ज्योतिष समाधान

Friday, 25 July 2025

शिव प्रार्थना

भस्म अंग, मर्दन अनंग, संतत असंग हर।
सीस गंग, गिरिजा अर्धंग भुजंगबर।।

मुंडमाल , बिधु बाल भाल, डमरू कपालु कर।
बिबुधबृंद-नवककुमुद-चंद, सुखकंद सूलधर।

 त्रिपुरारि त्रिलेाचन, दिग्बसन, बिषभोजन, भवभयहरन।
कह तुलसिदासु सेवत सुलभ सिव सिव संकर सरन।।

(150)

गरल -असन दिगबसन ब्यसन भंजन जनरंजन।
कुंद-इंदु-कर्पूर-गौर सच्चिदानंदघन।।

बिकटबेष, उर सेष , सीस सुरसरित सहज सुचि।
सिव अकाम अभिरामधाम नित रामनाम रूचि।ं

कंदर्प दुर्गम दमन उमारमन गुन भवन हर।
त्रिपुरारि! त्रिलोचन! त्रिगुनपर! त्रिपुरमथन! जय त्रिदसबर।।

Thursday, 24 July 2025

सोने का जनेऊ कैसे पहने

#कलियुग_में_कार्पासनिर्मित_(कपास)जनेऊ की प्राधान्यता ->> सत्युग में पद्मनालतन्तु निर्मित , त्रेतायुग में सुवर्णनिर्मित द्वापर में रजतनिर्मित और कलियुग में कार्पासनिर्मित जनेऊ की ही प्रधानता हैं -

कृते पद्ममयं सूत्रं त्रेतायां कनकोद्भवम्। 
             द्वापरे रजतं प्रोक्तं कलौ कार्पास निर्मितम्।।

मन्वपि - कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्वंवृतं त्रिवृत्।।

कार्पास निर्मित के अभाव में - अतसी , वृक्ष की छाल , गाय के बाल , शण  आदि यथासम्भव प्राप्त हो उनकी धारण करना उचित हैं --

देवलः - 
कार्पासक्षौमगोबालशाणवल्कतृणादिकम्।
                  यथा संभवतो धार्यमुवीतं द्विजातिभिः।।

युगान्तर विषयक स्वर्णमय जनेऊ का प्राधान्य त्रेतायुग में था , उस समय स्वयं देवशिल्प विश्वकर्मा का भी धरातल आनाजाना रहता था और अन्य रसविद्या के आचार्यो भी विद्यमान थे ।  आजकल जो स्वर्णमय जनेऊ की तरह अलङ्कार धारण करते हैं वह मात्र जनेऊ की तरह शरीर की शोभामात्र बढाने का अलङ्कार हैं । क्योंकि जिस प्रकार जनेऊ का निर्माण की पद्धति शास्त्र में कही हैं उस प्रकार से स्वर्ण जनेऊ निर्माण करना सम्भव नहीं हैं । 

व्रात्य अनुपनीत आदि से जनेऊ लेना और दक्षिणा के बहाने खरीदना भी निषिद्ध कहा हैं  इस प्रकार जनेऊ निर्माण किसने किया उसपर विचार मननीय हैं -->

चतुर्वर्गचिंतामणि प्रा०खण्ड ब्रह्माण्डपुराण 
अनध्याये तु यत्सूत्रं 
       यत्सूत्रं रण्डया कृतम्। 
यत्सूत्रं दारुसम्भृतं --------------
       #क्रीतं यद्ब्रह्मसूत्रकम् । 
व्रात्यादिभिस्तथा दत्तं 
        तत्सूत्रं परिवर्जयेत्। 
#एतदुर्मार्गवर्त्तिभ्यः_प्रतिगृह्य_द्विजातयः #यद्यत्_कर्म_तदा_कुर्युस्तद्भवति_निष्फलम्।।

अन्यच्च देवलः -
विधवा रचितं सूत्रमनध्यायकृतं च यत्। 
              विच्छिन्नं #चाप्यधोयातं #भुक्त्वा निर्मितमुत्सृजेत्" इति।।

उक्त प्रमाण से क्रीत जनेऊ या अनुपनीत व्रात्य आदि से ग्रहण किया हुआ किसी भी प्रकार के जनेऊ से जो जो भी कर्म किये जाएगे वह सभी निष्फल होते हैं, बिना उपवास किये निर्मित जनेऊ त्यागने योग्य हैं।

बिना उचित यथा कलिप्रधान कार्पासनिर्मित जनेऊ न पहनने में  यज्ञोपवीत त्याग , यज्ञोपवीत रहीते भोजन,  पान , मूत्र पुरीष  सम्भाषण आदि करना भी  दोष हैं, इसलिये स्वर्णसूत्र को नित्य धारण करना हैं तो  कार्पास निर्मित जनेऊ का त्याग नहीं करना चाहिये , कार्पास के जनेऊ के साथ ही स्वर्णालङ्कार का जनेऊ धारण कर सकते हैं नहीं तो पुनरुपनयन भी होना अनिवार्य हैं।   
          कितनेक पुष्टिमार्गीय वैष्णवाचार्यो आज भी कार्पास के जनेऊ को नित्यनिरन्तर धारण करते हुए ही स्वर्णमय-जनेऊ धारण करते हैं।।
                       

Monday, 21 July 2025

शिव जी की आरती

हे भोलेनाथ तेरी आरती गाऊं,

आरती गाऊं तुम्हें चित्त में बसाऊं,
हे गौरीशंकर तेरी आरती गाऊं,
हे शिवशंकर तेरी आरती गाऊं,
हे भोलेनाथ तेरी आरती गाऊं ।

भगीरथी जब धरा पे आये,
जटा में भोले की वेग समाये,
जनहितकारी पे बलि बलि जाऊं,
हे भोलेनाथ तेरी आरती गाऊं ॥

हलाहल से सबको बचाते,
नीलकण्ठ तब आप कहाते,
उमापति के दर्शन पाऊं,
हे भोलेनाथ तेरी आरती गाऊं ॥

सरल हृदय, करुणा के सागर,
खाली ना रहती किसी की गागर,
कृपा की कुछ बूंदें पा जाऊं,
हे भोलेनाथ तेरी आरती गाऊं ॥

महादेव प्रभु, हो त्रिपुरारी,
भक्तों के हो भोले तुम भयहारी,
हर हर शम्भो कहके तुमको रिझाऊं,
हे भोलेनाथ तेरी आरती गाऊं ॥

पूजा, जप, तप, योग ना जानूं,
महादेव को अपना मानूं,
श्रद्धा सुमन चरणों में चढ़ाऊं,
हे भोलेनाथ तेरी आरती गाऊं ॥

हे भोलेनाथ तेरी आरती गाऊं,
आरती गाऊं तुम्हें चित्त में बसाऊं,
हे गौरीशंकर तेरी आरती गाऊं,
हे शिवशंकर तेरी आरती गाऊं.......

अशुभ पेड़

केलेका पेड़ घरमें नहीं लगाना चाहिए!!! अवश्य पढ़ें!!
#प्रमाण—
1 बदरी कदली चैव दाडिमी बीजपूरिका।
प्ररोहन्ति गृहे यत्र तद्गृहं न प्ररोहति॥
(#समरांगणसूत्रधार-38/131)
#अर्थ— बेर, केला, अनार तथा नींबू जिस घरमें उगते हैं, उस घरकी वृद्धि नहीं होती।

*2 अश्वत्थं च कदम्बं च कदलीबीजपूरकम्।
*गृहे यस्य प्ररोहन्ति स गृही न प्ररोहति॥
      (#बृहद्दैवज्ञ० 87/9)

*#अर्थ—* पीपल, कदम्ब, केला, बीजू नींबू-ये जिस घरमें होते हैं, उसमें रहनेवालेकी वंशवृद्धि नहीं होती।

*3 मालतीं मल्लिकां मोचां चिञ्चां श्वेतां पराजिताम्।
*वास्तुन्यां रोपयेद्यस्तु स शस्त्रेण निहन्यते॥
(#वास्तुसौख्यम्- 39)

*#अर्थ—* मालती, मल्लिका, मोचा (केला/कपास), इमली, श्वेता (विष्णुक्रान्ता) और अपराजिताको जो वास्तुभूमिपर लगाता है, वह शस्त्रसे मारा जाता है।

*#तुलसी—* घरके भीतर लगायी हुई तुलसी मनुष्यों के लिये कल्याणकारिणी, धन-पुत्र प्रदान करनेवाली, पुण्यदायिनी तथा हरिभक्ति देनेवाली होती है। 

प्रात:काल तुलसीका दर्शन करनेसे सुवर्ण-दानका फल प्राप्त होता है।
(#ब्रह्मवैवर्तपुराण,कृष्ण०-103/62)

अपने घरसे दक्षिणकी ओर तुलसीवृक्षका रोपण नहीं करना चाहिये, अन्यथा यम-यातना भोगनी पड़ती है।    
         (#भविष्यपुराण म० 1)

*#गृह_समीपमें_निषिद्ध_वृक्ष—

घरके पास काँटेवाले, दूधवाले तथा फलवाले वृक्ष स्त्री
और सन्तानकी हानि करनेवाले हैं। 

यदि इन्हें काटा न जा सके
तो इनके पास शुभ वृक्ष लगा दें।

काँटेवाले वृक्ष शत्रुसे भय देनेवाले
दूधवाले वृक्ष धनका नाश करनेवाले और 
फलवाले वृक्ष सन्तानका नाश करनेवाले होते हैं। 

इनकी लकड़ीको भी घरमें नहीं लगानी चाहिये—

*आसन्ना: कण्टकिनो रिपुभयदाः क्षीरिणोऽर्थनाशाय।
*फलिनः प्रजाक्षयकरा दारूण्यपि वर्जयेदेषाम् ।।
         (#बृहत्संहिता-53/86)

पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेरा, पीपल, अगस्त्य, बेर, निर्गुंडी, इमली, कदंब, केला, नींबू, अनार, खजूर, बेल आदि वृक्ष घरके पास अशुभ हैं।

*#गृहसमीपस्थ_शुभवृक्ष—

अशोक, पुन्नाग, मौलसिरी, शमी, चंपा, अर्जुन, कटहल, केतकी, चमेली, पाटल, नारियल, नागकेसर, अड़हुल, महुआ, वट, सेमल, बकुल, शाल, आदि वृक्ष घरके पास शुभ हैं।

*#घरसे_दिशा_विशेषमें_वृक्षोंके_शुभाशुभ_फल—*

*#पूर्वमें—* पीपल भय तथा निर्धनता देता है ,
परंतु बरगद कामना पूर्ति करता है।

*#आग्नेयमें—* वट, पीपल, सेमल, पाकर तथा गूलर पीड़ा और मृत्यु देने वाले हैं।
 परंतु अनार शुभम् है ।

*#दक्षिणमें—* पाकर रोग तथा पराजय देने वाला है और आम, कैद, अगस्त्य तथा निर्गुंडी धन नाश करने वाले हैं।
 परंतु गूलर शुभ है।

 *#नैर्ऋत्यमें—* इमली शुभ है।

*#दक्षिण_नैर्ऋत्यमें—* जामुन और कदम्ब शुभ हैं।

*#पश्चिममें—* वट होनेसे राजपीड़ा, स्त्रीनाश व कुलनाश होता है, और आम, कैथ, अगस्त्य तथा निर्गुंडी धननाशक हैं। 
परंतु पीपल शुभ दायक है।

 *#वायव्यमें—* बेल शुभदायक है।

*#उत्तरमें—* गूलर नेत्ररोग तथा ह्रास करने वाला है ।
परंतु पाकर शुभ है।

#ईशानमें— आँवला शुभदायक है।

#ईशान_पूर्वमें— कटहल एवं आम शुभदायक हैं।

*#गृहवाटिका_का_विचार—*

जो घरसे पूर्व, उत्तर, पश्चिम या
ईशान दिशामें वाटिका बनाता है, वह सदा गायत्रीसे युक्त, दान देनेवाला और यज्ञ करनेवाला होता है। 

परन्तु जो आग्नेय, दक्षिण,
नैर्ऋत्य या वायव्यमें वाटिका बनाता है, उसे धन और पुत्रकी हानि तथा परलोकमें अपकीर्ति प्राप्त होती है। 
वह मृत्युको प्राप्त होता है। वह जातिभ्रष्ट व दुराचारी होता है।

यदि घरके समीप अशुभ वृक्ष लगे हों तो अशुभ वृक्ष और घरके बीचमें शुभफल देनेवाले वृक्ष लगा देने चाहिये। 

यदि पीपलका वृक्ष घरके पास
हो तो उसकी सेवा-पूजा करते रहना चाहिये।

दिनके दूसरे और तीसरे पहर यदि किसी वृक्ष, मन्दिर
आदिकी छाया मकानपर पड़े तो वह सदा दुःख व रोग देनेवाली होती है।

घरकी जितनी ऊंचाई है उससे कुछ ज्यादा दूरीपर कोई निषिद्ध वृक्ष खड़ा है तो कोई दोष नहीं होता।
Gurucev 
Bhubneshwar 
Parnkuti guna 
9893946810

Sunday, 6 July 2025

महामृत्युंज अनुष्ठान पूजन सामग्री पर्णकुटी गुना {【9893946810】

(1)हल्दी पिसी-------------------50 ग्राम
२】कलावा(आंटी)-------------10गोले 
३】गुलावजल--------    100ग्राम
४】कपूर----------------   50 ग्राम
५】बताशा-----------    (01) किलो
६】 हल्दी खड़ी ------------ 150 ग्राम
७】यज्ञोपवीत ---------------   2 मुुठा
८】चावल------------------ 15 किलो
९】अबीर-------------------50 ग्राम
१०】गुलाल,---100 ग्राम (पांच प्रकार की)

११】खोपरा बूरा 500 ग्राम 
    शक्कर बूरा 500 ग्राम
१२】सिंदूर ------------------100 ग्राम
१३】रोली, ------------------100ग्राम
१४】सुपारी, ( बड़ी)--------  200 ग्राम
१५】नारियल -----------------  15 नग्
१६】सरसो पीली---------------50 ग्राम
१७】काजू -100ग्राम 
बादाम -100 ग्राम 
किशमिस -100 ग्राम 
मखाने -100 ग्राम 
खारक -100 ग्राम
पिस्ता -100 ग्राम
१८】शहद (मधु)--------------- 100 ग्राम
१९】शकर------------------0 3 किलो
२०】घृत (शुद्ध घी)------------  04 किलो
२१】इलायची (छोटी)-----------10ग्राम
२२】लौंग ----------------10ग्राम
२३】इत्र की शीशी----------------1 नग्
२४】रंग लाल----------------20ग्राम
२५】रंग काला ---------------20ग्राम
२६】रंग हरा ------------------20ग्राम
२७】रंग पिला -----------------20ग्राम
२८】भस्म-----------------100 ग्राम 
२९】धुप बत्ती ---------------2 पैकिट
30】तिल का तेल -------------2 लीटर 
(31)  दाख {बड़ी}---------------50 ग्राम
32】आँवला ----------------50ग्राम
(32)मूँग बडी-----------------200ग्राम
(33)पापाड़थेली-------------01थैली
(34 ) पीताम्बरी पूजा बर्तन साफ करने के लिए 500ग्राम 
(35)नागफनी किले 04नग
(36)कच्चा सूत  गोले 05
(37)   नग उन के गोले
(38) बांस की डालिया 1 नग
(39) पचरंगा झंडा
(40,,)चांदी का सिक्का
(41) माचिस पैकेट 
(42)उड़द खड़े
(43) दालें पांच प्रकार की मात्रा पूजा अनुसार
(44) काली हल्दी
(45) ब्राह्मण बरण वस्त्र इच्छानुसार

हवन सामग्री सदस्य अनुसार 
तिल
 जौं 
इंद्र जौ
हवन सामग्री पैकेट
कमल गट्टा
गुगल
भोजपत्र
नारियल गोला


Gurudev Bhubaneswar:
Parnkuti ashram guna
9893946810
 =======================
३०】सप्तमृत्तिका
1】 हाथी के स्थान की मिट्टि-------50ग्राम
२】घोड़ा बांदने के स्थान की मिटटी--50ग्राम
३】बॉबी की मिटटी--------------50ग्राम
४】तुलसी की मिटटी-------------50ग्राम
५】नदी संगम की मिटटी----------50ग्राम
६】तालाब की मिटटी------------50ग्राम
७】गौ शाला की मिटटी-----------50ग्राम
राज द्वार की मिटटी--------------50ग्राम
============================
३१】पंचगव्य
१】 गाय का गोबर --------------50 ग्राम
२】गौ मूत्र-------------------50ग्राम
३】गौ घृत-------------------50ग्राम
4】गाय दूध-----------------50ग्राम
५】गाय का दही ------------50ग्राम
========================
३२】सप्त धान्य-कुलबजन--------100ग्राम
१】 जौ-----------
२】गेहूँ-
३】चावल-
४】तिल-
५】काँगनी-
६】उड़द-
७】मूँग
=============================
३३】कुशा 
३४】दूर्वा
35】पुष्प कई प्रकार के 
३६】गंगाजल
३७】ऋतुफल पांच प्रकार के -----1 किलो

38】पंच पल्लव
१】बड़,
२】 गूलर,
३】पीपल,
४】आम 
५】पाकर के पत्ते)
=========================
३९】बिल्वपत्र
४०】शमीपत्र
४१】सर्वऔषधि 
     तुलसी मंजरी
      भांग 

४२】अर्पित करने हेतु पुरुष बस्त्र
४३】मता जी को अर्पित करने हेतु  
सौभाग्यवस्त्र 

बर्तन
44】

(1)जल कलश तांबे के
पूजा की थाली 
कटोरी 
लौटा
आसान
आर्घा 
गंगा सागर छोटा 
श्रृंगी अभिषेक के लिए 

मिट्टी के कलश ढक्कन सहित 5 नग
     (2) खप्पर 5 
      दोना गड्डी 


१】सफेद कपड़ा 3मीटर
२】लाल कपड़ा 2मीटर
(3)पीला कपड़ा3मीटर
४】हरा कपड़ा 1मीटर
(5) काला कपडा 1मीटर
पीला चद्दर 1
छींट का कपड़ा 2मीटर

 Gurudev Bhubaneswar: 

पान के पत्ते ------------11 नग
रुई मेडिकल वाली 500 ग्राम
बन्दनवार


 ब्राह्मणों के लिए उपयोगी 
सावुन नहाने के---------------10
सावुन कपड़े धोने के --------10
सर्फ कपडे धोने का ---------1 किलो
मंजन --------------------100ग्राम
तेल शीशी -----             1 नग 
फलाहार सामग्री 

Gurudev
Bhubneshwar
Parnkuti aashram
Guna
9893946810

Thursday, 5 June 2025

एकादशी निर्णय कैसे करें

केवल एकादशी-निर्णय की चर्चा की जायेगी। एकादशी को हरिवासर कहा गया है। भविष्यपुराण का वचन है—

शुक्ले वा यदि वा कृष्णे विष्णुपूजनतत्परः। एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ॥

अर्थात्, विष्णुपूजा परायण होकर दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की ही एकादशी में उपवास करना चाहिये। लिङ्गपुराण में तो और भी स्पष्ट कहा है—

गृहस्थो ब्रह्मचारी च आहिताग्निस्तथैव च। एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥

अर्थात्, गृहस्थ, ब्रह्मचारी, सात्त्विकी किसी को भी एकादशी [दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण)] के दिन भोजन नहीं करना चाहिये। अब प्रश्न उठता है कि एकादशी व्रत का निर्धारण कैसे हो? वशिष्ठस्मृति के अनुसार दशमी विद्धा एकादशी संताननाशक होता है और विष्णुलोकगमन में बाधक हो जाता है। यथा—

दशम्येकादशी यत्र तत्र नोपवसद्बुध:। अपत्यानि विनश्यन्ति विष्णुलोकं न गच्छति॥

अतः यह परमावश्यक है कि एकादशी दशमीविद्धा (पूर्वविद्धा) न हो। हाँ द्वादशीविद्धा (परविद्धा) तो हो ही सकती है क्योंकि ‘पूर्वविद्धातिथिस्त्यागो वैष्णवस्य हि लक्षणम्’ (नारदपाञ्चरात्र)। लेकिन वेध-निर्णय का सिद्धान्त भी सर्वसम्मत नहीं है। निम्बार्क सम्प्रदाय में स्पर्शवेध प्रमुख है।उनके अनुसार यदि सूर्योदय में एकादशी हो परन्तु पूर्वरात्रि में दशमी यदि आधी रात को अतिक्रमण करे अर्थात् दशमी यदि सूर्योदयोपरान्त ४५ घटी से १ पल भी अधिक हो तो एकादशी त्याग कर महाद्वादशी का व्रत अवश्य करे। यथा—

अर्धरात्रमतिक्रम्य दशमी दृश्यते यदि। तदा ह्येकादशीं त्यक्त्वा द्वादशीं समुपोषयेत्॥

(कूर्मपुराण)। परन्तु कण्व स्मृति के अनुसार अरुणोदय के समय दशमी तथा एकादशी का योग हो तो द्वादशी को व्रत कर त्रयोदशी को पारण करना चाहिये। यथा—

अरुणोदयवेलायां दशमीसंयुता यदि । तत्रोपोष्या द्वादशी स्यात्त्रयोदश्यां तु पारणम्॥

यहाँ पुराण और स्मृति के निर्देश में भिन्नता पायी जा रही है अतः शास्त्र-सिद्धान्त से स्मृति-वचन ही बलिष्ठ होता है। अतः यही सिद्धान्त बहुमान्य है। अपने रामानन्द-सम्प्रदाय का मत है कि वैष्णवों को वेध रहित एकादशी का व्रत रखना चाहिये।यदि अरुणोदय-काल में एकादशी दशमी से विद्धा हो तो उसे छोड़कर द्वादशी का व्रत करना चाहिये—

एकादशीत्यादिमहाव्रतानि कुर्याद्विवेधानि हरिप्रियाणि। विद्धा दशम्या यदि साऽरुणोदये स द्वादशीन्तूपवसेद्विहाय ताम्॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ६७)। 
उदाहरणार्थ, भाद्रपद शु. ११ रविवार २०७० को उदया तिथि में एकादशी तो है पर पूर्ववर्ती दिन (शनिवार) दशमी की समाप्ति २८:४६ बजे हो रही है 
जो सूर्योदय (५:५२ बजे) से मात्र १घंटा ६ मि. अर्थात् पौने तीन घटी पहले है
 अतः अरुणोदय काल (२८:१६ बजे) में यह एकादशी दशमी-विद्धा है। 
फलतः इसे त्यागकर भाद्रपद शु. १२ सोमवार को पद्मा एकादशी का व्रत विहित है।
 यह वेध भी चार प्रकार का होता है- (१) सूर्योदय से पूर्व साढ़े तीन घटी का काल अरुणोदय वेध है (२) सूर्योदय से पूर्व २ घटी का काल अति-वेध है (३) सूर्य के आधे उदित हो जाने पर महावेध काल है तथा (४) सूर्योदय में तुरीय योग होता है। यथा—

घटीत्रयंसार्द्धमथारुणोदये वेधोऽतिवेधो द्विघटिस्तुदर्शनात्। रविप्रभासस्य तथोदितेऽर्द्धे सूर्येमहावेध इतीर्यते बुधैः॥ योगस्तुरीयस्तु दिवाकरोदये तेऽर्वाक् सुदोषातिशयार्थबोधकाः।

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७१-७२)। सूर्योदयकाल से पूर्व दो मुहुर्त संयुक्त एकादशी शुद्ध है और शेष सभी विद्धा हैं—

पूर्णेति सूर्योदयकालतः या प्राङ्मुहूर्तद्वयसंयुता च। अन्या च विद्धा परिकीर्तिता बुधैरेकादशी सा त्रिविधाऽपि शुद्धा॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७३)। शुद्धा एकादशी के भी तीन भेद हैं। यथा—

एका तु द्वादशी मात्राधिका ज्ञेयोभयाधिका। द्वितीया च तृतीया तु तथैवानुभयाधिका॥ तत्राद्या तु परैवास्ति ग्राह्या विष्णुपरायणैः। शुद्धाप्येकादशी हेया परतो द्वादशी यदि ॥ उपोष्य द्वादशीं शुद्धान्तस्यामेव च पारणम्। उभयोरधिकत्वे तु परोपोष्या विचक्षणैः॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७४-७६) अर्थात्, एक वह जिसमें केवल द्वादशी अधिक हो, दूसरी जिसमें दोनों अधिक हों तथा तीसरी जिसमें दोनों में कोई भी अधिक न हो। (अब इनमें से किसे ग्रहण किया जाय। जगद्गुरु आद्य रामानन्दाचार्य-चरण का आदेश है –) इनमें से वैष्णवों को प्रथम एकादशी अर्थात् द्वादशी मात्र का ग्रहण करना चाहिये, यदि परे द्वादशी की वृद्धि हो तो शुद्ध एकादशी भी छोड़ देनी चाहिये। विज्ञ-जनों को एकादशीरहित शुद्ध षष्ठीदण्डात्मक द्वादशी में उपवास कर अगले दिन अवशिष्ट द्वादशी में ही पारण भी कर लेना चाहिये। दोनों की अधिकता में पर का उपवास करना चाहिये।



 आगे आचार्य-चरण ने अष्टविध एकादशी का वर्णन इस प्रकार किया है—

उन्मीलिनी वञ्जुलिनी सुपुण्याः सा त्रिस्पृशाऽथो खलु पक्षवर्द्धिनी । 

जया तथाऽष्टौ विजया जयन्ती द्वादश्य एता इति पापनाशिनी॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७७) अर्थात्, उन्मीलिनी,
 वञ्जुलिनी, 
त्रिस्पर्शा, 
पक्षवर्द्धिनी, 
जया, 
विजया, जयन्ती और पापनाशिनी ये आठ
 द्वादशियाँ अत्यन्त पवित्र हैं।
 पद्मपुराणानुसार भी—

एकादशी तु संपूर्णा वर्द्धते पुनरेव सा। 

द्वादशी न च वर्द्धेत कथितोन्मीलिनीति सा॥

 संपूर्णैकादशी यत्र द्वादशी च यथा भवेत्। त्रयोदश्यां मुहुर्त्तार्द्धं वञ्जुली सा हरिप्रिया॥

 शुक्ले पक्षेऽथवा कृष्णे यदा भवति वञ्जुली। एकादशीदिने भुक्त्वा द्वादश्यां कारयेद्व्रतम्॥

यहाँ स्पष्टतः कहा गया है कि शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष को यदि वञ्जुली हो तो एकादशी को भोजन कर द्वादशी का व्रत करें। ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी यह वर्णन आया है।
 यथा—

एकादशी भवेत्पूर्णा परतो द्वादशी भवेत्।

 तदा ह्येकादशीं त्यक्त्वा द्वादशीं समुपोषयेत्॥

 पर्वाच्युतजयावृद्धौ ईश दुर्गान्तकक्षये। शुद्धाष्येकादशी त्याज्या द्वादश्यां समुपोषणम् ॥

 इनमें चार तिथिजन्य और चार नक्षत्रजन्य हैं जो इस प्रकार हैं-

१. उन्मीलनी अरुणोदय काल में सम्पूर्ण एकादशी अगले दिन प्रातः द्वादशी में वृद्धि को प्राप्त हो परन्तु द्वादशी की वृद्धि किसी भी दशा में न हो। 
२. वञ्जुली:- एकादशी की वृद्धि न होकर द्वादशी की वृद्धि हो अर्थात् त्रयोदशी में मुहुर्तार्ध द्वादशी हो। (पारण द्वादशी मध्य होनी चाहिये)।

 उदाहरणार्थ आश्विन कृष्ण ११ सोमवार २०७० को एकादशी रहते हुए भी द्वादशी की वृद्धि परिलक्षित हो रही है अतः इन्दिरा एकादशी व्रत को सोमवार को त्यागकर मंगलवार को वञ्जुली महाद्वादशी के रुप में की जायेगी।ध्यान रहे कि पारण द्वादशी मध्य विहित होने के कारण इसे ०६:०४ तक कर लेनी चाहिए।

 ३. त्रिस्पर्शा:- अरुणोदय काल में एकादशी, सम्पूर्ण दिन-रात्रि में द्वादशी तथा पर दिन त्रयोदशी हो, किन्तु किसी भी दशामें दशमीयुक्त नहीं हो। 

। ४. पक्षवर्द्धिनी:- अमावस्या अथवा पूर्णिमा की वृद्धि ।यथा वैशाख कृष्ण ११ रविवार २०७० को एकादशी वर्तमान होते हुये भी अमावस्या की वृद्धि होने के कारण वैशाख कृष्ण १२ सोमवार (पक्षवर्द्धिनी महाद्वादशी) को वरुथिनी एकादशी का उपवास विहित है। 
चार नक्षत्रयुक्त महाद्वादशी व्रत ये हैं यदि शुक्लपक्षीय द्वादशी

 १.पुनर्वसुयुता (जया) २. श्रवणयुता (विजया) ३. रोहिणीयुता (जयन्ती) तथा ४. पुष्ययुता (पापनाशिनी)। एकादशी (महाद्वादशी) व्रतोपवास का अन्त पारण के साथ होता है।

 कूर्मपुराणानुसार एकादशी को व्रत एवं द्वादशी को पारण होना चाहिए। किन्तु त्रयोदशी को पारण नहीं होना चाहिए, क्योंकि वैसा करने से १२ एकादशियों के पुण्य नष्ट हो जाते हैं ।

 उदाहरणार्थ 
चैत्र शु. ११ सं. २०७० (२२ अप्रिल २०१३ सोमवार) के दिन कामदा एकादशी है अतः परवर्ती दिन मङ्गलवार अर्थात् २३ अप्रिल २०१३ को पारण करना होगा। परन्तु ध्यान रहे कि पारण सूर्योदयोपरान्त ७:४९ बजे के पहले ही कर लेना होगा। परन्तु एक दिन पूर्व दशमीयुक्ता एकादशी हो और दूसरे दिन एकादशीयुक्ता द्वादशी तो उपवास तो द्वादशी को होता है, किन्तु यदि उपवास के बाद द्वादशी न हो तो त्रयोदशी के दिन पारण होगा।उदाहरणार्थ फाल्गुन कृष्ण ११ मंगलवार सं. २०७० (२५ फरवरी २०१४) के अरुणोदयकाल में दशमी है और सूर्योदय में एकादशी है अतः आचार्य-चरण के अनुसार यह एकादशी दशमीविद्धा अतः अकरणीय है। अतः विजया एकादशी का व्रतोपवास फाल्गुन कृष्ण १२ बुधवार सं. २०७० (२६ फरवरी २०१४) को होगा । परन्तु अगले दिन गुरुवार २७ फरवरी २०१४ को त्रयोदशी तिथि है अतः द्वादशी तिथि की अप्राप्ति में त्रयोदशी को ही पारण होगा।जैसा कि वायुपुराण में कहा है-

कलाप्येकादशी यत्र परतो द्वादशी न चेत्। पुण्यं क्रतुशतस्योक्तं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥

एक और भी बात। पारण में आचार्य-चरण ने यह भी आदेश किया है कि

आषाढ़भाद्रोर्जसितेषु संगता मैत्रश्रवोऽन्त्यादिगताद्व्युपान्त्यैः। चेद्द्वादशी तत्र न पारणं बुधः पादैः प्रकुर्याद्व्रतवृंदहारिणी॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७८)। अर्थात् यदि द्वादशी आषाढ़, भाद्र और कार्तिक मास शुक्ल पक्ष में अनुराधा, श्रवण, रेवती के आदि चरण, द्वितीय चरण और तृतीय चरण के साथ संयुक्त हो तो उसमें विद्वान् पारण न करे, 
क्योंकि वह समस्त व्रतों का नाशक है। अतः व्रतोपवास हेतु एकादशी-निर्णय एवं व्रत-समाप्ति के लिए उसके पारण-काल का निर्णय एकादशी का परमावश्यक अङ्ग है।

Friday, 23 May 2025

बर्षा योग

प्रसव (वर्षा) का समय

शुक्ल पात का गर्भ, कृष्ण पाल में और कृष्ण पक्ष का शुक्ल पक्ष में प्रसवित,

दिन का रात्रि में और रात्रि का दिन में

संध्या का विपरीत संध्या में.

विपरीत दिशा में अर्थात् यदि गर्भ के समय मेघ पूर्व दिशा से उठते हैं तो वर्षा ऋतु

में पश्चिम दिशा से उठेंगे, तदानुसार
हवा की दिशा विपरीत होगी.

गर्भोपघात के लक्षण

यदि प्रसव के समय विपरीत परिस्थियों हो तो गर्म स्थिर नहीं रह पाता और वर्षा नहीं होती, इस अवस्था की गर्मीपघात कहते हैं, इसके प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं।

उल्कापात, ग्रहण, धूमकेतु का उदय होना.

किसी दिशा में आकाश का लाल होना, तूफान आना.

भूकंप, भूस्खलन, विस्फोट, बाढ़ आना, भयंकर आग लगना या गैस रिसाव, युद्ध का होना भारी वर्षा का होना
> यहाँ का अतिचारी या मंदचारी होना.


ग्रह स्थिति / संचरण से वर्षा विचार

बुध, शुक्र व शनि के उदय व अस्त के समय वर्षा होती है।
शनि और मंगल के राशि परिवर्तन करते समय वर्षा होती है।
यह वक्री होने से भी वर्षा की संभावना बनती है। सूर्य, सिंह राशि में होने पर वर्षा का योग नहीं बनता लेकिन कर्क राशि में हो तो हल्की वर्षा होती है।शुक्र स्थित राशि से सप्तम राशि में चन्द्रमा, बुध, शुक्र व गुरु में कोई एक या अधिक ग्रह हो तो वर्षी होने के अच्छे योग होते हैं।
जब बुध-गुरु, बुध-शुक्र, गुरु-शुक्र और शनि-मंगल की युति हो तथा उन पर बुध, शुक या गुरु की दृष्टि या प्रभाव न हो तो तेज हवा चलती है और तापमान बढ़ता है। सूर्य से धीमी गति वाला यह आगे तथा तेज गति यह पीछे रहने की स्थिति में अच्छी वर्षा के योग होते हैं।आगे मंगल और पीछे सूर्य हो, तो समस्त बादलों को सोख लेते हैं लेकिन आगे सूर्य और पीछे मंगल हो तो अच्छी वर्षा व फसल होती है।जब समस्त ग्रह सूर्य से आगे या पीछे हो तो अच्छी वर्षा होन सूर्य यदि बुध व शुक्र के समीप हो तो वर्षी होती है लेकिन होने से वर्षा नहीं होती।
वराहमिहिर रचित बृहत संहिता में मेघ गर्भ धारण का उल्लेख है, अनेक अन्य खगोलविर्दा ने भी इसका विस्तृत वर्णन किया है, कश्यप ऋषि के अनुसार-
सितादी मार्गशीर्षस्य प्रतिपद् दिवसे तथा। पूर्वाषाढ़गले चन्द्रे गर्भाणां धारणं भवेत् ॥

अर्थात् मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में जब चन्द्रमा पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में आता है तब वहाँ से कहना चाहिए (लगभग दिसंबर मध्यः इस वर्ष 

गर्भ-लक्षण 
मेध-गर्भ धारण के समय सामान्य आकाशीय लक्षणों से ग्रहों विम्बों के आकार बड़े होना, ग्रहो की किरण कोमल होना, नक्षत्रों के गमन मार्ग की दिशा उत्तर/उत्तर-पूर्व/पूर्वी होना, हवा का मध्यम व कोमल गति से चलना, आसमान साफ रहना, सूर्य व चन्द्रमा की चमक अधिक होना, चन्द्रमा सूर्य के चारों और बादलों का गोलाकार वलय बनना, सध्या समय इन्द्रधनुष दिखना, मधुर गर्जन होना शामिल है।

तत्पश्चात् आकाश में जिस दिन बादल दिखाई दे, वह उस मेघ का गर्भ धारण कहलाता है।

यह प्रक्रिया चैत्र शुक्ल पक्ष (लगभग अप्रैल मध्य) तक जारी रहती है।

चन्द्रमा के जिस नक्षत्र में जाने से गर्भ होता है, उसके 195 सूर्य-दिवस के उपरान्त उसी नक्षत्र में पन्द्रमा के आने से प्रसव होता है।

उत्तम गर्भ के लक्षण

बादल चाँदी या मोती के समान श्वेत हो या बादलों का रंग गहरा सलेटी हो.

वायु उत्तर, उत्तर-पूर्व अथवा पूर्व दिशा से बह रही हो.

आकाश स्वच्छ हो.

प्रातः काल / सायंकाल आकाश में चिकने और लालिमा युक्त बादल ही या इन्द्रधनुष

दिखाई दें.

गर्जला हो या बिजली चमके.

नक्षत्रफल

उत्तम वर्षा पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढा, पूर्वाषाढा और रोहिणी.

वर्षा शतभिषा, आश्लेषा, आर्दा, स्वाति और मया,

यदि गर्भ के समय नक्षत्र पर सूर्य, मंगल, शनि, राहू या केतु की दृष्टि हो तो वर्षा के साथ ओले भी पड़तें है और विद्‌युतपात भी होता है. उयदि नक्षत्र पर बुध, शुक्र या चन्द्रमा की दृष्टि या युति हो तो बहुत वर्षा होती है.


प्रसव (वर्षा) का समय

> शुक्ल पक्ष का गर्भ, कृष्ण पक्ष में और कृष्ण पक्ष का शुक्ल पक्ष में प्रसवित > दिन का रात्रि में और रात्रि का दिन में.

संध्या का विपरीत सध्या में

विपरीत दिशा में अर्थात् यदि गर्भ के समय मेघ पूर्व दिशा से उठते हैं तो वर्षा ऋतु में पश्चिम दिशा से उठेंगे, लदानुसार,

हवा की दिशा विपरीत होगी.

गर्भोपघात के लक्षण

यदि प्रसव के समय विपरीत परिस्थियों हो तो गर्भ स्थिर नहीं रह पाता और वर्षा नहीं होती, इस अवस्था को गपिधात कहते हैं. इसके प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं।





नक्षत्रों में ग्रहों की स्थिति पर आधारित चक्र / योग

आर्दा प्रवेश चक्र मानसून की वर्षा के पूर्वानु‌मान के किये सूर्य के आर्दा नक्षत्र में प्रवेश के समय की ग्रहस्थिति को आर्दा प्रवेश धक्र कहते हैं. इसका खगोलीय व ज्योतिषीय विश्लेषण वर्षा पूर्वानुमान में बहुत सहायक होता है यहीं से वर्षा ऋतु का आरम्भ माना जता है (लगभग 21-22 जून) और आर्दा, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्ता और चित्रा इन 9 नक्षत्रों में सूर्य-संचरण की अवधि वर्षा-ऋतु कहलाती है। लगभग 24 अक्टूबर तक)।

सूर्य-संक्रांति चक्र सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं। और राशि-परिवर्तन के समय की यह स्थिति चक्र को सूर्य-संक्रांति चक्र कहा जाता है।

रोहिणी-योग- आषाड़ माह के कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा जब रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है तो वह रोहिणी योग बनाता है. इस समय वायु एवं बादलों के आकार का निरिक्षण करके निकट भविष्य में वर्षा की माग की जानकारी देते हैं। वायु का समय, वेग एवं अवधिः वर्षा की मात्रा व कालावधि का निधारण करती हैं।

सप्तनाड़ी चक इस चक्र में सात नाड़ियों में चार-चार नक्षत्रों की कल्पना की गई है. जिनकी प्रकृति के आधार पर वर्षा का पूर्वानुमान किया जाता है।

* मेघ-गर्भ बादलों की प्रारम्भिक उत्पत्तिा


नाड़ियों में ग्रह-स्थिति का फल

सामान्यतयाः जो यह अपनी नाडी में होता है, वह उसी नाडी क मंगल जिस भी नाडी में होता है, उसका फल देता है।

एक नाडी में एक से अधिक यह होने पर संयुक्त प्रकृति के अनुसार फल देते हैं।

निर्जल नाडी में चन्द्र, बुध व शुक्र आदि एक से अधिक जलद ग्रह हो तो वह जलद नाड़ी बन जाती है।

जलद नाडी में सूर्य, मंगल व शनि आदि एक से अधिक निर्जल यह हो तो वह निर्जल नाडी बन जाती है।

यदि चन्द्रमा, बुध, गुरु या शुक्र के साथ जलद नाही में हो तो तब तक वर्षा होती है

जब तक चन्द्रमा उस नाड़ी में रहता है।

चन्द्र, मंगल व गुरु एक ही नाही में हो तो भारी वर्षा होती है।



मेघ-गर्भ

वराहमिहिर रचित बृहत संहिता में मेघ गर्भ धारण का उल्लेख है, अनेक अन्य खगोलविर्दा ने भी इसका विस्तृत वर्णन किया है, कश्यप ऋषि के अनुसार-

सितादाँ मार्गशीर्षस्य प्रतिपद् दिवसे तथा।
पूर्वाषाढ़गले चन्द्रे गर्माणां धारणं भवेत् ॥

अर्थात् मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में जब चन्द्रमा पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में आता है तब वहाँ से गर्भ-लक्षण कहना चाहिए (लगभग दिसंबर मध्यः इस वर्ष 

मेघ-गर्भ धारण के समय सामान्य आकाशीय लक्षणों में यहाँ बिम्बों के आकार बड़े होना, ग्रहो की किरण कोमल होना, नक्षत्री के गमन मार्ग की दिशा उत्तर/उत्तर-पूर्व पूर्वी होना, हवा का मध्यम व कोमल गति से चलना, आसमान साफ रहना, सूर्य व




नक्षत्र

पुरुष नक्षत्र- आर्दा, पुनर्वसु पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्ता, चित्रा स्वाति।

स्त्री नक्षत्र मूल, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद उत्तराभाद्रपद, रेवती, अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी व मृगशिरा ।

नपुंसक नक्षत्र विशाखा, अनुराधा व ज्येष्ठा।

वर्षाकाल के दौरान सूर्य और चन्द्र की विभिन्न नक्षत्रों में स्थिति से वर्षों का विचार किया जाता है। इनकी स्थिति क्रमशः

पुरुष व स्त्री हो तो वर्षाकारका

स्त्री व पुरुष हो तो अधिक वर्षाकारकः

स्त्री व नपुसंक हो तो कम वर्षाकारक,

स्त्री-स्त्री या पुरुष-पुरुष हो तो बादल छाये रहने की संभावना, तया

नपुसंक-नपुसक हो तो अनावृष्टि समझना चाहिए।


सप्तनाड़ी चक्र

बारहवी शताब्दी के नरपति जयधर्या में सप्तनाही चक्र का विस्तृप्त वर्णन है. इसमें अभिजित् सहित 28 नक्षत्रों को 7 भागी में बांटा गया है। प्रत्येक भाग (नाही) के विशिष्ट लक्षण निम्नानुसार होते हैं।

प्रकृति नाही

स्वामी यह

शनि

सूर्य

प्रचंडवायु, आंधी, तुफान तेज हावा

मगल

निर्जन

वायु

दहन

रेवली

तापमान बढना

उत्तराभाद्रप

बादर बनना

पुनर्वसु

चन्द्र

पूर्वाषाढा

अच्छी वर्षा

भारी वर्षी

नीर

जलद जिल

अमृत


नक्षत्रों में ग्रहों की स्थिति पर आधारित चक्र / योग

*आदी प्रवेश चक्र मानसून की वर्षा के पूर्वानुमान के किये सूर्य के आदी नाक्षत्र में प्रवेश के समय की ग्रह‌स्थिति को आर्दा प्रवेश चक्र कहते हैं. इसका खगोलीय व ज्योतिषीय विश्लेषण वर्षा पूर्वानुमान में बहुत सहायक होता है यहीं से वर्षा ऋतु का आरम्भ माना जता है (लगभग 21-22 जून) और आर्दा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्ता और चित्रा इल इन 9 नक्षत्रों में सूर्य-संचरण की अवधि वर्षा-ऋतु कहलाती है। लगभग 24 अक्टूबर तक)।

*सूर्य-संक्रांति चक्र सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं। और राशि परिवर्तन के समय की यह स्थिति चक्र को सूर्य-संक्रांति चक्र कहा जाता है। रोहिणी-योग- आषाड़ माह के कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा जब रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है तो वह रोहिणी योग बनाता हैं, इस समय वायु एवं बादली के आकार का निरिक्षण





ग्रह

> सूर्य ग्रीष्मऋतु, पूर्व-दिशा, अग्नि, आकाश शुष्वा गर्न पुलिंग पन्टमा के साथ मिलकर मौसम को चरमसीसा की और ले जाता है. शुक्र के साथ मिलकर बादलवर्षा का योग बनाता है।

चन्द्रमा वर्षाऋतु, उत्तरपश्चिम दिशा राजबली, स्वीलिंग, खेती, ठंडी, तरल पदार्थ, पानी, गौलेपन अकर राशि मै चन्द्रमा के साथ वर्षाकारक।

>मगल- ग्रीष्मऋतु, दक्षिण दिशा, रात्रि के अंत में बनी, गर्मी, भूमि, अग्नि, पुल्लिंग, खेत, मौसम की पराकाष्ठाः सूर्य-हानि के साथ मिलकर सूखे का योग बनाना।

बुध शरदऋतु, उत्तर-दिशाः प्रात कालबली, नंपुसकता, ठंडा, नमी, वायु, उदवाव साफ मौसमा

गुरु हेमंतऋतु, अत्तरपूर्व-दिशा, फसल, शीतल-मंद-समीर, शुष्कता, पुल्लिंग, साफ मौसमका कारण ताप बढ़ाने में सक्षम ।

>शुक्र वसंतऋतु, दक्षिणपूर्व-दिशा, जलस्थान, गर्म, नम, स्त्रीलिंग, मध्याहनातर, कृषि उत्पाद, निम्तदबाव, हिमपात, आदत संगार के साथ मिलकर फरक

शनि- शिशिरऋतु, पश्चिम दिशा, नंपुसक, ठंडा, शुष्क, ठंडा सीलन मुक्त मौसम, कमदबाव का क्षेत्र, ताप व वर्षा में गिरावटः सूर्व के साथ मिलकर ध्धता ठंडा मौसम बनाने वाला समान मौसम कनाका रखने वाला राहू। केतु से सबंध होने पर वर्षों के साथ ले और विदयुत्पात की समावना होती है।


राशियाँ

पुरुष राशि -विसम राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ)

स्त्री राशि

सम राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन)

दिनबली रात्रिबली मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, धनु, मकर।

सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ, मीन।

मेष- अग्नितत्व, पूर्व-दिशा, शुष्क, उग्रप्रकृति, गर्म, वायुकारक, चर।

वृष भूमितत्व दक्षिण-दिशा शीतल, कान्ति-रहित, नमी, अर्द्धजल-राशि ।

नियुन- वायुतत्व, पश्चिम-दिशा, शुष्क, उष्ण।

कर्क जलतत्व, उत्तर दिशा, ठंडी, गीली ।

सिंह अग्नितत्व, पूर्व-दिशा, उष्ण, शुष्क, निर्जल-राशि।

कन्या पृथ्वीतत्व, दक्षिण दिशाः वायुकारक, शीतल, शुष्क

तुजा वायुतत्व, पश्चिम दिशा, ठंडी, श्याम-वर्ण, जल-राशि।

वृश्चिक जलतत्व, उत्तर-दिशा: अर्द्धजल राशि, मौसम की चरमसीमा की और से जाने वाली।

धनु अग्नितत्व पूर्व-दिशा, क्रूर. शुष्क, अर्धजल-राशि।

मकर- पृथ्वीतत्व, दक्षिण-दिशा, ठंडी, तूफानकारक।

कुम्भ- अयुतत्व पश्चिम दिशा, स्थिरसंशक, विद्‌युतकारक, उष्ण, अर्द्धजला

भौन जलतत्व, उत्तर-दिशाः ठंडी, नम।


नक्षत्र

पुरुष नक्षत्र आदी, पुनर्वसु पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्ता, चित्रा

वै स्वाति।

स्वी नक्षत्र मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद उत्तराभाद्रपद, रेवती. अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी व मृगशिरा।

नपुंसक नक्षत्र- विशाखा, अनुराधा व ज्येष्ठा।

वर्षाकाल के दौरान सूर्य और चन्द्र की विभिन्न नक्षत्रों में स्थिति से वर्षा का

विचार किया जाता है। इनकी स्थिति क्रमशः


पुरुष व स्त्री हो तो वर्षाकारक,

स्त्री व पुरुष हो तो अधिक वर्षाकारक,

स्त्री व नपुसंक हो तो कम वर्षाकारक,

स्त्री-स्त्री या पुरुष-पुरुष हो तो बादल छाये रहने की संभावना, तथा

नपुसक नपुसक हो तो अनावृष्टि समझना चाहिए।