Sunday, 21 September 2025

रजस्वला के विधि निषेध का पालन करने वाली ही आदि शंकराचार्य जैसे पुत्र को जन्म दे सकती है। सभी जानते है माँ आर्यम्बा ने मासिक धर्म की अशुद्धि के कारण बालक शंकर को भगवती की सेवा में दूध का पात्र देकर भेजा था और भगवती ने स्वयं प्रकट होकर उसे ग्रहण किया और तो और बालक शंकर को अपने स्तन का दूध भी पिलाया, जिसके कारण वे महान कवि बने। आदि शंकराचार्य जी ने सौंदर्य लहरी में इस बात का संकेत भी किया है। वे सौंदर्य लहरी के ७५ वें श्लोक में लिखते है--- 

तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः
पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव ।
दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत् 
कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ॥ ७५॥

अर्थः- हे धरणिधर कन्ये ! मैं ऐसा समझता हूं कि तेरे स्तनों के दूध का पारावार तेरे हृदय से बहने वाला सारस्वत ज्ञान सदृश है। जिसे पीकर, दयावती होकर तेरे स्तनपान कराने पर द्रविडशिशु ने प्रौढकवियों के सदृश कमनीय कविता की रचना की।

जया किशोरी, प्रेमानन्द बाबा, विचित्र लेखा जैसे बाजारू नट अपनी मीठी मोहित अशास्त्रीय बातों से आपका सर्वनाश ही करेंगें। सदैव याद रखें शास्त्रीय विधि निषेध के सम्यक पालन से ही जीवन में धर्म धारण किया जाता है, उसी धर्म से भगवद्भक्ति पैदा होती है, भक्ति से ज्ञान और ज्ञान से मुक्ति है।

नारायण

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