ज्योतिष समाधान

Saturday, 18 November 2017

"हम आज बात कर रहें है शमी के पौधे की। हिन्दू धर्म में शमी के पौधे को बहुत ही पूजनीय माना जाता है।

"हम आज बात कर रहें है शमी के पौधे की।
हिन्दू धर्म में शमी के पौधे को बहुत ही पूजनीय माना जाता है।

नवरात्रे तक में देवी की पूजा में शमी के पौधे का उपयोग होता है।

महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास में अपने हथियार शमी वृक्ष में ही छुपाये थे।

न्याय के देवता शनि देव को खुश करने के उपाए में एक उपाय है शमी के वृक्ष की पूजा।

शमी के पौधे को घर में लगा कर प्रत्येक शनिवार उसकी पूजा करनी चाहिए। शमी का पौधा अपने घर पर लगाने की सबसे अच्छी तिथि शनि जयंती का दिन है।

वैसे आप इसे शनिवार के दिन भी घर पर स्थापित कर सकते हैं।

इस पौधे को अपने घर के उत्तर पूर्व दिशा में लगाना चाहिए शनि देव का प्रिय पौधा होता है जिस घर में वहां नहीं आती कभी दरिद्रता

चूडामणि” का अदभुत रहस्य


*(रहस्यमयी “चूडामणि” का अदभुत रहस्य )*

आज रामायण में वर्णित चूडामणि की प्रस्तुत है । इस कथा में आप जानेंगे की-
१–कहाँ से आई चूडा मणि ?
२–किसने दी सीता जी को चूडामणि ?
३–क्यों दी लंका में हनुमानजी को सीता जी ने चूडामणि

*मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा ।जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा ॥*
*चूडामनि उतारि तब दयऊ ।हरष समेत पवनसुत लयऊ ॥*

  ( चूडामणि कहाँ से आई? )

सागर मंथन से चौदह रत्न निकले, उसी समय सागर से दो देवियों का जन्म हुआ –
१– रत्नाकर नन्दिनी
२– महालक्ष्मी
*' रत्नाकर नन्दिनी ने अपना तन मन श्री हरि ( विष्णु जी ) को देखते ही समर्पित कर दिया  ! जब उनसे मिलने के लिए आगे बढीं तो सागर ने अपनी पुत्री को विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्य रत्न जटित चूडा मणि प्रदान की ( जो सुर पूजित मणि से बनी ) थी ।'*
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         इतने में महालक्ष्मीजी का प्रादुर्भाव हो गया और लक्ष्मीजी ने विष्णु जी को देखा और मनही मन वरण कर लिया यह देखकर रत्नाकर नन्दिनी मन ही मन अकुलाकर रह गईं सब के मन की बात जानने वाले *" श्रीहरि रत्नाकर नन्दिनी के पास पहुँचे और धीरे से बोले - ' मैं तुम्हारा भाव जानता हूँ, पृथ्वी को भार- निवृत करने के लिए जब – जब मैं अवतार ग्रहण करूँगा, तब-तब तुम मेरी संहारिणी शक्ति के रूपमे धरती पे अवतार लोगी, सम्पूर्ण रूप से तुम्हे कलियुग मे श्रीकल्कि रूप में अंगीकार करूँगा  । अभी सतयुग है तुम त्रेता, द्वापरमें, त्रिकूट शिखरपर, ' वैष्णवी ' नाम से अपने अर्चकों की मनोकामना की पूर्ति करती हुई तपस्या करो । तपस्या के लिए बिदा होते हुए रत्नाकर नन्दिनी ने अपने केश पास से चूडामणि निकाल कर निशानी के तौर पर श्री विष्णु जी को दे दी '* वहीं पर साथ में इन्द्रदेव खडे थे, इन्द्र चूडामणि पाने के लिए लालायित हो गये, विष्णु जी ने वो चूडा मणि इन्द्रदेव को दे दी, इन्द्रदेव ने उसे *' इन्द्राणी के जूडे में स्थापित कर दिया'* ।
           शम्बरासुर नाम का एक असुर हुआ जिसने स्वर्ग पर चढाई कर दी इन्द्र और सारे देवता युद्ध में उससे हार के छुप गये कुछ दिन बाद इन्द्रदेव अयोध्या राजा दशरथ के पास पहुँचे सहायता पाने के लिए इन्द्र की ओर से राजा दशरथ कैकेई के साथ शम्बरासुर से युद्ध करने के लिए स्वर्ग आये और युद्ध में शम्बरासुर दशरथ के हाथों मारा गया ।
           युद्ध जीतने की खुशी में इन्द्र देव तथा इन्द्राणी ने दशरथ तथा कैकेई का भव्य स्वागत किया और उपहार भेंट किये । इन्द्र देव ने दशरथ जी को ” स्वर्ग गंगा मन्दाकिनी के दिव्य हंसों के चार पंख प्रदान किये ।*' इन्द्राणी ने कैकेई को वही " दिव्य चूडामणि " भेंट की और वरदान दिया जिस नारी के केशपास में ये चूडामणि रहेगी उसका सौभाग्य अक्षत–अक्षय तथा अखन्ड रहेगा, और जिस राज्य में वो नारी रहे गी उस राज्य को कोई भी शत्रु पराजित नही कर पायेगा । उपहार प्राप्त कर राजा दशरथ और कैकेई अयोध्या वापस आ गये ।" रानी सुमित्रा के अदभुत प्रेम को देख कर कैकेई ने वह चूडामणि सुमित्रा को भेंट कर दी "। इस चूडामणि की समानता विश्वभर के किसी भी आभूषण से नही हो सकती । '*
         जब श्री राम जी का व्याह माता सीता के साथ सम्पन्न हुआ । सीता जी को व्याह कर श्री राम जी अयोध्या धाम आये सारे रीति- रिवाज सम्पन्न हुए । तीनों माताओं ने मुह दिखाई की प्रथा निभाई । सर्व प्रथम *'रानी सुमित्रा ने मुँहदिखाई में "सीताजी को वही चूडामणि प्रदान कर दी । कैकेई ने सीता जी को मुँह दिखाई में कनक भवन प्रदान किया । अंत में कौशिल्या जी ने सीता जी को मुँह दिखाई में प्रभु श्री राम जी का हाथ सीता जी के हाथ में सौंप दिया । संसार में इससे बडी मुँह दिखाई और क्या होगी । जनकजीने सीताजी का हाथ राम को सौंपा और कौशिल्याजीने राम का हाथ सीता जी को सौंप दिया ।'*

राम की महिमा राम ही जाने हम जैसे तुक्ष दीन हीन अग्यानी व्यक्ति कौशिल्या की सीताराम के प्रति ममता का बखान नही कर सकते ।
        सीताहरण के पश्चात माता का पता लगाने के लिए जब हनुमान जी लंका पहुँचते हैं हनुमान जी की भेंट अशोक वाटिका में सीता जी से होती है। हनुमान जी ने प्रभु की दी हुई मुद्रिका सीतामाता को देते हैं और कहते हैं –
*मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा ।जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा॥*
*चूडामणि उतारि तब दयऊ ।हरष समेत पवन सुत लयऊ॥*
                सीता जी ने वही चूडा मणि उतार कर हनुमान जी को दे दी, यह सोंच कर *'यदि मेरे साथ ये चूडामणि रहेगी तो रावण का बिनाश होना सम्भव नही है ।'* हनुमान जी लंका से वापस आकर वो चूडामणि भगवान श्रीरामजी को दे कर माताजी के वियोग का हाल बताया ।

                  ॥ जय जय श्रीसीताराम जी ॥
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Monday, 13 November 2017

शनि अमावस्या के दिन ( साढेसाती* ढैया  *अढैया*) वालो को श्री शनिदेव की आराधना करने  का  मौका  आया। है । 18 नवम्बर 2017 को शनिवार के दिन शनि अमावस्या मनाई जानी है, यह पितृकार्येषु अमावस्या के रुप में भी जानी जाती है. कालसर्प योग, ढैय्या तथा साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी अनेक बाधाओं से मुक्ति पाने का यह दुर्लभ समय होता


शनि अमावस्या के दिन
( साढेसाती* ढैया  *अढैया*)
वालो को श्री शनिदेव की आराधना करने  का  मौका  आया। है । 18 नवम्बर 2017 को शनिवार के दिन शनि अमावस्या मनाई जानी है, यह पितृकार्येषु अमावस्या के रुप में भी जानी जाती है.
कालसर्प योग, ढैय्या तथा साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी अनेक बाधाओं से मुक्ति पाने का यह दुर्लभ समय होता

भविष्यपुराण के अनुसार शनिश्चरी अमावस्या शनिदेव को अधिक प्रिय रहती है।
शनि अमावस्या का दिन संकटों के समाधान के लिए विशेष महत्व रखता है।

शनि की शांति तथा कृपा के लिए ये निर्दिष्ट उपाय कर सकते हैं।  
* शनिवार का व्रत रखें।   
* व्रत के दिन शनिदेव की पूजा (कवच, स्तोत्र, मंत्र जप) करें। 
  * शनिवार व्रत कथा पढ़ना भी लाभकारी रहता है।   
* व्रत में दिन में दूध, लस्सी तथा फलों के रस ग्रहण करें।   

    * सायंकाल हनुमानजी या भैरवजी का दर्शन करें।   
* काले उड़द की खिचड़ी (काला नमक मिला सकते हैं) या उड़द की दाल का मीठा हलवा ग्रहण करें।  
* शनि की प्रसन्नता के लिए उड़द, तेल, इन्द्रनील (नीलम), तिल, कुलथी, भैंस, लोह, दक्षिणा और श्याम वस्त्र दान करें। 

  * किसी भी शनि मंदिरों में शनि की वस्तुओं जैसे काले तिल, काली उड़द, काली राई, काले वस्त्र, लौह पात्र तथा गुड़ का दान करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है।    

    * शनिवार को अपने हाथ की नाप का 19 हाथ काला धागा माला बनाकर पहनें।  

* शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल या नाव की सतह की कील का बना छल्ला मध्यमा में धारण करें।  

* प्रति शनिवार सुरमा, काले तिल, सौंफ, नागरमोथा और लोध मिले हुए जल से स्नान करें।  
* शनिवार को सायंकाल पीपल वृक्ष के चारों ओर 7 बार कच्चा सूत लपेटें, इस समय शनि के किसी मंत्र का जप करते रहें।

फिर पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक प्रज्ज्वलित करें तथा ज्ञात अज्ञात अपराधों के लिए क्षमा मांगें।  
हे विघ्नघ्न गणेश सूर्य हनुमन् हे राम कृष्णप्रभो!
हे विष्णो शिवशंकर प्रियसुरा: चन्द्रा: ग्रहा: तारका:!।
हे विप्रा: श्रुतिपारगा: गुरुवरा:  सत्स्नेहिन: सज्जना:!
आयान्तु प्रबुधा: विवाहविविधौ यच्छन्तु भव्याशिष:।।
                  
हे विघ्न हन्ता श्रीगणेश जी, हे सूर्य देव हेसश्रीहनुमान प्रभु हे भगवान श्रीराम एवं श्रीकृष्ण प्रभु हे श्रीविष्णु जी हे शिवशंकर महादेव जी एवं समस्त देवगण! हे चन्द्र ग्रह तारकगण! हे ब्राह्मण देवता हे श्रुति शास्त्र पारंगत मेरे समस्त गुरुवर!

संपर्क 

गुरुदेव 

भुबनेश्वर

पर्णकुटी गुना 

9893946810

Tuesday, 24 October 2017

लग्न से संबंधित व्यवसाय दिए जा रहे हैं जिनमें जातक को पूर्ण सफलता मिलती है तथा धन एवं सम्पत्ति को प्राप्त करता है :

यहां प्रत्येक लग्न से संबंधित व्यवसाय दिए जा रहे हैं जिनमें जातक को पूर्ण सफलता मिलती है तथा धन एवं सम्पत्ति को प्राप्त करता है :

मेष लग्न वाले जातक को इंजीनियरिंग, सेना, पुलिस, मिलिट्री, वकालत, चिकित्सक, ड्राइविंग, कम्प्यूटर जौहरी, अग्नि संबंधी व्यवसाय आदि में सफलता मिलती है।

वृष लग्न वाले जातकों के लिए कृषि, अध्यापन, कला, सजावट, विलासिता की वस्तुएं, चित्रकारी, कशीदाकारी, कलात्मक वस्तुएं, संगीत, सिनेमा, नृत्य, नाटक, अभिनय, गायक, फैशन, पेंटिंग, धातु का व्यापार, होटल या बर्फ के कारोबार अत्यधिक लाभदायक हैं।

मिथुन लग्न के जातकों के लिए बैंकिंग, लिपिक लेखन, समाचार रिपोर्टर, संपादन, भाषा विशेषज्ञ, एजैंट, अनुवादक, लेखक, उन्नतिकारक सिद्ध होंगे।

कर्क लग्न के जातकों के लिए जल व कांच से संबंधित व्यवसाय उष्ण व शीतल पेय, लांडरी, नाविक, डेयरी फार्म, मेट्रान, गृहिणी, होटल, कारोबार, स्नेकबार, बेकरी उद्योग, बर्फ, जहाज, रसायन विज्ञान सुगंधित पदार्थ, अगरबत्ती, फोटोग्राफी, चित्रकारी, पुरातत्व, इतिहास सामाजिक कार्यकर्ता आदि व्यवसाय सही हैं।

सिंह लग्न के जातकों के लिए राजनयिक, औषधि, स्टाक एक्सचेंज कपड़ा, रूई, कागज, स्टेशनरी, घास, फल, जमीन से प्राप्त पदार्थ, शासक, प्रशासक एवं अधिकारी जेवरात, सर्कस आदि व्यवसायों में लाभ होता है।

कन्या लग्न के जातकों को ज्योतिष, वायु, अध्ययन, अध्यापन, शिक्षक, खुदरा, विक्रेता, लिपिक, रुपयों का लेन-देन, स्वागतकर्ता, बस ड्राइवर, रेडियों-दूरदर्शन के कलाकार, नोटरी, कम्प्यूटर आदि के क्षेत्रों में कार्य करने से लाभ प्राप्त होता है।

तुला लग्न के जातकों को मनोचिकित्सक, अन्वेषक, जासूस, बही खाता रखने वाला, खजांची, बैंक क्लर्क, टाइपिस्ट, लेखा परीक्षक, सेल्स गर्ल पशुओं से उत्पन्न वस्तुएं जैसे दूध, घी, ऊन आदि का कारोबार लाभदायक रहता है।

वृश्चिक लग्न के जातक के लिए कैमिस्ट, डाक्टर, वकील, इंजीनियर, भवन निर्माण, मार्कीटिंग, देश सेवा, टैलीफोन, विद्युत खनिज तेल, नमक, औषधि, घड़ी, रेडियो दार्शनिक, ज्योतिषी, तांत्रिक जासूस एवं परिचारिकाएं के क्षेत्र अनुकूल हैं।

धनु लग्न के जातक अध्यापक, प्राध्यापक, लेखक, संपादक, शिक्षा विभाग, कानून, वकालत, लेखन, कार्य, क्लर्क, उपदेशक, स्वतंत्रता सेनानी, दार्शनिक, धर्म सुधारक, प्रकाशन, दलाली, कमीशन, एजैंट, आयात-निर्यात, खाद्य पदार्थ, चमड़े का व्यापारी, बैंकर आदि बना करते हैं।

मकर लग्न के जातक मैनेजमैंट, बीमा विभाग, बिजली, कमिशन, मशीनरी, ठेकेदारी, सट्टा, आयात-निर्यात, रेडीमेड कपड़ा, राजनीतिक, खिलौना, कृषि, खनन, वन उत्पाद, फार्म का कार्य, बागवानी, खान, विज्ञान, भूगर्भ, विज्ञान, संयोजन, सचिव, बैंकर आदि कार्यों में सफलता पाते हैं।

कुंभ लग्न के जातक शोध कार्य, शिक्षण कार्य, ज्योतिष तांत्रिक, प्राकृतिक, उपचारक, दार्शनिक, एक्स-रे कर्मचारी, चिकित्सकीय, उपकरणों के विक्रेता, टैलीग्राफिस्ट, कम्प्यूटर, वायुयान, मैकेनिक, बीमा, ठेकेदारी, चौकीदार आदि कार्यों में प्रवीणता प्राप्त करते हैं।

मीन लग्न के जातक लेखन, सम्पादन, अध्यापन, लिपिक, पानी, अनाज, दलाली, शेयर, मछली, कमीशन, एजैंट, आयात निर्यात, कोरियोग्राफी, सामाजिक, कार्य संग्रहालय, पुस्तकालय, क्लब संचालन संगीतज्ञ, कवि, तांत्रिक, यात्रा, एजैंट, अनुसंधानकर्ता चिकित्सा, सर्जन, नर्स, जेलर, उपदेशक मंत्री आदि कार्यों में से किसी भी एक को अपना व्यवसाय बनाकर धन एवं यश की प्राप्ति कर सकते हैं।

इस बार देव जागने के 25 दिन बाद भी कोई शुभ मुहूर्त नहीं है. 31 अक्टूबर को देवउठनी एकादशी है, लेकिन 11अक्टूबर से देवगुरु बृहस्पति पश्चिामास्त हैं जो कि देवउठनी एकादशी के बाद 6 नवंबर को पूर्व दिशा में उदित होंगे और आगामी तीन दिन बाल अवस्था में रहने के बाद 10 नवंबर को बालत्व निवृत्ति होगी. 16 नवंबर दिन को 12:39 को सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश करेगा. इन समस्त दोषों की निवृत्ति के पश्चात 19 नवंबर से शादियों की शुरुआत होगी


वर्ष 2017 में तुलसी विवाह 31 अक्टूबर अथवा 1 नवंबर को अपनी –अपनी मान्यतानुसार के दिन किया जायेगा.

1देव उठनी ग्यारस अथवा प्रबोधिनी एकादशी 31 अक्टूबर

2तुलसी विवाह 1 नवम्बर तुलसी विवाह का महत्व तुलसी एक गुणकारी पौधा हैं जिससे वातावरण एवम तन मन शुद्ध होते हैं.

कैसे बना तुलसी का पौधा एवम तुलसी विवाह के पीछे क्या कथा हैं ?

तुलसी, राक्षस जालंधर की पत्नी थी, वह एक पति व्रता सतगुणों वाली नारी थी, लेकिन पति के पापों के कारण दुखी थी| इसलिए उसने अपना मन विष्णु भक्ति में लगा दिया था. जालंधर का प्रकोप बहुत बढ़ गया था, जिस कारण भगवान विष्णु ने उसका वध किया. अपने पति की मृत्यु के बाद पतिव्रता तुलसी ने सतीधर्म को अपनाकर सती हो गई.

कहते हैं उन्ही की भस्म से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ और उनके विचारों एवम गुणों के कारण ही तुलसी का पौधा इतना गुणकारी बना.

तुलसी के सदगुणों के कारण भगवान विष्णु ने उनके अगले जन्म में उनसे विवाह किया.

इसी कारण से हर साल तुलसी विवाह मनाया जाता है|

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तिथि प्रारम्भ = ३०/अक्टूबर/२०१७ को १९:०३ बजे |

एकादशी तिथि समाप्त = ३१/अक्टूबर/२०१७ को १८:५५ बजे |

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4 महीने बाद खत्म होगा भगवान विष्णु का शयनकाल,

ऐसे करें पूजा भगवान विष्णु चार महीने के बाद जागते हैं तो तुलसी के पौधे से उनका विवाह होता है.

देवउठनी एकादशी को तुलसी विवाह उत्सव भी कहा जाता है.

देवउठनी एकादशी के बाद सभी तरह के शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं.

खास बातें देवउठनी एकादशी के बाद सभी तरह के शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं.

इस बार देव जागने के 25 दिन बाद भी कोई शुभ मुहूर्त नहीं है.

देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक यानी चार महीने भगवान विष्णु शयनकाल की अवस्था में होते हैं और इस दौरान कोई शुभ कार्य जैसे, शादी, गृह प्रवेश या कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है.

31 अक्टूबर को भगवान का शयनकाल खत्म होगा और इसके बाद ही कोई शुभ कार्य होगा. कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की ग्यारस के दिन देवउठनी ग्यारस होती है. इस एकादशी को प्रबोधनी ग्यारस भी कहा जाता है.

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शुभ कार्यों के लिए करना होगा इंतजार देवउठनी 

31 अक्टूबर को देवउठनी एकादशी है, लेकिन 11अक्टूबर से देवगुरु बृहस्पति पश्चिामास्त हैं जो कि देवउठनी एकादशी के सात दिन बाद 6नवंबर को पूर्व दिशा में उदित होंगे और आगामी तीन दिन बाल अवस्था में रहने के बाद 10 नवंबर को बालत्व निवृत्ति होगी. 16 नवंबर को सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश करेगा. इन समस्त दोषों की निवृत्ति के पश्चात 19 नवंबर से शादियों की शुरुआत होगी

शादियों के मुहूर्त इस साल नवंबर में 19, 22, 23, 24, 28, 29 और 30 नवंबर को विवाह के विशिष्ट मुहूर्त हैं.

दिसंबर में 3, 4, 8,9,10, 11 और 12 दिसंबर को विवाह मुहूर्त बन रहे हैं.

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15 दिसंबर 2017 से 14 जनवरी 2018 तक मलमास रहेगा. 

एबम शुक्रास्त 15 दिसम्बर 2017से  3 फरबरी 2018 तक  अस्त रहेगा । इस कारण जनवरी में  कोई विबाह मुहूर्त नही है

22 जनवरी को बसंत पंचमी को देवलग्र होने के कारण विवाह आयोजन कर पाएंगे, लेकिन लग्र शुध्दि के शुभ मुहूर्त फरवरी में ही मिलेंगे.

फरवरी में 4, 5, 7, 8, 9, 11, 18 और 19 तथा मार्च में 3 से 8 और 11 से 13 मार्च को शादियों के मुहूर्त हैं.

तुलसी विवाह, देवउठनी ग्यारस, देव प्रबोधनी एकादशी तिथि मान्यतानुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी जी और विष्णु जी का विवाह कराने की प्रथा है. तुलसी विवाह में तुलसी के पौधे और विष्णु जी की मूर्ति या शालिग्राम पाषाण का पूर्ण वैदिक रूप से विवाह कराया जाता है.

. तुलसी विवाह की विधि

तुलसी विवाह संपन्न कराने के लिए एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए और तुलसी जी के साथ विष्णु जी की मूर्ति घर में स्थापित करनी चाहिए.

तुलसी के पौधे और विष्णु जी की मूर्ति को पीले वस्त्रों से सजाना चाहिए.

पीला विष्णु जी की प्रिय रंग है. तुलसी विवाह के लिए तुलसी के पौधे को सजाकर उसके चारों तरफ गन्ने का मंडप बनाना चाहिए.

तुलसी जी के पौधे पर चुनरी या ओढ़नी चढ़ानी चाहिए. इसके बाद जिस प्रकार एक विवाह के रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह की भी रस्में निभानी चाहिए.

अगर चाहें तो पंडित या ब्राह्मण की सहायता से भी विधिवत रूप से तुलसी विवाह संपन्न कराया जा सकता है अन्यथा मंत्रोच्चारण (ऊं तुलस्यै नम:) के साथ स्वयं भी तुलसी विवाह किया जा सकता है. द्वादशी के दिन पुन: तुलसी जी और विष्णु जी की पूजा कर और व्रत का पारण करना चाहिए. भोजन के पश्चात तुलसी के स्वत: गलकर या टूटकर गिरे हुए पत्तों को खाना शुभ होता है. इस दिन गन्ना, आंवला और बेर का फल खाने से जातक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं.

Gurudev -bhubneshwar shastri
Kasturwa ngar
Parnkuti guna
9893946810

Monday, 16 October 2017

दीपावली पर श्री लक्ष्मी पूजा मुहूर्त सहित पांचो दिनों के लिए मुहूर्त 1-व्यापार पूजन मुहूर्त -व्यपारियो को स्याही भरने का कलम दवात सवारने का मुहूर्त -व्यपारियो के लिए गादी स्थापना के लिए मुहूर्त -पर्णकुटी गुना से लिंक ओपन करे

पाँच दिन का दीवाली उत्सव धनत्रयोदशी के दिन प्रारम्भ होता है और भाई दूज तक चलता है।

19 अक्टूम्बर 2017
लक्ष्मी पूजा, दिवाली पूजा लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिए जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है और लगभग २ घण्टे २४ मिनट तक रहता है।

कुछ स्त्रोत लक्ष्मी पूजा को करने के लिए महानिशिता काल भी बताते हैं।

हमारे विचार में महानिशिता काल तांत्रिक समुदायों और पण्डितों, जो इस विशेष समय के दौरान लक्ष्मी पूजा के बारे में अधिक जानते हैं, उनके लिए यह समय ज्यादा उपयुक्त होता है।

सामान्य लोगों के लिए हम प्रदोष काल मुहूर्त उपयुक्त बताते हैं।

पंडित भुबनेश्वर ने बताया लक्ष्मी पूजा को करने के लिए हम चौघड़िया मुहूर्त को देखने की सलाह नहीं देते हैं क्योंकि वे मुहूर्त यात्रा के लिए उपयुक्त होते हैं।

लक्ष्मी पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है जब स्थिर लग्न प्रचलित होती है।

ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान लक्ष्मी पूजा की जाये तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती है।

इसीलिए लक्ष्मी पूजा के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है।

वृषभ लग्न को स्थिर माना गया है और दीवाली के त्यौहार के दौरान यह अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है।

हम यथार्थ समय उपलब्ध कराते हैं। हमारे दर्शाये गए मुहूर्त के समय में त्रयोदशी तिथि, प्रदोष काल और स्थिर लग्न सम्मिलित होते हैं।

हम स्थान के अनुसार मुहूर्त उपलब्ध कराते हैं इसीलिए आपको पूजा का शुभ समय देखने से पहले अपने शहर का चयन कर लेना चाहिए।

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धनतेरस का दिन धन्वन्तरि त्रयोदशी या धन्वन्तरि जयन्ती, जो कि आयुर्वेद के देवता का जन्म दिवस है, के रूप में भी मनाया जाता है।

धनतेरस पूजा मुहूर्त

(2)प्रदोष काल = 18:03से 20:27

(मतलब):- 06 बजकर 03 मिनिट से 8 बजकर 27 मिनिट तक

वृषभ लग्न काल = 19:36 से 21:32

बृषभ लग्न :-7 बजकर 36मिनिट से  09बजकर 32  मिनिट तक

त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ = १७/अक्टूबर/२०१७ को ००:२६ बजे

मतलव :16 ओर 17 तारीख की रात्रि :12 बजकर  26 मिनिट से प्रारंभ

त्रयोदशी तिथि समाप्त = १८/अक्टूबर/२०१७ को ००:०८ बजे

मतलब :-17 ओर 18 तारीख की रात्रि  12:बजकर 8 मिनिट तक

वृषभ लग्न को स्थिर माना गया है और दीवाली के त्यौहार के दौरान यह अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है।
असामयिक मृत्यु से बचने के लिए मृत्यु के देवता यमराज के लिए घर के बाहर दीपक जलाया जाता है जिसे यम दीपम के नाम से जाना जाता है और इस धार्मिक संस्कार को त्रयोदशी तिथि के दिन किया जाता है।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^-  18 अक्टूम्बर 2017 नरक चतुर्दशी

वास्तविकता में यह दोनों अलग-अलग त्यौहार है और एक ही तिथि को मनाये जाते हैं। यह दोनों त्यौहार अलग-अलग दिन भी हो सकते हैं और यह चतुर्दशी तिथि के प्रारम्भ और समाप्त होने के समय पर निर्भर होता है।

दीवाली के दौरान अभ्यंग स्नान को चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा के दिन करने की सलाह दी गई है।

चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है जिसे नरक चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है।

यह माना जाता है कि जो भी इस दिन स्नान करता है वह नरक जाने से बच सकता है।

अभ्यंग स्नान के दौरान उबटन के लिए तिल के तेल का उपयोग किया जाता है।

अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान लक्ष्मी पूजा से एक दिन पहले या उसी दिन हो सकता है।

जब सूर्योदय से पहले चतुर्दशी तिथि और सूर्योदय के बाद अमावस्या तिथि प्रचलित हो तब नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी पूजा एक ही दिन हो जाते हैं।

अभ्यंग स्नान चतुर्दशी तिथि के प्रचलित रहते हुए हमेशा चन्द्रोदय के दौरान (लेकिन सूर्योदय से पहले) किया जाता है।

अभ्यंग स्नान के लिए मुहूर्त का समय चतुर्दशी तिथि के प्रचलित रहते हुए चन्द्रोदय और सूर्योदय के मध्य का होता है।

नरक चतुर्दशी के दिन को छोटी दीवाली, रूप चतुर्दशी, और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है।
है।

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लक्ष्मी पूजा

19 अक्टूबर २०१७ (बृहस्पतिवार) लक्ष्मी-गणेश पूजा
दिवस बेला:-  व्यपारियो लिए गादी स्थापना मुहूर्त स्याही भरना कलम दवात सबारने हेतु प्रता:रेलवे घड़ी अनुसार
प्रता:06 बजकर 42 मिनिट से 08 बजकर 7 मिनिट तक शुभ बेला
दिवा:-10 बजकर 58 मिनिट से 12 बजकर 23 मिनिट तक चंचल बेला
दिवा:-12 बजकर 00मिनिट से 12बजे तक अभिजीत बेला
दिवा :-12 बजकर 23 मिनिट से 01 बजकर 30 मिनिट तक लाभ बेला
दिवा:-01 बजकर 30 मिनिट से 03 बजे तक राहु काल
शाम:-04 बजकर 38 मिनिट से 06 बजकर 3 मिनिट तक शुभबेला

(2)प्रदोष काल = 18:03से 20:27

(मतलब):- 06 बजकर 03 मिनिट से 8 बजकर 27 मिनिट तक

वृषभ काल = 19:36 से 21:32

बृषभ लग्न :-7 बजकर 36मिनिट से  09बजकर 32  मिनिट तक
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^परिहार समय समाधान सूचक व्यापार पूजन हेतु

ब्रशिचक लग्न :-प्रता:08:54से 11:11तक

कुम्भ लग्न शाम :-03:01 से 04:32 तक

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      रात्रि मुहूर्त :-महानिशिता काल मुहूर्त

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त = 23:40 से 24:31+ *

मतलब :-रात्रि  11 बजकर 40 मिनिट से 12 बजकर 31 मिनीट तक
रात्रिलग्न

सिंह लग्न

मतलव :-रात्रि 02बजकर 04 मिनिट से 04बजकर 21 मिनिट तक

परिहार समय समाधान सूचक

ब्रशिचक लग्न :-प्रता:08:54से 11:11तक
कुम्भ लग्न :-03:01 से 04:32 तक

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तारीख - 20 अक्तूबर 2017, शुक्रवार

व्यपारियो के लिए रोकड़ मिलान
प्रता:08 :से10:58तक लाभ अमृत बेला
दिवा 12:23से1:48तक सु भ बेला
शाम:-4:38 से06 ;03 तक
गोवर्धन पूजा पर्व

तारीख - 20 अक्तूबर 2017, शुक्रवार

गोवर्धन पूजा सुबह का मुहूर्त- सुबह 06:28 बजे से 08:43 बजे तक
दोपहर :-अभिजीत मुहूर्त दिन का आधा भाग
गोवर्धन पूजा शाम का मुहूर्त - 04:27 बजे से सायं 05:42 बजे तक

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21 अक्टूम्बर भाई दोज़

भाई दूज टीका मुहूर्त = 12:45से 03:02

अवधि = 2 घण्टे 16 मिनट्स

द्वितीय तिथि प्रारम्भ = 21/अक्टूबर/2017को 02:07 बजे

द्वितीय तिथि समाप्त = 22/अक्टूबर/2017को 03:30 बजे

Pandit भुबनेश्व र
कस्तूरवानागर पर्णकुटी वुना

09893946810

Saturday, 7 October 2017

पाँच दिन का दीवाली उत्सव धनत्रयोदशी के दिन प्रारम्भ होता है और भाई दूज तक चलता है। 19 अक्टूम्बर २०१७ लक्ष्मी पूजा, दिवाली पूजा लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिए जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है और लगभग २ घण्टे २४ मिनट तक रहता है। लिंक ओपन करे

पाँच दिन का दीवाली उत्सव धनत्रयोदशी के दिन प्रारम्भ होता है और भाई दूज तक चलता है।

19 अक्टूम्बर २०१७ लक्ष्मी पूजा, दिवाली पूजा लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिए जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है और लगभग २ घण्टे २४ मिनट तक रहता है।

कुछ स्त्रोत लक्ष्मी पूजा को करने के लिए महानिशिता काल भी बताते हैं।

हमारे विचार में महानिशिता काल तांत्रिक समुदायों और पण्डितों, जो इस विशेष समय के दौरान लक्ष्मी पूजा के बारे में अधिक जानते हैं, उनके लिए यह समय ज्यादा उपयुक्त होता है।

सामान्य लोगों के लिए हम प्रदोष काल मुहूर्त उपयुक्त बताते हैं।

पंडित भुबनेश्वर ने बताया लक्ष्मी पूजा को करने के लिए हम चौघड़िया मुहूर्त को देखने की सलाह नहीं देते हैं क्योंकि वे मुहूर्त यात्रा के लिए उपयुक्त होते हैं।

लक्ष्मी पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है जब स्थिर लग्न प्रचलित होती है।

ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान लक्ष्मी पूजा की जाये तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती है।

इसीलिए लक्ष्मी पूजा के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है।

वृषभ लग्न को स्थिर माना गया है और दीवाली के त्यौहार के दौरान यह अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है।

हम यथार्थ समय उपलब्ध कराते हैं। हमारे दर्शाये गए मुहूर्त के समय में त्रयोदशी तिथि, प्रदोष काल और स्थिर लग्न सम्मिलित होते हैं।

हम स्थान के अनुसार मुहूर्त उपलब्ध कराते हैं इसीलिए आपको पूजा का शुभ समय देखने से पहले अपने शहर का चयन कर लेना चाहिए।

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धनतेरस का दिन धन्वन्तरि त्रयोदशी या धन्वन्तरि जयन्ती, जो कि आयुर्वेद के देवता का जन्म दिवस है, के रूप में भी मनाया जाता है।

धनतेरस पूजा मुहूर्त = १९:१९ से २०:१७

मतलव : शाम 07 बजकर 19 मिनिट से 08 बजकर 09  बजकर 17 मिनिट तक

अवधि = ० घण्टे ५८ मिनट्स

प्रदोष काल = १७:४५ से २०:१७

मतलब : -शाम 5 बजकर 45 मिनिट से  8 बजकर 17 मिनीट तक

वृषभ  लग्न  :काल = १९:१९ से २१:१४

मतलब:-शाम 07 बजकर 19 मिनिट से 09 बजकर 14 मिनिट तक

त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ = १७/अक्टूबर/२०१७ को ००:२६ बजे

मतलव :16 ओर 17 तारीख की रात्रि :12 बजकर  26 मिनिट से प्रारंभ

त्रयोदशी तिथि समाप्त = १८/अक्टूबर/२०१७ को ००:०८ बजे

मतलब :-17 ओर 18 तारीख की रात्रि  12:बजकर 8 मिनिट तक

वृषभ लग्न को स्थिर माना गया है और दीवाली के त्यौहार के दौरान यह अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है।
असामयिक मृत्यु से बचने के लिए मृत्यु के देवता यमराज के लिए घर के बाहर दीपक जलाया जाता है जिसे यम दीपम के नाम से जाना जाता है और इस धार्मिक संस्कार को त्रयोदशी तिथि के दिन किया जाता है।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^-  18 अक्टूम्बर 2017 नरक चतुर्दशी

वास्तविकता में यह दोनों अलग-अलग त्यौहार है और एक ही तिथि को मनाये जाते हैं। यह दोनों त्यौहार अलग-अलग दिन भी हो सकते हैं और यह चतुर्दशी तिथि के प्रारम्भ और समाप्त होने के समय पर निर्भर होता है।

दीवाली के दौरान अभ्यंग स्नान को चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा के दिन करने की सलाह दी गई है।

चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है जिसे नरक चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है।

यह माना जाता है कि जो भी इस दिन स्नान करता है वह नरक जाने से बच सकता है।

अभ्यंग स्नान के दौरान उबटन के लिए तिल के तेल का उपयोग किया जाता है।

अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान लक्ष्मी पूजा से एक दिन पहले या उसी दिन हो सकता है।

जब सूर्योदय से पहले चतुर्दशी तिथि और सूर्योदय के बाद अमावस्या तिथि प्रचलित हो तब नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी पूजा एक ही दिन हो जाते हैं।

अभ्यंग स्नान चतुर्दशी तिथि के प्रचलित रहते हुए हमेशा चन्द्रोदय के दौरान (लेकिन सूर्योदय से पहले) किया जाता है।

अभ्यंग स्नान के लिए मुहूर्त का समय चतुर्दशी तिथि के प्रचलित रहते हुए चन्द्रोदय और सूर्योदय के मध्य का होता है।

नरक चतुर्दशी के दिन को छोटी दीवाली, रूप चतुर्दशी, और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है।
है।

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लक्ष्मी पूजा

19 अक्टूबर २०१७ (बृहस्पतिवार) लक्ष्मी-गणेश पूजा

(1)प्रदोष काल मुहूर्त लक्ष्मी पूजा मुहूर्त = १९:११ से २०:१६
मतलब :-शाम 7 बजकर 11 मिनिट से प्रारंभ

अवधि = १ घण्टा ५ मिनट्स

(2)प्रदोष काल = १७:४३ से २०:१६

(मतलब):- 5 बजकर 43 मिनिट से 8 बजकर 16 मिनिट तक

वृषभ काल = १९:११ से २१:०६

बृषभ लग्न :-7 बजकर 11 मिनिट से 9 बजकर 6 मिनिट तक

अमावस्या तिथि प्रारम्भ
= १९/अक्टूबर/२०१७ को ००:१३ बजे

अमावस्या तिथि समाप्त

२०/अक्टूबर/२०१७ को ००:४१ बजे लक्ष्मी पूजा

महानिशिता काल मुहूर्त

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त = २३:४० से २४:३१+ *

मतलब :-रात्रि  11 बजकर 40 मिनिट से 12 बजकर 31 मिनीट तक

(स्थिर लग्न के बिना)
अवधि = ० घण्टे ५१ मिनट्स

सिंह काल = २५:४१+ से २७:५९+

मतलव :-रात्रि 1 बजकर 41 मिनिट से 3 बजकर 59 मिनिट तक

चौघड़िया पूजा मुहूर्त दीवाली लक्ष्मी पूजा के लिये शुभ चौघड़िया मुहूर्त

प्रातःकाल मुहूर्त (शुभ) = ०६:२८ - ०७:५३

प्रातःकाल मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) = १०:४१ - १४:५५
सायंकाल मुहूर्त (अमृत, चर) = १६:१९ - २०:५५

रात्रि मुहूर्त (लाभ) = २४:०६+ - २४:४१+

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गोवर्धन पूजा पर्व

तारीख - 20 अक्तूबर 2017, शुक्रवार

गोवर्धन पूजा सुबह का मुहूर्त- सुबह 06:28 बजे से 08:43 बजे तक
दोपहर :-अभिजीत मुहूर्त दिन का आधा भाग
गोवर्धन पूजा शाम का मुहूर्त - 04:27 बजे से सायं 05:42 बजे तक

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21 अक्टूम्बर भाई दोज़

भाई दूज टीका मुहूर्त = १२:४५ से १५:०२
अवधि = २ घण्टे १६ मिनट्स

द्वितीय तिथि प्रारम्भ = २१/अक्टूबर/२०१७ को ०२:०७ बजे

द्वितीय तिथि समाप्त = २२/अक्टूबर/२०१७ को ०३:३० बजे

Pandit भुबनेश्व र
कस्तूरवानागर पर्णकुटी वुना

09893946810