ज्योतिष समाधान

Friday, 21 July 2017

आखिर भद्रा में क्यों नहीं बांधी जाती राखी? ऐसा कहा जाता है कि सूपनखा मे अपने भाई रावण को भद्रा में राखी बांधी थी, जिसके कारण रावण का विनाश हो गया, यानी कि रावण का अहित हुआ। इस कारण लोग मना करते हैं भद्रा में राखी बांधने को। भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी……। अतः हिन्दू शास्त्र के अनुसार यह त्यौहार 7 अगस्त को भद्रा रहित काल में मनाया जाएगा।  किन्तु किसी कारणवश भद्रा काल में यह कार्य करना हो तो भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा पुच्छ काल में रक्षा बंधन का त्यौहार मानना श्रेष्ठ है भद्रा पूँछ – 06:40 से 07:55  भद्रा मुख – 07:55 से 10:01  भद्रा अन्त समय – 11:04 श्रावणी उपाकर्म   राखी बंधन   श्रवण पूजन  का मुहूर्त दिन के  11•05 से दोपहर के 1•28 मिनट के बीच में करना है ।


भद्रा रहेगी----- आखिर भद्रा में क्यों नहीं बांधी जाती राखी? ऐसा कहा जाता है कि सूपनखा मे अपने भाई रावण को भद्रा में राखी बांधी थी, जिसके कारण रावण का विनाश हो गया, यानी कि रावण का अहित हुआ। इस कारण लोग मना करते हैं भद्रा में राखी बांधने को।

भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी……।

अतः हिन्दू शास्त्र के अनुसार यह त्यौहार 7 अगस्त को भद्रा रहित काल में मनाया जाएगा। 
किन्तु किसी कारणवश भद्रा काल में यह कार्य करना हो तो भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा पुच्छ काल में रक्षा बंधन का त्यौहार मानना श्रेष्ठ है

भद्रा पूँछ – 06:40 से 07:55 
भद्रा मुख – 07:55 से 10:01 
भद्रा अन्त समय – 11:04

श्रावणी उपाकर्म 
 राखी बंधन  
श्रवण पूजन  का मुहूर्त
दिन के  11•05 से दोपहर के 1•28 मिनट के बीच में करना है ।

आखिर भद्रा में क्यों नहीं बांधी जाती राखी? ऐसा कहा जाता है कि सूपनखा मे अपने भाई रावण को भद्रा में राखी बांधी थी, जिसके कारण रावण का विनाश हो गया, यानी कि रावण का अहित हुआ। इस कारण लोग मना करते हैं भद्रा में राखी बांधने को। भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी……। अतः हिन्दू शास्त्र के अनुसार यह त्यौहार 7 अगस्त को भद्रा रहित काल में मनाया जाएगा।  किन्तु किसी कारणवश भद्रा काल में यह कार्य करना हो तो भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा पुच्छ काल में रक्षा बंधन का त्यौहार मानना श्रेष्ठ है भद्रा पूँछ – 06:40 से 07:55  भद्रा मुख – 07:55 से 10:01  भद्रा अन्त समय – 11:04 श्रावणी उपाकर्म   राखी बंधन   श्रवण पूजन  का मुहूर्त दिन के  11•05 से दोपहर के 1•28 मिनट के बीच में करना है ।

12साल बाद ऐसा संयोग बना है जब राखी के दिन ग्रहण लग रहा है।

इसलिए इस बार राखी के दिन सूतक का भी लगेगा

श्रावण शुक्ल पक्ष पूर्णिमा  7•8•2017 सोमवार

श्रावणी उपाकर्म 
 राखी बंधन  
श्रवण पूजन  का मुहूर्त
दिन के  11•05 से दोपहर के 1•28 मिनट के बीच में करना है ।

=====================================
चंद्र ग्रहण  समय  प्रारम्भ समय 
रात्रि 10•29 से  मध्य रात्रि 12•22 तक ।
ग्रहण का कुल समय 1•53 मिनट है।

सूतक काल प्रांरभ
दोपहर 1•29 मिनट से प्रांरभ 

गर्भवती स्त्री को सूर्य एवं चन्द्रग्रहण नहीं देखना चाहिए,

क्योंकी उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन जाता है । गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है ।

इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहू केतू उसका स्पर्श न करें. ।

ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्री को कुछ भी कैंची, चाकू आदि से काटने को मना किया जाता है , और किसी वस्त्र आदि को सिलने से मना किया जाता है,

क्योंकि ऐसी धारणा है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं

ग्रहण के समय सोने से रोग पकड़ता है किसी कीमत पर नहीं सोना चाहिए।

ग्रहण के समय मल-मूत्र त्यागने से घर में दरिद्रता आती है । शौच करने से पेट में क्रमी रोग पकड़ता है ।

ये शास्त्र बातें हैं इसमें किसी का लिहाज नहीं होता। ग्रहण के समय संभोग करने से सूअर की योनी मिलती है ।

============================================= ===    भद्रा विश्लेषण। =============

पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ 
6 अगस्त 2017 को  रात्रि10:28 बजे से आरंभ होगा परन्तु भद्रा काल व्याप्त रहेगी।

भद्रा रहेगी----- आखिर भद्रा में क्यों नहीं बांधी जाती राखी? ऐसा कहा जाता है कि सूपनखा मे अपने भाई रावण को भद्रा में राखी बांधी थी, जिसके कारण रावण का विनाश हो गया, यानी कि रावण का अहित हुआ। इस कारण लोग मना करते हैं भद्रा में राखी बांधने को।

भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी……।

अतः हिन्दू शास्त्र के अनुसार यह त्यौहार 7 अगस्त को भद्रा रहित काल में मनाया जाएगा। 
किन्तु किसी कारणवश भद्रा काल में यह कार्य करना हो तो भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा पुच्छ काल में रक्षा बंधन का त्यौहार मानना श्रेष्ठ है

भद्रा पूँछ – 06:40 से 07:55 
भद्रा मुख – 07:55 से 10:01 
भद्रा अन्त समय – 11:04

श्रावणी उपाकर्म 
 राखी बंधन  
श्रवण पूजन  का मुहूर्त
दिन के  11•05 से दोपहर के 1•28 मिनट के बीच में करना है ।
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रक्षाबंधन हमारे सनातन धर्म का सबसे खास त्योहार है। भाई की सलामती के लिए सदियों से यह त्योहार वैदिक रीति से मनाया जाता रहा है।

हालांकि वक्त के साथ इसमें बदलाव आए हैं, लेकिन वैदिक रीति का अपना खास महत्व है।

रक्षाबंधन की वैदिक विधि में सबसे अहम भूमिका रक्षा सूत्र यानी राखी की है।

आज कल बाजार में तरह-तरह की राखियां मिल जाएंगी लेकिन प्राचीन काल में वैदिक राखियां ही बनाई जाती थीं।

वैदिक राखी में जिन चीजों का इस्तेमाल किया जाता है उसका अपना-अपना प्रतीकात्मक अर्थ भी है।

माना जाता है कि ये वैदिक राखी न सिर्फ आपको अपनी विरासत और परंपरा से जोड़ती है, बल्कि आपके भाई की तरक्की के रास्ते के सारे कांटे भी चुन लेती है।

तो इस बार क्यों न आप अपने भाई को अपने हाथ से बनाई वैदिक राखी ही बांधें।

भाई की कलाई पर राखी बांधते समय बहन को इस मंत्र का उच्चारण जरूर करना चाहिए--

आयुर्द्रोणसुते श्रियो दशरथे शत्रुक्षयं राघवे । 
ऐश्वर्य नहुषे गतिश्च पवने मानञ्च दुर्योधने ॥
शौर्य शान्तनवे बलं हलधरे सत्यञ्च कुन्तीसुते । 
विज्ञानं विदुरे भवन्ति भवतां कीर्तिश्च नारायणे ॥

लक्ष्मीस्ते पंकजश्री निवसतु भवने भारती कण्ठदेशे बर्द्धन्तां बन्धुवर्गा: सकलरिपुगणा यान्तु पातालदेशम् । 
देश देशे च कीर्ति: प्रसरतु भवतां कुन्दपुष्पेन्दुशुभ्रा जीव त्वं पुत्रपौत्रै: सकलसुखयुतैर्हायनानां शलैश्व ॥

स्वस्त्यस्तु ते कुशलमस्तु चिरायुरस्तु गोवाजीरत्न धनधान्यसमृद्धिरस्तु ।
ऐश्वर्यमस्तु वलमस्तु रिपुक्षयोSस्तु सन्तानसौख्यशततं हरिभक्तिस्तु ॥

मन्त्रार्था: सफला: सन्तु पूर्णा: सन्तु मनोरथा: । 
शत्रुंणा बुद्धिनाशोSस्तु मित्राणांमुदयस्तव ॥ 
अव्याधिना शरीरेण मनसा च निरामया । 
पूरयन्नर्थिनामाशां त्वं जीव शरदांशतम् ॥ 
भद्रमस्तु शिवंचास्तु महालक्ष्मी प्रसीदतु । 
रक्षन्तु त्वां सदां: देवा आशीष: सन्तु सर्वदा ॥ 
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। 
तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल।।

कैसे बनाएं वैदिक राखी?

वैदिक राखी बनाने के लिए जो 5 वस्तुएं जरूरी होती हैं
जिसमें

दूर्वा,
अक्षत, 
केसर,
चंदन 
और सरसों के दाने प्रमुख हैं।

इन पांचों चीजों को रेशम या मलमल के कपड़े में बांधकर उसे लाल रंग के कलावे में पिरो दें और इस तरह से वैदिक राखी तैयार हो जाएगी।

वैदिक राखी में जिन पांच चीजों का सम्मिश्रण होता है उसका अपना अलग महत्व होता है।

====================================
                              1   दूर्वा 
    
के पीछे धारणा यह है कि जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर लगाने पर वह तेजी से फैलता है और हजारों की संख्या में वृद्धि करता है,

उसी प्रकार भाई के वंश और सदगुणों में भी वृद्धि होती रहे और उसका सदाचार, मन की पवित्रता तीव्र गति से बढ़ती जाए। दूर्वा गणेश जी को प्रिय है। इसका राखी में प्रयोग करने का अर्थ यह भी है, कि हम जिसे राखी बांध रहे हैं, उनके जीवन में किसी तरह के विघ्न न आने पाए।

=====================================
                             2 अक्षत

हमारे रिश्तों के प्रति श्रद्धा भाव का प्रतीक होता है। लंबी उम्र और यशस्वी जीवन की कामना भी इन्हीं अक्षत में छुपी है।
====================================
                           3   केसर

की प्रकृति तेज होती है। हम जिसे राखी बांध रहे हैं, वह तेजस्वी हो। उनके जीवन में धर्म की तेजस्विता कभी कम न हो, इसके लिए वैदिक राखी में अक्षत का प्रयोग किया जाता है।

=====================================
                             4    चंदन

की प्रकृति शीतल होती है और यह सुंदर सुगंध देता है। भाई के जीवन में शीतलता बनी रहे और कभी मानसिक तनाव ना हो। उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे। इन गुणों की वजह से वैदिक राखी में चंदन का इस्तेमाल किया जाता है।
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                             5  सरसों
जहां तक सरसों के दाने की बात है तो इसकी प्रकृति तीक्ष्ण होती है। इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों, विध्नों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें। सरसों के दाने भाई की नजर उतारने और बुरी नजर से भाई को बचाने के लिए भी प्रयोग में लाए जाते हैं।

रक्षा बंधन : वैदिक राखी बांधने से होती है भाई की तरक्की

वामन पुराण की एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने जब राजा बलि से तीन पग में उनका सब कुछ ले लिया था, तब राजा बलि ने भगवान विष्णु से एक वरदान मांगा।

वरदान में बलि ने विष्णु भगवान को पाताल में उनके साथ निवास करने का आग्रह किया।

भगवान विष्णु को वरदान के कारण पाताल में जाना पड़ा। इससे देवी लक्ष्मी को बहुत दुखी हुईं।

लक्ष्मी जी भगवान विष्णु को वामन से मुक्त करवाने के लिए एक दिन वृद्ध महिला का वेष बनाकर पाताल पहुंची और वामन को राखी बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया।

वामन ने जब लक्ष्मी से कुछ मांगने के लिए कहा तो लक्ष्मी ने वामन से भगवान विष्णु को पाताल से बैकुंठ भेजने के लिए कहा।

प्रतीकात्मक फोटो बहन की बात रखने के लिए वामन ने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी के साथ बैकुंठ भेज दिया।

भगवान विष्णु ने वामन को वरदान दिया कि चतुर्मास की अवधि में वह पाताल में आकर रहेंगे।

इसके बाद से हर साल चार महीने भगवान विष्णु पाताल में रहते हैं।

पुराणों के अनुसार एक बार दानवों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवता दानवों से हारने लगे। देवराज इंद्र की पत्नी देवताओं की हो रही हार से घबरा गईं और इंद्र के प्राणों की रक्षा के तप करना शुरू कर दिया, तप से उन्हें एक रक्षासूत्र प्राप्त हुआ।

शचि ने इस रक्षासूत्र को श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई पर बांध दिया, जिससे देवताओं की शक्ति बढ़ गयी और दानवों पर जीत प्राप्त की।

किसके बांधनी चाहिए राखी

श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षासूत्र बांधने से इस दिन रक्षा बंधन का त्योहार मनाया जाने लगा। पुराणों के अनुसार आप जिसकी भी रक्षा एवं उन्नति की इच्छा रखते हैं उसे रक्षा सूत्र यानी राखी बांध सकते हैं, चाहें वह किसी भी रिश्ते में हो।

राखी के साथ क्या है जरूरी

रक्षाबंधन का त्योहार बिना राखी के पूरा नहीं होता, लेकिन राखी तभी प्रभावशाली बनती है जब उसे मंत्रों के साथ रक्षासूत्र बांधा जाए।

राखी बांधने का मंत्र ‘

येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः। 
तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे! मा चल! मा चल!!’

इस मंत्र का अर्थ है कि जिस प्रकार राजा बलि ने रक्षासूत्र से बंधकर विचलित हुए बिना अपना सब कुछ दान कर दिया। उसी प्रकार हे रक्षा! आज मैं तुम्हें बांधता हूं, तू भी अपने उद्देश्य से विचलित न हो और दृढ़ बना रहे।

दिया। भगवान विष्णु ने वामन को वरदान दिया कि चतुर्मास की अवधि में वह पाताल में आकर रहेंगे। इसके बाद से हर साल चार महीने भगवान विष्णु पाताल में रहते हैं।

पंडित bhubneshwar 
कस्तूरवा नगर पर्णकुटी गुना 
9893946810

करीब 12 साल बाद ऐसा संयोग बना है जब राखी के दिन ग्रहण लग रहा है। इसलिए इस बार राखी के दिन सूतक का भी लगश्रावणी उपाकर्म   राखी बंधन  श्रवण पूजन  का मुहूर्त दिन के  11•05 से दोपहर के 1•28 मिनट के बीच में करना है ।


करीब 12 साल बाद ऐसा संयोग बना है जब राखी के दिन ग्रहण लग रहा है।

इसलिए इस बार राखी के दिन सूतक का भी लगेगा

श्रावण शुक्ल पक्ष पूर्णिमा  7•8•2017 सोमवार

श्रावणी उपाकर्म 
 राखी बंधन 
श्रवण पूजन  का मुहूर्त
दिन के  11•05 से दोपहर के 1•28 मिनट के बीच में करना है ।

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चंद्र ग्रहण  समय  प्रारम्भ समय
रात्रि 10•29 से  मध्य रात्रि 12•22 तक ।
ग्रहण का कुल समय 1•53 मिनट है।

सूतक काल प्रांरभ
दोपहर 1•29 मिनट से प्रांरभ 

गर्भवती स्त्री को सूर्य एवं चन्द्रग्रहण नहीं देखना चाहिए,

क्योंकी उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन जाता है । गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है ।

इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहू केतू उसका स्पर्श न करें. ।

ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्री को कुछ भी कैंची, चाकू आदि से काटने को मना किया जाता है , और किसी वस्त्र आदि को सिलने से मना किया जाता है,

क्योंकि ऐसी धारणा है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं

ग्रहण के समय सोने से रोग पकड़ता है किसी कीमत पर नहीं सोना चाहिए।

ग्रहण के समय मल-मूत्र त्यागने से घर में दरिद्रता आती है । शौच करने से पेट में क्रमी रोग पकड़ता है ।

ये शास्त्र बातें हैं इसमें किसी का लिहाज नहीं होता। ग्रहण के समय संभोग करने से सूअर की योनी मिलती है ।

============================================= ===    भद्रा विश्लेषण। =============

पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ
6 अगस्त 2017 को  रात्रि10:28 बजे से आरंभ होगा परन्तु भद्रा काल व्याप्त रहेगी।

भद्रा रहेगी----- आखिर भद्रा में क्यों नहीं बांधी जाती राखी? ऐसा कहा जाता है कि सूपनखा मे अपने भाई रावण को भद्रा में राखी बांधी थी, जिसके कारण रावण का विनाश हो गया, यानी कि रावण का अहित हुआ। इस कारण लोग मना करते हैं भद्रा में राखी बांधने को।

भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी……।

अतः हिन्दू शास्त्र के अनुसार यह त्यौहार 7 अगस्त को भद्रा रहित काल में मनाया जाएगा।
किन्तु किसी कारणवश भद्रा काल में यह कार्य करना हो तो भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा पुच्छ काल में रक्षा बंधन का त्यौहार मानना श्रेष्ठ है

भद्रा पूँछ – 06:40 से 07:55
भद्रा मुख – 07:55 से 10:01
भद्रा अन्त समय – 11:04

श्रावणी उपाकर्म 
 राखी बंधन 
श्रवण पूजन  का मुहूर्त
दिन के  11•05 से दोपहर के 1•28 मिनट के बीच में करना है ।
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रक्षाबंधन हमारे सनातन धर्म का सबसे खास त्योहार है। भाई की सलामती के लिए सदियों से यह त्योहार वैदिक रीति से मनाया जाता रहा है।

हालांकि वक्त के साथ इसमें बदलाव आए हैं, लेकिन वैदिक रीति का अपना खास महत्व है।

रक्षाबंधन की वैदिक विधि में सबसे अहम भूमिका रक्षा सूत्र यानी राखी की है।

आज कल बाजार में तरह-तरह की राखियां मिल जाएंगी लेकिन प्राचीन काल में वैदिक राखियां ही बनाई जाती थीं।

वैदिक राखी में जिन चीजों का इस्तेमाल किया जाता है उसका अपना-अपना प्रतीकात्मक अर्थ भी है।

माना जाता है कि ये वैदिक राखी न सिर्फ आपको अपनी विरासत और परंपरा से जोड़ती है, बल्कि आपके भाई की तरक्की के रास्ते के सारे कांटे भी चुन लेती है।

तो इस बार क्यों न आप अपने भाई को अपने हाथ से बनाई वैदिक राखी ही बांधें।

भाई की कलाई पर राखी बांधते समय बहन को इस मंत्र का उच्चारण जरूर करना चाहिए--

आयुर्द्रोणसुते श्रियो दशरथे शत्रुक्षयं राघवे । 
ऐश्वर्य नहुषे गतिश्च पवने मानञ्च दुर्योधने ॥
शौर्य शान्तनवे बलं हलधरे सत्यञ्च कुन्तीसुते । 
विज्ञानं विदुरे भवन्ति भवतां कीर्तिश्च नारायणे ॥

लक्ष्मीस्ते पंकजश्री निवसतु भवने भारती कण्ठदेशे बर्द्धन्तां बन्धुवर्गा: सकलरिपुगणा यान्तु पातालदेशम् । 
देश देशे च कीर्ति: प्रसरतु भवतां कुन्दपुष्पेन्दुशुभ्रा जीव त्वं पुत्रपौत्रै: सकलसुखयुतैर्हायनानां शलैश्व ॥

स्वस्त्यस्तु ते कुशलमस्तु चिरायुरस्तु गोवाजीरत्न धनधान्यसमृद्धिरस्तु ।
ऐश्वर्यमस्तु वलमस्तु रिपुक्षयोSस्तु सन्तानसौख्यशततं हरिभक्तिस्तु ॥

मन्त्रार्था: सफला: सन्तु पूर्णा: सन्तु मनोरथा: । 
शत्रुंणा बुद्धिनाशोSस्तु मित्राणांमुदयस्तव ॥ 
अव्याधिना शरीरेण मनसा च निरामया । 
पूरयन्नर्थिनामाशां त्वं जीव शरदांशतम् ॥ 
भद्रमस्तु शिवंचास्तु महालक्ष्मी प्रसीदतु । 
रक्षन्तु त्वां सदां: देवा आशीष: सन्तु सर्वदा ॥ 
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। 
तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल।।

कैसे बनाएं वैदिक राखी?

वैदिक राखी बनाने के लिए जो 5 वस्तुएं जरूरी होती हैं
जिसमें

दूर्वा,
अक्षत, 
केसर,
चंदन 
और सरसों के दाने प्रमुख हैं।

इन पांचों चीजों को रेशम या मलमल के कपड़े में बांधकर उसे लाल रंग के कलावे में पिरो दें और इस तरह से वैदिक राखी तैयार हो जाएगी।

वैदिक राखी में जिन पांच चीजों का सम्मिश्रण होता है उसका अपना अलग महत्व होता है।

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                              1   दूर्वा 
    
के पीछे धारणा यह है कि जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर लगाने पर वह तेजी से फैलता है और हजारों की संख्या में वृद्धि करता है,

उसी प्रकार भाई के वंश और सदगुणों में भी वृद्धि होती रहे और उसका सदाचार, मन की पवित्रता तीव्र गति से बढ़ती जाए। दूर्वा गणेश जी को प्रिय है। इसका राखी में प्रयोग करने का अर्थ यह भी है, कि हम जिसे राखी बांध रहे हैं, उनके जीवन में किसी तरह के विघ्न न आने पाए।

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                             2 अक्षत

हमारे रिश्तों के प्रति श्रद्धा भाव का प्रतीक होता है। लंबी उम्र और यशस्वी जीवन की कामना भी इन्हीं अक्षत में छुपी है।
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                           3   केसर

की प्रकृति तेज होती है। हम जिसे राखी बांध रहे हैं, वह तेजस्वी हो। उनके जीवन में धर्म की तेजस्विता कभी कम न हो, इसके लिए वैदिक राखी में अक्षत का प्रयोग किया जाता है।

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                             4    चंदन

की प्रकृति शीतल होती है और यह सुंदर सुगंध देता है। भाई के जीवन में शीतलता बनी रहे और कभी मानसिक तनाव ना हो। उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे। इन गुणों की वजह से वैदिक राखी में चंदन का इस्तेमाल किया जाता है।
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                             5  सरसों
जहां तक सरसों के दाने की बात है तो इसकी प्रकृति तीक्ष्ण होती है। इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों, विध्नों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें। सरसों के दाने भाई की नजर उतारने और बुरी नजर से भाई को बचाने के लिए भी प्रयोग में लाए जाते हैं।

रक्षा बंधन : वैदिक राखी बांधने से होती है भाई की तरक्की

वामन पुराण की एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने जब राजा बलि से तीन पग में उनका सब कुछ ले लिया था, तब राजा बलि ने भगवान विष्णु से एक वरदान मांगा।

वरदान में बलि ने विष्णु भगवान को पाताल में उनके साथ निवास करने का आग्रह किया।

भगवान विष्णु को वरदान के कारण पाताल में जाना पड़ा। इससे देवी लक्ष्मी को बहुत दुखी हुईं।

लक्ष्मी जी भगवान विष्णु को वामन से मुक्त करवाने के लिए एक दिन वृद्ध महिला का वेष बनाकर पाताल पहुंची और वामन को राखी बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया।

वामन ने जब लक्ष्मी से कुछ मांगने के लिए कहा तो लक्ष्मी ने वामन से भगवान विष्णु को पाताल से बैकुंठ भेजने के लिए कहा।

प्रतीकात्मक फोटो बहन की बात रखने के लिए वामन ने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी के साथ बैकुंठ भेज दिया।

भगवान विष्णु ने वामन को वरदान दिया कि चतुर्मास की अवधि में वह पाताल में आकर रहेंगे।

इसके बाद से हर साल चार महीने भगवान विष्णु पाताल में रहते हैं।

पुराणों के अनुसार एक बार दानवों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवता दानवों से हारने लगे। देवराज इंद्र की पत्नी देवताओं की हो रही हार से घबरा गईं और इंद्र के प्राणों की रक्षा के तप करना शुरू कर दिया, तप से उन्हें एक रक्षासूत्र प्राप्त हुआ।

शचि ने इस रक्षासूत्र को श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई पर बांध दिया, जिससे देवताओं की शक्ति बढ़ गयी और दानवों पर जीत प्राप्त की।

किसके बांधनी चाहिए राखी

श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षासूत्र बांधने से इस दिन रक्षा बंधन का त्योहार मनाया जाने लगा। पुराणों के अनुसार आप जिसकी भी रक्षा एवं उन्नति की इच्छा रखते हैं उसे रक्षा सूत्र यानी राखी बांध सकते हैं, चाहें वह किसी भी रिश्ते में हो।

राखी के साथ क्या है जरूरी

रक्षाबंधन का त्योहार बिना राखी के पूरा नहीं होता, लेकिन राखी तभी प्रभावशाली बनती है जब उसे मंत्रों के साथ रक्षासूत्र बांधा जाए।

राखी बांधने का मंत्र ‘

येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः। 
तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे! मा चल! मा चल!!’

इस मंत्र का अर्थ है कि जिस प्रकार राजा बलि ने रक्षासूत्र से बंधकर विचलित हुए बिना अपना सब कुछ दान कर दिया। उसी प्रकार हे रक्षा! आज मैं तुम्हें बांधता हूं, तू भी अपने उद्देश्य से विचलित न हो और दृढ़ बना रहे।

दिया। भगवान विष्णु ने वामन को वरदान दिया कि चतुर्मास की अवधि में वह पाताल में आकर रहेंगे। इसके बाद से हर साल चार महीने भगवान विष्णु पाताल में रहते हैं।

पंडित bhubneshwar 
कस्तूरवा नगर पर्णकुटी गुना 
9893946810

गर्भवती स्त्री को ग्रहण नहीं देखना चाहिए, क्योंकि उसके दुष्घ्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है । गर्भपात की संभावना बढ़ती है ।

चन्द्र ग्रहण अधिकतर पूर्णिमा तिथि को ही होता है। सूर्य व चन्द्रमा के बीच पृथ्वी के आ जाने से पृथ्वी की छाया से चन्द्रमा का पूरा या आंशिक भाग ढक जाता है , और पृथ्वी सूर्य की किरणों के चांद तक पहुंचने में अवरोध लगा देती है। तब चन्द्र ग्रहण होता है। चन्द्र ग्रहण दो प्रकार का नजर आता है। पूरा चन्द्रमा ढक जाने पर सर्वग्रास चन्द्रग्रहण तथा आंशिक रूप से ढक जाने पर खण्डग्रास चन्द्रग्रहण लगता है। ज्योतिषियों के अनुसार चन्द्र ग्रहण का प्रभाव 108 दिनों तक रहता है अत: जिन राशियों पर इसका प्रभाव हो उन्हें विशेष रूप से चन्द्र ग्रहण के समय जप और दान करना चाहिए । ग्रहण समाप्त होने के बाद पानी में गंगा जल डालकर स्नान करना चाहिए । इस बार चन्द्र ग्रहण 16 सितम्बर एवं 17 सितम्बर को दिखाई पड़ेगा। वर्ष 2016 में यह दूसरा चन्द्र ग्रहण होगा। यह ग्रहण एश‍िया, ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी अफ्रीका में दिखाई देगा। आंश‍िक रूप से यूरोप, दक्ष‍िण अमेरिका, अटलांटिक और अंटार्कटिका में दिखेगा। 16 सितंबर को भारतीय समयानुसार ग्रहण का समय- 22:24 बजे शुरू होगा और रात्रि 00:24 बजे ग्रहण चरम पर होगा तथा रात्रि 02: बजकर 23 मिनट पर चंद्र ग्रहण समाप्त हो जाएगा । वैसे तो ये चंद्रग्रहण भारत में नहीं दिखाई देंगे परन्तु इनका जो प्रभाव होगा वह भारतीय महासागर तक होगा । 16 सितम्बर को होने वाला चंद्र ग्रहण सभी राशियों में काफी उथल-पुथल लाने वाला है । शास्त्रों के अनुसार ग्रहण के समय किये जाने वाले जाप, दान और स्नान का लाखो गुना फल मिलता है और कुंडली के दोष भी कटते है । हमारे धर्म और ज्योतिष के अनुसार ग्रहण का प्रभाव शुभ नहीं माना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी पूर्णिमा के दिन समुद्र ज्वार आता ही है। समुद्री हलचल होती ही है जिसके परिणाम स्वरूप प्राकृतिक आपदाएँ आने की प्रबल संभावनाएँ भी होती हैं। बहुत से मनुष्यों में भी बेचैनी, घबराहट , चिड़चिड़ाहट बड़ जाती है लोग जल्दी क्रोधित हो जाते है । काल के दौरान व्यक्तियों को यथा संभव घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए और न ही ग्रहण के दर्शन करने चाहिए। गर्भवती महिलाओं के तो ग्रहण का दर्शन बिलकुल ही त्याज्य है। चन्द्र ग्रहण को ज्योतिष के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। चन्द्र ग्रहण के समय चन्द्र देव की पूजा करने का विधान है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि ग्रहण काल के दौरान सभी व्यक्तियों को श्वेत पुष्पों और चन्दन आदि से भगवान चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए। चंद्रमा के शुभ प्रभाव प्राप्त करने हेतु चंद्रमा के वैदिक मंत्र का ज्यादा से ज्यादा जप करना चाहिए।. —–”””ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः “””या “””ऊँ सों सोमाय नमः “” ग्रहण के सूतक और ग्रहण काल में स्नान, दान, जप, तप, पूजा पाठ, मन्त्र, तीर्थ स्नान, ध्यान, हवनादि शुभ कार्यो का करना बहुत लाभकारी रहता है. धर्म सिन्धु के अनुसार, ग्रहण मोक्ष के उपरान्त पूजा पाठ, हवन, स्नान, छाया-दान, स्वर्ण-दान, तुला-दान, गाय-दान, मन्त्र जाप आदि श्रेयस्कर होते हैं। ग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है। ग्रहण काल के समय अर्जित किया गया पुण्य अक्षय होता है । धार्मिक लोग इस समय का बहुत ही बेताबी से इंतज़ार करते है और इसका निश्चित ही लाभ उठाते है । इस समय में किया गया दान, जप, ध्यान का फल पूरे वर्ष में किये गए पुण्य से बहुत ही ज्यादा होता है । भगवान वेदव्यास जी ने कहा है कि - सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया जप , तप, ध्यान, दान आदि एक लाख गुना और सूर्य ग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। और यदि यह गंगा नदी के किनारे किया जाय तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है। ग्रहण मोक्ष होने पर सोलह प्रकार के दान, जैसे अन्न, जल, वस्त्र, फल, दूध, मीठा, स्वर्ण, चंद्रमा से संबंधित सफेद वस्तुएं जैसे मोती, चांदी, सफेद कपड़ा, चावल, मिश्री, शंख, कपूर, श्वेत चंदन, सफेद फूल, पलाश की लकड़ी, दही, चावल, घी, चीनी आदि का दान जो भी संभव हो सभी मनुष्यों को अवश्य ही करना चाहिए। लेकिन जिन व्यक्ति का चन्द्रमा उच्च का हो उन्हें सफ़ेद वस्तुओं का दान बिलकुल भी नहीं करना चाहिए । वह अन्न, वस्त्र, फल, पीली लाल मिठाई आदि का दान कर सकते है । हिंदू धर्म के मतानुसार चंद्र ग्रहण का प्रभाव शुभ नहीं माना जाता। ग्रहण के अशुभ प्रभावों से निजात पाने के लिए ग्रहण के दिन गरीबों को अवश्य ही दान दें, भोजन कराएं, गायत्री मंत्र का भी ज्यादा से ज्यादा जाप करें। अपने ईष्‍ट देव की आराधना करें और ग्रहण के समय उपवास रखें। ग्रहण के उपरांत स्‍नान कर ताजे भोजन का ही सेवन करें। सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो, उसका शुध्द बिम्ब को देख कर ही भोजन करना चाहिये । (1 प्रहर = 3 घंटे)। चंद्रग्रहण में 9 घंटे पहले सूतक लग जाता है । सूतक काल में जहाँ देव दर्शन वर्जित माने गये हैं वहीं मन्दिरों के पट भी बन्द कर दिये जाते हैं । इस दिन जलाशयों, नदियों व मन्दिरों में राहू, केतु व सुर्य के मंत्र का जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है और ग्रहों का दुष्प्रभाव भी खत्म हो जाता है । हमारे ऋषि मुनियों ने ग्रहण के समय भोजन करने के लिये मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय वातावरण में घातक किटाणु बहुलता से फैल जाते हैं जो खाद्य वस्तु, जल आदि में एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इसलिये भोजन / जल के पात्रों में क़ुश अथवा तुलसी डालने को कहा है, ताकि सब किटाणु उनमें एकत्रित हो जायें और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। जीव विज्ञान के प्रोफेसर टारिंस्टन ने भी पर्याप्त अनुसन्धान करके सिद्ध किया है कि ग्रहण के समय मनुष्य के पेट की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, जिसके कारण इस समय किया गया भोजन अपच, अजीर्ण आदि शिकायतें पैदा कर शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचा सकता है । देवी भागवत में कहा गया है कि ग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में दुःख भोगता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर काना, दंतहीन और अनेक रोगो से पीड़ित होता है। ग्रहण के बाद नया भोजन बनाने और ताजा पानी भरकर पीना ही श्रेयकर माना जाता है|जबकि पके हुए अन्न को पूरी तरह से त्यागकर गाय, कुत्ते को डाल देना चाहिए । ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिये बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अन्दर ऊष्मा का प्रवाह बढे, भीतर बाहर के जो भी किटाणु हो वह नष्ट हो जायें, बह जायें। ग्रहण की अवधि में सोना, तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र का त्याग करना, बालों में कँघी करना, रति क्रीडा करना, मंजन करना,शरीर पर उबटन लगाना सर्वथा वर्जित माने गये हैं । मान्यता है कि ग्रहण के समय सोने,भोजन करने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, सम्भोग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी हो जाता है। इसीलिए ग्रहण के समय से पहले भी ऐसा कुछ भी नहीं खाना चाहिए जिससे मल मूत्र के त्याग हेतु लैट्रिन, बाथरूम में जाना पड़े । ग्रहण के समय धोखा, ठगी ,क्रोध, हिंसा भी कतई भी नहीं करनी चाहिए| ग्रहण के समय किसी से धोखा, ठगी करने से सर्प की योनि मिलती है और क्रोध करने, हिंसा करने या किसी भी जीव-जन्तु की हत्या करने से चिर काल तक नारकीय योनी में भटकना पड़ता है । ग्रहण वाले दिन किसी भी व्यक्ति को किसी भी दशा में माँस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए, बहुत से लोग ग्रहण से पहले या बाद में उक्त का सेवन करते है और यह तर्क देते है कि उन्होंने ग्रहण के समय नहीं लिया है लेकिन यह बिलकुल गलत है । ग्रहण वाले दिन माँस मदिरा का सेवन करने वाला घोर नरक का पापी होता है इसका पाप ना केवल उसे वरन उसके वंश को भी भोगना पड़ता है । ऐसे व्यक्ति के परिवार में असाध्य रोग अपना घर बना लेते है। ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ना चाहिए। ग्रहण के अवसर पर मनुष्यों को पृथ्वी को भी नहीं खोदना चाहिए । इस समय कोइ भी शुभ और नया कार्य शुरु नहीं करना चाहिये । ग्रहण में घर में खूब सफाई रखे, चूँकि ग्रहण के दौरान झाड़ू नहीं लगती, अतः पहले से ही पूरे घर में साफ़-सफाई कर लें ग्रहण के समय गायों को हरी घास/ साग , पक्षियों को अन्न, चींटियों को भुना हुआ आटा, जरूरत मंदों को दान देने से अनेकों अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है। गर्भवती स्त्री को ग्रहण के समय विशेष ध्यान रखना चाहिए । गर्भवती स्त्री को ग्रहण नहीं देखना चाहिए, क्योंकि उसके दुष्घ्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है । गर्भपात की संभावना बढ़ती है । इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहू केतू उसका स्पर्श न करें । ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्री को कुछ भी कैंची, चाकू आदि से काटने, वस्त्र आदि को सिलने से मना किया जाता है । क्घ्योंकि माना जाता है कि ऐसा करने से शिशु के अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं। <