ज्योतिष समाधान

Saturday, 27 August 2016

प्रविश नगर कीजे सब काजा । ह्रदय राखी कोशल पुर राजा।।

कौशल प्रदेश, जिसकी स्थापना वैवस्वत मनु ने की थी, पवित्र सरयू नदी के तट पर स्थित है। सुन्दर एवं समृद्ध अयोध्या नगरी इस प्रदेश की राजधानी है। वैवस्वत मनु के वंश में अनेक शूरवीर, पराक्रमी, प्रतिभाशाली तथा यशस्वी राजा हुये जिनमें से राजा दशरथ भी एक थे। राजा दशरथ वेदों के मर्मज्ञ, धर्मप्राण, दयालु, रणकुशल, और प्रजापालक थे। उनके राज्य में प्रजा कष्टरहित, सत्यनिष्ठ एवं ईश्‍वरभक्‍त थी। उनके राज्य में किसी का किसी के भी प्रति द्वेषभाव का सर्वथा अभाव था।

जबआचार्य रावण के यजमान बने श्री राम

शिवलिंग स्थापना के लिए श्रीराम के आग्रह पर रावण बना आचार्य, आचार्य ने यजमान को दिया था विजय का आशीर्वाद प्रभु श्रीराम और रावण से जुड़ा एक प्रसंग सुनाने जा रहे हैं जो महर्षि कंब द्वारा लिखी रामायण में है. यह कथा बाल्मीकि रामायण या रामचरितमानस में नहीं है. सत्य क्या-असत्य क्या, प्रभु की लीला तो प्रभु ही जानें. हम तो बस आपके सामने दक्षिण भारत का एक प्रचलित प्रसंग रख रहे हैं. रावण केवल शिवभक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं ज्योतिष का भी प्रकांड विद्वान था. उसे भविष्य का पता था औऱ वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए संभव ही नहीं. लंका विजय के लिए श्रीराम ने शिवलिंग स्थापना की निर्णय लिया लेकिन संकट यह आया कि विधिपूर्वक शिवलिंग पूजन के लिए आचार्य कहां से आएं. रावण से बेहतर शिवभक्त और कर्मकंडी कोई नजर नहीं आता था. श्रीराम ने हृदय की विशालता का परिचय देते हुए रावण को ही आचार्य बनाने का निर्णय किया. आचार्य को निमंत्रण देकर बुलाया जाता है लेकिन श्रीराम स्वयं नहीं जा सकते थे क्योंकि वह राजा थे. राजा युद्ध से पूर्व स्वयं नहीं जा सकता. फिर श्रीराम का प्रतिनिधि बनाकर किसे भेजा जाए. हनुमानजी लंका जला आए हैं, अंगद भी रावण का अपमान कर आए हैं. सबसे समझदार और वयोवृद्ध जामवंतजी को इसके लिए चुना गया. जामवंतजी रावण को आचार्यत्व का निमंत्रण देने लंका गए. जामवन्त जी विशालकाय आकार के थे. आकार में वह कुम्भकर्ण से तनिक से ही ही छोटे थे. पहले हनुमान, फिर अंगद और अब जामवन्त. यह समाचार लंका में मन की गति से फैला. जामवंतजी के आकार भय से सब राक्षस अपनी जगह छुप गए. जामवंतजी निर्विघ्न रावण के राजदरबार के द्वार तक पहुंच गए. रावण स्वयं उनकी अगवानी करने बाहर आया. रावण को अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्तजी ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं श्रीराम का दूत बनकर आया हूं. उन्होंने तुम्हें सादर अभिवादन भेजा है. रावण ने जामवंतजी से कहा- आप हमारे पितामह के भाई हैं. इस नाते आप हमारे पूज्य हैं. आप कृपया आसन ग्रहण करें. जामवन्तजी ने आसन ग्रहण किया और बोले वनवासी श्रीराम ने तुम्हें प्रणाम कहा है. सागर पर सेतु बांध लेने के बाद अब महेश्वर लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं. इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचार्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है. मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूं. रावण मुस्कुराने लगा फिर पूछा- क्या राम द्वारा महेश्वर-लिंग-विग्रह स्थापना लंकाविजय की कामना से किया जा रहा है? जामवंतजी ने हामी भरी. वहां मौजूद प्रहस्त आंखे तरेरते हुए गुर्राया– राम अत्यंत धूर्त और निर्लज्ज है. लंकेश्वर ऐसा प्रस्ताव स्वीकार नहीं करेंगे. लंकेश ने प्रहस्त को चुप कराया. उसने कहा-जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना और आचार्य बनने योग्य जाना है. क्या रावण महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार करके मूर्ख नाम से जाना जाए. जब वनवासी राम ने इतना बड़े आचार्य पद पर पदस्थ होने हेतु आमंत्रित किया है तब वह भी यजमान पद हेतु उचित अधिकारी है भी अथवा नहीं इसकी मुझे भी जांच करनी होगी. जामवंतजी यदि हम आपको यहां बंदी बना लें और आपको लौटने न दें तो आप क्या करेंगे? जामवंत खुलकर हंसे और बोले- लंका के समस्त दानवों में इतनी शक्ति नहीं कि वे मिलकर भी मुझे बंदी बना लें. मुझे अपनी शक्ति का परिचय कराने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता. तुम्हें बता दूं कि मैं अभी एक ऐसे उपकरण के साथ यहां विद्यमान हूं, जिसके माध्यम से धनुर्धारी लक्ष्मण यह दृश्यवार्ता स्पष्ट रूप से देख-सुन रहे हैं. जब मैं वहां से चलने लगा था तभी धनुर्वीर लक्ष्मण ने आचमन करके अपने त्रोण से पाशुपतास्त्र निकालकर संधान कर लिया है. उन्होंने मुझसे कहा है कि रावण से कह देना कि यदि किसी ने भी मेरा विरोध करने या उद्दंडता की चेष्टा की तो यह पाशुपतास्त्र समस्त दानव कुल के संहार का संकल्प लेकर तुरन्त छूट जाएगा. आप मुझे अविलम्ब उत्तर देकर शीघ्र प्रस्थान की व्यवस्था करें ताकि लक्ष्मणजी मुझे देखकर निश्चिंत हों. उपस्थित दानव भयभीत हो गए. प्रहस्थ पसीने से लथपथ हो गया. लंकेश भी कांप उठा. पाशुपतास्त्र महेश्वर का अमोघ अस्त्र है.सृष्टि में एक साथ दो धनुर्धर प्रयोग ही नहीं कर सकते. भले ही मेघनाद के पास भी पाशुपतास्त्र है लेकिन जब लक्ष्मण ने उसे संधान स्थिति में ला ही दिया है, तब स्वयं भगवान शिव भी उसे उठा नहीं सकते. उसका तो कोई प्रतिकार है ही नहीं. रावण यह सोचकर बेचैन हो गया. उसने जामवंतजी से कहा-आप अपने शिविर को लौटें. मैं आचार्यत्व स्वीकार करता हूं. जामवंत को विदा कर लंकेश ने सेवकों को शिवलिंग स्थापना के लिए आवश्यक सामग्री जमा करने का आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचा. पूजन का विधान है कि जो सामग्री यजमान नहीं जुटा सकता उसकी व्यवस्था आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है. अशोक वाटिका पहुंचकर रावण ने सीताजी से कहा-राम लंका विजय की कामना से समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है. यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का होता है. तुम जानती हो कि अर्द्धांगिनी बिना गृहस्थ के अनुष्ठान अधूरे रहते हैं. विमान आ रहा है, उसपर बैठ जाना. ध्यान रहे कि तुम वहां भी रावण के अधीन ही रहोगी. अनुष्ठान समापन के बाद यहां आने के लिए विमान में पुनः बैठ जाना. स्वामी ने जिसे आचार्य स्वीकारा है वह स्वयं का भी आचार्य हुआ यह समझते हुए जानकीजी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया. रावण ने भी सौभाग्यवती भव कहते हुए आशीर्वाद देकर आचार्य का दायित्व निभाया. सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरा. उसने सीताजी को कहा कि जब आदेश मिले तब आना. सीताजी को विमान में ही छोड़कर स्वयं श्रीराम के सम्मुख पहुंचा. श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे. सम्मुख होते ही वनवासी श्रीराम ने आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया. आचार्य ने आशीर्वाद दिया- दीर्घायु भव! लंकाविजयी भव! दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्दों ने सबको चौंका दिया. फिर रावण ने सुग्रीव और विभीषण की ऐसी उपेक्षा कर दी जैसे वे उसके लिए अस्तित्व ही नहीं रखते. भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा- यजमान! अर्द्धांगिनी कहाँ है? उन्हें यथास्थान आसन दें. श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्य आचार्य अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान पूर्ण करा सकते हैं. रावण ने कहा- अवश्य किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं. यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था. तुम सन्यासी भी नहीं हो और पत्नीरहित वानप्रस्थ का तुमने व्रत नहीं लिया है. इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान कैसे हो? श्रीराम ने पूछा- कोई उपाय आचार्य? रावण ने कहा-अनुष्ठान के उपरांत आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण वापस ले जाते हैं. यदि स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर के पास पुष्पक विमान में यजमान की पत्नी विराजमान हैं. श्रीराम ने हाथ जोड़कर मौनभाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया. श्रीराम का आदेश पाते ही विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीताजी के साथ लौटे. रावण ने सीताजी से कहा- अर्द्ध यजमान के बगल में बैठो अर्द्ध यजमान. आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया.गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा लिंग विग्रह कहां हैं? श्रीराम ने कहा उसे लेने हनुमानजी रात्रि के प्रथम प्रहर से कैलाश गए हुए हैं. अभी तक लौटे नहीं हैं. आते ही होंगे. आचार्य ने आदेश दे दिया विलम्ब नहीं किया जा सकता. उत्तम मुहूर्त बीत रहा है. इसलिए अविलम्ब यजमान की पत्नी बालुका-लिंग विग्रह स्वयं बना लें. सीताजी ने आचार्य के निर्देश पर बालुका लिंग विग्रह बनाया. श्रीसीताराम ने वही महेश्वर लिंगविग्रह स्थापित किया. आचार्य ने पूर्ण विधि-विधान से अनुष्ठान सम्पन्न कराया. दक्षिणा की बारी आई तो विभीषण आदि चिंतित हुए कि कहीं रावण दक्षिणा में श्रीराम से अयोध्या लौटने को न कह दे. भगवान श्रीराम ने पूछा- आचार्य आपकी दक्षिणा? आचार्य के शब्दों ने फिर से सबको चौंका दिया- घबराओ नहीं यजमान. जो स्वयं स्वर्ण से बनी नगरी का स्वामी है उसे एक वनवासी यजमान क्या संपत्ति दक्षिणा में दे सकता है. श्रीराम ने कहा- अपने आचार्य कि जो भी मांग हो मैं उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता हूं.रावण ने मांगा- जब आचार्य मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे. मैं यही दक्षिणा मांगता हूं. श्रीराम ने कहा- ऐसा ही होगा आचार्य. यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी. यह दृश्य वार्ता देख-सुनकर सभी उपस्थित जन समुदाय के नेत्र भर गए. सभी ने एक साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया. रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञकार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, वह राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है? रावण शापित होकर पृथ्वी पर आया था और उसे मुक्ति नारायण के हाथों ही हो सकती थी. पाप का दंड मिलना ही है चाहे आप कितने भी विचारवान और ज्ञानी क्यों न हो. इसलिए रावण जैसा पापी लंका का स्वामी तो हो सकता है देवलोक का नहीं. देवलोक के लिए देवत्व चाहिए. अधर्म बलवान हो सकता लेकिन उसका बल एक न एक दिन धराशाई होता ही जिस प्रकार रावण जैसे त्रिलोकविजयी का हुआ. (रामेश्वरम में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी. बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है पर तमिल भाषा में लिखी महर्षि कम्बन की ‘इरामावतारम्’ में यह कथा

Friday, 26 August 2016

=====पितृ दोष निवारण स्त्रोत्र====

पितृ दोष निवारण स्तोत्र पितृ दोष निवारण विधि अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् । नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।। इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा । सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।। मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा । तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि ।। नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा। द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।। देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्। अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि:।। प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च । योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।। नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु । स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।। सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा । नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।। अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् । अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।। ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:। जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।। तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:। नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज

पितृ सूक्त का पाठ करैयेगा पितृ दोष से मुक्त

पितृ-सूक्तम्॥
उदिताम् अवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुम् यऽ ईयुर-वृका ॠतज्ञास्ते नो ऽवन्तु पितरो हवेषु॥1॥
अंगिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वनो भृगवः सोम्यासः।
तेषां वयम् सुमतो यज्ञियानाम् अपि भद्रे सौमनसे स्याम्॥2॥
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।
तेभिर यमः सरराणो हवीष्य उशन्न उशद्भिः प्रतिकामम् अत्तु॥3॥
त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठम् अनु नेषि पंथाम्।
तव प्रणीती पितरो न देवेषु रत्नम् अभजन्त धीराः॥4॥
त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः।
वन्वन् अवातः परिधीन् ऽरपोर्णु वीरेभिः अश्वैः मघवा भवा नः॥5॥
त्वं सोम पितृभिः संविदानो ऽनु द्यावा-पृथिवीऽ आ ततन्थ।
तस्मै तऽ इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥6॥
बर्हिषदः पितरः ऊत्य-र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्।
तऽ आगत अवसा शन्तमे नाथा नः शंयोर ऽरपो दधात॥7॥
आहं पितृन्त् सुविदत्रान् ऽअवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वः तऽ इहागमिष्ठाः॥8॥
उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।
तऽ आ गमन्तु तऽ इह श्रुवन्तु अधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥9॥
आ यन्तु नः पितरः सोम्यासो ऽग्निष्वात्ताः पथिभि-र्देवयानैः।
अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तो ऽधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥10॥
अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सु-प्रणीतयः।
अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्य-था रयिम् सर्व-वीरं दधातन॥11॥
येऽ अग्निष्वात्ता येऽ अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।
तेभ्यः स्वराड-सुनीतिम् एताम् यथा-वशं तन्वं कल्पयाति॥12॥
अग्निष्वात्तान् ॠतुमतो हवामहे नाराशं-से सोमपीथं यऽ आशुः।
ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥13॥
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्य इमम् यज्ञम् अभि गृणीत विश्वे।
मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरूषता कराम॥14॥
आसीनासोऽ अरूणीनाम् उपस्थे रयिम् धत्त दाशुषे मर्त्याय।
पुत्रेभ्यः पितरः तस्य वस्वः प्रयच्छत तऽ इह ऊर्जम् दधात॥15॥

आप के पितृ आप से नाराज है तो उन्हें खुस करने का उपाय

अमावस्या को घर में एक छोटा सा हवन
तथापितरों के निमित्त श्राद्ध अवश्य करें
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हर अमावस्या को घर में एक छोटा सा आहुति प्रयोग करें।
सामग्री :
१. काले तिल,
२. जौं,
३. चावल,
४. गाय का घी,
५. चंदन पाउडर,
६. गुगल,
७. गुड़,
८. देशी कपूर, गौ चंदन या कण्डा।
विधि:
गौ चंदन या कण्डे को किसी बर्तन में डालकर हवनकुंड बना लें,
फिर उपरोक्त ८ वस्तुओं के मिश्रण से तैयार सामग्री से, घर के सभी सदस्य एकत्रित होकर नीचे दिये गये देवताओं की १-१ आहुति दें।
आहुति मन्त्र:
१. ॐ कुल देवताभ्यो नमः
२. ॐ ग्राम देवताभ्यो नमः
३. ॐ ग्रह देवताभ्यो नमः
४. ॐ लक्ष्मीपति देवताभ्यो नमः ५. ॐ विघ्नविनाशक देवताभ्यो नमः

हर अमावस्या को पितरों के निमित्त श्राद्ध अवश्य करें हर अमावस्या को अपने पितरों का श्राद्ध भी अवश्य करना चाहियें अगर कोई श्राद्ध करने में असमर्थ है तो उसको कम से तिल मिश्रित जल तो अपने पितरों के निमित्त अर्पण करना ही चाहिये।

वराह पुराण के १३ अध्याय (पितरों का परिचय, श्राद्ध के समय का निरूपण तथा पितृगीत) में आता है कि श्राद्धकर्ता जिस समय श्राद्धयोग्य पदार्थ या किसी विशिष्ट ब्राह्मण को घर में आया जाने अथवा उत्तरायण या दक्षिणायन का आरम्भ, व्यतीपात योग हो, उस समय श्राद्ध का अनुष्ठान करे।

विषुव योग में, सूर्य और चन्द्र ग्रहण के समय,
सूर्य के राश्यन्तर-प्रवेश में नक्षत्र अथवा ग्रहों द्वारा पीडित होने पर,
बुरे स्वप्न दिखने पर तथा घर में नवीन अन्न आने पर काम्य-श्राद्ध करना चाहिये।

जो अमावस्या अनुराधा, विशाखा एवं स्वाती नक्षत्र से युक्त हो, उसमें श्राद्ध करने से पितृगण आठ वर्षों तक तृप्त रहते हैं।

इसी प्रकार जो अमावस्या पुष्य, पुनर्वसु या आर्द्रा नक्षत्र से युक्त हो, उसमें पूजित होने से पितृगण बारह वर्षों तक तृप्त रहते हैं।

जो पुरुष देवताओं एवं पितृगण को तृप्त करना चाह्ते हैं उनके लिये धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद अथवा शतभिषा नक्षत्र से युक्त अमावस्या अत्यन्त दुर्लभ हैं। ब्राह्मण श्रेष्ठ! जब अमावस्या इन नौ नक्षत्रों से युक्त होती है, उस समय किया हुआ श्राद्पितृगण को अक्षय तृप्तिकारक होता हैं।

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी, भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की त्रियोदशी, माघमास की अमावस्या, चन्द्र या सूर्य ग्रहण के समय तथा चारों अष्टकाओं (प्रत्येक मास की सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी तिथियों के समूह की तथा पौष, माघ एवं फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथीयों को "अष्टका" की संज्ञा हैं) में अथवा उत्तरायण य दक्षिणायन के समय जो मनुष्य एकाग्रचित से पितरों को तिलमिश्रित जल भी दान कर देता है तो वह मानों सहस्त्र वर्षों के लिये श्राद्ध कर देता हैं।

यह परम रहस्य स्वयं पितृगणों का बताया हुआ हैं। कदाचित्त माघ मास की अमावस्या का यदि शतभिषा नक्षत्र से योग हो जाय तो पितृगण की तृप्ति के लिये यह परम उत्कृष्ट काल होता हैं।

द्विजवर! अल्प पुण्यवान पुरुषों को ऐसा समय नही मिलता और यदि माघ मास की अमावस्या का धनिष्ठा नक्षत्र से योग हो जाये तो उस समय अपने कुल में उत्पन्न पुरुष द्वारा दिये हुए अन्न एवं जल से पितृगण दस हजार वर्ष के लिये तृप्त हो जाते है तथा यदि माघी अमावस्या के साथ पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का योग हो और उस समय पितरों के लिये श्राद्ध किया जाय तो इस कर्म से पितृगण अत्यन्त तृप्त होकर पूरे युग तक सुख पूर्वक शयन करते है। गंगा, शतद्रु, विपाशा, सरस्वती और नैमिषारण्य में स्थित गोमती नही में स्नानकर पितरों का आदरपूर्वक तर्पण करने से मनुष्य अपने समस्त पापों को नष्ट कर देता है।

पितृगण सर्वदा य गान करते हैं कि वर्षाकाल में (भाद्रपद शुक्ल त्रियोदशी के) मघा नक्षत्र में तृप्त होकर फिर माघ की अमावस्या को अपने पुत्र-पौत्रादि द्वारा दी गयी पुण्य तीर्थों की जलांजली से हम कब तृप्त होंगें।
विशुद्ध चित्त, शुद्ध धन, प्रशस्त काल, उपर्युक्त विधि, योग्य पात्र और परम भक्ति - ये सब मनुष्य को मनोवान्छित फल प्रदान करते हैं।
पंडित =भुबनेश्वर
कस्तुरवानगर पर्णकुटी
ऐ बी रोड गुना
09893946810

श्राद्ध कैसे करे और किनका श्राद्ध कब करे=====

पितृ पक्ष का हिन्दू धर्म तथा हिन्दू संस्कृति में बड़ा महत्व है। श्रद्धापूर्वक पित्तरों के लिये किया गया कर्म श्राद्ध कहलाता है।
शास्त्रों के अनुसार जो पित्तरों के नाम पर श्राद्ध तथा पिण्डदान नहीं करता है वह हिन्दु नहीं माना जा सकता है।
हिन्दु शास्त्रों के अनुसार मृत्यु होने पर जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाती है तथा ऊँची उठकर पितृलोक में पहुँचती है इन मृतात्मओं को शक्ति प्रदान करने के लिये, उन्हें मोक्ष प्रदान करवाने के लिए उन्हें तृप्त, संतुष्ट करने के लिए तर्पण ,पिण्डदान और श्राद्ध किया जाता है।

पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का भाव ही श्राद्ध है। वैसे तो हर अमावस्या और पूर्णिमा को, पितरों के लिये श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। लेकिन आश्विन शुक्ल पक्ष के 15 दिन, श्राद्ध के लिये विशेष माने गये हैं। इन 15 दिनों में अगर पितृ प्रसन्न रहते हैं, तो फिर, जीवन में, किसी चीज़ की कमी नहीं रहती। कई बार, ग़लत तरीके से किये गये श्राद्ध से, पितृ नाराज़ होकर शाप दे देते हैं। इसलिये श्राद्ध में इन 54 बातों का खास ध्यान रखना चाहिये। श्राद्ध की मुख्य प्रक्रिया -तर्पण में दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल से पितरों को तृप्त किया जाता है। -ब्राह्णणों को भोजन और पिण्ड दान से, पितरों को भोजन दिया जाता है। -वस्त्रदान से पितरों तक वस्त्र पहुंचाया जाता है। -यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है। श्राद्ध का फल, दक्षिणा देने पर ही मिलता है। श्राद्ध के लिये कौन सा पहर श्रेष्ठ? -
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श्राद्ध के लिये दोपहर का कुतुप और रौहिण मुहूर्त श्रेष्ठ है। -
कुतुप मुहूर्त दोपहर 11:36AM से 12:24PM तक। -
रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:24PM से दिन में 1:15PM तक। -
कुतप काल में किये गये दान का अक्षय फल मिलता है। -
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पूर्वजों का तर्पण, हर पूर्णिमा और अमावस्या पर करें। श्राद्ध में जल से तर्पण ज़रूरी क्यों? -श्राद्ध के 15 दिनों में, कम से कम जल से तर्पण ज़रूर करें। -चंद्रलोक के ऊपर और सूर्यलोक के पास पितृलोक होने से, वहां पानी की कमी है। -जल के तर्पण से, पितरों की प्यास बुझती है वरना पितृ प्यासे रहते हैं। श्राद्ध के लिये योग्य कौन? -पिता का श्राद्ध पुत्र करता है। पुत्र के न होने पर, पत्नी को श्राद्ध करना चाहिये। -पत्नी न होने पर, सगा भाई श्राद्ध कर सकता है। -एक से ज्य़ादा पुत्र होने पर, बड़े पुत्र को श्राद्ध करना चाहिये। श्राद्ध कब न करें? - कभी भी रात में श्राद्ध न करें, क्योंकि रात्रि राक्षसी का समय है। - दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं किया जाता है। श्राद्ध का भोजन कैसा हो? -जौ, मटर और सरसों का उपयोग श्रेष्ठ है। -ज़्य़ादा पकवान पितरों की पसंद के होने चाहिये। -गंगाजल, दूध, शहद, कुश और तिल सबसे ज्यादा ज़रूरी है। -तिल ज़्यादा होने से उसका फल अक्षय होता है। -तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। श्राद्ध के भोजन में क्या न पकायें? -चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा -कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी -बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी -खराब अन्न, फल और मेवे ब्राह्णणों का आसन कैसा हो? -रेशमी, ऊनी, लकड़ी, कुश जैसे आसन पर भी बिठायें। -लोहे के आसन पर ब्राह्मणों को कभी न बिठायें। ब्राह्णण भोजन का बर्तन कैसा हो? -सोने, चांदी, कांसे और तांबे के बर्तन भोजन के लिये सर्वोत्तम हैं। -चांदी के बर्तन में तर्पण करने से राक्षसों का नाश होता है। -पितृ, चांदी के बर्तन से किये तर्पण से तृप्त होते हैं। -चांदी के बर्तन में भोजन कराने से पुण्य अक्षय होता है। -श्राद्ध और तर्पण में लोहे और स्टील के बर्तन का प्रयोग न करें। -केले के पत्ते पर श्राद्ध का भोजन नहीं कराना चाहिये। ब्राह्णणों को भोजन कैसे करायें? -श्राद्ध तिथि पर भोजन के लिये, ब्राह्मणों को पहले से आमंत्रित करें। -दक्षिण दिशा में बिठायें, क्योंकि दक्षिण में पितरों का वास होता है। -हाथ में जल, अक्षत, फूल और तिल लेकर संकल्प करायें। -कुत्ते,गाय,कौए,चींटी और देवता को भोजन कराने के बाद, ब्राह्मणों को भोजन करायें। -भोजन दोनों हाथों से परोसें, एक हाथ से परोसा भोजन, राक्षस छीन लेते हैं। -बिना ब्राह्मण भोज के, पितृ भोजन नहीं करते और शाप देकर लौट जाते हैं। -ब्राह्मणों को तिलक लगाकर कपड़े, अनाज और दक्षिणा देकर आशीर्वाद लें। -भोजन कराने के बाद, ब्राह्मणों को द्वार तक छोड़ें। -ब्राह्मणों के साथ पितरों की भी विदाई होती हैं। -ब्राह्मण भोजन के बाद , स्वयं और रिश्तेदारों को भोजन करायें। -श्राद्ध में कोई भिक्षा मांगे, तो आदर से उसे भोजन करायें। -बहन, दामाद, और भानजे को भोजन कराये बिना, पितर भोजन नहीं करते। -कुत्ते और कौए का भोजन, कुत्ते और कौए को ही खिलायें। -देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। कहां श्राद्ध करना चाहिये? -दूसरे के घर रहकर श्राद्ध न करें। मज़बूरी हो तो किराया देकर निवास करें। -वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ और मंदिर दूसरे की भूमि नहीं इसलिये यहां श्राद्ध करें। -श्राद्ध में कुशा के प्रयोग से, श्राद्ध राक्षसों की दृष्टि से बच जाता है। -तुलसी चढ़ाकर पिंड की पूजा करने से पितृ प्रलयकाल तक प्रसन्न रहते हैं। -तुलसी चढ़ाने से पितृ, गरूड़ पर सवार होकर विष्णु लोक चले जाते हैं।
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1】 अश्विन कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा से
श्राद्ध पक्ष शुरू माना जाता है हालाँकि कुछ लोग इसके अगले दिन से भी श्राद्ध पक्ष मानते है । इस पूर्णिमा को प्रोष्ठपदी पूर्णिमा कहा जाता हैं।

२】मान्यताओं के अनुसार जिस भी व्यक्ति की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन होती हैं उनका श्राद्ध पूर्ण श्रद्धा से इसी दिन किया जाना चाहिए ।

३】पूर्णिमा के बाद की पहली तिथि अर्थात प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध पुराणो के अनुसार नाना-नानी और ननिहाल पक्ष के पितरों का श्राद्ध करने के लिए सबसे उत्तम माना गया है।

४】अगर नाना पक्ष के कुल में कोई न हो और आपको मृत्यु तिथी ज्ञात ना हो तो भी इस दिन ननिहाल पक्ष के लोगो का श्राद्ध करना चाहिए ।

५】श्राद्ध का दूसरा दिन अर्थात द्वितीय तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है,जिन लोगो की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की द्वितीय तिथि के दिन हुई हो , उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है।

६】श्राद्ध के तीसरे दिन अर्थात तृतीय तिथि को उन व्यक्तियों का श्राद्ध किया जाता है जिन लोगो की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की तृतीय तिथि को होती है। इस दिन को महाभरणी भी कहते हैं। भरणी श्राद्ध का बहुत ही महत्व है । भरणी श्राद्ध गया श्राद्ध के तुल्य माना जाता है क्योंकि भरणी नक्षत्र का स्वामी मृत्यु के देवता यमराज होते है। इसलिए इस दिन के श्राद्ध का महत्व पुराणों में अधिक मिलता है।

७】श्राद्ध के चौथे दिन अर्थात चतुर्थी तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है, जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन होती है ।

८】श्राद्ध का पाँचवा दिन अर्थात पंचमी तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है, जिनकी मृत्यु विवाह से पूर्व ही हो गयी हो।
इसीलिए इसे कुंवारा श्राद्ध भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की पँचमी तिथि के दिन होती है उनका भी श्राद्ध इसी दिन किया जाता है ।

९】श्राद्ध के छठे दिन अर्थात षष्ठी तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन हुई हो । इसे छठ श्राद्ध भी कहा जाता हैं।

१०】श्राद्ध के सातवें दिन अर्थात सप्तमी तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन हुई हो ।

११】श्राद्ध के आठवें दिन अर्थात अष्टमी तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन हुई हो ।

१२】श्राद्ध के नवें दिन अर्थात नवमी तिथि को उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन हुई हो । इस दिन को बुढ़िया नवमी या मातृ नवमी भी कहते हैं। इस दिन माता का श्राद्ध किया जाता है। सुहागिनों का श्राद्ध भी नवमी को ही करना चाहिए । इस दिन दादी या परिवार की किसी अन्य महिलाओं का श्राद्ध भी किया जाता है।

१४】श्राद्ध के दसवें दिन अर्थात दशमी तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के दिन हुई हो ।

१५】श्राद्ध के ग्यारवहें दिन अर्थात एकादशी तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन हुई हो । इस दिन परिवार के वह पूर्वज जो सन्यास ले चुके हो उनका श्राद्ध भी किया जाता है । इसे ग्यारस या एकदशी का श्राद्ध भी कहते है ।

१६】श्राद्ध के बारहवें दिन अर्थात द्वादशी तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन हुई हो । इस दिन परिवार के वह पूर्वज जो सन्यास ले चुके हो उनका श्राद्ध करने का सबसे उत्तम दिन माना जाता है ।

१७】श्राद्ध के तेरहवें दिन अर्थात त्रयोदशी तिथि के दिन उन व्यक्तियों का श्राद्ध कर्म किया जाता है जिन व्यक्तियों की मृत्यु शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन हुई हो ।यदि परिवार में किसी भी बच्चे का आकस्मिक देहांत हुआ हो तो उसका श्राद्ध भी इसी दिन किया जाता है ।

१८】श्राद्ध के चौदहवें दिन अर्थात चतुर्दशी तिथि में शास्त्रों के अनुसार जिन व्यक्तियों की अकाल-मृत्यु (दुर्घटना, हत्या, सर्पदंश, आत्महत्या आदि) हुई हो या जिनकी मृत्यु अस्त्र-शास्त्र के लगने से हुई हो ऐसे पितरों का श्राद्ध किया जाता है । इसे घात चतुर्दशी भी कहा जाता हैं।

१९】अमावस्या तिथि में श्राद्ध करने से सभी पितृ शांत होते है। यदि श्राद्ध पक्ष में किसी का श्राद्ध करने से आप चूक गए हों, अथवा गलती से भूल गए हों तो इस दिन श्राद्ध किया जा सकता है। अमावस्या तिथि में पुण्य आत्मा प्राप्त करने वाले पूर्वजों की आत्मा के लिए श्राद्ध भी इसी तिथि में किया जाता है। यदि हमें अपने किसी परिजन की मृत्यु तिथि का ज्ञान नहीं है तो उनका श्राद्ध भी इसी दिन किया जा सकता है ।

२०】इस अमावस्या को सर्व पितृ विसर्जनी अमावस्या अथवा सर्व पितृ दोष अमावस्या अथवा महालया के नाम से भी जाना जाता है। अश्विन की अमावस्या पितरों के लिए उत्सव का दिन कहलाता है ।
पंडित =भुबनेश्वर
कस्तूरवांगर पर्णकुटी
ऐ बी रोड गुना
09893946810

=========मन्त्र साधना=========

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=======जप करने की विधियाँ =======
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वैदिक मन्त्र का जप करने की चार विधियाँ
1. वैखरी
2. मध्यमा
3. पष्चरी
4. परा
शुरू शुरू में उच्च स्वर से जो जप किया जाता है, उसे वैखरी मन्त्र जप कहते हैं।

दूसरी है, मध्यमा। इसमें होंठ भी नहीं हिलते एवं दूसरा कोई व्यक्ति मन्त्र को सुन भी नहीं सकता।

तीसरी, पष्यन्ती। जिस जप में जिव्हा भी नहीं हिलती, हृदयपूर्वक जप होता एवं जप के अर्थ में हमारा चित्त तल्लीन होता जाता है उसे पष्यन्ती मन्त्र जप कहते हैं।

चैथी है परा। मन्त्र के अर्थ में हमारी वृत्ति स्थिर होने की तैयारी हो, मन्त्र जप करते-करते आनन्द आने लगे एवं बुद्धि परमात्मा में स्थिर होने लगे, उसे परा मन्त्र जप कहते हैं।

वैखरी जप है तो अच्छा लेकिन वैखरी से भी दसगुना ज्यादा प्रभाव मध्यमा में होता बैखरी उसे कहते हैं जो व्यक्त हो जाय। नाम का इस प्रकार उच्चारण हो कि आप सुनेँ और बाहर कोई बैठा हो तो उसे भी सुनायी पड़े।
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मन्त्र-जप, देव-पूजन तथा उपासना के संबंध में प्रयुक्त होने वाले कतिपय विषिष्ट षब्दों का अर्थ नीचे लिखे अनेसार समझना चाहिए।

1. पंचोपचार- गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, तथा नैवेद्य द्वारा पूजन करने को “पंचोपचार“ कहते हैं

2. पंचामृत- दूध, दही, घृत, मधु(षहद) तथा षक्कर इनके मिश्रण को “पंचामृत“ कहते हैं।

3. पंचगव्य- गाय के दूध, घृत, मूत्र तथा गोबर इन्हें सम्मिलित रूप में “पंचगव्य“ कहते है।

4. षोडषोपचार- आव्हान, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, अलंकार, सुगन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, ताम्बुल, तथा दक्षिणा इन सबके द्वारा पूजन करने की विधि को “षोडषोपचार“ कहते है।

5. दषोपचार- पाद्य, अध्र्य, आचमनीय, मधुपक्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, तथा, नैवेद्य द्वारा पूजन करने की विधि को “दषोपचार“ कहते है।

6. त्रिधातु- सोना, चाँदी, लोहा। कुछ आचार्य सोना, चांदी और तांबे के मिश्रण को भी त्रिधातु कहते हैं।

7. पंचधातु-
सोना,
चाँदी,
लोहा,
तांबा,
और जस्ता।

8. अष्टधातु-
सोना,
चांदी,
लोहा,
तांबा,
जस्ता,
रांगा,
कांसा और पारा।

9. नैवेद्य-खीर, मिष्ठान आदि मीठी वस्तुएँ।
10. नवग्रह- सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरू, षुक्र, षनि, राहु और केतु।
11. नवरत्न- माणिक्य, मोती, मूंगा, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद, और वैदूर्य।
12. अष्टगन्ध- 1. अगर, तगर, गोरोचन, केसर, कस्तूरी, ष्वेत चन्दन लाल चन्दन और सिन्दूर
(देव पूजन हेतु)।
2. अगर लालचन्दन, हल्दी, कुंकुम, गोरोचन, जटामांसी, षिलाजीत और कपूर (देवी पूजन हेतु)।
13. गन्धत्रय- सिन्दूर, हल्दी, कुंकुम।
14. पड्चांग- किसी वनस्पति के पुष्प, पत्र, फल, छाल, और जड़।
15. दषांष- दसवा भाग।
16. सम्पुट- मिट्टी के दो षकोरों को एक- दूसरे के मुँह से मिला कर बन्द करना।
17. भोजपत्र- एक वृक्ष की छाल (यह पंसारियो के यहाँ मिलती है)
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18. मन्त्र धारण-

किसी भी मन्त्र को स्त्री पुरूष दोनों ही कण्ठ में धारण कर सकते हैं, परन्तु यदि भुजा में धारण करना चाहे तो पुरूष को अपनी दायीं भुजा में और स्त्री को बायीं भुजा में धारण करना चाहिए।

19. ताबीज- यह तांबे के बने हुए बाजार में बहुतायत से मिलते हैं। ये गोल तथा चपटे दो आकारों में मिलते हैं। सोना, चांदी, त्रिधातु तथा अष्टधातु आदि के ताबीज सुनारों से कहकर बनवाये जा सकते हैं।

20. मुद्राएँ- हाथों की अंगुलियों को किसी विषेष स्थिति में लाने की क्रिया को “मुद्रा“ कहा जाता है। मुद्राएं अनेक प्रकार की होती हैं।

21. स्नान-यह दो प्रकार का होता है। बाह्य तथा आन्तरिक, बाह्य स्नान जल से तथा आन्तरिक स्नान मन्त्र जप द्वारा किया जाता है।

22. तर्पण- नदी, सरोवर आदि के जल में घुटनों तक पानी में खड़े होकर, हाथ की अड्जलि द्वारा जल गिराने की क्रिया को “तर्पण“ कहा जाता है। जहाँ नदी, सरोवर आदि न हो, वहाँ किसी पात्र में पानी भरकर भी “तर्पण“ की क्रिया सम्पन्न कर ली जाती है।

23. आचमन- हाथ में जल लेकर उसे अपने मुँह में डालने की क्रिया को “आचमन“ कहते है।

24. करन्यास- अंगूठा, अंगुली, करतल तथा करपृष्ठ पर मन्त्र जपने को “करन्यास“ कहा जाता है।

25. हृदययविन्यास- हृदय आदि अंगों को स्पर्ष करते हुए मन्त्रोच्चारण को “हृदयाविन्यास“ कहते हैं।

26. अंगन्यास- हृंदय, षिर, षिखा, कवच, नेत्र, एवं करतल- इन छः अंगो से मन्त्र का न्यास करने की क्रिया को “अंगन्यास“ कहते है।

27. अध्र्य- षंख, अंजलि आदि द्वारा जल छोड़ने को अध्र्य देना कहा जाता है। घड़ा या कलष में पानी भरकर रखने को अध्र्य-स्थापन कहते है। अध्र्यपात्र में दूध, तिल, कुषा के टुकड़े, सरसौं, जौ, पुष्प, चावल एवं कुंकुम इन सबको डाला जाता है।

28. पंचायतन पूजा- पंचायतन पूजा में पाँच देवताओं-विष्णु, गणेष, सूर्य, षक्ति तथा षिव का पूजन किया जाता है।

29. काण्डानुसमय- एक देवता के पूजाकाण्ड को समाप्त कर, अन्य देवता की पूजा करने का “कण्डानुसमय“ कहते हैं।

30. उद्वर्तन- उबटन।
31. अभिषेक- मन्त्रोच्चारण करते हुए षंख से सुगन्धित जल छोड़ने को अभिषेक कहते हैं।

32. उत्तरीय- वस्त्र।
33. उपवीत- यज्ञोपवीत (जनेऊ)।
34. समिधा- जिन लकडि़यों में अग्नि प्रज्ज्वलित कर होम किया जाता है, उन्हें समिधा कहते हैं। समिधा के लिए आक, पलाष, खदिर, अपामार्ग, पीपल, उदुम्बर, षमी, कुषा तथा आम की लकडि़यों को ग्राह्य माना गया है।

35. प्रणव- ऊँ।
36. मन्त्र ऋषि- जिस व्यक्ति ने सर्वप्रथम षिवजी के मुख से मन्त्र सुनकर उसे विधिवत् सिद्ध किया था, वह उस मन्त्र का ऋषि कहलाता है। उस ऋषि को मन्त्र का आदि गुरू मानकर श्रद्धपूर्वक उसका मस्तक में न्यास किया जाता है।
37. छन्द- मन्त्र को सर्वतोभावेन आच्छादित करने की विधि को “छन्द“ कहते है। यह अक्षरों अथवा पदों से बनता है। मन्त्र का उच्चारण चूंकि मुख से होता है अतः छनद का मुख से न्यास किया जाता है।

38. देवता- जीवमात्र के समस्त क्रिया-कलापों को प्रेरित, संचालित एवं नियंत्रित करने वाली प्राणषक्ति को देवता कहते हैं। यह षक्ति व्यक्ति के हृदय में स्थित होती है, अतः देवता का न्यास हृदय में किया जाता है।

39. बीज- मन्त्र षक्ति को उद्भावित करने वाले तत्व को बीज कहते हैं। इसका न्यास गुह्यागं में किया जाता है।

40. षक्ति- जिसकी सहायता से बीज मन्त्र बन जाता है, वह तत्व षक्ति कहलाता है। उसका न्यास पाद स्थान में करते है।

41. विनियोग- मन्त्र को फल की दिषा का निर्देष देना विनियोग कहलाता है।

42. उपांषु जप- जिह्ना एवं होठ को हिलाते हुए केवल स्वयं को सुनायी पड़ने योग्य मन्त्रोच्चारण को उपांषु जप कहते हैं।

43. मानस जप- मन्त्र, मन्त्रार्थ एवं देवता में मन लगाकर म नही मन मन्त्र का उच्चारण करने को मानस जप कहते हैं।

44. अग्नि की जिह्नाएँ- अग्नि की 7 जिह्नएँ मानी गयी हैं।
उसके नाम है-
1. हिरण्या,
2. गगना,
3. रक्ता,
4. कृष्णा,
5. सुप्रभा,
6. बहुरूपा एवं
7. अतिरिक्ता।
कतिपय आचार्याें ने अग्नि की सप्त जिह्नाओं के नाम इस प्रकार बताये हैं-
1. काली,
2. कराली,
3. मनोभवा,
4. सुलोहिता,
5. धूम्रवर्णा,
6. स्फुलिंगिनी तथा
7. विष्वरूचि।
45. प्रदिक्षणा- देवता को साष्टांग दण्डवत् करने के पष्चात इष्टदेव की परिक्रमा करने को प्रदक्षिणा कहते हैं।
विष्णु, षिव, षक्ति, गणेष और सूर्य आदि देवताओं की 4, 1, 2, 1, 3 अथवा 7 परिक्रमाएँ करनी चाहिए।
46. साधना- साधना 5 प्रकार की होती है-
1. अभाविनी,
2. त्रासी
3. दोर्वोधी
4. सौतकी तथा
5. आतुरो।
1) अभाविनी- पूजा के साधना तथा उपकरणों के अभाव से, मन से अथवा जलमात्र से जो पूजा साधना की जाती है, उसे अभाविनी कहते हैं।

(2) जो त्रस्त व्यक्ति तत्काल अथवा उपलब्ध उपचारों से या मानसापचारों से पूजन करता है, उसे त्रासी कहते हैं, यह साधना समस्त सिद्धियाँ देती है।

(3) बालक, वृद्ध, स्त्री, मूर्ख अथवा ज्ञानी व्यक्ति द्वारा बिना जानकारी के की जानी वाली पूजा दाबांधी कही जाती है।

(4) सूत की व्यक्ति मानसिक सन्ध्या करा कामना होने पर मानसिक पूजन तथा निष्काम होने पर सब कार्य करें। ऐसी साधना को भौतिकी कहा जाता है।

(5) रोगी व्यक्ति स्नान एवं पूजन न करें। देव मूर्ति अथवा सूर्यमण्डल की ओर देखकर, एक बार मूल मन्त्र का जप कर उस पर पुष्प चढ़ायें। फिर रोग की समाप्ति पर स्नान करके गुरू तथा ब्राम्हणों की पूजा करके पूजा विच्छेद का दोष मुझे न लगें- ऐसी प्रार्थना करके विधि पूर्वक इष्ट देव का पूजन करे तो इस साधना को आतुर कहा जाएगा।