ज्योतिष समाधान

Tuesday, 27 December 2016

भद्रा काल में क्या करे क्या न करे शुभकार्यो में भद्रा क्यों बर्जित है

भद्रा काल विचार भद्रा भगवान सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन है।
शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी क्रूर बताया गया है।
इस उग्र स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उसे कालगणना या पंचाग के एक प्रमुख अंग करण में स्थान दिया।
जहां उसका नाम विष्टी करण रखा गया।
भद्रा की स्थिति में कुछ शुभ कार्यों, यात्रा और उत्पादन आदि कार्यों को निषेध माना गया।किंतु भद्रा काल में तंत्र कार्य, अदालती और राजनैतिक चुनाव कार्य सुफल देने वाले माने गए हैं।
पंचक (तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण) की तरह ही भद्रा योग को भी देखा जाता है। तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं. इस तरह एक तिथि के दो करण होते हैं. कुल 11 करण माने गए हैं जिनमें बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि चर करण और शकुनि, चतुष्पद, नाग और किस्तुघ्न अचर करण होते हैं. विष्टि करण को ही भद्रा भी कहा जाता है.
कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी और शुक्लपक्ष की चतुर्थी, एकादशी के उत्तरार्ध में एवं कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी, शुक्लपक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा के पूर्वार्ध में भद्रा रहती है.
तिथि के पूर्वार्ध में (कृष्णपक्ष की 7:14 और शुक्लपक्ष की 8:15 तिथि) दिन की भद्रा कहलाती है.
तिथि के उत्तरार्ध की (कृष्णपक्ष की 3:10 और शुक्लपक्ष की 4:11) की भद्रा रात्री की भद्रा कहलाती है
. यदि दिन की भद्रा रात्री के समय और रात्री की भद्रा दिन के समय आ जाए तो उसे शुभ माना जाता है.
भद्राकाल में विवाह, मुंडन, गृहप्रवेश, यज्ञोपवित, रक्षाबंधन या कोई भी नया काम शुरू करना वर्जित माना गया है
. लेकिन भद्राकाल में ऑपरेशन करना, मुकदमा करना, किसी वस्तु का कटना, यज्ञ करना, वाहन खरीदना स्त्री प्रसंग संबंधी कर्म शुभ माने गए हैं.
सोमवार व शुक्रवार की भद्रा कल्याणी, शनिवार की भद्रा वृश्चिकी, गुरुवार की भद्रा पुण्यैवती, रविवार, बुधवार व मंगलवार की भद्रा भद्रिका कहलाती है.शनिवार की भद्रा अशुभ मानी जाती है.

Pandit
Bhubneshwar
Kasturwanagar
Parnkuti guna

गुरुपुष्य योगत्रिपुष्कर योगअमृतसिद्धि सर्वार्थसिद्धियोग में क्या करे

सर्वार्थसिद्धि,
अमृतसिद्धि,
गुरुपुष्यामृत
और रविपुष्यामृत योग

शुभ मुहूर्तों में स्वर्ण आभूषण, कीमती वस्त्र आदि खरीदना, पहनना, वाहन खरीदना, यात्रा आरम्भ करना, मुकद्दमा दायर करना, ग्रह शान्त्यर्थ रत्न धारण करना, किसी परीक्षा प्रतियोगिता या नौकरी के लिए आवेदन-पत्र भरना आदि शुभ मुहूर्त जानने के किए अब आपको पूछने के लिए किसी ज्योतिषी के पास बार-बार जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ।

सर्वार्थसिद्धि, अमृतसिद्धि, गुरुपुष्यामृत और रविपुष्यामृत योग वारों का विषेश नक्षत्रों से सम्पर्क होने से ये योग बनते हैं ।

जैसे कि इन योगों के नामों से स्पष्‍ट है, इन योगों के समय में कोई भी शु्भ कार्य आरम्भ किया जाय तो वह निर्विघ्न रूप से पूर्ण होगा ऐसा हमारे पूर्वाचार्यों ने कहा है ।
यात्रा, गृह प्रवेश, नूतन कार्यारम्भ आदि सभी कार्यों के लिए या अन्य किसी अपरिहार्य कारणवश यदि व्यतिपात, वैधृति, गुरु-शुक्रास्त, अधिक मास एवं वेध आदि का विचार सम्भव न हो तो सर्वार्थसिद्धि आदि योगों का आश्रय लेना चाहिये ।
अमृतसिद्धि योग अमृतसिद्धि योग रवि को हस्त, सोम को मृगशिर, मंगल को अश्‍विनी, बुध को अनुराधा, गुरु को पुष्य नक्षत्र का सम्बन्ध होने पर रविपुष्यामृत-गुरुपुष्यामृत नामक योग बन जाता है जो कि अत्यन्‍त शुभ माना गया है ।
रवियोग योग रवियोग भी इन्हीं योगों की भाँति सभी कार्यों के लिए हैं . शास्त्रों में कथन है कि जिस तरह हिमालय का हिम सूर्य के उगले पर गल जाता है और सैकड़ों हाथियों के समूहों को अकेला सिंह भगा देता है उसी तरह से रवियोग भी सभी अशुभ योगों को भगा देता है, अर्थात्‌ इस योग में सभी कार्य निर्विघन रूप से पूर्ण होंगे

। त्रिपुष्कर और द्विपुष्कर योग त्रिपुष्कर और द्विपुष्कर योग विषेश बहुमूल्य वस्तुओं की खरीददारी करने के लिए हैं . इन योगों में खरीदी गई वस्तु नाम अनुसार भविष्य में दिगुनी व तिगुनी हो जाती है । अतः इन योगों में बहुमूल्य वस्तु खरीदनी चाहिये ।

इन योगों के रहते कोई वस्तु बेचनी नहीं चाहिये क्योंकि भविष्य में वस्तु दुगुनी या तिगुनी बेचनी पड़ सकती है ।

धन या अन्य सम्पत्ति के संचय के लिए ये योग अद्वितीय माने गए हैं ।
इन योगों के रहते कोई वस्तु गुम हो जाये तो भविष्य में दुगुना या तिगुना नुकसान हो सकता है, अतः इस दिन सावधान रहना चाहिए । इस दिन मुकद्दमा दायर नहीं करना चाहिए और दवा भी नहीं खरीदनी चाहिए ।

Pandit

Bhubneshwar 

Kasturwanagar 

Parnkuti guna 

Thursday, 22 December 2016

सीढियां भवन के पाश्र्व में दक्षिणी व पश्चिमी भाग में दायीं ओर हो तो उत्तम है ।

सीढियां भवन के पाश्र्व में दक्षिणी व पश्चिमी भाग में दायीं ओर हो तो उत्तम है ।

सीढियों का द्वार पूर्व या दक्षिण दिशा में होगा तो भी शुभफलप्रद होता है ।

यदि सीढियां अन्य दिशाओं में, तथा घुमावदार बनानी पड़े तो सीढियां घड़ी की सुई की दिशा में याने बांये से दायीं ओर मुड़नी चाहिये ।

दक्षिण-पश्चिम भाग भारी हो इसके लिये इन दिशाओं में सीढियां बनाने का मत है । कुछ विद्वानों का मत है सीढियां उत्तर या पश्चिम में होनी चाहिये, मोड़ मध्य में होना चाहिये । अन्य मत यह है कि चढते समय मध्य बिन्दु तक व्यक्ति का मुख पश्चिम या दक्षिण में होवे तथा अंत में उत्तर, पूर्व में निकलना शुभ है ।

सुरक्षा की दृष्टि से सीढियां के ऊपरी भाग अथवा ऊपर नीचे दोनों जगह द्वार रखा जाय तो ठीक रहे परन्तु ध्यान रहे ऊपर वाले सुरक्षा द्वार की ऊँचाई आवास के दक्षिण पश्चिमी भाग से कम होवे ।

– क्लपर का द्वार नीचे के द्वार से १/१२ भाग कम होना चाहिये । सीढियां व पिलर, बीम की शुभ संख्या के लिये प्राचीन यह मत है।

संख्या के ३ भाग करें ।
पहला भाग इन्द्र का ॥ २ भाग जिंद (प्रेत) का ३ भाग राज का । इस तरह ३ का भाग देने पर २ बचे तो जिंद (राक्षस) भाग का होना चाहिये

ताकि अधिक भार वहन कर सके इसके साथ ही यह ध्यान रखना चाहिये कि सीढियों की संख्या विषम होवे ।

अतः सीढियों की संख्या ५, ११, १७, २३ संख्या में हो तो उत्तम रहे।
बीम की संख्या सम हो सकती है परन्तु जिंद का भाग आना चिहये ।
यह भी सुनिश्चित करना चाहिये कि सीढियां पूर्वी या उत्तरी दिशा की दीवारों को स्पर्श नहीं करें । कम से कम ३ इंच की दूरी होवे ।
अगर पुराने खरीदे मकान में सीढियां उत्तर पूर्व में बनी हो तो दक्षिण पश्चिम में एक कमरा बनाने से वास्तु दोष कम हो जाता है ।

दरवाजे या मेन गेट के सामने सीढियां नहीं होनी चाहिये

एक मारवाड़ी कहावत है – ‘जिसके सामने होवे नाल (सीढियां) उसके सिर पर काल ॥”

अगर सीढियां दक्षिणी भाग में बनाये, दक्षिण में बॉलकानी हो तो पूर्व में बालकॉनी बनाये । अगर पश्चिम भाग में हो पश्चिम में बालकॉनी हो तो उत्तर में बालकॉनी अवश्य बढाये ।
अगर एक से अधिक जगह सीढियां बनानी हो, बहुमंजिली इमारत में बाहर से अलग सीढियां बनानी हो तो मेनगेट के दाहिनी तरफ बनाये जैसे पूर्वमुखी मकान हो तो पूर्व दक्षिणी भाग में अलग सीढियां बना सकते है । दक्षिणमुखी मकान हो तो दक्षिणपश्चिमी भाग में अलग सीढियां बनाये ।

किसी भी तरह की सीढियां ईशान कोण में नहीं बनानी चाहिये ।
नैऋत्य कोण में भी कम काम में लेवे । यदि आवश्यकतावश नैऋत्य कोण में ही बनानी पड़े तो उत्तर की ओर कम से कम ६” उत्तर की ओर छोड़कर बनाये ।

कुछ जगह छोड़कर दक्षिणी भाग की ओर बनाये (चित्र अ) । मकान दक्षिण या उत्तरमुखी हो तो वायव्य कोण से पश्चिमी की ओर (चित्र ब) बनाये । ।

अगर पूर्व दिशा में सीढियां बनानी हो तो इस तरह बनाये कि चढ़ते समय दक्षिण में मुंह होवे तथा उस पर निकास पूर्व दिशा की बालकॉनी पर होवे ।
सीढियां अग्निकोण से कुछ पूर्व की ओर की दीवार के सहारे होवे ।
अगर दक्षिण दिशा में सीढियां बनानी हो तो निकासी ऊपर दक्षिणी बालकॉनी पर होवे ।
अगर पश्चिम दिशा में सीढियाँ बनानी हो तो ऊपर निकास पश्चिमी बॉलकानी पर होवे ।
उत्तर दिशा में सीढियां बनानी हो तो ऊपरी निकास उत्तरी बालकॉनी पर होवे ।
आजकल हर आदमी भूमि जगह का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहता है । अतः सीढियों के नीचे की सतह में टायलेट, बाथरूम बनाकर उपयोग करना चाहता है ।
वास्तु सिद्धान्त से यह सही नहीं है ।
(१) माना कि कोई व्यक्ति बाथरूम या टायलेट में है, जीने में कोई व्यक्ति चढ या उतर रहा है तो ऐसा लगेगा कि नीचे बैठे व्यक्ति के हारमोन्स का मर्दन हो रहा है । –
(२) जैसा कि पहिले सीढियों की संख्या के विषय में लिखा कि सीढियों की संख्या में ३ का भाग देने पर २ बचने से जिंद का भाग शुभ होता है। अत: रूम, स्टोर का आच्छादन (छद) जिंद भाग के द्वारा होना हानि करता है । (३)
आवश्यकता हो तो वास्तु सिद्धान्त के अनुसार करें ।
अगर पूर्व मुखी मकान है, पूर्व की बालकॉनी पर चढने के लिये सीढियां दक्षिण पूर्वी भाग में बनायी, उसके नीचे रूम, स्टोर, बाथरूम बनाने से अग्निकोण में बजन बढना अशुभ है । –
वास्तु दोष निवारण हेतु ईशान कोण से पूर्वी भाग की ओर एक थंभा (Piller) बालकॉनी को छूता हुआ बनाने से भार सम होगा ।
मकान उत्तरमुखी होवे तो सीढियां उत्तरी वायव्य में बनेगी ।
पश्चिम की ओर मुंह करके चढ़ती हुई बनायें व निकास पूर्व की ओर होवे ।
इनके नीचे स्टोर, बाथरूम बनाने से पश्चिमी वायव्य में बढ़ाना गलत है अत: दरवाजे के सामने ईशान कोण में एक स्तंभ बनाये । । मकान पश्चिम मुखी होवे सीढियां नैऋत्य कोण के पास मे चढावें तो इनके नीचे निर्माण अशुभ है । इसी तरह दक्षिण मुखी मकान में नैऋत्य कोण की सीढियों के नीचे कोई निर्माण नहीं कराये । – जो सीढियां अगर मकान के बाहरी से अलग ऊपर जाने के लिये बनाई हो तो, चाहे कोई भी दिशा होवे उन सीढियों के नीचे निर्माण नहीं करें ।

Pandit
Bhubneshwar
Kasturwanagar parnkuti
Guna m.p.

गण दोष योनि दोष बर्ण दोष नाड़ी दोष केवल ग्रह मैत्री होने पर समाप्त होते है लिंक ओपन करे

साधारणतया अष्टकूट अर्थात् तारा, गुण, वश्य, वर्ण, वर्ग, नाड़ी, योनी, ग्रह, गुण आदि के आधार पर सभी पंचागों में ''वर-वधु मेलापक सारिणी'' मुद्रित होती है।
उसमें गुणों की संखया के साथ दोषों के संकेत भी दिये जाते हैं। सर्वश्रेष्ठ मिलान में 36 गुणों का होना श्रेष्ठ मिलान का प्रतीक माना गया है।
उससे आधे अर्थात 18 गुण से अधिक होना ही कुंडली-मिलान का धर्म कांटा मान लिया जाता है। इससे अधिक जितने भी गुण मिलें, वह श्रेष्ठ मिलान का प्रतीक होता है। जहां दोषों का संकेत होता है उनमें भी शुभ नव पंचम, अशुभ नवपंचम अथवा सामान्य नव पंचम या श्रेष्ठ द्विर्द्वादश, प्रीति षडाष्टक, केंद्र के शुभ-अशुभ का आकलन करके सभी ज्योतिर्विद मिलान करते आये हैं और करते रहेंगे, सामान्यतया इन मिलानों का लाभ राम भरोसे सभी सज्जन उठाते हैं। इस प्रकार के मिलानों में दोषों का परिहार भी हमें मिल जाता है

गण दोष

स्वगणे च उत्तम:प्रीति मध्यमाअमरमर्त्ययो:

मत्यराक्षशो म्रत्यु: कलहो देव राक्षशो

राक्षशी यदि वा नारी नरो भबति मानुस:

मृत्युस्तत्र न संदेहो विप्रिता   शुभाब् हा











दोषो  योनि दोषो  वर्ण दोषो षणाष्टकम
चतवारि  नैब दुष्यति  राशि  मेत्री यदा भवेत्

चार दोष केवल ग्रह मेत्री से समाप्त होते है

जैसे-

नाड़ी दोषोऽस्ति विप्राणा, वर्ण दोषोऽस्ति भूभुजाम्।
वैश्यानां गणदोषाः स्यात् शूद्राणां योनि दूषणम्॥

ब्राह्मणों में नाड़ी दोष मानना आवश्यक है,
क्षत्रियों को वर्ण दोष की उपेक्षा नहीं करनी
चाहिए।
वैश्यों में गण दोष को प्रधान माना गया है।
शूद्रों के लिए योनी दोष की उपेक्षा न करना ज्योतिष शास्त्र सम्मत है

किंतु आज के वर्णहीन समाज की स्थिति में ब्राह्मण कौन हैं?

क्षत्रिय कहां हैं?वैश्य कौन है? शूद्र किसको माने?

क्योंकि समाज की संपूर्ण कार्य और कर्त्तव्य प्रणाली आज गड्ड मड्ड हो गयी है। जाति का अलंकार जन्म से या कर्म से किससे मानना चाहिए आज सबके सामने यह एक ज्वलंत प्रश्न खड़ा होता जा रहा है।
जन्मकुंडली में चंद्र नक्षत्र के आधार पर हम राशि, राशि स्वामी, नाड़ी, वर्ण, वश्य अंकित करते हैं।
इन सबका उपयोग कुंडली मिलान के समय किया जाता है।
वर्ण दोष आ रहा है तो क्या निर्णय किया जाये, आज यही समस्या सामने है।
वैश्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा शूद्र अपने को शूद्रादि किस रूप में मानें, जन्म से या कर्म से।
एक श्लोक के अनुसार इस निर्णय को भी धराशायी कर दिया गया है

- जन्मना जायते शूद्र, संस्कारात् द्विज उच्यते।
वेदपाठीभवेद् विप्र, ब्रह्मो जानाति ब्राह्मण॥

जन्म कुंडली मिलान करते समय गुण मिलान के निर्णय के अनुकूल होने पर भी कुंडली में स्थित ग्रहों के उच्च नीच, शत्रु मित्रों के योगायोग तथा उनके स्वभाव प्रकृति के अनुसार दशा, महादशा, अंतर्दशा तथा कुंडली के मारकेशों एवं आयु का प्राकलन श्रेष्ठ हो तो मिलान को श्रेष्ठता का निर्णायक मानना चाहिए।

मंगली जातकों की कुंडली में मंगल, सूर्य, शनि, राहु, केतु की स्थिति पर विचार करना अतिआवश्यक है लग्न सप्तम में सूर्य, शनि,राहु, केतु, मंगल आदि क्रूर विघटनकारी ग्रहों का सामंजस्य बैठाये बिना दांपत्य में अनावश्यक रूप से विघटन होगा ही होगा।

अतः सप्तम स्थान में सूर्य तथा राहु की स्थिति पर अत्यंत ध्यान पूर्वक विचार करके मिलान का निर्णय करना चाहिए।
कन्या की कुंडली में सप्तम स्थान में स्थित सूर्य का समुचित आकलन करना चाहिए। ऐसे दोषों को अवश्य मानना चाहिए

जैसे लग्न में शनि है और चतुर्थ में मंगल है, अष्टम में राहू है। उनका मंगल दोष दुगुना हो जाता है। क्रूर ग्रह अपनी क्रूरता नहीं छोड़ता। कुछ न कुछ ऐसी बिडंवना उत्पन्न करता है कि जीवन छिन्न-भिन्न हो जाता है। वक्री ग्रहों के स्वभाव तथा स्थान परविचार करना भी उचित है। केवल गुण मिलान पर संतोष कर लेना भावी दंपति के जीवन से खिलवाड़ करना है।

इसी प्रकार 4, 8 और लग्न में, सप्तम में और 12वें भाव में मांगलिक दोषों का ध्यान रखना चाहिए।
सामान्य से सामान्य कुंडलियां मिलान करते समय मांगलिक दोष ध्यान में रखना चाहिए। लग्न से लेकर 12वें भाव तक शत्रु, मित्र अथवा सम-मिलान सिद्धांत पर भी ध्यान देना चाहिए। विशेषतःलग्नेश 2, 3, 5 और सातवें भाव के स्वामी आपस में मित्र हों।

अगर मंगल के साथ चंद्र भी हो तो मांगलिक दोष का प्रभाव कम हो जाता है।
शुक्र से भी मंगली विचार पर ध्यान देना चाहिए। मंगली विशेष होने पर लड़की के लिए विष्णु विवाह, घट विवाह आदि का परिहार किया जा सकता है।
वैसे ही सप्तम में राहू होने की स्थिति में लड़का अथवा लड़की की कुंडली में सप्तम भाव में मंगल होने पर राहू का दोष कम हो जाता है

अगर उपरोक्त दोषों के साथ विवाह हो भी गया है तो उसके लिए विशेष समाधान पुनः उसी जोड़े से करवाना चाहिए और निरंतर गाय की सेवा करनी चाहिए।
शनि, सूर्य, राहू सप्तम में होने पर दोष पूर्ण माने गयेहैं, परंतु अकेले शुक्र और बृहस्पति भी इस स्थान पर होने पर पत्नी अथवा पति हंता योग बनाते हैं।
प्रयत्न करना चाहिए कि दोषों को टाला जाए। विशेष परिस्थितियों में ही उपाय का सहारा लेना चाहिए अन्यथा जीवन में कुछ बड़ी कमियां जरूर रह जाती हैं। एक व्यक्ति में बाहरी आकर्षण तो हो सकता है, लेकिन भीतर से वह पत्थर हृदय वाला और स्वार्थी हो सकता है, इसीलिए लोग विवाह बंधन से पहले कुंडली की व्याख्या कराना जरूरी समझते हैं।
कुंडली के बारह भावों में सप्तम भाव दांपत्य का है।
इस भाव के अलावा आयु, भाग्य, संतान, सुख, कर्म, स्थान का पूर्णत: विश्लेषण एक सीमा में अनिवार्य माना जाता है।
वैवाहिक बंधन जीवन का सबसे महत्वपूर्ण बंधन है। विवाह प्यार और स्नेह पर अधारित एक संस्था है। यह वह पवित्र बंधन है, जिसपर पूरे परिवार का भविष्य निर्भर करता है। समान्यत: कुंडली में अष्ट कुट एवं मांगलिक दोष ही देखा जाता है, लेकिन यह जान लेना अनिवार्य है कि कुंडली मिलान की अपेक्षा कुंडली की मूल संरचना अति महत्वपूर्ण है।

एक व्यक्ति में बाहरी आकर्षण तो हो सकता है, लेकिन भीरत से वह पत्थर हृदय वाला और स्वार्थी भी हो सकता है
, जाहिर है कि कुंडली की विस्तृत व्याख्या अनिवार्य मानी जाती है। कुंडली के बारह भावों में सप्तम भाव दांपत्य का है, इस भाव के अलावे आयु, भाग्य, संतान, सुख, कर्म, स्थान का पूर्णत: विश्लेषण एक सीमा में अनिवार्य है।
नवमांश कुंडली सप्तांश, चतुर्विशांश, सप्तविशांश के अलावा रोग के लिए त्रिशांश कुंडली भी देखी जाती है।
लड़कों के लिए शुक्र एवं लड़कियों के लिए गुरु कारक ग्रह है, इसकी स्थिति देखना अनिवार्य है। पुन: गुरु से सप्तम, चंद्र से सप्तम एवं सप्तम भाव के अधिपति की शुभ स्थिति देखी जाती है। शुभ ग्रह उसे कहते है जो स्वगृही, मित्रगृही या उच्च हो।
आजकल शादी में सिर्फ लड़की का रूप-रंग ही देखा जाता है, जबकि सामान्य कद-काठी और रूप-रंग के बच्चे भी यदि अत्यंत भाग्यशाली हुए, तो घर की स्थिति उत्तरोत्तर अच्छी होती जाती है और घर में चार चांद लग जाते हैं।
कई मामलों में मांगलिक दोष भी भंग हो जाता है, लेकिन उसे मांगलिक मान लिया जाता है और शादियां कट जाती हैं।

सप्तम भाव के ग्रह का विभिन्न भाव में शुभ स्थिति में फल यदि सप्तम भाव का स्वामी प्रथम भाव में हो तो वह ऐसे व्यक्ति से शादी करेगा जिसे वह बचपन से जानता हो।
पति एवं पत्नी प्रखर बुद्धि के होंगे और सभी बातों की जांच करने की क्षमता होगी।
यदि यह दूसरे भाव में हो तो पत्नी धनी होगी या उसके आने के बाद धन होगा।
यदि तीसरे भाव में हो तो भाई भाग्यशाली होंगे एवं विदेश में निवास करेंगे।
यदि सप्तमेश चौथे भाव में हो तो जीवन पूर्णत: प्रसन्न एवं खुशहाल होता है।
यदि पंचमभाव में हो तो पति या पत्नी संपन्न परिवार से होंगे और एक-दूसरे के लिए लाभकारी होंगे।
छठे भाव में होने पर शुभ स्थिति नहीं रहती,
लेकिन सप्तम भाव में स्थित होने से पति या पत्नी का व्यक्तित्व आकर्षक होता है, वह न्यायप्रिय और सम्मानित व्यक्ति होता है।
अष्टम भाव में स्थित होने से उसकी शादी किसी पास के संबंध में ही हो जाती है और दोनों धनी रहते हैं।
नवम भाव में स्थित होने से जातक के पिता विदेश में रहते हैं, पत्नी सुसंस्कृत एवं आदर्श होती है।
दशम भाव में स्थित होने पर जातक विदेश में सफल होता है, यात्र निरंतर करनी पड़ती है, पति या पत्नी एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहते हैं।
वहीं एकादश भाव में स्थित होने पर पत्नी धनी परिवार से होती है एवं अपने साथ प्रचूर धन लाती है।
द्वादश भाव में होने पर स्थिति शुभ नहीं रहती है। दाम्पत्य भाव में स्थित ग्रहों का फल अगर इस भाव में सूर्य हो तो जातक गोरा होगा, सिर पर बाल कम होंगे, शादी विलंब से होगी, उसमें कष्ट होगा।
यदि इस भाव में चंद्रमा हो तो पति या पत्नी देखने में सुंदर होंगे, लेकिन ईष्या की भावना होगी।
इस भाव में मंगल हो तो जातक पर पत्नी का शासन रहेगा एवं दाम्पत्य तनावपूर्ण होगा।
बुध वहां उपस्थित हो तो वह जातक सदाचारी और मिलनसार होगा, उसे कानून या गणित का ज्ञान होगा, उसे लिखने की क्षमता होगी।
यहां गुरु होने से वह राजनयिक और कोमल हृदय वाला होगा, पति या पत्नी सुंदर होगी, शिक्षा अच्छी होगी, शादी से लाभ होगा।

इस भाव मे शुक्रहो तो जातक का विवाहित जीवन सुखी रहेगा, पत्नी इसकी भक्त होगी, लेकिन यह झगड़ालु होगा।
यहां शनि होने से विवाह विलंब से होगा, जातक अपनी पत्नी के नियंत्रण में रहेगा, पत्नी कुरूप होगी, लेकिन अत्यधिक मेहनती होगी।
यदि यहां राहू हो तो यह जातक के परिवार के लिए दुख लेकर आयेगा, पत्नी स्त्रीजन्य रोग से पीड़ित होगी एवं आरामपसंद होगी।
इस भाव में केतू रहने से पत्नी दुष्ट प्रकृति की होगी अथवा पति दुष्ट होगा, जातक के पेट में असाध्य बीमारी होगी।
शादी से पहले ध्यान रखें ये बात–हिंदू वैदिक संस्कृति में विवाह से पूर्व जन्म कुंडली मिलान की शास्त्रीय परंपरा है, लेकिन आपने बिना जन्म कुंडली मिलाए ही गंधर्व विवाह [प्रेम-विवाह] कर लिया है तो घबराएं या डरें नहीं, बल्कि यह मान लें कि ईश्वरीय शक्ति द्वारा आपका ग्रह मिलान हो चुका है।हिन्दू संस्कृति में विवाह को सर्वश्रेष्ठ संस्कार बताया गया है।
क्योंकि इस संस्कार के द्वारा मनुष्य धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की सिद्धि प्राप्त करता है। विवाहोपरांत ही मनुष्य देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण से मुक्त होता है।
समाज में दो प्रकार के विवाह प्रचलन में हैं-
पहला परंपरागत विवाह [प्राचीन ब्रह्मधा विवाह] और दूसरा अपरंपरागत विवाह [प्रेम विवाह या गंधर्व विवाह]। परंपरागत विवाह माता-पिता की इच्छा अनुसार संपन्न होता है, जबकि प्रेम विवाह में लड़के और लड़की की इच्छा और रूचि महत्वपूर्ण होती है।
हिंदू धर्म शास्त्रों में हमारे सोलह संस्कार बताए गए हैं। इन संस्कारों में काफी महत्वपूर्ण विवाह संस्कार। शादी को व्यक्ति को दूसरा जन्म भी माना जाता है क्योंकि इसके बाद वर-वधू सहित दोनों के परिवारों का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। इसलिए विवाह के संबंध में कई महत्वपूर्ण सावधानियां रखना जरूरी है।
विवाह के बाद वर-वधू का जीवन सुखी और खुशियोंभरा हो यही कामना की जाती है। ऐसा माना जाता है इस सृष्ठि में प्रत्येक जीवित प्राणी का अपना उर्जा क्षेत्र होता है।
इन प्राणियों के उर्जा क्षेत्र किसी ना किसी ग्रह या किसी राशि के द्वारा नियंत्रित किया जाता है। संसार के सभी उर्जा क्षेत्र किसी ग्रह या राशि के द्वारा परिचालित होने के कारण अन्य सभी उर्जा क्षेत्रों के साथ संगत नहीं होते हैं। उदाहरण स्वरुप, पानी और अग्नि का एक दूसरे के साथ मेल नहीं हो सकता,क्योंकि पानी आग को बुझा सकता है। यह वह स्थान है जहां कुंडली मिलान का रिवाज काफी महत्वपूर्ण हो जाता है,जैसाकि यह प्रस्तावित जोड़े की संगत के विषय में उचित राय देता है। वर-वधू का जीवन सुखी बना रहे इसके लिए विवाह पूर्व लड़के और लड़की की कुंडली का मिलान कराया जाता है। किसी विशेषज्ञ ज्योतिषी द्वारा भावी दंपत्ति की कुंडलियों से दोनों के गुण और दोष मिलाए जाते हैं। साथ ही दोनों की पत्रिका में ग्रहों की स्थिति को देखते हुए इनका वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा? यह भी सटिक अंदाजा लगाया जाता है। यदि दोनों की कुंडलियां के आधारइनका जीवन सुखी प्रतीत होता है तभी ज्योतिषी विवाह करने की बात कहता है। कुंडली मिलान से दोनों ही परिवार वर-वधू के बारे काफी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। यदि दोनों में से किसी की भी कुंडली में कोई दोष हो और इस वजह से इनका जीवन सुख-शांति वाला नहीं रहेगा, ऐसा प्रतीत होता है तो ऐसा विवाह नहीं कराया जाना चाहिए। कुंडली के सही अध्ययन से किसी भी व्यक्ति के सभी गुण-दोष जाने जा सकते हैं। कुंडली में स्थित ग्रहों के आधार पर ही हमारा व्यवहार, आचार-विचार आदि निर्मित होते हैं। उनके भविष्य से जुड़ी बातों की जानकारी प्राप्त की जाती है। कुंडली से ही पता लगाया जाता है कि वर-वधू दोनों भविष्य में एक-दूसरे की सफलता के लिए सहयोगी सिद्ध या नहीं। वर-वधू की कुंडली मिलाने से दोनों के एक साथ भविष्य की संभावित जानकारी प्राप्त हो जाती है इसलिए विवाह से पहले कुंडली मिलान किया जाता है। व्यवहारिक रूप में गुण मिलान की यह विधि अपने आप में पूर्ण नहीं है तथा सिर्फ इसी विधि के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित कर देना उचित नहीं है। इस विधि के अनुसार वर-वधू की कुंडलियों में नवग्रहों में से सिर्फ चन्द्रमा की स्थिति ही देखी जाती है तथा बाकी के आठ ग्रहों के बारे में बिल्कुल भी विचार नहीं किया जाता जो किसी भी पक्ष से व्यवहारिक नहीं है क्योंकि नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह का अपना महत्त्व है तथा किसी भी एक ग्रह के आधार पर इतना महत्त्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया जा सकता। इस लिए गुण मिलान की यह विधि कुंडलियों के मिलान की विधि का एक हिस्सा तो हो सकती है लेकिन पूर्ण विधि नहीं। आइए अब विचार करें कि एक अच्छे ज्योतिषि को कुंडलियों के मिलान के समय किन पक्षों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आधुनिक परिप्रेक्ष्य, स्वतंत्र विचारों, पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण अधिकतर अभिभावक चिंतित रहते हैं कि कहीं उनका लड़का या लड़की प्रेम विवाह तो नहीं कर लेगाक् विवाह पश्चात उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा या नहींक् ऎसे कई प्रश्न माता-पिता के लिए तनाव का कारण बन सकते हैं। क्योंकि परंपरागत विवाह में जन्म कुंडली मिलने के बाद ही विवाह किया जाता है, जबकि प्रेम विवाह में जरूरी नहीं कि कुंडली मिलान किया जाए। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अधिकतर के पास जन्म कुंडली होती नहीं है। कई बार छिपकर भी प्रेम विवाह हो जाता है। विवाह होने के पश्चात जब माता-पिता को पता चलता है तो वह चिंतित हो उठते हैं क्या इनका दाम्पत्य जीवन सुखी और स्थायी रहेगा। माता-पिता इस तरह की चिंता नहीं करें, बल्कि यह सोचें कि इनकी कुंडली या ग्रह तो स्वयं ईश्वर ने ही मिला दिए हैं, तभी तो इनका विवाह हुआ है।

ज्योतिषशास्त्र के अंतर्गत प्रेम विवाह में पंचम भाव से व्यक्ति के संकल्प, विकल्प इच्छा, मैत्री, साहस, भावना और योजना-सामथ्र्य आदि का ज्ञान होता है।
सप्तम भाव से विवाह, दाम्पत्य सुख का विचार करते हैं।
एकादश भाव इच्छापूर्ति
और द्वितीय भाव पारिवारिक सुख-संतोष को प्रकट करता है।
सबसे पहले एक अच्छे ज्योतिषि को यह देखना चाहिए कि क्या वर-वधू दोनों की कुंडलियों में सुखमय वैवाहिक जीवन के लक्ष्ण विद्यमान हैं या नहीं।
उदाहरण के लिए अगर दोनों में से किसी एक कुंडली मे तलाक या वैध्वय का दोष विद्यमान है जो कि मांगलिक दोष, पित्र दोष या काल सर्प दोष जैसे किसी दोष की उपस्थिति के कारण बनता हो, तो बहुत अधिक संख्या में गुण मिलने के बावज़ूद भी कुंडलियों का मिलान पूरी तरह से अनुचित हो सकता है।
इसके पश्चात वर तथा वधू दोनों की कुंडलियों में आयु की स्थिति, कमाने वाले पक्ष की भविष्य में आर्थिक सुदृढ़ता, दोनों कुंडलियों में संतान उत्पत्ति के योग, दोनों पक्षों के अच्छे स्वास्थय के योग तथा दोनों पक्षों का परस्पर शारीरिक तथा मानसिक सामंजस्य देखना चाहिए। उपरोक्त्त विष्यों पर विस्तृत विचार किए बिना कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित करना मेरे विचार से सर्वथा अनुचित है। इस लिए कुंडलियों के मिलान में दोनों कुंडलियों का सम्पूर्ण निरीक्षण करना अति अनिवार्य है तथा सिर्फ गुण मिलान के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित करने के परिणाम दुष्कर हो सकते हैं। सिर्फ गुण मिलान की विधि से ही 25 से अधिक गुण मिलने के कारण वर-वधू की शादी करवा दी गई तथा कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया जिसके परिणाम स्वरुप इनमें से बहुत से केसों में शादी के बाद पति पत्नि में बहुत तनाव रहा तथा कुछ केसों में तो तलाक और मुकद्दमें भी देखने को मिले।
अगर 28-30 गुण मिलने के बाद भी तलाक,मुकद्दमें तथा वैधव्य जैसी परिस्थितियां देखने को मिलती हैं तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि गुण मिलान की प्रचलित विधि सुखी वैवाहिक जीवन बताने के लिए अपने आप में न तो पूर्ण है तथा न ही सक्षम। इसलिए इस विधि को कुंडली मिलान की विधि का एक हिस्सा मानना चाहिए न कि अपने आप में एक सम्पूर्ण विधि। केसे होता हें कुंडली मिलान— कुंडली मिलान, निर्धारित दिशा निर्देशों व नियमों की मदद से एक स्थिर समाज बनाने की क्षमता रखता है। उदाहरणस्वरुप, यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल काफी मजबूत का होता है, तो वह बहुत तीव्र, उत्साह से भरा हुआ तथा सक्रिय होता है। दूसरी ओर कमजोर मंगल वाला व्यक्ति में यह गुण नहीं होता। अब, यदि ऐसे दो लोगों का विवाह होता है तो , मजबूत मंगल वाला व्यक्ति को हमेशा लगेगा कि उसका साथी काफी सुस्त तथा अनुत्साहित है।
इसी तरह कमजोर मंगल वाला अपनी साथी की गति तथा तीव्रता के कारण दबाव महसूस कर सकता है। इस तरह से यह एक आदर्श जोड़ा नही हो सकता है।

हिंदू या वैदिक ज्योतिष प्रणाली में, जोड़े के मिलान के लिए अष्टकुट विधि ( आठ बिंदु विधि) का इस्तेमाल किया जाता है। इस पद्धति के अनुसार, अनुकूलता की जांच करने के लिए आठ विभिन्न मापदंडों को माना जाता है और प्रत्येक मापदंड जीवन की एक विशेष पहलू का सूचक है। इस प्रणाली हमें यह जानने में मदद करता है कि दो लोग जीवन के विभिन्न पहलू में एक दूसरे के साथ आरामदायक हैं या नहीं। ये सभी मापदंड विभिन्न बिंदूओं का मिलान करता है। यदि मिलान बिंदू १८ से अधिक है, तो यह एक औसत मेल माना जाता है, जबकि १८ से कम बिंदूओं पर मिलान की सिफारिश नहीं की जाती। यदि मिलान बिंदू २४ से ज्यादा है तो मेल औसत से अच्छा है और यदि यह २८ से ज्यादा है तो इसे अच्छा मेल माना जाता है। कुंडली के मिलान के समय, सभी मापदंडों को ध्यान में रखा जाता है तथा निम्न वर्णित के आधार पर अधिकतम अंक दिए जाते हैं। यहां प्रत्येकमापदंड के अर्थ का उल्लेख किया गया है। यह पद्धति एक जोड़े की संगतता (अनुकूलता) को पहचानने के लिए सदियों से अजेय रहा है। भारतीय ज्योतिष में विवाह शादी के लिए कुंडली मिलान के लिए गुण मिलान की विधि आज भी सबसे अधिक प्रचलित है। इस विधि के अनुसार वर-वधू की जन्म कुंडलियों में चन्द्रमा की स्थिति के आधार पर निम्नलिखित अष्टकूटों का मिलान किया जाता है।

1) वर्ण
2) वश्य
3) तारा
4) योनि
5) ग्रह-मैत्री
6) गण
7) भकूट
8) नाड़ी उपरोक्त अष्टकूटों को क्रमश: एक से आठ तक गुण प्रदान किये जाते हैं, जैसे कि वर्ण को एक, नाड़ी को आठ तथा बाकी सबको इनके बीच में दो से सात गुण प्रदान किये जाते हैं। इन गुणों का कुल जोड़ 36 बनता है तथा इन्हीं 36 गुणों के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित किया जाता है। 36 में से जितने अधिक गुण मिलें, उतना ही अच्छा कुंडलियों का मिलान माना जाता है। 36 गुण मिलने पर उत्तम, 36 से 30 तक बहुत बढ़िया, 30 से 25 तक बढ़िया तथा 25 से 20 तक सामान्य मिलान माना जाता है। 20 से कम गुण मिलने पर कुंडलियों का मिलान शुभ नहीं माना जाता है। भारतीय ज्योतिष में कुंडली मिलान के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में मिलाए जाने वाले अष्टकूटों में नाड़ी और भकूट को सबसे अधिक गुण प्रदान किए जाते हैं। नाड़ी को 8 तथा भकूट को 7 गुण प्रदान किए जाते हैं। इस तरह अष्टकूटों के इस मिलान में प्रदान किए जाने वाले 36 गुणों में से 15 गुण केवल इन दो कूटों अर्थात नाड़ी और भकूट के हिस्से में ही आ जाते हैं। इसी से गुण मिलान की विधि में इन दोनों के महत्व का पता चल जाता है। नाड़ी और भकूट दोनों को ही या तो सारे के सारे या फिर शून्य गुण प्रदान किए जाते हैं, अर्थात नाड़ी को 8 या 0 तथा भकूट को 7 या 0 अंक प्रदान किए जाते हैं। नाड़ी को 0अंक मिलने की स्थिति में वर-वधू की कुंडलियों में नाड़ी दोष तथा भकूट को 0 अंक मिलने की स्थिति में वर-वधू की कुंडलियों में भकूट दोष बन जाता है। भारतीय ज्योतिष में प्रचलित धारणा के अनुसार इन दोनों दोषों को अत्यंत हानिकारक माना जाता है तथा ये दोनों दोष वर-वधू के वैवाहिक जीवन में अनेक तरह के कष्टों का कारण बन सकते हैं और वर-वधू में से किसी एक यादोनों की मृत्यु का कारण तक बन सकते हैं। तो आइए आज भारतीय ज्योतिष की एक प्रबल धारणा के अनुसार अति महत्वपूरण माने जाने वाले इन दोनों दोषों के बारे में चर्चा करते हैं। १ वर्ण सामाजिक मूल्यों की अनुकूलता १ अंक २ वैश्य सामांजस्य स्तर पर अनुकूलता २ अंक ३ तारा / दिना व्यक्तिगत नियति की अनुकूलता ३ अंक ४ योनि यौन अनुकूलता ४ अंक ५ गृह /मैत्री वैवाहिक सद्भाव की अनुकूलता ५ अंक ६ गण व्यक्तिगत लक्षण की अनुकूलता ६ अंक ७ भकूट सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति की अनुकूलता ७ अंक ८ नाड़ी संतति पैदा करने की अनुकूलता ८ अंक इस प्रणाली का पालन करके किए जाने वाले जोड़े मेल वैज्ञानिक रुप से सही होते हैं। गणेशजी एक उदाहरण देना चाहते हैं। कुंडली में नाड़ी दोष संतान के जन्म में कठिनाईयों को दिखाता है। यदि गुण मिलाप के समय मध्य नाड़ी दोष का संकेत मिलता है, तो युगल के संतान सुख से वंचित रखने की संभावना काफी मजबूत होती है। कारण – नाड़ी किसी व्यक्ति की प्रकृति (मूल तत्व ) को इंगित करता है। ये प्रकृति वात, पित्त और कफ हैं। यदि दोनों भागीदार एक ही प्रकृति में जन्म लेते हैं तो नाड़ीके तहत प्राप्त अंक शून्य होगा। विवाह का मकसद एक दूसरे के साथ सुखी जीवन ही नहीं है, बल्कि परिवार का विस्तार भी है। यदि युगल संतानसुख से वंचित रहते हैं तो वैवाहिक जीवन में कुछ वर्षों के पश्चात उदासी आ सकती है तथा युगल को बुढ़ापे में सहारे के लिए भी कोई नहीं होता। नाड़ी के प्रकार तथा उनके अर्थ निम्न प्रकार से हैं- आद्य नाड़ी वात वायु स्वभाव सूखा तथा ठंड़ा मध्य नाड़ी पित्त पित्त स्वभाव उच्चतम मेटाबोलिक दर अंत नाड़ी कफ सुस्त स्वभाव तैलिय तथा विनित मध्य नाड़ी दोष इन तीनों में से सबसे मजबूत माना जाता है, जैसा कि पित्त प्रकृति वीर्य की गुणवत्ता का नाश करता है। इस कारण से सफल गर्भाधान की संभावना काफी कम हो जाती है, अधिकांशतः इसलिए कि शुक्राणु की आयु ३ से ५ दिन की होती है और पित्त प्रकृति का स्वभाव इसका नाश करने का है। फलतः मध्य नाड़ी दोष वाले युगल की प्रजनन क्षमता काफी कम होती है। आइए सबसे पहले यह जान लें कि नाड़ी और भकूट दोष वास्तव में होते क्या हैं तथा ये दोनों दोष बनते कैसे हैं। नाड़ी दोष से शुरू करते हुए आइए सबसे पहले देखें कि नाड़ी नाम का यह कूट वास्तव में होता क्या है। नाड़ी तीन प्रकार की होती है, आदि नाड़ी, मध्या नाड़ी तथा अंत नाड़ी। प्रत्येक व्यक्ति की जन्म कुंडली में चन्द्रमा की किसी नक्षत्र विशेष में उपस्थिति से उस व्यक्ति की नाड़ी का पता चलता है। नक्षत्र संख्या में कुल 27 होते हैं तथा इनमें से किन्हीं 9 विशेष नक्षत्रों में चन्द्रमा के स्थित होने से कुंडली धारक की कोई एक नाड़ी होती है। उदाहरण के लिए : चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की आदि नाड़ी होती है : अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तर फाल्गुणी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा तथा पूर्व भाद्रपद। चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की मध्य नाड़ी होती है : भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्व फाल्गुणी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा तथा उत्तर भाद्रपद। चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की अंत नाड़ी होती है : कृत्तिका, रोहिणी, श्लेषा, मघा, स्वाती, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती। गुण मिलान करते समय यदि वर और वधू की नाड़ी अलग-अलग हो तो उन्हें नाड़ी मिलान के 8 में से 8 अंक प्राप्त होते हैं, जैसे कि वर की आदि नाड़ी तथा वधू की नाड़ी मध्या अथवा अंत। किन्तु यदि वर और वधू की नाड़ी एक ही हो तो उन्हें नाड़ी मिलान के 8 में से 0 अंक प्राप्त होते हैं तथा इसे नाड़ी दोष का नाम दिया जाता है। नाड़ी दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार वर-वधू दोनों की नाड़ी आदि होने की स्थिति में तलाक या अलगाव की प्रबल संभावना बनती है तथा वर-वधू दोनों की नाड़ी मध्य या अंत होने से वर-वधू में से किसी एक या दोनों की मृत्यु की प्रबल संभावना बनती है। नाड़ी दोष को निम्नलिखित स्थितियों में निरस्त माना जाता है : यदि वर-वधू दोनों का जन्म एक ही नक्षत्र के अलग-अलग चरणों में हुआ हो तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता। यदि वर-वधू दोनों की जन्म राशि एक ही हो किन्तु नक्षत्र अलग-अलग हों तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता। यदि वर-वधू दोनों का जन्म नक्षत्र एक ही हो किन्तु जन्म राशियां अलग-अलग हों तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता। नाड़ी दोष के बारे में विस्तारपूर्वक जानने के बाद आइए अब देखें कि भकूट दोष क्या होता है। यदि वर-वधू की कुंडलियों में चन्द्रमा परस्पर 6-8, 9-5 या 12-2 राशियों में स्थित हों तो भकूट मिलान के 0 अंक माने जाते हैं तथा इसे भकूट दोष माना जाता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि वर की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मेष राशि में स्थित हैं, अब : यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा कन्या राशि में स्थित हैं तो इसे षड़-अष्टक भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर कन्या राशि छठे तथा कन्या राशि से गिनती करने पर मेष राशि आठवें स्थान पर आती है। यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा धनु राशि में स्थित हैं तो इसे नवम-पंचम भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर धनु राशि नवम तथा धनु राशि से गिनती करने पर मेष राशि पांचवे स्थान पर आती है। यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मीन राशि में स्थित हैं तो इसे द्वादश-दो भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर मीन राशि बारहवें तथा मीन राशि से गिनती करने पर मेष राशि दूसरे स्थान पर आती है। भकूट दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार षड़-अष्टक भकूट दोष होने से वर-वधू में से एक की मृत्यु हो जाती है, नवम-पंचम भकूट दोष होने से दोनों को संतान पैदा करने में मुश्किल होती है या फिर सतान होती ही नहीं तथा द्वादश-दो भकूट दोष होने से वर-वधू को दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। भकूट दोष को निम्नलिखित स्थितियों में निरस्त माना जाता है : यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो तो भकूट दोष खत्म हो जाता है। जैसे कि मेष-वृश्चिक तथा वृष-तुला राशियों के एक दूसरे से छठे-आठवें स्थान पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि मेष-वृश्चिक दोनों राशियों के स्वामी मंगल हैं तथा वृष-तुला दोनों राशियों के स्वामी शुक्र हैं। इसी प्रकार मकर-कुंभ राशियों के एक दूसरे से 12-2 स्थानों पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों राशियों के स्वामी शनि हैं। यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों के स्वामी आपस में मित्र हैं तो भी भकूट दोष खत्म हो जाता है जैसे कि मीन-मेष तथा मेष-धनु में भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों ही उदाहरणों में राशियों के स्वामी गुरू तथा मंगल हैं जो कि आपसे में मित्र माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त अगर दोनो कुंडलियों में नाड़ी दोष न बनता हो, तो भकूट दोष के बनने के बावजूद भी इसका असर कम माना जाता है। किन्तु इन दोषों के द्वारा बतायी गईं हानियां व्यवहारिक रूप से इतने बड़े पैमाने पर देखने में नहीं आतीं और न ही यह धारणाएं तर्कसंगत प्रतीत होती हैं। उदाहरण के लिए नाड़ी दोष लगभग 33 प्रतिशत कुंडलियों के मिलान में देखने में आता है कयोंकि कुल तीन नाड़ियों में से वर और वधू की नाड़ी एक होने की सभावना लगभग 33 प्रतिशत बनती है। इसी प्रकार की गणना भकूट दोष के विषय में भी करके यह तथ्य सामने आता है कि कुंडली मिलान की लगभग 50 से 60 प्रतिशत उदाहरणों में नाड़ी या भकूट दोष दोनों में से कोई एक अथवा दोनों ही उपस्थित होते हैं। और क्योंकि बिना कुंडली मिलाए विवाह करने वाले लोगों में से 50-60प्रतिशत लोग ईन दोनों दोषों के कारण होने वाले भारी नुकसान नहीं उठा रहे इसलिए इन दोनों दोषों से होने वाली हानियों तथा इन दोनों दोषों की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। नाड़ी दोष तथा भकूट दोष अपने आप में दो लोगों के वैवाहिक जीवन में उपर बताई गईं विपत्तियां लाने में सक्षम नहीं हैं तथा इन दोषों और इनके परिणामों को कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं के साथ ही जोड़ कर देखना चाहिए। नाड़ी दोष तथा भकूट दोष से होने वाले बुरे प्रभावों को ज्योतिष के विशेष उपायों से काफी हद तक कम किया जा सकता है। ज्योतिष को एक विज्ञान के रुप में, समय से काफी आगे, व्यक्ति के तारीख, समय तथा जन्म स्थान के आधार पर, सही वैज्ञानिक व्याख्या के साथ सभी कुछ का सही विवरण बताता है। लेकिन, क्या युगल एक दूसरे के लिए भाग्यशाली साबित होगें ?विवाह के बाद क्या युगल वित्तिय प्रगति कर सकेगें ? इस तरह के सवालों का जवाब भी विस्तृत कुंडली के मिलान करके आसानी से पाया जा सकता है।यहां अन्य कई ज्योतिषिय मापदंड भी हैं जो कुंडली मिलान के समय ध्यान में रखा जाता है। इसमें समग्र तालिका की अवधारणा भी शामिल है, जो बताता है कि दो लोग एक दूसरे के साथ सुखी रहेगें हैं या नहीं। उनका जीवन किस तरह से बितेगा, कोई एक चमकेगा तथा दूसरे के सकारात्मक गुणों से तर हो जाएगा ? ये सारे कारण हैं कि विवाह को तय करने से पहले दूल्हा दुल्हन के कुंडली का मिलान किया जाता है। इस संदर्भ में पुरूष के लिए शुक्र और स्त्री के लिए मंगल का विश्लेषण आवश्यक है। शुक्र प्रणय और आकर्षण का प्रेरक है। इससे सौंदर्य, भावनाएं, विलासिता का भी ज्ञान होता है। पंचम भाव स्थित शुक्र जातक को प्रणय की उद्दाम अनुभूतियों से ओत-प्रोत करता है। मंगल साहस का कारक है। मंगल जितना प्रभुत्वशाली होगा, जातक उसी अनुपात में साहसी और धैर्यशील होगा। यदिव्यक्ति मंगल कमजोर हो तो जातक प्रेमानुभूति को अभिव्यक्त नहीं कर पाता। वह दुविधा, संशय और हिचकिचाहट में रहता है। चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। चंद्रमा का मानसिक स्थिति, स्वभाव, इच्छा, भावना आदि पर प्रभुत्व है। प्रेम मन से किया जाता है। इसलिए चंद्र की स्थिति भी प्रेम विवाह में अनुकूलता प्रदान करती है। शुक्र आकर्षण का कारक है। यदि शुक्र जातक के प्रबल होता है तो प्रेम विवाह हो जाता है और यदि शुक्र कमजोर होता है तो विवाह नहीं हो पाता है। संक्षेप में कहा जाए तो कुंडली मिलान एक सफल तथा सद्भावपूर्ण विवाहित जीवन की कुंजी है। दूसरी बात, वो ये कि आजकल जन्मकुंडली मिलान वगैरह के लिए भी कम्पयूटर का ही सहारा लिया जाने लगा है. खैर इसमें कोई बुराई नहीं बल्कि ये तो अच्छी बात है क्यों कि कम्पयूटर के इस्तेमाल से गलती की कैसी भी कोई संभावना नहीं रहती…… परन्तु अन्तिम निर्णय तो विद्वान ज्योतिषी को ही करना होता है. कम्पयूटर का कार्य है सिर्फ गणित(Calculations) करना. जन्मकुंडली देखना, उसके बारे में अन्तिम रूप से सारांशत: व्यक्तिगत रूचि लेकर किसी निर्णय पर पहुँचने का कार्य ज्योतिष के ज्ञाता का है. कम्पयूटर मानव कार्यों का एक सर्वोतम सहायक जरूर है, मानव नहीं…..इसलिए कम्पयूटर का उपयोग करें तो सिर्फ जन्मकुंडली निर्माण हेतु….न कि कम्पयूटर द्वारा दर्शाई गई गुण मिलान संख्या को आधार मानकर कोई अंतिम निर्णय लिया जाए….शुभ और अशुभ भकूट गुणों का विचार/निर्णय—भकूट दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार षड़-अष्टक भकूट दोष होने से वर-वधू में से एक की मृत्यु हो जाती है, नवम-पंचम भकूट दोष होने से दोनों को संतान पैदा करने में मुश्किल होती है या फिर सतान होती ही नहीं तथा द्वादश-दो भकूट दोष होने से वर-वधू को दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। भकूट दोष को निम्नलिखित स्थितियों में निरस्त माना जाता है : यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो तो भकूट दोष खत्म हो जाता है। जैसे कि मेष-वृश्चिक तथा वृष-तुला राशियों के एक दूसरे से छठे-आठवें स्थान पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि मेष-वृश्चिक दोनों राशियों के स्वामी मंगल हैं तथा वृष-तुला दोनों राशियों के स्वामी शुक्र हैं। इसी प्रकार मकर-कुंभ राशियों के एक दूसरे से 12-2 स्थानों पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों राशियों के स्वामी शनि हैं। यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों के स्वामी आपस में मित्र हैं तो भी भकूट दोष खत्म हो जाता है जैसे कि मीन-मेष तथा मेष-धनु में भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों ही उदाहरणों में राशियों के स्वामी गुरू तथा मंगल हैं जो कि आपसे में मित्र माने जाते हैं।इसके अतिरिक्त अगर दोनो कुंडलियों में नाड़ी दोष न बनता हो, तो भकूट दोष के बनने के बावजूद भी इसका असर कम माना जाता है। किन्तु इन दोषों के द्वारा बतायी गईं हानियां व्यवहारिक रूप से इतने बड़े पैमाने पर देखने में नहीं आतीं और न ही यह धारणाएं तर्कसंगत प्रतीत होती हैं। उदाहरण के लिए नाड़ी दोष लगभग 33 प्रतिशत कुंडलियों के मिलान में देखने में आता है कयोंकि कुल तीन नाड़ियों में से वर और वधू की नाड़ी एक होने की सभावना लगभग 33 प्रतिशतबनती है। इसी प्रकार की गणना भकूट दोष के विषय में भी करके यह तथ्य सामने आता है कि कुंडली मिलान की लगभग 50 से60 प्रतिशत उदाहरणों में नाड़ी या भकूट दोष दोनों में से कोई एक अथवा दोनों ही उपस्थित होते हैं। और क्योंकि बिना कुंडली मिलाए विवाह करने वाले लोगों में से 50-60 प्रतिशत लोग ईन दोनों दोषों के कारण होने वाले भारी नुकसान नहीं उठा रहे इसलिए इन दोनों दोषों से होने वाली हानियों तथा इन दोनों दोषों की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। मेरे अपने अनुभव के अनुसार नाड़ी दोष तथा भकूट दोष अपने आप में दो लोगों के वैवाहिक जीवन में उपर बताई गईं विपत्तियां लाने में सक्षम नहीं हैं तथा इन दोषों और इनके परिणामों को कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं के साथ ही जोड़ कर देखना चाहिए। भकूट का तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है। यह 6 प्रकार का होता है जो क्रमश: इस प्रकार है:- कुण्डली में गुण मिलान के लिए अष्टकूट से विचार किया जाता है इन अष्टकूटों में एक है भकूट भकूट अष्टकूटो में 7 वां है,भकूट निम्न प्रकार के होते हैं. 1. प्रथम – सप्तक 2. द्वितीय – द्वादश 3. तृतीय – एकादश 4. चतुर्थ – दशम 5. पंचम – नवम 6. षडष्टक ज्योतिष के अनुसार निम्न भकूट अशुभ हैं द्विर्द्वादश नवपंचक एवं षडष्टक शेष निम्न तीन भकूट शुभ हैं. इनके रहने पर भकूट दोष माना जाता है प्रथम-सप्तक तृतीय-एकादश चतुर्थ-दशम भकूट जानने के लिए वर की राशि से कन्या की राशि तक तथा कन्या की राशि से वर की राशि तक गणना करनी चाहिए। यदि दोनों की राशि आपस में एक दूसरे से द्वितीय एवं द्वादश भाव में पड़ती हो तो द्विर्द्वादश भकूट होता है। वर कन्या की राशि परस्पर पांचवी व नवी में पड़ती है तो नव-पंचम भकूट होता है, इस क्रम में अगर वर-कन्या की राशियां परस्पर छठे एवं आठवें स्थान पर पड़ती हों तो षडष्टक भकूट बनता है। नक्षत्र मेलापक में द्विर्द्वादश, नव-पंचक एवं षडष्टक ये तीनों भकूट अशुभ माने गये हैं। द्विर्द्वादश को अशुभ की इसलिए कहा गया है क्योंकि द्सरा स्थान(12th place) धन का होता है और बारहवां स्थान व्यय का होता है, इस स्थिति के होने पर अगर शादी की जाती है तो पारिवारिक जीवन में अधिक खर्च होता है। नवपंचक भकूट को अशुभ कहने का कारण यह है कि जब राशियां परस्पर पांचवें तथा नवमें स्थान पर होती हैं तो धार्मिक भावना, तप-त्याग, दार्शनिक दृष्टि तथा अहं की भावना जागृत होती है जो दाम्पत्य जीवन में विरक्ति तथा संतान के सम्बन्ध में हानि देती है। षडष्टक भकूट को महादोष की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि कुण्डली में 6ठां एवं आठवां स्थान मृत्यु का माना जाता हैं। इस स्थिति के होने पर अगर शादी की जाती है तब दाम्पत्य जीवन में मतभेद, विवाद एवं कलह ही स्थिति बनी रहती है जिसके परिणामस्वरूप अलगाव, हत्या एवं आत्महत्या की घटनाएं भी घटित होती हैं। मेलापक के अनुसार षडष्टक में वैवाहिक सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। शेष तीन भकूट- प्रथम-सप्तम, तृतीय – एकादश तथा चतुर्थ -दशम शुभ होते हैं। शुभ भकूट का फल निम्न हैं:- मेलापक में राशि अगर प्रथम-सप्तम हो तो शादी के पश्चात पति पत्नी दोनों का जीवन सुखमय होता है और उन्हे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। वर कन्या का परस्पर तृतीय-एकादश भकूट हों तो उनकी आर्थिक अच्छी रहती है एवं परिवार में समृद्धि रहती है,जब वर कन्या का परस्पर चतुर्थ-दशम भकूट हो तो शादी के बाद पति पत्नी के बीच आपसी लगाव एवं प्रेम बना रहता है। इन स्थितियों में भकूट दोष नहीं लगता है:—– 1. यदि वर-वधू दोनों के राशीश आपस में मित्र हों। 2. यदि दोनों के राशीश एक हों। 3. यदि दोनों के नवमांशेश आपस में मित्र हों। 4. यदि दोनों के नवमांशेश एक हो। नाड़ी दोष— इस प्रकार मेलापक में नाडी के माध्यम से भावी दम्पति की मानसिकता, मनोदशा का मूल्यांकन किया जाता है । वैदिक ज्योतिष के मेलापक प्रकरण में गणदोष, भकूटदोष एवं नाडी दोष - इन तीनों को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है । यह इस बात से भी स्पष्ट है कि ये तीनों कुल 36 गुणों में से (6+7+8=21) कुल 21 गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं और शेष पाँचों कूट (वर्ण, वश्य, तारा, योनि एवं ग्रह मैत्री) कुल मिलाकर (1+2+3+4+5=15) 15 गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं । अकेली नाडी के 8 गुण होते हैं, जो वर्ण, वश्य आदि 8 कूटों की तुलना में सर्वाधिक हैं । इसलिए मेलापक में नाडी दोष एक महादोष माना गया है । कुंडली मिलान के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में मिलाए जाने वाले अष्टकूटों में नाड़ी और भकूट को सबसे अधिक गुण प्रदान किए जाते हैं। नाड़ी को 8 तथा भकूट को 7 गुण प्रदान किए जाते हैं। इस तरह अष्टकूटों के इस मिलान में प्रदान किए जाने वाले 36 गुणों में से 15 गुण केवल इन दो कूटों अर्थात नाड़ी और भकूट के हिस्से में ही आ जाते हैं। इसी से गुण मिलान की विधि में इन दोनों के महत्व का पता चल जाता है। नाड़ी और भकूट दोनों को ही या तो सारे के सारे या फिर शून्य गुण प्रदान किए जाते हैं, अर्थात नाड़ी को 8 या 0 तथा भकूट को 7 या 0 अंक प्रदान किए जाते हैं। नाड़ी को 0 अंक मिलनेकी स्थिति में वर-वधू की कुंडलियों में नाड़ी दोष तथा भकूट को 0 अंक मिलने की स्थिति में वर-वधू की कुंडलियों में भकूट दोष बन जाता है। भारतीय ज्योतिष में प्रचलित धारणा के अनुसार इन दोनों दोषों को अत्यंत हानिकारक माना जाता है तथा ये दोनों दोष वर-वधू के वैवाहिक जीवन में अनेक तरह के कष्टों का कारण बन सकते हैं और वर-वधू में से किसी एक या दोनों की मृत्युका कारण तक बन सकते हैं। तो आइए आज भारतीय ज्योतिष की एक प्रबल धारणा के अनुसार अति महत्वपूरण माने जाने वाले इन दोनों दोषों के बारे में चर्चा करते हैं। आइए सबसे पहले यह जान लें कि नाड़ी और भकूट दोष वास्तव में होते क्या हैं तथा ये दोनों दोष बनते कैसे हैं। नाड़ी दोष से शुरू करते हुए आइए सबसे पहले देखें कि नाड़ी नाम का यह कूट वास्तव में होता क्या है। नाड़ी तीन प्रकार की होती है, आदि नाड़ी, मध्या नाड़ी तथा अंत नाड़ी। प्रत्येक व्यक्ति की जन्म कुंडली में चन्द्रमा की किसी नक्षत्र विशेष में उपस्थिति से उस व्यक्ति की नाड़ी का पता चलता है। नक्षत्र संख्या में कुल 27 होते हैं तथा इनमें से किन्हीं 9 विशेष नक्षत्रों में चन्द्रमा के स्थित होने से कुंडली धारक की कोई एक नाड़ी होती है। उदाहरण के लिए : चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की आदि नाड़ी होती है : अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तर फाल्गुणी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा तथा पूर्व भाद्रपद। चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की मध्य नाड़ी होती है : भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्व फाल्गुणी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा तथा उत्तर भाद्रपद। चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की अंत नाड़ी होती है : कृत्तिका, रोहिणी, श्लेषा, मघा, स्वाती, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती। गुण मिलान करते समय यदि वर और वधू की नाड़ी अलग-अलग हो तो उन्हें नाड़ी मिलान के 8 में से 8 अंक प्राप्त होते हैं, जैसे कि वर की आदि नाड़ी तथा वधू की नाड़ी मध्या अथवा अंत। किन्तु यदि वर और वधू की नाड़ी एक ही हो तो उन्हें नाड़ी मिलान के 8 में से 0 अंक प्राप्त होते हैं तथा इसे नाड़ी दोष का नाम दिया जाता है। नाड़ी दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार वर-वधू दोनों की नाड़ी आदि होने की स्थिति में तलाक या अलगाव की प्रबल संभावना बनती है तथा वर-वधू दोनों की नाड़ी मध्य या अंत होने से वर-वधू में से किसी एक या दोनों की मृत्यु की प्रबल संभावना बनती है। नाड़ी दोष को निम्नलिखित स्थितियों में निरस्त माना जाता है : यदि वर-वधू दोनों का जन्म एक ही नक्षत्र के अलग-अलग चरणों में हुआ हो तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता। यदि वर-वधू दोनों की जन्म राशि एक ही हो किन्तु नक्षत्र अलग-अलग हों तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता। यदि वर-वधू दोनों का जन्म नक्षत्र एक ही हो किन्तु जन्म राशियां अलग-अलग हों तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता। नाड़ी दोष के बारे में विस्तारपूर्वक जानने के बाद आइए अब देखें कि भकूट दोष क्या होता है। यदि वर-वधू की कुंडलियों में चन्द्रमा परस्पर 6-8, 9-5 या 12-2 राशियों में स्थित हों तो भकूट मिलान के 0 अंक माने जाते हैं तथा इसे भकूट दोष माना जाता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि वर की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मेष राशि में स्थित हैं, अब : यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा कन्या राशि में स्थित हैं तो इसे षड़-अष्टक भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर कन्या राशि छठे तथा कन्या राशि से गिनती करने पर मेष राशि आठवें स्थान पर आती है। यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा धनु राशि में स्थित हैं तो इसे नवम-पंचम भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर धनु राशि नवम तथा धनु राशि से गिनती करने पर मेष राशि पांचवे स्थान पर आती है। यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मीन राशि में स्थित हैं तो इसे द्वादश-दो भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर मीन राशि बारहवें तथा मीन राशि से गिनती करने पर मेष राशि दूसरे स्थान पर आती है। कुंडली मिलान के लिए गुण मिलान की विधि —- एक अच्छे ज्योतिषि को यह देखना चाहिए कि क्या वर-वधू दोनों की कुंडलियों में सुखमय वैवाहिक जीवन के लक्ष्ण विद्यमान हैं या नहीं। उदाहरण के लिए अगर दोनों में से किसी एक कुंडली मे तलाक या वैध्वय का दोष विद्यमान है जो कि मांगलिक दोष,पित्र दोष या काल सर्प दोष जैसे किसी दोष की उपस्थिति के कारण बनता हो, तो बहुत अधिक संख्या में गुण मिलने के बावज़ूद भी कुंडलियों का मिलान पूरी तरह से अनुचित हो सकता है। इसके पश्चात वर तथा वधू दोनों की कुंडलियों में आयु की स्थिति,कमाने वाले पक्ष की भविष्य में आर्थिक सुदृढ़ता, दोनों कुंडलियों में संतान उत्पत्ति के योग, दोनों पक्षों के अच्छे स्वास्थय के योग तथा दोनों पक्षों का परस्पर शारीरिक तथा मानसिक सामंजस्य देखना चाहिए। उपरोक्त्त विष्यों पर विस्तृत विचार किए बिनाकुंडलियों का मिलान सुनिश्चित करना मेरे विचार से सर्वथा अनुचित है। इस लिए कुंडलियों के मिलान में दोनों कुंडलियों का सम्पूर्ण निरीक्षण करना अति अनिवार्य है तथा सिर्फ गुण मिलान के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित करने के परिणाम दुष्कर हो सकते हैं। अगर 28-30 गुण मिलने के बाद भी तलाक, मुकद्दमें तथा वैधव्य जैसी परिस्थितियां देखने को मिलती हैं तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि गुण मिलान की प्रचलित विधि सुखी वैवाहिक जीवन बताने के लिए अपने आप में न तो पूर्ण है तथा न ही सक्षम। इसलिए इस विधि को कुंडली मिलान की विधि का एक हिस्सा मानना चाहिए न कि अपने आप में एक सम्पूर्ण विधि। मैने अपनी ज्योतिष की प्रैक्टिस के दौरान कुंडली मिलान के ऐसे बहुत से केस देखे हैं जिनमें सिर्फ गुण मिलान की विधि से ही25 से अधिक गुण मिलने के कारण वर-वधू की शादी करवा दी गई तथा कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया जिसके परिणाम स्वरुप इनमें से बहुत से केसों में शादी के बाद पति पत्नि में बहुत तनाव रहा तथा कुछ केसों में तो तलाक और मुकद्दमें भी देखने को मिले। वर्ण दोष, वश्य दोष भारतवर्ष में विवाह कार्यों के लिए की प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में प्रयोग होने वाले अष्टकूटों में से वर्ण तथा वश्य नामक कूटों को क्रमश: 1 तथा 2 अंक प्रदान किए जाते हैं तथा इन कूटों का गुण मिलान की विधि में विशेष महत्व है। नएपाठकों की सुविधा के लिए मैं यहां पर गुण मिलान की इस विधि का संक्षेप में वर्णन कर रहा हूं। गुण मिलान की प्रक्रिया में आठ कूटों का मिलान किया जाता है जिसके कारण इसे अष्टकूट मिलान भी कहा जाता है तथा ये आठ कूट हैं, वर्ण, वश्य, तारा,योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी तथा इन सभी कूटों को वर तथा वधू की कुंडलियों से मिलाने के पश्चात अंक दिये जाते हैं तथा इन कूटों को दिये जाने वाले अधिकतम अंक क्रमश: 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 तथा आठ हैं जिसका अर्थ है कि वर्ण मिलान के लिए अधिकतम अंक 1 है तथा नाड़ी मिलान के लिए अधिकतम अंक 8 हैं। इन सभी कूटों में से अधिकतम अंक मिलने की स्थिति में कुल अंक 36 हो जाते हैं

Sunday, 11 December 2016

शनि का राशी परिबर्तन 2017 में आपकी राशि पर प्रभाव लिंक ओपन करे

गोचर मे शनि 26 जनवरी 2017 को लगभग 21:34 बजे वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश करेगा ।

वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश करने से मकर राशि के जातकों के लिए शनि की साढ़े साती प्रारम्भ हो जाएगी ।

वृश्चिक राशि वाले जातको के लिये यह अंतिम चरण की साढ़े साती होगी

तथा तुला राशि वाले जातक साढ़े साती से मुक्त हो जायेंगे।

शनि के धनु राशि मे आते ही कन्या राशि के जातको की लघु कल्याणि ढ्य्या आरम्भ होगी

तथा वृष राशि वाले जातको की अष्ठम शनि की ढ्य्या आरम्भ हो जायेगी।शनि को भय , रोग , कर्ज , दुख , दरिद्रता ,विपन्नता, असाध्य व लम्बे चलने वाले रोग , आयु , मृत्यु तथा बुढापे आदि का कारक ग्रह माना गया है ।

2017 वर्ष मे शनि का गोचर बहुत अस्थिर रहेने वाला है क्योकि यह कुछ समय के लिये वक्री हो कर पुनः वृश्चिक राशि मे आ जायेगा और दोबारा लगभग ऑक्तूबर तक मार्गी होकर धनु राशि मे प्रवेश करेगा ।

शनि का गोचर केवल चंद्र राशि से 3,6,11 भावो मे ही शुभ फल देता है इस प्रकार शनि के धनु राशि मे आने से कुम्भ ,वृष तथा तुला राशि के जातको को शुभ फल मिलने सम्भव है ।

शनि महाराज विभिन्न राशि वाले जातको को विभिन्न प्रकार के फल देंगे

:-मेष राशि-

मेष राशि वाले जातको को अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिये अन्यथा उन्हे स्वास्थ्य सम्बंधित समस्यायो का सामना करना पड सकता है । उच्च शिक्षा के क्षेत्र मे समस्याये आ सकती है अथवा जातक को कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है । आपको जीवन के किसी भी क्षेत्र मे मनचाही सफलता पाने के लिए अधिक परिश्रम और प्रयास करने पड सकते है । जातक को आर्थिक हानि सम्भव है ,उसके निर्णयो मे कमी होती है , मति भ्रम की स्थिति बनती है ‌तथा सरकार से भय रहता है । जातक की मित्रो से अनबन होती है, संतान से कष्ट सम्भव है सन्तान की तरफ से कष्ट प्राप्त होता है तथा भाग्य मे कमी आती है ।

वृष राशि ‌-

शनि के धनु राशि मे गोचर के कारण वृष राशि वाले जातको के लिये अष्टम शनि की ढैय्या आरम्भ हो जाएगी । शनि का यह गोचर विभिन्न प्रकार की कठिनाई लाता है। जातक को आर्थिक समस्यायो का सामना करना पड़ सकता है। स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याये उत्पन्न हो सकती है कोई लम्बी चलने वाली असाध्य बिमारी सम्भव है । यदि आप पहले से ही किसी रोग जैसे ह्रदय रोग आदि से पीडित है तो विशेषरूप से सावधान रहने की आवश्यकता है । जातक को यात्रायो मे साव्धानी बरतनी चाहिये । दुर्घटना आदि सम्भव हो सकती है अतः जातक को व्यर्थ की यात्राओ से बचना चाहिये । जातक की रुचि गूढ ज्ञान की तरफ हो सकती है । पारिवारिक सुख में कमी आती है व्यर्थ के मतभेद उत्पन्न हो सकते है भाग्य मे भी कमी होती है । नौकरी आदि के क्षेत्र मे कुछ समस्यायो के साथ प्रगती हो सकती है ।प्रेम सम्बंधो मे कमी होति है, संतान से वैचारिक मतभेद सम्भव है।जातक को चाहिये कि किसी भी प्रकार के महत्व्पूर्ण निर्ण्य इस समय मे नही ले ।

मिथुन राशि –

मिथुन राशि वाले जातको के लिये शनि का गोचर उनके जीवनसाथी के लिये स्वास्थ समस्याये ले कर आयेगा ।पति ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌पत्नि के बीच वैचारिक मतभेद भी सम्भव है । स्वय जातक को यात्राओ मे कष्ट होता है तथा शत्रुओ से समस्याये सम्भव है । जातक की कार्यक्षमता मे वृधि सम्भव है अतः किसी भी कार्य अथवा योजना को अत्यधिक उत्साह मे आ कर आरम्भ नही करे । यह समय जातक के कर्मो के फल मिलने का समय है अतः शुभ कर्म करे तथा धर्म व न्याय का साथ दे नही तो समाज मे बद्नामी सम्भव है । धन – सम्पत्ति ,जमीन- जायदाद आदि से सम्बंधित निर्ण्य सोच- समझ कर ले ।

कर्क राशि –

कर्क राशि के जातको के लिये शनि छटे भाव मे गोचर करेगा । चंद्र राशि से शनि का गोचर छटे भाव मे शुभ फल देने वाला कहा जाता है । जातक की आयु मे वृधि होती है । उसका गूढ ज्ञान एवम परा विढ्या मे भी रुचि बढती है । जातक की रुचि यात्राओ मे होती है । जातक के नौकरी से सम्बंधित कार्यो मे प्रगति होती है । पराक्रम मे वृधि होती है । वह अपने शत्रुओ पर विजय प्राप्त करता है ।

सिंह राशि ‌-

सिंह राशि वाले जातको के लिये शनि का गोचर उनके पंचम भाव मे होगा ।इस स्थिति मे जातक की बुधि भ्रमित रहती है , निर्णयो मे कमी आती है । धन का नाश होता है । जातक के परिवार से वैचारिक मतभेद हो सकते है । जातक के मित्रो और प्रियजनो को कष्ट होना सम्भव होता है । अपनी वाणी को संयम मे रखें तथा झूट बोलने से बचें । संतान सम्बंधित फैसले सोच- समझ कर लें । जातक व्यापार या विवाह से सम्बंधित कोइ महत्व्पूर्ण फैसला कर सकता है ।

कन्या राशि –

कन्या राशि वाले जातको के लिये शनि चतुर्थ भाव मे गोचर करेगा अर्थात कन्या राशि वालो की लघु कल्याणि ढैय्या आरम्भ हो जायेगी । यदि जातक का पहले से ही कोई पारिवारिक भूमि सम्पत्ति का मामला कोर्ट में चल रहा है तो उसके बढ़ने की सम्भावना है । जातक के शत्रुओ मे भी वृधि होती है । वाहन आदि सावधानी से चलायें अन्यथा दुर्घटना हो सकती है । साथ ही स्थान परिवर्तन और कार्य –व्यवसाय मे भी परिवर्तन हो सकता है । जातक को अपने स्वास्थ्य व अपनी माता के स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिये । आपको भूमि- सम्पत्ति से जुढे‌‌‌‌‌‌‌‌ फैसले सोच- समझ कर लेने चाहिये ।

तुला राशि ‌-

तुला राशि वाले जातको के लिये शनि का गोचर तीसरे भाव मे होगा ।चंद्र राशि से तीसरे भाव मे शनि का गोचर शुभ फल देने वाला होता है । परन्तु यदि आप सम्पत्ति बेचना चाहते है तो किसी प्रकार का फायदा नहीं होने की उम्मीद है । जातक को संतान की प्राप्ति होती है, विढ्या की प्राप्ति होती है , उसका भाग्य प्रबल होता है । जातक लम्बी दूरी की तथा कम दूरी की दोनों प्रकार की यात्राये तथा विदेश यात्राये करता है । जातक का अपने छोटे भाई – बहनों से लगाव बढ‌ जाता है । दूर-संचार के माध्यम से कोई शुभ सूचना प्राप्त होती है ।

वृश्चिक राशि ‌-

वृश्चिक राशि के जातकों के लिये शनि का गोचर धनु राशि मे द्वितिय भाव मे होगा । यह इनके लिये उतरती हुई साढ़े साती होगी । जातक के अपने छोटे भाई- बहनों से मतभेद रहेंगे तथा जातक अपने मित्रजनों व् प्रियजनो के साथ अन्याय करता है ।उसके अपने कुटुम्ब से वैचारिक मतभेद की स्थिति बनती है । जातक को धन संचय मे कठिनाई आती है । माता के स्वास्थय पर भी विपरीत प्रभाव देखने को मिलता है । इस समय जातक किसी प्रकार की कोई लम्बी investment नहीं करे तो अच्छा है । जातक को अनयास ही अपने कार्यों मे बाधायें व समस्यायें उत्पन्न हो जाती है । इस समय जातक को अपनी वाणी पर सयम रखना चाहिये

। धनु राशि –

धनु राशि वाले जातकों के लिये यह दूसरे चरण की साढ़े साती है । अग्नि तत्व होने के कारण इस राशि के जातकों को साढ़े साती ज्यादा परेशानी देने वाली होती है । इस समय जातक अपने काम में अत्यधिक व्यस्त होने के कारण परिवार से दूर हो जाता है ,जिस कारण कुटुम्ब को समय नही दे पाता । जीवनसाथी से अनबन होती है । जातक को कार्य के नये- नये अवसर प्राप्त होते हैं। जातक के स्वास्थ्य में कमी आती है तथा मानसिक चिंतायें बड़ जाती है । जातक को कार्य के सिलसिले मे यात्रायें करनी पड्ती है

। मकर राशि –

मकर राशि वाले जातकों के लिये यह प्रथम चरण की साढ़े साती होगी । यह शनि का ही लग्न है, परंतु चंद्र्मा से व्यय भाव में शनि का गोचर शुभ फल नही देता । जातक के रोग , शत्रु और ऋण आदि की स्थिति मे वृधि होती है । जातक के व्यय अधिक होते है और धन का संचय कम होता है । दुर्घटना की भी सम्भावना बनती है । जातक के पैरों मे चोट लग सकती है । भाग्य मे कमी आती है ,पिता को समस्यायें आती हैं । जातक को मानसिक कष्ट बड़ जाते है । व्यर्थ की लम्बी दूरी की यात्रायें करनी पड़्ती हैं ।

कुम्भ राशि-

कुम्भ राशि के जातकों के लिये शनि महाराज का गोचर एकादश भाव में हो रहा है जो आपके लिये लाभ की स्थिति बनाता है । जातक की किसी कार्य विशेष के लिये की गयी विदेश यात्रा शुभफलदायक होगी परंतु जातक के अपनी संतान से वैचारिक मतभेद हो सकते है । इस समय आप अपनी संतान के विषय में जो भी निर्ण्य लेंगे वह शुभ हो सकते हैं । विढ्यर्थियो के लिये लिये यह शुभ समय है । जातक को मान- सम्मान की प्राप्ति होती है । जातक को अचानक लाभ की सी स्थिति बनती है । आपकी रुचि गुप्त विढ्या की ओर हो सकती है तथा आपको पैतृक सम्पत्ति से भी लाभ प्राप्त होता है ।

मीन राशि-

मीन राशि के जातकों के लिये शनि का गोचर दशम भाव मे होगा जो जातक के कर्म मे परिवर्तन बताता है । यदि जातक कर्म /व्यवसाय से सम्बंधित विदेश यात्रायें करता है तो उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती है । आपका विदेश से सम्बंध बनता है । परंतु इस समय जातक को चहिये कि अपने पैसे कहीं ना फसायें अर्थात कोई investment ना करे । किसी प्रकार की भूमि – सम्पत्ति का क्रय –विक्रय नही करें । जातक के घर के सुखों मे कमी आती है ,माता व पिता के सुखों मे कमी आती है । जातक के पारिवारिक सम्बंधों मे भी कमी आती है । जीवनसाथी के स्वास्थय में कमी आती है अथवा उससे मतभेद की स्थिति बनती है ।

जब भी जीवन में शनि की दशा हो या शनि अगोच्रस्थ हो तो सुन्दर काण्ड का पाठ.हनुमान और शनि चालिसा का पाठ, दशरथ कृत शनि स्त्रोत्र का पाठ ,शनि मन्दिर मे पूजन दान,तिल, सरसो तेल से शिवलिगँ का अभिषेक , महामृत्युन्जय जप ,शनि के मँत्र का जप,माँ काली ,कालरात्री की पूजा,कुता , कोऑ, कबुतर, चीटीँ और गाय को नियमित भोजन दे ,श्री कृष्ण की पूजन , ,अमावस्या की पूजा की पूजा दान,छाता या जूते का दान करना इनमें से कोई भी उपाय नियमित रूप से करने

Pandit
bhubneshwar
Kasturwanagar parnkuti guna
Mo.9893946810