हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2018 में दो ज्येष्ठ माह होंगे। खास बात यह रहेगी कि अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से साल के 365 दिन और 12 माह के बीच ही तिथियों की घटा-बढ़ी में ये दो ज्येष्ठ और इसके 13 माह समाहित रहेंगे। वर्ष 2018 में ज्येष्ठ तो 30 अप्रैल से प्रारंभ हो जाएगा, लेकिन अधिकमास की अवधि 16 मई से 13 जून तक रहेगी। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। प्राय: हर तीसरे वर्ष में अधिकमास होता है। इस अवधि में शुभ कार्य नहीं होंगे, लेकिन धार्मिक अनुष्ठान व कथा आदि के आयोजन किए जा सकेंगे। इसके पहले वर्ष 2015 में दो आषाढ़ का अधिकमास था। अब वर्ष 2018 के बाद 2020 में अधिकमास होगा। खास बात यह है कि दो ज्येष्ठ वाला अधिकमास 10 साल बाद आ रहा है। इसके पूर्व वर्ष 2007 में ज्येष्ठ में अधिकमास का योग बना था। दूसरी ओर अंग्रेजी कैलेंडर से आगामी नया वर्ष एक जनवरी सोमवार को शुरू होगा और इसके आखिरी दिन 31 दिसंबर को भी सोमवार ही रहेगा। हिंदू पंचांग के हिसाब से हर तीसरे वर्ष में अधिकमास होता है। वर्ष 2018 में 16 मई से 13 जून तक की अवधि अधिकमास की रहेगी। वैसे ज्येष्ठ माह इसके पूर्व 30 अप्रैल से प्रारंभ होकर 27 जून तक रहेगा, परंतु कृष्ण और शुक्ल पक्ष के दिनों के मान से अधिकमास मई व जून के मध्य भाग में रहेगा। सौरमास 12 और राशियां भी 12 होती हैं। जब दो पक्षों में संक्रांति नहीं होती, तब अधिकमास होता है। अधिकमास शुक्ल पक्ष से प्रारंभ होकर कृष्ण पक्ष में समाप्त होता है। आमतौर पर यह स्थिति 32 माह और 16 दिन और 36 सेकंड में एक बार यानी हर तीसरे वर्ष में बनती है। ऐसा सूर्य व पृथ्वी की गति में होने वाले परिवर्तन से तिथियों का समय घटने-बढ़ने के कारण होता है। पंडित प्रफुल्ल भट्ट का कहना है कि अधिकमास में धार्मिक अनुष्ठान व कथा आदि के आयोजन किए जाते हैं, परंतु इस अवधि में विवाह व अन्य कोई शुभ कार्य नहीं होते हैं। चंद्रमास में 354 व सौरमास 365 दिन ज्योतिष में चंद्रमास 354 दिन व सौरमास 365 दिन का होता है। इस कारण हर साल 11 दिन का अंतर आता है, जो 3 साल में एक माह से कुछ ज्यादा होता है। चंद्र और सौर मास के अंतर को पूरा करने के लिए धर्म शास्त्रों में अधिकमास की व्यवस्था की गई है।
ज्योतिष समाधान
Thursday, 8 March 2018
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2018 में दो ज्येष्ठ माह होंगे।
सोमवार व शुक्रवार की भद्रा को कल्याणी, शनिवार की भद्रा को वृश्चिकी, गुरुवार की भद्रा को पुण्यवती तथा रविवार, बुधवार, मंगलवार की भद्रा को भद्रिका कहते हैं। इसमें शनिवार की भद्रा विशेष अशुभ होती है।
पूर्वार्द्ध की भद्रा दिन में व उत्तरार्द्ध की भद्रा रात्रि में त्याज्य है। यहां विशेष बात यह है कि भद्रा का मुख भाग ही त्याज्य है जबकि पुच्छ भाग सब कार्यों में शुभफलप्रद है। भद्रा के मुख भाग की 5 घटियां अर्थात 2 घंटे त्याज्य है। इसमें किसी भी प्रकार का शुभकार्य करना वर्जित है। पुच्छ भाग की 3 घटियां अर्थात 1 घंटा 12 मिनट शुभ हैं। सोमवार व शुक्रवार की भद्रा को कल्याणी, शनिवार की भद्रा को वृश्चिकी, गुरुवार की भद्रा को पुण्यवती तथा रविवार, बुधवार, मंगलवार की भद्रा को भद्रिका कहते हैं। इसमें शनिवार की भद्रा विशेष अशुभ होती है।
Wednesday, 7 March 2018
प्रतिष्ठा के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं-
मंदिर में प्रतिमा की प्रतिष्ठा के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं-
शुभ वार- देव प्रतिष्ठा मुहूर्त के लिए सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शुभ हैं।
शुभ तिथि- शुक्लपक्ष की 1, 2, 5,10, 13, 15 वीं तिथि शुभ हैं।
मतांतर से कृष्णपक्ष 1, 2, 5वीं तिथि भी शुभ मानी गई है।
शुभ नक्षत्र- पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, हस्त, रेवती, रोहिणी, अश्विनी, मूला, श्रवण, धनिष्ठा व पुनर्वसु नक्षत्र शुभ हैं।
इसके अतिरिक्त उत्तरायण के सूर्य में गुरु, शुक्र और मंगल भी बली होना चाहिए।
लग्न शुद्धि- स्थिर व द्विस्वभाव लग्न हो केंद्र व त्रिकोण में शुभ ग्रह एवं 3,6,11वें पाप ग्रह हों।
अष्टम में कोई पाप ग्रह हो।
देवशयन, मलमास, गुरु-शुक्र अस्त व निर्बल चंद्र कदापि नहीं होना चाहिए।
शिवलिंग स्थापना के लिए शिववास भी देखना शुभ होता है।
मिथुन लग्न में विष्णु, महादेव तथा सूर्य की स्थापना करनी चाहिए। कन्या लग्न में कृष्ण की, कुंभ लग्न में ब्रह्मा की, द्विस्वभाव लग्नों में देवियों की स्थापना करनी चाहिए। चार लग्नों में योगिनियों की और स्थिर लग्नों में सर्व देवताओं की स्थापना करना शुभ है।
देव स्थापना के विशेष लग्न्: स्थाप्यों हिरिर्दिन करो मिथुने महैर्शो।
नारायणश्च युवतौ घटके विधाता।।
देव्यो द्विमृत्तं भवनेषु नि वेशंनीयाः।
क्षुद्राश्चरे स्थिरगृहै निलिखलाश्चः देवाः।।
मिथुन लग्न में विष्णु, महादेव तथा सूर्य की स्थापना करनी चाहिए। कन्या लग्न में कृष्ण की, कुंभ लग्न में ब्रह्मा की, द्विस्वभाव लग्नों में देवियों की स्थापना करनी चाहिए। चार लग्नों में योगिनियों की और स्थिर लग्नों में सर्व देवताओं की स्थापना करना शुभ है।
लिंग स्थापन तु कत्र्तव्यं शिशिरादावृतुत्रये। प्रावृषि स्थापित लिंग भवेद् वरयोगदम्।
हैमंते ज्ञानदं चैव शिशिरे सर्वभूतिदम्।
लक्ष्मीप्रदं वसंते च ग्रीष्मे च लिंगसयारोपणंमतम्।।
यतीनां सर्वकाले च लिंगसयारोपणंमतम्।। श्रेष्ठोत्तरे प्रतिष्ठा स्याउयनेमुक्ति मिच्छताम्।।
दक्षिणे तु मुमुक्षूणां मलमासे न सा द्वयोः।।
माघ, फाल्गुन-वैशाख-ज्येष्ठाषाढेषु पंचसु। प्रतिष्ठा शुभदाप्रोक्ता सर्वसिद्धिः प्रजायते।।
श्रावणे च नभस्ये च लिंग स्थापनमुत्तमम्।
देव्याः माघाश्विने मासेअव्युत्तमा सर्वकामदा।।
माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ तथा आषाढ़ महीनों में शिव जी की प्रतिष्ठा सब प्रकार से सिद्धि देने वाली कही गयी है।
श्रावण महीना भी शुभ है। ऋतुओं की दृष्टि से हेमंत ऋतु में शिव लिंग की स्थापना से यजमान और भक्तों को विशेष ज्ञान की प्राप्ति होती है। शिशिर में शुभ, किंतु बसंत ऋतु में शिव मंदिर की प्रतिष्ठा विशेष धनदायक साबित होती है, जबकि ग्रीष्म ऋतु में यह प्रतिष्ठा शांति, शीतलता और विजयप्रदाता कही गयी है।
इस प्रकार भगवती जगदम्बा की प्रतिष्ठा माघ एवं अश्विन में सर्वश्रेष्ठ फल देने वाली उत्तम कही गयी है।
चैत्रे वा फाल्गुने मासे ज्येष्ठे वा माधवे तथा।
माघे वा सर्वदेवानां प्रतिष्ठा शुभदा सिते।
रिक्तान्य तिथिषु स्यात्सवारे भौमान्यके तथा।।
हेमाद्रि के कथनानुसार
: विष्णु प्रतिष्ठा माघे न भवति।
माघे कर्तुः विनाशः स्यात्।
फाल्गुने शुभदा सिता।।
देवी प्रतिष्ठा मुहूर्तः
सर्व देवताओं की प्रतिष्ठा चैत्र, फाल्गुन, ज्येष्ठ, वैशाख और माघ मास में करना शुभ है।
श्राविणे स्थापयेल्लिंग आश्विनै जगदंबिकाम्। मार्गशीर्ष हरि चैव, सर्वान् पौषेअपि केचन्।। -
मुहूर्तगणपति श्रावण में शंकर की स्थापना करना, आश्विन में जगदंबा की स्थापना करना, मार्गशीर्ष में विष्णु की स्थापना करना और पौष मास में किसी भी देवता की स्थापना करना शुभ है।
हस्त्र, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, ज्येष्ठ, मूल, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, रोहिणी एवं मार्गशीर्ष में सभी देवताओं की, खास कर देवी की, प्रतिष्ठा शुभ है।
यद्दिनं यस्य देवस्य तद्दिने संस्थितिः। -
वशिष्ठ संहिता जिस देव की जो तिथि हो, उस दिन उस देव की प्रतिष्ठा करनी चाहिए।
शुक्ल पक्ष की तृतीया, पंचमी, चतुर्थी, षष्ठी, सप्तमी, नवमी, दशमी, द्वादशी, त्रयोदशी एवं पूर्णिमा
तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी एवं चतुर्दशी दैवी कार्य के लिए सब मनोरथों को देने वाली है।
शुक्ल पक्ष में और कृष्ण पक्ष की दसवीं तक प्रतिष्ठा शुभ रहती है।
इसी प्रकार, शनि, रवि और मंगल को छोड़ कर, अन्य सभी वारों में यज्ञ कार्य एवं देव प्रतिष्ठा शुभ कहे गये है।
Thursday, 1 March 2018
मुख्यतः यज्ञ मंडप मे सोलह स्तंभ होते है।।
मुख्यतः यज्ञ मंडप मे सोलह स्तंभ होते है।।
जिसकी पूजा यज्ञोमे बतायी गई है ,जिसमे एक एक स्तंभ के एक एक देव भी है।।,,,,,
इस सोलह स्तंभो के नाम इस प्रकार है,
,, शुभद ।। विजय ।। कृष्ण ।। श्रीमान ।। मंगल ।। गुरू ।। जय ।। धनद ।। कल्याणी ।।शुभ ।। शान्त ।। मनोहर ।। ऋद्धि ।। सिद्धि ।। विचित्र ।। दिव्य रूप ।। ,
,,,,, शुभदं विजयं कृष्णं श्रमंतं मंगलं गुरूम्।
जयं धनदकल्याणी शुभं शान्तं मनोहरम्।।
ऋद्धिं सिद्धिं विचित्रं च दिव्यरूपमनुक्रमात्। मंडपस्तंभनामानि षोडशैतान्यसंशयः।।
9893946810
Saturday, 24 February 2018
मंगल दोष रद्द
मंगल दोष रद्द,
उदाहरण 1
मेष लग्न की कुंडली
अब इस कुंडली में मंगल पहले, चौथे, आठवें और बारवें भाव में हुआ तो मंगल दोष खुद ब खुद रद्द हो जाएगा
क्योंकि मेष राशि व वृश्चिक राशि मंगल की अपनी राशि है और अपनी राशि का मंगल मांगलिक दोष नहीं देता।
इस कुंडली में चौथे भाव में बैठा मंगल चंद्रमा की कर्क व बारहवें भाव में बैठा मंगल बृहस्पति की राशि में हैै।
लिहाजा मेष लग्न में छः में से चार घरों पर बैठे मंगल पर मागलिक दोष रद्द हो गया है।
इस लग्न में सिर्फ दूसरे व सातवें भाव में बैठे मंगल पर ही मांगलिक दोष बनता है।
उदाहरण 2
इस दूसरे उदाहरण में जातक की कुंडली चार राशि यानि कि
कर्क लग्न की है। कर्क और सिंह लग्न
में मंगल एक केंद्र और एक त्रिकोण का मालिक होकर योगा कारक ग्रह हो जाता है।
लिहाजा कर्क और सिंह लग्न की कुंडली में जातक को मांगलिक दोष नहीं लगता।
इस कुंडली में मंगल पांचवें (त्रिकोण में वृश्चिक राशि) और दसवें (केंद्र में मेष राशि) का स्वामी है लिहाजा यहां मंगल दोष नहीं लगेगा।
उदहारण 3
ये तीसरी कुंडली मीन लग्न की है और इस कुंडली में लग्न का स्वामी बृहस्पति है और बृहस्पति मजबूत हो कर अपनी राशि में लग्न में बैठा है।
लिहाजा इस लग्न में लग्न के मंगल पर मांगलिक दोष नहीं लगेगा।
मीन लग्न में दूसरे भाव में बैठा मंगल अपनी मेष राशि में आ जाएगा।
लिहाजा दूसरे घर के मंगल पर भी मांग्लिक दोष रद्द हो जाएगा।
इसी लग्न में चौथे भाव में बैठा मंगल बुद्ध की राशि मिथुन में आ गया है लिहाजा यहां भी मंगल दोष नहीं लगेगा।
सातवें घर में मंगल के साथ चंद्रमा है और मंगल पर बृहस्पति की दृष्टि भी है। लिहाजा सातवें घर के मांगल का मांगलिक दोष भी रद्द हो गया है। उदहारण 4
तुला लग्न की इस चौथी कुंडली में लग्न में बैठा मंगल सूर्य के साथ है लिहाजा लग्न का मांगलिक दोष रद्द हो गया है।
इस कुंडली में चौथे भाव में बैठा मंगल मकर राशि में जाकर उच्च का मंगल हो गया है और बुध के साथ बैठा है लिहाजा यहां चौथे भाव के मंगल से मांगलिक दोष नहीं लगेगा।
यहां आठवें भाव में मगल शनि और बारवें भाव में मंगल राहू के साथ बैठा है लिहाजा मांगलिक दोष यहां भी रद्द हो जाएगा।
ऐसे भी रद्द हो जाता है
मांगलिक दोष कुंभ लग्न की कुंडली में मंगल यदि चौथे और आठवें घर में हो तो मांगलिक दोष नहीं लगता।
लग्न में शुभ बृहस्पति या शुक्र बैठें हों तो मांगलिक दोष रद्द हो जाता है।
धनु और मीन लग्न की कुंडली में आठवें घर में बैठे मंगल से मांगलिक दोष नहीं लगता। बाहरवें घर में मंगल यदि शुक्र की राशि वृष या तुला में हो तो मंगल दोष नहीं लगता।
दूसरे घर में मिथुन या कन्या राशि में बैठा मंगल भी मांगलिक दोष नहीं देता।
भू रुदन :- हर महीने की अंतिम घडी, वर्ष का अंतिम् दिन, अमावस्या, हर मंगल वार को भू रुदन होता हैं । अतः इस काल को शुभ कार्य भी नही लिया जाना चाहिए । यहाँ महीने का मतलब हिंदी मास से हैं और एक घडी मतलब 24 मिनिट हैं । अगर ज्यादा गुणा न किया जाए तो मास का अंतिम दिन को इस आहुति कार्य के लिए न ले।
भू रुदन :-
हर महीने की अंतिम घडी, वर्ष का अंतिम् दिन, अमावस्या, हर मंगल वार को भू रुदन होता हैं । अतः इस काल को शुभ कार्य भी नही लिया जाना चाहिए । यहाँ महीने का मतलब हिंदी मास से हैं और एक घडी मतलब 24 मिनिट हैं । अगर ज्यादा गुणा न किया जाए तो मास का अंतिम दिन को इस आहुति कार्य के लिए न ले।
भू रजस्वला :-
इस का बहुत ध्यान रखना चाहिए ।यह तो हर व्यक्ति जानता हैं की मकरसंक्रांति लगभग कब पड़ती हैं । अगर इसका लेना देना मकर राशि से हैं तो इसका सीधा सा तात्पर्य यह हैं की हर महीने एक सूर्य संक्रांति पड़ती ही हैं और यह एक हर महीने पड़ने वाला विशिष्ट साधनात्मक महूर्त होता हैं । तो जिस भारतीय महीने आपने आहुति का मन बनाया हैं ठीक उसी महीने पड़ने वाली सूर्य संक्रांति से (हर लोकलपंचांग मे यह दिया होता हैं । लगभग 15 तारीख के आस पास यह दिन होता हैं । मतलब सूर्य संक्रांति को एक मान कर गिना जाए तो 1, 5, 10, 11, 16, 18, 19 दिन भू रजस्वला होती हैं ।
भू शयन :-
आपको सूर्य संक्रांति समझ मे आ गयी हैं तो किसी भी महीने की सूर्य संक्रांती से 5, 7, 9, 15, 21 या 24 वे दिन को भू शयन माना जाया हैं । सूर्य जिस नक्षत्र पर हो उस नक्षत्र से आगे गिनने पर 5, 7,9, 12, 19, 26 वे नक्षत्र मे पृथ्वी शयन होता हैं । इस तरह से यह भी काल सही नही हैं । अब समय हैं यह जानने का कि भू हास्य क्या है ?
भू हास्य :- तिथि मे पंचमी ,दशमी ,पूर्णिमा । वार मे – गुरु वार । नक्षत्र मे – पुष्य, श्रवण मे पृथ्वी हसती हैं । अतः इन दिनों का प्रयोगकिया जाना चाहिए । गुरु और शुक्र अस्त :- यह दोनों ग्रह कब अस्त होते हैं और कब उदित । आप लोकल पंचांग मे बहुत ही आसानी से देख सकते हैं और इसका निर्धारण कर सकते हैं । अस्त होने का सीधा सा मतलब हैं की ये ग्रह सूर्य के कुछ ज्यादा समीप हो गए और अब अपना असर नही दे पा रहे हैं ।