ज्योतिष समाधान

Saturday, 30 July 2022

रक्षा बन्धन (11-12 अगस्त, 2022 ई.कब मनायें*

रक्षा बन्धन (11-12 अगस्त, 2022 ई.कब मनायें*                            🙏🙏🚩🚩🌹🕉️🌹🚩🚩🙏🙏🙏 रक्षा बंधन का पवित्र पर्व भद्रारहित अपराह्ण व्यापिनी पूर्णिमा में करने का शास्त्र विधान है-"
 *भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा* "🚩
यदि पहिले दिन व्याप्त पूर्णिमा के अपराह्नकाल में भद्रा हो तथा उदयकालिक पूर्णिमा तिथि त्रिमुहूर्त-व्यापिनी हो, 
तो उदयकालिक पूर्णिमा (दूसरे अपराह्णकाल में रक्षाबन्धन करना चाहिए। चाहे वह अपराह्ण से पूर्व ही क्यों न समाप्त हो जाएं। 
क्योंकि उस समय साकल्यापादित पूर्णिमा का अस्तित्व होगा।  

*पुरुषार्थ चिन्तामणि* के अनुसार भी-' *यदा द्वितीयापराह्णात् पूर्वं समाप्ता, तदापि भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये*🚩

परन्तु यदि आगामी दिन पूर्णिमा त्रिमुहूर्त्त-व्यापिनी न हो, 
तो पहिले भद्रा समाप्त होने पर प्रदोषकाल में ही रक्षाबन्धन करने का विधान कहा गया है।🚩
*अथ रक्षाबन्धनमस्यामेव पूर्णिमायां भद्रारहितायां त्रिमुहूर्ताधिकोदय व्यापिन्याम्-अपराह्णे प्रदोषे वा कार्यम् ।। 
उदयत्रिमुहूर्त - न्यूनत्वे पूर्वेद्यु-भद्रारहिते प्रदोषादिकाले कार्यम्* ॥'🚩
इस वर्ष 11 अगस्त 2022 ई. को अपराह्ण व्यापिनी पूर्णिमा में भद्रादोष व्याप्त  है और आगामी दिन 12 अगस्त, शुक्रवार को पूर्णिमा त्रिमुहूर्त्त व्यापिनी नहीं है। 
पूर्णिमा केवल प्रातः 7 घं.-06 मिं. पर ही समाप्त हो रही है। 
अतः उपरोक्त शास्त्र-निर्णयानुसार तो 11 अगस्त, गुरुवार को ही प्रदोषकाल के समय भद्रारहित काल में अर्थात् 20-53मिं. के बाद रक्षा-बन्धन पर्व मनाया जा सकेगा। यहाँ इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि प्रदोषकाल की समाप्ति से पूर्व (पहिले) ही रक्षाबन्धन कर लेना चाहिए। (
अर्थात् निशीथकाल आरम्भ होने से पहिले ।)🚩
11 अगस्त, गुरुवार को सभी धर्मनिष्ठ लोगों को भद्रा समाप्ति 20घं. - 53मिं. बाद तथा 21षं.-50मिं. से पहिले अर्थात् 1 घण्टे के भीतर रक्षाबन्धन कर लेना चाहिए। 
परन्तु अति आवश्यक परिस्थितिवश (यात्रा- भ्रमण सुविधा उपलब्ध न होने पर, फौज आदि में, ड्यूटी आदि कार्यों में आदि) परिहारस्वरूप भद्रामुख (18घं.- 20 मिं. से 20घं--02 मिं. तक) काल का विशेष रूप से त्यागकर भद्रापुच्छकाल (17घं-18 मिं. से 18घं-20 मिं. (तक) में भी रक्षाबन्धन करना शुभ एवं ग्राह्य होगा ।🚩

*कार्येत्वावश्यके विष्टेः मुखमात्रं परित्यजेत्* ।। (मुहूर्त्त प्रकाश)🚩 इसके अतिरिक्त 11 अगस्त, गुरुवार को चन्द्रमा मकर राशिस्थ एवं भद्रा पाताललोक में होने से भी भद्रा का परिहार होगा।
  *अतएव शास्त्रानुसार तो 11 अगस्त, गुरुवार को ही भद्रा के बाद प्रदोषकाल में (20:53 से 21:50 तक) रक्षाबन्धन मनाना चाहिए*।🚩🚩 

Thursday, 12 May 2022

यज्ञ पूजन सामग्री पर्णकुटी गुना 9893946810

============================
1】हल्दीः--------------------------500ग्राम
२】कलावा(आंटी)-------------1 किलो (गोले वाली)
३】अगरबत्ती-------------------     3पैकिट
४】कपूर-------------------------   1 किलो ग्राम
५】केसर-------------------------   1डिव्वि
६】चंदन पेस्ट ------------------ 500 ग्राम
७】यज्ञोपवीत -----------------   11बंडल 
८】चावल------------------------ 25 किलो
९】अबीर-------------------------200 ग्राम
१०】गुलाल, -----------------1 किलो ग्राम पांच प्रकार की
११】अभ्रक-------------------100 ग्राम
१२】सिंदूर --------------------500 ग्राम
१३】रोली, --------------------300ग्राम
१४】सुपारी, ( बड़ी)--------  2 किलो ग्राम
१५】नारियल -----------------  100 नग्
१६】सरसो----------------------200 ग्राम
१७】पंच मेवा------------------1 किलो ग्राम 
१८】शहद (मधु)--------------- 200 ग्राम
१९】शकर-----------------------05किलो
२०】घृत (शुद्ध घी)------------  03 किलो
२१】इलायची (छोटी)-----------100ग्राम
२२】लौंग मौली-------------------100ग्राम
२३】इत्र की शीशी----------------5 नग्
२४】रंग लाल----------------------100ग्राम
२५】रंग काला --------------------100ग्राम
२६】रंग हरा -----------------------100ग्राम
२७】रंग पिला ---------------------100ग्राम
२८】चंदन मूठा--------------------1 नग्
२९】धुप बत्ती ---------------------12 पैकिट
29】सूत के गोले -----------------3 नग
29】नागफनी किलें---------------5नग
29】बास्तु किट -------------------8नग
29】तेल तीली का ---------------3 लीटर
      गुलाब जल. ------------१००ग्राम
नान्दी श्राद्ध के लिए
(30)आवला ---------------------100ग्राम
(31)दाख बड़ी-------------------100 ग्राम
क्ष्रेत्र पाल पूजन
(32)मूँग बडी-------------------200 ग्राम
(33)पापाड़थेली----------------1पैकिट
34】उडद -----------------------500 ग्राम

(35)तिली
(36)चावल
(37)जौ
(38)हवन सामग्री 【सुर्जन का】
 (39)
(40)नारियल गोले  ----------------------21




=============================
३०】सप्तमृत्तिका
1】 हाथी के स्थान की मिट्टि-----------50ग्राम
२】घोड़ा बांदने के स्थान की मिटटी--50ग्राम
३】बॉबी की मिटटी---------------------50ग्राम
४】दीमक की मिटटी-------------------50ग्राम
५】नदी संगम की मिटटी---------------50ग्राम
६】तालाब की मिटटी-------------------50ग्राम
७】गौ शाला की मिटटी-----------------50ग्राम
राज द्वार की मिटटी-----------------------50ग्राम
============================
३१】पंचगव्य
१】 गाय का गोबर -----------------50 ग्राम
२】गौ मूत्र-----------------------------50ग्राम
३】गौ घृत------------------------------50ग्राम
4】गाय दूध----------------------------50ग्राम
५】गाय का दही ---------------------50ग्राम
=============================
३२】सप्त धान्य-कुलबजन--------100ग्राम
१】 जौ-----------
२】गेहूँ-
३】चावल-
४】तिल-
५】काँगनी-
६】उड़द-
७】मूँग
=============================
३३】कुशा 
३४】दूर्वा
35】पुष्प कई प्रकार के 
३६】गंगाजल
३७】ऋतुफल पांच प्रकार के -----1 किलो
38】पंच पल्लव


४५】      बस्त्र
१】सफेद कपड़ा 5 मीटर
२】लाल कपड़ा 5 मीटर

(3)पीला कपड़ा 5 मीटर

४】हरा कपड़ा 2मीटर

(5) काला कपडा 3 मीटर

(6)चन्दौवा प्रधान कुंड पर 



४६】पंच रत्न ( जितनी मूर्ती हो)
४७】दीपक
४८】तुलसी दल 
४८】केले के पत्ते
(यदि उपलब्ध हों तो खंभे सहित)
49】बन्दनवार
50】पान के पत्ते ------------11 नग
51】रुई
५२】भस्म
53】ध्वजालाल-1   -

 तोरण के लिये पीपल पाकर गूलर

ध्वजा  =1हाथ हाथ चौडी और 3,5,7,हाथ लम्बी होना चाहिये ।

पताका =1हाथ चौड़ी 3,5,7,हाथ लम्बी हो 

महाध्वज=का बांस 10,16,21,या 23,का होबे

महाध्वज का नाप  3हाथ चौडा 5या 10हाथ लम्बा हो 

ध्वजा

3=पीली 

3=लाल

2=काली

1=हरी 

3=सफेद



१】बड़,
२】 गूलर,
३】पीपल,
४】आम 
५】पाकर के पत्ते)
=============================
३९】बिल्वपत्र
४०】शमीपत्र
४१】सर्वऔषधि 
४२】अर्पित करने हेतु पुरुष बस्त्र
४३】मता जी को अर्पित करने हेतु  
सौ भाग्यवस्त्र 

बर्तन
44】

(1)जल कलश तांबे के 7

(2)मिट्टी के 41

(3)थाली प्रधान यजमान को बडी 

(4)कटोरी 11 

(5)जीतने कुंड हो उतने ही यजमानौ को थाली लोटा आसन 

(6)जीतने कुंड हो उतनी  भगोनी

(7)जीतने कुंड हो उतने ब्रह्मा पात्र 

(8)मन्दिर के कलश 

(9)मन्दिर के पूजन पात्र 

(10)चांदी का तार डोरा  के लिये 

(11)सोने का तार नेत्र उन्मीलन  के लिये 

(12)प्रधान कुंड पर लटकाने के लिये पात्र 

(13) सह्त्र छिद्र कलश 

(14) कुमडा  

(15) दर्पण भगवान का चेहरा  देखने के लिये 
४५】      बस्त्र
१】सफेद कपड़ा 5 मीटर
२】लाल कपड़ा 5 मीटर

(3)पीला कपड़ा 5 मीटर

४】हरा कपड़ा 2मीटर

(5) काला कपडा 3 मीटर

(6)चन्दौवा प्रधान कुंड पर 



४६】पंच रत्न ( जितनी मूर्ती हो)
४७】दीपक
४८】तुलसी दल 
४८】केले के पत्ते
(यदि उपलब्ध हों तो खंभे सहित)
49】बन्दनवार
50】पान के पत्ते ------------11 नग
51】रुई
५२】भस्म
53】ध्वजालाल-1   -

ध्वजा  =1हाथ हाथ चौडी और 3,5,7,हाथ लम्बी होना चाहिये ।

पताका =1हाथ चौड़ी 3,5,7,हाथ लम्बी हो 

महाध्वज=का बांस 10,16,21,या 23,का होबे

महाध्वज का नाप  3हाथ चौडा 5या 10हाथ लम्बा हो 

ध्वजा

3=पीली 

3=लाल

2=काली

1=हरी 

3=सफेद


पताका   

3=पीली

3=लाल

2=काली

1=हरी

3=सफेद


 

=पूर्व मे पीपल

पश्चिम मे गूलर 

उत्तर मे पाकर

दक्षिण मे गूलर

आयुध 

पूर्व मे शंख बरगद 

पश्चिम मे गदा  पीपल

उत्तर मे पदम

दक्षिण मे चक्र गूलर 

============================
55】   ब्राहम्णो  के  द्वारा अनुष्ठान करवा रहे है तो   उनके लिए नित्य उपयोगी सामान
=================================
सावुन नहाने के---------------10
सावुन कपड़े धोने के --------10
सर्फ कपडे धोने का ---------1 किलो
मंजन -------------------------100ग्राम
तेल ----------------------------100ग्राम
-------------------------------------------------------------56】========ब्राह्मण बरण सामग्री=======
1】धोती 
२】दुपट्टा
३】आंगोछा
४】आसन
५】माला 
६】गौमुखी 
७】लोटा 
८】पंचपात्र 
९】चमची 
१०】तष्टा 
११】अर्घा (1)मृतीका

(2)पंच पल्लव

(3)गौ मूत्र 

(4)गौमय 

(5)गन्धोदक

(6)दर्भोदक

(7)नारिकेलोदक

(8)क्षारोदक

(9)दूध

(11)स्वादुदक

(12)दधि 

(13)सुरोदक

(14)इक्षुरश

(15)घृत

(16)भस्म

(17)गौ घृत

(18)मधु

(19)शर्करल 

(20)पंचामृत 

(21)गन्ध

(22)पंच पल्लव

(23)सर्बोषधि 

(24)श्वेत पुष्प

(25)फलोदक

(26)अष्ट फ़ल

(27)स्वर्ण

(28)गौ श्र्ंगोदक

(29)सप्त धान्य 

(30)शह्स्त्र् छिद्र कलश 

(31)दिव्य औषधी 

(33)नवरत्न

(34)तीर्थोदक

(35)कदंब पत्र 

(36)शाल्मली पत्र

(37)जम्बू  पत्र 

(38)अशोकपत्र

(39)पीपलपत्र

(40)आम पत्र

(41)बट

(42)विल्व

(43)नाग पत्र

(44)पलाश पत्र

45=उबटन
1)=========================
1=जलाधीवास
2=गन्धादी वास
4=पुष पादी वास
5=धान्यादी वास
6=फलादी वास
7=ओषध्यादी वास
8=बश्त्रादी वास
9=घ्रतादि वास
10=शक्रादी वास
11=मिष्ठानआदी वास
12=श्य्यादी वास


 पूर्ण आहुति के लिये 

केले के खंबे 

बांस की 3=3 फिट की चम्पट 

दही अग्नी 

कपडा लाल 

Thursday, 5 May 2022

अशुभ योग में न करे शुभ कार्य पर्णकुटी आश्रम गुना

शुभ मुहूर्त या योग को लेकर मुहूर्त मार्तण्ड, मुहूर्त गणपति, मुहूर्त चिंतामणि, मुहूर्त पारिजात, धर्म सिंधु, निर्णय सिंधु आदि शास्त्र हैं। हिन्दू पंचांग में मुख्य 5 बातों का ध्यान रखा जाता है। इन पांचों के आधार पर ही कैलेंडर विकसित होता है। ये 5 बातें हैं- 1.तिथि, 2.वार, 3. नक्षत्र, 4. योग और 5. करण। आज हम बात करते हैं योग की।
 
 
27 योग :- सूर्य-चन्द्र की विशेष दूरियों की स्थितियों को योग कहते हैं। योग 27 प्रकार के होते हैं। दूरियों के आधार पर बनने वाले 27 योगों के नाम क्रमश: इस प्रकार हैं- 1.विष्कुम्भ, 2.प्रीति, 3.आयुष्मान, 4.सौभाग्य, 5.शोभन, 6.अतिगण्ड, 7.सुकर्मा, 8.धृति, 9.शूल, 10.गण्ड, 11.वृद्धि, 12.ध्रुव, 13.व्याघात, 14.हर्षण, 15.वज्र, 16.सिद्धि, 17.व्यतिपात, 18.वरीयान, 19.परिध, 20.शिव, 21.सिद्ध, 22.साध्य, 23.शुभ, 24.शुक्ल, 25.ब्रह्म, 26.इन्द्र और 27.वैधृति।

अशुभ योग कौन से हैं?

27 योगों में से कुल 9 योगों को अशुभ माना जाता है तथा सभी प्रकार के शुभ कामों में इनसे बचने की सलाह दी गई है। 
ये 9 अशुभ योग हैं- 
विष्कुम्भ,
 अतिगण्ड,
 शूल, गण्ड,
 व्याघात, वज्र, 
व्यतिपात, 
परिध 
और वैधृति। 

1.विष्कुम्भ योग : इस योग को विष से भरा हुआ घड़ा माना जाता है इसीलिए इसका नाम विष्कुम्भ योग है। जिस प्रकार विष पान करने पर सारे शरीर में धीरे-धीरे विष भर जाता है वैसे ही इस योग में किया गया कोई भी कार्य विष के समान होता है अर्थात इस योग में किए गए कार्य का फल अशुभ ही होते है

2.अतिगण्ड : इस योग को बड़ा दुखद माना गया है। इस योग में किए गए कार्य दुखदायक होते हैं। इस योग में किए गए कार्य से धोखा, निराशा और अवसाद का ही जन्म होता है। अत: इस योग में कोई भी शुभ या मंगल कार्य नहीं करना चाहिए और ना ही कोई नया कार्य आरंभ करना चाहिए।
3.शूल योग : शूल एक प्रकार का अस्त्र है और इसके चूभने से बहुत बहुत भारी पीड़ा होती है। जैसे नुकीला कांटा चूभ जाए। इस योग में किए गए कार्य से हर जगह दुख ही दुख मिलते हैं। वैसे तो इस योग में कोई काम कभी पूरा होता ही नहीं परंतु यदि अनेक कष्ट सहने पर पूरा हो भी जाए तो शूल की तरह हृदय में एक चुभन सी पैदा करता रहता है। अत: इस योग में कोई भी कार्य न करें अन्यथा आप जिंदगी भर पछताते रहेंगे।

4.गण्ड : इस योग में किए गए हर कार्य में अड़चनें ही पैदा होगी और वह कार्य कभी भी सफल नहीं होगा ना ही कोई मामला कभी हल होगा। मामला उलझता ही जाएगा। इस योग किया गया कार्य इस तरह उलझता है कि व्यक्ति सुलझाते सुलझाते थक जाता है लेकिन कभी वह मामला सही नहीं हो पाता। इसलिए कोई भी नया काम शुरू करने से पहले गण्ड योग का ध्यान अवश्य करना चाहिए।
 
5.व्याघात योग : किसी प्रकार का होने वाला आघात या लगने वाला धक्का। यदि इस योग में कोई कार्य किया गया तो बाधाएं तो आएगी ही साथ ही व्यक्ति को आघात भी सहन करना होगा। यदि व्यक्ति इस योग में किसी का भला करने जाए तो भी उसका नुकसान होगा। इस योग में यदि किसी कारण कोई गलती हो भी जाए तो भी उसके भाई-बंधु उसका साथ सोचकर छोड़ देते हैं कि उसने यह जानबूझ कर ऐसा किया है।
 
 
6.वज्र योग : वज्र का अर्थ होता है कठोर। इस योग में वाहन आदि नहीं खरीदे जाते हैं अन्यथा उससे हानि या दुर्घटना हो सकती है। इस योग में सोना खरीदने पर चोरी हो जाता है और यदि कपड़ा खरीदा जाए तो वह जल्द ही फट जाता है या खराब निकलता है।
 
7.व्यतिपात योग : इस योग में किए जाने वाले कार्य से हानि ही हानि होती है। अकारण ही इस योग में किए गए कार्य से भारी नुकसान उठाना पड़ता है। किसी का भला करने पर भी आपका या उसका बुरा ही होगा।
 
 
8.परिध योग : इस योग में शत्रु के विरूद्ध किए गए कार्य में सफलता मिलती है अर्थात शत्रु पर विजय अवश्य मिलती है।
 
9.वैधृति योग : यह योग स्थिर कार्यों हेतु ठीक है परंतु यदि कोई भाग-दौड़ वाला कार्य अथवा यात्रा आदि करनी हो तो इस योग में नहीं करनी चाहिए।
Gurudev
Bhubneshwar
Parnkuti
9893956810

Sunday, 24 April 2022

पीपल द्वारा नवग्रह दोष दूर करने के उपाय पर्णकुटी गुना 9893946810

पीपल द्वारा नवग्रह दोष दूर करने के उपाय वैदिक दृष्टिकोण से:-

भारतीय संस्कृतिमें पीपल देववृक्ष है, इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्त: चेतना 
पुलकित और प्रफुल्लित होती है।स्कन्द पुराणमें वर्णित है कि अश्वत्थ (पीपल) के मूल 
में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं 
के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं।पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:
मूर्तिमान स्वरूप है। भगवानकृष्णकहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ।
स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त 
किया है। शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता 
स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी विनष्ट 
नहीं होती। पीपल की सेवा करने वाले सद्गति प्राप्त करते हैं।
अश्वत्थ सुमहाभागसुभग प्रियदर्शन। 
इष्टकामांश्चमेदेहिशत्रुभ्यस्तुपराभवम्॥ 

प्रत्येक नक्षत्र वाले दिन भी इसका विशिष्ट गुण भिन्नता लिए हुए होता है।
भारतीय ज्योतिष शास्त्र में कुल मिला कर 28 नक्षत्रों कि गणना है, तथा प्रचलित 
केवल 27 नक्षत्र है उसी के आधार पर प्रत्येक मनुष्य के जन्म के समय नामकरण होता है।
अर्थात मनुष्य का नाम का प्रथम अक्षर किसी ना किसी नक्षत्र के अनुसार ही होता है।
तथा इन नक्षत्रों के स्वामी भी अलग अलग ग्रह होते है।विभिन्न नक्षत्र एवं उनके स्वामी 
निम्नानुसार है यहां नक्षत्रों के स्वामियों के नाम कोष्ठक में है जिससे आपको जनलाभार्थ
ज्ञान वृद्धि हो-:-

(१)अश्विनी(केतु), (१०)मघा(केतु), (१९)मूल(केतु),
(२)भरणी(शुक्र), (११)पूर्व फाल्गुनी(शुक्र), (२०)पूर्वाषाढा(शुक्र),
(३)कृतिका(सूर्य), (१२)उत्तराफाल्गुनी(सूर्य), (२१)उत्तराषाढा(सूर्य),
(४)रोहिणी(चन्द्र), (१३)हस्त(चन्द्र), (२२)श्रवण(चन्द्र), 
(५)मृगशिर(मंगल), (१४)चित्रा(मंगल), (२३)धनिष्ठा(मंगल),
(६)आर्द्रा(राहू), (१५)स्वाति(राहू), (२४)शतभिषा(राहू), 
(७)पुनर्वसु(वृहस्पति), (१६)विशाखा(वृहस्पति), (२५)पूर्वाभाद्रपद(वृहस्पति),
(८)पुष्य(शनि), (१७)अनुराधा(शनि), (२६)उत्तराभाद्रपद(शनि)
(९)आश्लेषा(बुध), (१८)ज्येष्ठा(बुध), (२७)रेवती(बुध)

ज्योतिष शास्त्र अनुसार प्रत्येक ग्रह 3, 3 नक्षत्रों के स्वामी होते है।
कोई भी व्यक्ति जिस भी नक्षत्र में जन्मा हो वह उसके स्वामी ग्रह से सम्बंधित दिव्य 
पीपल के प्रयोगों को करके लाभ प्राप्त कर सकता है।
अपने जन्म नक्षत्र के बारे में अपनी जन्मकुंडली को देखें या अपनी जन्मतिथि और 
समय व् जन्म स्थान लिखकर भेजे,या अपने विद्वान ज्योतिषी से संपर्क कर जन्म का 
नक्षत्र ज्ञात कर के यह सर्व सिद्ध प्रयोग करके लाभ उठा सकते है।

    सूर्य:-

जिन नक्षत्रों के स्वामी भगवान सूर्य देव है, उन व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है।
(अ) रविवार के दिन प्रातःकाल पीपल वृक्ष की 5 परिक्रमा करें।
(आ) व्यक्ति का जन्म जिस नक्षत्र में हुआ हो उस दिन (जो कि प्रत्येक माह में अवश्य 
आता है) भी पीपल वृक्ष की 5 परिक्रमा अनिवार्य करें।
(इ) पानी में कच्चा दूध मिला कर पीपल पर अर्पण करें।
(ई) रविवार और अपने नक्षत्र वाले दिन 5 पुष्प अवश्य चढ़ाए। साथ ही अपनी कामना 
की प्रार्थना भी अवश्य करे तो जीवन की समस्त बाधाए दूर होने लगेंगी।

   चन्द्र:-

जिन नक्षत्रों के स्वामी भगवान चन्द्र देव है, उन व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है।
(अ) प्रति सोमवार तथा जिस दिन जन्म नक्षत्र हो उस दिन पीपल वृक्ष को सफेद 
पुष्प अर्पण करें लेकिन पहले 4 परिक्रमा पीपल की अवश्य करें।
(आ) पीपल वृक्ष की कुछ सुखी टहनियों को स्नान के जल में कुछ समय तक रख 
कर फिर उस जल से स्नान करना चाहिए।
(इ) पीपल का एक पत्ता सोमवार को और एक पत्ता जन्म नक्षत्र वाले दिन तोड़ कर 
उसे अपने कार्य स्थल पर रखने से सफलता प्राप्त होती है और धन लाभ के मार्ग 
प्रशस्त होने लगते है।
(ई) पीपल वृक्ष के नीचे प्रति सोमवार कपूर मिलकर घी का दीपक लगाना चाहिए।

   मंगल:-

जिन नक्षत्रो के स्वामी मंगल है. उन नक्षत्रों के व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है.... 
(अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन और प्रति मंगलवार को एक ताम्बे के लोटे में जल लेकर 
पीपल वृक्ष को अर्पित करें।
(आ) लाल रंग के पुष्प प्रति मंगलवार प्रातःकाल पीपल देव को अर्पण करें।
(इ) मंगलवार तथा जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष की 8 परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए।
(ई) पीपल की लाल कोपल को (नवीन लाल पत्ते को) जन्म नक्षत्र के दिन स्नान के 
जल में डाल कर उस जल से स्नान करें।
(उ) जन्म नक्षत्र के दिन किसी मार्ग के किनारे १ अथवा 8 पीपल के वृक्ष रोपण करें।
(ऊ) पीपल के वृक्ष के नीचे मंगलवार प्रातः कुछ शक्कर डाले।
(ए) प्रति मंगलवार और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन अलसी के तेल का दीपक पीपल 
के वृक्ष के नीचे लगाना चाहिए।

    बुध:-

जिन नक्षत्रों के स्वामी बुध ग्रह है, उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग 
करने चाहिए।
(अ) किसी खेत में जंहा पीपल का वृक्ष हो वहां नक्षत्र वाले दिन जा कर, पीपल के 
नीचे स्नान करना चाहिए।
(आ) पीपल के तीन हरे पत्तों को जन्म नक्षत्र वाले दिन और बुधवार को स्नान के 
जल में डाल कर उस जल से स्नान करना चाहिए।
(इ) पीपल वृक्ष की प्रति बुधवार और नक्षत्र वाले दिन 6 परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए।
(ई) पीपल वृक्ष के नीचे बुधवार और जन्म, नक्षत्र वाले दिन चमेली के तेल का दीपक 
लगाना चाहिए।
(उ) बुधवार को चमेली का थोड़ा सा इत्र पीपल पर अवश्य लगाना चाहिए अत्यंत 
लाभ होता है।

वृहस्पति:-

जिन नक्षत्रो के स्वामी वृहस्पति है. उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग 
करने चाहियें।
(अ) पीपल वृक्ष को वृहस्पतिवार के दिन और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन पीले पुष्प 
अर्पण करने चाहिए।
(आ) पिसी हल्दी जल में मिलाकर वृहस्पतिवार और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन 
पीपल वृक्ष पर अर्पण करें।
(इ) पीपल के वृक्ष के नीचे इसी दिन थोड़ा सा मावा शक्कर मिलाकर डालना या 
कोई भी मिठाई पीपल पर अर्पित करें।
(ई) पीपल के पत्ते को स्नान के जल में डालकर उस जल से स्नान करें।
(उ) पीपल के नीचे उपरोक्त दिनों में सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

    शुक्र:'

जिन नक्षत्रो के स्वामी शुक्र है. उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग 
करने चाहियें-:-

(अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष के नीचे बैठ कर स्नान करना।
(आ) जन्म नक्षत्र वाले दिन और शुक्रवार को पीपल पर दूध चढाना।
(इ) प्रत्येक शुक्रवार प्रातः पीपल की 7 परिक्रमा करना।
(ई) पीपल के नीचे जन्म नक्षत्र वाले दिन थोड़ासा कपूर जलाना।
(उ) पीपल पर जन्म नक्षत्र वाले दिन 7 सफेद पुष्प अर्पित करना।
(ऊ) प्रति शुक्रवार पीपल के नीचे आटे की पंजीरी सालना।

    शनि:'

जिन नक्षत्रों के स्वामी शनि है. उस नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहिए..
शनिवार के दिन पीपल पर थोड़ा सा सरसों का तेल चडाना।
 शनिवार के दिन पीपल के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाना।
 शनिवार के दिन और जन्म नक्षत्र के दिन पीपल को स्पर्श करते हुए उसकी 
एक परिक्रमा करना।
 जन्म नक्षत्र के दिन पीपल की एक कोपल चबाना।
 पीपल वृक्ष के नीचे कोई भी पुष्प अर्पण करना।
पीपल के वृक्ष पर मोलि बंधन।

     राहू:-

जिन नक्षत्रों के स्वामी राहू है उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहिए...
(अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष की 21 परिक्रमा करना।
(आ) शनिवार वाले दिन पीपल पर शहद चडाना।
(इ) पीपल पर लाल पुष्प जन्म नक्षत्र वाले दिन चडाना।
(ई) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल के नीचे गौमूत्र मिले हुए जल से स्नान करना।
(उ) पीपल के नीचे किसी गरीब को मीठा भोजन दान करना।

    केतु:-

जिन नक्षत्रों के स्वामी केतु है, उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न उपाय 
कर अपने जीवन को सुखमय बनाना चाहिए।
(अ) पीपल वृक्ष पर प्रत्येक शनिवार मोतीचूर का एक लड्डू या इमरती चडाना।
(आ) पीपल पर प्रति शनिवार गंगाजल मिश्रित जल अर्पित करना।
(इ) पीपल पर तिल मिश्रित जल जन्म नक्षत्र वाले दिन अर्पित करना।
(ई) पीपल पर प्रत्येक शनिवार सरसों का तेल चडाना।
(उ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल की एक परिक्रमा करना।
(ऊ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल की थोडीसी जटा लाकर उसे धूप दीप दिखा कर 
अपने पास सुरक्षित रखना।

अथर्ववेदके उपवेद आयुर्वेद में पीपल :-

के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। पीपल के वृक्ष के नीचे 
मंत्र, जप और ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को शुभ माना गया है। श्रीमद्भागवत् 
में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल 
वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए। यज्ञ में प्रयुक्त किए जाने वाले 'उपभृत पात्र' 
(दूर्वी, स्त्रुआ आदि) पीपल-काष्ट से ही बनाए जाते हैं। पवित्रता की दृष्टि से यज्ञ में 
उपयोग की जाने वाली समिधाएं भी आम या पीपल की ही होती हैं। यज्ञ में अग्नि 
स्थापना के लिए ऋषिगण पीपल के काष्ठ और शमी की लकड़ी की रगड़ से अग्नि 
प्रज्वलित किया करते थे।ग्रामीण संस्कृति में आज भी लोग पीपल की नयी कोपलों 
में निहित जीवनदायी गुणों का सेवन कर उम्र के अंतिम पडाव में भी सेहतमंद बने रहते हैं।
आयु: प्रजांधनंधान्यंसौभाग्यंसर्व संपदं। 
देहिदेवि महावृक्षत्वामहंशरणंगत:॥

Tuesday, 5 April 2022

राम नवमी पर रवि पुष्य योग, सर्वार्थ सिद्धि योग एवं रवि योग का त्रिवेणी संयोग बन रहा है. पर्णकुटी गुना

 इस बार राम नवमी पर रवि पुष्य योग, सर्वार्थ सिद्धि योग एवं रवि योग का त्रिवेणी संयोग बन रहा है. 
ये तीनों ही योग इस दिन को अतिशुभ बना रहे हैं. 
यह दिन मकान, वाहन आदि की खरीदारी, विशेष कार्यों को शुरु करने और सूर्य देव की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए उत्तम है. 
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीराम का जन्म त्रेतायुग में हुआ था, 
रामायण मीमांसा के रचनाकार धर्मसम्राट स्वामी करपात्री, गोवर्धन पुरी शंकराचार्य पीठ, पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र, श्रीराघवेंद्रचरितम् के रचनाकार श्रीभागवतानंद गुरु आदि के अनुसार श्रीराम अवतार श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हुआ था जिसके अनुसार श्रीरामचंद्र जी का काल लगभग पौने दो करोड़ वर्ष पूर्व का है। इसके सन्दर्भ में विचार पीयूष, भुशुण्डि रामायण, पद्मपुराण, हरिवंश पुराण, वायु पुराण, संजीवनी रामायण एवं पुराणों से प्रमाण दिया जाता है।

तब चैत्र शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र में कर्क लग्न का उदय था और पांच ग्रह मंगल, शुक्र, सूर्य, शनि एवं बृहस्पति उच्च स्थान पर विद्यमान थे.आइए जानते हैं 
वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के जन्म का क्या वर्णन है ततो य्रूो समाप्ते तु ऋतुना षट् समत्युय: । 
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ॥ 
नक्षत्रेsदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु । 
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह॥ 
प्रोद्यमाने जनन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् । 
कौसल्याजयद् रामं दिव्यलक्षसंयुतम् ॥ 

भावार्थ-
 चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथी को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में कौशल्यादेवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त सर्वलोकवन्दित श्री राम को जन्म दिया। यानी जिस दिन भगवान राम का जन्म हुआ उस दिन अयोध्या के ऊपर तारों की सारी स्थिति का साफ-साफ जिक्र है

मान्यता है कि भगवान श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। इसीलिए इस दिन तीसरे प्रहर तक व्रत रखा जाता है और दोपहर में मनाया जाता है श्रीराम महोत्सव। इस दिन व्रत रखकर भगवान श्रीराम और रामचरितमानस की पूजा करनी चाहिए। इस दिन जो श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर भगवान श्रीराम की पूजा करते हैं तथा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान−पुण्य करते हैं वह अनेक जन्मों के पापों को भस्म करने में समर्थ होते हैं।

रामायण में वर्णित श्रीराम जन्म कथा का श्रद्धा भक्ति पूर्वक पाठ और श्रवण तो इस दिन किया ही जाता है अनेक भक्त रामायण का अखण्ड पाठ भी करते हैं।

Monday, 4 April 2022

राम नबमी राम के जन्म का क्या वर्णन है कि —

वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के जन्म का क्या वर्णन है कि — 
ततो य्रूो समाप्ते तु ऋतुना षट् समत्युय: ।
 ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ॥
 नक्षत्रेsदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु ।
 ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह॥
 प्रोद्यमाने जनन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् । 
कौसल्याजयद् रामं दिव्यलक्षसंयुतम् ॥

 भावार्थ- चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथी को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में कौशल्यादेवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त सर्वलोकवन्दित श्री राम को जन्म दिया। यानी जिस दिन भगवान राम का जन्म हुआ उस दिन अयोध्या के ऊपर तारों की सारी स्थिति का साफ-साफ जिक्र है

वाल्मीकि के अनुसार श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी तिथि एवं पुनर्वसु नक्षत्र में जब पांच ग्रह अपने उच्च स्थान में थे तब हुआ था। इस प्रकार सूर्य मेष में 10 डिग्री, मंगल मकर में 28 डिग्री, ब्रहस्पति कर्क में 5 डिग्री पर, शुक्र मीन में 27 डिग्री पर एवं शनि तुला राशि में 20 डिग्री पर था। (बाल कांड 18/श्लोक 8, 9)।
 तब 12 बजकर 25 मिनट पर आकाश में ऐसा ही दृष्य था जो कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है।

हिन्दु धर्म शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की पुन: स्थापना के लिये भगवान विष्णु ने मृत्यु लोक में श्री राम के रूप में अवतार लिया था। श्रीराम चन्द्र जी का जन्म चैत्र शुक्ल की नवमी [4] के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में रानी कौशल्या की कोख से, राजा दशरथ के घर में हुआ था।
राम नवमी का त्यौहार पिछले कई हजार सालों से मनाया जा रहा है। राम नवमी का त्यौहार भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।

Monday, 28 March 2022

चैत्र नवरात्र महूर्त विश्लेषण पर्णकुटी गुना

गुड़ी पड़वा में ‘गुड़ी’ शब्द का अर्थ ‘विजय पताका’ और पड़वा का अर्थ प्रतिपदा तिथि से है। साथ ही चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गुड़ी पड़वा पर्व के मौके पर प्रत्येक घर में विजय के प्रतीक स्वरूप गुड़ी सजाई जाती है और लोग हर्ष उल्लास के साथ इसे मनाते हैं। कहा जाता है कि इस दिन अपने घर को सजाने और गुड़ी फहराने से घर में सुख समृद्धि आती है और बुराइयों का नाश होता है। 
इस पर्व पर सूर्य देव की विशेष आराधना भी की जाती है। लोग सूर्य उपासना करके आरोग्य और सुख- समृद्धि की कामना करते हैं।
आपको बात दें कि गुड़ी पड़वा के त्योहार पर लोग पूरन पोली बनाते हैं जो  परिवार के लोग इसे एक साथ बैठकर खाते हैं।
आपको बता दें कि गुड़ी पड़वा पर नीम की पत्तियों को खाने की परंपरा है।
ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्रमास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि संरचना प्रारंभ की। यह भारतीयों की मान्यता है, इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्षारंभ मानते हैं।
महान गणितज्ञ भास्कराचार्य द्वारा इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, मास और वर्ष की गणना कर पंचांग की रचना की गई थी।
इसी कारण हिन्दू पंचांग का आरंभ भी गुड़ी पड़वा से ही होता है। (पंचांग) के ये पांच प्रमुख अंग हैं- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण (तिथि का आधा भाग)। पंचांग के माध्यम से समय के विभिन्न अंगों का अध्ययन और विश्लेषण करके यह जाना जाता है कि किस कार्य को करने के लिए कौन सा दिन सही है।नव-संवत्सरोत्सव में काल (समय) का, उसके विभिन्न अंगों- वर्ष, मास, तिथि, वार, नक्षत्र आदि के साथ पूजन करने का उद्देश्य समय की महत्ता को समझाना है। 

हिन्दुओं में पूरे वर्ष के दौरान साढ़े तीन मुहूर्त बहुत शुभ माने जाते हैं।
ये साढ़े तीन मुहूर्त हैं–
गुड़ी पड़वा,
अक्षय तृतीया,
दशहरा
और दीवाली, दिवाली को आधा मुहूर्त माना जाता है 

राजा शनि

दुर्भिक्ष मरकं रोगान करोति पवनं तथा ।

शनैश्चराब्दो दोषाश्च विग्रहांश्चैव भूभुजम् ।।

शनि के वर्ष में उपद्रव, युद्ध, दंगे, मारकाट का वातावरण तैयार होता है। अनेक देशों में परस्पर तनाव व टकराव होता है। जनहानि व दुर्भिक्ष होते हैं। तूफान से जनधन हानि, कम वर्षा या वर्षा के साथ तेज हवाएं चलती हैं। पेयजल से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है। राजनैतिक मतभेद सामान्य रहता है। न्याय तथा कार्यप्रणाली में सकारात्मक परिवर्तन होगा। मौद्रिक नीति में परिवर्तन होगा। महंगाई बढ़ेगी। उड़द, कोयला, लकड़ी, लोहा, कपड़ा, स्टील महंगे होंगे।

मंत्री बृहस्पति

विविध दान्ययुता खलु मेदिनि प्रचुरतोयधनामुदिता भवेत ।

नृपतयो जन लालन तत्परा: सुरगुरौ खलु मंत्रिपदान्विते ।।

देवगुरु बृहस्पति के मंत्री होने से सभी प्रकार के अनाजों की अच्छी पैदावार, खूब वर्षा, शासन की लोकभाव नीतियों के कारण सर्वत्र प्रसन्नता रहती है। किंतु राजा शनि होने से उपरोक्त फलों में न्यूनता समझनी चाहिए।

 किस दिन घटस्थापना होने से किस बाहन पर आती है
 देवी जी
शशिसुर्ये गजारूढा ,शनिभोमे तुँरगमे ।
गुरू शुक्रो च दोलायाँ- बुधे नौका प्रकीर्तिता ।।

1सोमवार रविवार को हाथी पर
2शनिवार मंगलवार को घोड़े पर
3गुरुवार शुक्रवार को खटोला यानी डोली पर
4 बुधवार को नोका पर

बाहन पर आने का फल
गजे च जलदा देवी , छत्र भँग तुरँगमे ।
नौकायाँ सर्व सिद्धिस्यात दोलायाँ मरणँ धुव्रम ।।

रविवार और सोमवार को आगमन( नवरात्र शुरू होने का दिन) होता है तो वाहन हाथी है 
जो जल की वृष्टि कराने वाला है ,

शनिवार और मँगल वार को आगमन होता है तो राजा और सरकार को पद से हटना पड सकता है ,

गुरूवार और शुक्रवार को आगमन हो तो दोला ( खटोला ) पर आगमन होता है जो जन हानि , 
ताँडव , रक्तपात होना बताता है ,

बुधवार को आगमन हो तो देवी नोका ( नाव ) पर आती है तब भक्तो को सभी सिद्धि देती है ।
इस दिन इंद्र योग, अमृत सिद्धि योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है. गुड़ी पड़वा पर इंद्र योग सुबह 08:31 मिनट तक है. फिर इसके बाद अमृत सिद्धि और सर्वार्थ सिद्धि योग 1 अप्रैल से सुबह 10:40 मिनट से 02 अप्रैल को सुबह 06:10 मिनट तक है.