ज्योतिष समाधान

Monday, 28 March 2022

चैत्र नवरात्र महूर्त विश्लेषण पर्णकुटी गुना

गुड़ी पड़वा में ‘गुड़ी’ शब्द का अर्थ ‘विजय पताका’ और पड़वा का अर्थ प्रतिपदा तिथि से है। साथ ही चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गुड़ी पड़वा पर्व के मौके पर प्रत्येक घर में विजय के प्रतीक स्वरूप गुड़ी सजाई जाती है और लोग हर्ष उल्लास के साथ इसे मनाते हैं। कहा जाता है कि इस दिन अपने घर को सजाने और गुड़ी फहराने से घर में सुख समृद्धि आती है और बुराइयों का नाश होता है। 
इस पर्व पर सूर्य देव की विशेष आराधना भी की जाती है। लोग सूर्य उपासना करके आरोग्य और सुख- समृद्धि की कामना करते हैं।
आपको बात दें कि गुड़ी पड़वा के त्योहार पर लोग पूरन पोली बनाते हैं जो  परिवार के लोग इसे एक साथ बैठकर खाते हैं।
आपको बता दें कि गुड़ी पड़वा पर नीम की पत्तियों को खाने की परंपरा है।
ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्रमास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि संरचना प्रारंभ की। यह भारतीयों की मान्यता है, इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्षारंभ मानते हैं।
महान गणितज्ञ भास्कराचार्य द्वारा इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, मास और वर्ष की गणना कर पंचांग की रचना की गई थी।
इसी कारण हिन्दू पंचांग का आरंभ भी गुड़ी पड़वा से ही होता है। (पंचांग) के ये पांच प्रमुख अंग हैं- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण (तिथि का आधा भाग)। पंचांग के माध्यम से समय के विभिन्न अंगों का अध्ययन और विश्लेषण करके यह जाना जाता है कि किस कार्य को करने के लिए कौन सा दिन सही है।नव-संवत्सरोत्सव में काल (समय) का, उसके विभिन्न अंगों- वर्ष, मास, तिथि, वार, नक्षत्र आदि के साथ पूजन करने का उद्देश्य समय की महत्ता को समझाना है। 

हिन्दुओं में पूरे वर्ष के दौरान साढ़े तीन मुहूर्त बहुत शुभ माने जाते हैं।
ये साढ़े तीन मुहूर्त हैं–
गुड़ी पड़वा,
अक्षय तृतीया,
दशहरा
और दीवाली, दिवाली को आधा मुहूर्त माना जाता है 

राजा शनि

दुर्भिक्ष मरकं रोगान करोति पवनं तथा ।

शनैश्चराब्दो दोषाश्च विग्रहांश्चैव भूभुजम् ।।

शनि के वर्ष में उपद्रव, युद्ध, दंगे, मारकाट का वातावरण तैयार होता है। अनेक देशों में परस्पर तनाव व टकराव होता है। जनहानि व दुर्भिक्ष होते हैं। तूफान से जनधन हानि, कम वर्षा या वर्षा के साथ तेज हवाएं चलती हैं। पेयजल से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है। राजनैतिक मतभेद सामान्य रहता है। न्याय तथा कार्यप्रणाली में सकारात्मक परिवर्तन होगा। मौद्रिक नीति में परिवर्तन होगा। महंगाई बढ़ेगी। उड़द, कोयला, लकड़ी, लोहा, कपड़ा, स्टील महंगे होंगे।

मंत्री बृहस्पति

विविध दान्ययुता खलु मेदिनि प्रचुरतोयधनामुदिता भवेत ।

नृपतयो जन लालन तत्परा: सुरगुरौ खलु मंत्रिपदान्विते ।।

देवगुरु बृहस्पति के मंत्री होने से सभी प्रकार के अनाजों की अच्छी पैदावार, खूब वर्षा, शासन की लोकभाव नीतियों के कारण सर्वत्र प्रसन्नता रहती है। किंतु राजा शनि होने से उपरोक्त फलों में न्यूनता समझनी चाहिए।

 किस दिन घटस्थापना होने से किस बाहन पर आती है
 देवी जी
शशिसुर्ये गजारूढा ,शनिभोमे तुँरगमे ।
गुरू शुक्रो च दोलायाँ- बुधे नौका प्रकीर्तिता ।।

1सोमवार रविवार को हाथी पर
2शनिवार मंगलवार को घोड़े पर
3गुरुवार शुक्रवार को खटोला यानी डोली पर
4 बुधवार को नोका पर

बाहन पर आने का फल
गजे च जलदा देवी , छत्र भँग तुरँगमे ।
नौकायाँ सर्व सिद्धिस्यात दोलायाँ मरणँ धुव्रम ।।

रविवार और सोमवार को आगमन( नवरात्र शुरू होने का दिन) होता है तो वाहन हाथी है 
जो जल की वृष्टि कराने वाला है ,

शनिवार और मँगल वार को आगमन होता है तो राजा और सरकार को पद से हटना पड सकता है ,

गुरूवार और शुक्रवार को आगमन हो तो दोला ( खटोला ) पर आगमन होता है जो जन हानि , 
ताँडव , रक्तपात होना बताता है ,

बुधवार को आगमन हो तो देवी नोका ( नाव ) पर आती है तब भक्तो को सभी सिद्धि देती है ।
इस दिन इंद्र योग, अमृत सिद्धि योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है. गुड़ी पड़वा पर इंद्र योग सुबह 08:31 मिनट तक है. फिर इसके बाद अमृत सिद्धि और सर्वार्थ सिद्धि योग 1 अप्रैल से सुबह 10:40 मिनट से 02 अप्रैल को सुबह 06:10 मिनट तक है.

Saturday, 12 March 2022

होली के टोटके पर्णकुटी गुना 9893946810

1))】गोमती चक्र, कौड़ियाँ और बताशे जलती होली में स्वयं पर से उतार कर डालने से भी जीवन की हर बाधा स्वाहा हो जाती है।

2))होली की रात 12 बजे किसी पीपल वृक्ष के नीचे घी का दीपक जलाने और सात परिक्रमा करने से सारी बाधाएं दूर होती हैं।

3))होलिका दहन की रात तगर, काकझा, केसर को “क्लीं कामदेय फट् स्वाहा” मंत्र से अभिमंत्रित कर होली के दिन इसे अबीर या गुलाल में मिलाकर किसी के सिर पर डालने से वह शीश में हो जाता है।

4))जल्द शादी के लिए होली के दिन सुबह एक पान के पत्ते पर साबूत सुपारी और हल्दी की गांठ के साथ शिवलिंग पर चढ़ाएं और बिना पलटे घर आ जाएं। अगले दिन भी यही प्रयोग करें।

5))होलिका दहन के बाद जलती अग्नि में नारियल झाड़ने से नौकरी की बाधाएं दूर होती हैं।

6))डर और कर्ज से निजात पाने के लिए नरसिंह स्तोत्र का पाठ करना लाभदायक होता है।

7))होलिका दहन की राख को एक डिब्बी में लेकर अपने घर के ईशान कोण पर रख दें।

8))होलिका की राख काले कपड़े में बांधकर अपने घर के मुख्य द्वार पर लटका दें।
9))52 सिक्के, 5 गोमती चक्र, और 5 हल्दी की गांठ ले। इन्हें एक लाल कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। फिर उस पोटली को होलिका के पास ले जाये और उस पोटली को अग्नि की आंच दिखाएं (सेंक दे ) और घर आकर उस पोटली को अपने घर के पूजा स्थान पर रख दे। फिर हाथ पैर धोकर आसन लगाकर श्री सूक्त का पाठ करें। 

10))होलिका दहन की राख को एक डिब्बी में लेकर अपने घर के ईशान कोण पर रख दें।
11))होलिका की राख काले कपड़े में बांधकर अपने घर के मुख्य द्वार पर लटका दें।

12))होलिका दहन की राख अपने घर में लाकर चारों कोनों में रख दे। फिर 24 घंटे के बाद उनको उठाकर घर से बाहर फेंक दें।
13))5 गोमती चक्र, 5 गांठ वाली हल्दी ले। इन्हे लाल कपड़े में बांधकर एक पोटली बना ले। फिर इस पोटली को श्री कृष्ण मंदिर में ले जाकर भगवान श्री कृष्ण के चरणों में रखे।
 भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना करें और फिर उस पोटली को अपने साथ लेकर आए जहां होलिका दहन हो रहा हो। होलिका की 7 बार परिक्रमा करें और मन में शीध्र विवाह की प्रार्थना करते हुए पोटली को होलिका की अग्नि को समर्पित कर दे। इस पूरे प्रयोग को गुप्त रखें।

14))काली हल्दी होली के दिन गुगल के धूप के साथ जलाएं। साथ ही इसे घिस कर तिलक भी लगाएं। ऐसा करने से आपका मान-सम्मान भी बढ़ेगा और लोगों के बीच आपका आकर्षण भी कामय रहेगा।
15))होलिका दहन से पहले जब उसकी पूजा होती है उस समय आप काली हल्दी पर घी और सिंदूर लगा दें और गुगल का धूप दिखा कर उसे चांदी की प्लेट में रखे। इसके बाद एक घी का दीपक जलाएं और मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद लाल कपड़े में चांदी के सिक्के बांध कर उसे तिजोरी में रख दें। ये आपके धन को कभी कम नहीं होने देगा।


16))अगर आपके शत्रु बहुत हैं तो आप काली हल्दी पर सिंदूर और घी का लेप लगा कर होली दहन के समय काले कपड़े में चार कौड़ी और आठ काली गुंजा के साथ बांध लें और इसे गुगल की धूप दिखाएं । इसके बाद इसे घर के मुख्य द्वार की चौखट पर टांग दें लेकिन ऐसे टांगे की ये बाहर से किसी को नजर न आए। ये शत्रु निवारणा का सबसे बड़ा टोटका है।

17))गाय के गोबर में जौ, अरसी, कुश मिलाकर छोटा उपला बना लें। इसे घर के मुख्य दरवाजे पर लटका दें। ऐसा करने से नजर दोष, बुरी शक्तियों, टोने-टोटके से घर और घर में रहने वाले लोग सुरक्षित रहते हैं।

18))होलिका दहन के बाद अगली सुबह यानी धुलैंडी के दिन होलिकाग्नि की राख को माथे पर लगाएं। इसे लगाने का सही तरीका है बायीं ओर से दायीं ओर तीन रेखा खींचें।
इसे त्रिपुण्ड कहते हैं। इसे लगाने से 27 देवता प्रसन्न होते हैं। शस्त्रों में बताया गया है कि पहली रेखा के स्वामी महादेव हैं, दूसरी रेखा के महेश्वर और तीसरी रेखा के शिव।

19))होलिका दहन की रात घर के सभी सदस्यों को सरसों का उबटन बनाकर पूरे शरीर पर मालिश करना चाहिए। इससे जो भी मैल निकले उसे होलिकाग्नि में डाल दें। ऐसा करने से जादू, टोने का असर समाप्त होता है और शरीर स्वस्थ रहता है।होली की राख को घर के चारों ओर और दरवाजे पर छिड़कें। ऐसा करने से घर में नकारात्मक शक्तियों  का प्रवेश नही होता है

20))अगर क‍िसी बच्चे के परीक्षा में उम्मीद के अनुसार नंबर नहीं आ रहे हो या फिर उसका मन पढ़ाई में न लगता हो। तो उस विद्यार्थी को होलिका दहन स्थल पर नारियल, पान तथा सुपारी भेंट करना चाहिए। मान्‍यता है क‍ि ऐसा करने से पढ़ने में मन लगने लगता है। साथ ही मनमुताब‍िक पर‍िणाम भी म‍िलने लगते हैं। 

21))इसके अलावा होली की रात सरसों के तेल का चौमुखी दीपक घर के मुख्य द्वार पर लगाएं और उसकी पूजा करें। इसके बाद भगवान से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। इस प्रयोग से हर प्रकार की बाधा का निवारण होता है।

22))अगर बार-बार क‍िसी परीक्षा में असफल हो रहे हों तो होली की रात को हनुमान चालीसा का पाठ करें। इसके बाद लगातार 40 दिनों तक रोज एकबार हनुमान चालीसा का पाठ करें। मान्‍यता है ऐसा करने से हनुमानजी की कृपा होती है। साथ ही उनकी कृपा से सफलता म‍िलने लगती है। इसके अलावा होलिका दहन के सामने ओम ऐं सरस्वत्यै नमः का जप करें और इसके बाद रोजाना न‍ियम‍ित रूप से इस मंत्र का 3 बार जप करें। कहते हैं क‍ि धीरे-धीरे ये मंत्र अपना फल देने लगता है।

23))अगर लंबे समय से नौकरी नहीं मिल रही है, तो होली की रात बारह बजे से पहले एक दाग रहित बड़ा नींबू लेकर चौराहे पर जाएं और उसकी चार फांक कर चारों कोनों में फेंक दें। ध्यान रहें कि लौटते समय गलती से भी पीछे मुड़कर न देखें जल्द ही नौकरी मिलेगी।

24))अगर आप बिजनेसमैन हैं, तो बिजनेस में लाभ के लिए होली के दिन गुलाल के एक खुले पैकेट में एक मोती शंख और चांदी का एक सिक्का रखकर उसे नए लाल कपड़े में लाल मौली से बांधकर तिजोरी में रख दें। इससे आपका बिजनेस तरक्की के रास्ते पर अग्रसर होगा।

25))अगर आप बिजनेसमैन हैं, तो बिजनेस में लाभ के लिए होली के दिन गुलाल के एक खुले पैकेट में एक मोती शंख और चांदी का एक सिक्का रखकर उसे नए लाल कपड़े में लाल मौली से बांधकर तिजोरी में रख दें। इससे आपका बिजनेस तरक्की के रास्ते पर अग्रसर होगा।

26))होली के दिन एक एकाक्षी नारियल की पूजा करके लाल कपड़े में लपेट कर दुकान में स्थापित करें। साथ ही स्फटिक का शुद्ध श्रीयंत्र भी रखें। अगर आप यह उपाय आस्थापूर्वक करते  हैं, तो लाभ में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होगी।

27))शाम के समय हनुमान जी को केवड़े का इत्र एवं गुलाब की माला अर्पित करें। 

28))होलिका की अग्नि से दुकान या प्रतिष्ठान के आग्नेय कोण में सरसों के तेल का दीपक जलाएं। ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है।

होली के दिन एक एकाक्षी नारियल की पूजा करके लाल कपड़े में लपेट कर दुकान में स्थापित करें। साथ ही स्फटिक का शुद्ध श्रीयंत्र भी रखें। अगर आप यह उपाय  करते हैं, तो लाभ में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होगी।

शाम के समय हनुमान जी को केवड़े का इत्र एवं गुलाब की माला अर्पित करें। होलिका की राख को घर के चारों ओर और दरवाजे पर छिड़कने से घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश नहीं होता है। होलिका की अग्नि से दुकान या प्रतिष्ठान के आग्नेय कोण में सरसों के तेल का दीपक जलाएं। ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है।



Gurudev
Bhubneshwar
Parnkuti
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Thursday, 10 March 2022

होलिका दहन मुहूर्त्त का सूक्ष्म शास्त्रीय विचार पर्णकुटी गुना

 होलिका दहन मुहूर्त्त का सूक्ष्म शास्त्रीय विचार

 शास्त्र का सूक्ष्म विचार दुर्लभ से दुर्लभ होता जा रहा है। उसमें भी शास्त्रवचनों से ऊपर स्वसुविधा की वृत्ति ने व्रत-नियम के प्रति अनास्था उत्पन्न कर दी है।  होलिका दहन फाल्गुन शुक्लपक्ष की भद्रारहित प्रदोषव्यापिनी पूर्णिमा को ग्राह्य है। धर्मशास्त्र के सूक्ष्म विचार से ज्ञात होता है कि इस वर्ष 17 /18 मार्च 2022 में रात्रि 01:12 के पश्चात् ही शुद्धतम होलिका दहन मान्य होगा।


प्रतिपद्भूत भद्रासु या sर्चिताहोलिका दिवा, 
संवत्सरं तद्राष्ट्रं पुरं दहति सा द्रुतम्।
प्रदोष व्यापिनी ग्राह्या पूर्णिमा फाल्गुनी सदा 
तस्यां भद्रा मुखं त्यक्त्वा पूज्या होला निशा मुखे।।

तदनुसार पढ़वाँ, चौदस, 
दोनों दिन होली जलाना
 वर्ष पर्यंत राष्ट्र और जनता को दग्ध करता है।

मन्वादि क्रम से फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा प्रदोषकाल व्यापिनी लें, इस काल मेंभद्रा है तो भद्रा पुच्छ काल या मुख छोड़ कर दहन करें रात्रि की भद्रा का  पूर्वार्द्ध ग्राह्य है। 

अगले दिन पूर्णिमा प्रदोषकाल रहित हो तो प्रवर पक्ष प्रथम पूर्णिमा प्रदोषकाल सर्वमान्य है। 

तिथि मान प्रारंभ से साढ़े उन्नीस से साढ़े वाईस घटी तक भद्रा पुच्छ होगा।

।परिशोधित समयानुसार भद्रा पुच्छ काल मध्यम मान से दस बज कर वारह मिनट तक रहेगा

 अक्षांश भेद उदयास्त मान से समयांतर संभव है। 
अर्द्ध रात्रि से अधिक भद्रा काल है तो या भद्रा मुख साढ़े वाईस से साढ़े सत्ताईस घटी तक का समय मुखका है इस काल में होलिका दहन पूर्णतया निषिद्ध है।

अतः निर्णय सागर पंचाङ्ग, का निर्धारितप्रदोषकाल समय वा भद्रा पुच्छ समर्थित समय यथा साध्य यथामति यथेष्ट शास्त्र मत से सर्वथा ग्रहण करने योग्य है। 


दिनार्धात् परतो या स्यात् फाल्गुनी पूर्णिमा यदि। 
रात्रौ भद्रावसाने तु होलिकां तत्र पूजयेत्॥ –

भविष्योत्तर

अर्थात् यदि पहले दिन प्रदोष के समय भद्रा हो और दूसरे दिन सूर्यास्त से पहले पूर्णिमा समाप्त हो जाए तो भद्रा के समाप्त होने की प्रतीक्षा करके सूर्योदय होने से पहले रात्रि में होलिकादाह करना चाहिए। 

 भविष्योत्तरपुराण के उपरोक्त प्रमाण से स्पष्ट लिखा है कि - 

"यदा तु प्रदोषे पूर्वदिने भद्रा भवति परदिने चास्तात्पूर्वमेव पंचदशी समाप्यते तदा सूर्योदयात्पूर्वं भद्रान्तं प्रतीक्ष्य होलिका दीपनीया।"

 प्राचीन परंपरा यही रही है, देर रात्रि भद्रा उतरने पर 2, 3, 5 बजे होलिकादहन सभी ने देखा है, परन्तु आज मनुष्यों की सुविधा का विचार कर शास्त्र के स्पष्ट तथ्यों व परम्परा को त्यागा जा रहा है व प्रमाणाभास के आधार पर सायं भद्रा के समय ही होलिकादहन करने का मिथ्या निर्णय दिया जा रहा है।

भद्रा में होलिकादहन कथमपि शास्त्रसम्मत नहीं है
 क्योंकि―
भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा। 
श्रावणी नृपति हन्ति ग्रामं दहति फाल्गुनी॥

― निर्णयसिन्धु 

श्रावणी कर्म और फाल्गुनी पूर्णिमा पर होलिकादन भद्रा होने पर नहीं करना चाहिए। भद्रा में श्रावणी करने से राजा की हानि तथा होलिकादहन से ग्राम दहन का भय उत्पन्न होता है।

नन्दायां नरकं घोरं भद्रायां देशनाशनम्। 
दुर्भिक्षं च चतुर्दश्यां करोत्येव हुताशनः॥ 

–विद्याविनोद

प्रतिपदा में होलिकादाह से नरक, भद्रा में होलिकादाह से देशनाश, और चतुर्दशी में करने से दुर्भिक्ष होता है।

प्रतिपद्भूतभद्रासु यार्चिता होलिका दिवा। 
संवत्सरं तु तद्राष्ट्रं पुरं दहति साद्भुतम्॥ 

– चन्द्रप्रकाश

प्रतिपदा, चतुर्दशी, भद्रा और दिन, इनमें होली जलाना सर्वथा त्याज्य है। कुयोगवश यदि जला दी जाए तो वहाँ के राज्य, नगर और मनुष्य अद्भुत उत्पातों से एक ही वर्ष में हीन हो जाते हैं। 

भद्रायां दीपिता होली राष्ट्रभंगं करोति वै। 
― पुराणसमुच्चय
भद्रा में होली दाह से राष्ट्रभंग होता है।

अतः उपर्युक्त प्रचुर प्रमाणों से सिद्ध है कि पूर्णिमाव्यापिनी रात्रिपर्यन्त कभी भी भद्रारहित काल मिलने पर भद्रा में होलिका दाह पूर्णतः शास्त्रविरुद्ध एवं अनिष्टकारी है। 

भद्रा पुच्छकाल में होलिका दहन केवल तब ही होता है जब यदि पहले दिन भद्रारहित प्रदोष न मिले, रात्रिभर भद्रा रहे (सूर्योदय होने से पहले न उतरे) और दूसरे दिन सूर्यास्त से पहले ही पूर्णिमा समाप्त हो जाए, तो ऐसे अवसर में सूर्योदय पूर्व भद्रा के पुच्छकाल में होलिकादीपन कर देना चाहिए। 

पर चूँकि भद्राकाल सूर्योदय पर्यन्त व्याप्त नहीं है 

और 
17/18 की रात्रिशेष 01:12 पर ही समाप्त हो रहा है अतः रात्रि 01:12 से पहले होलिका दहन शास्त्र एवं परम्परा के विरुद्ध होगा। 

 शास्त्र  प्रमाणों की सर्वसम्मति से भद्रा समाप्ति के पश्चात् हो होलिकादहन को शुभ माना है। 

अतः 17 /18 मार्च  2022 को देर रात्रि 01:12 पश्चात् शास्त्रवचन एवं परम्परासिद्ध उत्तम मुहूर्त्त में होलिकादीपन कर उत्तम शुभफल की प्राप्ति करें। 
Gurudev
Bhubneshwar
Parnkuti guna
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Monday, 7 March 2022

शिव ओंकारा

*"ॐ जय शिव ओंकारा"*
यह वह प्रसिद्ध आरती है जो देश भर में शिव-भक्त नियमित गाते हैं..

लेकिन, बहुत कम लोग का ही ध्यान इस तथ्य पर जाता है कि... इस आरती के पदों में ब्रम्हा-विष्णु-महेश तीनो की स्तुति है..

*एकानन* (एकमुखी, विष्णु),  *चतुरानन* (चतुर्मुखी, ब्रम्हा) और *पंचानन* (पंचमुखी, शिव) *राजे..*

*हंसासन* (ब्रम्हा) *गरुड़ासन* (विष्णु ) *वृषवाहन* (शिव) *साजे..*

*दो भुज* (विष्णु), *चार चतुर्भुज* (ब्रम्हा), *दसभुज* (शिव) *अति सोहे..*

*अक्षमाला* (रुद्राक्ष माला, ब्रम्हाजी ), *वनमाला* (विष्णु ) *रुण्डमाला* (शिव) *धारी..*

*चंदन* (ब्रम्हा ), *मृगमद* (कस्तूरी विष्णु ), *चंदा* (शिव) *भाले शुभकारी* (मस्तक पर शोभा पाते हैं)..

*श्वेताम्बर* (सफेदवस्त्र, ब्रम्हा) *पीताम्बर* (पीले वस्त्र, विष्णु) *बाघाम्बर* (बाघ चर्म ,शिव) *अंगे..*

*ब्रम्हादिक* (ब्राह्मण, ब्रह्मा) *सनकादिक* (सनक आदि, विष्णु ) *प्रेतादिक* (शिव ) *संगे* (साथ रहते हैं)..

*कर के मध्य कमंडल* (ब्रम्हा), *चक्र* (विष्णु), *त्रिशूल* (शिव) *धर्ता..*

*जगकर्ता* (ब्रम्हा) *जगहर्ता* (शिव ) *जग पालनकर्ता* (विष्णु)..

*ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका* (अविवेकी लोग इन तीनो को अलग अलग जानते हैं।)
*प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका*

(सृष्टि के निर्माण के मूल ऊँकार नाद में ये तीनो एक रूप रहते है... आगे सृष्टि-निर्माण, सृष्टि-पालन और संहार हेतु त्रिदेव का रूप लेते है
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Wednesday, 23 February 2022

नक्षत्रों से जानें व्यक्ति का स्वभाव

सत्ताइस नक्षत्रों से जानें व्यक्ति का स्वभाव
ज्योतिष शास्त्र में विभिन्न प्रकार के नक्षत्रों का जिक्र किया गया है। ये सभी नक्षत्र जितने महत्वपूर्ण हैं उतने ही वैयक्तिक जीवन पर भी असर डालते हैं। आपको यकीन नहीं होगा लेकिन ये सच है कि जिस नक्षत्र में इंसान जन्म लेता है वह नक्षत्र उसके स्वभाव और आगामी जीवन पर अपना असर जरूर छोड़ता है। आइए जानें भिन्न-भिन्न नक्षत्रों में जन्म लेने वाले लोगों की क्या-क्या खासियत होती है।

अश्विन नक्षत्र
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ज्योतिष शास्त्र में सबसे प्रमुख और सबसे प्रथम अश्विन नक्षत्र को माना गया है। जो व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेता है वह बहुत ऊर्जावान होने के सथ-साथ हमेशा सक्रिय रहना पसंद करता है। इनकी महत्वाकांक्षाएं इन्हें संतुष्ट नहीं होने देतीं। ये लोग रहस्यमयी प्रकृत्ति के इंसान होने के साथ-साथ थोड़े जल्दबाज भी होते हैं जो पहले काम कर लेते हैं और बाद में उस पर विचार करते हैं। ये लोग अच्छे जीवनसाथी और एक आदर्श मित्र साबित होते हैं।

भरणी नक्षत्र
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इस नक्षत्र का स्वामी शुक्र ग्रह होता है, जिसकी वजह से इस नक्षत्र में जन्में लोग आराम पसंद और आलीशान जीवन जीना चाहते हैं। ये लोग काफी आकर्षक और सुंदर होते हैं, इनका स्वभाव लोगों को आकर्षित करता है। इनके जीवन में प्रेम सर्वोपरि होता है और जो भी ये ठान लेते हैं उसे पूरा करने के बाद ही चैन से बैठते हैं। इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान हमेशा बना रहता है।

कृत्तिका नक्षत्र
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इस नक्षत्र में जन्में जातक ना तो पहली नजर में प्यार जैसी चीज पर भरोसा करते हैं और ना ही किसी पर बहुत जल्दी एतबार करते हैं। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति पर सूर्य का प्रभाव रहता है, जिसकी वजह से ये लोग आत्म गौरव करने वाले होते हैं। ये लोग स्वाभिमानी होने के साथ-साथ तुनक मिजाजी और बहुत उत्साहित रहने वाले होते हैं। ये लोग जिस भी काम को अपने हाथ में लेते हैं उसे पूरी लगन और मेहनत के साथ पूरा करते हैं।

रोहिणी नक्षत्र
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रोहिणी नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा होता है और चंद्रमा के प्रभाव की वजह से ये लोग काफी कल्पनाशील और रोमांटिक स्वभाव के होते हैं। ये लोग काफी चंचल स्वभाव के होते हैं और स्थायित्व इन्हें रास नहीं आता। इन लोगों की सबसे बड़ी कमी यह होती है कि ये कभी एक ही मुद्दे या राय पर कायम नहीं रहते। ये लोग स्वभाव से काफी मिलनसार तो होते ही हैं लेकिन साथ-साथ जीवन की सभी सुख-सुविधाओं को पाने की कोशिश भी करते रहते हैं। विपरीत लिंग के लोगों के प्रति इनके भीतर विशेष आकर्षण देखा जा सकता है।

मृगशिरा नक्षत्र
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इस नक्षत्र के जातकों पर मंगल का प्रभाव होने की वजह से ये लोग काफी साहसी और दृढ़ निश्चय वाले होते हैं। ये लोग स्थायी जीवन जीने में विश्वास रखते हैं और हर काम पूरी मेहनत के साथ पूरा करते हैं। इनका व्यक्तित्व काफी आकर्षक होता है और ये हमेशा सचेत रहते हैं। अगर कोई व्यक्ति इनके साथ धोखा करता है तो ये किसी भी कीमत पर उसे सबक सिखाकर ही मानते हैं। ये लोग काफी बुद्धिमान और मानसिक तौर पर मजबूत होते हैं। इन्हें संगीत का शौक होता है और ये सांसारिक सुखों का उपभोग करने वाले होते हैं।

आर्द्रा नक्षत्र
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इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों पर आजीवन बुध और राहु ग्रह का प्रभाव रहता है। राहु का प्रभाव इन्हें राजनीति की ओर लेकर जाता है और इनके प्रति दूसरों में आकर्षण विकसित करता है। ये लोग दूसरों का दिमाग पढ़ लेते हैं इसलिए इन्हें बहुत आसानी से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। दूसरों से काम निकलवाने में माहिर इस नक्षत्र में जन्में लोग अपने निजी स्वार्थ को पूरा करने के लिए नैतिकता को भी छोड़ देते हैं।

पुनर्वसु नक्षत्र
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ऐसा माना जाता है कि इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति के भीतर दैवीय शक्तियां होती हैं। इनका शरीर काफी भारी और याद्दाश्त बहुत मजबूत होती है। ये लोग काफी मिलनसार और प्रेम भावना से ओत-प्रोत होते हैं। आप कह सकते हैं कि जब भी इन पर कोई विपत्ति आती है तो कोई अदृश्य शक्ति इनकी सहायता करने अवश्य आती है। ये लोग काफी धनी भी होते हैं।

पुष्य नक्षत्र
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ज्योतिषशास्त्र के अंतर्गत शनिदेव के प्रभाव वाले पुष्य नक्षत्र को सबसे शुभ माना गया है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग दूसरों की भलाई के लिए सदैव तैयार रहते हैं और इनके भीतर सेवा भावना भी बहुत प्रबल होती है। ये लोग मेहनती होते हैं और अपनी मेहनत के बल पर धीरे-धीरे ही सही तरक्की हासिल कर ही लेते हैं। ये लोग कम उम्र में ही कई कठिनाइयों का सामना कर लेते हैं इसलिए ये जल्दी परिपक्व भी हो जाते हैं। चंचल मन वाले ये लोग विपरीत लिंग के प्रति विशेष आकर्षण भी रखते हैं। इन्हें संयमित और व्यवस्थित जीवन जीना पसंद होता है।

आश्लेषा नक्षत्र
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शास्त्रों के अनुसार यह नक्षत्र विषैला होता है और इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के भीतर भी विष की थोड़ी बहुत मात्रा अवश्य पाई जाती है। आश्लेषा नक्षत्र में जन्में व्यक्ति ईमानदार तो होते हैं किंतु मौका मिलते ही अपने रंग दिखाने से भी बाज नहीं आते। जब तक इन्हें लाभ मिलता है बस तभी तक दोस्ती निभाने वाले ये लोग दूसरों पर बिल्कुल भरोसा नहीं कर पाते। ये लोग कुशल व्यवसायी साबित होते हैं और दूसरों का मन पढ़कर उनसे अपना काम निकलवा सकते हैं। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों को अपने भाइयों का पूरा सहयोग मिलता है।

मघा नक्षत्र
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इस नक्षत्र को गण्डमूल नक्षत्र की श्रेणी में रखा गया है। सूर्य के स्वामित्व के कारण ये लोग काफी ज्यादा प्रभावी बन जाते हैं। इनके भीतर स्वाभिमान की भावना प्रबल होती है और बहुत ही जल्दी इनका दबदबा भी कायम हो जाता है। ये कर्मठ होते हैं और किसी भी काम को जल्दी से जल्दी पूरा करने की कोशिश करते हैं। इनके भीतर ईश्वरीय आस्था बहुत अधिक होती है।

पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र
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इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों में संगीत और कला की विशेष समझ होती है जो बचपन से ही दिखाई देने लगती है। ये लोग नैतिकता और ईमानदारी के रास्ते पर चलकर ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं, शांति पसंद होने की वजह से किसी भी तरह के विवाद या लड़ाई-झगड़े में पड़ना पसंद नहीं करते। इनके पास धन की मात्रा अच्छी खासी होती है जिसकी वजह से ये भौतिक सुखों का आनंद उठाते हैं। ये लोग अहंकारी प्रवृत्ति के होते हैं।

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र
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इस नक्षत्र में जन्में लोग समझदार और बुद्धिमान होते हैं। ये अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भरपूर प्रयास करते हैं। ये लोग निजी क्षेत्र में सफलता हासिल नहीं कर सकते इसलिए इन्हें सरकारी क्षेत्र में ही अपना कॅरियर तलाशना चाहिए। ये लोग एक काम को करने में काफी समय लगा देते हैं। अपने हर संबंध को ये लोग लंबे समय तक निभाते हैं।

हस्त नक्षत्र
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बौद्धिक, मददगार, निर्णय लेने में अक्षम, कुशल व्यवसायिक गुणों वाले ये लोग दूसरों से अपना काम निकालने में माहिर माने जाते हैं। इन्हें हर प्रकार की सुख-सुविधाएं मिलती हैं और इनका जीवन आनंद में बीतता है।

चित्रा नक्षत्र
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इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के स्वभाव में आपको मंगल ग्रह का प्रभाव दिखाई दे सकता है। ये लोग हर किसी के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश करते हैं, इन्हें आप सामाजिक हितों के लिए कार्य करते हुए भी देख सकते हैं। ये लोग विपरीत हालातों से बिल्कुल नहीं घबराते और खुलकर मुसीबतों का सामना करते हैं। परिश्रम और हिम्मत ही इनकी ताकत है।

स्वाति नक्षत्र
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इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक मोती के समान चमकते हैं अर्थात इनका स्वभाव और आचरण स्वच्छ होता है। ऐसा माना जाता है कि इस नक्षत्र में पानी की बूंद सीप पर गिरती है तो वह मोती बन जाती है। तुला राशि में होने की वजह से स्वाति नक्षत्र के जातक सात्विक और तामसिक दोनों ही प्रवृत्ति वाले होते हैं। ये लोग राजनीतिक दांव-पेंचों को अच्छी तरह समझते हैं और अपने प्रतिद्वंदियों पर हमेशा जीत हासिल करते हैं।

विशाखा नक्षत्र
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पठन-पाठन के कार्यों में उत्तम साबित होते हैं स्वाति नक्षत्र में जन्में लोग। ये लोग शारीरिक श्रम तो नहीं कर पाते लेकिन अपनी बुद्धि के प्रयोग से सभी को पराजित करते हैं। ये लोग काफी सामाजिक होते हैं जिसकी वजह से इनका सामाजिक दायरा भी बहुत विस्तृत होता है। ये लोग महत्वाकांक्षी होते हैं और अपनी हर महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए बहुत मेहनत करते हैं।

अनुराधा नक्षत्र
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इस नक्षत्र में जन्में लोग अपने आदर्शों और सिद्धांतों पर जीते हैं। ये लोग अपने गुस्से को नियंत्रित नहीं कर पाते इस कारण इन्हें कई बार बड़े नुकसान उठाने पड़ते हैं। ये लोग अपने दिमाग से ज्यादा दिल से काम लेते हैं और अपनी भावनाओं को छिपाकर नहीं रख पाते। ये लोग जुबान से थोड़े कड़वे होते हैं जिसकी वजह से लोग इन्हें ज्यादा पसंद नहीं करते।

ज्येष्ठा नक्षत्र
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गण्डमूल नक्षत्र की श्रेणी में होने की वजह से यह भी अशुभ नक्षत्र ही माना जाता है। ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग तुनक मिजाजी होते है और छोटी-छोटी बातों पर लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। खुली मानसिकता वाले ये लोग सीमाओं में बंधकर अपना जीवन नहीं जी पाते।

मूल नक्षत्र
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यह नक्षत्र गण्डमूल नक्षत्र की श्रेणी का सबसे अशुभ नक्षत्र माना गया है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के परिवार को भी इसके दोष का सामना करना पड़ता है। लेकिन इनमें कई विशेषताएं भी होती हैं जैसे कि इनका बुद्धिमान होना, इनकी वफादारी, सामाजिक रूप से जिम्मेदार, आदि। इन्हें आप विद्वानों की श्रेणी में रख सकते हैं।

पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र
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ईमानदार, प्रसन्न, खुशमिजाज, कला, सहित्य और अभिनय प्रेमी, बेहतरीन दोस्त और आदर्श जीवनसाथी, ये सभी पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में जन्में लोगों के खासियत होती है।

उत्तराषाढ़ा नक्षत्र
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ये लोग काफी आशावादी और खुशमिजाज स्वभाव के होते हैं। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले लोग नौकरी और व्यवसाय दोनों ही में सफलता प्राप्त करते हैं। ये पूरी भावना के साथ अपने मित्रों का साथ देते हैं और इसी स्वभाव के कारण इन्हें अपने मित्रों से परस्पर सहयोग और सहायता इन्हें मिलती रहती है। ये लोग काफी धनी भी होते हैं।

श्रवण नक्षत्र
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ज्योतिषशास्त्र के अनुसार माता-पिता के लिए अपना सर्वस्व त्यागने वाले श्रवण कुमार के नाम पर ही इस नक्षत्र का नाम पड़ा है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों में कई विशेषताएं होती हैं जैसे कि इनका ईमानदार होना, इनकी समझदारी, कर्तव्यपरायणता आदि। ये लोग जिस भी कार्य में हाथ डालते हैं उसमें सफलता हासिल करते हैं। ये लोग कभी अनावश्यक खर्च नहीं करते, जिसकी वजह से लोग इन्हें कंजूस भी समझ बैठते हैं।

घनिष्ठा नक्षत्र
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग काफी उर्जावान होते हैं और उन्हें खाली बैठना बिल्कुल पसंद नहीं होता। ये लोग अपनी मेहनत और लगन के बल पर अपनी मंजिल हासिल कर ही लेते हैं। इन्हें दूसरों को अपने नियंत्रण में रखना अच्छा लगता है और ये अधिकार भावना भी रखते हैं। इन्हें शांतिपूर्ण तरीके से अपना जीवन जीना पसंद है।

शतभिषा नक्षत्र
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ये लोग शारीरिक श्रम में बिल्कुल विश्वास नहीं करते हैं और हर समय अपनी बुद्धि का परिचय देते हैं। इस नक्षत्र में जन्में लोग स्वच्छंद विचारधारा के होते है अत: साझेदारी की अपेक्षा स्वतंत्र रूप से कार्य करना पसंद करते हैं। ये लोग उन्मुक्त विचारधारा के होते हैं और मशीनी तौर पर जीना इन्हें कतई बरदाश्त नहीं होता। ये अपने शत्रुओं पर हमेशा हावी रहते हैं।

पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र
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गुरु ग्रह के स्वामित्व वाले इस नक्षत्र में जन्में जातक सत्य और नैतिक नियमों का पालन करने वाले होते हैं। दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहने वाले ये लोग बहुत अधिक व्यवहार कुशल और मिलनसार कहे जा सकते हैं। ये लोग आध्यात्मिक प्रवृत्ति के तो होते ही हैं साथ ही साथ ज्योतिष के भी अच्छे जानकार कहे जाते हैं।

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र
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इस नक्षत्र में जन्में लोग हवाई किलों या कल्पना की दुनिया में विश्वास नहीं करते। ये लोग बेहद यथार्थवादी और हकीकत को समझने वाले होते हैं। व्यापार हो या नौकरी, इनका परिश्रम इन्हें हर जगह सफलता दिलवाता है। इनके भीतर त्याग भावना भी बहुत ज्यादा होती है।

रेवती नक्षत्र
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रेवती नक्षत्र में जन्में जातक बहुत ईमानदार होते है और इस कारण ये किसी भी रूप में धोखा नहीं दे सकते। परंपराओं और मान्यताओं को लेकर ये लोग काफी रूढ़िवादी होने के बावजूद अपने व्यवहार में लचीलापन रखते हैं। इनकी शिक्षा का स्तर काफी ऊंचा होता है और अपनी सूझबूझ से ये बहुत सी मुश्किलों को हल कर लेते हैं।
 
Gurudev
Bhubneshwar
Parnkuti 
9893946810

Tuesday, 22 February 2022

श्राप और उनके पीछे की कथा,,,,,

पौराणिक काल के 24 चर्चित श्राप और उनके पीछे की कथा,,,,, 

हिन्दू पौराणिक ग्रंथो में अनेको अनेक श्रापों का वर्णन मिलता है। हर श्राप के पीछे कोई न कोई कहानी जरूर मिलती है। आज हम आपको हिन्दू धर्म ग्रंथो में उल्लेखित 24 ऐसे ही प्रसिद्ध श्राप और उनके पीछे की कथा बताएँगे।

1. युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप : - महाभारत के शांति पर्व के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद जब कुंती ने युधिष्ठिर को बताया कि कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था तो पांडवों को बहुत दुख हुआ। तब युधिष्ठिर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का भी अंतिम संस्कार किया। माता कुंती ने जब पांडवों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताया तो शोक में आकर युधिष्ठिर ने संपूर्ण स्त्री जाति को श्राप दिया कि – आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपा कर नहीं रख सकेगी।

2. ऋषि किंदम का राजा पांडु को श्राप: - महाभारत के अनुसार एक बार राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए। उन्होंने वहां हिरण के जोड़े को मैथुन करते देखा और उन पर बाण चला दिया। वास्तव में वो हिरण व हिरणी ऋषि किंदम व उनकी पत्नी थी। तब ऋषि किंदम ने राजा पांडु को श्राप दिया कि जब भी आप किसी स्त्री से मिलन करेंगे। उसी समय आपकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के चलते जब राजा पांडु अपनी पत्नी माद्री के साथ मिलन कर रहे थे, उसी समय उनकी मृत्यु हो गई।

3. माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप: - 
महाभारत के अनुसार माण्डव्य नाम के एक ऋषि थे। राजा ने भूलवश उन्हें चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया।

तब ऋषि यमराज के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप 12 वर्ष के थे, तब आपने एक फतींगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा।
तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि 12 वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण यमराज ने महात्मा विदुर के रूप में जन्म लिया।

4. नंदी का रावण को श्राप: - वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

5. कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप : -  महाभारत के अनुसार ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियां थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूंछ काली है।

कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूंछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमजेय के सर्प यज्ञ में भस्म हो जाओगे।

6. उर्वशी का अर्जुन को श्राप : - महाभारत के युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए, तो वहां उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। यह देख अर्जुन ने उन्हें अपनी माता के समान बताया। यह सुनकर क्रोधित उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया कि तुम नपुंसक की भांति बात कर रहे हो। इसलिए तुम नपुंसक हो जाओगे, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। यह बात जब अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो उन्होंने कहा कि अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा।

7. तुलसी का भगवान विष्णु को श्राप : - 
शिवपुराण के अनुसार शंखचूड़ नाम का एक राक्षस था। उसकी पत्नी का नाम तुलसी था। तुलसी पतिव्रता थी, जिसके कारण देवता भी शंखचूड़ का वध करने में असमर्थ थे। देवताओं के उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी का शील भंग कर दिया। तब भगवान शंकर ने शंखचूड़ का वध कर दिया। यह बात जब तुलसी को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दिया। इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु की पूजा शालीग्राम शिला के रूप में की जाती है।

8. श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप : - 
पाण्डवों के स्वर्गारोहण के बाद अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने शासन किया। उसके राज्य में सभी सुखी और संपन्न थे। एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए। तब उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए, जो मौन अवस्था में थे। राजा परीक्षित ने उनसे बात करनी चाहिए, लेकिन ध्यान में होने के कारण ऋषि ने कोई जबाव नहीं दिया।
ये देखकर परीक्षित बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने एक मरा हुआ सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। यह बात जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने श्राप दिया कि आज से सात दिन बात तक्षक नाग राजा परीक्षित को डंस लेगा, जिससे उनकी मृत्यु हो जाएगी।

9. राजा अनरण्य का रावण को श्राप : - 
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुई। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई। मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा। इन्हीं के वंश में आगे जाकर भगवान श्रीराम ने जन्म लिया और रावण का वध किया।

10. परशुराम का कर्ण को श्राप : - महाभारत के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के ही अंशावतार थे। सूर्यपुत्र कर्ण उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम को अपना परिचय एक सूतपुत्र के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे, उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए, ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया।

नींद से उठने पर जब परशुराम ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण सूतपुत्र नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे।

11. तपस्विनी का रावण को श्राप: -  वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था। तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, जो भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी।

12. गांधारी का श्रीकृष्ण को श्राप : - महाभारत के युद्ध के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण गांधारी को सांत्वना देने पहुंचे तो अपने पुत्रों का विनाश देखकर गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार पांडव और कौरव आपसी फूट के कारण नष्ट हुए हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने बंधु-बांधवों का वध करोगे। आज से छत्तीसवें वर्ष तुम अपने बंधु-बांधवों व पुत्रों का नाश हो जाने पर एक साधारण कारण से अनाथ की तरह मारे जाओगे। गांधारी के श्राप के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण के परिवार का अंत हुआ।

13. महर्षि वशिष्ठ का वसुओं को श्राप: - 
महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह पूर्व जन्म में अष्ट वसुओं में से एक थे। एक बार इन अष्ट वसुओं ने ऋषि वशिष्ठ की गाय का बलपूर्वक अपहरण कर लिया। जब ऋषि को इस बात का पता चला तो उन्होंने अष्ट वसुओं को श्राप दिया कि तुम आठों वसुओं को मृत्यु लोक में मानव रूप में जन्म लेना होगा और आठवें वसु को राज, स्त्री आदि सुखों की प्राप्ति नहीं होगी। यही आठवें वसु भीष्म पितामह थे।

14. शूर्पणखा का रावण को श्राप: - वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।

15. ऋषियों का साम्ब को श्राप : - महाभारत के मौसल पर्व के अनुसार एक बार महर्षि विश्वामित्र, कण्व आदि ऋषि द्वारका गए। तब उन ऋषियों का परिहास करने के उद्देश्य से सारण आदि वीर कृष्ण पुत्र साम्ब को स्त्री वेष में उनके पास ले गए और पूछा कि इस स्त्री के गर्भ से क्या उत्पन्न होगा। क्रोधित होकर ऋषियों ने श्राप दिया कि श्रीकृष्ण का ये पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए लोहे का एक भयंकर मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा समस्त यादव कुल का नाश हो जाएगा।

16. दक्ष का चंद्रमा को श्राप : -  शिवपुराण के अनुसार प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से करवाया था। उन सभी पत्नियों में रोहिणी नाम की पत्नी चंद्रमा को सबसे अधिक प्रिय थी। यह बात अन्य पत्नियों को अच्छी नहीं लगती थी। ये बात उन्होंने अपने पिता दक्ष को बताई तो वे बहुत क्रोधित हुए और चंद्रमा को सभी के प्रति समान भाव रखने को कहा, लेकिन चंद्रमा नहीं माने। तब क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया।

17. माया का रावण को श्राप : -  रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहां रावण ने माया को अपनी बातों में फंसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया।

इस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासना युक्त होकर मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया। इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।

18. शुक्राचार्य का राजा ययाति को श्राप : - 
महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार राजा ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ था। देवयानी की शर्मिष्ठा नाम की एक दासी थी। एक बार जब ययाति और देवयानी बगीचे में घूम रहे थे, तब उसे पता चला कि शर्मिष्ठा के पुत्रों के पिता भी राजा ययाति ही हैं, तो वह क्रोधित होकर अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली गई और उन्हें पूरी बात बता दी। तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने ययाति को बूढ़े होने का श्राप दे दिया था।

19. ब्राह्मण दंपत्ति का राजा दशरथ को श्राप : - वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार जब राजा दशरथ शिकार करने वन में गए तो गलती से उन्होंने एक ब्राह्मण पुत्र का वध कर दिया। उस ब्राह्मण पुत्र के माता-पिता अंधे थे। जब उन्हें अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया कि जिस प्रकार हम पुत्र वियोग में अपने प्राणों का त्याग कर रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग के कारण ही होगी।

20. नंदी का ब्राह्मण कुल को श्राप : - 
शिवपुराण के अनुसार एक बार जब सभी ऋषिगण, देवता, प्रजापति, महात्मा आदि प्रयाग में एकत्रित हुए तब वहां दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर का तिरस्कार किया। यह देखकर बहुत से ऋषियों ने भी दक्ष का साथ दिया। तब नंदी ने श्राप दिया कि दुष्ट ब्राह्मण स्वर्ग को ही सबसे श्रेष्ठ मानेंगे तथा क्रोध, मोह, लोभ से युक्त हो निर्लज्ज ब्राह्मण बने रहेंगे। शूद्रों का यज्ञ करवाने वाले व दरिद्र होंगे।

21. नलकुबेर का रावण को श्राप : - वाल्मीकि रामायण के अनुसार विश्व विजय करने के लिए जब रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो उसे वहां रंभा नाम की अप्सरा दिखाई दी। अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह से स्पर्श न करें, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के लिए आरक्षित हूं। इसलिए मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूं।

लेकिन रावण ने उसकी बात नहीं मानी और रंभा से दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसको स्पर्श करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बंट जाएगा।

22. श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप : - 
महाभारत युद्ध के अंत समय में जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया, तब पाण्डव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम तक पहुंच गए। तब अश्वत्थामा ने पाण्डवों पर ब्रह्मास्त्र का वार किया। ये देख अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा।

महर्षि व्यास ने दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा और अर्जुन से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ये विद्या नहीं जानता था। इसलिए उसने अपने अस्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी।
यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि तुम तीन हजार वर्ष तक इस पृथ्वी पर भटकते रहोगे और किसी भी जगह, किसी पुरुष के साथ तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी। तुम्हारे शरीर से पीब और लहू की गंध निकलेगी। इसलिए तुम मनुष्यों के बीच नहीं रह सकोगे। दुर्गम वन में ही पड़े रहोगे।

23. तुलसी का श्रीगणेश को श्राप :- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार तुलसीदेवी गंगा तट से गुजर रही थीं, उस समय वहां श्रीगणेश तप कर रहे थे। श्रीगणेश को देखकर तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी ने श्रीगणेश से कहा कि आप मेरे स्वामी हो जाइए, लेकिन श्रीगणेश ने तुलसी से विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोधवश तुलसी ने श्रीगणेश को विवाह करने का श्राप दे दिया और श्रीगणेश ने तुलसी को वृक्ष बनने का।

24. नारद का भगवान विष्णु को श्राप : - 
शिवपुराण के अनुसार एक बार देवऋषि नारद एक युवती पर मोहित हो गए। उस कन्या के स्वयंवर में वे भगवान विष्णु के रूप में पहुंचे, लेकिन भगवान की माया से उनका मुंह वानर के समान हो गया। भगवान विष्णु भी स्वयंवर में पहुंचे। उन्हें देखकर उस युवती ने भगवान का वरण कर लिया। यह देखकर नारद मुनि बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि जिस प्रकार तुमने मुझे स्त्री के लिए व्याकुल किया है। उसी प्रकार तुम भी स्त्री विरह का दु:ख भोगोगे। भगवान विष्णु ने राम अवतार में नारद मुनि के इस श्राप को पूरा किया
Gurudevbhubneshwar
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Tuesday, 15 February 2022

शिव रात्रि कब है शास्त्रीय निर्णय पर्णकुटी गुना 9893946810

शिव रात्रि: 

शिव पुराण-विद्येश्वरसंहिता खंड-10 में

 भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के प्रश्न के उत्तर में भगवान महेश्वर के आदेश विद्यमान हैं कि

 ‘‘मेरे दर्शन-पूजन के लिये चतुर्दशी तिथि निशीथ व्यापिनी अथवा प्रदोष व्यापिनी (अर्द्धरात्रि व्यापिनी अथवा संध्याकाल व्यापिनी) लेनी चाहिये; 

क्योंकि परवर्तिनी तिथि से संयुक्त चतुर्दशी की ही प्रशंसा की जाती है।’’

 ‘‘निशीथसंयुता या तु कृष्णपक्षे च चतुर्दशी।

 उपोष्या सा तिथिः सर्वेः शिवसायुज्यकारिका।।’’ 

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-स्कन्दपुराण- 

माहेश्वरखंड-केदारखंड-33/92 

‘‘कृष्ण पक्ष में चतुर्दशी अर्धरात्रि व्यापिनी हो,

 उसमें सबको उपवास करना चाहिये। 

वह भगवान् शिव का सायुज्य प्रदान करने वाली है।


’’ स्कंद पुराण- नागर खंड-उत्तरार्द्ध-221 में पृष्ठांकित है 

 ‘‘माघ मास के कृष्ण पक्ष में जो चतुर्दशी तिथि आती है, उसकी रात्रि ही शिव रात्रि है।’’ यहां अमावास्यान्त मास की दृष्टि से माघ मास कहा गया है।

 जहां कृष्ण पक्ष में मास का आरंभ और पूर्णिमा पर उसकी समाप्ति होती है, उसके अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी में यह शिवरात्रि का व्रत होता है। 

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ईशान संहिता में स्पष्ट वर्णित है कि ‘‘

फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्याम् आदि देवो महानिशि।

शिवलिंगतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः।।

तत्कालव्यापिनी ग्राहृा शिवरात्रिव्रते तिथिः।।’

फाल्गुनकृष्ण चतुर्दशी की मध्यरात्रि में आदिदेव भगवान शिव लिंग रूप में अमितप्रभा के साथ उद्- भूूूत हुए अतः अर्धरात्रि से युक्त चतुर्दशी ही शिवरात्रि व्रत में ग्राहृा है।

निर्णय सिंधु में उद्धृत नारद संहिता और ईशान संहिता का उदाहरण भी यही समझना चाहिए। 

लिंगपुराण में भगवान् शिव का स्पष्ट कथन है कि

 फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावधान होकर कृत्तिवासेश्वर लिंग में जो महादेव की पूजा करते हैं; उनको मैं सदैव मुक्त और रोगरहित परमस्थान देता हूं। 

निष्कर्ष यह है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अर्द्धरात्रिव्यापिनी चतुर्दशी ही मान्य है।

#शिवरात्रि का अर्थ क्या है  ?

'शिवस्य प्रिया रात्रियस्मिन व्रते अंगत्वेन विहिता तदव्रतं शिवरात्र्‌याख्याम्‌।'

इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है, 

वह रात्रि जो आनंद प्रदायिनी है 

और जिसका शिव के साथ विशेष संबंध है।

 शिवरात्रि, जो फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को है, 

उसमें शिव पूजा, उपवास और रात्रि जागरण का प्रावधान है। 

इस महारात्रि को शिव की पूजा करना सचमुच एक महाव्रत है

रात्रि जागरण महाशिवरात्रि व्रत में विशेष फलदायी है।


गीता में इसे स्पष्ट 

या निशा सर्वभूतानां तस्या जागर्ति संयमी।

यस्यां जागृति भूतानि सा निशा पश्चतो सुनेः॥

- तात्पर्य यह कि विषयासक्त सांसारिक लोगों की जो रात्रि है, 

उसमें संयमी लोग ही जागृत अवस्था में रहते है

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शिवरात्रि में चार प्रहरों में चार बार अलग-अलग विधि से पूजा का प्रावधान है

। महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में

शिवपुराण के अनुसार व्रत करने वाले को महाशिवरात्रि के दिन प्रात:काल उठकर स्नान व नित्यकर्म से निवृत्त होकर ललाट पर भस्मका त्रिपुण्ड तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला धारण कर शिवालय में जाना चाहिए और शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन एवं भगवान शिव को प्रणाम करना चाहिए। तत्पश्चात उसे श्रद्धापूर्वक महाशिवरात्रि व्रत का संकल्प करना चाहिए।


महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में 
संकल्प करके 
दूध से स्नान 
व 
ॐ ओम हीं ईशानाय नम: का जाप करना चाहिए। 

 भगवान शिव की ईशान मूर्ति को दुग्ध द्वारा स्नान कराएं, 

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दूसरे प्रहर में 

द्वितीय प्रहर में 
दधि स्नान करके 
ॐ ओम हीं अधोराय नम: 
का जाप 

उनकी अघोर मूर्ति को दही से स्नान करवाएं 

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और तीसरे प्रहर में घी से स्नान कराएं 


तृतीय प्रहर में
 घृत स्नान 
एवं 
मंत्र ॐ ओम हीं वामदेवाय नम: तथा 

व चौथे प्रहर में 

चतुर्थ प्रहर में 

मधु स्नान 

एवं

 ॐ ओम हीं सद्योजाताय नम:

 मंत्र का जाप करना चाहिए

उनकी सद्योजात मूर्ति को 

मधु द्वारा स्नान करवाएं। 

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इससे भगवान आशुतोष अतिप्रसन्न होते हैं।

प्रातःकाल विसर्जन और व्रत की महिमा का श्रवण कर अमावस्या को निम्न प्रार्थना कर पारण करें -

संसार क्लेश दग्धस्य व्रतेनानेन शंक

प्रसीद समुखोनाथ, ज्ञान दृष्टि प्रदोभव॥

- तात्पर्य यह कि भगवान शंकर!

 मैं हर रोज संसार की यातना से, दुखों से दग्ध हो रहा हूं। 

इस व्रत से आप मुझ पर प्रसन्न हों और प्रभु संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।

'ॐ नमः शिवाय' कहिए और देवादिदेव प्रसन्न होकर सब मनोरथ पूर्ण करेंगे। 

शिवरात्रि के दिन शिव को ताम्रफल (बादाम), 

कमल पुष्प, अफीम बीज और धतूरे का पुष्प चढ़ाना चाहिए 

एवं अभिषेक कर बिल्व पत्र चढ़ाना चाहिए।

      Gurudev

Bhubneshwar

Parnkuti guna

9893946810