ज्योतिष समाधान

Thursday, 24 August 2017

ऋद्धि और सिद्धि के स्वामी श्री गणेश का जन्मोत्सव 'गणेश चतुर्थी' वर्ष 2017 में 25 अगस्त को मनाई जाएगी. विशेष बात यह कि इस बार यह त्यौहार 10 दिनों के बजाय 11 दिनों तक मनाया जाएगा  इस साल भगवान श्री गणेश गजकेसरी योग में विराजेंगे,

ऋद्धि और सिद्धि के स्वामी श्री गणेश का जन्मोत्सव 'गणेश चतुर्थी' वर्ष 2017 में 25 अगस्त को मनाई जाएगी.

विशेष बात यह कि इस बार यह त्यौहार 10 दिनों के बजाय 11 दिनों तक मनाया जाएगा 
इस साल भगवान श्री गणेश गजकेसरी योग में विराजेंगे,

जो छात्रों, बुद्धिजीवियों के साथ-साथ राजनीतिज्ञों के लिए बहुत कल्याणकारी सिद्ध होगा.

यह योग कई शुभ संयोग लेकर आ रहा है. सबसे महत्वपूर्ण संयोग तो यह है कि इस दिन से कर्मधिपति शनिदेव की चाल सीधी हो जाएगी.

फलतः सभी राशियों पर शनिदेव के प्रकोप का असर धीरे-धीर समाप्त होने लगेगा और जातकों के बिगड़े काम बनने लगेंगे.

विशेष बात यह कि इस बार यह त्यौहार 10 दिनों के बजाय 11 दिनों तक मनाया जाएगा.

यानी मोदकप्रिय गणेश अपने भक्तों के घरों में 11 दिनों तक मेहमान बनकर विराजेंगे और अपनी कृपादृष्टि बनाए रखेंगे.

यह परिघटना हिन्दू पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि में तिथि-वृद्धि के कारण संभव हुआ है. इस तिथि को एक दिन बढ़ जाने से श्री गणेश का जलविहार अब 12वें दिन यानी 5 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा.

लेकिन आइए सबसे पहले जानते हैं, इस वर्ष गणेश चतुर्थी की पूजा और अन्य अनुष्ठान के लिए शुभ समय और मुहूर्त क्या है

वैदिक पंचांग के अनुसार,

चतुर्थी तिथि का आरम्भ और समापन समय हिन्दू पंचांग के अनुसार,

चतुर्थी तिथि 24 अगस्त 2017 को शाम में 08:27 बजे से आरम्भ होगी.

इस तिथि की समाप्ति 25 अगस्त को शाम में 08:31 बजे होगी.

लेकिन 08:31 बजे के बाद भी चन्द्रमा उदित रहेंगे, जो शाम में 09:20 बजे अस्त होंगे.

इसलिए जिन श्रद्धालुओं की चंद्र-दर्शन निषेध में आस्था है, उन्हें 09:20 बजे तक चंद्रमा को देखने से बचना चाहिए.

इस साल गणपति पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:06 बजे से आरम्भ हो कर दोपहर बाद 01:39 बजे तक है.

पौराणिक प्रमाणों के अनुसार, गजानन श्री गणेश का जन्म दिन के मध्याह्न में हुआ था. लिहाजा श्री गणेश पूजन की यह उपरोक्त अवधि, जो कि लगभग 2 घंटे 33 मिनट की है,

भाद्रपद की चतुर्थी को हुआ था श्री गणेश का आविर्भाव

हिंदू पंचाग के अनुसार गणेश चतुर्थी त्यौहार भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है. इसी तिथि को मध्याह्न में शक्ति-स्वरूपा देवी पार्वती ने दिव्य-स्नान के समय अपनी त्वचा के मैल से एक बालक का स्वरूप गढ़ा और उसमें प्राण आरोपित कर अपने महल की पहरेदारी में नियुक्त कर दिया.

बालक की निष्ठा, सजगता और तत्परता इतनी प्रबल थी कि देवाधिदेव शिव भी उसका उल्लंघन नहीं कर पाए और फिर जो हुआ वह तो जग-विदित है.

चतुर्थी तिथि का आरम्भ और समापन समय हिन्दू पंचांग के अनुसार,

ऋषि पंचमी   ब्रत मुहूर्त
26 अगस्त 2017, दिन शनिवार को सुबह 11:06 से दोपहर १:39 बजे तक यानी 2 घंटे 33 मिनट तक पूजा का मुहूर्त है।
इसमे सप्त ऋषियों का पूजन किया जाता है उनके नाम इस प्रकार है।
सप्तऋषि के सात ऋषियों के नाम इस प्रकार हैं -
कश्यप
अत्रि
भारद्वाज
विश्वामित्र
गौतम
वशिष्ठ
जमदग्नि
इस व्रत का एक महत्वपूर्ण भाग स्त्रियों के मासिक धर्म से भी जुडा है
शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री का कार्य करना निषेध है
परंतु यदि इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाये तो स्त्री को इसका पाप लगता है
अत: मासिक धर्म के समय लगे पाप से छुटकारा पाने के लिए यह एक मात्र व्रत स्त्रियों द्वारा किया ही जाना चाहिए।
इस सम्बन्ध में श्री कृष्ण जी ने युधिष्ठर को एक कथा सुनाई थी जिसके अनुसार जब इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र वृत्र का हनन किया तो उन्हें ब्रह्महत्या का अपराध लगा।
जब इन्द्र को ब्रह्म हत्या का महान पाप लगा तो उसने इस पाप से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना की.

ब्रह्मा जी ने उस पर कृपा करके उस पाप को चार भागों में बांट दिया था जिसमें
प्रथम भाग अग्नि (धूम से मिश्रित प्रथम ज्वाला) में, नदियों (वर्षाकाल के पंकिल जल) में,
पर्वतों (जहाँ गोंद वाले वृक्ष उगते हैं) में
और चौथे भाग को स्त्री के रज में विभाजित करके इंद्र को शाप से मुक्ति प्रदान करवाई थी.
इसलिए उस पाप को शुद्धि के लिए ही हर स्त्री को ॠषि पंचमी का व्रत करना चाहिए.
शास्त्र कहते हैं कि यदि कोई स्त्री या कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करे और श्रद्धा भाव के साथ पूजा तथा क्षमा प्रार्थना करे तो उसे इस पाप से मुक्ति प्राप्त होती है.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत में हल से जुता हुआ कुछ भी नहीं खाते हैं।
इस बात को ध्यान में रखकर ही व्रत किया जाएगा।

वे केवल फल (fruits), मेवा व समां की खीर, मोरधान से बने व्यंजनों को खाकर व्रत रखेंगी तथा घर-घर में भजन-कीर्तनों का आयोजन किया गया।

Thursday, 10 August 2017

महामृत्युंजय के अनुष्ठान एंव लधु रूद्र, महारूद्र तथा सामान्य रूद्राअभिषेक प्रायः होते ही रहते है, लेकिन विशेष कामनाओं के लिए शिर्वाचन का अपना अलग विशेष महत्व होता है। महारूद्र सदाशिव को प्रसन्न करने व अपनी सर्वकामना सिद्धि के लिए यहां पर पार्थिव पूजा का विधान है, जिसमें मिटटी के शिर्वाचन पुत्र प्राप्ति के लिए, श्याली चावल के शिर्वाचन व अखण्ड दीपदान की तपस्या होती है। शत्रुनाश व व्याधिनाश हेतु नमक के शिर्वाचन, रोग नाश हेतु गाय के गोबर के शिर्वाचन, दस विधि लक्ष्मी प्राप्ति हेतु मक्खन के शिर्वाचन अन्य कई प्रकार के शिवलिंग बनाकर उनमें प्राण-प्रतिष्ठा कर विधि-विधान द्वारा विशेष पुराणोक्त व वेदोक्त विधि से पूज्य होती रहती है।

महामृत्युंजय के अनुष्ठान एंव लधु रूद्र, महारूद्र तथा सामान्य रूद्राअभिषेक प्रायः होते ही रहते है, लेकिन विशेष कामनाओं के लिए शिर्वाचन का अपना अलग विशेष महत्व होता है। महारूद्र सदाशिव को प्रसन्न करने व अपनी सर्वकामना सिद्धि के लिए यहां पर पार्थिव पूजा का विधान है, जिसमें मिटटी के शिर्वाचन पुत्र प्राप्ति के लिए, श्याली चावल के शिर्वाचन व अखण्ड दीपदान की तपस्या होती है। शत्रुनाश व व्याधिनाश हेतु नमक के शिर्वाचन, रोग नाश हेतु गाय के गोबर के शिर्वाचन, दस विधि लक्ष्मी प्राप्ति हेतु मक्खन के शिर्वाचन अन्य कई प्रकार के शिवलिंग बनाकर उनमें प्राण-प्रतिष्ठा कर विधि-विधान द्वारा विशेष पुराणोक्त व वेदोक्त विधि से पूज्य होती रहती है।
==========================================
ऊॅ हौं जूं सः। ऊॅ भूः भुवः स्वः ऊॅ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उव्र्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
ऊॅ स्वः भुवः भूः ऊॅ। ऊॅ सः जूं हौं।

महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरश: अर्थ

त्रयंबकम- त्रि.नेत्रों वाला ;कर्मकारक।

यजामहे- हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं। हमारे श्रद्देय।

सुगंधिम- मीठी महक वाला, सुगंधित।

पुष्टि- एक सुपोषित स्थिति, फलने वाला व्यक्ति। जीवन की परिपूर्णता

वर्धनम- वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है।

उर्वारुक- ककड़ी।

इवत्र- जैसे, इस तरह।

बंधनात्र- वास्तव में समाप्ति से अधिक लंबी है।

मृत्यु- मृत्यु से

मुक्षिया, हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें।

मात्र न

अमृतात- अमरता, मोक्ष।

सरल अनुवाद

हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं। जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है। ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग हम जीवन व मृत्यु के बंधन से मुक्त हो।

महामृत्युंजय मंत्

ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्व: भुव: भू: ॐ स: जूं हौं ॐ !!
संस्कृत में महामृत्युंजय उस व्यक्ति को कहते हैं जो मृत्यु को जीतने वाला हो।
मंत्र के चरणो अर्थ :-

१. त्र्यम्बकं यजामाहे :   अम्बिका शक्ति सहित त्र्यम्बकेश, पूर्व दिशा में प्रवाहित शक्ति में स्थित

२. सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् : वामा शक्ति सहित मृत्युंजयेश ,दक्षिण दिशा में प्रवाहित शक्ति में स्थित

३.  उर्वारुकमिव बन्धनान : भीमा  शक्ति सहित महादेवेश , पश्चिम  दिशा में प्रवाहित शक्ति में स्थित

४. मृत्योर्मुक्षीय मामृतात : द्रौपदी  शक्ति सहित संजीवनीश ,  उत्तर  दिशा में प्रवाहित शक्ति में स्थित

त्रि - ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
यम - अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।
ब - सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
कम - जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
य - वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
म - प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे - प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि - अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
व - पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध - भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् - कपाली रुद्र का घोतक है । उरु मूल में स्थित है।
उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है । यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा - स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
रु - भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
क - धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि - अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
व - मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
ब - वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
न्धा - अंशु आदित्यद का घोतक है । वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् - भगादित्यअ का बोधक है । वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ - विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श

तात् - अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।

उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्त देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं।
भुबनेश्वर
कस्तूरवानगर पर्णकुटी गुना
9893946810

【१】लड्डू गोपाल को खीर का भोग लगायें खीर का भोग लगाने से आपको मकान और धन की प्राप्ति हो सकती है। 【२】 दही-मक्खन का भोग दही मक्खन का भोग लगाने से आप हमेशा निरोगी और स्वस्थ रहेंगे। 【३】 देशी घी का भोग देशी घी से पूजा करने से सुख, शांति, समृद्दि प्राप्त होगी। 【४】लड्डू झूले वाले कान्हा जी को मक्खन और लड्डू खिलाने से संतान सुख मिलता है। मिश्री का भोग मिश्री का भोग लगाने से अच्छी नौकरी मिलेगी। 【५】बर्फी का भोग लगायें बर्फी का भोग लगाने से सारे कर्जे माफ हो जायेंगे। 【६】इलायची वाले दूध का भोग इलायची वाले दूध का भोग लगाने से समृद्धि हासिल होती है। राधा-कृष्ण की पूजा राधा-कृष्ण की पूजा करने से शादी जल्दी और मनचाही होती है।

हिंदू पर्वों के निर्णय हेतु कौन-कौन से शास्त्र प्रामाणिक हैं निष्कर्ष यह है कि विद्यमान देश, काल और परिस्थिति में विषयान्तर्गत प्रामाणिकता की दृष्टि से सर्वधर्मशास्त्रों में ‘निर्णयसिंधु’ ही श्रेयस्कर है।

जन्माष्टमी पद्मपुराण-

उत्तराखंड श्रीकृष्णावतार की कथा में वर्णन मिलता है कि ‘‘दसवां महीना आने पर भादों मास की कृष्णा अष्टमी को आधी रात के समय श्री हरि का अवतार हुआ।’’

महाभारत खिलभाग हरिवंश- विष्णु पर्व - 4/17 के अनुसार

जब भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजित नामक मुहूत्र्त था, रोहिणी नक्षत्र का योग होने से अष्टमी की वह रात जयंती कहलाती थी और विजय नामक विशिष्ट मुहूत्र्त व्यतीत हो रहा था।’’

श्रीमद्भागवत- 10/3/1 के अनुसार

भाद्रमास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्द्ध रात्रि के समय भगवान् विष्णु माता देवकी के गर्भ से प्रकट हुए।

गर्ग संहिता गोलोकखंड-11/22-24 के अनुसार ‘‘

भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण-योग, अष्टमी तिथि, आधी रात के समय, चंद्रोदय काल, वृषभ लग्न में माता देवकी के गर्भ से साक्षात् श्री हरि प्रकट हुए।’’

ब्रह्मवैवर्त पुराण- श्रीकृष्ण जन्मखंड-7 के अनुसार

आधी रात के समय रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग संपन्न हो गया था। जब अर्ध चंद्रमा का उदय हुआ तब भगवान श्रीकृष्ण दिव्य रूप धारण करके माता देवकी के हृदय कमल के कोश से प्रकट हो गए।

ब्रह्मवैवर्त पुराण- श्रीकृष्ण जन्मखंड-8 के अनुसार

सप्तमी तिथि के दिन व्रती पुरुष को हविष्यान्न भोजन करके संयम पूर्वक रहना चाहिए। सप्तमी की रात्रि व्यतीत होने पर अरुणोदय की बेला में उठकर व्रती पुरुष प्रातः कालिक कृत्य पूर्ण करने के अनंतर स्नानपूर्वक संकल्प करें। उस संकल्प में यह उद्देश्य रखना चाहिये कि आज मैं श्री कृष्ण प्रीति के लिये व्रत एवं उपवास करूंगा। मन्वादि तिथि प्राप्त होने पर स्नान और पूजन करने से वही फल कोटिगुना अधिक होता है। उस तिथि को जो पितरों के लिये जल मात्र अर्पण करता है, वह मानो लगातार सौ वर्षों तक पितरों की तृप्ति के लिये गया श्राद्ध का संपादन कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। <<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<< 
अतएव स्पष्ट है कि सप्तमीयुक्त अष्टमी को त्याग देना चाहिए और अष्टमी युक्त नवमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतोपवास करना चाहिये। 

कृष्ण जन्माष्टमी कृष्ण जन्माष्टमी पूजा मुहूर्त

भगवान श्रीकृष्ण का ५२४४वाँ जन्मोत्सव 

निशिता पूजा का समय  रात्रि= १२:०३+ से 1२:४७+ 
अवधि = ० घण्टे ४३ मिनट्स 
मध्यरात्रि का क्षण = १२:२५+ 
१५th को, पारण का समय  शाम= ५:३९ के बाद 

=====================================
               बैष्णव् जन्माष्टमी

पारण के दिन अष्टमी तिथि का समाप्ति समय शाम = :३९
रोहिणी नक्षत्र के बिना जन्माष्टमी 
*वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी १५/अगस्त/२०१७ को वैष्णव जन्माष्टमी के लिये अगले दिन का पारण समय = ०५:५४ (सूर्योदय के बाद)

पारण के दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी
रोहिणी नक्षत्र के बिना जन्माष्टमी दही हाण्डी - १५th, अगस्त को 

अष्टमी तिथि प्रारम्भ = १४/अगस्त/२०१७ को शाम :४५ बजे 

अष्टमी तिथि समाप्त = १५/अगस्त/२०१७ को शाम ५:३९ बजे

जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व केवल एक ही समय भोजन करते हैं। व्रत वाले दिन, स्नान आदि से निवृत्त होने के पश्चात, भक्त लोग पूरे दिन उपवास रखकर, अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के समाप्त होने के पश्चात व्रत कर पारण का संकल्प लेते हैं।

कुछ कृष्ण-भक्त मात्र रोहिणी नक्षत्र अथवा मात्र अष्टमी तिथि के पश्चात व्रत का पारण कर लेते हैं। संकल्प प्रातःकाल के समय लिया जाता है और संकल्प के साथ ही अहोरात्र का व्रत प्रारम्भ हो जाता है।

जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है। वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है। निशीथ समय पर भक्त लोग श्री बालकृष्ण की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।

विस्तृत विधि-विधान पूजा में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह (१६) चरण सम्मिलित होते हैं। जन्माष्टमी की विस्तृत पूजा विधि, वैदिक मन्त्रों के साथ जन्माष्टमी पूजा विधि पृष्ठ पर उपलब्ध है। कृष्ण जन्माष्टमी पर व्रत के नियम एकादशी उपवास के दौरान पालन किये जाने वाले सभी नियम जन्माष्टमी उपवास के दौरान भी पालन किये जाने चाहिये। अतः जन्माष्टमी के व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के अन्न का ग्रहण नहीं करना चाहिये।

जन्माष्टमी का व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद एक निश्चित समय पर तोड़ा जाता है जिसे जन्माष्टमी के पारण समय से जाना जाता है।

जन्माष्टमी का पारण सूर्योदय के पश्चात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद किया जाना चाहिये। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होते तो पारण किसी एक के समाप्त होने के पश्चात किया जा सकता है।

यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से कोई भी सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होता तब जन्माष्टमी का व्रत दिन के समय नहीं तोड़ा जा सकता। ऐसी स्थिति में व्रती को किसी एक के समाप्त होने के बाद ही व्रत तोड़ना चाहिये। 
अतः अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के अन्त समय के आधार पर कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत दो सम्पूर्ण दिनों तक प्रचलित हो सकता है।

हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु के अनुसार, जो श्रद्धालु-जन लगातार दो दिनों तक व्रत करने में समर्थ नहीं है, वो जन्माष्टमी के अगले दिन ही सूर्योदय के पश्चात व्रत को तोड़ सकते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी को कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयन्ती और श्री जयन्ती के नाम से भी जाना जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी के दो अलग-अलग दिनों के विषय में अधिकतर कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है।

जब-जब ऐसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त सम्प्रदाय के लोगो के लिये और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव सम्प्रदाय के लोगो के लिये होती है। प्रायः उत्तर भारत में श्रद्धालु स्मार्त और वैष्णव जन्माष्टमी का भेद नहीं करते और दोनों सम्प्रदाय जन्माष्टमी एक ही दिन मनाते हैं।

हमारे विचार में यह सर्वसम्मति इस्कॉन संस्थान की वजह से है। "कृष्ण चेतना के लिए अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय" संस्था, जिसे इस्कॉन के नाम से अच्छे से जाना जाता है, वैष्णव परम्पराओं और सिद्धान्तों के आधार पर निर्माणित की गयी है। अतः इस्कॉन के ज्यादातर अनुयायी वैष्णव सम्प्रदाय के लोग होते हैं। इस्कॉन संस्था सर्वाधिक व्यावसायिक और वैश्विक धार्मिक संस्थानों में से एक है जो इस्कॉन संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये अच्छा-खासा धन और संसाधन खर्च करती है। अतः इस्कॉन के व्यावसायिक प्रभाव और विज्ञापिता की वजह से अधिकतर श्रद्धालु-जन इस्कॉन द्वारा चयनित जन्माष्टमी को मनाते हैं। जो श्रद्धालु वैष्णव धर्म के अनुयायी नहीं हैं वो इस बात से अनभिज्ञ हैं कि इस्कॉन की परम्पराएँ भिन्न होती है और जन्माष्टमी उत्सव मनाने का सबसे उपयुक्त दिन इस्कॉन से अलग भी हो सकता है। स्मार्त अनुयायी, जो स्मार्त और वैष्णव सम्प्रदाय के अन्तर को जानते हैं, वे जन्माष्टमी व्रत के लिये इस्कॉन द्वारा निर्धारित दिन का अनुगमन नहीं करते हैं।
दुर्भाग्यवश ब्रज क्षेत्र, मथुरा और वृन्दावन में, इस्कॉन द्वारा निर्धारित दिन का सर्वसम्मति से अनुगमन किया जाता है।

श्रद्धालु जो दूसरों को देखकर जन्माष्टमी के दिन का अनुसरण करते हैं वो इस्कॉन द्वारा निर्धारित दिन को ही उपयुक्त मानते हैं। लोग जो वैष्णव धर्म के अनुयायी नहीं होते हैं, वो स्मार्त धर्म के अनुयायी होते हैं।

स्मार्त अनुयायियों के लिये, हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु में, जन्माष्टमी के दिन को निर्धारित करने के लिये स्पष्ट नियम हैं।

श्रद्धालु जो वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी नहीं हैं, उनको जन्माष्टमी के दिन का निर्णय हिन्दु ग्रन्थ में बताये गये नियमों के आधार पर करना चाहिये। इस अन्तर को समझने के लिए एकादशी उपवास एक अच्छा उदाहरण है।
एकादशी के व्रत को करने के लिये, स्मार्त और वैष्णव सम्प्रदायों के अलग-अलग नियम होते हैं। ज्यादातर श्रद्धालु एकादशी के अलग-अलग नियमों के बारे में जानते हैं परन्तु जन्माष्टमी के अलग-अलग नियमों से अनभिज्ञ होते हैं।

अलग-अलग नियमों की वजह से, न केवल एकादशी के दिनों बल्कि जन्माष्टमी और राम नवमी के दिनों में एक दिन का अन्तर होता है। वैष्णव धर्म को मानने वाले लोग अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र को प्राथमिकता देते हैं और वे कभी सप्तमी तिथि के दिन जन्माष्टमी नहीं मनाते हैं।

वैष्णव नियमों के अनुसार हिन्दु कैलेण्डर में जन्माष्टमी का दिन अष्टमी अथवा नवमी तिथि पर ही पड़ता है। जन्माष्टमी का दिन तय करने के लिये, स्मार्त धर्म द्वारा अनुगमन किये जाने वाले नियम अधिक जटिल होते हैं। इन नियमों में निशिता काल को, जो कि हिन्दु अर्धरात्रि का समय है, को प्राथमिकता दी जाती है।

जिस दिन अष्टमी तिथि निशिता काल के समय व्याप्त होती है, उस दिन को प्राथमिकता दी जाती है। इन नियमों में रोहिणी नक्षत्र को सम्मिलित करने के लिये कुछ और नियम जोड़े जाते हैं।

जन्माष्टमी के दिन का अन्तिम निर्धारण निशिता काल के समय, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के शुभ संयोजन, के आधार पर किया जाता है।

स्मार्त नियमों के अनुसार हिन्दु कैलेण्डर में जन्माष्टमी का दिन हमेशा सप्तमी अथवा अष्टमी तिथि के दिन पड़ता है। यह पृष्ठ स्मार्त सम्प्रदाय के लिये जन्माष्टमी का दिन दर्शाता है और अगर वैष्णव जन्माष्टमी का दिन स्मार्त जन्माष्टमी से पृथक होता है तो उसे स्पष्ट करने के लिये टिप्पणी संकलित कर दी जाती है।

पंडित भुबनेश्वर 

कस्तूरवा नगर पर्णकुटी 

9893946810

विश्लेषण =रोहिणी नक्षत्र के बिना जन्माष्टमी * वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी १५/अगस्त/२०१७ को वैष्णव जन्माष्टमी के लिये अगले दिन का पारण समय = ०५:५४ (सूर्योदय के बाद) पारण के दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी रोहिणी नक्षत्र के बिना जन्माष्टमी दही हाण्डी - १५th, अगस्त को अष्टमी तिथि प्रारम्भ = १४/अगस्त/२०१७ को १९:४५ बजे यानी अष्टमी तिथि प्रारम्भ १४अगस्त /२०१७को शाम 0७:४५से अष्टमी तिथि समाप्त = १५/अगस्त/२०१७ को १७:३९ बजे यानिअष्टमीतिथि समाप्त =१५अगस्त/२0१७को५:३९ बजे तक ===विश्लेषण

भगवान श्रीकृष्ण का ५२४४वाँ जन्मोत्सव
निशिता पूजा का समय = २४:०३+ से २४:४७+
यानी  रात्र 12:बजकर ३ मिनिट से 12  बजकर ४७ तक

अवधि = ० घण्टे ४३ मिनट्स

मध्यरात्रि का क्षण = २४:२५+ यानि रात्रि काल का आधा

समय

१५th को, पारण का समय = १७:३९ के बाद

पारण के दिन अष्टमी तिथि का समाप्ति समय = १७:३९

=====================================

       वैष्णव  सम्प्रदाय
रोहिणी नक्षत्र के बिना जन्माष्टमी *

वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी १५/अगस्त/२०१७ को वैष्णव जन्माष्टमी के लिये अगले दिन का पारण समय = ०५:५४ (सूर्योदय के बाद)

पारण के दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी

रोहिणी नक्षत्र के बिना जन्माष्टमी दही हाण्डी - १५th, अगस्त को

अष्टमी तिथि प्रारम्भ = १४/अगस्त/२०१७ को १९:४५ बजे
यानी अष्टमी तिथि प्रारम्भ १४अगस्त /२०१७को शाम 0७:४५से

अष्टमी तिथि समाप्त = १५/अगस्त/२०१७ को १७:३९ बजे
यानिअष्टमीतिथि समाप्त =१५अगस्त/२0१७को५:३९ बजे तक
=====================================
                             विश्लेषण
हिंदू पर्वों के निर्णय हेतु कौन-कौन से शास्त्र प्रामाणिक हैं निष्कर्ष यह है कि विद्यमान देश, काल और परिस्थिति में विषयान्तर्गत प्रामाणिकता की दृष्टि से सर्वधर्मशास्त्रों में ‘निर्णयसिंधु’ ही श्रेयस्कर है।

जन्माष्टमी पद्मपुराण-

उत्तराखंड श्रीकृष्णावतार की कथा में वर्णन मिलता है कि ‘‘दसवां महीना आने पर भादों मास की कृष्णा अष्टमी को आधी रात के समय श्री हरि का अवतार हुआ।’’

महाभारत खिलभाग हरिवंश- विष्णु पर्व - 4/17 के अनुसार

जब भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजित नामक मुहूत्र्त था, रोहिणी नक्षत्र का योग होने से अष्टमी की वह रात जयंती कहलाती थी और विजय नामक विशिष्ट मुहूत्र्त व्यतीत हो रहा था।’’

श्रीमद्भागवत- 10/3/1 के अनुसार

भाद्रमास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्द्ध रात्रि के समय भगवान् विष्णु माता देवकी के गर्भ से प्रकट हुए।

गर्ग संहिता गोलोकखंड-11/22-24 के अनुसार ‘‘

भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण-योग, अष्टमी तिथि, आधी रात के समय, चंद्रोदय काल, वृषभ लग्न में माता देवकी के गर्भ से साक्षात् श्री हरि प्रकट हुए।’’

ब्रह्मवैवर्त पुराण- श्रीकृष्ण जन्मखंड-7 के अनुसार

आधी रात के समय रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग संपन्न हो गया था। जब अर्ध चंद्रमा का उदय हुआ तब भगवान श्रीकृष्ण दिव्य रूप धारण करके माता देवकी के हृदय कमल के कोश से प्रकट हो गए।

ब्रह्मवैवर्त पुराण- श्रीकृष्ण जन्मखंड-8 के अनुसार

सप्तमी तिथि के दिन व्रती पुरुष को हविष्यान्न भोजन करके संयम पूर्वक रहना चाहिए। सप्तमी की रात्रि व्यतीत होने पर अरुणोदय की बेला में उठकर व्रती पुरुष प्रातः कालिक कृत्य पूर्ण करने के अनंतर स्नानपूर्वक संकल्प करें। उस संकल्प में यह उद्देश्य रखना चाहिये कि आज मैं श्री कृष्ण प्रीति के लिये व्रत एवं उपवास करूंगा। मन्वादि तिथि प्राप्त होने पर स्नान और पूजन करने से वही फल कोटिगुना अधिक होता है। उस तिथि को जो पितरों के लिये जल मात्र अर्पण करता है, वह मानो लगातार सौ वर्षों तक पितरों की तृप्ति के लिये गया श्राद्ध का संपादन कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। <<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<< 
अतएव स्पष्ट है कि सप्तमीयुक्त अष्टमी को त्याग देना चाहिए और अष्टमी युक्त नवमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतोपवास करना चाहिये। 

जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व केवल एक ही समय भोजन करते हैं। व्रत वाले दिन, स्नान आदि से निवृत्त होने के पश्चात, भक्त लोग पूरे दिन उपवास रखकर, अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के समाप्त होने के पश्चात व्रत कर पारण का संकल्प लेते हैं।

कुछ कृष्ण-भक्त मात्र रोहिणी नक्षत्र अथवा मात्र अष्टमी तिथि के पश्चात व्रत का पारण कर लेते हैं। संकल्प प्रातःकाल के समय लिया जाता है और संकल्प के साथ ही अहोरात्र का व्रत प्रारम्भ हो जाता है।

जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है। वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है। निशीथ समय पर भक्त लोग श्री बालकृष्ण की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।

विस्तृत विधि-विधान पूजा में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह (१६) चरण सम्मिलित होते हैं। जन्माष्टमी की विस्तृत पूजा विधि, वैदिक मन्त्रों के साथ जन्माष्टमी पूजा विधि पृष्ठ पर उपलब्ध है। कृष्ण जन्माष्टमी पर व्रत के नियम एकादशी उपवास के दौरान पालन किये जाने वाले सभी नियम जन्माष्टमी उपवास के दौरान भी पालन किये जाने चाहिये। अतः जन्माष्टमी के व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के अन्न का ग्रहण नहीं करना चाहिये।

जन्माष्टमी का व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद एक निश्चित समय पर तोड़ा जाता है जिसे जन्माष्टमी के पारण समय से जाना जाता है।

जन्माष्टमी का पारण सूर्योदय के पश्चात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद किया जाना चाहिये। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होते तो पारण किसी एक के समाप्त होने के पश्चात किया जा सकता है।

यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से कोई भी सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होता तब जन्माष्टमी का व्रत दिन के समय नहीं तोड़ा जा सकता। ऐसी स्थिति में व्रती को किसी एक के समाप्त होने के बाद ही व्रत तोड़ना चाहिये। 
अतः अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के अन्त समय के आधार पर कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत दो सम्पूर्ण दिनों तक प्रचलित हो सकता है।

हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु के अनुसार, जो श्रद्धालु-जन लगातार दो दिनों तक व्रत करने में समर्थ नहीं है, वो जन्माष्टमी के अगले दिन ही सूर्योदय के पश्चात व्रत को तोड़ सकते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी को कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयन्ती और श्री जयन्ती के नाम से भी जाना जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी के दो अलग-अलग दिनों के विषय में अधिकतर कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है।

जब-जब ऐसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त सम्प्रदाय के लोगो के लिये और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव सम्प्रदाय के लोगो के लिये होती है। प्रायः उत्तर भारत में श्रद्धालु स्मार्त और वैष्णव जन्माष्टमी का भेद नहीं करते और दोनों सम्प्रदाय जन्माष्टमी एक ही दिन मनाते हैं।

हमारे विचार में यह सर्वसम्मति इस्कॉन संस्थान की वजह से है। "कृष्ण चेतना के लिए अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय" संस्था, जिसे इस्कॉन के नाम से अच्छे से जाना जाता है, वैष्णव परम्पराओं और सिद्धान्तों के आधार पर निर्माणित की गयी है। अतः इस्कॉन के ज्यादातर अनुयायी वैष्णव सम्प्रदाय के लोग होते हैं। इस्कॉन संस्था सर्वाधिक व्यावसायिक और वैश्विक धार्मिक संस्थानों में से एक है जो इस्कॉन संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये अच्छा-खासा धन और संसाधन खर्च करती है। अतः इस्कॉन के व्यावसायिक प्रभाव और विज्ञापिता की वजह से अधिकतर श्रद्धालु-जन इस्कॉन द्वारा चयनित जन्माष्टमी को मनाते हैं। जो श्रद्धालु वैष्णव धर्म के अनुयायी नहीं हैं वो इस बात से अनभिज्ञ हैं कि इस्कॉन की परम्पराएँ भिन्न होती है और जन्माष्टमी उत्सव मनाने का सबसे उपयुक्त दिन इस्कॉन से अलग भी हो सकता है। स्मार्त अनुयायी, जो स्मार्त और वैष्णव सम्प्रदाय के अन्तर को जानते हैं, वे जन्माष्टमी व्रत के लिये इस्कॉन द्वारा निर्धारित दिन का अनुगमन नहीं करते हैं।
दुर्भाग्यवश ब्रज क्षेत्र, मथुरा और वृन्दावन में, इस्कॉन द्वारा निर्धारित दिन का सर्वसम्मति से अनुगमन किया जाता है।

श्रद्धालु जो दूसरों को देखकर जन्माष्टमी के दिन का अनुसरण करते हैं वो इस्कॉन द्वारा निर्धारित दिन को ही उपयुक्त मानते हैं। लोग जो वैष्णव धर्म के अनुयायी नहीं होते हैं, वो स्मार्त धर्म के अनुयायी होते हैं।

स्मार्त अनुयायियों के लिये, हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु में, जन्माष्टमी के दिन को निर्धारित करने के लिये स्पष्ट नियम हैं।

श्रद्धालु जो वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी नहीं हैं, उनको जन्माष्टमी के दिन का निर्णय हिन्दु ग्रन्थ में बताये गये नियमों के आधार पर करना चाहिये। इस अन्तर को समझने के लिए एकादशी उपवास एक अच्छा उदाहरण है।
एकादशी के व्रत को करने के लिये, स्मार्त और वैष्णव सम्प्रदायों के अलग-अलग नियम होते हैं। ज्यादातर श्रद्धालु एकादशी के अलग-अलग नियमों के बारे में जानते हैं परन्तु जन्माष्टमी के अलग-अलग नियमों से अनभिज्ञ होते हैं।

अलग-अलग नियमों की वजह से, न केवल एकादशी के दिनों बल्कि जन्माष्टमी और राम नवमी के दिनों में एक दिन का अन्तर होता है। वैष्णव धर्म को मानने वाले लोग अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र को प्राथमिकता देते हैं और वे कभी सप्तमी तिथि के दिन जन्माष्टमी नहीं मनाते हैं।

वैष्णव नियमों के अनुसार हिन्दु कैलेण्डर में जन्माष्टमी का दिन अष्टमी अथवा नवमी तिथि पर ही पड़ता है। जन्माष्टमी का दिन तय करने के लिये, स्मार्त धर्म द्वारा अनुगमन किये जाने वाले नियम अधिक जटिल होते हैं। इन नियमों में निशिता काल को, जो कि हिन्दु अर्धरात्रि का समय है, को प्राथमिकता दी जाती है।

जिस दिन अष्टमी तिथि निशिता काल के समय व्याप्त होती है, उस दिन को प्राथमिकता दी जाती है। इन नियमों में रोहिणी नक्षत्र को सम्मिलित करने के लिये कुछ और नियम जोड़े जाते हैं।

जन्माष्टमी के दिन का अन्तिम निर्धारण निशिता काल के समय, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के शुभ संयोजन, के आधार पर किया जाता है।

स्मार्त नियमों के अनुसार हिन्दु कैलेण्डर में जन्माष्टमी का दिन हमेशा सप्तमी अथवा अष्टमी तिथि के दिन पड़ता है। यह पृष्ठ स्मार्त सम्प्रदाय के लिये जन्माष्टमी का दिन दर्शाता है और अगर वैष्णव जन्माष्टमी का दिन स्मार्त जन्माष्टमी से पृथक होता है तो उसे स्पष्ट करने के लिये टिप्पणी संकलित कर दी जाती है।

पंडित भुबनेश्वर 

कस्तूरवा नगर पर्णकुटी 

9893946810