ज्योतिष समाधान

Tuesday, 3 September 2024

#आचमन का महत्व

आचमन/ पवित्रता क्यों आवश्यक है........?

* सकल सौच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा॥
अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए॥

भावार्थ:-शौच के सब कार्य करके (नित्य) पवित्र और सुजान श्री रामचन्द्रजी ने स्नान किया। फिर बड़ का दूध मँगाया और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित उस दूध से सिर पर जटाएँ बनाईं। यह देखकर सुमंत्रजी के नेत्रों में जल छा गया॥

संध्या वंदन के समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है। संधिकाल में ही संध्या वंदन किया जाता है। वेदज्ञ और ईश्‍वरपरायण लोग इस समय प्रार्थना करते हैं। ज्ञानीजन इस समय ध्‍यान करते हैं। भक्तजन कीर्तन करते हैं।  

पुराणिक लोग देवमूर्ति के समक्ष इस समय पूजा या आरती करते हैं। तब सिद्ध हुआ की संध्योपासना या हिन्दू प्रार्थना के चार प्रकार हो गए हैं- (1)प्रार्थना-स्तुति, (2)ध्यान-साधना, (3)कीर्तन-भजन और (4)पूजा-आरती।

 व्यक्ति की जिस में जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है।   

भारतीय परंपरा में पूजा, प्रार्थना और दर्शन से पहले शौच और आचमन करने का विधान है। बहुत से लोग मंदिर में बगैर शौच या आचमन किए जले जाते हैं जो कि अनुचित है। प्रात्येक मंदिर के बाहर या प्रांगण में नल जल की उचित व्यवस्था होनी चाहिए जहां व्यक्ति बैठकर अच्छे से खुद को शुद्ध कर सके। जल का उचित स्थान नहीं है तो यह मंदिर दोष में गिना जाएगा। 
 
शौच का अर्थ : - शौच अर्थात शुचिता, शुद्धता, शुद्धि, विशुद्धता, पवित्रता और निर्मलता। शौच का अर्थ शरीर और मन की बाहरी और आंतरिक पवित्रता से है। आचमन से पूर्व शौचादि से निवृत्त हुआ जाता है।

 शौच का अर्थ है अच्छे से मल-मूत्र त्यागना भी है। शौच के दो प्रकार हैं- बाह्य और आभ्यन्तर। बाह्य का अर्थ बाहरी शुद्धि से है और आभ्यन्तर का अर्थ आंतरिक अर्थात मन वचन और कर्म की शुद्धि से है। जब व्यक्ति शरीर, मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहता है तब उसे स्वास्थ्‍य और सकारात्मक ऊर्जा का लाभ मिलना शुरू हो जाता है।
 
*शौचादि से निवृत्ति होने के बाद पूजा, प्रार्थना के पूर्व आचमन किया जाता है। मंदिर में जाकर भी सबसे पहले आचमन किया जाता है।
 
शौच के दो प्रकार हैं- बाह्य और आभ्यन्तर।

*बाहरी शुद्धि- हमेशा दातुन कर स्नान करना एवं पवित्रता बनाए रखना बाह्य शौच है। कितने भी बीमार हों तो भी मिट्टी, साबुन, पानी से थोड़ी मात्रा में ही सही लेकिन बाहरी पवित्रता अवश्य बनाए रखनी चाहिए। आप चाहे तो शरीर के जो छिद्र हैं उन्हें ही जल से साफ और पवित्र बनाएँ रख सकते हैं। बाहरी शुद्धता के लिए अच्छा और पवित्र जल एवं भोजन करना भी जरूरी है। अपवित्र या तामसिक खानपान से बाहरी शु‍द्धता भंग होती है।
 
*आंतरिक शुद्धि- आभ्यन्तर शौच उसे कहते हैं जिसमें हृदय से राग-द्वेष तथा मन के सभी खोटे कर्म को दूर किया जाता है। जैसे क्रोध से मस्तिष्क और स्नायुतंत्र क्षतिग्रस्त होता है।

 लालच, ईर्ष्या, कंजूसी आदि से मन में संकुचन पैदा होता है जो शरीर की ग्रंथियों को भी संकुचित कर देता है। यह सभी हमारी सेहत को प्रभावित करते हैं। मन, वचन और कर्म से पवित्र रहना ही आंतरिक शुद्धता के अंतर्गत आता है अर्थात अच्छा सोचे, बोले और करें।
 
शौच के लाभ- ईर्ष्या, द्वेष, तृष्णा, अभिमान, कुविचार और पंच क्लेश को छोड़ने से दया, क्षमा, नम्रता, स्नेह, मधुर भाषण तथा त्याग का जन्म होता है। इससे मन और शरीर में जाग्रति का जन्म होता है। विचारों में सकारात्मकता बढ़कर उसके असर की क्षमता बढ़ती है। रोग और शोक से छुटकारा मिलता है। शरीर स्वस्थ और सेहतमंद अनुभव करता है। निराशा, हताशा और नकारात्मकता दूर होकर व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ती है।
 
जानिए आचमन के बारे में विस्तार से...
 
आचमन का अर्थ : - आचमन का अर्थ होता है जल पीना। प्रार्थना, दर्शन, पूजा, यज्ञ आदि आरंभ करने से पूर्व शुद्धि के लिए मंत्र पढ़ते हुए जल पीना ही आचमन कहलाता है। इससे मन और हृदय की शुद्धि होती है। आचमनी का अर्थ एक छोटा तांबे का लोटा और तांबे की चम्मच को आचमनी कहते हैं। छोटे से तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें तुलसी डालकर हमेशा पूजा स्थल पर रखा जाता है। यह जल आचमन का जल कहलाता है। इस जल को तीन बार ग्रहण किया जाता है। माना जाता है कि ऐसे आचमन करने से पूजा का दोगुना फल मिलता है।
 
आचमन विधि : - वैसे तो आचमन के कई विधान और मंत्र है लेकिन यहां छोटी सी ही विधि प्रस्तुत है। आचमन सदैव उत्तर, ईशान या पूर्व दिशा की ओर मुख करके ही किया जाता है अन्य दिशाओं की ओर मुंह करके कदापि न करें। संध्या के पात्र तांबे का लोटा, तारबन, आचमनी, टूक्कस हाथ धोने के लिए कटोरी, आसन आदि लेकर के गायत्री छंद से इस संध्या की शुरुआत की जाती है। प्रातःकाल की संध्या तारे छिपने के बाद तथा सूर्योदय पूर्व करते हैं।
 
आचमन के लिए जल इतना लें कि हृदय तक पहुंच जाए। अब हथेलियों को मोड़कर गाय के कान जैसा बना लें कनिष्ठा व अंगुष्ठ को अलग रखें। तत्पश्चात जल लेकर तीन बार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं:- हुए जल ग्रहण करें-
ॐ केशवाय नम: 
ॐ नाराणाय नम:
ॐ माधवाय नम:
ॐ ह्रषीकेशाय नम:, बोलकर ब्रह्मतीर्थ (अंगुष्ठ का मूल भाग) से दो बार होंठ पोंछते हुए हस्त प्रक्षालन करें (हाथ धो लें)। उपरोक्त विधि ना कर सकने की स्थिति में केवल दाहिने कान के स्पर्श मात्र से ही आचमन की विधि की पूर्ण मानी जाती है।
 
आचमन मुद्रा : - शास्त्रों में कहा गया है कि,,,
 त्रिपवेद आपो गोकर्णवरद् हस्तेन त्रिराचमेत्। यानी आचमन के लिए बाएं हाथ की गोकर्ण मुद्रा ही होनी चाहिए तभी यह लाभदायी रहेगा। गोकर्ण मुद्रा बनाने के लिए तर्जनी को मोड़कर अंगूठे से दबा दें। उसके बाद मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठिका को परस्पर इस प्रकार मोड़ें कि हाथ की आकृति गाय के कान जैसी हो जाए।
 
भविष्य पुराण के अनुसार जब पूजा की जाए तो आचमन पूरे विधान से करना चाहिए। जो विधिपूर्वक आचमन करता है, वह पवित्र हो जाता है। सत्कर्मों का अधिकारी होता है। आचमन की विधि यह है कि हाथ-पांव धोकर पवित्र स्थान में आसन के ऊपर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दाहिने हाथ को जानु के अंदर रखकर दोनों पैरों को बराबर रखें। फिर जल का आचमन करें।
 
आचमन करते समय हथेली में 5 तीर्थ बताए गए हैं- 1. देवतीर्थ, 2. पितृतीर्थ, 3. ब्रह्मातीर्थ, 4. प्रजापत्यतीर्थ और 5. सौम्यतीर्थ।
 
कहा जाता है कि अंगूठे के मूल में ब्रह्मातीर्थ, कनिष्ठा के मूल में प्रजापत्यतीर्थ, अंगुलियों के अग्रभाग में देवतीर्थ, तर्जनी और अंगूठे के बीच पितृतीर्थ और हाथ के मध्य भाग में सौम्यतीर्थ होता है, जो देवकर्म में प्रशस्त माना गया है।

 आचमन हमेशा ब्रह्मातीर्थ से करना चाहिए। आचमन करने से पहले अंगुलियां मिलाकर एकाग्रचित्त यानी एकसाथ करके पवित्र जल से बिना शब्द किए 3 बार आचमन करने से महान फल मिलता है। आचमन हमेशा 3 बार करना चाहिए।
 
आचमन के बारे में स्मृति ग्रंथ में लिखा है कि
प्रथमं यत् पिबति तेन ऋग्वेद प्रीणाति।
यद् द्वितीयं तेन यजुर्वेद प्रीणाति।
यत् तृतीयं तेन सामवेद प्रीणाति।
 
श्लोक का अर्थ है कि आचमन क्रिया में हर बार एक-एक वेद की तृप्ति प्राप्त होती है। प्रत्येक कर्म के आरंभ में आचमन करने से मन, शरीर एवं कर्म को प्रसन्नता प्राप्त होती है। आचमन करके अनुष्ठान प्रारंभ करने से छींक, डकार और जंभाई आदि नहीं होते हालांकि इस मान्यता के पीछे कोई उद्देश्य नहीं है।
 
पहले आचमन से ऋग्वेद और द्वितीय से यजुर्वेद और तृतीय से सामवेद की तृप्ति होती है। आचमन करके जलयुक्त दाहिने अंगूठे से मुंह का स्पर्श करने से अथर्ववेद की तृप्ति होती है। आचमन करने के बाद मस्तक को अभिषेक करने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। दोनों आंखों के स्पर्श से सूर्य, नासिका के स्पर्श से वायु और कानों के स्पर्श से सभी ग्रंथियां तृप्त होती हैं। माना जाता है कि ऐसे आचमन करने से पूजा का दोगुना फल मिलता है।
 
"शौच ईपसु: सर्वदा आचामेद एकान्ते प्राग उदड़्ग मुख:" (मनुस्मृति) 

अर्थात जो पवित्रता की कामना रखता है उसे एकान्त में आचमन अवश्य करना चाहिए। 'आचमन' कर्मकांड की सबसे जरूरी विधि मानी जाती है। वास्तव में आचमन केवल कोई प्रक्रिया नहीं है। यह हमारी बाहरी और भीतरी शुद्धता का प्रतीक है। 
 
“एवं स ब्राह्मणों नित्यमुस्पर्शनमाचरेत्।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यंन्तं जगत् स परितर्पयेत्॥”

प्रत्येक कार्य में आचमन का विधान है। आचमन से हम न केवल अपनी शुद्धि करते हैं अपितु ब्रह्मा से लेकर तृण तक को तृप्त कर देते हैं। जब हम हाथ में जल लेकर उसका आचमन करते हैं तो वह हमारे मुंह से गले की ओर जाता है, यह पानी इतना थोड़ा होता है कि सीधे आंतों तक नहीं पहुंचता। 

हमारे हृदय के पास स्थित ज्ञान चक्र तक ही पहुंच पाता है और फिर इसकी गति धीमी पड़ जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि हम वचन और विचार दोनों से शुद्ध हो गए हैं तथा हमारी मन:स्थिति पूजा के लायक हो गई है। आचमन में तांबे के विशेष पात्र से हथेली में जल लेकर ग्रहण किया जाता है। उसके बाद खुद पर जल छिड़क कर शुद्ध किया जाता है।
 
मनुस्मृति में कहा गया है कि- नींद से जागने के बाद, भूख लगने पर, भोजन करने के बाद, छींक आने पर, असत्य भाषण होने पर, पानी पीने के बाद, और अध्ययन करने के बाद आचमन जरूर करें।

सत्य सनातन धर्म की जय हो।।
Arun shastri जबलपुर 
 ❗जय महादेव❗
 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

Monday, 2 September 2024

#हवन

🔥🔥🔥 हवन 🔥🔥🔥
हवन कुंड और हवन के नियमों के बारे में विशेष जानकारी 
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जन्म से मृत्युपर्यन्त सोलह संस्कार या कोई शुभ धर्म कृत्य यज्ञ अग्निहोत्र के बिना अधूरा माना जाता है। वैज्ञानिक तथ्यानुसार जहाॅ हवन होता है, उस स्थान के आस-पास रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु शीघ्र नष्ट हो जाते है।
शास्त्रों में अग्नि देव को जगत के कल्याण का माध्यम माना गया है जो कि हमारे द्वारा दी गयी होम आहुतियों को देवी देवताओं तक पहुंचाते है। जिससे देवगण तृप्त होकर कर्ता की कार्यसिद्धि करते है। इसलिये पुराणों में कहा गया है।
 ""अग्निर्वे देवानां दूतं ""
कोई भी मन्त्र जाप की पूर्णता , प्रत्येक संस्कार , पूजन अनुष्ठान आदि समस्त दैवीय कर्म , हवन के बिना अधूरा रहता है।
हवन दो प्रकार के होते हैं वैदिक तथा तांत्रिक. आप  हवन वैदिक करायें या तांत्रिक दोनों प्रकार के हवनों को कराने के लिए हवन कुंड की वेदी और भूमि का निर्माण करना अनिवार्य होता हैं. शास्त्रों के अनुसार वेदी और कुंड हवन के द्वारा निमंत्रित देवी देवताओं की तथा कुंड की सज्जा की रक्षा करते हैं. इसलिए इसे “मंडल” भी कहा जाता हैं.
हवन की भूमि👉  हवन करने के लिए उत्तम भूमि को चुनना बहुत ही आवश्यक होता हैं. हवन के लिए सबसे उत्तम भूमि नदियों के किनारे की, मन्दिर की, संगम की, किसी उद्यान की या पर्वत के गुरु ग्रह और ईशान में बने हवन कुंड की मानी जाती हैं. हवन कुंड के लिए फटी हुई भूमि, केश युक्त भूमि तथा सांप की बाम्बी वाली भूमि को अशुभ माना जाता हैं.
हवन कुंड की बनावट👉  हवन कुंड में तीन सीढियाँ होती हैं. जिन्हें “ मेखला ” कहा जाता हैं. हवन कुंड की इन सीढियों का रंग अलग – अलग होता हैं.
1👉 हवन कुंड की सबसे पहली सीधी का रंग सफेद होता हैं.
2👉 दूसरी सीढि का रंग लाल होता हैं.
3👉 अंतिम सीढि का रंग काला होता हैं.
ऐसा माना जाता हैं कि हवन कुंड की इन तीनों सीढियों में तीन देवता निवास करते हैं.
1👉 हवन कुंड की पहली सीढि में विष्णु भगवान का वास होता हैं.
2👉 दूसरी सीढि में ब्रह्मा जी का वास होता हैं.
3👉 तीसरी तथा अंतिम सीढि में शिवजी का वास होता हैं.
हवन कुंड के बाहर गिरी सामग्री को हवन कुंड में न डालें - आमतौर पर जब हवन किया जाता हैं तो हवन में हवन सामग्री या आहुति डालते समय कुछ सामग्री नीचे गिर जाती हैं. जिसे कुछ लोग हवन पूरा होने के बाद उठाकर हवन कुंड में डाल देते हैं. ऐसा करना वर्जित माना गया हैं. हवन कुंड की ऊपर की सीढि पर अगर हवन सामग्री गिर गई हैं तो उसे आप हवन कुंड में दुबारा डाल सकते हैं. इसके अलावा दोनों सीढियों पर गिरी हुई हवन सामग्री वरुण देवता का हिस्सा होती हैं. इसलिए इस सामग्री को उन्हें ही अर्पित कर देना चाहिए।
तांत्रिक हवन कुंड 👉  वैदिक हवन कुंड के अलावा तांत्रिक हवन कुंड में भी कुछ यंत्रों का प्रयोग किया जाता हैं. तांत्रिक हवन करने के लिए आमतौर पर त्रिकोण कुंड का प्रयोग किया जाता हैं.
हवन कुंड और हवन के नियम 
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हवन कुंड के प्रकार - हवन कुंड कई प्रकार के होते हैं. जैसे कुछ हवन कुंड वृताकार के होते हैं तो कुछ वर्गाकार अर्थात चौरस होते हैं. कुछ हवन कुंडों का आकार त्रिकोण तथा अष्टकोण भी होता हैं.
आहुति के अनुसार हवन कुंड बनवायें 
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1👉 अगर अगर आपको हवन में 50 या 100 आहुति देनी हैं तो कनिष्ठा उंगली से कोहनी (1 फुट से 3 इंच )तक के माप का हवन कुंड तैयार करें.
2👉 यदि आपको 1000 आहुति का हवन करना हैं तो इसके लिए एक हाथ लम्बा (1 फुट 6 इंच ) हवन कुंड तैयार करें.
3👉 एक लक्ष आहुति का हवन करने के लिए चार हाथ (6 फुट) का हवनकुंड बनाएं.
4👉 दस लक्ष आहुति के लिए छ: हाथ लम्बा (9 फुट) हवन कुंड तैयार करें.
5👉 कोटि आहुति का हवन करने के लिए 8 हाथ का (12 फुट) या 16 हाथ का हवन कुंड तैयार करें.
6👉 यदि आप हवन कुंड बनवाने में असमर्थ हैं तो आप सामान्य हवन करने के लिए चार अंगुल ऊँचा, एक अंगुल ऊँचा, या एक हाथ लम्बा – चौड़ा स्थण्डिल पीली मिटटी या रेती का प्रयोग कर बनवा सकते हैं.
7👉 इसके अलावा आप हवन कुंड को बनाने के लिए बाजार में मिलने वाले ताम्बे के या पीतल के बने बनाए हवन कुंड का भी प्रयोग कर सकते हैं. शास्त्र के अनुसार इन हवन कुंडों का प्रयोग आप हवन करने के लिए कर सकते हैं. पीतल या ताम्बे के ये हवन कुंड ऊपर से चौड़े मुख के और नीचे से छोटे मुख के होते हैं. इनका प्रयोग अनेक विद्वान् हवन – बलिवैश्व – देव आदि के लिए करते हैं.
8👉 भविषयपुराण में 50 आहुति का हवन करने के लिए मुष्टिमात्र का निर्देश दिया गया हैं. भविष्यपूराण में बताये गए इस विषय के बारे में शारदातिलक तथा स्कन्दपुराण जैसे ग्रन्थों में कुछ मतभेद मिलता हैं।
हवन के नियम👉  वैदिक या तांत्रिक दोनों प्रकार के मानव कल्याण से सम्बन्धित यज्ञों को करने के लिए हवन में “मृगी” मुद्रा का इस्तेमाल करना चाहिए.
1👉 हवन कुंड में सामग्री डालने के लिए हमेशा शास्त्रों की आज्ञा, गुरु की आज्ञा तथा आचार्यों की आज्ञा का पालन करना चाहिए.
2👉 हवन करते समय आपके मन में यह विश्वास होना चाहिए कि आपके करने से कुछ भी नहीं होगा. जो होगा वह गुरु के करने से होगा.
3👉 कुंड को बनाने के लिए अड़गभूत वात, कंठ, मेखला तथा नाभि को आहुति एवं कुंड के आकार के अनुसार निश्चित किया जाना च हिए.
4👉 अगर इस कार्य में कुछ ज्यादा या कम हो जाते हैं तो इससे रोग शोक आदि विघ्न भी आ सकते हैं.
5👉 इसलिए हवन को तैयार करवाते समय केवल सुन्दरता का ही ध्यान न रखें बल्कि कुंड बनाने वाले से कुंड शास्त्रों के अनुसार तैयार करवाना चाहिए।
हवन करने के फायदे 
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1👉 हवन करने से हमारे शरीर के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं.
2👉 हवन करने से आस – पास का वातावरण शुद्ध हो जाता हैं.
3👉 हवन ताप नाशक भी होता हैं.
4👉 हवन करने से आस–पास के वातावरण में ऑक्सिजन की मात्रा बढ़ जाती हैं.
हवन से सम्बंधित कुछ आवश्यक बातें 
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अग्निवास का विचार 
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तिथि वार के अनुसार अग्नि का वास पृथ्वी ,आकाश व पाताल लोक में होता है। पृथ्वी का अग्नि वास समस्त सुख का प्रदाता है लेकिन आकाश का अग्नि वास शारीरिक कष्ट तथा पाताल का धन हानि कराता है। इसलिये नित्य हवन , संस्कार व अनुष्ठान को छोड़कर अन्य पूजन कार्य में हवन के लिये अग्निवास अवश्य देख लेना चाहिए। 
हवन कार्य में विशेष सावधानियां 
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मुँह से फूंक मारकर, कपड़े या अन्य किसी वस्तु से धोक देकर हवन कुण्ड में अग्नि प्रज्ज्वलित करना तथा जलती हुई हवन की अग्नि को  हिलाना - डुलाना या छेड़ना नही चाहिए।
हवन कुण्ड में प्रज्ज्वलित हो रही अग्नि शिखा वाला भाग ही अग्नि देव का मुख कहलाता है। इस भाग पर ही आहुति करने से सर्वकार्य की सिद्धि होती है। अन्यथा 
कम जलने वाला भाग नेत्र - यहाँ आहुति डालने पर अंधापन , 
धुँआ वाला भाग नासिका - यहां आहुति डालने से मानसिक कष्ट ,
अंगारा वाला भाग मस्तक - यहां आहुति डालने पर धन नाश तथा काष्ठ वाला भाग अग्नि देव का कर्ण कहलाता है यहां आहुति करने से शरीर में कई प्रकार की व्याधि हो जाती है। हवन अग्नि को पानी डालकर बुझाना नही चाहिए। 
विशेष कामना पूर्ति के लिये अलग अलग होम सामग्रियों का प्रयोग भी किया जाता है।
सामान्य हवन सामग्री ये है
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तिल, जौं, चावल ,सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , पानड़ी , लौंग , बड़ी इलायची , गोला , छुहारे , सर्वोषधि ,नागर मौथा , इन्द्र जौ , कपूर काचरी , आँवला ,गिलोय, जायफल, ब्राह्मी तुलसी किशमिश, बालछड़ , घी आदि ......
हवन समिधाएँ
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कुछ अन्य समिधाओं का भी वाशिष्ठी हवन पद्धति में वर्णन है । उसमें ग्रहों तथा देवताओं के हिसाब से भी कुछ समिधाएँ बताई गई हैं। तथा विभिन्न वृक्षों की समिधाओं के फल भी अलग-अलग कहे गये हैं। 
यथा-नोः पालाशीनस्तथा।
खादिरी भूमिपुत्रस्य त्वपामार्गी बुधस्य च॥
गुरौरश्वत्थजा प्रोक्त शक्रस्यौदुम्बरी मता ।
शमीनां तु शनेः प्रोक्त राहर्दूर्वामयी तथा॥
केतोर्दभमयी प्रोक्ताऽन्येषां पालाशवृक्षजा॥
आर्की नाशयते व्याधिं पालाशी सर्वकामदा। 
खादिरी त्वर्थलाभायापामार्गी चेष्टादर्शिनी।
प्रजालाभाय चाश्वत्थी स्वर्गायौदुम्बरी भवेत।
शमी शमयते पापं दूर्वा दीर्घायुरेव च ।
कुशाः सर्वार्थकामानां परमं रक्षणं विदुः ।
यथा बाण हारणां कवचं वारकं भवेत ।
तद्वद्दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारिका॥
यथा समुत्थितं यन्त्रं यन्त्रेण प्रतिहन्यते ।
तथा समुत्थितं घोरं शीघ्रं शान्त्या प्रशाम्यति॥
अब समित (समिधा) का विचार कहते हैं, सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मङ्गल की खैर की, बुध की चिड़चिडा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु दूर्वा की, और केतु की कुशा की समिधा कही गई है । इनके अतिरिक्त देवताओं के लिए पलाश वृक्ष की समिधा जाननी चाहिए । मदार की समिक्षा रोग को नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है। जिस प्रकार बाण के प्रहारों को रोकने वाला कवच होता है, उसी प्रकार दैवोपघातों को रोकने वाली शान्ति होती है। जिस प्रकार उठे हुए अस्त्र को अस्त्र से काटा जाता है, उसी प्रकार (नवग्रह) शान्ति से घोर संकट शान्त हो जाते हैं।
ऋतुओं के अनुसार समिधा के लिए इन वृक्षों की लकड़ी विशेष उपयोगी सिद्ध होती है।
वसन्त-शमी
ग्रीष्म-पीपल
वर्षा-ढाक, बिल्व
शरद-पाकर या आम
हेमन्त-खैर
शिशिर-गूलर, बड़
यह लकड़ियाँ सड़ी घुनी, गन्दे स्थानों पर पड़ी हुई, कीडे़-मकोड़ों से भरी हुई न हों, इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए।
विभिन्न हवन सामग्रियाँ और समिधाएं विभिन्न प्रकार के लाभ देती हैं। विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता देती हैं।
प्राचीन काल में रोगी को स्वस्थ करने हेतु भी विभिन्न हवन होते थे। जिसे वैद्य या चिकित्सक रोगी और रोग की प्रकृति के अनुसार करते थे पर कालांतर में ये यज्ञ या हवन मात्र धर्म से जुड़ कर ही रह गए और इनके अन्य उद्देश्य लोगों द्वारा भुला दिए गये।
सर भारी या दर्द होने पर किस प्रकार हवन से इलाज होता था इस श्लोक से देखिये :-
श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितलं मनःशिला।। गन्धाश्चा गुरुपत्राद्या धूमं मुर्धविरेचनम्।। 
(चरक सू* 5/26-27)
अर्थात अपराजिता , मालकांगनी , हरताल, मैनसिल, अगर तथा तेज़पात्र औषधियों को हवन करने से शिरो विरेचन होता है। 
परन्तु अब ये चिकित्सा पद्धति विलुप्त प्राय हो गयी है।
रोग और उनके नाश के लिए प्रयुक्त होने वाली हवन सामग्री 
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१.👉 सर के रोग, सर दर्द, अवसाद, उत्तेजना, उन्माद मिर्गी आदि के लिए
ब्राह्मी, शंखपुष्पी , जटामांसी, अगर , शहद , कपूर , पीली सरसो
२.👉 स्त्री रोगों, वात पित्त, लम्बे समय से आ रहे बुखार हेतु बेल, श्योनक, अदरख, जायफल, निर्गुण्डी, कटेरी, गिलोय इलायची, शर्करा, घी, शहद, सेमल, शीशम
३.👉 पुरुषों को पुष्ट बलिष्ठ करने और पुरुष रोगों हेतु सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , अश्वगंधा , पलाश , कपूर , मखाने, गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , लौंग , बड़ी इलायची , गोला 
४.👉 पेट एवं लिवर रोग हेतु भृंगराज, आमला , बेल , हरड़, अपामार्ग, गूलर, दूर्वा , गुग्गुल घी , इलायची
५👉  श्वास रोगों हेतु वन तुलसी, गिलोय, हरड , खैर अपामार्ग, काली मिर्च, अगर तगर, कपूर, दालचीनी, शहद, घी, अश्वगंधा, आक, यूकेलिप्टिस।
हवन में आहुति डालने के बाद क्या करें
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आहुति डालने के बाद तीन प्रकार के क्षेत्रों का विभाजित करने के बाद मध्य भाग में पूर्व आदि दिशाओं की कल्पना करें. इसके बाद आठों दिशाओं की कल्पना करें. आठों दिशाओं के नाम हैं – पूर्व अग्नि, दक्षिण, नीऋति, पश्चिम, वायव्य, उत्तर तथा इशान।
हवन की पूर्णाहुति में ब्राह्मण भोजन 
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""ब्रह्स्पतिसंहिता "" के अनुसार यज्ञ हवन की पूर्णाहुति वस्तु विशेष से कराने पर निम्न संख्या में ब्राह्मण भोजन अवश्य कराना चाहिए। 
पान - 5 ब्राह्मण
पक्वान्न - 10 ब्राह्मण
ऋतुफल - 20 ब्राह्मण
सुपारी - 21 ब्राह्मण
नारियल - 100 ब्राह्मण
घृतधारा - 200 ब्राह्मण
हवन यज्ञ आदि से सम्बंधित समस्त जानकारियो के लिये ""यज्ञ मीमांसा "" देखें। 
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Sunday, 1 September 2024

# कुशा में जड़ में ब्रह्मा मध्य में विष्णु और ऊपर शिव का बास है

#कुशा_का_एक_ब्राह्मण_के_लिए_महत्व:-

ब्राह्मण को नित्य कुश धारण करने का निर्देश देते हुए कहा गया है कि-
"यथेन्द्रस्याशनिर्हस्ते यथा शूलं कपर्दिन: ।
यथा सुदर्शनं विष्णोर्विप्रहस्तकुशस्तथा ।।
वरुणस्य करे पाशो यथा दण्डो यमस्य तु ।
तथा ब्राह्मणहस्तस्थ: सकलं साधयेत् कुश:।।"
  #अर्थात्:-
जिस प्रकार देवराज इंद्र के हाथ में स्थित वज्र ,शंकर जी का त्रिशूल ,विष्णु का सुदर्शन चक्र ,वरुण देव का पाश, यमराज का दंड ,अमोघ होता है, वैसे ही ब्राम्हण के हाथ में स्थित कुश भी अमोघ एवं फलदाई होता है।

#कुश_का_अर्थ:- 
"पापाह्वय: 'कु' शब्द: स्यात् 'श' शब्द: शमनाह्वय: ।
तूर्णेन पाप शमनं येनैतत्कुश उच्यते ।।"
#अर्थात्:-
'कुश' नाम की व्युत्पत्ति में कहा गया है कि 'कु' शब्द समस्त पापों का वाचक है और 'श' शब्द सभी प्रकार के दोष पापों का नाशक है ,इसलिए शीघ्र ही पापो का नाश करने के कारण इसे "#कुश" कहा गया है। 


कुश का महत्व
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, कुश का मूल ब्रह्मा, मध्य विष्णु और अग्रभाग शिव का जानना चाहिए. ये देव कुश में प्रतिष्ठित माने गए हैं. बताया जाता है कि मंत्र, ब्राह्मण, अग्नि, तुलसी और कुश कभी भी बासी नहीं माने जाते हैं. पूजा में इनका उपयोग बार-बार किया जाता है. धर्मग्रंथों में कुश के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है.

भगवान विष्णु के रोम से बना है कुश
अथर्ववेद के अनुसार, कुश घास का उपयोग करने से क्रोध नियंत्रित करने में सहायता मिलती है.कुश का उपयोग औषधि के रूप में भी होता है. भगवान विष्णु के रोम से बने होने की वजह से इसे पवित्र माना जाता है.

कुश की उत्पत्ति कथा
मत्स्य पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया था और हिरण्याक्ष का वध किया था. फिर से पृथ्वी को समुद्र से निकालकर सभी प्राणियों की रक्षा की थी. उस समय जब भगवान वराह ने अपने शरीर को झटका था, तब उनके शरीर के कुछ रोम धरती पर गिर गए थे. उन्हीं से कुश की उत्पत्ति हुई. इस वजह से कुश पवित्र माने जाते हैं.

कुश और अमृत कलश से जुड़ा प्रसंग
महाभारत में कुश से जुड़ा एक प्रसंग है. एक समय की बात है, जब गरुड़ देव स्वर्ग से अमृत कलश लेकर आ रहे थे, तब उन्होंने कुछ देर लिए अमृत कलश को जमीन पर कुश पर रख दिया. इस पर अमृत कलश रखने के कारण यह पवित्र माना जाता है.

कुश से जुड़े नियम
जिस कुश घास में पत्ती हो, आगे का भाग कटा न हो और वो हरा हो, वह कुश देवताओं और पितरों की पूजा के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है. शास्त्रों के अनुसार, कुश को इस अमावस्या पर सूर्योदय के वक्त लाना चाहिए. यदि आप सूर्योदय के समय इसे न ला पाएं तो उस दिन के अभिजित या विजय मुहूर्त में घर पर लाएं.


कुशोत्पाटनी अमावस्या के नाम से लोक में विश्रुत है क्योकि इस दिन पूरे साल देव पूजा और श्राद्ध आदि कर्मों के लिए कुश का संग्रह किया जाता है। कुशग्रहणी अमावस्या के दिन पितारों की पूजा और श्राद्ध करने से पितर संतुष्ट और प्रसन्न होते हैं। इस दिन किए गए स्नान, दान आदि से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रानुसार बिना कुश के की गई पूजा का फल निष्फल मानी जाती है यथा- –

पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि:।
कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया॥

इसी कारण पूजा के समय पुजारी अनामिका उंगली में कुश की बनी पैंती पहनाते हैं और पंडित जी उसी पैंती से गंगा जल मिश्रित जल बैठे हुए सभी भक्त जनों पर छिड़कते हैं। इसी कारण इस दिन पूरे साल के लिए पूजा आदि हेतु कुश उखाड़ा रखा जाता है-

कुशा: काशा यवा दूर्वा उशीराच्छ सकुन्दका:।
गोधूमा ब्राह्मयो मौन्जा दश दर्भा: सबल्वजा:॥

आपके समीप सहज रूप में जो भी कुश उपलब्ध हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।


 कहा जाता है कि जिस कुश का मूल तीक्ष्ण, जिसमे 7 पत्ती हों, आगे का भाग कटा न हो और हरा हो, उसका उपयोग देव और पितृ दोनों पूजा में होता है अतः कुश उखाड़ते समय इस बात का अवश्य ही ध्यान रखें।

किस मन्त्र से कुश को उखाड़ना चाहिए ?

जहां भी कुश उपलब्ध हो, वहां पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जाए उसके बाद इस मन्त्र को बोलते हुए दाहिने हाथ से  


“ॐ हूं फट” तथा अधोलिखित मंत्र पढ़कर कुश को उखाड़ लेना चाहिए।
मंत्र | 

‘विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव॥

कुश के जड़ में ब्रह्मा, 

मूल भाग में नारायण 

एवं ऊपर में शिव का वास माना गया है।

Thursday, 29 August 2024

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में अंतर..??

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में  अंतर..??

भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं।

1. ऋषि (Rishi): - परिभाषा:,
ऋषि वे व्यक्ति होते हैं जिन्होंने गहन ध्यान, तपस्या और अध्ययन के माध्यम से दिव्य ज्ञान प्राप्त किया होता है। उन्हें वेदों के मन्त्रद्रष्टा कहा जाता है, अर्थात् वेदों के मंत्रों को साक्षात अनुभव करने वाले।
विशेषताएँ: ऋषि वे होते हैं जिन्होंने अपने ज्ञान से समाज को दिशा दी है। उदाहरण के लिए, सप्तऋषि (अत्रि, भारद्वाज, कश्यप, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ) जिन्होंने वेदों का संकलन किया।
प्रमुख गुण: दिव्य दृष्टि, तपस्वी, समाज का कल्याण करने वाला।

2. मुनि (Muni): - परिभाषा:,
मुनि वह व्यक्ति होता है जिसने मौन धारण कर लिया हो और जो अपने विचारों और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता हो। मुनि शब्द "मौन" से उत्पन्न हुआ है।
विशेषताएँ: मुनि अपनी साधना और तपस्या के माध्यम से उच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त करते हैं। वे गहन ध्यान और आत्मचिंतन में लीन रहते हैं।
प्रमुख गुण: मौन, ध्यान, आत्मसंयम।

3. साधु (Sadhu): - परिभाषा:,
साधु एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसने सांसारिक जीवन को त्याग कर पूर्णतः भगवान की भक्ति, साधना और धर्म के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया हो।
विशेषताएँ: साधु आमतौर पर घुमक्कड़ जीवन जीते हैं, वे भिक्षा पर निर्भर रहते हैं और समाज को धर्म और नैतिकता का संदेश देते हैं। वे विभिन्न धार्मिक आयोजनों और तीर्थ स्थलों पर पाए जाते हैं।
प्रमुख गुण: भक्ति, समर्पण, तपस्वी जीवनशैली।

4 संत (Saint): - परिभाषा:,
संत वे व्यक्ति होते हैं जिन्होंने ईश्वर की भक्ति, धर्म और सेवा में अपना जीवन समर्पित किया हो और जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया हो। संत समाज के प्रति परोपकार और आध्यात्मिकता का प्रसार करते हैं।
विशेषताएँ: संत समाज में रहते हुए भी अपनी आत्मा को उच्च आध्यात्मिक स्थिति में रखते हैं। वे दूसरों को भी ईश्वर के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। तुलसीदास, कबीर, और संत ज्ञानेश्वर कुछ प्रसिद्ध संत हैं।
प्रमुख गुण: परोपकार, आत्मज्ञान, धर्म का प्रसार।

5. सन्यासी (Sanyasi): - परिभाषा:,
सन्यासी वह व्यक्ति होता है जिसने जीवन के सभी भौतिक और सांसारिक बंधनों को त्याग कर संन्यास ग्रहण किया हो। वह चारों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास) में अंतिम अवस्था में प्रवेश कर चुका होता है।
विशेषताएँ: सन्यासी समाज से दूर एकांत में रहते हैं और केवल भगवान की साधना में लीन रहते हैं। वे किसी भी प्रकार के भौतिक सुखों से मुक्त होते हैं।
प्रमुख गुण: वैराग्य, त्याग, आत्मानुशासन।

6. योगी (Yogi): - परिभाषा:,
योगी वह व्यक्ति होता है जो योग की साधना के माध्यम से अपने शरीर, मन और आत्मा का संतुलन बनाए रखता है। योग का उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और परमात्मा के साथ एकत्व की स्थिति प्राप्त करना होता है।
विशेषताएँ: योगी विभिन्न योग प्रणालियों (जैसे हठ योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, कर्म योग) का पालन करता है और अपने जीवन को संयमित और आध्यात्मिक बनाता है। पतंजलि को योग शास्त्र का जनक माना जाता है।
प्रमुख गुण: ध्यान, प्राणायाम, आत्मसंयम, संतुलित जीवनशैली।
जयति जयति जय पुण्य सनातन संस्कृति,
जयति जयति जय पुण्य भारतभूमि,
सदासुमङ्गल जयति सनातन,

🚩जय जय श्रीराम,🙏

Wednesday, 28 August 2024

#गर्भ और _ग्रह

गर्भ 

1. गर्भ से पहले महीने तक शुक्र का प्रभाव रहता है अगर गर्भावस्था के समय शुक्र कमजोर है तो शुक्र को मजबूत करना चाहिए। अगर शुक्र मजबूत होगा तो बच्चा बहुत सुंदर होगा। और उस समय स्त्री को चटपटी चीजे खानी चाहिए शुक्र का दान न करे अगर दान किया तो शुक्र कमजोर हो जाएगा। दान सिर्फ उसी ग्रह का करे जो पापी और क्रूर हो और उसके कारण गर्भपात का खतरा हो।

2. दूसरे महीने मंगल का प्रभाव रहता है। मीठा खा कर मंगल को मजबूत करे तथा लाल वस्त्र ज्यादा धारण करें।

3. तीसरे महीने गुरु का प्रभाव रहता है। दूध और मीठे से बनी मिठाई या पकवान का सेवन करे तथा पीले वस्त्र ज्यादा धारण करें।

4. चौथे महीने सूर्य का प्रभाव रहता है। रसों का सेवन करे तथा महरून वस्त्र ज्यादा धारण करें।

5. पांचवे महीने चंद्र का प्रभाव रहता है। दूध और दही तथा चावल तथा सफ़ेद चीजों का सेवन करे तथा सफ़ेद ज्यादा वस्त्र धारण करें।

6. छटे महीने शनि का प्रभाव रहता है। कसैली चीजों केल्शियम और रसों के सेवन करे तथा आसमानी वस्त्र ज्यादा धारण करें।

7. सातवे महीने बुध का प्रभाव रहता है जूस और फलों का खूब सेवन करे तथा हरे रंग के वस्त्र ज्यादा धारण करें।

8. आठवे महीने फिर चंद्र का तथा नौवे महीने सूर्य का प्रभाव रहता है। इस दौरान अगर कोई ग्रह नीच राशि गत भ्रमण कर रहा है तो उसका पूरे महीने यज्ञ करन चाहिए। जितना गर्भ ग्रहों की किरणों से तपेगा उतना ही बच्चा महान और मेधावी होगा जैसी एक मुर्गी अपने अंडे को ज्यादा हीट देती है तो उसका बच्चा मजबूत पैदा होता है। अगर हीट कम देगी तो उसका चूजा बहुत कमजोर होगा। उसी प्रकार माँ का गर्भ ग्रहों की किरणों से जितना तपेगा बच्चा उतना ही मजबूत होगा। जैसे गांधारी की आँ खों की किरणों के तेज़ से दुर्योधन का शरीर वज्र का हो गया था।

ASTRO NEHA BHALLA

Sunday, 25 August 2024

#रामायण जानकारी

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में
हनुमत हनुमंत हनुमान हनुमंता हनुमाना हनुमानु आदि(हनुमान् जी) के नाम का *९५ बार* उल्लेख किया है।

*(१)हनुमत* जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयं धरि कृपानिधाना ।। कि.22.12।। 
अंगद *(२)हनुमत* अनुचर जाके । रन बाँकुरे बीर अति बाँके ।। लं 36.4।।

हनुमदादि (हनुमान् आदि)

प्रात होत प्रभु सुभट पठाए । *(३)हनुमदादि* अंगद सब धाए ।। लं.84.4।। 
*(४)हनुमदादि* मुरुछित करि बंदर । पाइ प्रदोष हरष दसकंधर ।। लं.97.11।।

*(५)हनुमदादि* सब बानर बीरा । धरे मनोहर मनुज सरीरा ।। उ.7.211

भरतादि अनुज बिभीषनांगद *(६)हनुमदादि* समेत ते । गहें छत्र चामर व्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते ।। उ.11.10छं ।।

हनुमंत (हनुमन्त, हनुमान् जी)

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ *(७)हनुमंत* । मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ।। कि.3।। 
तब *(८)हनुमंत* उभय दिसि की सब कथा सुनाइ । पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाइ ।। कि.4।। 
तब (९)हनुमंत* बोलाए दूता । सब कर करि सनमान बहूता ।। कि.18.6।। 
सुनु *(१०)हनुमंत* संग लै तारा । करि बिनती समुझाउ कुमारा ।। कि.19.3।। 
बचन सुनत सब बानर जाँ तहँ चले तुरंत । तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल *(११)हनुमंत* ।। कि 22।। 
जामवंत के बचन सुहाए । सुनि *(१२)हनुमंत* हृदय अति भाए ।। सुं.0.1।। 
तब *(१३)हनुमंत* कही सब राम कथा निज नाम । सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ।। सुं.6।। 
तब *(१४)हनुमंत* कहा सुनु भ्राता । देखी चहउँ जानकी माता ।। सुं.7.4।। 
तब *(१५)हनुमंत* निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ।। सुं.12.8।। 
कह *(१६)हनुमंत* विपति प्रभु सोई । जब तव सुमिरन भजन न होई ।। सुं.31.3।। 
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि *(१७)हनुमंत* । चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत ।। सुं 32।। 
कह *(१८)हनुमंत* सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास । तव मूरति विधु उर वसति सोइ स्यामता अभास ।। लं.12क ।। 
अंगद अरु *(१९)हनुमंत* प्रवेसा । कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा ।। लं.44.7।। 
तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत ।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ *(२०)हनुमंत* ।। लं. 60क ।।

रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत ।

अंगद नील मयंद नल संग सुभट *(२१)हनुमंत* ।। लं.75 ।। 
*(२२)हनुमंत* संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले ।

रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले ।। लं.94.10छ ।।

*(२३)हनुमंत* अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे ।

मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे ।। लं.95.10छं ।। तब *(२४)हनुमंत* नगर महुँ आए। सुनि निसिचरी निसाचर धाए ।। लं. 106.3।।

सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदय बसहुँ *(२५)हनुमंत*

सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत ।। लं.107।।

तब *(२६)हनुमंत* नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा ।। 3.1.15 ।।

अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ *(२७)हनुमंत* ।

तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए *(२८)भगवंत* ।। उ.19ख ।।

हनुमंतहि (हनुमान् जी को)

आगें कै *(२९)हनुमंतहि* लीन्हा । पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा ।। कि.23.8।।

प्रभु *(३०)हनुमंतहि* कहा बुझाई । धरि बटु रूप अवधपुर जाई ।। लं.120.1।।

हनुमंता (दे. हनुमंत)

जेहिं गिरि चरन देइ *(३१)हनुमंता* । चलेउ सो गा पाताल तुरंता ।। सुं.0.7।।

अब मोहि भा भरोस *(३२)हनुमंता* । बिनु हरिकृपा मिलहि नहि संता ।। सुं 6.4।। 
पावक जरत देखि *(३३)हनुमंता* । भयउ परम लघुरूप तुरंता ।। सुं 24.8।। 
कोउ कह कहँ अंगद *(३४)हनुमंता*। कहँ नल नील दुविद बलवंता ।। ल.42.2।। 
धरि लघु रूप गयउ *(३५)हनुमंता* । आनेउ भवन समेत तुरंता ।। लं.54.8।। 
पुनिः उठि तेहिं मारेउ *(३६)हनुमंता* । घुर्मित भूतल परेउ तुरंता ।। लं.64.8।। 
अस कहि कपि सब चले तुरंता । अंगद कहइ सुनहु *(३७)हनुमंता* ।। उ.18.10।। 
जोरि पानि कह तब *(३८)हनुमंता* । सुनहु दीनदयाल भगवंता ।। उ.35.5।।

हनुमान (हनुमान् जी, श्रीराम के महान् भक्त, वानर जाति के योद्धा 'केसरी' और

माता 'अंजना/अंजनी' के पुत्र, इन्द्र के वज्र से इनका हनु अर्थात् ठोड़ी भंजन होने से हनुमान् नामकरण, जन्म कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को अर्थात् दीपावली के एक दिन  पूर्व हुआ था, सुग्रीव के मंत्री थे, श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता के सेतु बने, सीता की खोज की, संजीवनी लाकर लक्ष्मण की प्राणरक्षा की, हनुमान् जी ब्रह्मचर्य, ज्ञान, शक्ति, कर्मठता और राम-भक्ति के महान् आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित है)

मन *(३९)हनुमान* कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना ।। कि 23.4।।

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ *(४०)हनुमान* ।। सुं 2।।

सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि *(४१)हनुमान* हरषि हियँ लाए ।। सुं 29.711

सेन सहित तव मान मथि बन उजारि पुर जारि ।

कस रे सठ *(४२)हनुमान)* कपि गयउ जो तव सुत मारि ।। लं 26।।

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर ।

आइ गयउ *(४३)हनुमान* जिमि करुना महँ बीर रस ।। लं.61सो ।। 
रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान ।

धन्य धन्य तव जननी कह अंगद *(४४)हनुमान* ।। लं.76।।

बिनु प्रयास *(४५)हनुमान* उठायो । लंका द्वार राखि पुनि आयो ।। लं.76.1।।

उत पचार दसकंधर इत अंगद *(४६)हनुमान* ।

लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन ।। लं.80ग ।।

प्रगटेसि बिपुल *(४७)हनुमान* । धाए गहे पाषान ।। लं.100.13छ ।।

तब *(४८)हनुमान* राम पहिं जाई । जनकसुता कै कुसल सुनाई ।। लं.107.211

कपिपति नील रीछपति अंगद नल *(४९)हनुमान* ।

सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान ।। लं.118ख ।।

बूझहिं बैठि राम गुन गाहा । कह *(५०)हनुमान* सुमति अवगाहा ।। उ.25.5।।

हनुमाना (दे. हनुमान)
महाबीर बिनवउँ *(५१)हनुमाना*। राम जासु जस आप बखाना ।। बा 16.10 ।। 
अति सभीत कह सुनु *(५२)हनुमाना*। पुरुष जुगल बल रूप निधाना ।। कि.0.3।। 
तारा सहित जाइ *(४३)हनुमाना*। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना ।। कि.19.4।। 
सुनहु नील अंगद *(५४)हनुमाना*। जामवंत मतिधीर सुजाना ।। कि 22.1।। 
कहइ रीछपति सुनु *(५५)हनुमाना*। का चुप साधि रहेहु बलवाना ।। कि 29.3।। 
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ *(५६)हनुमाना* ।। सुं.0.811 
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ *(५७)हनुमाना* ।। सुं 1.6।। 
अति लघु रूप धरेउ
*(५८)हनुमाना*। पैठा नगर सुमिरि भगवाना ।। सु.4.4।। 
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ *(५९)हनुमाना* ।। सु.12.411 
बूड़त बिरह जलधि *(६०हनुमाना*। भयहु तात मो कहुँ जलजाना ।। सुं 13.2।। 
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन *(६१)हनुमाना* ।। सु. 16.4।। 
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ *(६२)हनुमाना* ।। सु.175।। 
उलटा होइहि कह *(६३)हनुमाना*। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ।। सुं 23.4।। 
हरषे सब बिलोकि *(६४)हनुमाना*। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ।। सुं 27.3।। 
नाथ काजु कीन्हेउ *(६५)हनुमाना*। राखे सकल कपिन्ह के प्राना ।। सुं 28.5।। 
प्रभु प्रसन्न जाना *(६६)हनुमाना*। बोला बचन विगत अभिमाना ।। सुं 32.6।। सुनि प्रभु बचन हरष *(६७)हनुमाना*। सरनागत बच्छल भगवाना ।। सु. 42.9।। बड़भागी अंगद *(६८)हनुमाना*। चरन कमल चापत विधि नाना ।। लं.10.7।।

निज दल विकल सुना *(६९)हनुमाना*। पच्छिम द्वार रहा बलवाना ।। लं.42.3।। गए जानि अंगद *(७०)हनुमाना*। फिरे भालु मर्कट भट नाना ।। लं.45.3।। 
सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद *(७१)हनुमाना* ।। लं.46.1।।
 बार बार पचार *(७२)हनुमाना*। निकट न आव मरमु सो जाना ।। लं.50.4।। 
तब लगि लै आयउ *(७३)हनुमाना*। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना ।। लं. 54.6।। 
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरषि चलेउ *(७४)हनुमाना* ।। लं .57.611 
हरषि राम भेटेउ *(७५)हनुमाना*। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ।। लं.61.1।। 
चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद *(७६)हनुमाना* ।। लं.81.6।। 
गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना। पुनि फिरि भिरेउ प्रबल *(७७)हनुमाना* ।। लं.94.5।। 
पुनि प्रभु बोलि लियउ *(७८)हनुमाना*। लंका जाहु कहेउ भगवाना ।। लं.106.1।। 
मारुत सुत मैं कपि *(७९)हनुमाना*। नामु मोर सुनु कृपानिधाना ।। उ.1.8।। 
तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे *(८०)हनुमाना* ।। उ.18.7।। 
अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह *(८१)हनुमाना* ।। 3.35.411

हनुमानू (दे. हनुमान)

किएहुँ कुवेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत *(८२)हनुमानू* ।। बा.6.7।। 
कालनेमि कलि कपट निधानू । नाम सुमति समरथ *(८३)हनुमानू* ।। बा 26.8।।

हनू (दे. हनुमान)

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत । जय कृपाल कहि कपि चले अंगद *(८४)हनू* समेत ।। सुं 44।।

हनूमंत (दे. हनुमान)

कहें नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद *(८५)हनूमंत* बल सीवा ।। लं. 49.2।।

हनूमान (दे. हनुमान)

*(८६)हनूमान* तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम ।। सुं. 1।।
सोइ छल *(८७)हनूमान* कहें कीन्हा । तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ।। सुं 2.4।। 
*(८८)हनूमान* अंगद रन गाजे । हाँक सुनत रजनीचर भाजे ।। लं.46.6।। 
है दससीस मनुज रघुनायक । जाके *(८९)हनूमान* से पायक ।। लं.62.3।। 
देखा श्रमित विभीषनु भारी। धायउ *(९०)हनूमान* गिरि धारी ।। लं.94.1।।(*९१)हनूमान* अंगद के मारे । रन महि परे निसाचर भारे ।। लं.118.10।। 
देखत *(९२)हनूमान* अति हरषेउ । पुलक गात लोचन जल बरषेउ ।। उ.1.1।। 
करहिं बिनय अति बारहि बारा। *(९३)हनूमान* हिय हरष अपारा ।। उ.41.2।। 
*(९४)हनूमान* भरतादिक भ्राता । संग लिए सेवक सुखदाता ।। 3.49.211 
*(९५)हनूमान* सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी ।। उ.49.8।।
[25/8, 8:53 am] Devi Lal Ji Sadora: *रामचरितमानस में तुलसी द्वारा शत्रुघ्न, शब्द की केवल* *सात* बार आवृत्ति की गई है
*सत्रुघुन* (शत्रुघ्न, श्रीराम के छोटे भाई, दशरथ और सुमित्रा के छोटे पुत्र, लक्ष्मण इनके जुड़वाँ भाई थे, इनकी पत्नी श्रुतिकीर्ति थीं, यह भरत के अनुगामी रहे) 

सुनि *(१)सत्रुघुन* मातु कुटिलाई । जरहिं गात रिस कछु न बसाई ।। अ.162.1।।

लखनु *(२)सत्रुसूदनु* एकरूपा । नख सिख ते सब अंग अनूपा ।। बा.310.7||

जाके सुमिरन तें रिपु नासा । नाम *(३)सत्रुहन* बेद प्रकासा ।। बा.196.8।।

भरत *(४)सत्रुहन* दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई ।। बा.197.4।।

कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु ।

राम लखन तुम्ह *(५)सत्रुहन* सरिस सुअन सुचि जासु ।। अ.173।।

पुनि प्रभु हरषि *(६)सत्रुहन* भेंटे हृदय लगाइ ।

लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ ।। उ।उ.5।।

भरत *(७)सत्रुहन* दोनउ भाई । सहित पवनसुत उपबन जाई ।। उ.25.4।।


 मारुतसुत मारुति (पवनपुत्र, पवनसुत, हनुमान्)आदि नाम का रामचरितमानस में *१३ बार* उल्लेख किया है

अब *(१)मारुतसुत* दूत समूहा। पठवहु जहँ तहें बानर जूहा ।। कि.18.4।। 
ताहि मारि *(२)मारुतसुत* बीरा । बारिधि पार गयउ मतिधीरा ।। सुं 25॥ *(३)मारुतसुत* देखा सुभ आश्रम । मुनिहि बूझि जल पियौ जाइ श्रम ।। ल. 56.2।। 
तब *(४)मारुतसुत* मुठिका हन्यो । परये धरनि व्याकुल सिर धुन्यो ।। ल 64.7।। 
मुरुछा गइ *(५)मारुतसुत* जागा । सुग्रीवहि तब खोजन लागा ।। ल.65.4।। *(६)मारुतसुत* अंगद नल नीलाः । कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला ।। ल.72.8।। 
बुधि बल निसिचर परइ न पारये। तब मारुतसुत प्रभु संभारये ।। ल.94.8।। *(७)मारुतसुत* के संग सिधावहु । सादर जनकसुतहि लै आवहु ।। ल.107.4।। 
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं । चितवहि सब *(८)मारुतसुत* पाहीं ।। उ.35.2।। 
*(९)मारुतसुत* तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई ।। उ.49.7।।

मारुति (हनुमान्, पवनसुत)

उठि बहोरि *(१०)मारुति* जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा ।। लं.75.8।। 
बालितनय *(११)मारुति* नल नीला। बानरराज दुबिद बलसीला ।। लं.97.3।। तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत *(१२)मारुति* नयसोला ।। लं.105 2।। 
प्रभु नारद संबाद कहि *(१३)मारुति* मिलन प्रसंग । पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग ।। 3.66 क ।।
[25/8, 8:53 am] Devi Lal Ji Sadora: रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने पवन पुत्र या पवन कुमार के नाम का प्रयोग *पांच बार* किया है।

*पवनकुमार* (वायु के पुत्र, हनुमान्

प्रनवउँ *(१)पवनकुमार* खल बन पावक ग्यानघन । जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर ।। बा.17॥ 

पवनसुत (वायु के पुत्र, हनुमान् सुमिरि *(२)पवनसुत* पावन नामू । अपने बस करि राखे रामू ।। बा 25.6।।देखि *(३)पवनसुत* पति अनुकूला । हृदय हरष बीती सब सूला ।। कि 3.1॥

इहाँ *(४)पवनसुत* हृदय बिचारा । राम काजु सुग्रीवं बिसारा ।। कि 18.1।।
 गिरि ते उतरि *(५)पवनसुत* आवा । सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा ।। कि 23.7।।

Thursday, 22 August 2024

# जन्माष्टमी निर्णय

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत पुराणों वा शास्त्रों द्वारा निर्णय किस दिन करना शास्त्रों के अनुकूल, सही तिथि

श्रीमद्भागवत् पुराण, श्रीभविष्य पुराण, अग्नि, विष्णु सहित सभी धर्मग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी, नक्षत्र एवं वृष राशिस्थ चन्द्रमाकालीन अर्धरात्रि के समय हुआ था।

भविष्यपुराण में लिखा है-

 'सिंहराशिगते सूर्ये गगने जलदाकुले। 

मासि भाद्रपदे अष्टम्यां कृष्णपक्षेअर्धरात्रिके। 

वृषराशि स्थिते चन्द्रे, नक्षत्रे रोहिणी युते।।

निशीथे तमउद्भूते जायमाने जनार्दने ।

देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णु: सर्वगुहाशय: ॥

( श्रीमद्भागवत महापुराण* (10/03/08)

शास्त्र विचार

शास्त्रों में स्मार्त, वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य आदि अनेक आचार्यों के भिन्न-भिन्न मत अर्थात् सिद्धान्त हैं । इनमें, जो जिनका उपासक है तथा जिस पथ का पथिक है, वह अपने उन आचार्य ( गुरु ) के दिये गये शास्त्रसम्मत मतों ( सिद्धान्तों ) को मानकर उनका अनुगमन करते हैं । मुख्य रूप से हम यहाँ दो मतों की चर्चा करते हैं । स्मार्त तथा वैष्णव मत ।

कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है। जब-जब ऐसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त सम्प्रदाय के लोगो के लिये और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव सम्प्रदाय के लोगो के लिये होती है।

स्मार्त मत के अनुसार:-राज्यराष्ट्रीयदुनियाभोजपुरी कहानियाव्यंग ही व्यंगलेखसंपादकीयमनोरंजनराजनीती

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत पुराणों वा शास्त्रों द्वारा निर्णय किस दिन करना शास्त्रों के अनुकूल, सही तिथि

Update: 2020-08-09 01:50 GMT
श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत पुराणों वा शास्त्रों द्वारा निर्णय किस दिन करना शास्त्रों के अनुकूल, सही तिथि

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे,

तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम: ॥

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत पुराणों वा शास्त्रों द्वारा निर्णय किस दिन करना शास्त्रों के अनुकूल, सही तिथि

श्रीमद्भागवत् पुराण, श्रीभविष्य पुराण, अग्नि, विष्णु सहित सभी धर्मग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी, नक्षत्र एवं वृष राशिस्थ चन्द्रमाकालीन अर्धरात्रि के समय हुआ था।

भविष्यपुराण में लिखा है- 'सिंहराशिगते सूर्ये गगने जलदाकुले। मासि भाद्रपदे अष्टम्यां कृष्णपक्षेअर्धरात्रिके। वृषराशि स्थिते चन्द्रे, नक्षत्रे रोहिणी युते।।

निशीथे तमउद्भूते जायमाने जनार्दने ।

देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णु: सर्वगुहाशय: ॥

( श्रीमद्भागवत महापुराण* (10/03/08)

शास्त्र विचार

शास्त्रों में स्मार्त, वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य आदि अनेक आचार्यों के भिन्न-भिन्न मत अर्थात् सिद्धान्त हैं । इनमें, जो जिनका उपासक है तथा जिस पथ का पथिक है, वह अपने उन आचार्य ( गुरु ) के दिये गये शास्त्रसम्मत मतों ( सिद्धान्तों ) को मानकर उनका अनुगमन करते हैं । मुख्य रूप से हम यहाँ दो मतों की चर्चा करते हैं । स्मार्त तथा वैष्णव मत ।

कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है। जब-जब ऐसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त सम्प्रदाय के लोगो के लिये और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव सम्प्रदाय के लोगो के लिये होती है।

स्मार्त मत के अनुसार:-

स्मार्त मतानुसार वे चन्द्रोदय को स्वीकारते हुए पर्व के समय उस तिथि के होने को महत्त्व देते हैं – 'अष्टमी चन्द्रोदयव्यापिनी यदा तदा जयन्ती व्रतम्' ( कृत्यसार समुच्चय )

तद्युत्तरदिने चन्द्रोदयव्यापिनी नाष्टमी तदा सप्तमीसंयुता ग्राह्या । ( कृत्यसार समुच्चय )

अर्थात् वे चन्द्रोदय के अनुसार रात्रि के समय अष्टमी तिथि होने पर जन्माष्टमी पर्व मनाते हैं – 'निशीथव्यापिनी अष्टम्याम्' ।

स्मार्त – वे सभी जो वेद-पुराणों के पाठक, आस्तिक, पंच देवों (गणेश, विष्णु, शिव, सूर्य व दुर्गा) के उपासक व गृहस्थ हैं, स्मार्त के अंतर्गत आते हैं। इस मत को मानने वाले 11अगस्त 2020 मंगलवार को जन्माष्टमी मनाएंगे व्रत भी रखेंगे।

वैष्णव मत के अनुसार:-

वैष्णव मतानुसार वे सूर्योदय के समय की तिथि को महत्त्व देते हैं ।

 'उदयव्यापिनी अष्टम्यमलम्बिनां वैष्णवानाम्' 

अर्थात् सूर्योदय में यदि अष्टमी है, तो रात्रि में अष्टमी न होने पर भी सूर्योदय के अनुसार उसे अष्टमी तिथि के रूप में ही ग्राह्य करते हैं और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व को मनाते हैं ।

कलाकाष्ठामुहूर्तापि यदा कृष्णाष्टमीतिथि: ।

नवम्यां सैव ग्राह्या स्यात्सप्तमीसंयुता नहि ॥