ज्योतिष समाधान

Saturday, 5 November 2016

नाड़ी दोस् क्या है और उसका परिहार क्या है

गुण मिलान नहीं होने पर सर्वगुण सम्पन्न कन्या भी अच्छी जीवनसाथी सिद्ध नहीं होगी। गुण मिलाने हेतू मुख्य रूप से अष्टकूटों का मिलान किया जाता है। ये अष्टकूट है, वर्ण, वश्य, तारा, योनी, ग्रहमैत्री,गण, राशि, नाड़ी। विवाह के लिए भावी वर-वधू की जन्म-कुंडली मिलान करते नक्षत्र मेलापक के अष्टकूटों (जिन्हे गुण मिलान भी कहा जाता है) में नाडी को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।
नाड़ी जो कि व्यक्ति के मन एवं मानसिक ऊर्जा की सूचक होती है। व्यक्ति के निजी सम्बंध उसके मन एवं उसकी भावना से नियंत्रित होते हैं, जिन दो व्यक्तियों में भावनात्मक समानता, या प्रतिद्वंदिता होती है, उनके संबंधों में ट्कराव पाया जाता है।

जैसे शरीर के वात, पित्त एवं कफ इन तीन प्रकार के दोषों की जानकारी कलाई पर चलने वाली नाड़ियों से प्राप्त की जाती है, उसी प्रकार अपरिचित व्यक्तियों के भावनात्मक लगाव की जानकारी आदि, मध्य एवं अंत्य नाम की इन तीन प्रकार की नाड़ियों के द्वारा मिलती है।

वैदिक ज्योतिष अनुसार
आदि,
मध्य
तथा अंत्य- ये तीन नाड़ियां यथाक्रमेण आवेग, उद्वेग एवं संवेग की सूचक हैं, जिनसे कि संकल्प, विकल्प एवं प्रतिक्रिया जन्म लेती है।

मानवीय मन भी कुल मिलाकर संकल्प, विकल्प या प्रतिक्रिया ही करता है और व्यक्ति की मनोदशा का मूल्यांकन उसके आवेग, उद्वेग या संवेग के द्वारा होता है। इस प्रकार मेलापक में नाड़ी के माध्यम से भावी दम्पती की मानसिकता, मनोदशा का मूल्यांकन किया जाता है। वैदिक ज्योतिष के मेलापक प्रकरण में

गणदोष,
भकूटदोष
एवं नाड़ी दोष- इन तीनों को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है।

अकेली नाड़ी के 8 गुण होते हैं, जो वर्ण, वश्य आदि 8 कूटों की तुलना में सर्वाधिक हैं, इसलिए मेलापक में नाड़ी दोष एक महादोष माना गया है।
नाड़ी दोष :-
नाड़ी दोष होने पर यदि अधिक गुण प्राप्त हो रहें हो तो भी गुण मिलान को सही माना जा सकता, अन्‍यथा उनमें व्यभिचार का दोष पैदा होने की सभांवना रहती है।

मध्य नाड़ी को पित स्वभाव की मानी गई है। इस लिए मध्य नाड़ी के वर का विवाह मध्य नाड़ी की कन्या से हो जाए तो उनमे परस्पर अंह के कारण सम्बंन्ध अच्छे नहीं बन पाते। उनमें विकर्षण कि सभांवना बनती है। परस्पर लड़ाई -झगड़े होकर तलाक की नौबत आ जाती है। विवाह के पश्चात् संतान सुख कम मिलता है। गर्भपात की समस्या ज्यादा बनती है।

अन्त्य नाड़ी को कफ स्वभाव की मानी इस प्रकार की स्थिति मे प्रबल नाड़ी दोष होने के कारण विवाह करते समय अवश्य ध्यान रखें, जिस प्रकार वात प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए वात नाड़ी चलने पर, वात गुण वाले पदार्थों का सेवन एवं वातावरण वर्जित होता है, अथवा कफ प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए कफ नाड़ी के चलने पर कफ प्रधान पदार्थों का सेवन एवं ठंडा वातावरण हानिकारक होता है, ठीक उसी प्रकार मेलापक में वर-वधू की एक समान नाड़ी का होना, उनके मानसिक और भावनात्मकताल-मेल में हानिकारक होने के कारण वर्जित किया जाता है।

तात्पर्य यह है कि लड़का- लड़की की एक समान नाड़ियां हों तो उनका विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी मानसिकता के कारण, उनमें आपसी सामंजस्य होने की संभावना न्यूनतम और टकराव की संभावना अधिकतम पाई जाती है, इसलिए मेलापक में आदि नाड़ी के साथ आदि नाड़ी का, मध्य नाड़ी के साथ मध्य का और अंत्य नाड़ी के साथ अंत्य का मेलापक वर्जित होता है। जब कि ल़ड़का-लड़की की भिन्न-भिन्न नाड़ी होना उनके दाम्पत्य संबंधों में शुभता का द्योतक है। यदि वर एवं कन्या कि नाड़ी अलग-अलग हो तो नाड़ी शुद्धि मानी जाती है। यदि वर एवं कन्या दोनों का जन्म यदि एक ही नाड़ी मे हो तो नाड़ी दोष माना जाता है। सामान्य नाड़ी दोष होने पर ये उपाय दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

1- आदि नाड़ी- अश्विनी, आर्द्रा पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी,हस्ता, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पुर्वाभाद्रपद

2- मध्य नाड़ी- भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पुर्वाफाल्गुनी,चित्रा, अनुराधा, पुर्वाषाढा, धनिष्ठा, उत्तरासभाद्रपद।

3-अन्त्य नाड़ी- कृतिका, रोहिणी, अश्लेशा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढा, श्रवण, रेवती आदि मध्य व अन्त्य नाड़ी का यह विचार सर्वत्र प्रचलित है, लेकिन कुछ स्थानों पर चर्तुनाड़ी एवं पंचनाड़ी चक्रभी प्रचलित है, लेकिन व्यावहारिक रुप से त्रिनाड़ी चक्र ही सर्वथा उपयुक्त जान पड़ता है।

नाड़ी दोष को इतना अधिक महत्व क्यों दिया गया है, इसके बारे मे जानकारी हेतू त्रिनाड़ी स्वभाव की जानकारी होनी आवश्‍यकत है।

आदि नाड़ी वात् स्वभाव की मानी गई है,
मध्य नाड़ी पित स्वभाव की मानी गई है, जबकि मध्य नाड़ी पित् प्रति एवं अन्त्य नाड़ी कफ स्वभाव की।
यदि वर एवं कन्या की नाड़ी एक ही हो तो नाड़ी दोष माना जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि वात् स्वभाव के वर का विवाह यदि वात् स्वभाव की कन्या से हो तो उनमे चंचलता की अधिकता के कारण समर्पण व आकर्षण की भावना विकसित नहीं होती। विवाह के पश्‍चात् उत्पन्न संतान मे भी वात सम्भावना रहती है।

इसी आधार पर आद्य नाड़ी वाले वर का विवाह आद्य नाड़ी की कन्या से वर्जित माना गया है, अन्यथा उनमें व्याभिचार का दोष पैदा होने की संभावना रहती है।

मध्य नाड़ी को पित् स्वभाव की मानी गई है, इसलिए मध्य नाड़ी के वर का विवाह मध्य नाड़ी की कन्या से हो जाए तो उनमें परस्पर अहं के कारण सम्बंन्ध अच्छे नहीं बन पाते, उनमें विकर्षण की सम्भावना बनती है। परस्पर लड़ाई-झगड़े होकर तलाक की नौबत आ जाती है। विवाह के पश्चात् संतान सुख कम मिलता है। गर्भपात की समस्या ज्यादा बनती है

अन्त्य नाड़ी को कफ स्वभाव की मानी गई है, इसलिए अन्त्य नाड़ी के वर का विवाह यदि अन्त्य नाड़ी की महिला से हो तो उनमें कामभाव की कमी पैदा होने लगती है। शान्त स्वभाव के कारण उनमे परस्पर सामंजस्य का अभाव रहता है। दांपत्‍य मे गलतफहमी होना भी स्वभाविक होती है। नाड़ी होने पर विवाह न करना ही उचित माना जाता है। लेकिन नाड़ी दोष परिहार की स्थिति में यदि कुण्डली मिलान उत्तम बना रहा है, तो विवाह किया जा सकता है।

नाड़ी दोष परिहार

:-क) वर कन्या की एक राशि हो, लेकिन जन्म नक्षत्र अलग-अलग हों या जन्म नक्षत्र एक ही हों परन्तु राशियां अलग हो तो नाड़ी नहीं होता है, यदि जन्म नक्षत्र एक ही हो, लेकिन चरण भेद हो तो अति आवश्यकता अर्थात् सगाई हो गई हो, एक दूसरे को पंसद करते हों तब इस स्थिति मे विवाह किया जा सकता है।

ख) विशाखा, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवति, हस्त, स्वाति, आद्र्रा, पूर्वाभद्रपद इन 8 नक्षत्रों में से किसी नक्षत्र मे वर कन्या का जन्म हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है

ग) उत्तराभाद्रपद, रेवती, रोहिणी, विषाख, आद्र्रा, श्रवण, पुष्य, मघा, इन नक्षत्र में भी वर कन्या का जन्म नक्षत्र पड़े तो नाड़ी दोष नही रहता है। उपरोक्त मत कालिदास का है

घ) वर एवं कन्या के राशिपति यदि बुध, गुरू, एवं शुक्र में से कोई एक अथवा दोनों के राशिपति एक ही हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है।

ङ) ज्योतिष के अनुसार-नाड़ी दोष विप्र वर्ण पर प्रभावी माना जाता है। यदि वर एवं कन्या दोनो जन्म से विप्र हो तो उनमें नाड़ी दोष प्रबल माना जाता है। अन्य वर्णो पर नाड़ी पूर्ण प्रभावी नहीं रहता। यदि विप्र वर्ण पर नाड़ी दोष प्रभावी माने तो नियम का हनन होता हैं। क्योंकि बृहस्पति एवं शुक्र को विप्र वर्ण का माना गया हैं। यदि वर कन्या के राशिपति विप्र वर्ण ग्रह हों, तो इसके अनुसार नाड़ी दोष नहीं रहता। विप्र वर्ण की राशियों में भी बुध व शुक्र राशिपति बनते हैं।

च) सप्तमेश स्वगृही होकर शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो एवं वर कन्या के जन्म नक्षत्र चरण में भिन्नता हो तो नाड़ी दोष नही रहता है। इन परिहार वचनों के अलावा कुछ प्रबल नाड़ी दोष के योग भी बनते हैं, जिनके होने पर विवाह न करना ही उचित हैं। यदि वर एवं कन्या की नाड़ी एक हो एवं निम्न में से कोई युग्म वर कन्या का जन्म नक्षत्र हो तो विवाह न करें ।

अ) आदि नाड़ी- अश्विनी-ज्येष्ठा, हस्त- शतभिषा, उ.फा.-पू.भा. अर्थात् यदि वर का नक्षत्र अश्विनी हो तो कन्या नक्षत्र ज्येष्ठा होने पर प्रबल नाड़ी दोष होगा। इसी प्रकार कन्या नक्षत्र अश्विनी हो तो वर का नक्षत्र ज्येष्ठा होने पर भी प्रबल नाड़ी दोष होगा। इसी प्रकार आगे के युग्मों से भी अभिप्राय समझें।

आ) मध्य नाड़ी - भरणी-अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी-उतराफाल्गुनी, पुष्य-पूर्वाषाढा, मृगशिरा-चित्रा,चित्रा-धनिष्ठा,मृगशिरा-धनिष्ठा।

इ) अन्त्य नाड़ी - कृतिका-विशाखा, रोहिणी-स्वाति, मघा-रेवती; इस प्रकार की स्थिति में प्रबल नाड़ी दोष होने के कारण विवाह करते समय अवश्य ध्यान रखें। सामान्य नाड़ी दोष होने पर किस प्रकार के उपाय दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने का प्रयासकर सकते हैं।

जाने-नाड़ी दोष उपाय

1- वर एवं कन्या दोनों मध्य नाड़ी मे उत्पन्न हो तो पुरुष को प्राण भय रहता है। इसी स्थिति मे पुरुष को महामृत्यंजय जाप करना यदि अतिआवश्यक है। यदि वर एवं कन्या दोनो की नाड़ी आदि या अन्त्य हो तो स्त्री को प्राणभय की सम्भावना रहती है, इसलिए इस स्थिति मे कन्या महामृत्युजय अवश्य करे।

2- नाड़ी दोष होने पर संकल्प लेकर किसी ब्राह्यण को गोदान या स्वर्णदान करना चाहिए

3- अपनी सालगिराह पर अपने वजन के बराबर अन्न दान करें, एवं साथ मे ब्राह्मण भोजन कराकर वस्त्र दान करें

4- नाड़ी दोष के प्रभाव को दूर करने के लिए अनुकूल आहार दान करें। अर्थात् आयुर्वेद के मतानुसार जिस दोष की अधिकतम बने उस दोष को दूर करने वाले आहार का सेवन करें

5- वर एवं कन्या मे से जिसे मारकेश की दशा चल रही हो उसको दशानाथ का उपाय दशाकाल तक अवश्य करना चाहिए।

कुंडली से दाम्पत्य सुख कैसे जाने लिंक ओपन करे

कुंडली मिलान को आज हम एक अन्य रुप में बताने का प्रयास कर रहे हैं. लड़का और लड़की की कुंडली का मिलान भावों के आधार पर भी होना बहुत जरुरी है क्योकि जन्म कुंडली का हर भाव महत्व रखता है. सभी नौ ग्रह कुंडली में अपना स्वतंत्र महत्व रखते हैं.

जब भी कुंडली मिलान की बात आए तो यह देखें कि दोनो की जन्म कुंडली के भाव एक - दूसरे से 6,8 या 12 नहीं होने चाहिए.

छठा भाव रोग, ऋण तथा शत्रुओं का माना जाता है. आठवें भाव को अनिष्टकारी माना जाता है. 12वाँ भाव व्यय का है. इसलिए इन तीनों को ही अशुभ माना गया है.

जैसे लड़के की जन्म कुंडली के जिस भाव में सूर्य है उससे गिनती करते हुए लड़की की कुंडली का सूर्य देखें कि वह किस भाव में स्थित है.

माना लड़के की जन्म कुण्डली में सूर्य दूसरे भाव में है और लड़की की कुंडली में सूर्य नवम भाव में है तो यह एक्-दूसरे से षडाष्टक योग बनाते हैं जो कि शुभ नहीं माना जाता है.

यदि दोनो की कुंडली के सूर्य एक्-दूसरे से 6,8 या 12 वें भाव में स्थित है तब इसे शुभ नहीं माना जाता है.

इसी तरह सभी नौ ग्रहों का आंकलन किया जाएगा और जितने अधिक से अधिक ग्रह एक - दूसरे से शुभ स्थित होगें उतना मिलान अच्छा होगा.

राशि के अनुसार ग्रहों की स्थिति |

अब हम राशियों के आधार पर ग्रहों के मिलान की चर्चा करेगें. मिलान का तरीका भाव मिलान की तरह ही है इसमें हम राशि में स्थित ग्रह को लेते हैं. इस मिलान में हम लड़का और लड़की की कुंडली के ग्रहों को राशि के अनुसार देखते हैं कि कौन सा ग्रह कौन सी राशि में स्थित है.

लड़के की जन्म कुंडली में जिस राशि में जो ग्रह है, वही ग्रह लड़्की की कुंडली में किस राशि में गया है, यह देखना है.

माना लड़के की कुंडली में गुरु वृष राशि में स्थित है और लड़की की कुंडली में तुला राशि में स्थित है, अब यह देखेगे कि दोनो राशियों का आपस में क्या संबंध बन रहा है.

दोनो की जन्म कुण्डली में गुरु जिन राशियों में स्थित वह एक - दूसरे से 6/8 अ़क्ष पर स्थित है अर्थात वृष राशि से तुला राशि छठे भाव में आति है और तुला राशि से वृष राशि आठवें भाव में आती है.

अत: दोनों की जन्म कुण्डली में गुरु की स्थिति एक्-दूसरे से सही नहीं है. अब हम इसी तरह से बाकी ग्रहों को भी देखेगें कि वह एक्-दूसरे से क्या संबंध बनाते हैं.

जो ग्रह जिन राशियों में स्थित है वह यदि 6,8 या 12 वें भाव में स्थित है तब उचित मिलान नही माना जाएगा.

इस मिलान में भी जितने अधिक ग्रह एक्-दूसरे से सही दिशा में स्थित होगें उतना मिलान भी अच्छा होगा.

लग्न का मिलान | 

आइए अब हम लड़के और लड़की की जन्म लग्न की बात करते हैं. लड़के व लड़की की कुंडली का लग्न एक सा नहीं होना चाहिए.

उदाहरण के लिए यदि एक का लग्न मेष है तो दूसरे का लग्न भी मेष नही होना चाहिए.

यदि दोनों का एक सा लग्न होगा तब दोनो में कमियाँ भी एक जैसी ही होगी.

एक को क्रोध आएगा तो दूसरे को भी उतना ही आएगा.

इससे दोनों में अकसर तनाव बने रहने की संभावना बनी रह सकती है.

माना दोनों का अग्नितत्व लग्न है तो क्रोध की मात्रा एक सी होगी और दोनों में हर बात को लेकर जल्दबाजी रह सकती है और कई बार जल्दबाजी में लिए निर्णय गलत भी सिद्ध हो सकते हैं.

यदि दोनो का वायुतत्व लग्न है तब दोनों में व्यवहारिकता की कमी हो सकती है.

हर समय ख्यालों में ही रहना आप दोनो की आदत हो सकती है.

आप हर बात के लिए अत्यधिक चिन्तन मनन करेगें और निर्णय लेने की क्षमता का अभाव रहेगा.

यदि दोनो का जलतत्व लग्न है तब आप दोनो अत्यधिक भावुक होगे और हर बात का निर्णय दिल से लेगें.

भावनाओं में बहकर लिए गए निर्णुय अकसर गलत भी हो जाते हैं.

दोनो का पृथ्वीतत्व होने से दोनों ही ज्यादा ही व्यवहारिक होगें और हर बात को नाप तौल कर करेगें. यह इनकी एक बड़ी कमी हो सकती है.

यह जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लेगें अपितु कुछ ज्यादा ही सोच लेगें. इन्हें जीवन में बदलाव की बजाय ठहराव अधिक पसंद होगा और इस कारण यह आसानी से स्वयं को नए परिवेश अथवा परिस्थितियों में ढ़ाल नहीं पाएंगें.

कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातों का आंकलन |

आइए जन्म कुंडली में स्थित कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलुओ की चर्चा करें. लड़के और लड़की की जन्म कुंडली का स्वतंत्र रुप से अध्ययन भी अपना महत्व रखता है. मिलान से पहले तो यही देखना चाहिए कि व्यक्ति की अपनी स्वयं की कुंडली के योग क्या हैं. यदि वह सही नही है तब आप अपनी कमियों को जानते हुए स्वभाव में बदलाव कर सकते हैं. व्यक्ति विशेष की जन्म कुण्डली में यह देखना चाहिए कि उसकी कुंडली के लग्नेश और सप्तमेश की आपस में क्या स्थिति है?

माना किसी की जन्म कुंडली में लग्नेश दूसरे भाव में है और सप्तमेश तीसरे भाव में स्थित है. ऎसी स्थिति में दोनो का द्विद्वार्दश संबंध माना जाएगा. यह संबंध ज्यादा अच्छा नही है. इसका अर्थ है कि यह व्यक्ति अपने साथी के साथ समझौता करके रहेगा और उसके साथ आरामदायक महसूस नहीं करेगा.

इसी तरह से यदि किसी की जन्म कुंडली में लग्नेश और सप्तमेश आपस में षडाष्टक योग बना रहे हैं तब यह स्थिति बहुत खराब मानी गई है.

किसी व्यक्ति विशेष की जन्म कुंडली में शुक्र से 12वें भाव में पाप ग्रह नहीं होना चाहिए अन्यथा व्यक्ति को संबंधों में तनाव बना रह सकता है या व्यक्ति के शैय्या सुख में कमी रहती है अथवा व्यक्ति अपने साथी से शारीरिक सुख की कमी का अनुभव कर सकता है, कारण कुछ भी हो सकता है. जन्म कुंडली में शुक्र का बहुत महत्व है क्योकि यह भोग का कारक है. शुक्र जिस राशि में स्थित है उसका स्वामी ग्रह अगर वक्री है तब भी संबंधों में लचीलापन नहीं रहता है.

माना शुक्र गुरु की राशि में है और गुरु जन्म कुंडली में वक्री अवस्था में है तब उस व्यक्ति को संबंधों में ज्यादा रुचि नहीं रहेगी.

स्मार्त वैष्णव एकादसी देवउठनी या (देवप्रबोधनी) तुलसी विबाह मुहूर्त लिंक ओपन करे


देव उठनी एकादशी प्रबोधिनी एकादशी पारण ११ को, पारण

(व्रत तोड़ने का) समय = ०१:०९ से ०३:२० पारण तिथि के दिन

हरि वासर समाप्त होने का समय = ०२:३०
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 दूजी देवुत्थान एकादशी = ११/११/२०१६ 

१२ को, दूजी एकादशी के लिए पारण
(व्रत तोड़ने का) समय = ०६:३८ से ०८:४९ 

पारण के दिन द्वादशी सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी 
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एकादशी तिथि प्रारम्भ = १०/नवम्बर/२०१६ को ११:२१ बजे एकादशी

तिथि समाप्त = ११/नवम्बर/२०१६ को ०९:१२ बजे

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(१)एकादशी प्रबोधिनी एकादशी को देव उठनी एकादशी और देवुत्थान एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

(२)एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं।

(३)एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है।

(४)एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है।

(५)यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है।

(६)द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

(७)एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

(८)जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है।

(९)व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।

(१०)व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

(११)कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए।

(१२)कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है।

(१२)जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए।

(१३)दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं।

(१४)सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए।

(१५)जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।.

(१)वेष्णव(२) शैब(३) शाक्त (४)स्मार्त (५)बैदिक सम्प्रदाय किसे कहते है

प्राचीनकाल में

 देव,

 नाग, 

किन्नर, 

असुर,

 गंधर्व, 

भल्ल, 

वराह,

 दानव,

 राक्षस, 

यक्ष,

 किरात,

 वानर, 

कूर्म, 

कमठ, 

कोल,

 यातुधान, 

पिशाच, 

बेताल, चारण आदि जातियां हुआ करती थीं।

 देव और असुरों के झगड़े के चलते धरती के अधिकतर मानव समूह दो भागों में बंट गए। 

पहले बृहस्पति और शुक्राचार्य की लड़ाई चली, फिर गुरु वशिष्ठ और विश्‍वामित्र की लड़ाई चली। इन लड़ाइयों के चलते समाज दो भागों में बंटता गया। 

हजारों वर्षों तक इनके झगड़े के चलते ही पहले सुर और असुर नाम की दो धाराओं का धर्म प्रकट हुआ, यही आगे चलकर यही वैष्णव और शैव में बदल गए।

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लेकिन इस बीच वे लोग भी थे, जो वेदों के एकेश्वरवाद को मानते थे और जो ब्रह्मा और उनके पुत्रों की ओर से थे। इसके अलावा अनीश्वरवादी भी थे। कालांतर में वैदिक और चर्वाकवादियों की धारा भी भिन्न-भिन्न नाम और रूप धारण करती रही। 


शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों के झगड़े के चलते शाक्त धर्म की उत्पत्ति हुई जिसने दोनों ही संप्रदायों में समन्वय का काम किया।
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इसके पहले अत्रि पुत्र दत्तात्रेय ने तीनों धर्मों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव के धर्म) के समन्वय का कार्य भी किया।

 बाद में पुराणों और स्मृतियों के आधार पर जीवन-यापन करने वाले लोगों का संप्रदाय ‍बना जिसे स्मार्त संप्रदाय कहते हैं।

इस तरह वेद और पुराणों से उत्पन्न 5 तरह के संप्रदायों माने जा सकते हैं:-

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1.】 वैष्णव,
2.】 शैव,
3.】 शाक्त,
4 】स्मार्त और
5.】 वैदिक संप्रदाय। 


१】वैष्णव जो विष्णु को ही परमेश्वर मानते हैं,
२】शैव जो शिव को परमेश्वर ही मानते हैं,
३】शाक्त जो देवी को ही परमशक्ति मानते हैं
४】और स्मार्त जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं।
५】अंत में वे लोग जो ब्रह्म को निराकार रूप जानकर उसे ही सर्वोपरि मानते हैं। हालांकि आजकल सब कुछ होचपोच। हालांकि सभी संप्रदाय का धर्मग्रंथ वेद ही है। सभी संप्रदाय वैदिक धर्म के अंतर्गत ही आते हैं लेकिन आजकल यहां भेद करना जरूर हो चला है, क्योंकि बीच-बीच में ब्रह्म समाज, आर्य समाज और इसी तरह के प्राचीनकालीन समाजों ने स्मृति ग्रंथों का विरोध किया है। जो ग्रंथ ब्रह्म (परमेश्वर) के मार्ग से भटकाए, वे सभी अवैदिक माने गए हैं। 'रंग' बना जाति का 'जहर'

1】==*वैष्णव संप्रदाय के उप संप्रदाय :

वैष्णव के बहुत से उप संप्रदाय हैं-

जैसे बैरागी,
दास,
रामानंद,
वल्लभ,
निम्बार्क,
माध्व,
राधावल्लभ,
सखी,
गौड़ीय आदि।
वैष्णव का मूलरूप आदित्य या सूर्य देव की आराधना में मिलता है। भगवान विष्णु का वर्णन भी वेदों में मिलता है। पुराणों में विष्णु पुराण प्रमुख है। विष्णु का निवास समुद्र के भीतर माना गया है। *

*वैष्णव ग्रंथ :

ऋग्वेद में वैष्णव विचारधारा का उल्लेख मिलता है।
ईश्वर संहिता,
पाद्मतन्त,
विष्णु संहिता,
शतपथ ब्राह्मण,
ऐतरेय ब्राह्मण,
महाभारत,
रामायण,
विष्णु पुराण आदि।
*वैष्णव पर्व और व्रत :
एकादशी,
चातुर्मास,
कार्तिक मास,
रामनवमी,
कृष्ण जन्माष्टमी,
होली,
दीपावली आदि।
*वैष्णव तीर्थ :
बद्रीधाम (badrinath),
मथुरा (mathura),
अयोध्या (ayodhya),
तिरुपति बालाजी,
श्रीनाथ,
द्वारकाधीश।
*वैष्णव संस्कार :
1.】 वैष्णव मंदिर में विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियां होती हैं। एकेश्‍वरवाद के प्रति कट्टर नहीं है।
2.】 इसके संन्यासी सिर मुंडाकर चोटी रखते हैं। 3. इसके अनुयायी दशाकर्म के दौरान सिर मुंडाते वक्त चोटी रखते हैं।
4.】 ये सभी अनुष्ठान दिन में करते हैं।
5】 ये सात्विक मंत्रों को महत्व देते हैं।
6.】 जनेऊ धारण कर पितांबरी वस्त्र पहनते हैं और हाथ में कमंडल तथा दंडी रखते हैं।
7.】 वैष्णव सूर्य पर आधारित व्रत उपवास करते हैं।
8.】 वैष्णव दाह-संस्कार की रीति है।
9. 】यह चंदन का तिलक खड़ा लगाते हैं।
10. 】वैष्णव साधु-संत : वैष्णव साधुओं को आचार्य, संत, स्वामी आदि कहा जाता है
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।2】==*शैव संप्रदाय के उप संप्रदाय :

शैव में शाक्त,
नाथ,
दसनामी,
नाग आदि उप संप्रदाय हैं।
महाभारत में माहेश्वरों (शैव) के 4 संप्रदाय बतलाए गए हैं-
शैव,
पाशुपत,
कालदमन
और कापालिक।
शैव मत का मूल रूप ॠग्वेद में रुद्र की आराधना में है।
12 रुद्रों में प्रमुख रुद्र ही आगे चलकर शिव, शंकर, भोलेनाथ और महादेव कहलाए।
इनकी पत्नी का नाम है पार्वती जिन्हें दुर्गा भी कहा जाता है। शिव का निवास कैलाश पर्वत पर माना गया है। *शिव के अवतार : शिव पुराण में शिव के भी दशावतारों के अलावा अन्य का वर्णन मिलता है, जो निम्नलिखित है- 1. महाकाल, 2. तारा, 3. भुवनेश, 4. षोडश, 5.भैरव, 6.छिन्नमस्तक गिरिजा, 7.धूम्रवान, 8.बगलामुखी, 9.मातंग और 10. कमल नामक अवतार हैं। ये दसों अवतार तंत्रशास्त्र से संबंधित हैं। शिव के अन्य 11 अवतार : 1. कपाली, 2. पिंगल, 3. भीम, 4. विरुपाक्ष, 4. विलोहित, 6. शास्ता, 7. अजपाद, 8. आपिर्बुध्य, 9. शम्भू, 10. चण्ड तथा 11. भव का उल्लेख मिलता है।

इन अवतारों के अलावा शिव के
दुर्वासा,
हनुमान,
महेश,
वृषभ,
पिप्पलाद,
वैश्यानाथ,
द्विजेश्वर,
हंसरूप,
अवधूतेश्वर,
भिक्षुवर्य,
सुरेश्वर,
ब्रह्मचारी,
सुनटनतर्क,
द्विज,
अश्वत्थामा,
किरात और
नतेश्वर
आदि अवतारों का उल्लेख भी 'शिव पुराण' में हुआ है जिन्हें अंशावतार माना जाता है। *

शैव ग्रंथ :
वेद का श्‍वेताश्वतरा उपनिषद
शिव पुराण
आगम ग्रंथ
और तिरुमुराई

। शैव व्रत और त्योहार :

चतुर्दशी,
श्रावण मास,
शिवरा‍त्रि,
रुद्र जयं‍‍ती,
भैरव जयंती आदि।

*शैव तीर्थ :
12 ज्योतिर्लिंगों में खास काशी (kashi), बनारस (Benaras),
केदारनाथ (Kedarnath),
सोमनाथ (Somnath),
रामेश्वरम (Rameshvaram),
चिदम्बरम (Chidambaram),
अमरनाथ (Amarnath)
और कैलाश मानसरोवर (kailash mansarovar)

। *शैव संस्कार :

1.】 शैव संप्रदाय के लोग एकेश्वरवादी होते हैं।
2. 】इसके संन्यासी जटा रखते हैं।
3.】 इसमें सिर तो मुंडाते हैं, लेकिन चोटी नहीं रखते।
4.】 इनके अनुष्ठान रात्रि में होते हैं।
5.】 इनके अपने तांत्रिक मंत्र होते हैं।
6. 】ये निर्वस्त्र भी रहते हैं, भगवा वस्त्र भी पहनते हैं और हाथ में कमंडल, चिमटा रखकर धूनी भी रमाते हैं।
7.】 शैव चन्द्र पर आधारित व्रत-उपवास करते हैं। 8. शैव संप्रदाय में समाधि देने की परंपरा है।
9. 】शैव मंदिर को शिवालय कहते हैं, जहां सिर्फ शिवलिंग होता है।
10.】 ये भभूति तिलक आड़ा लगाते हैं।

शैव साधु-संत :
शैव साधुओं को नाथ,
अघोरी,
अवधूत, बाबा,
ओघड़,
योगी,
सिद्ध आदि कहा जाता है।

नोट : मान्यता है कि हिन्दू धर्म में आमजनों को अग्निदाह और साधुओं को समाधि दी जाती है। उक्त जानकारी आमजनों के समझने हेतु संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत की गई है। इसे पूर्ण न समझा जाए।

3】==शाक्त धर्म :

मां पार्वती को शक्ति भी कहते हैं।
वेद, उपनिषद और गीता में शक्ति को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति कहने से अर्थ वह प्रकृति नहीं हो जाती। हर मां प्रकृति है। जहां भी सृजन की शक्ति है, वहां प्रकृति ही मानी गई है इसीलिए मां को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति में ही जन्म देने की शक्ति है।

शाक्त संप्रदाय को शैव संप्रदाय के अंतर्गत माना जाता है। शाक्तों का मानना है कि दुनिया की सर्वोच्च शक्ति स्त्रैण है इसीलिए वे देवी दुर्गा को ही ईश्वर रूप में पूजते हैं। सिन्धु घाटी की सभ्यता में भी मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। शाक्त संप्रदाय प्राचीन संप्रदाय है। गुप्तकाल में यह उत्तर-पूर्वी भारत, कम्बोडिया, जावा, बोर्निया और मलाया प्राय:द्वीपों के देशों में लोकप्रिय था। बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद इसका प्रभाव कम हुआ।

मां पार्वती : मां पार्वती का मूल नाम सती है।

ये 'सती' शब्द बिगड़कर शक्ति हो गया। पुराणों के अनुसार सती के पिता का नाम दक्ष प्रजा‍पति और माता का नाम मेनका है। पति का नाम शिव और पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हैं। यज्ञ में स्वाहा होने के बाद सती ने ही पार्वती के रूप में हिमालय के यहां जन्म लिया था। इन्हें हिमालय की पुत्री अर्थात उमा हैमवती भी कहा जाता है। दुर्गा ने महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों का वध करके जनता को कुतंत्र से मुक्त कराया था। उनकी यह पवित्र गाथा मार्केण्डेय पुराण में मिलती है। उन्होंने विष्णु के साथ मिलकर मधु और कैटभ का भी ‍वध किया था। भैरव, गणेश और हनुमान : अकसर जिक्र होता है कि मां दुर्गा के साथ भगवान भैरव, गणेश और हनुमानजी हमेशा रहते हैं। प्राचीन दुर्गा मंदिरों में आपको भैरव और हनुमानजी की मूर्तियां अवश्य मिलेंगी। दरअसल, भगवान भैरव दुर्गा की सेना के सेनापति माने जाते हैं और उनके साथ हनुमानजी का होना इस बात का प्रमाण है कि राम के काल में ही पार्वती के शिव थे।

प्रमुख पर्व नवदुर्गा :

मार्कण्डेय पुराण में परम गोपनीय साधन, कल्याणकारी देवी कवच एवं परम पवित्र उपाय संपूर्ण प्राणियों की रक्षार्थ बताया गया है। जो देवी की 9 मूर्तियांस्वरूप हैं जिन्हें 'नवदुर्गा' कहा जाता है, उनकी आराधना आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक की जाती है।

धर्म ग्रंथ :

शाक्त संप्रदाय में देवी दुर्गा के संबंध में 'श्रीदुर्गा भागवत पुराण' एक प्रमुख ग्रंथ है जिसमें 108 देवी पीठों का वर्णन किया गया है। उनमें से भी 51-52 शक्तिपीठों का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसी में दुर्गा सप्तशती भी है।

शाक्त धर्म का उद्देश्य :

सभी का उद्देश्य मोक्ष है फिर भी शक्ति का संचय करो। शक्ति की उपासना करो। शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही धर्म है, शक्ति ही सत्य है, शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है और शक्ति की हम सभी को आवश्यकता है। बलवान बनो, वीर बनो, निर्भय बनो, स्वतंत्र बनो और शक्तिशाली बनो। तभी तो नाथ और शाक्त संप्रदाय के साधक शक्तिमान बनने के लिए तरह-तरह के योग और साधना करते रहते हैं। सिद्धियां प्राप्त करते रहते हैं। वेदों को श्रुति ग्रंथ कहा जाता है अर्थात जिस ज्ञान को परमेश्वर से सुनकर जाना गया। वेदों को छोड़कर सभी ग्रंथ स्मृति ग्रंथ कहलाते हैं अर्थात जिस ज्ञान को परंपरा के माध्यम से जाना या जिसे स्मृतियों के आधार पर जाना। अधिकतर लोग इस संप्रदाय का नाम शंकराचार्य से जोड़ते हैं। शंकराचार्य ने तो दसनामी संप्रदाय की स्थापना की थी, जो सभी शिव के उपासक शैव पंथ से हैं।

प्रमुख देवता :

शिव,
विष्णु,
शक्ति,
सूर्य
एवं गणेश

4】== स्मार्त संप्रदाय

स्मृति ग्रंथों में मनु स्मृति सहित सभी स्मृतियां और पुराण आते हैं। वेदों को छोड़कर जो इन ग्रंथों पर आधारित जीवन-यापन करते हैं उनको स्मार्त संप्रदाय का माना जाता है।

जैसे जो विष्णु को भी माने और शिव को भी, दुर्गा को भी और अन्य देवी-देवताओं का भी पूजन करें, वे सभी स्मार्त संप्रदाय के हैं।

अधिकतर हिन्दू स्मार्त संप्रदाय के ही हैं जिसमें एकनिष्ठता का अभाव है।

5】==वैदिक संप्रदाय :

हालांकि सभी संप्रदाय का धर्मग्रंथ वेद ही है। सभी संप्रदाय वैदिक धर्म के अंतर्गत ही आते हैं लेकिन आजकल यहां भेद करना जरूर हो चला है, क्योंकि बीच-बीच में ब्रह्म समाज, आर्य समाज और इसी तरह के प्राचीनकालीन समाजों ने स्मृति ग्रंथों का विरोध किया है। संत मत : भारत के संत मत को भी वैदिक संप्रदाय का माना जाता है जैसे कबीर, दादू आदि सभी एकेश्‍वरवाद पर ही जोर देते हैं। वैदिक धर्म-कर्म पर आधारित हैं। इसमें एक परमेश्‍वर को ही सर्वोपरि शक्ति माना जाता है।

Wednesday, 2 November 2016

पंचकों में कौन कौन से कार्य नही करना चाहिए

पंचक अर्थात ऐसा समय जो प्रत्येक माह में अपना एक अलग महत्व रखता है… कुछ लोग अज्ञान के कारण पंचको को पूर्ण अशुभ समय मान बैठते है परन्तु ऐसा नही है… पंचको में शुभ कार्य भी किये जा सकते है… ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पंचक तब लगते है जब ब्रह्मांड में चन्द्र ग्रह धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण में प्रवेश करते है..इस तरह चन्द्र ग्रह का कुम्भ और मीन राशी में भ्रमण पंचकों को जन्म देता है… कई बार एक अंग्रेजी महीने में पंचक दो बार आ जाते है…

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चन्द्र ग्रह का धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण और शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद तथा रेवती नक्षत्र के चारों चरणों में भ्रमण काल पंचक काल कहलाता है.

. पंचको के बारे में एक पोराणिक कथा है, कहते है की एक बार मंगल ग्रह ने रेवती नक्षत्र के साथ दुष्कर्म कर दिया था, जिसके कारण रेवती अशुद्ध हो गयी थी और परिजनों ने उसके हाथ से जल ग्रहण कर लिया था तब देवताओं के गुरु कहे जाने ब्रहस्पति ने एक सभा बुलाई और जल ग्रहण करने वाले सभी परिजनों का बहिष्कार कर दिया… तब श्रवण नक्षत्र ने यह अपील की कि में तो पिता के कहने पर जल लेने चला गया था… मेरा क्या कसूर है? तब श्रवण नक्षत्र की अपील पर उसे छोड़ दिया गया और श्रवण के पिता धनिष्ठा नक्षत्र, बड़ी बहन पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, छोटी बहन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, माता शतभिषा नक्षत्र और पत्नी रेवती नक्षत्र को पंचक होना करार दे दिया गया…

.कहते है कि तभी से इस दुष्कर्म के कारण क्रूर और पापी ग्रह माना जाने लगा.. अगर आधुनिक खगोल विज्ञान की दृष्टि से देखें तो ३६० अंशो वाले भचक्र में पृथ्वी जब ३०० अंश से ३६० अंश के बिच भ्रमण कर बीच रही होती है तो उस अवधि में धरती पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्यधिक होता है…

उसी अवधि को पंचक काल कहते है

… शास्त्रों में पांच निम्नलिखित पाँच कार्य ऐसे बताये गये है जिन्हें पंचक काल के दोरान नही किया जाना चाहिए:-

—लकड़ी एकत्र करना या खरीदना..
–मकान पर छत डलवाना…
—शव जलाना…
—पलंग या चारपाई बनवाना..
—दक्षिण दिशा की तरफ यात्रा करना…
—ये पांचो ऐसे कार्य है जिन्हें पंचक के दौरान न करने की सलाह प्राचीन ग्रन्थों में दी गयी है

परन्तु आज का समय प्राचीन समय से बहुत अधिक भिन्न है वर्तमान समय में समाज की गति बहुत तेज है इसलिए आधुनिक युग में उपरोक्त कार्यो को पूर्ण रूप से रोक देना कई बार असम्भव हो जाता है…

परन्तु शास्त्रकारों ने शोध करके ही उपरोक्त कार्यो को पंचक काल में न करने की सलाह दी है.. ऐसी भी मान्यता है की अगर उपरोक्त वर्जित कार्य पंचक काल में करने की अनिवार्यता उपस्थित हो जाये तो निम्नलिखित उपाय करके उन्हें किया जा सकता है- —-

लकड़ी का समान खरीदना जरूरी हो तो खरीद ले किन्तु पंचक काल समाप्त होने पर गायत्री माता के नाम पर हवन कराए. इससे पंचक दोष दूर हो जाता है… —

-मकान पर छत डलवाना अगर जरूरी हो तो मजदूरों को मिठाई खिलने के पश्चात ही छत डलवाने का कार्य करे… —

-अगर पंचक काल में शव को धन करना अनिवार्य हो तो शव दाह करते समय पाँच अलग पुतले बनाकर उन्हें भी आवश्य जलाएं….

—पंचक काल में अगर पलंग या चारपाई लेना जरूरी हो तो पंचक काल की समाप्ति के पश्चात ही इस पलंग या चारपाई का प्रयोग करे.. —पंचक काल में अगर दक्षिण दिशा की यात्रा करना अनिवार्य हो तो हनुमान मंदिर में फल चदा कर यात्रा प्रारम्भ करे. ऐसा करने से पंचक दोष दूर हो जा

विबाह मुहूर्त में त्रिबल शुद्धि देखकर ही विबाह करे

विवाह में त्रिबल शुद्धि का महत्व |
विवाह मुहूर्त का विचार करते समय त्रिबल का विचार करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है. त्रिबल अर्थात तीन बल इसमें हम सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का बल देखते हैं. त्रिबल में वर के लिए सूर्य का बल, कन्या के लिए बृहस्पति (गरू) का बल और वर-कन्या दोनों के लिए चंद्रमा बल पर विचार किया जाता है.

स्त्रीणां गुरुबलं श्रेष्ठं पुरुषाणां रवेर्बलम। तयोश्चन्द्रबलं श्रेष्ठमिति गर्गेण निश्चितम।।

यदि मिलान में सूर्य, चंद्रमा तथा बृहस्पति का बल कुछ कम या पूर्ण नहीं हो तो विवाह नहीं किया जाता है.

गुरू को जीवन एवं भाग्य का कारक माना जाता है.
चंद्रमा धन एवं मानसिक शांति प्रदान करता है तथा सूर्य तेज प्रदान करने का कार्य करते हैं इसलिए यदि विवाह के समय यह ग्रह पूर्ण अनुकूल हों तो वर एवं वधु का आने वाला जीवन सूख पूर्वक व्यतीत होता है. वधु के लिए गुरु एवं चंद्रमा का बल और पुरुष के लिए सूर्य तथा चंद्रमा के बल का विचार किया जाता है. यह तीनों बल अत्यंत आवश्यक माने जाते हैं. शरीर एवं धन का संबंध पुरुष से बनता है और बुद्धि का बल ही इन्हें नियंत्रित करने में सक्षम बनता है. इसलिए कन्या के लिए गुरू का बल देखा जाता है क्योंकि शरीर और धन के संवर्धन में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यदि गृहलक्ष्मी का बुद्धि बल श्रेष्ठ है तो गृहस्थ जीवन सुखद रह पाएगा. गुरू-सूर्य तथा चंद्र विचरण |

त्रिबल विचार के लिए वर-वधु की जन्म राशि से विवाह के समय गुरू-सूर्य तथा चंद्र जिन राशियों में विचरण कर रहे हैं, वहां तक गिनती की जाती है.

जैसे पुरूष के लिए सूर्य का विचार करने हेतु देखते हैं कि उसकी चंद्र राशि से वर्तमान राशि में गतिशील सूर्य यदि गिनती करने पर चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में आता है तो इस समय विवाह का त्याग करना उचित होता है.

यदि पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें या नवें स्थान में सूर्य स्थित हो तो सूर्य का दान और पूजादि करके विवाह किया जा सकता है

. यदि सूर्य तीसरे, छठे, दसवें या ग्यारहवें स्थान में हों तो विवाह का होना बहुत शुभप्रद माना जाता है.

कन्या की चंद्र राशि से गोचर का गुरू यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में भ्रमण कर रहा है तो विवाह नहीं करना चाहिए व ऎसे समय का विवाह के लिए त्याग करना ही उचित होता है.

इसके अतिरिक्त यदि पहले, तीसरे, छठे या दशवें स्थान में गुरू हों तो उसकी पूजा एवं दान कराके ही विवाह का विचार शुभकारक होता है.

यदि दूसरे, पांचवे, सातवें, नौवें या ग्यारहवें स्थान में गुरू हों तो विवाह करना शुभप्रद माना जाता है.

चंद्र विचार के लिए वर एवं वधु की चंद्र राशि से गोचर का चंद्रमा यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़े तो अशुभ माना जाता है.

अन्य सभी स्थानों पर चंद्रमा के गोचर को विवाह के लिए शुभ माना जाता है. सूर्य-चंद्र तथा गुरू तीनों ही विवाह के समय यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में भ्रमण कर रहे हों तो अशुभ होते हैं. इस समय विवाह नहीं करना चाहिए.

कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार वर के लिए चंद्रमा को बारहवें में शुभ मानते हैं, लेकिन कन्या के लिए बारहवां चंद्रमा पूर्ण रुप से निषिद्ध माना गया है. इसी प्रकार त्रिबल में सूर्य-चंद्र तथा गुरू का विचार करते हुए ग्यारहवां स्थान सर्वथा शुभ माना जाता है. त्रिबल पूजा विधान |

त्रिबल में वर-वधु की राशि के आधार पर तीनों ग्रहों को देखा जाता है. यदि यह तीनों ग्रह शुभ हैं तो विवाह करना शुभ होता है परंतु यदि किसी ग्रह की शांति की जानी हो तो उस ग्रह की पूजा एवं शांति के साथ उस ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान करने के पश्चात विवाह किया जा सकता है

. लाल पूजा - इन ग्रहों से संबंधित पूजा में सूर्य की पूजा को लाल पूजा कहा जाता है.

पीली पूजा - बृहस्पति की पूजा को पीली पूजा कहा जाता है. यदि विवाह में लाल एवं पीली पूजा करना अनिवार्य है तो उक्त पूजा को करने के बाद ही विवाह किया जाना चाहिए.

यदि संभव हो तो लाल पूजा करने पर विवाह को कुछ समय के लिए टाल देना ही हितकर व शुभ होता है. भावी वर एवं वधु की पत्रिका के आधार पर गोचर में ग्रहों की क्या स्थिति है उसे इस सारणी के आधार पर देखा जा सकता है.
त्रिबल पूजा
                              सुद्ध     पूज्य्       नेष्ट
वर की राशि से सूर्य
        3, 6, 10, 11 1, 2, 5, 7, 9 4, 8, 12
कन्या की राशि से गुरू
2, 5, 7, 9, 11 1, 3, 6, 10 4, 8, 12
दोनों की राशि से चंद्र
3, 6, 7, 10, 11 1, 2, 5, 9, 11 4, 8