ज्योतिष समाधान

Saturday, 13 January 2018

मकर संक्रांति 2018 में फिर से 14 जनवरी को और वर्ष 2019 2020 में 15 जनवरी को मनाया जायेगा। यह क्रम 2030 तक चलता रहेगा। इस साल रविवार, 14 जनवरी को ध्रुव, पारिजात और

मकर संक्रांति 2018 में फिर से 14 जनवरी को और वर्ष 2019 2020 में 15 जनवरी को मनाया जायेगा। यह क्रम 2030 तक चलता रहेगा।

इस साल रविवार, 14 जनवरी को
ध्रुव, पारिजात और
सर्वार्थसिद्धि योग बनने से इस शुभ पर्व का महत्व और बढ़ गया है।
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इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। इसलिए इस दिन को मकर संक्रान्ति के रूप में मनाया जाता है| मकर संक्रान्ति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारम्भ होती है। इसलिये इस त्यौहार को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं।सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं|

इसका पुण्यकाल सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक होगा जो बहुत ही शुभ संयोग है क्योंकि इस साल पुण्यकाल का लाभ पूरे दिन लिया जा सकता है।

2-देवी पुराण के अनुसार संक्रांति से 15 घटी पहले और बाद तक का समय पुण्यकाल होता है।

महापुण्यकाल का समय बहुत सीमित है।
महापुण्य काल का समय 14 जनवरी 2018 के दिन दोपहर 2:00 से 2:24 तक ही रहेगा।

दान के लिए सर्वश्रेष्ठ समय दोपहर 2:00 से 2:24 तक ही माना जाएगा।

ऐसा होगा पर्व का स्वरूप

- वाहन : भैंसा
- उपवाहन :  ऊंट
- वस्त्र : काले
- पात्र : खप्पर
- भक्षण :  दही

सूर्य के राशि परिवर्तन का 12 राशियों पर असर

मेष :मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि और लाभ के अवसर मिलेंगे।

वृष :विवाद और मानसिक कष्ट की संभावना बनेगी।

मिथुन :कोर्ट-कचहरी के मसलों में कष्ट और धन का अपव्यय हो सकता है।

कर्क :दांपत्य संबंधों में विवाद और मान हानि की संभावना है।

सिंह :शत्रुओं पर विजय प्राप्ति और रोगों से निजात मिलेगी।

कन्या :उच्च अधिकारियों से तनाव मिलेगा, संभल कर यात्रा करने की आवश्यकता है।

तुला :जमीन-जायदाद संबंधी मामलों में सर्तकता रखने की आवश्यकता है।

वृश्चिक :तरक्की के अवसर और आय में वृद्धि की संभवना है।

धनु :धन हानि और सिर और आंखों में पीड़ा के योग है।

मकर :मान-सम्मान में वृद्धि। लाभ के अवसर आ रहे हैं। धन के लिए प्रयास करने पड़ेंगे।

कुंभ :यश-प्रतिष्ठा में वृद्धि। यात्रा-मनोरंजन के योग हैं। धन प्राप्ति के विशेष अवसर आएंगे।

मीन:धन, पदोन्नति और मान-सम्मान के अवसर मिलेंगे।

1 -मकर संक्रान्ति के साथ अनेक पौराणिक तथ्य जुडे़ हुए हैं जिसमें से कुछ के अनुसार भगवान आशुतोष ने इस दिन भगवान विष्णु जी को आत्मज्ञान का दान दिया था.

२-इसके अतिरिक्त देवताओं के दिनों की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है.

३-सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है तो उस अवधि को देवताओं की रात्री व उतरायण के छ: माह को दिन कहा जाता है.

4-महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था.

5 कहा जाता है कि आज ही के दिन गंगा जी ने भगीरथ के पीछे- पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी.

6-मकर संक्रान्ति के दिन से मौसम में बदलाव आना आरम्भ होता है. यही कारण है कि रातें छोटी व दिन बडे होने लगते है.

७-सूर्य के उतरी गोलार्ध की ओर जाने बढने के कारण ग्रीष्म ऋतु का प्रारम्भ होता है. सूर्य के प्रकाश में गर्मी और तपन बढने लगती है.

८-इस दिन को देवता छ: माह की निद्रा से जागते है।
भगवान सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक नयी शुरुआत का दिन होता है।
९-मान्यता है कि पवित्र माघ मास में जो व्यक्ति नित्य भगवान विष्णु की तिल से पूजा करता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं,
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1-मकर संक्रांति को सभी जातकों को चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष सूर्योदय से पूर्व अवश्य ही अपनी शय्या का त्याग करना चाहिए ।
2-फिर स्नान आदि करने के बाद उगते हुए सूर्य को तांबे के लोटे के जल में कुंकुम तथा लाल रंग के फूल डालकर अध्र्य दें।
३-अध्र्य देते समय ऊँ घृणि सूर्याय नम: मंत्र का जप जरुर करते रहें।
इस प्रकार सूर्य को अध्र्य देने से मन की सभी इच्छाएँ अवश्य ही पूर्ण हो जाती है ।
४-मकर संक्रांति के दिन दान करने का विशेष महत्व है।
हमारे शास्त्रों के अनुसार इस दिन किए गए दान का सहस्त्रों गुना पुण्य प्राप्त होता है।
इस दिन कंबल,
गर्म वस्त्र,
घी,
दाल-चावल की कच्ची खिचड़ी
और तिल आदि का दान विशेष रूप से फलदायी माना गया है। ।
५-शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन गुड़ एवं कच्चे चावल बहते हुए जल में प्रवाहित करना बहुत शुभ माना जाता है।
6-इस दिन खिचड़ी, तिल-गुड़ और पके हुए चावल में गुड़ और दूध मिलाकर खाने से भी भगवान सूर्यदेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
८-मकर संक्रांति के दिन साफ लाल कपड़े में गेहूं व गुड़ बांधकर किसी जरूरतमंद अथवा ब्राह्मण को दान देने से भी व्यक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है।
9-ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चूँकि तांबा सूर्य की धातु है अत: मकर संक्रांति के दिन तांबे का सिक्का या तांबे का चौकोर टुकड़ा बहते जल में प्रवाहित करने से कुंडली में स्थित सूर्य के दोष कम होते है।
10-मकर संक्रांति में तिल के प्रयोग का विशेष महत्व है। इस दिन तिल से उबटन, जल में तिल डालकर स्नान आदि अवश्य करना चाहिए।
इस दिन तिल - स्नान करने वाला मनुष्य सात जन्म तक रोगी नहीं होता है।
इसी लिए निरोगी शरीर की कामना करने वालें मनुष्य को तिल के उबटन से सुबह अवश्य ही स्नान करना चाहिए।
11-देवी पुराण में लिखा है कि जो व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन स्नान नहीं करता है। वह रोगी और निर्धन बना रहता है।

12-तिल युक्त जल पितरों को देना,अग्नि में तिल से हवन करना, तिल खाना खिलाना एवं दान करने से अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है।

14-तिल के दान से आपकी कुंडली के कई दोष दूर होते है , विशेष रूप से कालसर्प योग, शनि की साढ़ेसाती और ढय्या, राहु-केतु के दोष दूर हो जाते हैं। इस दिन तिल के लड्डुओं के साथ हरे मूंग और चावल की खिचड़ी का दान करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
मकर संक्रांति के दिन पितरों के लिए तर्पण करने का विधान है। इस दिन

Gurudew

Bhubneshwar
KSturwanagar
Parnkuti guna
9893946810

Wednesday, 10 January 2018

भागवत में लिखा है – ‘ पूतना लोकबालघ्नी राक्षसा रुधिराशना।’ (10|6|35) ‘ पूतना संसार के बालकों की हत्या करने वाली राक्षसी थी।’

भागवत में लिखा है – ‘ पूतना लोकबालघ्नी राक्षसा रुधिराशना।’ (10|6|35) ‘ पूतना संसार के बालकों की हत्या करने वाली राक्षसी थी।’ ‘ पूतना बालघातिनी।’ (10|6|2) ‘ पूतना बालहत्यारी थी।’ ‘ विबुध्य तां बालकमारिकाग्रहम्।’ (10|6|8) ‘ उसे बालकों को मारने वाला हौआ समझकर’ ‘ बालग्रहस्तत्र विचिन्वती शिशून्।’ (10|6|6) (बच्चों को खोजती हुई वह बालिकाओं के लिये हौआ रुप बनी हुई पूतना) इत्यादि। अतः यह बालकों को लगने वालीएक भूतनी या राक्षसी है। यह प्रायः नित्य है और इस कथा का तात्पर्य ‘रक्षोघ्नकृत्य’ से है।

आनन्दरामायण पूर्णकाणड, अध्याय 5|31, 37 में लिखा है कि जब भगवान् श्रीराम समस्त अयोध्या वासियों के साथ स्वधाम चलने लगे, तब सीता जी के निन्दक धोबी तथा कैकेयी की दासी मन्थरा की इच्छा न देखकर, इन्हें कुश के साथ साकेत भेज दिया। ये लोग प्रभु के साथ न गये। अतः कृष्णावतार में यह रजक हुआ और मन्थरा ही पूतना हुई-

तदा रामस्तं रजकं मन्थरां प्रैषयत्पुरीम्।
कुशेन सहवेगेन समाहूयाऽथ सादरम्।।
पूर्ववैरमनुस्मृत्य ना भ्रंऽयातामधर्मिणी।
कृष्णावतारे तावेव रजको रजकोऽभवत्।।
मन्थरा पूतना जाता हतौ तौ पूर्ववैरतः।।

‘ तब श्रीराम ने उस धोबी को (जिसने जानकी जी पर राक्षस के घर में रहने का आरोप लगाया था) तथा मन्थरा को अपने बड़े पुत्र कुशके साथ शीघ्र अयोध्या लौटा दिया। उसी धोबी ने मथुरा में ( ’ (श्रीकृष्णावतार के समय ) पुनः धोबी के रुप में जन्म लिया और मन्थरा पीतना हुई तथा दोंनो ही पूर्व जन्म के वैर के कारण श्रीकृष्ण के द्वारा मारे गये।
आदि पुराण के 18 वें अध्याय में लिखा है कि पूतना पूर्व जन्म में काल भीरु नामक ऋषि की कन्या ‘ चारुमती’ थी। वह कक्षीवान् नामक महर्षि की पत्नी थी। पति के परदेशन जान पर वह एक शुद्र से संसक्त हुई तथा पति के वापस आने एवं स_द् व्यवहार करने पर भी निरन्तर दुष्टता करती रही। अन्त में कक्षीवान् ने उसे राक्षसी हो जाने का शाप दे दिया-
त्वं वञ्चयित्वा मां नूनं वदभूः कितवे रता।
प्रयातु राक्षसीं योविं दुष्टे दुष्टप्रदूषिता।।
कदाचित्करुणासिन्धुः कृष्णस्संतारयिष्यति।।
‘ तूने मेरी वञ्चना कर के एक धूर्त के साथ प्रेम किया; अतः उस दुष्ट के द्वारा दूषित होने के कारण सिन्धु भगवान् श्रीकृष्ण तेरा उद्धार करेंगे - तुझे राक्षसी योनि से छुड़ायेंगे। ’
इसी पुराण में आगे चलकर नारद जी ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा है कि ‘ ऐसी पापिनी का आपने दूध क्यों पीया ?’ इसके उत्तर में भगवान् ने उन्हें बतलाया कि च्यावन मुनियों को एक दोष से शीघ्र मरने का शाप भगवान् शिव से मिला था। अतः उन्हें पूतना द्वारा मरना पड़ा। उनके
श्रेय- स्मपादन - पुण्य से उसे कृष्णधात्रीत्व का सौभाग्य मिला।
इसी प्रकार ब्रह्मावैवर्त में कृष्णज्मखण्ड में नारायण ने नारद जी से तथा गर्गसंहिता, गोलोकखण्ड में राजा बहु-लाश्व के प्रश्न पर नारदी जी ने कहा था कि ‘ यह पूतना राजा बलिकी कन्या रत्नमाला ही थी। जब वामनावतार में भगवान् श्रीहरि बलि के यहां पधारे तो रत्नमालाको उन्हें देख वात्सल्यभाव हो आया और सोचने लगी कि कदाचित् ऐसा ही मुझे भी कोई लड़का होता, तो मैं उसे दूध पिलाति - पालती ’-
बलियज्ञे वामनस्य दृष्द्वा रुपमतः परम्।
बलिकन्या रत्नमाला पुत्रस्नेहं चकार ह।।
‘ राजा बलि के यज्ञ में भगवान् वामन के श्रेष्ठ रुप को देखकर उसकी कन्या रत्ननमाला को उनके प्रति वात्सल्यका भाव उमड़ आया।’
पाययामि स्तनं तेन प्रसन्नं मे मनस्तदा ।
साभवद् द्वापरान्ते वै पूतना नामविश्रुता।।
वह सोचने लगी - ‘मैं इस बालक को स्तन्यपान कराऊं तब मेरा मन प्रसन्न हो। वही द्वापर के अन्त में जन्म लेकर पीतना के नाम से प्रसिद्ध हुई।’ भगवान् उसके हृदय की बात जान गये और उसकी इच्छा रखने के लिये उन्होंने द्वापर में श्रीकृष्ण रुप से उसका स्तन्यपान किया। इस तरह कल्पभेद से अनेक कथाएं है

कलप बेद हरिचरित सुहाए। भांति अनेक मुनीसन्ह गाए।।
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने।।

अथवा एक के बाद दूसरा जन्म तथा अन्त में कृष्णप्राप्ति समझनी चाहिये। जैसा कि नारद जी के जन्मों में स्पष्ट है। —

शिव पार्वती विवाह (खण्ड-काव्य)  


शिव पार्वती विवाह (खण्ड-काव्य)  

मत्तगयंद सवैया ======
शारद, शॆष, सुरॆश  दिनॆशहुँ,  ईश  कपीश गनॆश मनाऊँ ॥
पूजउँ राम सिया पद-पंकज, शीश गिरीश खगॆशहिं नाऊँ ॥
बंदउँ  चारहु  बॆद  भगीरथ, गंग  तरंगहिं  जाइ नहाऊँ ॥
मातु-पिता-गुरु आशिष माँगउँ, शंभु बरात विवाहु सुनाऊँ ॥

सवैया (मत्तगयंद)
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जैसहिं है छवि दूलह की सखि,तैसि बरात सजावत भॊला !!
दै डुम कारि बजै डमरू अरु,   नाद- सु- नाद सुनावत भॊला !!
नाग गरॆ झुलना जसि झूलत,  दै पुचकारि खिलावत भॊला !!
आइ रहॆ गण  दूत सखी सबु,  ताहि बुलाइ बिठावत भॊला !!

सवैया (मत्तगयंद)
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नंग  धड़ंग  मतंग भुजंगन,  ढंग बि-ढंगन साजि सँगाती !!
भूत भभूति लटॆ लिपटॆ अरु, नाक कटी चिपटी चिचुआती !!
कान कटॆ अरु हॊंठ फटॆ कछु,  दाँत बतीस चुड़ैल दिखाती !!
लागत आजु मसान सखी सब,आइ गयॆ बनि शंभु बराती !!

सवैया (मत्तगयंद)
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मूँक मलूक सलूक नहीं कछु, बॊल रहॆ  बड़-बॊल अधूरा !!
हाँथ कटॆ कछु पाँव कटॆ कछु,आइ गयॆ सजि लंग लँगूरा !!
आँख कढ़ी अरु नाक चढ़ी कछु,धावत चारिहुँ ऒर जँमूरा !!
मारि रहॆ सुटकारि कछू जनि, छानि रहॆ कछु भंग धतूरा !!

सवैया (मत्तगयंद)
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बामहिं हाँथ गहॆ डमरू अरु,  दाँहिन माल फिरावत भॊला !!
ताल भरै जब नाम हरी धुन, जॊरहिं जॊर बजावत भॊला !!
दॆखि रहॆ सुर-वृंद सबै छवि, कॊटिन काम लजावत भॊला !!
आज भयॆ जग-नैन सुखी सखि,रूप-अनूप दिखावत भॊला !!

सवैया (मत्तगयंद)
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डूँड़ह बैल चढ़ॊ सखि दूलह,  रूप छटा नहिं जाइ बखानी !!
बाघिन खाल बनी पियरी-पट,जूँ-लट जूट-जटा लिपटानी !!
साँपन कै सिर-मौर बँधी अरु,कंगन-कुंडल हैं बिछु रानी !!
धूसरि धू्रि रमाय रहॆ तन,  मॊह रहॆ मन औघड़ – दानी !!

सवैया (किरीट)
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नाँचत गावत कूँदत फाँदत, खींस निपॊरत भूत भयंकर !!
बैल चढ़ॆ बृषकॆतु हँसैं सखि, पीटत दॊनहुं  हाँथ दिगंबर !!
दॆख हँसैं नरनारि बरातहिं,बालक मारि भगैं कछु कंकर !!
नाग-गलॆ सिर-चंद-छ्टा सखि,दूलह आजु बनॆ शिवशंकर !!

मत्तगयंद सवैया :-
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बॆद व्रती सबु जॊग-जती सबु,पाहुन आजु बनॆ शिव संगा !!
गाय रहॆ धुनि राम हरी गुन, मंगल गान चुनॆ चित चंगा !!
बाँच रहॆ कछु पॊथि लियॆ अरु,कॊबिद गावत गीत-अभंगा !!
छाइ रही नभ चंद छटा छवि, नाचि रहॆ उड़ि कीट पतंगा !!

मत्तगयंद सवैया :-
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तीनहुँ लॊक हुलास भरॆ अरु, दॆखि रही धरनी शिव शादी !!
शीश झुकाय करॆ शिव वंदन, भाँषि रही जय दॆव अनादी !!
सौरभ डारि रहॆ मग माँझहिं, हाँथ लियॆ गणिका सनकादी !!
नारद पीट  रहॆ  ढ़प  झाँझर, धूम  मचावत  प्रॆत गणादी !!

सवैया (दुर्मिल)
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बहु भाँति बरात सजी सँवरी,किलकाति चली तितरी-बितरी !!
नहिं सूझ रही  कछु बूझ रही, बस गूँज रही तुरही  तुतरी !!
अति धूलि उड़ै जब चंग चढ़ै,तब लागत व्यॊम भयॊ छतरी !!
उतिराइ रहीं उलका नभ मां, जस आतिशबाजि हरै चित री !!

सुन्दरी सवैया =
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सखि तीनहुँ  लॊक हुलास भरॆ, चित चॆत अचॆतन कॆ जग जाहीं !!
नहिं दीख परै कछु भॆद वहाँ,सखि दीन कुलीन न जाति मनाहीं !!
खिखियाइ रहॆ  कछु गाइ रहॆ, कछु दाँत दिखाय बड़ॆ  बतियाहीं !!
पछियाइ रहॆ  कछु धाइ  रहॆ, समुहाइ  रहॆ कछु  मारग  माहीं !!

किरीट सवैया
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नाँचि रहॆ कछु गाइ रहॆ कछु, पीट रहॆ कछु पॆट थपा-थप !!
भाग रहॆ कछु कूँद रहॆ कछु, ऊँघ रहॆ कछु नैन झपा-झप !!
फूट रहॆ कछु छाँड़ि बरातहिं, सूँट रहॆ कछु भाँग सपा-सप !!
लॊग खड़ॆ जिवनार लियॆ मग,खाइ रहॆ कछु भॊज गपा-गप !!

सवैया (मत्तगयंद)
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ताकत-झाँकत नाचत गावत, लाँघत-भागत भूत-सवारी !!
झूमत घूमत हूकत कूकत,  फूँकत शंख उठै धुत  कारी !!
दॆव कहैं बिहराइ चलॊ सब,  आपन  आपन सॆन सँवारी !!
नाक कटै सबहीं कइ जानहु, दॆखत लॊग हँसैं दइ तारी !!

सवैया (मत्तगयंद)
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आपन आपन सॆन लियॆ सुर, साजि चलॆ निज धारि तिरंगा !!
नारद  नाच रहॆ ठुमका  दइ, भाव भरॆ  जियरा अति चंगा !!
तीनहुँ लॊक बिलॊक रहॆ छवि, भावति भामिनि श्रीपति-संगा !!
बाँचत वॆद-बिरंचि सखी सुनु,  आरति आजु  उतारति  गंगा !!

सवैया (मत्तगयंद)
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बाजहिं झाँझ उठैं झनकारहिं,शंख-असंख्य बजावत हूका ॥
गूँजत राग अघॊरि अनाहद, गाइ रहॆ धुनि गान  अचूका ॥
भूत अकूत भभूति चढ़ावहिं, भंग चढ़ी बहु मारहिं कूका ॥
आनँद आजु उठाइ रहॆ सखि, कॊयल काक उलूक महूका ॥
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गाँवन गाँवन  खॊरन -खॊरन, झुण्ड बनाइ खड़ॆ नर नारी ॥
पॆड़न पै चढ़ि ताक रहॆ कछु,बालक और जवान अनारी ॥
चाब रहॆ कछु पान चबाचभ, बूढ़ चबावत छालि सुपारी ॥
आपस मॆं बतियाइ रहॆ सबु, आवत कौन गली त्रिपुरारी ॥
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शिव पार्वती विवाह “खण्ड-काव्य”का यह भी एक मजॆदार प्रसंग,,,,,,
“पार्वती की माँ मैना रानी का नारद जी कॊ उलाहना”
सवैया (मत्तगयंद)
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जाहि घरी हिमजा जनमी मुनि,काह कही तुम नारद बानी ॥
नींक मिलै बहुतै घर या कहुं, तीनहुँ  लॊक  न

जाहि घरी हिमजा जनमी मुनि,काह कही तुम नारद बानी ॥
नींक मिलै बहुतै घर या कहुं, तीनहुँ  लॊक  नहीं वर सानी ॥
भॊरहिं तॆ उठि मॊरि-सुता नित,जात रही हरि धाम सयानी ॥
काह बिगार तुहाँर किया हम,दाव भँजाय लिहौ मुनि ज्ञानी ॥

सवैया (मत्तगयंद)
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दीनहुँ बानर रूप रमा पति, ब्याह तुहाँरि  नहीं हुइ पायॊ !!
कारन एहि सुनौ मुनि नारद, काज सुहावत नाहिं  परायॊ !!
मॊरि लिलॊर चकॊरि सुता तुम, जानत बूझत धार बहायॊ !!
तीनहुँ लॊक इहै चरिचा मुनि, गौरहिँ ब्याहन बाउर आयॊ !!

सवैया (मत्तगयंद)
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जानत भॆद तुहाँर मुनी जग, नारद नाम मिला चुगली मां ॥
आँख मिलावति नाहि बनै अब,हॆरत काह गुनी बगुली मां ॥
एहि बदॆ बिन ब्याह रहॆ तुम, मंगल कॆतु शनी कुँडली मां ॥
कारज एक नहीं बन पावहिँ,  राहु चढ़ा तुहँरी  उँगली मां ॥

सवैया (दुर्मिल)
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कस दॆव ऋषी  कहलाइ रहॆ, तुम नंबर  एक बड़ॆ घटिया ॥
इतहूँ उतहूँ  सुलिगाय मुनी, पुनि सॆंकहु हाँथ परॆ खटिया ॥
नहिं भॆद तुहाँरि मिलै कबहूँ, चुगला-चुगली पटवा-पटिया ॥
नहिं जानबु पीर पराय ऋषी, तुहँरॆ घर नाहि हवै बिटिया ॥

सवैया (मत्तगयंद)
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भाँग पियै अरु गाँज पियै अरु, खाइ धतूर महा अड़बंगा !!
हाँथ लियॆ तुमरी वन डॊलत,लागत जईसन हॊ भिखमंगा !!
दॆह उँघारि फिरै दिन-रातहिं, घामहुँ-शीत नहाइ  न नंगा !!
मॊरि दुलारि बदॆ वर लायहु, कौनहुँ भाँति न हॊइ पसंगा !!

सवैया (मत्तगयंद)
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छींट कसी पुरवासि करैं अरु, बॊलहिं काह विवाह रचायॊ !!
दान दहॆज बचावँइ खातिर, राजन छाँटि  इहै वर लायॊ !!
नाँव धरैं नर-नारि हमैं सब,खॊजत-खॊजत का वर पायॊ !!
मातु-पिता अँधराइ गयॆ कस, गौरहिँ पागल हाँथ गहायॊ !!

सवैया (मत्तगयंद)
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काह कमी हमरॆ घर दॆखहु, राज धिराज हवैं हिम राजा !!
गूँजत चारु दिशा जयकारहिं, नींक घरान पुनीत समाजा !!
नौकर-चाकर सॆवक संतरि,नीति-पुनीति सुलॊक लिहाजा !!
कंचन कॆ नहिं कूत खजानहिं, द्वार सुमॆरु बजावत बाजा !!

सवैया (किरीट)
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भॊरहिं तॆ उठि  मॊरि सुता नित, जात रही  हरि मंदिर द्वारन !!
हाँफत  हाँफत  काँपत  काँपत, शीतहुँ  घामहुँ  द्वार  बुहारन !!
बारिहुँ  मास  प्रदॊष  पुजाइश, सॊम अमावश  भाग सुधारन !!
कौन भला तप-जाप करै असि,मॊरि दुलारि कियॆ जस कानन !!

सवैया (मत्तगयंद)
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मॊरि सुता जप जॊग कियॆ बहु, रात दिना करि एकहिं डारॆ !!
खॊह  गुफा गिरि  कंदर अंदर, यॊग ब्रती तप  मंत्र उचारॆ !!
दान करै नित हॊम करै नित, ऒम् जपै उठि रॊज सकारॆ !!
पाहन पूज थकी बिटिया हरि, काह लिखॊ तुम भाग हमारॆ !!

सवैया (मत्तगयंद)
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शीश झुकाय खड़ॆ मुनि नारद, बॊल रही हिम-भामिनि बैना !!
मॊरि सुता मलया-गिरि चंदन, या बर ठूँठ कुठारि कटै ना !!
मारत हाँथ लिलारि कतौ चिढ़ि, खींचत साँस बहावत नैना !!
क्वाँरि रहै सुकुमारि अजीवन, ब्याह करौं सँग बाउर मैं ना !!
कुछ पद
मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तू पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

धुरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी॥
वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥

कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।
माहिनि तानन सों रसखान, अटा चड़ि गोधन गैहै पै गैहै॥
टेरी कहाँ सिगरे ब्रजलोगनि, काल्हि कोई कितनो समझैहै।
माई री वा मुख की मुसकान, सम्हारि न जैहै, न जैहै, न जैहै॥

मोरपखा मुरली बनमाल, लख्यौ हिय मै हियरा उमह्यो री।
ता दिन तें इन बैरिन कों, कहि कौन न बोलकुबोल सह्यो री॥
अब तौ रसखान सनेह लग्यौ, कौउ एक कह्यो कोउ लाख कह्यो री।
और सो रंग रह्यो न रह्यो, इक रंग रंगीले सो रंग रह्यो री।

Monday, 25 December 2017

दस सिर सहमत नहीं रहे थे | दस सिर सहमत नहीं रहे थे |

दस सिर सहमत नहीं रहे थे |
दस सिर सहमत नहीं रहे थे |
लंका-नगरी बैठ दशानन त्रेता में मुस्काया था |
बीस भुजाओं से सिर सारे मन्द मन्द सहलाया था ||
सीता ने तृण-मर्यादा का जब वो जाल बिछाया था-
बाँये से पहले वाला सिर बहुत-बहुत झुँझलाया था |
ब्रह्मा ने बाँधा था ऐसा, कुछ  भी  ना  कर पाया था |
असंतुष्ट  हो  वचन  सहे  थे |
दस सिर सहमत नहीं रहे थे ||

दहन देख दारुण दुःख लंका दूजा मुख गुर्राया था |
क्षत-विक्षत अक्षय को देखा गला बहुत भर्राया था |
अंगद के कदमों के नीचे तीजा खुब  अकुलाया था |
पैरों ने जब भक्त-विभीषण पर आघात लगाया था |
बाएं से चौथे सिर ने नम-आँखों, दर्द  छुपाया था-
भाई   ने   तो   पैर   गहे   थे |
दस सिर सहमत नहीं रहे थे ||

सहस्त्रबाहु से था लज्जित दायाँ वाला पहला सिर |
दूजे  ने  रौशनी  गंवाई  एक आँख  बाली  से घिर |
तीजा तो बचपन से निकला महादुष्ट पक्का शातिर |
मन्दोदरी से चौथा चाहे  बातचीत हरदम आखिर |
पर  सबके  अरमान  दहे  थे |
दस सिर सहमत नहीं रहे थे ||

शीश नवम था चापलूस बस दसवें की महिमा गाये |
दो पैरों  के, बीस  हाथ  के,  कर्म - कुकर्म  सदा भाये |
मारा रावण राम-चन्द्र ने, पर फिर से वापस आये |
नया  दशानन  पैरों  की  दस  जोड़ी  पर सरपट धाये |
दसों दिशा में बंटे शीश सब, जगह-जगह रावण छाये -
सब सिर के अरमान लहे थे |
दस सिर सहमत नहीं रहे थे ||