ज्योतिष समाधान

Thursday, 26 September 2024

#चोरी की वस्तु

रेवती नक्षत्र से अभिजित सहित गणना करें, रेवती नक्षत्र पूर्व में रहता है इस तरह शेष नक्षत्रों की दिशा भी क्रमशः गणना करें।
पूर्व दिशा नक्षत्र में गई वस्तु 1 सप्ताह में प्राप्त होती है
दक्षिण दिशा नक्षत्र में गई वस्तु 2-3 सप्ताह में प्राप्त होती है 
पश्चिम दिशा नक्षत्र में गई वस्तु 3 सप्ताह से 3 माह में विशेष प्रयत्न करने पर प्राप्त होती है, अन्यथा प्राप्त नहीं होती है
उत्तर दिशा नक्षत्र में गई वस्तु कभी प्राप्त नहीं होती है

जय सियाराम जी

आशीर्वाद


लक्ष्मीस्ते पङ्कजाक्षी निवसतु भवने भारती कण्ठदेशे । वर्धन्तां बन्धुवर्गाः सकलरिपुगणा यान्तु पातालमूलम् ।। देशे देशे च कीर्ति प्रसरतु भवतां दिव्यकुन्देन्दुशुभ्रा । जीव त्वं पुत्रपाैत्रै:सकल सुखयुतै र्हायनानां शतैश्च ।।

Sunday, 22 September 2024

वास्तु पूजा एवं गृह प्रवेश पूजा सामग्री

================================ 1】हल्दीः--------------------------50 ग्राम 
२】कलावा(आंटी)-------------10 गोले 
३】अगरबत्ती------------------- 3पैकिट
 ४】कपूर------------------------- 50 ग्राम
 ५】केसर------------------------- 1डिव्वि 
६】चंदन पेस्ट ------------------ 50 ग्राम
 ७】यज्ञोपवीत ----------------- 11नग्
 ८】चावल------------------------ 07 किलो 
९】अबीर-------------------------50 ग्राम 
१०】गुलाल, -----------------100 ग्राम
 ११कच्चा सूत ----------------200 फिट
१२】सिंदूर --------------------100 ग्राम 
१३】रोली, --------------------100ग्राम 
१४】सुपारी, ( बड़ी)-------- 200 ग्राम
 १५】नारियल ----------------- 11 नग्
 १६】सरसो----------------------50 ग्राम
 १७】पंच मेवा------------------100 ग्राम 
१८】शहद (मधु)--------------- 50 ग्राम
 १९】शकर-----------------------0 1किलो
 २०】घृत (शुद्ध घी)------------ 01किलो
 २१】इलायची (छोटी)-----------10ग्राम 
२२】नागफणी किले --------------05 नग
 २३】इत्र की शीशी----------------1 नग् 
२४】रंग लाल----------------------10ग्राम 
२५】रंग काला --------------------10ग्राम 
२६】रंग हरा -----------------------10ग्राम 
२७】रंग पिला ---------------------10ग्राम 
२८】बास्तु किट --------------------1 नग्
 २९】धुप बत्ती ---------------------2 पैकिट

सप्त धान्य-कुलबजन--------100ग्राम
 १】 जौ-----------
 २】गेहूँ- 
३】चावल- 
४】तिल- 
५】काँगनी- 
६】उड़द-
 ७】मूँग =============================
 
३३】कुशा 
३४】दूर्वा 
35】पुष्प कई प्रकार के 
३६】गंगाजल 
३७】ऋतुफल पांच प्रकार के -----1 किलो

 38】पंच पल्लव 
१】बड़, 
२】 गूलर,
 ३】पीपल, 
४】आम 
५】पाकर के पत्ते) ============================= 


३९】बिल्वपत्र 
४०】शमीपत्र 
४१】सर्वऔषधि 
४२】अर्पित करने हेतु पुरुष बस्त्र 
४३】मता जी को अर्पित करने हेतु सौ भाग्यवस्त्र
 44】जल कलश तांबे का मिट्टी का) 
-------------------------------------------------
४५】 बस्त्र 
१】सफेद कपड़ा दोमीटर) 
२】लाल कपड़ा (2मीटर) 
३】काला कपड़ा 2मीटर)
 ४】हरा कपड़ा 2मीटर)  पीला कपड़ा 2 मीटर

४६】पंच रत्न (सामर्थ्य अनुसार)
 ४७】दीपक 
४८】तुलसी दल
 ४८】केले के पत्ते (यदि उपलब्ध हों तो खंभे सहित) 49】बन्दनवार 50】पान के पत्ते ------------11 नग 51】रुई
 ५२】भस्म 
53】ध्वजालाल-1 
पचरंगा -1 
54】प्रसाद(अनुमानि) ====================================नवग्रह समिधा======= 
१】आक 
२】 छोला
 ३】खैर 
४】आंधी झाड़ा
 ५】पीपल 
६】उमर(गूलर) 
७】शमी 
८】दूर्वा 
९】कुशा


घरेलू समान 
आसान बिछाने के लिए 
चौकी 2/2की पांच या फिर प्लाई एक 3/6 की
दूध ,दही ,फूल ,दूर्वा ,पूजा के लिए  बर्तन ,भगवान की तस्वीरे , आटा चोक पुरने के  लिए,
 
Gurudev 
Bhubneshwar
9893946810

Friday, 20 September 2024

#गणेश जी की आरती


जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

एकदंत, दयावन्त, चार भुजाधारी,
माथे सिन्दूर सोहे, मूस की सवारी। 
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।। ..
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश, देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया,
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया। 
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।। 
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा .. 
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा। 

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। 
कामना को पूर्ण करो जय बलिहारी

Sunday, 15 September 2024

#सूतक

#अशौची से संसर्ग करनेवालोंकी शुद्धि

अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव च।
स्नात्वा सचैलः स्पृष्ट्वाऽग्निं घृतं प्राश्य विशुध्यति॥
(मनुस्मृति - ५.१०३)

जो मनुष्य (सपिण्डसे भिन्न) अपनी जाति अथवा अन्य जाति के साथ श्मशान में जाता है वह वस्त्रोंके सहित स्नान करके अग्निका स्पर्श करने और घी खानेपर शुद्ध होताहै॥ 

ब्राह्मणेनानुगन्तव्यो न शूद्रो न द्विजः क्वचि।
अनुगम्याम्भसि स्नात्वा स्पृष्टाग्निं घृतभुक्शुचिः॥
(याज्ञवल्क्यस्मृति - ३.२६)

ब्राह्मण को उचित है कि (असपिण्ड) द्विज अथवा शूद्रके मुर्देके साथ श्मशान में नही जावे; किन्तु यदि जावे तो जलमें स्नान करके अग्निका स्पर्श और घी भोजन करके शुद्ध होवे॥

यस्तैः सहान्नं कुर्याच्च यानादीनि तु चैवं हि।
ब्राह्मणे वा परे वापि दशाहेन विशुध्यति॥ 
यस्तेषामन्नमश्नाति स तु देवोऽपि कामतः।
तदा शौचनिवृत्तेषु स्नानं कृत्वा विशुध्यति॥
यावत्तदन्नमश्नाति दुर्भिक्षाभिहतो नरः।
तावन्त्यन्यन्यशुद्धिः स्यात्प्रायश्चित्तं ततश्चरेत्॥
(उशनास्मृति - ६.४८-५०)

ब्राह्मण अथवा अन्य वर्णका मनुष्य जो कोई अशौचीके सहित अन्न भोजन या एकत्र यानादि व्यवहार करेगा वह १० दिनपर अर्थात् अशौची के शुद्ध होनेपर शुद्ध होगा॥  जो जान करके अशौचवालेके घर अन्न खाता है वह देवता होनेपर भी अशौचवाले के शुद्ध होनेपर स्नान करके शुद्ध होता है; किन्तु जो दुर्भिक्षसे पीड़ित होकर प्राणरक्षाके लिये अशौचवालेके घर जितने दिन भोजन करता है वह उतने दिनतक अशुद्ध रहता है, उसके बाद स्नान आदि प्रायश्चित्त करके शुद्ध हो जाता है॥

असपिण्डेर्न कर्त्तव्यं चूडाकार्ये विशेषतः॥
जन्मप्रभृतिसंस्कारे श्मशानान्ते च भोजनम्॥
(आपस्तम्ब स्मृति - ९.२१-२२)
जातकर्म आदि संस्कार के समय, प्रेतकर्ममें और विशेष करके चूड़ाकरणके समय असपिण्डके घर भोजन नहीं करना चाहिये॥

संपर्कादुष्यते विप्रो जनने मरणे तथा।
संपर्काच्च निवृत्तस्य न प्रेतं नैव सूतकम्॥ 
(पाराशरस्मृति - ३.२१)

ब्राह्मण असपिण्ड के मृत्यु तथा जन्मके अशौचमें केवल सम्पर्कसे ही दूषित होता है; यदि वह अशौच वालेसे सम्पर्क नहीं रखे तो उसको मरणका अथवा जन्मका अशौच नहीं लगता है॥

#अनाथब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः।
पदे पदे यज्ञफलमानुपूर्व्यालभन्ति ते॥
न तेषामशुभं किञ्चित्पापं वा शुभकर्मणाम्।
जला गाहनात्तेषां सद्यः शौचं विधीयते॥ 
असगोत्रमबन्धुश्च प्रेतीभूतद्विजोत्तमम्।
वहित्वा च दहित्वा च प्राणायामेन शुध्यति॥
(पाराशरस्मृति ३.४१-४३)

जो द्विजाति अनाथ ब्राह्मणके मृत शरीरको ढोकर श्मशानमें ले जाते हैं वे पद-पद पर यज्ञ करनेका फल पाते हैं; उन शुभ कर्म करनेवालोंको न तो कुछ दोष लगता है न अशुभ होता है; वे लोग जलमें स्नान करनेसे उसी समय शुद्ध होजाते हैं।  जो ब्राह्मण अन्य गोत्र और अबान्धव मृतकको ढोता है और दाह करता है वह प्राणायाम करने पर शुद्ध होजाता है।

#पराशौचे नरो भुक्त्वा कृमियोनौ प्रजायते। 
भुक्त्वान्नं म्रियते यस्य तस्य योनौ प्रजायते॥
(शङ्खस्मृति - १५.२४)
जो मनुष्य अन्यके अशौचमे अर्थात् उसके शुद्ध होनेसे पहिले उसके घर भोजन करता है वह कीड़की योनि में जन्म लेता है और जो जिसका अन्न खाकर अर्थात् पेटमें उसका अन्न रहनेपर मर जाता है वह उसी की जाति जन्मता॥

अनिर्दशाहे पक्वान्नं नियोगाद्यस्त भुक्तवान्।
कृमिर्भूत्वा स देहान्ते तद्विष्टामुपजीवति॥  द्वादशमासान्द्वादशार्द्धमासान्वाऽनश्नन्संहितामधीयानः पूतो भवतीति विज्ञायते॥
(वसिष्ठस्मृति - ४.२७-२८)

जो ब्राह्मण अशौचवाले ब्राह्मणके घर १० दिनके भीतर निमन्त्रित होकर पका हुआ अन्न खाता है वह मरनेपर कीड़ा होकर अशौचवालेकी विष्ठा से जीता है। वह मनुष्य १२ मास अथवा ६ मास अन्नरहित होकर (केवल दूध पीकर) वेदकी संहिताका पाठ करनेपर शुद्ध होजाता है; ऐसा शास्त्र से जाना गया है॥
-आचार्य श्री दीनदयालमणि त्रिपाठी जी
-आचार्य_। वैदिक नितिन शुक्ला जी ✍️🙏

#ब्रह्मण का धन

ब्राह्मण का धन सम्पत्ति कभी नहीं खाना चाहिए??
-::-  -::-
1.नाहं हालाहलं मन्ये विषं यस्य प्रतिक्रिया।
ब्रह्मस्वं हि विषं प्रोक्तं नास्य प्रतिविधिर्भुवि।।१२/ ३३।।
2.हिनस्ति विषमत्तारं वह्निरद्भिः प्रशाम्यति।
कुलं समूलं दहति ब्रह्मस्वारणिपावकः
।।१२/ ३४।।
3.स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्तिं हरेच्च यः।
#षष्टिवर्षसहस्त्राणिविष्ठायां जायते कृमिः।।१२/३९।।
4.यथाहं प्रणमे विप्राननुकालं समाहितः।
तथा नमत यूयं च योन्यथा मे  स दण्डभाक्।।१२/४२।।
                  ----------

मैं हलाहल विषको विष नहीं मानता,क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है।वस्तुत: ब्राह्मणोंका धन ही परम विष है;उसको पचा लेनेके लिये पृथ्वीमें कोई औषध,कोई उपाय नहीं है

जो मनुष्य अपनी या दूसरोंकी दी हुई ब्राह्मणोंकी वृत्ति,उनकी जीविकाके साधन छीन लेते हैं,वे साठ हजार वर्ष तक विष्ठाके कीड़े होते हैं।
Arun Dubey Jabalpur

👇👇👇
कृष्णः परिजनं प्राह भगवान्देवकीसुतः
ब्रह्मण्यदेवो धर्मात्मा राजन्याननुशिक्षयन् ३१

दुर्जरं बत ब्रह्मस्वं भुक्तमग्नेर्मनागपि
तेजीयसोऽपि किमुत राज्ञां ईश्वरमानिनाम् ३२

नाहं हालाहलं मन्ये विषं यस्य प्रतिक्रिया
ब्रह्मस्वं हि विषं प्रोक्तं नास्य प्रतिविधिर्भुवि ३३

हिनस्ति विषमत्तारं वह्निरद्भिः प्रशाम्यति
कुलं समूलं दहति ब्रह्मस्वारणिपावकः ३४

ब्रह्मस्वं दुरनुज्ञातं भुक्तं हन्ति त्रिपूरुषम्
प्रसह्य तु बलाद्भुक्तं दश पूर्वान्दशापरान् ३५

राजानो राजलक्ष्म्यान्धा नात्मपातं विचक्षते
निरयं येऽभिमन्यन्ते ब्रह्मस्वं साधु बालिशाः ३६

गृह्णन्ति यावतः पांशून्क्रन्दतामश्रुबिन्दवः
विप्राणां हृतवृत्तीनाम्वदान्यानां कुटुम्बिनाम् ३७

राजानो राजकुल्याश्च तावतोऽब्दान्निरङ्कुशाः
कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते ब्रह्मदायापहारिणः ३८

स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्तिं हरेच्च यः
षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः ३९

न मे ब्रह्मधनं भूयाद्यद्गृध्वाल्पायुषो नराः
पराजिताश्च्युता राज्याद्भवन्त्युद्वेजिनोऽहयः ४०

विप्रं कृतागसमपि नैव द्रुह्यत मामकाः
घ्नन्तं बहु शपन्तं वा नमस्कुरुत नित्यशः ४१

यथाहं प्रणमे विप्राननुकालं समाहितः
तथा नमत यूयं च योऽन्यथा मे स दण्डभाक् ४२

ब्राह्मणार्थो ह्यपहृतो हर्तारं पातयत्यधः
अजानन्तमपि ह्येनं नृगं ब्राह्मणगौरिव ४३

एवं विश्राव्य भगवान्मुकुन्दो द्वारकौकसः
पावनः सर्वलोकानां विवेश निजमन्दिरम् 
अर्थ 👇👇👇👇👇👇
राजा नृगके चले जानेपर ब्राह्मणोंके परम प्रेमी, धर्मके आधार देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने क्षत्रियोंको शिक्षा देनेके लिये वहाँ उपस्थित अपने कुटुम्बके लोगोंसे कहा— ।। 
‘जो लोग अग्रिके समान तेजस्वी हैं, वे भी ब्राह्मणोंका थोड़े-से-थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते। फिर जो अभिमानवश झूठमूठ अपनेको लोगोंका स्वामी समझते हैं, वे राजा तो क्या पचा सकते हैं ?।। 
मैं हलाहल विषको विष नहीं मानता, क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है। वस्तुत: ब्राह्मणोंका धन ही परम विष है; उसको पचा लेनेके लिये पृथ्वीमें कोई औषध, कोई उपाय नहीं है ।। ३३ ।।
हलाहल विष केवल खानेवालेका ही प्राण लेता है, और आग भी जलके द्वारा बुझायी जा सकती है; परंतु ब्राह्मणके धनरूप अरणिसे जो आग पैदा होती है, वह सारे कुलको समूल जला डालती है ।। 
ब्राह्मणका धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिये बिना भोगा जाय तब तो वह भोगनेवाले, उसके लडक़े और पौत्र—इन तीन पीढिय़ोंको ही चौपट करता है। परंतु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाय, तब तो पूर्वपुरुषोंकी दस पीढिय़ाँ और आगेकी भी दस पीढिय़ाँ नष्ट हो जाती हैं ।। 
 जो मूर्ख राजा अपनी राजलक्ष्मीके घमंडसे अंधे होकर ब्राह्मणोंका धन हड़पना चाहते हैं, समझना चाहिये कि वे जान-बूझकर नरकमें जानेका रास्ता साफ कर रहे हैं। वे देखते नहीं कि उन्हें अध:पतनके कैसे गहरे गड्ढेमें गिरना पड़ेगा ।।  ।।
जिन उदारहृदय और बहुकुटुम्बी ब्राह्मणोंकी वृत्ति छीन ली जाती है, उनके रोनेपर उनके आँसूकी बूँदोंसे धरतीके जितने धूलिकण भीगते हैं, उतने वर्षोंतक ब्राह्मणके स्वत्वको छीननेवाले उस उच्छृङ्खल राजा और उसके वंशजोंको कुम्भीपाक नरकमें दु:ख भोगना पड़ता है ।। 
जो मनुष्य अपनी या दूसरोंकी दी हुई ब्राह्मणोंकी वृत्ति, उनकी जीविकाके साधन छीन लेते हैं, वे साठ हजार वर्षतक विष्ठाके कीड़े होते हैं ।।
 इसलिये मैं तो यही चाहता हूँ कि ब्राह्मणोंका धन कभी भूलसे भी मेरे कोषमें न आये, क्योंकि जो लोग ब्राह्मणोंके धनकी इच्छा भी करते हैं—उसे छीननेकी बात तो अलग रही—वे इस जन्ममें अल्पायु, शत्रुओंसे पराजित और राज्यभ्रष्ट हो जाते हैं और मृत्युके बाद भी वे दूसरोंको कष्ट देनेवाले साँप ही होते हैं ।। 
इसलिये मेरे आत्मीयो ! यदि ब्राह्मण अपराध करे, तो भी उससे द्वेष मत करो । वह मार ही क्यों न बैठे या बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे, उसे तुमलोग सदा नमस्कार ही करो ।। 
जिस प्रकार मैं बड़ी सावधानीसे तीनों समय ब्राह्मणोंको प्रणाम करता हूँ, वैसे ही तुमलोग भी किया करो। जो मेरी इस आज्ञाका उल्लङ्घन करेगा, उसे मैं क्षमा नहीं करूँगा, दण्ड दूँगा ।। 
यदि ब्राह्मणके धनका अपहरण हो जाय तो वह अपहृत धन उस अपहरण करनेवालेको—अनजानमें उसके द्वारा यह अपराध हुआ हो तो भी— अध:पतनके गड्ढे में डाल देता है। जैसे ब्राह्मणकी गाय ने अनजान में उसे लेनेवाले राजा नृगको नरकमें डाल दिया था ।। 
परीक्षित्‌ ! समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण द्वारका- वासियोंको इस प्रकार उपदेश देकर अपने महलमें चले गये।।
   Arun shastri जबलपुर 
❗जय महादेव❗
 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

Saturday, 14 September 2024

#पुत्र होने का अचूक नुस्खा

अवश्य लड़का ही होगा 

भांग के बीज नया गुड़ दोनों एक एक तोला लें पांच मोर पंख की चंद्रिका घोंट कर चौदह गोली बनायें जब ढाई माह का गर्भ हो तब बछड़े बाली गाय के दूध में एक एक  गोली सात दिन तक खाएं दवा खाते समय कन्या नहीं देखें वाल रुप में कन्हैया जी के फोटो के दर्शन करें 

                 गुरुदेव
भुवनेश्वर