'किशोरदास' चतुरन की चतुराई साथ
पान में तमाखू किसी मूरख ने चलाई है.
( मूरख न बनिये )

                     🙇 #जयश्रीसीताराम 🙇

दुर्गा सप्तशती हवन किस श्लोक पर किस ओषधि का हवन करना है केवल ब्राह्मणों के उपयोगार्थ लिंक ओपन करे

नवरात्रि हवन सामग्री श्लोक संख्या सहित कई कौन से श्लोक पर किस ओषधि का हवन करना है केवल ब्राह्मणों के उपयोगार्थ लिंक ओपन करे
श्लोक सँख्या   ///******///
1   पत्र पुष्प, फल,
2 अर्क
3 अर्क
5 अपामार्ग
6 कुशा
7 खैर
10 त्रण कुशा दूर्वा
20 पत्र पुष्प फल
26 पत्र पुष्प फल
29 पत्र पुष्प फल
35 पत्र पुष्प फल
39 पत्र पुष्प फल
46पत्र पुष्प फल
51 यव तंडुल
55 इलायची
56 शकर
59 पत्र पुष्प फल
63 पत्र पुष्प फल
66 मिश्री पुष्प
67 पीपल पत्ता कमल गट्टा
68 उडद राल समुद्र फेन
69कमल गट्टा
70 कमल गट्टा
71पत्र पुष्प फल
72 हल्दी
73पुष्प
74दूर्वा दर्भा
75 मिश्री
77 राई
78 राई
79 लाजा  पुष्प मिश्री शहदेवी
80 हवन नही
83 राई
84जाय फल  भांग
87 भांग
88पत्र पुष्प फल
89 कमल गट्टा
92 रक्त गुंजा
94 राई
96 पत्र पुष्प फल
100 कपूर
101 कमलगट्टा दर्भा
102 पत्र पुष्प फल
103 कुशा शंख  पुष्पी गूगल पान  मधु केला
104 पुष्प
महाहुति "","पान कैथ मधु कमल गट्टा गूगल गंधक्षत पुष्प लोंग इलायची सुपाड़ी
=================================

               दूसरा अध्याय

श्लोक सँख्या ///******///
1 पत्र पुष्प, फल,
2 अर्क
3 अर्क
5 अपामार्ग
6 कुशा
7 खैर
10 त्रण कुशा दूर्वा
20 पत्र पुष्प फल
26 पत्र पुष्प फल
29 पत्र पुष्प फल
35 पत्र पुष्प फल
39 पत्र पुष्प फल
46पत्र पुष्प फल
51 यव तंडुल
55 इलायची
56 शकर
59 पत्र पुष्प फल
63 पत्र पुष्प फल
66 मिश्री पुष्प
67 पीपल पत्ता कमल गट्टा
68 उडद राल समुद्र फेन
69कमल गट्टा
70 कमल गट्टा
71पत्र पुष्प फल
72 हल्दी
73पुष्प
74दूर्वा दर्भा
75 मिश्री
77 राई
78 राई
79 लाजा पुष्प मिश्री शहदेवी
80 हवन नही
83 राई
84जाय फल भांग
87 भांग
88पत्र पुष्प फल
89 कमल गट्टा
92 रक्त गुंजा
94 राई
96 पत्र पुष्प फल
100 कपूर
101 कमलगट्टा दर्भा
102 पत्र पुष्प फल
103 कुशा शंख पुष्पी गूगल पान मधु केला
104 पुष्प
महाहुति "","पान कैथ मधु कमल गट्टा गूगल गंधक्षत पुष्प लोंग इलायची सुपाड़ी
=================================

               दूसरा अध्याय



""""""""","''''''':::::::::::""""""""""''''''''**********
1 पत्र पुष्प फल
2 भैंसा गूगल
10 नीम गिलोय जाय फल
12 कपूर
14 जाटा मासी  विष्णु कांता
15आम्र फल
17 कपूर
18 रक्त चंदन
20 लोंग
21 शंख पुष्पी
22 लोंग
25 पुष्प
28 कपूर पुष्प
29 पुष्प कमल गट्टा
30 मधु
57 हरताल
60 सरसो
63 कटहल
67 दर्भा कपूर राई
69 पुष्प गूगल विल्वफल

महाहुति """"","",पान शाकल्य  कमल गट्टा  गूगल नारियल फल खंड  पुष्प  लोंग  इलायची सुपाड़ी

:::      ::::  ::::::::::;;;         ::::::::: :;: ;;;;;;;;;    ;;
     तीसरा अध्याय
1पत्र पुष्प फल
9 दर्पण कपूर
10 लोंग कागजी नीबू
12 मैनसिल
17 मैनसिल शिलाजीत
19 लोंग
20 सरसों
25 खिरनी
27 सिंघाड़ा
29 हरताल
34 पान गुड़ दूध शहद
36 वच राजान
37 पत्र पुष्प फल
38  मधुआसव पत्र पुष्प फल
39 पत्र पुष्प फल
40 सरसो गोखुरु
42 कालीमिर्च उडद लोकी
44 पत्र पुष्प गुलाल पान सुपारी
  महा आहुति """""""पान विजोरानीबू चंदन दधि नीम गिलोय  माष (उडद दही मिलाकर ) भैसा गूगल  कमल गट्टा  लोंग इलायची सुपारी पत्र पुष्प फल

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
चौथा अध्याय :::::::
3 कदली फल
5 विष्णु कांता विल्वफल
7 विल्व फल
8 हलुआ पकवान  श्वेत चंदन
11 ब्राह्मी कपूर
12 विजोरा
14 लाल कनेर पुष्प
23 कमल गट्टा  लाल कनेर सीताफल
24 से  हवन नही होगा
27 तक हवन नही होगा
28 पत्र पुष्प फल
29 पुष्प लाल चंदन हरिद्रा सुगंधित द्रव्य
30 अष्टांग धूप गूगल
31 पत्र पुष्प फल
33 पत्र पुष्प फल
34 राई  गूगल
35 गूगल जाय फल
36 पंचमेवा खीर गुलकंद  मिश्री पुष्प फल
37 पत्र पुष्प फल 
39 पुष्प
41 भोजपत्र  रक्तनीर 
42 पुष्प आंवला  मधु  धूप
महआहुति :::::     पान शाकल्य खीर कमल गट्टा विल्वफल लोंग इलायची गूगल पुष्प सुपारी

::::: :::::::::: :::::: ::::::; :::::::: :::::::: ::::: ::::;: ::::: :::::
1 पत्र पुष्प फल
6 पत्र पुष्प फल
8 पत्रपुष्प फल
9 पत्र पुष्प फल  गूगल भोज पत्र 
10 हल्दी  आंवला
11 पुष्प
12 दूर्वा
13 दारू हल्दी
14 से 16तक  विष्णु कांता
17 से  19 तक आंवला
20 से 22 तक ब्राह्मी
23 से 25  तक हल्दी ब नीम गिलोय
29 से 31 तक सतावरी
32 से 34 तक सोंठ  जाय फल
44 से 46 तक   लाजा पुष्प
47 से 49 तक पुष्प
50 से 52 तक पुष्प
53 से 55 तक  अबीर
56 से 58 तक  मिश्री विल्वफल कमल गट्टा
59 से 61 तक शहद  पुष्प
62 से 64 तक  ब्राह्मी विजया
65 से 67 तक सहदेवी
68 से 70 तक पकवान
71 से 73 तक  केसर लाल कनेर
81 मिश्री इलायची
82 गूगल
83 पत्र पुष्प फल
84 जावित्री
85 दाल चीनी
86 भोज पत्र 
87 भोजपत्र दालचीनी
88 दारू हल्दी  पुष्प
89 आम्र फल
92 कपूर
94 पुष्प विल्व पत्र
95 गुंजा
96 पुष्प कमलगट्टा
97 भोजपत्र
99 भोजपत्र
101 पत्र पुष्प
104 मैनसिल
105 पत्र पुष्प फल
114 लाजा
115 पत्र पुष्प फल
116 वच पान भोजपत्र शमीपत्र दूर्वा
117  शमी पत्र दूर्वा फल पुष्प कनेर पुष्प
120 लाजा लोंग काजल
121 लाजा खाजा शमीपत्र  हिंगुल
122 पत्र पुष्प फल
126 जटामांसी
127 पान पुष्प फल शमीपत्र
129 ताम्बूल सुपारी गन्ना
महआहुति:::   पान शाकल्य लोंग इलायची सुपारी गूगल कमल गट्टा श्वेत चंदन पुष्प फल विजोरा

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छठवा अध्याय :::::::
1पत्र पुष्प फल
4 राई  जटामांसी गूगल
7 मसूर
10 पत्र पुष्प फल
12 पत्र पुष्प फल
13 राल विजोरा गूगल
14 उडद मसूर
17 केसर
18 केसर राई
19 केसर राई
23 राई जटामांसी
24 लोंग कनेर गन्ना
महआहुति ******पान शाकल्य गूगल कमलगट्टा  भोजपत्र कुष्मांड नारंगीफल  नारिकेल फल खंड /
**///***///////****//////*****/////*****/////***
सातवा अध्याय **///*****////***/////
1पत्र पुष्प फल
5 काली हल्दी कस्तूरी काजल
6 काली मिर्च
8 पान रक्त चंदन कुमकुम केसर
12 सरसो
14 हल्दी काली मिर्च
15 गूगल बज्र दंती
19 कपूर बज्र दंती
20 जटा मासी दर्भा सरसो कदली फल
23 विजोरा नीबू
24 गन्ना
25 पत्र पुष्प फल
26 पान पुष्प फल आम्रफल  चिरोंजी
महआहुति ****/////पान शाकल्य लोंग इलायची चिरोंजी लाजवंती पुष्प कमल गट्टा जाय फल कुष्मांड फलखंड कपूर
******///////*****/////******///////****//////आठवाँ अध्याय
1 पत्र पुष्प फल
5 राई
6 राई
8दूर्वा रक्त नीर गूगल
9 दूर्वा रक्त नीर गूगल
10 दूर्वा गूगल काली हल्दी
13 पत्र पुष्प फल
14 गुंजा
15 ब्राह्मी
16 जटामासी
17 मोर पंख
18 विष्णु कांता
19 बज्रदन्ति पत्र
20 गोखरू
21 पुष्प लोंग
28 जटामासी  विजया
29  आमी हल्दी
39 सरसों
43 रक्त गूंजा 
44 रक्त गुंजा
49 लालचन्दन
54 रक्त चंदन रक्त गुंजा
55 रक्त चंदन
57 से 61 तक रक्त चंदन
62 विजोरा नीबू
63 पुष्प
महआहुति****//////पान शाकल्य कमलगट्टा लोंग इलायची  सुपारी गूगल कुष्मांड फलखण्ड लाल चंदन मधु

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नबम अध्याय ****///////
1पत्र पुष्प फल
2 विजोरा नीबू
4 पत्र पुष्प फल
17 कवीठ/कैथ
20 केसर
31 दूर्वा रक्त नीर
34 लोंग
35 विजोरा नीबू
36 गूगल कण इन्द्र जो
38 मोरपंखी
41 उडद कुष्मांड फलखण्ड गन्ना पान सुपारी बेलगिरी
महआहुति ****////पान शाकल्य लोंग इलायची सुपारी विजोरा कूष्मांडखण्ड इक्षुरखण्ड /गन्ना विल्वफल  मैनफल

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/दसवाँ अध्याय **///
1 पत्र पुष्प फल
2 केसर कस्तूरी
4 पान पुष्प फल दूर्वा शमीपत्र
5 रक्त चंदन
6 पान पुष्प फल
7 पुष्प
8 पान पुष्प फल दूर्वा शमीपत्र
9 पुष्प
10 पान पुष्प फल
27 पक्का केला
28 भोजपत्र
31 पुष्प
32 कपूर गूगल कमल गट्टा बटपत्र इन्द्र जो
महआहुति *****/////
पान शाकल्य लोंग इलायची सुपाड़ी  कस्तूरी कमलगट्टा गूगल विल्वफल  कूष्मांडखण्ड फल पुष्प मैनसिल मातुलिंग

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ग्यारवा अध्याय ****/////

1 /1से 3 तक पुष्प पत्र फल
3 दूर्वा
5 विष्णु कांता विजोरा नीबू
6 भोजपत्र  मालकांगनी
10 इलायची गूगल जायफल दूर्वा पुष्प फल केसर मिश्री
12 दूर्वा पुष्प गुगल कमलगट्टा
13 कुशा ब्राह्मी
14 कपूर
15 मोरपंखी
16 शंख पुष्पी
17 बज्र दंती
18 गोखरू
19 पुष्प
20 जायफल जटामांसी
21 नीम गिलोय
22 लोंग इलायची गूगल मिश्री
23पान पुष्प
24 लालकनेर दूर्वा फल पुष्प पत्र बहेड़ा
25 बहेड़ा
26 नीम आंवला राई
28 रक्तचन्दन उडद मसूर दही
29 सरसो कालीमिर्च जायफल नीम गिलोय आंवला राई
31भोजपत्र मालकांगनी 
32 हल्दी दर्भा दुर्बा
33 पुष्प मिश्री
35 फल पुष्प
36 दुर्बा पत्र पुष्प फल शमी पत्र
37 लाजा शमीपत्र फल पुष्प फल
38 पान पुष्प फल
39 सरसों कालीमिर्च दालचीनी जायफल
40 दूर्वा पान शमीपत्र
41 सरसों
42 मक्खन
43 जायफल
44 दाड़िम/गुड़हल के पुष्प
45 आनार मजीठ
46 पुष्प पान फल नारंगी
47 इलायची कमल गट्टा
49 पालक पत्र पुष्प फल
50 दूर्वा लाल कनेर पान फल
52 रक्त गुंजा पान पुष्प फल
53 लालकनेर
54 पुष्प फल पान
55 काली मिर्च सरसो गुगल
महआहुति****///// पान लोंग इलायची कपूर  शकर पत्र पुष्प फल कमल गट्टा सुपारी  मिश्री खीर गूगल गन्ना गुड़हल पुष्प फल
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बारहवा अध्याय ****/////
1 पान शमीपत्र पुष्प फल
2 गूगल दूर्वा आमी हल्दी  नागकेसर
3 दर्भा
4 भोजपत्र
5 गूगल मिश्री
6 हल्दी दूर्वा
8 मिश्री गूगल
9 पान पुष्प मिश्री इलायची मधु
10 गन्ना कुष्मांड खंड फल नारियल खण्ड फल पेड़ा
11 केला गन्ना कुष्मांड खंड फल
12 पान पुष्प फल मिश्री
13 पान पुष्प मिश्री हल्दी खीर फल इलायची
14 दूर्वा
15 दर्भा
17 अर्क पलास शमीपत्र खैर भोजपत्र
18 राई गुगल फूल प्रियंगु  आशापुरी धूप
20 पान पुष्प फल
21 पान पुष्प फल धूप केसर  मिश्री कपूर विजोरा नीबू  पकवान
22 खीर पकवान
23पान पुष्प फल जायफल
25 दर्भा पुष्प भोजपत्र
29 हरताल गूगल पुष्प
30 सरसों गूगल लोंग
31 पान पुष्प फल
32 वच पान पुष्प
33 सर्वोषधि
36 पान पुष्प फल
39 अनार के छिलके
41 गंध पुष्प पान फल मिश्री जाय फल  चन्दन धूप
महआहुति ****/////
अगर केसर कस्तूरी कमल गट्टा पत्र पुष्प फल जाय फल विल्वफल  मिश्री

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तेरहँवा अध्याय

1 पत्र पुष्प फल
3 विष्णु कांता
5 पान पत्र  पुष्प फल
6 पान पत्र पुष्प फल
9 पुष्प  भोजपत्र
10 पान पुष्प गन्ध धूप फल
11 गन्ना
12 पान पुष्प फल  खोपरा बूरा गुड़
13 पान पुष्प फल दूर्वा शमीपत्र
14 पान पुष्प फल नारियल खंड फल
15 पान पुष्प फल
16 भैंसा गुगल काली मिर्च अशोक पुष्प या पत्र
18 पान पुष्प फल दूर्वा कनेर पुष्प शमीपत्र
19 कमलपुष्प अशोक पुष्प या पत्र
20 सरसो गुगल
22 अर्क कपूर
23 पुष्प फल
24 भोजपत्र
25 पुष्प फल पान
26 पुष्प फल पान
28 पुष्प फल पान
29 अर्क कपूर गंध फल पान सुपारी
महआहुति******//////पान शाकल्य लोंग इलायची सुपारी  विल्वफल गुगल कमल गट्टा फल शमीपत्र श्वेतकेसर कपूर पुष्प अर्क पुष्प  नारियल खंड फल
महआहुति///****

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