नवरात्र की पूजा में सबसे महत्वपूर्ण कलश स्थापना को माना जाता है। शास्त्रों में कलश स्थापित करने को गणेशजी का स्वरूप माना गया है। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना इसलिए की जाती है ताकि गणेशजी की कृपा से नवरात्र के 9 दिन बिना किसी विघ्न बाधा के पूजा के कार्य संपन्न हो सकें। कलश भगवान गणेश का स्वरूप है जिसमें सभी तीर्थ, समुद्र, पवित्र नदियों, वरुण सहित अनेक देवताओं का वास होता है। वैदिक परंपरा के अनुसार कलश स्थापना के लिए आवश्यक सामग्री में 7 प्रकार के अनाजों भी शामिल किया गया है। इसे सप्त धान्य भी कहा जाता है। इन 7 प्रकार के अनाज का संबंध 7 ग्रहों से माना जाता है। कलश स्थापना में इसका प्रयोग करके सभी ग्रहों की शांति का आह्वान किया जाता है। आइए जानते हैं कौन से हैं ये 7 प्रकार के अनाज…
2/8पहला अनाज जौ
">

नवरात्र की पूजा में जौ का सबसे अधिक महत्व माना जाता है। जौ का संबंध बृहस्पति ग्रह से माना गया है। जौ के प्रयोग से आपका गुरु बलवान होता है और आपके गुरु के बलवान होने से करियर, रुपये-पैसे और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
3/8दूसरा अनाज सफेद तिल
">

कलश स्थापना के लिए प्रयोग होने वाले 7 अनाज में से सफेद तिल भी एक है। सफेद तिल को शुक्र से जोड़कर देखा जाता है। शुक्र के मजबूत होने से आपके भौतिक सुखों में वृद्धि के साथ दांपत्य जीवन में भी मधुरता बनी रहती है।
4/8तीसरा अनाज धान
">

कलश स्थापना के लिए प्रयोग होने वाले 7 अनाज में धान तीसरे स्थान पर है। धान का संबंध चंद्रमा से माना जाता है। हवन आदि पूजा में धान का प्रयोग करने से आपका चंद्रमा मजबूत होता है। चंद्रमा के मजबूत होने से व्यक्ति सर्दी, जुकाम के साथ अन्य मौसम जनित बीमारियों से दूर रहता है। वहीं चंद्रमा अपने स्वभाव के अनुरूप व्यक्ति के क्रोध को कम करता है।
5/8चौथा अनाज मूंग
">

मूंग का संबंध बुध ग्रह से माना जाता है। बुध के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को रूप, गुण, बुद्धि और सौंदर्य की प्राप्ति होती है। कलश स्थापना में मूंग को शामिल करना जरूरी माना जाता है।
6/8पांचवां अनाज मसूर
">

कलश स्थापना के लिए पांचवें अनाज के रूप में मसूर का प्रयोग किया जाता है। मसूर का संबंध उग्र ग्रह माने जाने वाले मंगल से होता है। मसूर को पूजा में शामिल करने से मंगल के दुष्प्रभाव आपके ऊपर नहीं रहते हैं।
7/8छठवां अनाज काले चने
">

कलश स्थापना के लिए छठवें अनाज के रूप में काले चने का प्रयोग किया जाता है। काले चने का संबंध शनि ग्रह से होता है। शनि ग्रह को कर्मों का देवता माना जाता है। शनिदेव अच्छे कर्मों का फल देने के साथ ही बुरे कर्मों की सजा भी देते हैं। पूजा में चने का प्रयोग करने से आप शनि की दशा से दूर रहते हैं।
8/8सातवां अनाज गेहूं
">
कलश स्थापना के लिए सातवें अनाज के रूप में गेहूं का प्रयोग किया जाता है। गेहूं का संबंध सूर्य ग्रह से माना जाता है। पूजा में गेहूं का प्रयोग करने से आपका सूर्य ग्रह मजबूत होता है। सूर्य के मजबूत होने से आपको निरोगी काया के साथ ही दीर्घायु की भी प्राप्ति होती है।
ज्योतिष समाधान
Saturday, 17 October 2020
घट स्थापना मे सप्त धान्य से ग्रह शान्ती
Friday, 16 October 2020
दुर्गा पूजन सामग्री
नवरात्रि पूजन हवन सामग्री सहित
(पूजन समग्री कम और ज्यादा कर सकते है )
सम्पर्क सूत्र
gurudev : bhubneshwar
कस्तूरवानागर पर्णकुटी गुना
9893946810
(पूजन समग्री कम और ज्यादा कर सकते है ) इस सामान की मात्रा केवल अनुष्ठान के लिए अगर छोटा कार्यक्रम है तो सामान कम कर सकते है
कलश स्थापना और पूजा का समय भारतीय शास्त्रानुसार
नवरात्रि पूजन तथा कलशस्थापना
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के पश्चात १० घड़ी तक
अथवा अभिजीत मुहूर्त में करना चाहिए।
निर्णयसिन्धु के अनुसार
— सम्पूर्णप्रतिपद्येव चित्रायुक्तायदा भवेत। वैधृत्यावापियुक्तास्यात्तदामध्यदिनेरावौ।।
अभिजितमुहुर्त्त यत्तत्र स्थापनमिष्यते।
अर्थात अभिजीत मुहूर्त में ही कलश स्थापना करना चाहिए।
भारतीय ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार नवरात्रि पूजन द्विस्वभाव लग्न में करना श्रेष्ठ होता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार
मिथुन,
कन्या,
धनु
तथा कुम्भ राशि द्विस्वभाव राशि है।
अतः हमें इसी लग्न में पूजा प्रारम्भ करनी चाहिए।
===============================
1हल्दीः--------------------------50 ग्राम
२】कलावा(आंटी)-------------100 ग्राम
३】अगरबत्ती------------------- 3पैकिट
४】कपूर------------------------- 50 ग्राम ५】केसर------------------------- 1डिव्वि ६】चंदन पेस्ट ------------------ 50 ग्राम ७】यज्ञोपवीत ----------------- 11नग्
८】चावल------------------------ 15 किलो ९】अबीर-------------------------50 ग्राम १०】गुलाल, -----------------10 0ग्राम ११】अभ्रक-------------------
१२】सिंदूर --------------------100 ग्राम १३】रोली, --------------------100ग्राम १४】सुपारी, ( बड़ी)-------- 200 ग्राम
१५】नारियल ----------------- 15नग्
१६】सरसो----------------------50 ग्राम १७】पंच मेवा------------------500 ग्राम १८】शहद (मधु)--------------- 50 ग्राम १९】शकर-----------------------0 1किलो २०】घृत (शुद्ध घी)------------ 01किलो २१】इलायची (छोटी)-----------10ग्राम
२२】लौंग मौली-------------------10ग्राम २३】इत्र की शीशी----------------1 नग्
२४】रंग लाल----------------------10ग्राम २५】रंग काला --------------------10ग्राम २६】रंग हरा -----------------------10ग्राम २७】रंग पिला ---------------------10ग्राम २८】चंदन मूठा--------------------1 नग् २९】धुप बत्ती ---------------------2 पैकिट ============================= अगर दासविधि स्नान करना हो तो ये मिट्टी लाना है
३०】सप्तमृत्तिका
1】 हाथी के स्थान की मिट्टि-----------50ग्राम २】घोड़ा बांदने के स्थान की मिटटी--50ग्राम ३】बॉबी की मिटटी---------------------50ग्राम
४】दीमक की मिटटी-------------------50ग्राम ५】नदी संगम की मिटटी---------------50ग्राम ६】तालाब कीमिटटी-------------------50ग्रा ७】गौ शाला की मिटटी-----------------50ग्राम राज द्वार की मिटटी-----------------------50ग्राम दुर्गा प्रतिमाके लिए गंगा माटी ओर सोना गाची की मिट्टी ============================ अगर दासविधि स्नानं करना हो तो लआना है ३१】पंचगव्य
१】 गाय का गोबर -----------------50 ग्राम २】गौ मूत्र-----------------------------50ग्राम ३】गौ घृत------------------------------50ग्राम
4】गाय दूध----------------------------50ग्राम
५】गाय का दही ---------------------50ग्राम ============================= ३२】सप्त धान्य-कुलबजन--------100ग्राम
१】 जौ-----------
२】गेहूँ-
३】चावल-
४】तिल-
५】काँगनी-
६】उड़द-
७】मूँग ============================= ३३】कुशा
३४】दूर्वा
35】पुष्प कई प्रकार के
३६】गंगाजल
३७】ऋतुफल पांच प्रकार के -----1 किलो 38】पंच पल्लव
१】बड़,
२】 गूलर,
३】पीपल,
४】आम
५】पाकर के पत्ते) =============================
३९】बिल्वपत्र
४०】शमीपत्र
४१】सर्वऔषधि
४२】अर्पित करने हेतु पुरुष बस्त्र
४३】मता जी को अर्पित करने हेतु सौ भाग्यवस्त्र सौभाग्य सामग्री सहित भैरव के लिए किसी बालक को सुंदर बस्त्र एक 9 बर्ष की कन्या के लिए बस्त्र
44】जल कलश तांबे पीतल सहित7 पूजन थाली कटोरी लोटा सहित कलश मिट्टी के 5 ४५】 बस्त्र
१】सफेद कपड़ा दोमीटर)
२】लाल कपड़ा (2मीटर)
३】काला कपड़ा 2मीटर)
४】हरा कपड़ा 2मीटर) 0) पीला कपड़ा 2 मीटर ४६】पंच रत्न (सामर्थ्य अनुसार) सिक्का चाँदी का सप्तघृत मातृका के लिए
४७】दीपक
४८】तुलसी दल
♦️प्रथम दिन :
🌹नवरात्रि के पहले दिन शनिवार को माता शैलपुत्री का होगा। इस दिन गाय के दुध से बने हुए व्यंजनों का भोग लगेगा। माता की पूजा करने से मंगल ग्रह की शांति होगी।
♦️द्वितीया तिथि :
🌹रविवार को मां ब्रह्माचारिणी की अराधना होगी। इस दिन माता को शक्कर का भोग लगेगा। इस दिन माता की अराधना करने से गुरु ग्रह की शांति होगी।
♦️तृतीया तिथि :
🌹सोमवार को मां चंद्रघंटा की अराधना होगी। इस दिन माता को घी का भोग लगेगा। इस दिन माता पूजा करने से बुध ग्रह की शांति होगी।
♦️चतुर्थी तिथि :
🌹मंगलवार को मां कुष्मांडा का दिन है। इस दिन माता को मालपुआ का भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से शनि ग्रह की शांति होगी।
♦️पंचमी तिथि :
🌹बुधवार को मां स्कंदमाता का दिन है। इस दिन माता को केला भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से राहु ग्रह की शांति होगी।
♦️षष्ठी तिथि :
🌹गुरुवार को मां कात्यायनी का दिन है। इस दिन माता को शहद का भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से केतु ग्रह की शांति होगी।
♦️सप्तमी तिथि :
🌹शुक्रवार को मां कालरात्रि का दिन है। इस दिन माता को गुड़ का भोग लगाया जाएगा। इस दिन पूजा करने से शुक्र ग्रह की शांति होगी।
♦️अष्टमी तिथि :
🌹शनिवार को मां महागौरी का दिन है। इस दिन माता को नारियल का भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से सूर्य ग्रह की शांति होगी।
♦️नवमीं तिथि :
🌹रविवार को इस दिन सिद्धिदात्री का दिन होगा। इस दिन माता को धान की लाई का भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से चंद्र ग्रह की शांति होगी।×××××××××××××××××××××××××××××
संपर्क -
किसी भी प्रकार की पूजा
जैसे
- सतचण्डीपाठ , नवरात्रिपाठ , महामृत्यंजय , वास्तु पूजन, ग्रह प्रवेश , श्री मदभागवत कथा, श्री राम कथा , करवाने हेतु एबम ज्योतिष द्वारा समाधान,आदि की जानकारी के लिए ××××××××××××××××××××××××××××××
संपर्क सूत्र पंडित -परमेश्वर दयाल शास्त्री (मधुसुदनगड़) 09893397835 ============================= गुरुदेव-भुबनेश्वर दयाल शास्त्री
(पर्णकुटी गुना)
09893946810 ============================ पंडित -घनश्याम शास्त्री
(parnkuti guna )
09893983084 ============================= विशेष संपर्क कस्तूरवा नगर पर्णकुटी आश्रम गुना ऐ -बी रोड दा होटल सारा के सामने 09893946810
=================
अगर कोई समान छूट गया हो तो इसमें कॉमेंट बॉक्स में जरूर लिखे हमारा प्रयास प्रसिद्धि पाना नही केवल जान सहयोग की भावना है ।
नवरात्रि मे भोग सामग्री
🛕🪔9 दिन लगाए भोग और ऐसे करें पूजा-
♦️प्रथम दिन :
🌹नवरात्रि के पहले दिन शनिवार को माता शैलपुत्री का होगा। इस दिन गाय के दुध से बने हुए व्यंजनों का भोग लगेगा। माता की पूजा करने से मंगल ग्रह की शांति होगी।
♦️द्वितीया तिथि :
🌹रविवार को मां ब्रह्माचारिणी की अराधना होगी। इस दिन माता को शक्कर का भोग लगेगा। इस दिन माता की अराधना करने से गुरु ग्रह की शांति होगी।
♦️तृतीया तिथि :
🌹सोमवार को मां चंद्रघंटा की अराधना होगी। इस दिन माता को घी का भोग लगेगा। इस दिन माता पूजा करने से बुध ग्रह की शांति होगी।
♦️चतुर्थी तिथि :
🌹मंगलवार को मां कुष्मांडा का दिन है। इस दिन माता को मालपुआ का भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से शनि ग्रह की शांति होगी।
♦️पंचमी तिथि :
🌹बुधवार को मां स्कंदमाता का दिन है। इस दिन माता को केला भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से राहु ग्रह की शांति होगी।
♦️षष्ठी तिथि :
🌹गुरुवार को मां कात्यायनी का दिन है। इस दिन माता को शहद का भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से केतु ग्रह की शांति होगी।
♦️सप्तमी तिथि :
🌹शुक्रवार को मां कालरात्रि का दिन है। इस दिन माता को गुड़ का भोग लगाया जाएगा। इस दिन पूजा करने से शुक्र ग्रह की शांति होगी।
♦️अष्टमी तिथि :
🌹शनिवार को मां महागौरी का दिन है। इस दिन माता को नारियल का भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से सूर्य ग्रह की शांति होगी।
♦️नवमीं तिथि :
🌹रविवार को इस दिन सिद्धिदात्री का दिन होगा। इस दिन माता को धान की लाई का भोग लगेगा। इस दिन पूजा करने से चंद्र ग्रह की शांति होगी।
Saturday, 16 February 2019
यज्ञकुण्ड और मण्डपों के सम्बन्ध में इस प्रकार के उल्लेख ग्रन्थों में मिलते है
नमो भगवते वासुदेवाय॥
॥ यज्ञौवैश्रेष्ठतरं कर्मः स यज्ञः स विष्णुः॥ ॥ यज्ञात्भवति पर्जन्यः पर्जन्याद्अन्नसम्भवः॥ ॥
कुण्ड और मण्डपों के सम्बन्ध में इस प्रकार के उल्लेख ग्रन्थों में मिलते है
जिसकी पूजा यज्ञोमे बतायी गई है ,जिसमे एक एक स्तंभ के एक एक देव भी है।।,,,,,
इस सोलह स्तंभो के नाम इस प्रकार है,
,, शुभद ।।
विजय ।।
कृष्ण ।।
श्रीमान ।।
मंगल ।।
गुरू ।।
जय ।।
धनद ।।
कल्याणी ।।
शुभ ।।
शान्त ।।
मनोहर ।।
ऋद्धि ।।
सिद्धि ।।
विचित्र ।।
दिव्य रूप ।। ,
,शुभदं विजयं कृष्णं श्रमंतं मंगलं गुरूम्।
जयं धनदकल्याणी शुभं शान्तं मनोहरम्।।
ऋद्धिं सिद्धिं विचित्रं च दिव्यरूपमनुक्रमात्। मंडपस्तंभनामानि षोडशैतान्यसंशयः।।
जानिए यज्ञ के नौ कुंडों की विशेषता
* 1=सभी प्रकार की मनोकामना पूर्ति के लिए प्रधान चतुरस्त्र कुंड का महत्व होता है।
* 2=पुत्र प्राप्ति के लिए योनि कुंड का पूजन जरूरी है।
* 3=ज्ञान प्राप्ति के लिए आचार्य कुंड यज्ञ का आयोजन जरूरी होता है।
* 4=शत्रु नाश के लिए त्रिकोण कुंड यज्ञ फलदाई होता है।
* 5=व्यापार में वृद्धि के लिए वृत्त कुंड करना लाभदाई होता है।
* =मन की शांति के लिए अर्द्धचंद्र कुंड किया जाता है।
5=लक्ष्मी प्राप्ति के लिए समअष्टास्त्र कुंड,
6=विषम अष्टास्त्र कुंड,
7=विषम षडास्त्र कुंड का विशेष महत्व होता।
यज्ञ कुंड मुख्यत:
आठ प्रकार के होते हैं और सभी का प्रयोजन अलग अलग होताहैं ।
1. योनी कुंड – योग्य पुत्र प्राप्ति हेतु ।
2. अर्ध चंद्राकार कुंड – परिवार मे सुख शांति हेतु । पर पतिपत्नी दोनों को एक साथ आहुति देना पड़ती हैं ।
3. त्रिकोण कुंड – शत्रुओं पर पूर्ण विजय हेतु ।
4. वृत्त कुंड – जन कल्याण और देश मे शांति हेतु ।
5. सम अष्टास्त्र कुंड – रोग निवारण हेतु ।
6. सम षडास्त्र कुंड – शत्रुओ मे लड़ाई झगडे करवाने हेतु ।
7. चतुष् कोणास्त्र कुंड – सर्व कार्य की सिद्धि हेतु ।
8. पदम कुंड – तीव्रतम प्रयोग और मारण प्रयोगों से बचने हेतु ।
मण्डपों के निर्माण में
द्वार,
खम्भे,
तोरण द्वार,
ध्वजा,
शिखर,
छादन,
रङ्गीन वस्त्र आदि वर्णन हैं ।
इनके वस्तु भेद,
रङ्ग भेद,
नाप दिशा आदि के विधान बताए गए हैं ।
बड़े यज्ञों में ३२ हाथ (४८ फुट)
अर्थात १६ = २४ फुट का चौकोर मण्डप बनाना चाहिये
। मध्यम कोटि के यज्ञों में १४ (१८ फुट) हाथ
अथवा १२ हाथ (१८ फुट) का पर्प्याप्त है ।
छोटे यज्ञों में १० हाथ (१५ फुट ) या ८ (१२ फुट) हाथ की लम्बाई चौडाई का पर्याप्त है ।
मण्डप की चबूतरी जमीन से एक हाथ या ऊँची रहनी चाहिए ।
बड़े मण्डपों की मजबूती के लिए १६ खंभे
=================================
मंडप के एक हाथ बाहर चारों दिशाओं में ४ तोरण द्वार होते हैं,
यह ७ हाथ (१० फुट ६ इंच) उँचे और ३.५ चौड़े होने चाहिए ।
तोरण द्वार के लिये
1=पूर्व मे पीपल की या बरगद की लकडी
2=दक्षिण मे गूलर की
3=पश्चिम मे पीपल या पाकर
4=उत्तर मे पाकर या बरगद
इन तोरण द्वारों में से
पूर्व द्वार पर शङ्क, =बरगद या पीपल
दक्षिण वाले पर चक्र, =गूलर
पच्छिम में गदा =पीपल का पाकर का
उत्तर मे पद्द्म= पाकर या बरगद
यदि चारों न मिलें तो इनमें से किसी भी प्रकार की चारों दिशाओं में लगाई जा सकती है ।
पूर्व के तोरण में लाल वस्त्र,
दक्षिण के तोरण में काला वस्त्र,
पच्छिम के तोरण में सफेद वस्त्र,
उत्तर के तोरण में पीला वस्त्र लगाना चाहिए ।
==================================
ध्वजा =2हाथ या तीन हाथ चौडी और पांच हाथ लम्बी होना चाहिये ।
पताका =1हाथ चौड़ी 3,5,7,हाथ लम्बी हो
महाध्वज=का बांस 10,16,21,या 23,का होबे
महाध्वज का नाप 3हाथ चौडा 5या 10हाथ लम्बा हो
सभी दिशाओं में तिकोनी ध्वजाएँ लगानी चाहिये ।
2=पीली
2=लाल
2=काली
2=हरी
1=सफेद
1=नीली
1=इन्द्र की पूर्व में पीली, बाहन हाथी
2=अग्नी की अग्निकोण में लाल, सफेद रंग का मेडा
3=यम की दक्षिण में काली,बाहन लाल रँग का भेसा
4= नैऋत्ययी नैऋत्य में नीली, में सफेद,रंग का सिंह
5=बरुण की पश्चिम मे,बाहन हरे रंग की मछली
6=बायु की वायव्य में धूमिल, बाहन काले रंग का हिरन
7=सोम की उत्तर में हरी,सुबर्ण के जैसा घोडा
8=ईशान की ईशान में सफेद लगानी चाहिये ।लाल बैल
दो ध्वजाएँ ब्रह्मा और अनन्त की विशेष होती है,
ब्रह्मा की सफेद या लाल ध्वजा ईशानकोण और पुर्व् के मध्य मे में बाहन सफेद रंग का हंस
और अनन्त की पीली सफेद या काली ध्वजा नैऋत कोण और पश्चिम के मध्य में लगानी चाहिए । बाहन गरुण
इन ध्वजाओं में सुविधानुसार वाहन और आयुध भी चित्रित किये जाते हैं ।
ध्वजा की ही तरह पताकाएं भी लगाई जाती है इन पताकाओं की दिशा और रङ्ग भी ध्वजाओं के समान ही हैं ।पताकाएं चौकोर होती है
पताका
2=पीली
2=लाल
2=काली
1=हरी
2=सफेद
1=नीली
1=पूर्व की पताका मे आयुध बज्र होता है
2=अग्नी कोण मे आयुध तलवार होता है
3=दक्षिण मे आयुध दण्ड होता है
4=नैऋत्यकोण की पताका मे आयुध खंग होता है
5=पश्चिम दिशा मे आयुध पाश होता है
6=वायव्यकोण की पताका मे आयुध अंकुश होता है
7=उत्तर दिशा मे आयुध गदा होती है
8=ईशान कोण की पताका मे आयुध त्रिशूल होता है
9=पूर्व और ईशान कोण के मध्य मे आयुध कमण्डलू
10=पश्चिम और नैऋत्य मे आयुध चक्र होता है
एक सबसे बड़ा महाध्वज सबसे उँचा होता है ।उसका बांस 10,16,21,या 23,हाथ का हो।उस पर घुगरू, चवर, घंटी हो
==================================
मण्डप के भीतर चार दिशाओं में चार वेदी बनती हैं ।
ईशान में ग्रह वेदी,
अग्निकोण में योगिनी वेदी,
नैऋत्य में वस्तु वेदी
और वायव्य में क्षेत्रपाल वेदी,
प्रधान वेदी पूर्व दिशा में होनी चाहिए ।
==================================
एक कुण्डी यज्ञ में मण्डप के बीच में ही कुण्ड होता है ।
उसमें चौकोर या कमल जैसा पद्म कुण्ड बनाया जाता हैं ।
कामना विशेष से अन्य प्रकार के कुण्ड भी बनते हैं ।
=================================
चार कुण्डीय
पूर्व मे चतुराश्त्र
दक्षिण मे अर्ध चंद्र
पश्चिम मे ब्रत्त
उत्तर मे पद्द्म
==================================
पंच कुण्डी यज्ञ में आचार्य कुण्ड बीच में,
चतुरस्र पूर्व में, =योनि पूर्व मे
अर्थचन्द्र दक्षिण में, =योनि दक्षिण मे
वृत पच्छिम में =योनि पश्चिम मे
और पद्म उत्तर में होता है । पश्चिम मे
==================================
नव कुण्डी यज्ञ में आचार्य कुण्ड मध्य में
चतुररसा्र कुण्ड पूर्व में, =योनि=दक्षिण मे
योनि कुण्ड अग्नि कोण में,= इसमे योनि नही होती
अर्धचन्द्र दक्षिण में, =योनि =दक्षिण मे
त्रिकोण नैऋत्य में वृत पच्छिम में,=योनि =पश्चिम मे
पश्चिम मे ब्रत्त कुंड =योनि =पश्चिम मे
षडस्र वायव्य में,=योनि पश्चिम मे
पद्म उत्तर में, =योनि =पश्चिम मे
अष्ट कोण ईशान में होता है ।=योनि पश्चिम मे
1 प्रत्येक कुण्ड में ३ मेखलाएं होती हैं ।
ऊपर की मेखला ४ अंगुल,
बीच की ३ अंगुल,
नीचे की २ अँगुल होनी चाहिए ।
ऊपर की मेखला पर सफेद रङ्ग
मध्य की पर लाल रङ्ग
और नीचे की पर काला रङ्ग करना चाहिए ।
५० से कम आहुतियों का हवन करना हो तो कुण्ड बनाने की आवश्यकता नहीं ।
भूमि पर मेखलाएं उठाकर स्थाण्डिल बना लेना चाहिए ।
५० से ९९ तक आहुतियों के लिए २१ अंगुल का कुण्ड होना चाहिए ।
१०० से ९९९ तक के लिए २२.५अँगुल का,
एक हजार आहुतियों के लिए २ हाथ=(१.५)फुट का,
तथा एक लाख आहुतियों के लिए ४ हाथ (६ फुट)का कुण्ड बनाने का प्रमाण है ।
==================================
यज्ञ-मण्डप में पच्छिम द्वार से साष्टाङ्ग नमस्कार करने के उपरान्त प्रवेश करना चाहिए ।
हवन के पदार्थ चरु आदि पूर्व द्वार से ले जाने चाहिए ।
दान की सामग्री दक्षिण द्वार से
और पूजा प्रतिष्ठा की सामग्री उत्तर द्वार से ले जानी चाहिए ।
=================================
मंडप के स्थम्भो पर बस्त्र या कलर
मण्डप के मध्य के चारो स्थम्भ
1= ईशान मे लाल
2=अग्निकोण मे सफेद
3=नैऋत्य मे काला
4=वायव्य कौण मे पीला
बाहर के स्थम्भो मे
1=ईशान मे लाला बस्त्र
2=ईशान पूर्व के स्थम्भ के मध्य मे सफेद
3=पूर्व और अग्निकोण के स्थम्भ के मध्य मे काला
4=अग्निकोण के स्थम्भ मे काला
5=अग्निकोण और दक्षिण के मध्य के स्थम्भ मे सफेद
6=दक्षिण और नैऋत्यकोण के मध्य के स्थम्भ मे हरा
7=नैऋत्यकोण मे पीला
8=नैऋत्यकोण और पश्चिम के मध्य के स्थम्भ मे सफेद
9=पश्चिम और बायव्य कोण के मध्य के स्थम्भ मे सफेद
10=वायब्य कोण मे पीला
11=उत्तर और बायव्य कोण के मध्य मे पीला
12=उत्तर और ईशान कोण के मध्य मे लाल
Gurudev bhubneshwar
पर्णकुटी गुना
9893946810
Wednesday, 9 January 2019
मकर सक्रांति पर बन रहा महा योग अमृत सिद्धि, सर्वार्थ सिद्धि, मंगलाश्विनी अमृतसिद्धि योग व राजप्रद योग का संयोग बन रहा है।
जब सूर्य गोचर करते हुए धनु राशि से मकर में प्रवेश करते हैं तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है
नवग्रहों राजा सूर्यदेव 14 जनवरी की शाम को करीब 7:50:52 मकर राशि में प्रवेश करेंगे।
इसी के साथ ही मकर संक्रांति की शुरुआत हो जाएगी।
गुरुदेव भुबनेश्वर जी पर्णकुटी वाले बताते हैं
कि संक्रांति के प्रवेश के अनंतर की 40 घटी या 16 घंटे पुण्य काल माना जाता है।
इसमें भी 20 घटी या 8 घंटे अति उत्तम है।
रात्रि में संक्रांति का प्रवेश हो तो दूसरे दिन मध्यान्ह तक स्नान-दानादि किए जा सकते हैं
किंतु सूर्योदय से 5 घटी लगभग 2 घंटे अत्यंत पवित्र माना गया है।
15 जनवरी को सुबह से ही अमृत सिद्धि, सर्वार्थ सिद्धि, मंगलाश्विनी अमृतसिद्धि योग व राजप्रद योग का संयोग बन रहा है।
चूंकि इस बार संक्रांति का वाहन सिंह और उपवाहन हाथी है,
इस कारण साल भर काम की अधिकता औऱ राजनीतिक परिवर्तन सहित कई अन्य बदलाव देखने को मिलेंगे।
– 15 जनवरी, मंगलवार
– पुण्य काल का समय 15 जनवरी 2019 को सुबह 7:18 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक
– महा पुण्य काल का समय 15 जनवरी 2019 की सुबह 7:18 से 9:02 बजे तक
इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है।
ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है।
इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।
जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है-
माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥
ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं।
चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है।
महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का ही चयन किया था।
मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं।
वैसे तो सूर्य संक्रांति 12 हैं,
लेकिन इनमें से चार संक्रांति महत्वपूर्ण हैं
जिनमें मेष, कर्क, तुला, मकर संक्रांति हैं.
मकर संक्रांति के शुभ मुहूर्त में स्नान-दान और पुण्य के शुभ समय का विशेष महत्व होता है.
सूर्य के किसी राशि में जाने पर उसका प्रभाव सभी राशियों पर 26 दिनों तक होता है।
देखिए आपकी राशि पर मकर संक्रांति का कैसा प्रभाव है।
मेष: नौकरी में मान-प्रतिष्ठा
आपकी राशि से दसवें घर में सूर्य का संचार होने जा रहा है। यह सरकार और नौकरी-व्यवसाय का घर है। सूर्य के यहां आगमन से आपको नौकरी में मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी। सरकारी क्षेत्र में मान-सम्मान मिल सकता है। पिता और वरिष्ठजनों से मेलजोल बनाए रखें, इनका सहयोग और सलाह लेना फायदेमंद होगा।
वृष: परिश्रम से बढ़कर फायदा
आपके लिए सूर्य का मकर राशि में संचार कुल मिलाकर शुभ रहेगा। धर्म और आध्यात्मिक विषयों में आपकी रुचि रहेगी। भाग्य साथ देगा, मेहनत कीजिए परिश्रम से बढ़कर फायदा मिलेगा।
मिथुन: दुर्घटना की आशंका
राशि के आठवें सूर्य का संचार होगा साथ में केतु भी मौजूद हैं ऐसे में आपको जोखिम से बचना चाहिए दुर्घटना की आशंका रहेगी। अग्नि से भय रहेगा। बिजली के उपकरणों के साथ छेड़-छाड़ से बचें। अच्छी बात यह है कि आपके काम की सराहना होगी, मान-सम्मान और प्रभाव बढ़ेगा। सेहत का ध्यान रखें।
कर्क: वैवाहिक जीवन में कठिनाइयां
मकर राशि में सूर्य का गमन आपकी राशि से सातवें घर में हो रहा है। पारिवारिक जीवन खासतौर पर वैवाहिक जीवन में कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है। व्यापार में साझेदारी से परेशान होंगे। दैनिक कार्यों में प्रगति होगी। शत्रुओं का पक्ष कमजोर होगा।
सिंह: अदालती कामों में सफलता
राशि स्वामी का राशि से छठे घर में जाना अदालती कामों में सफलता दिलाएगा। नौकरी व्यवसाय में आपका पक्ष मजबूत होगा। बहन-बुआ के लिए समय सुखद होगा लेकिन ससुराल पक्ष से परेशानी हो सकती है। कर्ज को चुकाने में सफल हो सकते हैं। सेहत का ध्यान रखें।
कन्या: संतान सुख की चाह पूरी होगी
शिक्षा और संतान के मामलों में सूर्य का मकर राशि में गमन शुभ रहेगा लेकिन प्रेम प्रसंग के मामले में समय अनुकूल नहीं है। जो दंपत्ति संतान सुख की चाहत रखे हुए हैं उनकी इच्छा पूरी होगी। मांगलिक कार्य में भाग लेने का मौका मिल सकता है।
तुला: भूमि, भवन का लाभ
आपकी राशि से चौथे घर में सूर्य का गोचर भूमि, भवन का लाभ दिला सकता है। यात्रा का प्रसंग भी बनेगा। माता और माता समान महिला की सेहत को लेकर चिंतित होंगे। भौतिक सुखों पर खर्च बढ़ेगा। शरीर के ऊपरी हिस्से में कष्ट हो सकता है।
वृश्चिक: कार्यक्षेत्र में सम्मान
आपका वर्चस्व और प्रभाव बढ़ेगा। कार्यक्षेत्र में सम्मान मिलेगा। गुप्त शत्रुओं से राहत मिलेगी। भाइयों से मेलजोल बनाकर रखें नहीं तो आपस में मनमुटाव हो सकता है।
धनु: आर्थिक मामलों में प्रगति
बीते समय से चली आ रही परेशानी से राहत महसूस करेंगे। आर्थिक मामलों में प्रगति होगी, लाभ मिलेगा। पारिवारिक मामलों में आपको थोड़ी परेशानी हो सकती है। सगे-संबंधियों से निराशा का सामना करना होगा। जमा पूंजी बढ़ाने का प्रयास सफल होगा।
मकर: नौकरी में प्रभाव बढ़ेगा
आपकी राशि में सूर्य का संचार होगा। क्रोध बढ़ेगा और कई बार आप अपने अंदर हीन भावना महसूस करेंगे। आपके लिए सलाह है आत्मबल बनाए रखें। नौकरी में प्रभाव बढ़ेगा। अधिकारियों से तालमेल बनाए रखना अच्छा रहेगा।
कुंभ: खर्च में वृद्धि
आपकी राशि से बारहवें घर में सूर्य का संचार आपके खर्च में वृद्धि करेगा। सामाजिक कामों में भाग लेंगे और प्रतिष्ठा पाएंगे। धार्मिक और शुभ कार्यों पर व्यय होगा। यात्रा करनी पड़ सकती है।
मीन: मनोकामना पूरी होगी
राशि से ग्यारहवें घर में सूर्य का संचार आर्थिक मामलों में शुभ फलदायी होगा। आपकी आय में वृद्धि होगी। कोई मनोकामना भी इस समय पूरी हो सकती है। बड़े भाई से तालमेल बनाकर रखें, मतभेद हो सकता है
Gurudev bhubneshwar
Parnkuti aashram guna
9893946810
Sunday, 25 November 2018
पंचांग सिखने के लिये आवश्यक जानकारी
१. आयन
—सूर्य का सायन, मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, मिथुन में स्थिति काल को उत्तरायण और शेष सायन राशि कर्वक़, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक व धन में सूर्य स्थिति दक्षिणायन होता है।
यद्यपि लगभग सभी शुभ कृत्य उत्तरायण में किए जाते हैं।
कुछ कार्य दक्षिणायन में भी होते हैं। जिन की चर्चा विषय अनुसार ही होगी।
२. अथिक मास
—सूर्य संक्रांति—रहित शुक्लादि चन्द्रमास।
३. क्षय मास
—दो सूर्य संक्रांतियों वाला शुक्लादि चन्द्रमास। ४. धनु:स्थ सूर्य—जब सूर्य धन राशि में भ्रमण कर रहा हो।
५. मीनस्थ सूर्य
—जब सूर्य मीन राशि में भ्रमण कर रहा हो।
६. ज्येष्ठ मास
—प्रथम गर्भ से जातक का, कोई भी मंगल कृत्य ज्येष्ठ मास में नहीं करना चाहिए।
कुछ विद्वान इस दोष को सामान्य मानते हैं। वहा ‘ज्येष्ठ मास’ चन्द्र मास वाला है।
७. बृहस्पति का अस्त एवं वार्घक्य
—वाल्य काल। यद्यपि बृहस्पति के वार्घक्य और बाल्य काल के बारे में ज्योतिषग्रंथों में अनेक मत है। लेकिन परम्परया बृहस्पति अस्त में तीन दिन पहले उसका वार्घक्य काल और उदय के तीन दिन बाद तक बाल्य काल पर अधिक विद्वानों द्वारा मान्य है।
८. शुक्र का अस्त एवं वार्घक्य
—बाल्य काल। यहाँ भी उपरोक्त वृहस्पति के अनुसार ही शुक्र के वार्घक्य एवं बाल्य काल के तीन तीन दिन ही मान्य हैं।
९. प्रोष्ठपदी श्राद्ध पूर्णिमा
—भाद्रपद, पूर्णिमा प्रोष्ठपदी पूर्णिमा कहलाती है। इस तिथि में पूर्णिमा का महालय श्राद्ध होता है, अत: यह दिन मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित हैं। १०. श्राद्ध दिवस
—आश्विन कृष्ण पक्ष के सभी दिन।
११. त्रयोदश दिन पक्ष
—जिस पक्ष में दो तिथियों का क्षय हो, वह त्रयोदश दिन पक्ष कहलाता है। शास्त्रों में इसे अत्यनिष्ठ प्रद कहा गया है।
१२. सिंहस्थ गुरु
—सामान्यत: सिहंस्थ गुरु के पूर्ण काल को शुभ कार्यों में वर्जित किया गया है। परन्तु सिहांशकस्थ (मघा व पू. फा. प्रथम चरणस्थ) काल को वर्जित अनेकों शास्त्र वाक्य से सभी पंचागकार परम्परया करते चले आ रहे हैं।
१३. मकरस्थ गुरु
—सामान्यत: मकरस्थ (नीच) गुरु के पूरे काल को शुभ कृत्यों के लिए वर्जित कहा है लेकिन इसके (मकरस्थ गुरु के) केवल उसी काल को जहाँ गुरु नीचांशक (मकर—मकरांशक) में स्थित हो।
१४. लुप्त संवत्सर
—यद्यपि लुप्त संवत्सर को पूर्णत: मांगलिक कार्यों में वज्र्य लिखा है, लेकिन सुदीर्घ पंचाग कार इसे स्वीकार नहीं करते।
१५.होलाष्टक
—फाल्गुन शुक्ला अष्टमी से पूर्णिमा तक काल (होलाष्टक) कहलाता है। कुछ स्थान विशेष में ही इसे वर्जित मानते हैं।
१६. तिथि, वर एवं नक्षत्रों की विष घटियॉं—सभी शुभ कार्यों में तिथि आदि की विष घटिया अशुभ मानी गई है। पर लग्न शुद्धि एवं गोचर ग्रह शुद्धि से इनका परिहार हो जाता है।
१७. शून्य तिथि, नक्षत्र एवं राशियाँ—यह केवल मध्य देश में ही वर्जित है।
१८. पक्षरन्ध्र तिथियाँ
—दोनों (शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष) की ४, ६, ८, ९, १२, १४ तिथियाँ पक्षरन्ध्र तिथियाँ कहलाती हैं। इन की आरम्भ की कुछ घडिया शुभकार्यों के लिए वर्जित मानी है। पर लग्न शुद्धि व गोचर ग्रह शुद्धि से भी इन दोष समाप्त हो जाता है।
१९. भद्रा (विष्टी करण)
—सभी शुभ कार्यों में भद्रा का बहुत ही अशुभफल लिखा है। तथापि भद्रा का परिहार अनेकों मुहूर्तों ग्रंथों में मिलता है। लेकिन इस का प्रयोग अतयन्त विवशता की स्थिति में करना चाहिए—ऐसा मेरा मानना है।
२०. दग्धातिथि
—मेषादि १२ राशियों में सूर्य की स्थिति के समय क्रमश: ४, ६, ८, ६, १०, ८, १२, १०, २, १२, १४ और २ तिथियाँ (दोनों पक्षों की) दग्धा कहलाती है। इन तिथियों में शुभ कार्य करने का निषेध है। लेकिन केन्द्र—त्रिकोण में गुरु, शुक्र या बुध ग्रहों की स्थिति मुहूर्त लग्न में हो तो दूर करती है।
२१. रिक्ता तिथि
—दोनों पक्षों (शुक्ल एवं कृष्ण) की ४—९—१४ तिथियाँ रिक्ता मानी गई है। शुभ कार्यों के लिए इन्हें वर्जित माना है। लेकिन विवाहादि कुछ कार्यों में इन्हें परम्परानुसार केन्द्र त्रिकोण गत गुरु, शुक्र या बुध की स्थिति और शनिवार के संयोग से, तिथि दोष भी समाप्त हो जाता है।
२२. अमावस्या
—प्रत्येक मास की अमावस को चन्द्र के अदर्शन के कारण सभी शुभ कार्यों में वर्जित माना है।
२३. माता—पिता का श्राद्ध दिन
—सभी शुभ कार्यों में वर्जित हैं।
२४. जन्म मास, तिथि
—नाक्षत्र—प्रथम गर्भ से उत्पन्न जातक से सम्बंद्ध कोई भी मुहूर्त (मंगल कार्य) उसके (जातक के) जन्म मास, तिथियाँ नक्षत्र में शुभ नहीं माना जाता है। इसे केवल चन्द्र मास ही माने।
२५. क्षीण तिथि (तिथि क्षय)
—सूर्योदय का स्पर्श न करने वाली तिथि क्षीण कहलाती है। यह भी शुभ कार्यों में वर्जित है। लेकिन गुरु शुक्र या बुध की केन्द्र या त्रिकोण में स्थिति होने से इस दोष का परिहार माना गया है।
२६. तिथि वृद्धि
—यह दो सूर्योदयों का स्पर्श करने वाली होती है। इसे भी शुभ कार्यों में वर्जित माना है। लेकिन गुरु शुक्र या बुध की केन्द्र या त्रिकोण में स्थिति होने से इसे भी दोष रहित माना गया है।
२७. व्रूर वार
—सामान्यत: व्रूक़र (रवि—मंगल और शनिवारों में शुभ कृत्य न करने का उल्लेख है।) लेकिन परम्परया विवाहादि मुहूर्तों में व्रूरवारों का सभी लोग प्रयोग करते चले आ रहे हैं। और कई मुहूर्तों में तो व्रक़रवारों को विशेष रूप से ग्राहब भी माना है। कुछ में वर्जित भी किया है। यह मुहूर्तों में विशेष आयेगा।
२८. नक्षत्रान्त
—सभी नक्षत्रों के अन्त की तीन
—तीन घडियाँ (१ घं. १२ मिनट) शुभ कार्यों में वर्जित मानी है।
लग्न शुद्धि से यद्यपि दोष का परिहार तर्वक़ सकते हैं, परन्तु बहुत से विद्वान इसकी उपेक्षा करते हैं। लग्न शुद्धि से हो इस का परिहार हो जाता है। ३१ गण्डात—यह तीन प्रकार से होता है—१ तिथि गण्डात, २ नक्षत्र गण्डात और ३ लग्न गण्डात १ तिथि गण्डात—पूर्णा (५—१०—१५—३०) तिथियों के अन्त की और नन्दा (१—६—११) तिथियों के प्रारम्भ की १ एक घटी (२४ मिनट) तिथि गण्डात होती है। (११) नक्षत्र गण्डात—अश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती नक्षत्र के अन्त की और मघा, मूल और अश्विनी नक्षत्रों की प्रारम्भ की २—२ घडियां (४८—४८) मिनट नक्षत्र गण्डात कहलाती हैं। (१११) लग्न गण्डात—कर्वक़, वृश्चिक, मीन लग्न के अन्त की और सिंह, धन, तथा मेष लग्नों की प्रारम्भ की आधी—आधी घड़ी (१२—१२ मिनट) ‘लग्न गण्डात’ मानी गई हैं। ये तीनों गण्डात समय शुभ कार्यों में वर्जित माने गये हैं। ध्यान दें—नाक्षत्र गण्डात में जातक का जन्म शुभ नहीं माना जाता। शिशु का जन्म होने पर हर स्थिति में गण्डात शान्ति करानी चाहिए। ३२ दग्धा लग्न—दोनों (कृष्ण—शुक्ल) पक्षों की प्रतिपदा में तुला—मकर, तृतीया में सिंह—मकर, पंचमी में मिथुन—कन्या, सप्तमी में धन—कर्वक़, नवमी में कर्क़—सिंह, एकादशी में धन—मीन और त्रयोदशी में वृष मीन लग्न दग्धा कहलाते हैं। शुभ कार्यों में इन्हें वर्जित लिखा है। सभी विद्वान इस दोष को मान्यता नहीं देते। लग्न शुद्धि भी इस दोष को समाप्त करती हैं। ३३ दिन—रात्रि, सन्धि—दिन मध्य एवं रात्रि मध्य के १०—१० पल (४—४ मिनट) भी अमंगल कारी माने गये हैं। बलवान् लग्न एवं केन्द्र—त्रकोण गत शुभ ग्रहों से यह दोष भी समाप्त हो जाता है। ३४ क्रांति साम्य—सूर्य चन्द्र की क्रांति समय की अविध को सभी मांगलिक कार्यों में अत्यन्त भयावह माना है। इसे अवश्य छोडें। ३५ क्षीण चन्द्रमा—कुछ विद्वान कृष्ण त्रयोदशी से शुक्ल प्रतिपदान्त (चार दिन) तक। अधिकतर विद्वान कृष्ण चतुर्दशी से प्रतिपदान्त (तीन दिन) तक के लिए क्षीण चन्द्र माना गया है। इन दिनों में कोई भी मंगल कार्य नहीं किया जाता। ३६ सूर्य संक्रान्ति—सूर्य संक्रान्ति वाले दिन भी शुभ कार्य नहीं होते। कुछ विद्वानों का मत है कि संक्रान्ति से पूर्वापरवर्ती १६—१६ घडियां (६ घं २४ मिनट) ही अशुभ मानी जाए। अधिक मान्यता में दिन में कार्य नहीं करने की ही है। ३७ मासान्त—सूर्य संक्रान्ति के पूर्व, परवर्ती (उपरोक्त) वाले समय १६—१६ घड़ियों को त्याज्य मानते हैं, मासान्त दिन को शुभकार्यों में वज्र्य नहीं मानते। ३८ ग्रहण :—सूर्य चन्द्र ग्रहण घटित हो व दिन साथ ही ग्रहण से पूर्व १ दिन और परवर्ती ३ दिन कुल ५ दिन सभी शुभ कार्यों में वर्जित मानते गये हैं। ३९ ग्रहण दूषित नक्षत्र—जस नक्षत्र में सूर्य—चन्द्र ग्रहण घटित हो उस नक्षत्र के ग्रहण ग्रास की मात्रा के अनुसार निम्नांकित मासों के लिए शुभ कार्यों में वर्जित माना है। १०० प्रतिशत ग्रास होने पर ६ मास के लिए ग्रहण नक्षत्र वर्जित। ८३ प्रतिशत ग्रास होने पर ५ मास के लिए ग्रहण नक्षत्र वर्जित। ६६ प्रतिशत ग्रास होने पर ४ मास के लिए ग्रहण नक्षत्र वर्जित। ५० प्रतिशत ग्रास होने पर ३ मास के लिए ग्रहण नक्षत्र वर्जित। ३३ प्रतिशत ग्रास होने पर २ मास के लिए ग्रहण नक्षत्र वर्जित। १६ प्रतिशत ग्रास होने पर १ मास के लिए ग्रहण नक्षत्र वर्जित। ध्यान रखें—कभी कभी ग्रहण दो नक्षत्रों में घटित होता है, तो वह दोनों नक्षत्रों को दूषित करता है। अत: उन दोनों नक्षत्रों को ग्रास की मात्रा के अनुसार उपरोक्त महीनों के लिए शुभ कार्यों में वर्जित माने। ४० दोष पूर्ण विष्कुम्भादि योग—विष्कुम्भ और वङ्का की प्रारम्भ की ३–३ अतिगण्ड और गण्ड की ६—६, शूल की ५ और व्याघात ९ घडियां शुभ कार्यों में अशुभ मानी गई है। परिघ का पूर्वाघ, और व्यातिपात एवं वैघृति दोनों का पूरा काल भी सभी कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है। ४१ जन्म राशि / जन्म लग्न से अष्टम लग्न राशि / लग्न नवांश जिस के लिए मांगलिक कार्य किया जा रहा है, उस जातक की जन्म राशि या जन्म लग्न से अष्टम राशि का लग्न एवं अष्टम राशि का लग्न नवांश भी शुभ होता है। यदि लग्नेश या नवांशेश से जन्म राशिश या जन्म लग्नेश की मित्रता आदि हो तो यह दोष दूर हो जाता है। विशेष :—जिस की जन्म राशि आदि ज्ञात न हो उसे बोलते नाम अनुसार मानें। ४२ पापयुक्त लग्न एवं लग्न नवांश लग्न व लग्न के नवांश में पापी (व्रूर) ग्रह हो तो भी उस लग्न से शुभ कार्ये नहीं करें। ४३ चन्द्र युक्त लग्न—लग्न में चन्द्रमा की स्थिति होने से भी कोई शुभ कार्य नहीं करें। भले ही वह चन्द्रमा स्वराशि, मित्र राशि या स्वोच्चस्थ राशि में क्यों न हो। ४४ लग्न मे क्रूर ग्रह का नवांश भी शुभ कार्यों में मान्य नहीं। लेकिन यदि केन्द्र या त्रिकोण में गुरु, शुक्र या हो तो दोष कारक नहीं। एकादश भाव में सूर्य या चन्द्रमा होने से दोष दूर हो जाता है। केन्द्र एवं एकादशगत लग्नेश तथा लग्न नवांशेश भी इस दोष के निवारणर्थ मान्य है। लग्न एवं चन्द्र की वर्गोतम स्थिति भी इस दोष का निवारण करती है। ४५ लग्नगत अन्ति नवांश—लग्न में किसी भी राशि का अन्तिम नावांश भी शुभ कार्यों नहीं लिया गया है। बशर्ते वह वर्गोतम नहीं हों। ४६ लग्न एवं चन्द्र कत्र्तरी—लग्न या चन्द्रमा से द्वितीय भाव में वक्री क्रूर ग्रह और इनके द्वादश भाव में मार्गी व्रर ग्रह कत्र्तरी दोष माना है। यह भी कार्यो में वर्जित हैं। परिहार—यदि बुध, गुरु, शुक्र में कोई भी ग्रह केन्द्र / त्रिकोण में बैठा हो तो कत्र्तरी दोष समाप्त हो जाता है। कत्र्तरी बनाना वाले पापी ग्रह शत्रु या नीच राशि में हो अथवा अस्त हो तो भी दोष शून्य हो जाता है। ध्यान रखें—द्वितीय एवं द्वादश भाव में स्थित दोनों ग्रह मार्गी या दोनों वक्री पापी ग्रहों से भी कत्र्तरी योग बनता है, जो कि सामान्य माना है। ४७ व्रूर युत नक्षत्र—यदि मुहूत्र्त का नक्षत्र व्रूर ग्रह से युत हो तो वह अशुभ माना है। यदि चन्द्रमा वर्गोतम अथवा अपनी उच्च या मित्र राशि में स्थित हो तो यह दोष समाप्त होगा। ४८ विद्व नक्षत्र—वेघ दो प्रकार का है—सप्तश्लाका और पंचशलाका वेघ। पंचशलाका वेघ का विचार केवल विवाहिक कार्य में देखें और सप्तशलाका वेघ का विचार सभी शुभ कार्यों में किया जाता है। इन दोनों ग्रहों से वेघ नक्षत्र जानने के लिए हमारा पं. जैनी जीयालाल चौधरी जी कृत पंचाग को देखे पढ़ें। व्रूर ग्रह के विद्ध नक्षत्र में कोई भी शुभ कार्य नहीं होता। व्रूâर ग्रह का वेघ विद्व नक्षत्र के सम्पूर्ण काल को दूषित करता है, जब कि शुभ ग्रह का वेघ नक्षत्र के एक ही चरण को दूषित करता है यदि बेधक शुभ ग्रह नक्षत्र के प्रथम चरण में हो तो वह वेघ्य नक्षत्र के चतुर्थ चरण को और यदि द्वितीय चरण में हो तो व तृतीय चरण को, तृतीय चरण होने से दूसरे चरण को, और चतुर्थ चरण हो तो प्रथम चरण को वेधता है। इस प्रकार क्रूर ग्रह द्वारा विद्व नक्षत्र सम्पूर्ण काल को और शुभ ग्रह द्वारा विद्व नक्षत्र के एक चरण का काल ही शुभ कार्यों में वे वर्जित माना जाता है। ४९ कुलिक, काल वेला, यमघण्ट, कुण्टक :— यह चारों कुयोग, जिन्हें मुहूर्त कारों ने ‘मुहूर्त’ भी कहा है। दिनमान् षोडशांशों (सोलहवां भाग) से बनते हैं। भिन्न भिन्न वारों में इनक का काल भिन्न होता है। इन कुलिक आदि चारों कुयोगों को शुभ कार्यों में वर्जित माना है। कुछ विद्वान देश के कुछ भागों के वर्जित मानते हैं। कुलिकादि मुहूत्र्त बोधक चक्र बार / योग रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार कुलिक१४१२१०८६४२ काल बेला८६४२१४१२१० यमघण्ट१०८६४२१४१२ कण्टक६४२१४१२१०८ कुलिकादि योग दिनमान के सोहलवा भाग से बनते हैं। उत्तर के कोष्टक में कुलिकादि के आगे लिखी संख्या १४, ८, १०, आदि दिनमान का सोलहवा भाग है। इसी लिए इसे षोडशांश को यहाँ मुहूर्त कहा गया है। रविवार को १४ वां षोडशांश ‘कुलिक’ मुहूर्त है। इसी प्रकार शनिवार को ८ वां कण्टक’ नाम मुहूत्र्त हैं। ठीक इसी भान्ति अन्य वारों में भी जानें। ५० अद्र्धयाम—रविवार को चतुर्थ, सोमवार को सप्तम् मंगलवार को द्वितीय, बुधवार को पंचम, गुरुवार को अष्टम, शुक्रवार को तृतीय और शनिवार को छठा अद्र्धयाम (यामाद्र्ध) इस में भी शुभ कार्यों नहीं होते। नोट—यह मुहूर्त दिनमान का आठवां भाग है। विशेष—लग्न शुद्धि इस के दोष को समाप्त करती हैं। ५१ दुष्ट मुहूर्त—दन और रात्रि को १५—१५ मुहूर्तों में बांटा गया है। इन मुहूर्तो में से आर्यमा रविवार को, ब्रह्मा और राक्षस सोम को पितृ और अग्नि मंगल को, अभिजित बुधवार को, राक्षस और जल गुरु को, पितृ और ब्रह्मा शुक्रवार को तथा शिव व सर्प शनिवार को शुभ कार्यों में अशुभ माने गये हैं। ५२ तिथि—वार—नाक्षत्र—संयोगोत्पन्न कुयोग। वर एवं नक्षत्रों के योग से उत्पन्न काल दण्ड, धूम्र, उत्पात, मृत्यु, काण, राक्षस आदि कुयोग एवं तिथिवारों के योग से उत्पन्न क्रकच, संवत्र्त, दग्ध, विष आदि कुयोग तथा द्वादशी—अश्लेषा, प्रतिपदा, उ. पा. द्वितीया—अनुराधा आदि तिथि—नाक्षत्र के योग से उत्पन्न कुयोग शुभ कार्यों के लिए शुभ नहीं माने। रवि योग, सिद्धि योग, अमृत आदि सिद्धि योग से इन कुयोगों का कुफल निष्फल हो जाता है। अधिक जानकारी के पं. जैनी जीयालाल जी के पंचाग व जन्त्री का अवलोकन करें। मुहूत्र्त क्रम१२३४५६७८९१०१११२ १३१४१५ दिवा मुहूर्तशिवसर्पमित्रपित्तवसु जलविशेष अभिजीतब्रह्मा इन्द्र इन्द्राणी राक्षस वरुण अर्धसा भग रात्रि मुहूर्तशिवटजपदआहिर्बुहय पूजाअशिथीकुमार राम अग्नि ब्रह्मा चन्द्र अक्षिति ब्रहस्पति विष्णु सूर्य विश्वकर्मा दिनमान को १५ से भाग देने पर, दिन के और राित्र नाम मान को १५ को १५ से भाग देने पर, रात्रि के एक मुहूत्र्त का नाम प्राप्त होता है। गोचर चन्द्र बल—जन्म राशि, जन्म राशि ज्ञान न हो तो नाम राशि से ४—८—१२ स्थानों में गोचर चन्द्र होने पर शुभ कार्यारम्भ करना सुफल दायान नहीं होते। कुछ विद्वान अभिषेक, गर्भाधान, उपनयन, विवाह एवं यात्रा में तो १२ वें चन्द्र को दोष कारक नहीं मानतें। ५४ धूम केतु दर्शन, उल्कापात आदि दिव्य उत्पात, गंधर्वनगर आदि अंतरिक्ष उत्पात और भूकम्पादि भौम उत्पात सभी शुभ कार्यों में वर्जित माने हैं। ऐसे अप्रत्यशित उत्पातों का पूर्व ज्ञान देने वाली कोई पद्धति का भी स्पष्ट ज्ञान भी नहीं है। परम्परा मुहूत्र्त शास्त्री भी इन उत्पातों को नहीं विचारतें। ५५ मंगलभिलाषी के परिवार में किसी निकटतम सगोत्र सम्बन्धी की मृत्यु से उत्पन्न मृता शौच (प्रतिवूâलता दोष) में शुभ कार्य न करना का धर्म शास्त्र आदेश देते हैं। इन की शुद्धि के अन्तर ही मंगल कृत्य करना चाहिए। यदि आपात स्थितिवश ऐसा करना सम्भव न हो तो अपने स्थानय समाज से विचार करें जैसे कहें वैसा करे या श्री पूजा विनायक शान्ति आदि करके मांगलिक कार्य सम्पन्न किया जा सकता है। उपरोक्त सर्वत्र वज्र्य दोष के अन्तर्गत दोषों का कुछ विस्तार सहित वर्णन किया। उपरोक्त दोष ऐसे हैं—जिनका विचार सभी मुहूर्तों के निर्णय में विद्वानाचार्यों को अनिवारर्यरूप से करना चाहिए। अगले अंकों में हम आपको कभी छोटे कभी बडे मुहूर्तों में जो वज्र्य विशेष दोष है। (जिनकी चर्चा उपरोक्त दोषों में नहीं है) उनका मुहूर्तों के साथ साथ वर्णन करेंगे। उपरोक्त दोषों में अनेक ऐसे दोष भी है जिन्हें किसी मुहूर्त विशेष में निश्चित कालावधि या अन्य किसी कारण से विचारना सम्भव नहीं होता। इन दोषों की उपेक्षा करनी पड़ती है। ऐसा मुहूर्त शास्त्र का निर्देश भी है। उदाहरणार्थ :— बीगर्भाधान, पुसवन आदि गर्भाधान संस्कार सीमित ऋतुकाल से सम्बद्ध हैं। अत: यहाँ गुरु—शुक्रास्त, अधिक मास आदि दोषों का विचार सम्भव नहीं। पुनवस संस्कार गर्भ के तीसरे मास में किया जाता है गुरु—शुकास्त आदि हो तो भी इस संस्कार को करना ही पड़ता है। अगले अंक का इन्तजार करें।