ज्योतिष समाधान

Monday, 14 November 2016

हिन्दू पर्बो पर तिथियों का निर्णय करने हेतु शास्त्रीय नियम क्या है

प्रश्नः हिंदू पर्वों के निर्णय हेतु कौन-कौन से शास्त्र प्रामाणिक हैं

निष्कर्ष यह है कि विद्यमान देश, काल और परिस्थिति में विषयान्तर्गत प्रामाणिकता की दृष्टि से सर्वधर्मशास्त्रों में ‘निर्णयसिंधु’ ही श्रेयस्कर है।

जन्माष्टमी पद्मपुराण-

उत्तराखंड श्रीकृष्णावतार की कथा में वर्णन मिलता है कि ‘‘दसवां महीना आने पर भादों मास की कृष्णा अष्टमी को आधी रात के समय श्री हरि का अवतार हुआ।’’

महाभारत खिलभाग हरिवंश-

विष्णु पर्व - 4/17 के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजित नामक मुहूत्र्त था, रोहिणी नक्षत्र का योग होने से अष्टमी की वह रात जयंती कहलाती थी और विजय नामक विशिष्ट मुहूत्र्त व्यतीत हो रहा था।’’

श्रीमद्भागवत- 10/3/1 के अनुसार

भाद्रमास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्द्ध रात्रि के समय भगवान् विष्णु माता देवकी के गर्भ से प्रकट हुए।

गर्ग संहिता गोलोकखंड-11/22-24 के अनुसार

‘‘भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण-योग, अष्टमी तिथि, आधी रात के समय, चंद्रोदय काल, वृषभ लग्न में माता देवकी के गर्भ से साक्षात् श्री हरि प्रकट हुए।’’

ब्रह्मवैवर्त पुराण- श्रीकृष्ण जन्मखंड-7 के अनुसार

आधी रात के समय रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग संपन्न हो गया था।

जब अर्ध चंद्रमा का उदय हुआ तब भगवान श्रीकृष्ण दिव्य रूप धारण करके माता देवकी के हृदय कमल के कोश से प्रकट हो गए।

ब्रह्मवैवर्त पुराण- श्रीकृष्ण जन्मखंड-8 के अनुसार

सप्तमी तिथि के दिन व्रती पुरुष को हविष्यान्न भोजन करके संयम पूर्वक रहना चाहिए।
सप्तमी की रात्रि व्यतीत होने पर अरुणोदय की बेला में उठकर व्रती पुरुष प्रातः कालिक कृत्य पूर्ण करने के अनंतर स्नानपूर्वक संकल्प करें। उस संकल्प में यह उद्देश्य रखना चाहिये कि आज मैं श्री कृष्ण प्रीति के लिये व्रत एवं उपवास करूंगा। मन्वादि तिथि प्राप्त होने पर स्नान और पूजन करने से वही फल कोटिगुना अधिक होता है। उस तिथि को जो पितरों के लिये जल मात्र अर्पण करता है, वह मानो लगातार सौ वर्षों तक पितरों की तृप्ति के लिये गया श्राद्ध का संपादन कर लेता है, इसमें संशय नहीं है।
<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<

अतएव स्पष्ट है कि सप्तमीयुक्त अष्टमी को त्याग देना चाहिए और अष्टमी युक्त नवमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतोपवास करना चाहिये।

<<<<<<<<<<<<<<<<<<<====<<<<<<<<
निर्णय सिंधु में रचनाकार
श्री कमलाकर भट्टजी ने
वन्ही पुराण,
गरुड़ पुराण,
स्कंद पुराण,
भविष्य पुराण,
ब्रह्म पुराण,
ब्रह्मांड पुराण,
ब्रह्मवैवर्त पुराण,
पद्मपुराण,
विष्णु धर्म,
वशिष्ठ संहिता,
कल्पतरू,
हेमाद्रि,
व्यास,
माधव,
मदन-रत्न,
निर्णयामृत,
अनन्तभट्ट,
गौड़,मैथिल आदि ग्रंथों का परस्पर विरोधी मतों ने उल्लेख किया है। यहां भी और अन्यत्र भी साधारणतः इस व्रत के विषय में दो मत विद्यमान हैं।

स्मात्र्त लोग अर्द्ध रात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी के दिन भी व्रतोपवास करते हैं।

लेकिन वैष्णवों को सप्तमी का किंचित मात्र भी स्पर्श मान्य नहीं।

उनके यहां सप्तमी का स्पर्श होने पर द्वितीय दिवस ही व्रतोत्सव हेतु मान्य है।

चाहे उस दिन अष्टमी क्षण मात्र के लिये ही क्यों न हो।

वल्लभाचार्य,
चैतन्यमहाप्रभु,
निम्बार्काचार्य और रामानंद सम्प्रदायी वैष्णव तो पूर्व दिन अर्द्ध रात्रि से कुछ पल भी सप्तमी अधिक हो, तो भी अष्टमी को उपवास न करके नवमी को ही उपवास करते हैं।

रामानुज संप्रदाय वाले नक्षत्र को ही प्रधानता देते हैं।
उनके यहां तिथि का कोई महत्व नहीं।

शिव रात्रि:

शिव पुराण-विद्येश्वरसंहिता खंड-10 में भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के प्रश्न के उत्तर में भगवान महेश्वर के आदेश विद्यमान हैं कि ‘‘मेरे दर्शन-पूजन के लिये चतुर्दशी तिथि निशीथ व्यापिनी अथवा प्रदोष व्यापिनी (अर्द्धरात्रि व्यापिनी अथवा संध्याकाल व्यापिनी) लेनी चाहिये; क्योंकि परवर्तिनी तिथि से संयुक्त चतुर्दशी की ही प्रशंसा की जाती है।’’

‘‘निशीथसंयुता या तु कृष्णपक्षे च चतुर्दशी। उपोष्या सा तिथिः सर्वेः शिवसायुज्यकारिका।।’’

-स्कन्दपुराण- माहेश्वरखंड-केदारखंड-33/92

‘‘कृष्ण पक्ष में चतुर्दशी अर्धरात्रि व्यापिनी हो, उसमें सबको उपवास करना चाहिये।
वह भगवान् शिव का सायुज्य प्रदान करने वाली है।’
’ स्कंद पुराण- नागर खंड-उत्तरार्द्ध-221 में पृष्ठांकित है

कि ‘‘माघ मास के कृष्ण पक्ष में जो चतुर्दशी तिथि आती है, उसकी रात्रि ही शिव रात्रि है।’’ यहां अमावास्यान्त मास की दृष्टि से माघ मास कहा गया है। जहां कृष्ण पक्ष में मास का आरंभ और पूर्णिमा पर उसकी समाप्ति होती है, उसके अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी में यह शिवरात्रि का व्रत होता है।

निर्णय सिंधु में उद्धृत नारद संहिता और ईशान संहिता का उदाहरण भी यही समझना चाहिए। लिंगपुराण में भगवान् शिव का स्पष्ट कथन है

कि फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावधान होकर कृत्तिवासेश्वर लिंग में जो महादेव की पूजा करते हैं; उनको मैं सदैव मुक्त और रोगरहित परमस्थान देता हूं। निष्कर्ष यह है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अर्द्धरात्रिव्यापिनी चतुर्दशी ही मान्य है।

उदाहरणार्थ

दीपावली: ‘‘

कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को यदि अमावस्या भी हो और उसमें स्वाती नक्षत्र का योग हो तो उसी दिन दीपावली होती है।’’

यह निर्णय स्कंद पुराण-वैष्णवखंड कार्तिक मास-माहात्म्य-

त्रयोदशी से लेकर दीपावली तक के उत्सव कृत्य का वर्णन’

पद्मपुराण- उत्तरखंड-124 के अनुसार

कार्तिक कृष्णाचतुर्दशी को रात्रि के आरंभ में भिन्न-भिन्न स्थानों पर मनोहर दीप लगाने चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि मंदिरों में, गुप्त गृहों में, देववृक्षों के नीचे, सभाभवन में, नदियों के किनारे, चहारदीवारी पर बगीचे में, बावली के तट पर, गली-कूचों में, गृहोद्यान में तथा एकान्त अश्वशालाओं में एवं गजशालाओं में भी दीप जलाने चाहिये।

इस प्रकार रात व्यतीत होने पर अमावस्या को प्रातःकाल स्नान करें और भक्तिपूर्वक देवताओं तथा पितरों का पूजन करें।

निर्णयसिंधु-द्वितीय परिच्छेद के अनुसार

दिवोदासीय में ब्रह्मपुराण का कथन है कि कात्र्तिक की क्षमावस्था युक्त चतुर्दशी को दीपदान करने से मनुष्य यममार्ग के अंधकार से छूट जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस दिन सूर्यास्त पश्चात एक घड़ी अधिक तक अमावस्या रहे उस दिन दीपावली मानी जानी चाहिये।

दोनों दिन सायंकाल में हो तो दूसरे दिन और केवल पहले दिन ही सायंकाल में अमावस्या हो तो पहले दिन दीपावली मानना उचित है।

इस उत्सव के साथ स्वाति नक्षत्र का योग हो जाय तो सोने पर सुहागा माना गया है।

दशहरा:

हेमाद्रौ व्रतकाण्डे कश्यपः ‘‘उदये दशमी किंचित्संपूर्णोकादशी यदि।
श्रवणक्र्षे यदा काले सा तिथिर्विजयार्भिदा।। श्रवणक्र्षे तु पूर्णयां काकुत्स्थ पास्थतो यतः। उल्लंघयेयुः सीमानं तद्दिनक्र्षे न तो नराः ।।’’

-निर्णयसिन्धु-द्वितीय परिच्छेद हेमाद्रि के व्रतकाण्ड में कश्यप ने लिखा है

कि यदि उदयकाल में दशमी किंचित मात्र भी हो और आगे संपूर्ण एकादशी हो तब यदि अपराह्न समय पर श्रवण नक्षत्र हो तो वह विजयादशमी कहलाती है

जिससे श्रवण नक्षत्र में दशमी के दिन श्रीरामचंद्रजी ने प्रस्थान किया है।

इससे मनुष्य उस दिन श्रवण नक्षत्र में ग्राम की सीमा को लंघन करें।

विजयादशमी के विषय में अधिसंख्य लोगों का यह निराधार विचार है कि यह उत्सव भगवान् श्रीरामचंद्र जी के लंका-विजय के उलक्ष्य में प्रारंभ हुआ है,

लेकिन वेद-पुराणों एवं अन्य हिंदू धर्मशास्त्रों में भी कहीं ऐसा उल्लेख नहीं मिलता।

इसलिये इसे लंका विजय का दिन मानना तो कल्पना मात्र ही है।

निर्णय सिंधु के उपरोक्त उल्लेख से यह सिद्ध होता है कि भगवान श्रीरामचंद्रजी ने इस दिन लंका-विजय के लिये प्रस्थान किया था।

अतएव वास्तव में यह दिन लंका-विजय के लिये प्रस्थान दिवस है। भगवान् श्री रामचंद्रजी द्वारा लंका-विजय भारत वर्ष का एक सबसे बड़ा पराक्रम माना जाता है।

क्योंकि उनकी यह यात्रा इसी दिन प्रारंभ हुई थी इसलिये सदा के लिये यह दिन भारतवासियों के लिये विजय मुहूत्र्त बन गया। यही इस दशहरा उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता है।

आश्विन के शुक्ल पक्ष में सूर्योदय के समय यदि दशमी तिथि हो तो उसे पंडित विजयादशमी कहते हैं।

यहां यह मुख्य अर्थ है कि अपराह्न में पूजा आदि के कथन से कर्म में अपराह्न मुख्य समय है और प्रदोष गौण है।

होली:

फाल्गुन की पूर्णिमा को होली कहते हैं।

यह संध्याव्यापिनी ग्रहण करनी चाहिए।
निर्णय सिंधु-द्वितीय परिच्छेद के अनुसार ब्रह्मवैवर्तपुराण, भविष्यपुराण, निर्णयामृत, ज्योतिर्निबंध, हेमाद्रि, मदनरत्न और नारद के अनुसार

फाल्गुन मास की पूर्णिमा प्रदोष व्यापिनी लेनी चाहि

रक्षा बंधन:

निर्णय सिंधु- द्वितीय परिच्छेद के अनुसार भविष्यपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, कल्पतरू, हेमाद्रि, मदनरत्न और निर्णयामृत में पृष्ठांकित है

कि अपराह्न व्यापिनी श्रावण पूर्णिमा को रक्षाबंधन नामक व्रतोत्सव मनाना चाहिये।

यही सिद्ध है। रक्षाबंधन भद्रा (द्वितीय, सप्तमी, द्वादशी) में नहीं मनाना चाहिये।

भैया दूज:

निर्णय सिंधु द्वितीय परिच्छेद के अनुसार भैया दूज का व्रतोत्सव अपराह्नव्यापिनी कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को मनाना चाहिये।

अपने कथन की पुष्टि में रचयिता ने

भविष्य पुराण,
स्कंद पुराण,
ब्रह्मांड पुराण,
हेमाद्रि,
निर्णयामृत आदि का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

धनतेरस:

निर्णयसिंधु-द्वितीय परिच्छेद में उल्लेख मिलता है कि निर्णयामृत में स्कंद पुराण का वाक्य है कि कार्तिक वदी (कृष्ण पक्ष) तेरस को घर से बाहर प्रदोष के समय यमदीपक जलाये तो अकालमृत्यु नष्ट होती है;

उसका मंत्र यह है कि

मृत्यु, पाश, दंड, काल, श्यामासहित यमराज त्रयोदशी के दीपदान से मेरे उपर प्रसन्न हों।

अतएव कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, प्रदोषव्यापिनी त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाना चाहिये।

यद्यपि धनतेरस का व्रतोत्सव मूलतः यमराज को प्रसन्न करने हेतु इस दिन संध्याकाल में एक दीपक जलाकर मुख्य द्वार पर रखा जाता है तथा इसी भांति दीपावली महोत्सव का श्रीगणेश किया जाता है तथापि इसका नामकरण आयुर्वेद के आदि प्रवत्र्तक महर्षि अथवा अधिदेवता भगवान धन्वतरि के जयंती के कारण ही हुआ ऐसा प्रतीत होता है।

वर्तमान में यह धनतेरस औषधि खाद्यान्न पकाने का पात्र खरीदने वाला त्योहार का स्वरूप धारण कर लिया है।

अन्य पर्वों के तिथि निर्णय:
पद्म पुराण-उत्तरखंड के अनुसार यदि अमावस्या अथवा पूर्णिमा साठ दंड की होकर दिन रात अविकल रूप से रहे और दूसरे दिन प्रतिपदा में भी उसका कुछ अंश चला गया हो तो वह ‘पक्षवर्धिनी’ मानी जाती है।

उस पक्ष की एकादशी का भी यही नाम है। वह दस हजार अश्वमेध यज्ञों के समान फल देने वाली होती है।

जब शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘पुनर्वसु’, नक्षत्र हो तो ‘जया’, जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘श्रवण ‘नक्षत्र’ हो तो ‘विजया’, जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘रोहिणी’ नक्षत्र हो तो ‘जयंती’, जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘पुष्य’ नक्षत्र हो तो ‘पापनाशिनी’ तिथि कहलाती हैं।

ये सभी व्रतोत्सव पापनाशिनी हैं। जब एक ही दिन-रात (सूर्योदय से सूर्योदय तक) एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी हो तो उसे ‘त्रिस्पृशा’ समझना चाहिये।

उसमें दशमी का योग नहीं होना चाहिये। किसी भी महीने या किसी भी पक्ष में आये, यह ‘त्रिस्पृशा’ व्रत चारों पुरुषार्थों को देने वाली है। सभी मास की सभी पक्षों के एकादशी व्रत उनके नामानुकूल तथा चारों पुरुषार्थ फल प्रदान करने वाले हैं। ध्यान रहे कि कोई भी एकादशी व्रत एकादशी व्रतों का विवरण निम्नांकित हैं। मास का नाम कृष्णपक्ष शुक्ल पक्ष 1. मार्ग शीर्ष उत्पत्ति एकादशी मोक्षदा एकादशी 2.. पौष सफला ’’ पुत्रदा ’’ 3. माघ षट्तिला ’’ जया ’’ 4. फाल्गुन विजया ’’ आमलकी ’’ 5. चैत्र पापमोचिनी ’’ कामदा ’’ 6. वैशाख वरुथिनी ’’ मोहिनी ’’ 7. ज्येष्ठ अपरा ’’ निर्जरा ’’ 8. आषाढ़ योगिनी ’’ शयिनी ’’ 9. श्रावण कामिका ’’ पुत्रदा ’’ 10. भाद्रपद अजा ’’ पद्मा ’’ 11. आश्विन इंदिरा ’’ पापांकुश ’’ 12. कार्तिक रमा ’’ प्रबोधिनी ’’ 13. पुरुषोत्तम कमला ’’ कामदा ’’ (अधिक मास) निर्णय सिंधु - द्वितीय परिच्छेद के अनुसार पुराणसमुच्चय में लिखी हैं कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन मत्स्य, वैशाख अमावस्या- कूर्म, श्रावण शुक्ल षष्ठी वाराह, वैशाख शुक्ल चतुर्दशी- नृसिंह, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी-वामन, वैशाख शुक्ल तृतीया-परशुराम, चैत्र शुक्ल नवमी-श्रीरामचंद्र जी, भाद्रपदकृष्ण अष्टमी - श्रीकृष्णजी, आश्विन शुक्ल दशमी-बुध और श्रावण शुक्ल षष्ठी-कल्की अवतार हुए/होंगे। वामन, परशुराम और श्रीरामचंद्रजी मध्याह्न, मत्स्य और वाराह-अपराह्न, कूर्म, नरसिंह, बुध और कल्की-संध्याकाल तथा श्रीकृष्णचंद्रजी अर्द्ध रात्रि के समय अवतरित हुए।

सामान्यतः उपरोक्त पर्वों के जन्मकाल व्यापिनी तिथि को ही मनाया जाता है।

यही विधि का विधान है और यही तिथि निर्णय।

देवउठनी ग्यारस ११नबम्बर २०१६को ही क्यों

देवउठनी (देवुत्थान )एकादशी
= ११/११/२०१६ 

पारण के दिन द्वादशी सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी 
============================

एकादशी तिथि प्रारम्भ = १०/नवम्बर/२०१६ को ११:२१ बजे एकादशी

तिथि समाप्त = ११/नवम्बर/२०१६ को ०९:१२ बजे

==========================

(१)एकादशी प्रबोधिनी एकादशी को देव उठनी एकादशी और देवुत्थान एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

(२)एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं।

(३)एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है।

(४)एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है।

(५)यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है।

(६)द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

(७)एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

(८)जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है।

(९)व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।

(१०)व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

(११)कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए।

(१२)कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है।

(१२)जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए।

(१३)दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं।

(१४)सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए।

(१५)जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।.
============================
----------( एकादशी निर्णय कैसे करे)---------
============================
धर्मसिंधु के अनुसार एकादशी दो प्रकार की होती हैं, पहली विद्धा और दूसरी शुद्धा. यदि एकादशी तिथि दशमी तिथि से युक्त हो तो वह विद्धा एकादशी कही जाती है. यदि सूर्योदय के समय एकादशी तिथि द्वादशी तिथि से युक्त होती है तब वह शुद्धा एकादशी कही जाती है. सामान्य जन साधारण को शुद्धा एकादशी का व्रत रखना ही पुण्यदायक माना गया है.
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
एकादशी को हरिवासर कहा गया है।
भविष्यपुराण का वचन है—
शुक्ले वा यदि वा कृष्णे विष्णुपूजनतत्परः।
एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ॥

अर्थात्, विष्णुपूजा परायण होकर दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की ही एकादशी में उपवास करना चाहिये। लिङ्गपुराण में तो और भी स्पष्ट कहा है—
गृहस्थो ब्रह्मचारी च आहिताग्निस्तथैव च। एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥

अर्थात्, गृहस्थ, ब्रह्मचारी, सात्त्विकी किसी को भी एकादशी [दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण)] के दिन भोजन नहीं करना चाहिये। अब प्रश्न उठता है कि एकादशी व्रत का निर्धारण कैसे हो?

((((वशिष्ठस्मृति के अनुसार दशमी विद्धा एकादशी संताननाशक होता है और विष्णुलोकगमन में बाधक हो जाता है।)))
यथा— "
दशम्येकादशी यत्र तत्र नोपवसद्बुध:।
अपत्यानि विनश्यन्ति विष्णुलोकं न गच्छति॥

अतः यह परमावश्यक है कि एकादशी दशमीविद्धा (पूर्वविद्धा) न हो। हाँ द्वादशीविद्धा (परविद्धा) तो हो ही सकती है

क्योंकि

‘पूर्वविद्धातिथिस्त्यागो वैष्णवस्य हि लक्षणम्’
(नारदपाञ्चरात्र)।
लेकिन वेध-निर्णय का सिद्धान्त भी सर्वसम्मत नहीं है। निम्बार्क सम्प्रदाय में स्पर्शवेध प्रमुख है।उनके अनुसार यदि सूर्योदय में एकादशी हो परन्तु पूर्वरात्रि में दशमी यदि आधी रात को अतिक्रमण करे अर्थात् दशमी यदि सूर्योदयोपरान्त ४५ घटी से १ पल भी अधिक हो तो एकादशी त्याग कर महाद्वादशी का व्रत अवश्य करे।
सभी लोगोंको दशमीरहित एकादशी तिथि व्रतमें ग्रहण करनी चाहिये ।
(((दशमीयुक्त एकादशी तीन जन्मोंके कमाये हुए पुण्यका नाश कर देती है । ))))
यदि एकादशी द्वादशीमें एक कला भी प्रतीत हो और सम्पूर्ण दिन द्वादशी हो और द्वादशी भी त्रयोदशीमें मिली हुई हो तो दूसरे दिनकी तिथि ( द्वादशी ) हो उत्तम मानी गयी है ।
हिन्दू धर्म मे कार्त‌िक महीने की शुक्लपक्ष की एकादशी का बड़ा ही महत्व है।
कहते है इस एकादशी के द‌िन व्रत पूजा करने वाले के कई जन्मों के पाप कट जाते है और व्यक्त‌ि उत्तम लोक मे जाने का अध‌िकारी बन जाता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु का इस दिन किया गया पूजन शुभ, सिद्धिदायक और सौभाग्य मे वृद्धि करने वाला होता है। इसल‌िए परलोक मे उत्तम गत‌ि की इच्छा रखने वाले इस द‌िन भगवान व‌िष्‍णु के ल‌िए व्रत रखते है। इस एकादशी को लेकर ऐसी मान्यता भी है क‌ि इसद‌िन देवतागण भी भगवान व‌िष्‍णु के पास पहुंचकर उनके दर्शन का लाभ पाते है और व्रत पूजन करते है। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु चार महिनों की नींद से जागते है। इसे देवोत्थापनी या देवउठनी एकादशी भी कहते है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व है। (((धार्मिक मान्यता है कि असुर मधुकेटव भगवान ब्रह्मा जी से युद्ध लड़ने चल देता है। बृह्मा जी सहित सभी देवता परेशान हो जाते है और वे क्षीर सागर मे सो रहे भगवान विष्णु की स्तुति करते है। भगवान विष्णु कार्तिक माह की शुक्ल एकादशी को जागते है और जिसके बाद वे असुर का अंत करते है।))))

इस मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान को जगाएं : ‘

उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्‌ सुप्तं भवेदिदम्‌॥’ ‘उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव। गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥’ ‘शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।’

इस बार देवप्रबोधिनी एकादशी का पर्व 11 नवंबर,2016 (शुक्रवार) को है।
हिंदू शास्त्रो के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी को पूजा-पाठ, व्रत-उपवास किया जाता है। इस तिथि को रात्रि जागरण भी किया जाता है। देवप्रबोधिनी एकादशी पर भगवान विष्णु को धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, गंध, चंदन, फल और अध्र्य आदि अर्पित करे। भगवान की पूजा करके घंटा, शंख, मृदंग आदि वाद्य यंत्रो के साथ निम्न मंत्रो का जाप करे-

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्।। उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे। हिरण्याक्षप्राणघातिन् त्रैलोक्ये मंगलं कुरु।।
इसके बाद भगवान की आरती करे
>>>>>>>>>>-->-->-->>>>>>>>>>>>>
अषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानि देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी के बीच की अवधि को चातुर्मास कहा गया है।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
निर्णय सिन्धू की मानें तो एकादशी के अगले दिन यानि द्वादशी के दिन तुलसी विवाह करना चाहिए और इस द्वादशी को सुधा द्वादशी कहा जाता है।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
बर्ष भर में आने वाली एकादशीयो के नाम
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>

१】कामदा एकादशी             चैत्र शुक्ल पक्ष
२】वरूथिनी एकादशी    वैशाख कृष्ण पक्ष
३】मोहिनी एकादशी        वैशाख शुक्ल पक्ष
४】अपरा एकादशी             ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष
५】निर्जला एकादशी           ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष
६】योगिनी एकादशी        आषाढ़ कृष्ण पक्ष
७】देवशयनी एकादशी    आषाढ़ शुक्ल पक्ष
८】कामिका एकादशी       श्रावण कृष्ण पक्ष
९】पुत्रदा एकादशी          श्रावण शुक्ल पक्ष
१०】अजा एकादशी।    भाद्रपद कृष्ण पक्ष
११】परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष
१२】इंदिरा एकादशी       आश्विन कृष्ण पक्ष
१३】पापांकुशा एकादशी आश्विन शुक्ल पक्ष
१४】रमा एकादशी         कार्तिक कृष्ण पक्ष
१५】देव प्रबोधिनी एकादशी कार्तिक शुक्ल
१६】उत्पन्ना एकादशी    मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष
१७】मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष
१८】सफला एकादशी।       पौष कृष्ण पक्ष
१९】पुत्रदा एकादशी            पौष शुक्ल पक्ष
२०】षटतिला एकादशी।      माघ कृष्ण पक्ष
२१】जया एकादशी              माघ शुक्ल पक्ष
२२】विजया एकादशी।   फाल्गुन कृष्ण पक्ष
२३】आमलकी एकादशी फाल्गुन शुक्ल पक्ष
२४】पापमोचिनी एकादशी चैत्र कृष्ण पक्ष
२५】पद्मिनी एकादशी अधिकमास शुक्ल
२६】परमा एकादशी अधिकमास कृष्ण

पंडित
भुबनेश्वर
कस्तूरवनगर पर्णकुटी
९८९३९४६८१०