ज्योतिष समाधान

Thursday, 2 March 2017

होलाष्टक प्रारम्भ 5 मार्च 2017 को आरम्भ

होलाष्टक प्रारम्भ 2017, 5 मार्च रविवार

चन्द्र मास के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका पर्व मनाया जाता है.

होली पर्व के आने की सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है.
होलाष्टक को होली पर्व की सूचना लेकर आने वाला एक हरकारा कहा जात सकता है.

"होलाष्टक" के शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो होला+ अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, जो दिन होता है, वह होलाष्टक कहलाता है.

सामान्य रुप से देखा जाये तो होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है. दुलैण्डी के दिन रंग और गुलाल के साथ इस पर्व का समापन होता है.

होली की शुरुआत होली पर्व होलाष्टक से प्रारम्भ होकर दुलैण्डी तक रहती है.

इसके कारण प्रकृ्ति में खुशी और उत्सव का माहौल रहता है.

वर्ष 2017 में 5 मार्च, 2017 से 12 मार्च, 2017 के मध्य की अवधि होलाष्टक पर्व की रहेगी.

होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलती है, साथ ही इस दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरु हो जाती है.

होलिका दहन में होलाष्टक की विशेषता

(होलिका पूजन करने के लिये होली से आंठ दिन पहले होलिका दहन वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकडी, सूखी खास व होली का डंडा स्थापित कर दिया जाता है.

जिस दिन यह कार्य किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारम्भ का दिन भी कहा जाता है.

जिस गांव, क्षेत्र या मौहल्ले के चौराहे पर पर यह होली का डंडा स्थापित किया जाता है. होली का डंडा स्थापित होने के बाद संबन्धित क्षेत्र में होलिका दहन होने तक कोई शुभ कार्य संपन्न नहीं किया जाता है.

होलाष्टक के दिन से शुरु होने वाले कार्य

सबसे पहले इस दिन, होलाष्टक शुरु होने वाले दिन होलिका दहन स्थान का चुनाव किया जाता है.

इस दिन इस स्थान को गंगा जल से शुद्ध कर, इस स्थान पर होलिका दहन के लिये लकडियां एकत्र करने का कार्य किया जाता है.

इस दिन जगह-जगह जाकर सूखी लकडियां विशेष कर ऎसी लकडियां जो सूखने के कारण स्वयं ही पेडों से टूट्कर गिर गई हों, उन्हें एकत्र कर चौराहे पर एकत्र कर लिया जाता है.

होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन इसमें कुछ लकडियां डाली जाती है.

इस प्रकार होलिका दहन के दिन तक यह लकडियों का बडा ढेर बन जाता है.

व इस दिन से होली के रंग फिजाओं में बिखरने लगते है. अर्थात होली की शुरुआत हो जाती है.

बच्चे और बडे इस दिन से हल्की फुलकी होली खेलनी प्रारम्भ कर देते है.

होलाष्टक में कार्य निषेध

होलाष्टक मुख्य रुप से पंजाब और उत्तरी भारत में मनाया जाता है.

होलाष्टक के दिन से एक ओर जहां उपरोक्त कार्यो का प्रारम्भ होता है. वहीं कुछ कार्य ऎसे भी है जिन्हें इस दिन से नहीं किया जाता है.

यह निषेध अवधि होलाष्टक के दिन से लेकर होलिका दहन के दिन तक रहती है.

अपने नाम के अनुसार होलाष्टक होली के ठिक आठ दिन पूर्व शुरु हो जाते है. होलाष्टक के मध्य दिनों में 16 संस्कारों में से किसी भी संस्कार को नहीं किया जाता है.

यहां तक की अंतिम संस्कार करने से पूर्व भी शान्ति कार्य किये जाते है.

इन दिनों में 16 संस्कारों पर रोक होने का कारण इस अवधि को शुभ नहीं माना जाता है.

होलाष्टक की पौराणिक मान्यता

फाल्गुण शुक्ल अष्टमी से लेकर होलिका दहन अर्थात पूर्णिमा तक होलाष्टक रहता है.

इस दिन से मौसम की छटा में बदलाव आना आरम्भ हो जाता है.

सर्दियां अलविदा कहने लगती है, और गर्मियों का आगमन होने लगता है. साथ ही वसंत के आगमन की खुशबू फूलों की महक के साथ प्रकृ्ति में बिखरने लगती है.

होलाष्टक के विषय में यह माना जाता है कि जब भगवान श्री भोले नाथ ने क्रोध में आकर काम देव को भस्म कर दिया था, तो उस दिन से होलाष्टक की शुरुआत हुई थी.

होलाष्टक से जुडी मान्यताओं को भारत के कुछ भागों में ही माना जाता है.

इन मान्यताओं का विचार सबसे अधिक पंजाब में देखने में आता है. होली के रंगों की तरह होली को मनाने के ढंग में विभिन्न है. होली उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडू, गुजरात, महाराष्ट्र, उडिसा, गोवा आदि में अलग ढंग से मनाने का चलन है.

देश के जिन प्रदेशो में होलाष्टक से जुडी मान्यताओं को नहीं माना जाता है. उन सभी प्रदेशों में होलाष्टक से होलिका दहन के मध्य अवधि में शुभ कार्य करने बन्द नहीं किये जाते है.

होलाष्टक का एक अन्य रुप बीकानेर की होली

होलाष्टक से मिलती जुलती होली की एक परम्परा राजस्थान के बीकानेर में देखने में आती है.

पंजाब की तरह यहां भी होली की शुरुआत होली से आठ दिन पहले हो जाती है.

फाल्गुन मास की सप्तमी तिथि से ही होली शुरु हो जाती है, जो धूलैण्डी तक रहती है.

राजस्थान के बीकानेर की यह होली भी अंदर मस्ती, उल्लास के साथ साथ विषेश अंदाज समेटे हुए हैं. इस होली का प्रारम्भ भी होलाष्टक में गडने वाले डंडे के समान ही चौक में खम्भ पूजने के साथ होता है.

पंडित
=bhubneshwar
Parnkuti guna
०९८९३९४६८१०

होली क्यों मनाई जाती है

शिव पुराण के अनुसार, हिमालय की पुत्री पार्वती शिव से विवाह हेतु कठोर तप कर रही थीं और शिव भी तपस्या में लीन थे। इंद्र का भी शिव-पार्वती विवाह में स्वार्थ छिपा था कि ताड़कासुर का वध शिव-पार्वती के पुत्र द्वारा होना था। इसी वजह से इंद्र ने कामदेव को शिव जी की तपस्या भंग करने भेजा परन्तु शिव ने क्रोधित हो कामदेव को भस्म कर दिया। शिव जी की तपस्या भंग होने के बाद देवताओं ने शिव को पार्वती से विवाह के लिए राजी कर लिया। इस कथा के आधार पर होली में काम की भावना को प्रतीकात्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है। कंस को जब आकाशवाणी द्वारा पता चला कि वसुदेव और देवकी का आठवां पुत्र उसका विनाशक होगा तो कंस ने वसुदेव तथा देवकी को कारागार में डाल दिया। कारागार में जन्मे देवकी के छ: पुत्रों को कंस ने मार दिया। सातवें पुत्र शेष नाग के अवतार बलराम थे जिनके अंश को जन्म से पूर्व ही वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया था। आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। वसुदेव ने रात में ही श्रीकृष्ण को गोकुल में नंद और यशोदा के यहां पहुंचा दिया और उनकी नवजात कन्या को अपने साथ ले आए। कंस उस कन्या को मार नहीं सका और आकाशवाणी हुई कि कंस को मारने वाले ने तो गोकुल में जन्म ले लिया है। तब कंस ने उस दिन गोकुल में जन्मे सभी शिशुओं की हत्या करने का काम राक्षसी पूतना को सौंपा। वह सुंदर नारी का रूप बनाकर शिशुओं को विष का स्तनपान कराने गई लेकिन श्रीकृष्ण ने राक्षसी पूतना का वध कर दिया। यह फाल्गुन पूर्णिमा का दिन था। अत: बुराई के अंत की खुशी में होली मनाई जाने लगी। होली का त्यौहार राधा-कृष्ण के पवित्र प्रेम से भी जुड़ा है। बसंत में एक-दूसरे पर रंग डालना श्रीकृष्ण लीला का ही अंग माना गया है। मथुरा-वृंदावन की होली राधा-कृष्ण के प्रेम रंग में डूबी होती है। बरसाने और नंदगांव की लठमार होली जगप्रसिद्ध है। होली पर होली जलाई जाती है अहंकार की, अहं की, वैर-द्वेष की, ईर्ष्या की, संशय की और प्राप्त किया जाता है विशुद्ध प्रेम। प्रह्लाद और होलिका का प्रसंग तो लगभग सभी लोग जानते हैं। माना जाता है कि होली पर्व का प्रारंभ प्रह्लाद और होलिका से जुड़ा है। दोनों की कथा विष्णु पुराण में उल्लिखित है। हिरण्यकश्यप ने तपस्या कर वरदान प्राप्त कर लिया। अब वह न तो पृथ्वी पर मर सकता था, न आकाश में, न दिन में, न रात में, न घर में, न बाहर, न अस्त्र से, न शस्त्र से, न मानव से, न पशु से। वरदान के बल से उसने देवताओं-मानव आदि लोकों को जीत लिया और विष्णु पूजा बंद करा दी, परन्तु पुत्र प्रह्लाद को नारायण की भक्ति से विमुख नहीं कर सका। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को बहुत यातनाएं दीं परन्तु उसने विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। अत: दैत्यराज ने होलिका को प्रह्लाद का अंत करने के लिए प्रह्लाद सहित आग में प्रवेश करा दिया परन्तु होलिका का वरदान निष्फल सिद्ध हुआ और वह स्वयं उस आग में जल कर मर गई। बस प्रह्लाद की इसी जीत की खुशी में होली का त्यौहार मनाया जाने लगा। पुराने समय में एक राजा हुए उनका नाम था राजा पृथु। उनके समय में एक राक्षसी थी ढुंढी। वह नवजात शिशुओं को खा जाती थी। राक्षसी को वर प्राप्त था कि उसे कोई भी देवता, मानव, अस्त्र या शस्त्र नहीं मार सकेगा। न ही उस पर सर्दी, गर्मी और वर्षा का कोई असर होगा लेकिन शिव के एक श्राप के कारण बच्चों की शरारतों से मुक्त नहीं थी। राजा को ढुंढी को खत्म करने के लिए राजपुरोहित ने एक उपाय बताया कि यदि फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन जब न अधिक सर्दी होगी और गर्मी, क्षेत्र के सभी बच्चे एक-एक लकड़ी एक जगह पर रखें और जलाए, मंत्र पढ़ें और अग्रि की परिक्रमा करें तो राक्षसी मर जाएगी। हुआ भी ऐसा ही इतने बच्चे एक साथ देखकर राक्षसी ढुंढी अग्रि के नजदीक आई तो उसका मंत्रों के प्रभाव से वहीं विनाश हो गया। तब से इसी तरह मौज-मस्ती के साथ होली मनाई जाने लगी।

होलिका दहन मुहूर्त 12 मार्च 2017 लिंक ओपन करे


होलिका दहन १२वाँ मार्च २०१७ (रविवार)

होलिका दहन पूजा होलिका दहन मुहूर्त

होलिका दहन मुहूर्त = १८:२३ से २०:२३

अवधि = १ घण्टा ५९ मिनट्स

भद्रा पूँछ = ०४:११ से ०५:२३
भद्रा मुख = ०५:२३ से ०७:२३

रंगवाली होली १३th, मार्च को

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ =

११/मार्च/२०१७ को २०:२३ बजे

पूर्णिमा तिथि समाप्त =

१२/मार्च/२०१७ को २०:२३ बजे

होलिका दहन के दिन का पञ्चाङ्ग होलिका दहन के दिन का चौघड़िया मुहूर्त

टिप्पणी - २४ घण्टे की घड़ी नई दिल्ली के स्थानीय समय के साथ और सभी मुहूर्त के समय के लिए डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है)।

होलिका दहन २०१७ हिन्दु धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार, होलिका दहन,

१】जिसे होलिका दीपक और छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है, को सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष के समय, जब पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो, करना चाहिये।

२】भद्रा, जो पूर्णिमा तिथि के पूर्वाद्ध में व्याप्त होती है, के समय होलिका पूजा और होलिका दहन नहीं करना चाहिये।

३】सभी शुभ कार्य भद्रा में वर्जित हैं।

४】होलिका दहन के मुहूर्त के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिये -

५】भद्रा रहित, प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा तिथि, होलिका दहन के लिये उत्तम मानी जाती है।

६】यदि भद्रा रहित, प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा का अभाव हो परन्तु भद्रा मध्य रात्रि से पहले ही समाप्त हो जाए तो प्रदोष के पश्चात जब भद्रा समाप्त हो तब होलिका दहन करना चाहिये।

७】यदि भद्रा मध्य रात्रि तक व्याप्त हो तो ऐसी परिस्थिति में भद्रा पूँछ के दौरान होलिका दहन किया जा सकता है।

८】परन्तु भद्रा मुख में होलिका दहन कदाचित नहीं करना चाहिये।

९】धर्मसिन्धु में भी इस मान्यता का समर्थन किया गया है।

१०】धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार भद्रा मुख में किया होली दहन अनिष्ट का स्वागत करने के जैसा है जिसका परिणाम न केवल दहन करने वाले को बल्कि शहर और देशवासियों को भी भुगतना पड़ सकता है।

११】किसी-किसी साल भद्रा पूँछ प्रदोष के बाद और मध्य रात्रि के बीच व्याप्त ही नहीं होती तो ऐसी स्थिति में प्रदोष के समय होलिका दहन किया जा सकता है।

१२】कभी दुर्लभ स्थिति में यदि प्रदोष और भद्रा पूँछ दोनों में ही होलिका दहन सम्भव न हो तो प्रदोष के पश्चात होलिका दहन करना चाहिये।

१३】होलिका दहन का मुहूर्त किसी त्यौहार के मुहूर्त से ज्यादा महवपूर्ण और आवश्यक है।

१४】यदि किसी अन्य त्यौहार की पूजा उपयुक्त समय पर न की जाये तो मात्र पूजा के लाभ से वञ्चित होना पड़ेगा परन्तु होलिका दहन की पूजा अगर अनुपयुक्त समय पर हो जाये तो यह दुर्भाग्य और पीड़ा देती है।

१५】इस पृष्ठ पर दिया मुहूर्त धर्म-शास्त्रों के अनुसार निर्धारित है।

१६】हम होलिका दहन के श्रेष्ठ मुहूर्त को प्रदान कराते हैं।

१७】इस पृष्ठ पर दिया मुहूर्त हमेशा भद्रा मुख का त्याग करके निर्धारित होता है क्योंकि भद्रा मुख में होलिका दहन सर्वसम्मति से वर्जित है।

१८】होलिका दहन के साथ-साथ इस पृष्ठ पर भद्रा मुख और भद्रा पूँछ का समय भी दिया गया है जिससे भद्रा मुख में होलिका दहन से बचा जा सके।

१९】यदि भद्रा पूँछ प्रदोष से पहले और मध्य रात्रि के पश्चात व्याप्त हो तो उसे होलिका दहन के लिये नहीं लिया जा सकता क्योंकि होलिका दहन का मुहूर्त सूर्यास्त और मध्य रात्रि के बीच ही निर्धारित किया जाता है।

२०】रंगवाली होली, जिसे धुलण्डी के नाम से भी जाना जाता है, होलिका दहन के पश्चात ही मनायी जाती है और इसी दिन को होली खेलने के लिये मुख्य दिन माना जाता है।

सम्पर्क सूत्र
पंडित =भुबनेश्वर
कस्तूरवानगर पर्णकुटी गुना
9893946810

Wednesday, 1 March 2017

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए श्री बर्धक अँगूठी धारण करे (21मार्च2017)को

25=रत्ती सोना
16=रत्ती चांदी
10=ताँबा
-----------------------------
51=रत्ती-----------टोटल बजन 
इन धातुओ के योग के बजन की तार अथवा अपने विश्वास योग्य सोनी से निश्चित  समय में निर्माण करवा कर धारण करने से धन की बृद्धि होती है रुके हुये रोजगार  में बढ़ोत्तरी होती है  धन  सग्रह में सहयोग होता है घर में लक्ष्मी जी का वास होता है

अधिक जानकारी के लिए
सम्पर्क सूत्र
09893946810

Thursday, 23 February 2017

*मां के गर्भ से लेकर मृत्यु तक कब, कैसे होते हैं १६ संस्कार, जानिए....?

*मां के गर्भ से लेकर मृत्यु तक कब, कैसे होते हैं १६ संस्कार, जानिए....?

                    *हिंदू धर्म*  में व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक १६ कर्म अनिवार्य बताए गए हैं। इन्हें १६ संस्कार कहा जाता है। इनमें से हर एक संस्कार एक निश्चित समय पर किया जाता है। कुछ संस्कार तो शिशु के जन्म से पूर्व ही कर लिए जाते हैं।

संस्कारों के संबंध में आद्य गुरु शंकराचार्य ने कहा है-

*संस्कारों हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्योषाप नयनेन वा ॥*

-ब्रह्मसूत्र भाष्य १/१/४

अर्थात: व्यक्ति में गुणों का आरोपण करने के लिए जो कर्म किया जाता है,उसे संस्कार कहते हैं।

*संस्कार विधि में लिखा है....✍🏼*

जन्मना जायते शुद्रऽसंस्काराद्द्विज उच्यते।

अर्थात जन्म से सभी शुद्र होते हैं और संस्कारों द्वारा व्यक्ति को द्विज बनाया जाता है।

*संस्कार कितने हैं.....?

गौतम स्मृति शास्त्र में ४० संस्कारों का उल्लेख है।

कुछ जगह ४८ संस्कार भी बताए गए हैं।

महर्षि अंगिरा ने २६ संस्कारों का उल्लेख किया है।

वर्तमान में महर्षि वेदव्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार, १६ संस्कार प्रचलित हैं,

उसके अनुसार-

*गर्भाधानं पुंसवनं सीमंतो जातकर्म च।* *नामक्रियानिष्क्रमणेअन्नाशनं वपनक्रिया:।।*

*कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारंभक्रियाविधि:।*
*केशांत स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रह:।।*

*त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्कारा:षोडश स्मृता:।*

(व्यासस्मृति १/१३-१५)

संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है। संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा,यज्ञ,मंत्रोच्चारण आदि होता है,उसका वैज्ञानिक महत्व भी होता है।

*इन १६ संस्कारों की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है-*

१. *गर्भाधान संस्कार* 📖

यह ऐसा संस्कार है,जिससे योग्य,गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान के लिए गर्भधारण किस प्रकार करें?इसका विवरण दिया गया है। इस संस्कार से कामुकता का स्थान अच्छे विचार ले लेते हैं। ऐसी मान्यता है।

२. *पुंसवन संस्कार* 📖

यह संस्कार गर्भधारण के दो-तीन महीने बाद किया जाता है। मां को अपने गर्भस्थ शिशु की ठीक से देखभाल करने योग्य बनाने के लिए यह संस्कार किया जाता है। पुंसवन संस्कार के दो प्रमुख लाभ-पुत्र प्राप्ति और स्वस्थ,सुंदर गुणवान संतान है।

३. *सीमन्तोन्नयन संस्कार* 📖

यह संस्कार गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है। इस संस्कार का फल भी गर्भ की शुद्धि ही है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म आएं, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है। महाभक्त प्रह्लाद को देवर्षि नारद का उपदेश तथा अभिमन्यु को चक्रव्यूह प्रवेश का उपदेश इसी समय में मिला था। अत: माता-पिता को चाहिए कि वे इन दिनों विशेष सावधानी के साथ योग्य आचरण करें।

४. *जातकर्म संस्कार* 📖

शिशु का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से गर्भस्त्रावजन्य संबंधी सभी दोष दूर हो जाते हैं। नाल छेदन के पूर्व नवजात शिशु को सोने की चम्मच या अनामिका अंगुली (तीसरे नंबर की) से शहद और घी चटाया जाता है। घी आयु बढ़ाने वाला तथा वात व पित्तनाशक है और शहद कफनाशक है। सोने की चम्मच से शिशु को घी व शहद चटाने से त्रिदोष (वात, पित्त व कफ) का नाश होता है।

५. *नामकरण संस्कार* 📖

शिशु के जन्म के बाद ११वें या सौवें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष आधार पर बच्चे का नाम तय किया जाता है। बच्चे को शहद चटाकर सूर्य के दर्शन कराए जाते हैं। उसके नए नाम से सभी लोग उसके उत्तम स्वास्थ्य व सुख-समृद्धि की कामना करते हैं-

*आयुर्वर्चोअभिवृद्धिश्च सिद्धिव्र्यवह्रतेस्तथा।* *नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभि:।।*

(स्मृतिसंग्रह)

६. *निष्क्रमण संस्कार* 📖

इस संस्कार का फल विद्वानों ने आयु की वृद्धि बताया है-

*निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युद्दिष्टा मनीषिभि:।*

ये संस्कार शिशु के जन्म के चौथे चा छठे महीने में किया जाता है। सूर्य तथा चंद्रमा आदि देवताओं की पूजा कर शिशु को उनके दर्शन कराना इस संस्कार की मुख्य प्रक्रिया है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इस संस्कार में इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

७. *अन्नप्राशन संस्कार* 📖

माता के गर्भ में रहते हुए शिशु के पेट में गंदगी चली जाती है, जिससे उस शिशु में दोष आ जाते हैं। अन्नप्राशन संस्कार के माध्यम से उन दोषों का नाश हो जाता है- अन्नाशमान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुध्दयति।
जब शिशु ६-७ मास का हो जाता है और उसके दांत निकलने लगते हैं, पाचनशक्ति तेज होने लगती है, तब यह संस्कार किया जाता है। शुभ मुहूर्त में देवताओं की पूजा के बाद माता-पिता आदि सोने या चांदी की चम्मच से नीचे लिखे मंत्र को बोलते हुए शिशु को खीर चटाते हैं-

*शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमधौ।*
*एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुंचतो अंहस:।।*

(अथर्ववेद ८/२/१८)

८. *मुंडन संस्कार* 📖

शिशु की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारे जाते हैं, जिसे वपन क्रिया संस्कार, मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार कहा जाता है। इसके बाद शिशु के सिर पर दही-मक्खन लगाकर स्नान करवाया जाता है व अन्य मांगलिक क्रियाएं की जाती हैं। इस संस्कार का उद्देश्य शिशु का बल, आयु व तेज की वृद्धि करना है।

९. *कर्णवेधन संस्कार* 📖

इस परंपरा के अंतर्गत शिशु के कान छेदें जाते हैं। इसलिए इसे कर्णवेधन संस्कार कहा जाता है। यह संस्कार जन्म के छह माह बाद से लेकर पांच वर्ष की आयु के बीच किया जाता था। मान्यता के अनुसार, सूर्य की किरणें कानों के छेदों से होकर बालक-बालिका को पवित्र करती हैं और तेज संपन्न बनाती हैं। शास्त्रों में कर्णवेधरहित (जिसके कान छीदे न हो) पुरुष को श्राद्ध का अधिकारी नहीं माना गया है। कर्णवेध संस्कार के बाद बालक को कुंडल तथा बालिका को कान के आभूषण पहनाने चाहिए।

१०. *उपनयन संस्कार* 📖

इस संस्कार को व्रतादेश व यज्ञोपवित संस्कार भी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस संस्कार के द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का दूसरा जन्म होता है। बालक को विधिवत् यज्ञोपवित (जनेऊ) धारण करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। जनेऊ में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार के द्वारा बालक को गायत्री जाप, वेदों का अध्ययन आदि करने का अधिकार प्राप्त होता है।

११. *विद्यारंभ संस्कार* 📖

उपनयन संस्कार हो जाने के बाद बालक को वेदों का अध्ययन करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस संस्कार के अंतर्गत निश्चित समय शुभ मुहूर्त देखकर बालक की शिक्षा प्रारंभ की जाती है। इसे ही विद्यारंभ संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार का मूल उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना है। पूर्व में इस संस्कार के बाद बालक को गुरुकुल भेज दिया जाता था, जहां वह अपने गुरु के संरक्षण में वेदों व अन्य शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करता था।

१२. *केशांत संस्कार* 📖

विद्यारंभ संस्कार में बालक गुरुकुल में रहते हुए वेदों का अध्ययन करता है। उस समय वह ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करता है तथा उसके लिए केश और श्मश्रु (दाड़ी) व जनेऊ धारण करने का विधान है। पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद गुरुकुल में ही केशांत संस्कार किया जाता है। इसके बाद श्मश्रु वपन (दाड़ी बनाने) की क्रिया संपन्न की जाती है, इसलिए इसे श्मश्रु संस्कार भी कहा जाता है। यह संस्कार सूर्य के उत्तरायण होने पर ही किया जाता है। कुछ शास्त्रों में इसे गोदान संस्कार भी कहा गया है।

१३. *समावर्तन संस्कार* 📖

समावर्तन का अर्थ है फिर से लौटना। समावर्तन विद्याध्ययन का अंतिम संस्कार है। पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद ब्रह्मचारी अपने गुरु की आज्ञा से अपने घर लौटता है। इसीलिए इसे समावर्तन संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार में वेदमंत्रों से अभिमंत्रित जल से भरे हुए ८ कलशों से विधिपूर्वक ब्रह्मचारी को स्नान करवाया जाता है, इसलिए इसे वेद स्नान संस्कार भी कहते हैं। इस संस्कार के बाद ब्रह्मचारी गृहस्थ जीवन में प्रवेश पाने का अधिकारी हो जाता है।

१४. *विवाह संस्कार* 📖

वि यानी विशेष रूप से, वहन यानी ले जाना। विवाह का अर्थ है पुरुष द्वारा स्त्री को विशेष रूप से अपने घर ले जाना। सनातन धर्म में विवाह को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना गया है। यह धर्म का साधन है। विवाह के बाद पति-पत्नी साथ रहकर धर्म का पालन करते हुए जीवन यापन करते हैं। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी से व्यक्ति पितृ ऋण से मुक्त होता है। पुराणों के अनुसार, ब्राह्म आदि उत्तम विवाहों से उत्पन्न पुत्र पितरों को तारने वाला होता है।
विवाह का यही फल बताया गया है-

*ब्राह्माद्युद्वाहसंभूत: पितृणां तारक: सूत:।*
*विवाहस्य फलं त्वेतद् व्याख्यातं परमर्षिभि:।।*

(स्मृतिसंग्रह)

१५. *विवाह अग्नि संस्कार* 📖

विवाह संस्कार में होम आदि क्रियाएं जिस अग्नि में की जाती हैं, उसे आवसथ्य नामक अग्नि कहते हैं। इसी को विवाह अग्नि भी कहा जाता है। विवाह के बाद वर-वधू उस अग्नि को अपने घर में लाकर किसी पवित्र स्थान पर स्थापित करते हैं व प्रतिदिन अपने कुल की परंपरा के अनुसार सुबह-शाम हवन करते हैं। प्रतिदिन किए जाने वाले इस हवन को ब्राह्मणों के लिए आवश्यक बताया गया है। इसी अग्नि में सभी देवताओं के निमित्त आहुति दी जाती है।

महर्षि याज्ञवल्क्य ने लिखा है कि-

*कर्म स्मार्तं विवाहाग्नौ कुर्वीत प्रत्यहं गृही।*

याज्ञवल्क्य स्मृति, आचाराध्याय (२/१७)

१६. *अंत्येष्टि संस्कार* 📖

इसका अर्थ है अंतिम यज्ञ। आज भी शवयात्रा के आगे घर से अग्नि जलाकर ले जाई जाती है। इसी से चिता जलाई जाती है। आशय है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी, उसी से उसके अंतिम यज्ञ की अग्नि जलाई जाती है। मृत्यु के साथ ही व्यक्ति स्वयं इस अंतिम यज्ञ में होम हो जाता है। हमारे यहां अंत्येष्टि को इसलिए संस्कार कहा गया है कि इसके माध्यम से मृत शरीर नष्ट होता है। अंत्येष्टि संस्कार को पितृमेध, अन्त्यकर्म व श्मशानकर्म आदि भी कहा जाता है।

              
                             🙏🏼