ज्योतिष समाधान

Friday, 31 May 2024

तेरह दिन का पक्ष करेगा कमाल

अगर 13  दिन का पक्ष हो तो भीषण संहार होता है (महाभारत)

इस वर्ष आषाढ़ मास का कृष्ण पक्ष केवल 13 दिन का, ऐसा संयोग द्वापर युग के महाभारत काल में था......!!!!!
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि आषाढ़ मास 23 जून से शुरू है और 21 जुलाई तक चलेगा
हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल संवत् 2081 में बहुत समय बाद आषाढ़ कृष्ण पक्ष केवल 13 दिन का पर रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इसे दुर्योंग काल माना जा रहा है। ऐसा संयोग महाभारत काल में पड़ा था। इस साल दुर्योग काल के चलते प्रकृति का प्रकोप बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। 
 विक्रम संवत् का प्रत्येक महीना दो पखवाड़ा यानी-15-15 दिनों का होता है। इसे कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष कहा जाता है। जब किसी पक्ष में एक तिथि दो दिन पड़ती है तो यह पक्ष 16 दिनों का हो जाता है और तिथि के घटने पर 14 दिनों का होता है।
इस साल विक्रम संवत 2081 में आषाढ महीने का कृष्ण पक्ष 23 जून से शुरू होकर 5 जुलाई तक चलेगा अर्थात कृष्ण पक्ष 13 दिनों का रहेगा।अब शुक्ल_पक्ष 6 जुलाई से शुरू हो रहा है जो 21जुलाई तक चलेगा। इस कृष्ण पक्ष में दो तिथियों द्वतिया और चतुर्थी का क्षय हो रहा है, इसलिए यह कृष्ण पक्ष केवल 13 दिनों का होगा। ऐसा संयोग बहुत सालों में आता है। ,इसे "विश्व घस्र" पक्ष कहते हैं। यह बहुत बड़ा दुर्योग है, बहुत वर्ष बाद ऐसा दुर्योग आता है। महाभारत युद्ध के पहले 13 दिन के पक्ष का दुर्योग काल आया था। उस समय बड़ी जनधन हानि हुई थी। घनघोर युद्ध था।
पक्षस्य_मध्ये_द्वितिथि_पतेतां_यदा_भवेद्रौरव_काल_योगः। 
पक्षे_विनष्टं_सकलं_विनष्ट_मित्याहुराचार्यवराः_समस्ताः

एकपक्षे_यदा_यान्ति_तिथियश्च_त्रयोदश।
त्रयस्तत्र क्षयं यान्ति वाजिनो मनुजा गज:।।
त्रयोदश दिने पक्षे तदा संहरेत जगत् ।
अपि_वर्षे_सहस्रेण_कालयोग_प्रकीर्तित:।।

द्वितियामारभ्य_चतुर्दश्यन्तं_तिथिद्वये_ह्रासे।
 त्रयोदश_दिनात्मक:पक्षोऽति_दोषोवतो_भवति।।

अर्थात आषाढ़ कृष्ण पक्ष 13 दोनों का है यह 13 दिन का पक्ष होने से पृथ्वी पर जनहानि युद्ध की संभावना होती है जिस वर्ष 13 दिन का पक्ष होता है उसे वर्ष संपूर्ण विश्व के लिए हानिकारक होता है विशेष कर द्वितीया तिथि से लेकर चतुर्दशी तिथि पर्यंत अगर दो तिथि का क्षय हो तो विशेष रूप से संपूर्ण विश्व के लिए हानिकारक होता है यह पक्ष मंगल कार्य हेतु भी उत्तम नहीं है 
यह "रौरव काल" संज्ञक दुर्योग होता है। ज्योतिष शास्त्र में इसे अच्छा नहीं माना गया है। ऐसा दुर्योग होने से अतिवृष्टि, अनावृष्टि, राजसत्ता का परिवर्तन, विप्लव, वर्ग भेद आदि उपद्रव होने की संभावना पूरे साल बनी रहती है। ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि त्रयोदशदिने पक्षे_तदा_संहरते_जगत्। 
अपिवर्षसहस्रेण_कालयोगःप्रकीर्तितः। 
अर्थात समस्त प्रकृति को पीड़ित करने वाला यह दुर्योग संक्रामक रोगों की भी वृद्धि कर सकता है। इस पक्ष में मांगलिक कार्य, व्रतारम्भ, उद्यापन, भूमि भवन का क्रय विक्रय, गृह प्रवेश आदि शुभ कार्यों का त्याग कर देना चाहिए।
काल_चक्र_की_गणना_भारी।
जाने_मुरारी_या_त्रिपुरारी।।

          जयश्रीसीताराम
🙏

Wednesday, 29 May 2024

#पूजा में सिर ढकना चाहिए या नहीं

आजकल एक प्रथा चल पड़ी है कि पूजन आरंभ होते ही रूमाल निकाल कर सर पर रख लेते है … जबकि पूजा में सिर ढकने को शास्त्र निषेध करता है।शौच के समय ही सिर ढकने को कहा गया है। प्रणाम करते समय,जप व देव पूजा में सिर खुला रखें। तभी शास्त्रोचित फल प्राप्त होगा।

शास्त्र प्रमाण:-
उष्णीषो कञ्चुकी चात्र मुक्तकेशी गलावृतः ।
 प्रलपन् कम्पनश्चैव तत्कृतो निष्फलो जपः ॥
अर्थात् -
पगड़ी पहनकर, कुर्ता पहनकर, नग्न होकर, शिखा खोलकर, कण्ठको वस्त्रसे लपेटकर, बोलते हुए, और काँपते हुए जो जप किया जाता है, वह निष्फल होता है ।'

शिर: प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा |
अकृत्वा पादयोः शौचमाचांतोऽप्यशुचिर्भवेत् ||
                   ( -कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 9)
अर्थात्-- सिर या कण्ठ को ढककर ,शिखा तथा कच्छ(लांग/पिछोटा) खुलने पर,बिना पैर धोये आचमन करने पर भी अशुद्ध रहता हैं(अर्थात् पहले सिर व कण्ठ पर से वस्त्र हटाये,शिखा व कच्छ बांधे, फिर पाँवों को धोना चाहिए, फिर आचमन करने के बाद व्यक्ति शुद्ध(देवयजन योग्य) होता है)।

सोपानस्को जलस्थो वा नोष्णीषी वाचमेद् बुधः।
                  -कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 10अर्ध।
अर्थात्-- बुध्दिमान् व्यक्ति को जूता पहनें हुए,जल में स्थित होने पर,सिर पर पगड़ी इत्यादि धारणकर आचमन नहीं करना चाहिए ।

शिरः प्रावृत्य वस्त्रोण ध्यानं नैव प्रशस्यते।-(कर्मठगुरूः)
अर्थात्-- वस्त्र से सिर ढककर भगवान का ध्यान नहीं करना चाहिए ।

उष्णीशी कञ्चुकी नग्नो मुक्तकेशो गणावृत।
अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत् क्वचित् ॥-
                              (शब्द कल्पद्रुम  )
अर्थात्-- सिर ढककर,सिला वस्त्र धारण कर,बिना कच्छ के,शिखा खुलीं होने पर ,गले के वस्त्र लपेटकर । 
अपवित्र हाथों से,अपवित्र अवस्था में और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।।

न जल्पंश्च न प्रावृतशिरास्तथा।-योगी याज्ञवल्क्य
अर्थात्-- न वार्ता करते हुए और न सिर ढककर।

अपवित्रकरो नग्नः शिरसि प्रावृतोऽपि वा । 
प्रलपन् प्रजपेद्यावत्तावत् निष्फलमुच्यते  ।।          (रामार्च्चनचन्द्रिकायाम्)
अर्थात्-- अपवित्र हाथों से,बिना कच्छ के,सिर ढककर जपादि कर्म जैसे किये जाते हैं, वैसे ही निष्फल होते जाते हैं ।
शिव महापुराण उमा खण्ड अ.14-- सिर पर पगड़ी रखकर,कुर्ता पहनकर ,नंगा होकर,बाल खोलकर ,गले के कपड़ा लपेटकर,अशुद्ध हाथ लेकर,सम्पूर्ण शरीर से अशुद्ध रहकर और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।।
               ज्योतिषाचार्य डॉ०आशुतोष मिश्र 
                       8887540341

Saturday, 25 May 2024

नौतपा_का_तपना_क्यों_जरूरी_है

#जानिये_नौतपा_का_तपना_क्यों_जरूरी_है।

नौतपा अगर ना तपे तो क्या होता है? 

[‘दो मूसा, दो कातरा, दो तीड़ी, दो ताव।
दो की बादी जळ हरै, दो विश्वर दो वाव।]

‘नौतपा के पहले दो दिन लू न चली तो चूहे बहुत हो जाएंगे। 
अगले दो दिन न चली तो कातरा (फसल को नुकसान पहुँचाने वाला कीट)। 
तीसरे दिन से दो दिन लू न चली तो टिड्डियों के अंडे नष्ट नहीं होंगे। 
चौथे दिन से दो दिन नहीं तपा तो बुखार लाने वाले जीवाणु नहीं मरेंगे। 
इसके बाद दो दिन लू न चली तो विश्वर यानी साँप-बिच्छू नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे। 
आखिरी दो दिन भी नहीं चली तो आंधियां अधिक चलेंगी, फसलें चौपट कर देंगी।

Wednesday, 22 May 2024

शिव जी पर कुम कुम

शिव लिंगे हरिद्राद्यर्पण विधी निषेध :-

कल रात्रि ग्रुप के एक विद्वान् महाभाग फोन आया था की,प्रायः यह भ्रम फैलाया जाता है कि शिवलिङ्ग पर हरिद्रा(हल्दी) अथवा कुमकुम अर्पित करना निषिद्ध है एवं इनका पूजोपचारादिके अन्तर्गत कोई विधान नहीं है।
उनकी संका थी की क्या ऐसा वास्तव में है अथवा ये केवल एक भ्रम मात्र है।

                          वस्तुतः ऐसी बातें निराधार हैं। शिवलिङ्ग पर हरिद्रा, कुमकुम अर्पण करने के विधानका पर्याप्त वर्णन धर्मग्रंथो में प्राप्त होता है। ऐसी कल्पनाओं का शमन करने हेतु निम्न शास्त्रप्रमाणों को देखना चाहिए —

🔥उष्णोदकेन हरिद्राद्येन लिंगमूर्ति पीठसहितां विशोध्य गंधोदकहिरण्योदकमंत्रोदकेन रुद्राध्यायं पठमानः
[लिङ्गo,उत्तरभाग, 24/17]

🔥सुगन्धामलकं दद्याद्धरिद्रां च यथाक्रमम्।
ततः संशोध्य सलिलैर्लिङ्ग बेरमथापि वा॥
[शिवo,वायवीयसंहिता-उत्तरखण्ड,24/43]

🔥रक्तचन्दनपुष्पाढ्यं पानीयं चातिशीतलम्।
मृदु एलारसाक्तं च खण्डं पूगफलस्य च॥
🔥कस्तूरिका कुंकमं च रसो मृगमदात्मकः।
पुष्पाणि सुरभीण्येव पवित्राणि शुभानि च॥
[शिवमहापुराण, वायवीयसंहिता-उत्तरखण्ड,25/15-18]

🔥स्नापयेत्पयसा पूर्वं दध्ना घृतयुतेन च।
मधुनेक्षुरसेनैव कुंकुमेन विलेपयेत्॥४॥
[स्कन्दमहापुराणे, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्येचण्डीशमाहात्मये,30/4]

🔥हरिद्राखण्डचूर्णेन यो विलिम्पेदुमासखम्।
स मे गणेशः स्कंदः स्यादश्वमेधायुतं लभेत्॥
गंधं दत्वा चंद्रमौलौ द्वादशाहफलं लभेत्।
त्रिफलं चंदनं प्रोक्तं कुंकुमं तत्समं स्मृतम्॥
[शिवरहस्ये, एकादशांशे]

🔥यवगोधूमजैश्चूर्णैः कषायैर्रजनीसहै:।
कवोष्णेनाम्बुना देवि स्नापयेत्तदननंतरम्॥
[शिवरहस्ये, उग्राख्ये सप्तमांशे]

🔥ततो हरिद्रया देवमालिप्य स्नानमाचरेत्।
[शैवाचारप्रदीपिकायाम्]

🔥हरिद्रां कवचेन संयोजयेत्..... मूलेन मर्दयेत्।
.......
चन्दनागरुकस्तुरी कुंकुमकर्पूरमनश्शिलैलाकुष्ठतक्कोल-लवंगोशीररजनीचूर्णसहितमुदकं गंधोदकम्।
[शिवार्चनचंद्रिकायां, दिक्षितेन्द्र]

🔥चन्दनागुरुकर्पूरै: कृष्णपिष्टै: सकुंकुमै:।
लिंग पर्याप्त मालिप्य कल्पकोटिं वसेद्दिवी॥

शिवलिंग के सुगन्धानुलेपन का महान फल होता है। सुगन्धानुलेपन के पुण्य से भी दुगना चन्दनानुपेलन का फल होता है। उससे आठ गुना अधिक पुण्य अगरू लेपन का होता है और उसमें भी कृष्णागरु का फल दोगुना होता है, इससे भी सौ गुना फल कुंकम के अनुलेपन का कहा जाता है। 

अत: शिवलिंग पर कुंकुम का अनुलेपन अवश्य करना चाहिए, इसमें कोई निषेध नहीं। चन्दन, अगरु, कृष्णागुरु, कर्पूर एवं कुंकुम से ​शिवलिंग का अनुलेपन करने वाला करोडों कल्प तक देवलोक में निवास करता है।

🔥नोट:-
केवल पारदलिङ्ग हेतु हरिद्रा का निषेध है। 

यथा-
नैवार्पणं कुर्यात हरिद्रा हिंगुल च वासवः।
रसलिङ्गं संततिः दद्याद् कुष्ठी वा हृदयार्णवः॥

सर्वे जना: सुखिनो भवन्तुः।
(साभार शास्त्री लखन पाल शर्मा)

Tuesday, 14 May 2024

यज्ञ

ध्यान से श्रवण करिये।~~~ 
#अन्नहीनो_दहेद्राष्ट्रं_मन्त्रहीनस्तु_ऋत्विजः ।
#दीक्षितं_दक्षिणाहिनो_नास्ति_यज्ञसमो_रिपुः ।।
अन्नहीन (ब्राह्मण भोजन से रहित) यज्ञ से राष्ट्र का , मंत्र हीन यज्ञ से पुरोहित का ,  ओर दक्षिणा से हीन यज्ञ करने से यजमान का नाश होता है । अतः संपूर्ण विधि विधान से रहित यज्ञ न करे । 
Arun shastri जबलपुर
#प्रश्न_नही_स्वाध्याय_करे!!

~~~~~(सर्वेषाम् एव शौचानाम्) सब शौचों में (अर्थ शौचं परं स्मृतम्) धन की शुद्धि सबसे बढ़कर है। (यः अर्थे शुचिः) जो धन कमाने में शुद्ध है (स शुचिः) वह वस्तुतः शुद्ध है। (न मृत + वारि + शुचिः शुचिः) मिट्टी और जल की शुद्धि शुद्धि नहीं है‼️
‼️स्वधर्म वृत्ति से प्राप्त धन ही शुद्ध होता है ‼️
 जिसके धन कमाने के साधन शुद्ध नहीं हैं वह 
 कितना ही अन्य बातों में शुद्ध क्यों न हो शुद्ध 
   नहीं कहा जा सकता‼️
 
  वाचा शौचं च मनसः शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
  सर्वभूते दया शौचमेतच्छौचं परार्थिनाम् ‼️
  यदि आप दिव्यता चाहते है तो आपके वाचा, मन 
  और इन्द्रियों में शुद्धता होनी चाहिए. उसी प्रकार 
   आपके ह्रदय में करुणा होनी चाहिए.‼️
~~~~~~
उनका कहना भी सही है, इस संबंध में एक प्रमाण भी है..."" मूर्खो वदति विष्णाय, ज्ञानी वदति विष्णवे ।।

Sunday, 12 May 2024

👉सूतक ,पातक निर्णय --



।।👉सूतक ,पातक निर्णय --

 👉हिन्दू धर्म में सूतक और पातक नाम से दो परंपराएं प्रचलित हैं। किसी के भी घर-परिवार में कोई शांत हो जाते हैं या स्वर्ग चला जाता है तो उस परिवार या घर में सूतक लग जाता है। मृतक के जितने भी खून के रिश्ते के बंधु बंधव होते हैं उनक सभी के घरों में सूतक माना जाता है। क्या होता है या सूतक और कितने समय तक का होता है जानिए इस संबंध में संक्षिप्त जानकारी।
 
 👉क्या होता है सूतक और पातक : --

👉सूतक का संबंध जन्म-मरण के कारण हुई अशुद्धि से है। जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया के दौरान जो हिंसा होती है, उसमें लगने वाला दोष या पाप प्रायश्‍चित के रूप में पातक माना जाता है। इस तरह मरण से फैली अशुद्धि से सूतक और दाह संस्कार से हुई हिंसा के दोष या पाप से प्रायश्‍चित स्वरूप पातक माना जाता है।

 👉जिस तरह घर में बच्चे के जन्म के बाद सूतक लगता है उसी तरह गरुड़ पुराण के अनुसार परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु होने पर लगने वाले सूतक को 'पातक' कहते हैं। सूतक और पातक की परिभाषा इससे अलग भी है। जैसे व्यक्ति की मृत्यु होने के पश्चात गोत्रज तथा परिजनों को विशिष्ट कालावधि तक अशुचित्व और अशुद्धि प्राप्त होता है, उसे सूतक कहते हैं। अशुचित्व अर्थात अमंगल और शुद्ध का विपरित अशुद्धि होता है।
 
 👉कब-कब लगता है सूतक : --

👉जन्म काल, ग्रहण काल, स्त्री के मासिक धर्म का काल और मरण काल में सूतक और पातक का विचार किया जाता है। सभी के काल में सूतक के दिन और समय का निर्धारण अलग-अलग होता है। 

👉सूतक-पातक का समय : ---

1. 👉मृत व्यक्ति के परिजनों को 10 दिन तथा अंत्यक्रिया करने वाले को 12 से 13 दिन (सपिंडीकरण तक) सूतक पालन कड़ाई से करना होता है। मूलत: यह सूतक काल सवा माह तक चलता है। सवा माह तक कोई किसी के घर नहीं जाता है। सवा माह अर्थात 37 से 40 दिन। 40 दिन में नक्षत्र का एक काल पूर्ण हो जाता है। घर में कोई सूतक (बच्चा जन्म हो) या पातक (कोई मर जाय) हो जाय 40 तक का सूतक या पातक लग जाता है।
 
2. 👉ऐसा भी कहा जाता है कि सात पीढ़ियों पश्चात 3 दिन का सूतक माना जाता है, लेकिन यह निर्धारित करना कठिन है। मृतक के अन्य परिजन (मामा, भतीजा, बुआ इत्यादि परिजन) कितने दिनों तक सूतक का पालन करें, यह संबंधों पर निर्भर है तथा उसकी जानकारी पंचांग व धर्मशास्त्रों में दी जाती है। लेकिन जिसका संबंध रक्त से है उसे उपर बताए नियमों अनुसार ही चलना होता है।
 
3. 👉जन्म के बाद नवजात पीढ़ियों को हुई अशुचिता 3 पीढ़ी तक 10 दिन, 4 पीढ़ी तक 10 दिन, 5 पीढ़ी तक 6 दिन गिनी जाती है। एक रसोई में भोजन करने वालों के पीढ़ी नहीं गिनी जाती है। वहां पूरा 10 दिन तक का सूतक होता है। प्रसूति नवजात की मां को 45 दिन का सूतक रहता है। प्रसूति स्थान 1 माह अशुद्ध माना जाता है। इसीलिए कई लोग अस्पताल से घर आते हैं तो स्नान करते हैं। पुत्री का पीहर में बच्चे का जन्म में 3 दिन का, ससुराल में जन्म दे तो उन्हें 10 दिन का सूतक रहता है।
 
4. 👉मरण के अवसर पर दाह संस्कार में इत्यादि में हिंसा होती है। इसमें लगने वाले दोष या पाप के प्रायश्चित के स्वरूप पातक माना जाता है। जिस दिन दाह संस्कार किया जाता है, उस दिन से पातक के दिनों की गणना होती है। न कि मृत्यु के दिन से। अगर किसी घर का सदस्य बाहर है तो जिस दिन उसे सूचना मिलती है उस दिन तक उसके पातक लगता ही है। अगर 12 दिन बाद सूचना मिले तो स्नान मात्र से शुद्धि हो जाती है।
 
5. 👉अगर परिवार की किसी स्त्री का गर्भपात हुआ है तो जितने माह का हुआ है उतने दिन का ही पातक माना जाएगा। घर का कोई सदस्य मुनि, साध्वी है उसे जन्म मरण का सूतक नहीं लगता है। किंतु उसका ही मरण हो जाने पर उसका एक दिन का पातक लगता है।
 
6. 👉किसी की शवयात्रा में जाने को एक दिन, मुर्दा छूने को 3 दिन और मुर्दे को कन्धा देने वाले को 8 दिन की अशुद्धि मानी जाती है। घर में कोई आत्मघात करले तो 6 माह का पातक माना जाता है। छह माह तक वहां भोजन और जल ग्रहण नहीं किया जा सकता। वह मंदिर नहीं जाता और ना ही उस घर का द्रव्य मंदिर में चढ़ाया जाता है।
 
7. 👉इसी तरह घर के पालतू गाय, भैंस, घोड़ी, बकरी इत्यादि को घर में बच्चा होने पर 1 दिन का सूतक परंतु घर से दूर-बाहर जन्म होने पर कोई सूतक नहीं रहता। बच्चा देने वाली गाय, भैंस और बकरी का दूध, क्रमशः 15 दिन, 10 दिन और 8 दिन तक अशुद्ध रहता है।
 
 👉सूतक-पातक के नियम : --

1. 👉सूतक और पातक में अन्य व्यक्तियों को स्पर्श न करें। 
2. 👉कोई भी धर्मकृत्य अथवा मांगलिक कार्य न करें तथा सामाजिक कार्य में भी सहभागी न हों। 
3.👉 अन्यों की पंगत में भोजन न करें। 
4.👉 किसी के घर न जाएं और ना ही किसी भी प्रकार का भ्रमण करें। घर में ही रहकर नियमों का पालन करें।
 
5. 👉किसी का जन्म हुआ है तो शुद्धि का ध्यान रखते हुए भगवान का भजन करें और यदि कोई मर गया है तो गरुढ़ पुराण सुनकर समय गुजारें।
 
6.👉 सूतक या पातक काल समाप्त होने पर स्नान तथा पंचगव्य (गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण) सेवन कर शुद्ध हो जाएं।
 
7👉. सूतक पातक की अवधि में देव शास्त्र गुरु, पूजन प्राक्षाल, आहार आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती है।
 
8. 👉जिस व्यक्ति या परिवार के घर में सूतक-पातक रहता है, उस व्यक्ति और परिवार के सभी सदस्यों को कोई छूता भी नहीं है। वहां का अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करता है। वह परिवार भी मंदिर सहित किसी के घर नहीं जा सकता है और न किसी का भोगों पानी या प्रसाद नही ग्रहण करना चाहिए ।

स्त्री को श्राद्ध का अधिकार है या नहीं

माता सीता ने समय के महत्व को समझते हुए अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान करने का निर्णय लिया. देवी सीता ने फल्गु नदी के किनारे बालू का पिंड बनाया और वटवृक्ष, केतकी फूल, नदी और गाय को साक्षी मानकर स्वर्गीय राजा दशरथ का पिंडदान किया. राजा दशरथ की आत्मा इससे बहुत प्रसन्न हुई और देवी सीता को आशीर्वाद दिया था I  .तथा मार्कंडेय पुराण में भी कहा गया है कि अगर किसी का पुत्र न हो तो पत्नी ही बिना मंत्रों के श्राद्ध कर्म कर सकती है इसके अलावा गरुड़ पुराण:के ग्यारहवें अध्याय में बताया गया है पुत्राभावे वधु कूर्यात ..भार्याभावे च सोदनः !
 शिष्यो वा ब्राह्मणः सपिण्डो वा समाचरेत !!
 ज्येष्ठस्य वा कनिष्ठस्य भ्रातृः पुत्रश्चः पौत्रके !
 श्राध्यामात्रदिकम कार्य पुत्रहीनेत खगः !! अर्थात -  ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र के अभाव में बहू, पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है। इसमें ज्येष्ठ पुत्री या एकमात्र पुत्री भी शामिल है। अगर पत्नी भी जीवित न हो तो सगा भाई अथवा भतीजा, भानजा, नाती, पोता आदि कोई भी श्राद्ध कर सकता है। इन सबके अभाव में शिष्य, मित्र, कोई भी रिश्तेदार अथवा कुल पुरोहित मृतक का श्राद्ध कर सकता है। इस प्रकार परिवार के पुरुष सदस्य के अभाव में कोई भी महिला सदस्य व्रत लेकर पितरों का श्राद्ध, तर्पण कर सकती है।  आप सभी विद्वानों से सविनय निवेदन है की तो इसपर उचित प्रकाश  डालने की कृपा करें
प्रश्न की पत्नी को श्राद्ध का अधिकार है अथवा नहीं:- हमारा उत्तर है की पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है। किन्तु इसके लिए नियम है, स्मरण रहें स्वपुत्र के अतिरिक्त जो भी श्राद्ध करेंगे उन्हें स्वयं को अधिकारी घोषित करना होगा श्राद्ध मे प्रथम और एक मात्र अधिकार पुत्र का ही होता है पुत्र के अभाव मे पत्नी आदि विकल्प होते हैं।
अब विकल्प का निर्णय सुनिए :-
पुत्र, पौत्र, प्रपोत्र, नाती,पत्नी,भाई,भतीजा, पिता, माता,पुत्र वधु, बहन,भांजा,सपिंड (1से 7 पीढ़ी तक के लोग), सोदक (7से 14)
ऊपर से एक एक के अभाव मे अगला श्राद्ध करे ऐसा शास्त्र का आदेश हैं।स्मृति संग्रह और श्राद्ध कल्प मे ये वचन आया है।
और भी वचन हैं जो पत्नी को श्राद्ध का अधिकारी बनाती है -
पितु: पुत्रेन कर्तव्या:पिंडदानोदक कृया।
पुत्राभावे तु पत्नी: स्यात पत्न्याभावे तु सोदर:!!