ज्योतिष समाधान

Monday, 24 September 2018

श्राद्ध कितने प्रकार के होते है मत्स्य पुराण में तीन प्रकार के श्राद्ध बतलाए गए है, । यमस्मृतिमें पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। विश्वामित्र स्मृति, निर्णय सिन्धु तथा भविष्य पुराण में बारह प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता हैं

श्राद्ध के प्रकार

मत्स्य पुराण में तीन प्रकार के श्राद्ध बतलाए गए है, जिन्हें नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य के नाम से जाना जाता है।
यमस्मृतिमें पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। जिन्हें नित्य, नैमित्तिक,काम्य,वृद्धि और पार्वण के नाम से जाना जाता है।
विश्वामित्र स्मृति, निर्णय सिन्धु तथा भविष्य पुराण में बारह प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता हैं

1- नित्य श्राद्धः प्रतिदिन की क्रिया को ही 'नित्य' कहते हैं। अर्थात् रोज-रोज किए जानें वाले श्राद्ध को नित्य श्राद्ध कहते हैं। इस श्राद्ध में विश्वेदेव को स्थापित नहीं किया जाता। अत्यंत आवश्यकता एवं असमर्थावस्थामें केवल जल से इस श्राद्ध को सम्पन्न किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति अन्न, जल, दूध, कुशा, पुष्प व फल से प्रतिदिन श्राद्ध करके अपने पितरों को प्रसन्न कर सकता है।
2- नैमित्तक श्राद्ध- दूसरा नैमित्तिक श्राद्ध है जो किसी को निमित्त बनाकर जो श्राद्ध किया जाता है एक पितृ के उद्देश्य से किया जाता है, यह श्राद्ध विशेष अवसर पर किया जाता है। जैसे- पिता आदि की मृत्यु तिथि के दिन|इसे एकोदिष्ट भी कहा जाता है। एकोद्दिष्ट का मतलब किसी एक को निमित्त मानकर किए जाने वाला श्राद्ध जैसे किसी की मृत्यु हो जाने पर दशाह, एकादशाह आदि एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। इसमें भी विश्वेदेवोंको स्थापित नहीं किया जाता। इसमें विश्वदेवा की पूजा नहीं की जाती है, केवल मात्र एक पिण्डदान दिया जाता है।
3- काम्य श्राद्धः किसी कामना विशेष या सिद्धि की प्राप्ति के लिए यह श्राद्ध किया जाता है। जैसे- पुत्र की प्राप्ति आदि। वह काम्य श्राद्ध के अन्तर्गत आता है।
4- वृद्धि श्राद्धः यह श्राद्ध सौभाग्य वृद्धि के लिए किया जाता है। इसमें वृद्धि की कामना रहती है जैसे संतान प्राप्ति या परिवार में विवाह आदि मांगलिक कार्यो में । इसे नान्दीश्राद्धया नान्दीमुखश्राद्ध के नाम भी जाना जाता है।
5- सपिंडन श्राद्ध- सपिण्डन शब्द का अभिप्राय पिण्डों को मिलाना। दरअसल शास्त्रों के अनुसार जब जीव की मृत्यु होती है, तो वह प्रेत हो जाता है। प्रेत से पितर में ले जाने की प्रक्रिया ही सपिण्डन है। अर्थात् इस प्रक्रिया में प्रेत पिण्ड का पितृ पिण्डों में सम्मेलन कराया जा सकता है। इसे ही सपिण्डनश्राद्ध कहते हैं। मृत व्यक्ति के 12 वें दिन पितरों से मिलने के लिए किया जाता है। इसमें प्रेत व पितरों के मिलन की इच्छा रहती है। ऐसी भी भावना रहती है कि प्रेत, पितरों की आत्माओं के साथ सहयोग का रुख रखें। इसे स्त्रियां भी कर सकती है।
6- पार्वण श्राद्धः जो अमावस्या के विधानके अनुरूप किया जाता है। पिता, दादा, परदादा, सपत्नीक और दादी, परदादी, व सपत्नीक के निमित्त किया जाता है। किसी पर्व जैसे पितृपक्ष, अमावास्या अथवा पर्व की तिथि आदि पर किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है। यह श्राद्ध विश्वेदेवसहित होता है। इसमें दो विश्वदेवा की पूजा होती है।
7- गोष्ठी श्राद्धः गोष्ठी शब्द का अर्थ समूह होता है। जो श्राद्ध सामूहिक रूप से या समूह में सम्पन्न किए जाते हैं। उसे गोष्ठी श्राद्ध कहते हैं।
8- कर्मांग श्राद्धः यह श्राद्ध किसी संस्कार के अवसर पर किया जाता है। कर्मांग का सीधा साधा अर्थ कर्म का अंग होता है, अर्थात् किसी प्रधान कर्म के अंग के रूप में जो श्राद्ध सम्पन्न किए जाते हैं। उसे कर्मांग श्राद्ध कहते हैं। जैसे- सीमन्तोन्नयन, पुंसवन आदि संस्कारों के सम्पन्नता हेतु किया जाने वाला श्राद्ध इस श्राद्ध के अन्तर्गत आता है।
9- शुद्धयर्थ श्राद्धः शुद्धि के निमित्त जो श्राद्ध किए जाते हैं। उसे शुद्धयर्थश्राद्ध कहते हैं। जैसे शुद्धि हेतु ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। यह श्राद्ध परिवार की शुद्धता के लिए किया जाता है।
10- तीर्थ श्राद्धः यह श्राद्ध तीर्थ में जाने पर किया जाता है।
11- यात्रार्थ श्राद्धः यह श्राद्ध यात्रा की सफलता के लिए किया जाता है। यात्रा के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध यात्रार्थ श्राद्ध कहलाता है। जैसे- तीर्थ में जाने के उद्देश्य से या देशान्तर जाने के उद्देश्य से जिस श्राद्ध को सम्पन्न कराना चाहिए वह यात्रार्थश्राद्ध ही है। यह घी द्वारा सम्पन्न होता है। इसीलिए इसे घृतश्राद्ध की भी उपमा दी गयी है।
12- पुष्टयर्थ श्राद्धः पुष्टि के निमित्त जो श्राद्ध सम्पन्न हो, जैसे शारीरिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए किया जाना वाला श्राद्ध पुष्ट्यर्थश्राद्ध कहलाता है। शरीर के स्वास्थ्य व सुख समृद्धि के लिए त्रयोदशी तिथि, मघा नक्षत्र, वर्षा ऋतु व आश्विन मास का कृष्ण पक्ष इस श्राद्ध के लिए उत्तम माना जाता है।
सात से बारहवें प्रकार के श्राद्ध की प्रक्रिया सामान्य श्राद्ध जैसी ही होती है।

Gurudev
भुबनेश्वर पर्णकुटी गुना
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Saturday, 1 September 2018

वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी ०३/सितम्बर/२०१८ को वैष्णव जन्माष्टमी के लिये अगले दिन का पारण समय = ०६:०६ (सूर्योदय के बाद) व्रत-पर्वों का निर्णय सूर्योदय कालीन तिथि के आधार पर और कुछ का रात्रि व्यापिनी तिथि के आधार पर किया जाता है। यद्यपि उदया तिथि ही प्रधान होती है, तथापि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का निर्णय रात्रिव्यापिनी अष्टमी के आधार पर किया जाता है। सप्तमीयुक्त अष्टमी को त्याग देना चाहिए और अष्टमी युक्त नवमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतोपवास करना चाहिये। यहां भी और अन्यत्र भी साधारणतः इस व्रत के विषय में दो मत विद्यमान हैं। स्मात्र्त लोग अर्द्ध रात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी के दिन भी व्रतोपवास करते हैं। लेकिन वैष्णवों को सप्तमी का किंचित मात्र भी स्पर्श मान्य नहीं। उनके यहां सप्तमी का स्पर्श होने पर द्वितीय दिवस ही व्रतोत्सव हेतु मान्य है। चाहे उस दिन अष्टमी क्षण मात्र के लिये ही क्यों न हो।


वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी ०३/सितम्बर/२०१८ को
वैष्णव जन्माष्टमी के लिये अगले दिन का पारण समय = ०६:०६ (सूर्योदय के बाद)

पारण के दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से पहले समाप्त हो गये

दही हाण्डी - ३rd, सितम्बर को

अष्टमी तिथि प्रारम्भ = २/सितम्बर/२०१८ को २०:४७ बजे
मतलव :शाम को /8:47 मिनिट पर  प्रारम्भ

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अष्टमी तिथि समाप्त = ३/सितम्बर/२०१८ को १९:१९ बजे
मतलव:शाम को / 7:19 मिनिट पर समाप्त
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कुछ व्रत-पर्वों का निर्णय सूर्योदय कालीन तिथि के आधार पर और कुछ का रात्रि व्यापिनी तिथि के आधार पर किया जाता है।
यद्यपि उदया तिथि ही प्रधान होती है,

तथापि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का निर्णय रात्रिव्यापिनी अष्टमी के आधार पर किया जाता है।
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सप्तमीयुक्त अष्टमी को त्याग देना चाहिए और अष्टमी युक्त नवमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतोपवास करना चाहिये।

यहां भी और अन्यत्र भी साधारणतः इस व्रत के विषय में दो मत विद्यमान हैं।

स्मात्र्त लोग अर्द्ध रात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी के दिन भी व्रतोपवास करते हैं।

लेकिन वैष्णवों को सप्तमी का किंचित मात्र भी स्पर्श मान्य नहीं।

उनके यहां सप्तमी का स्पर्श होने पर द्वितीय दिवस ही व्रतोत्सव हेतु मान्य है। चाहे उस दिन अष्टमी क्षण मात्र के लिये ही क्यों न हो।

देश, काल और परिस्थिति में विषयान्तर्गत प्रामाणिकता की दृष्टि से सर्वधर्मशास्त्रों में ‘निर्णयसिंधु’ ही श्रेयस्कर है।

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Gurudev -bhubneshwar
Parnkuti guna
जन्माष्टमी पद्मपुराण-
उत्तराखंड श्रीकृष्णावतार की कथा में वर्णन मिलता है कि ‘‘दसवां महीना आने पर भादों मास की कृष्णा अष्टमी को आधी रात के समय श्री हरि का अवतार हुआ।’’

महाभारत -खिलभाग हरिवंश-

विष्णु पर्व - 4/17 के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजित नामक मुहूत्र्त था, रोहिणी नक्षत्र का योग होने से अष्टमी की वह रात जयंती कहलाती थी और विजय नामक विशिष्ट मुहूत्र्त व्यतीत हो रहा था।’’

श्रीमद्भागवत-

10/3/1 के अनुसार भाद्रमास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्द्ध रात्रि के समय भगवान् विष्णु माता देवकी के गर्भ से प्रकट हुए।

गर्ग संहिता गोलोकखंड-

11/22-24 के अनुसार ‘‘भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण-योग, अष्टमी तिथि, आधी रात के समय, चंद्रोदय काल, वृषभ लग्न में माता देवकी के गर्भ से साक्षात् श्री हरि प्रकट हुए।’’

ब्रह्मवैवर्त पुराण-

श्रीकृष्ण जन्मखंड-7 के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग संपन्न हो गया था।

जब अर्ध चंद्रमा का उदय हुआ तब भगवान श्रीकृष्ण दिव्य रूप धारण करके माता देवकी के हृदय कमल के कोश से प्रकट हो गए।

ब्रह्मवैवर्त पुराण-

श्रीकृष्ण जन्मखंड-8 के अनुसार सप्तमी तिथि के दिन व्रती पुरुष को हविष्यान्न भोजन करके संयम पूर्वक रहना चाहिए।

सप्तमी की रात्रि व्यतीत होने पर अरुणोदय की बेला में उठकर व्रती पुरुष प्रातः कालिक कृत्य पूर्ण करने के अनंतर स्नानपूर्वक संकल्प करें।

Gurudev
Bhubneshwar
Parnkuti guna
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Monday, 20 August 2018

श्रावणी उपाकर्म अनुमानित पूजन सामग्री आदरणीय  ब्राह्मण बन्धुओ ........ जैसा कि आपको विदित हो कि प्रति बर्ष की भांति इस बर्ष भी कर्मकांड एबं कथाकार एबं समस्त ब्राह्मण समाज के लिए श्रावणी उपाकर्म का आयोजन बजरंगर किले के पीछे नदी पर रख गया है अतः हम सभी को यथा स्थान को पहुंचना है । प्रात: 6बजे श्रावणी कर्म  प्रारम्भ होगा आप अपने घर से अनुमानित सामग्री ला सकते है।

आदरणीय  ब्राह्मण बन्धुओ ........
जैसा कि आपको विदित हो कि प्रति बर्ष की भांति इस बर्ष भी कर्मकांड एबं कथाकार एबं समस्त ब्राह्मण समाज के लिए श्रावणी उपाकर्म का आयोजन बजरंगर किले के पीछे नदी पर रख गया है
अतः हम सभी को यथा स्थान को पहुंचना है । प्रात: 6बजे श्रावणी कर्म  प्रारम्भ होगा आप अपने घर से अनुमानित सामग्री ला सकते है।

1】हल्दीः--------------------------
२】कलावा(आंटी)-------------
३】अगरबत्ती-------------------    
४】कपूर-------------------------  
५】तिल
६) जो
७】यज्ञोपवीत -----------------  
८】चावल------------------------
९】अबीर-------------------------
१०】गुलाल, -----------------
११ माचिस
१२】सिंदूर --------------------
१३】रोली, --------------------
१४】सुपारी, ( बड़ी)-------- 
१५】नारियल ----------------- 
१६】सरसो----------------------
१७】हवन सामग्री
१८】शहद (मधु)---------------
१९】शकर-----------------------
२०】घृत (शुद्ध घी)------------ 
२१)अगरवत्ती
२९】धुप बत्ती ---------------------
=============================

३०】सप्तमृत्तिका

1】 हाथी के स्थान की मिट्टि-----------
२】घोड़ा बांदने के स्थान की मिटटी--
३】बॉबी की मिटटी---------------------
४】दीमक की मिटटी-------------------
५】नदी संगम की मिटटी---------------
६】तालाब की मिटटी-------------------
७】गौ शाला की मिटटी-----------------
राज द्वार की मिटटी-----------------------
============================

३१】पंचगव्य

१】 गाय का गोबर -----------------
२】गौ मूत्र-----------------------------
३】गौ घृत------------------------------
4】गाय दूध----------------------------
५】गाय का दही ---------------------
=============================

३२】सप्त धान्य-कुलबजन--------100ग्राम

१】 जौ-----------
२】गेहूँ-
३】चावल-
४】तिल-
५】काँगनी-
६】उड़द-
७】मूँग
=============================

३३】कुशा
३४】दूर्वा
35】पुष्प कई प्रकार के
३६】गंगाजल
३७】ऋतुफल

38】

============================
========================
---39स्वेतबस्त्र
========
ब्राह्मण को अपने लिए  उपयोगी सामग्री=
1】धोती
२】दुपट्टा
३】आंगोछा
४】आसन
५】माला
६】गौमुखी
७】लोटा
८】पंचपात्र
९】चमची
१०】तष्टा
११】अर्घा
१२】 डाभ अंगूठी
13 )जनेऊ गांठ लगा हुआ
मो''''''
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अनुष्ठान पूजन सामग्री लिष्ट हमारा ब्लाग ओपन करे

1】हल्दीः--------------------------50 ग्राम
२】कलावा(आंटी)-------------100 ग्राम
३】अगरबत्ती-------------------     3पैकिट
४】कपूर-------------------------   50 ग्राम
५】केसर-------------------------   1डिव्वि
६】चंदन पेस्ट ------------------ 50 ग्राम
७】यज्ञोपवीत -----------------   11नग्
८】चावल------------------------ 05 किलो
९】अबीर-------------------------50 ग्राम
१०】गुलाल, -----------------10 0ग्राम
११】अभ्रक-------------------
१२】सिंदूर --------------------100 ग्राम
१३】रोली, --------------------100ग्राम
१४】सुपारी, ( बड़ी)--------  200 ग्राम
१५】नारियल -----------------  11 नग्
१६】सरसो----------------------50 ग्राम
१७】पंच मेवा------------------100 ग्राम
१८】शहद (मधु)--------------- 50 ग्राम
१९】शकर-----------------------0 1किलो
२०】घृत (शुद्ध घी)------------  01किलो
२१】इलायची (छोटी)-----------10ग्राम
२२】लौंग मौली-------------------10ग्राम
२३】इत्र की शीशी----------------1 नग्
२४】रंग लाल----------------------10ग्राम
२५】रंग काला --------------------10ग्राम
२६】रंग हरा -----------------------10ग्राम
२७】रंग पिला ---------------------10ग्राम
२८】चंदन मूठा--------------------1 नग्
२९】धुप बत्ती ---------------------2 पैकिट
=============================

३०】सप्तमृत्तिका

1】 हाथी के स्थान की मिट्टि-----------50ग्राम
२】घोड़ा बांदने के स्थान की मिटटी--50ग्राम
३】बॉबी की मिटटी---------------------50ग्राम
४】दीमक की मिटटी-------------------50ग्राम
५】नदी संगम की मिटटी---------------50ग्राम
६】तालाब की मिटटी-------------------50ग्राम
७】गौ शाला की मिटटी-----------------50ग्राम
राज द्वार की मिटटी-----------------------50ग्राम
============================

३१】पंचगव्य

१】 गाय का गोबर -----------------50 ग्राम
२】गौ मूत्र-----------------------------50ग्राम
३】गौ घृत------------------------------50ग्राम
4】गाय दूध----------------------------50ग्राम
५】गाय का दही ---------------------50ग्राम
=============================

३२】सप्त धान्य-कुलबजन--------100ग्राम

१】 जौ-----------
२】गेहूँ-
३】चावल-
४】तिल-
५】काँगनी-
६】उड़द-
७】मूँग
=============================

३३】कुशा
३४】दूर्वा
35】पुष्प कई प्रकार के
३६】गंगाजल
३७】ऋतुफल

38】

============================
========================
-----------------56】========ब्राह्मण बरण सामग्री=======

1】धोती
२】दुपट्टा
३】आंगोछा
४】आसन
५】माला
६】गौमुखी
७】लोटा
८】पंचपात्र
९】चमची
१०】तष्टा
११】अर्घा
१२】 डाभ अंगूठी

Gurudev
Bhubneshwar
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६२६२९४६८१०

Friday, 17 August 2018

बंध्यापन दूर करने की विशेष हवन सामग्री- इसमें निम्नलिखित वनौषधियां मिलाई जाती हैं :–

योनिप्रदोषान्मनसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषतत्।
अकालयोगाद्बलसंक्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजापि॥

बीस प्रकार के योनि रोगों में से किसी प्रकार के रोग होने से, अंग विशेष के दूषित होने नया विकारग्रस्त होने से, किसी प्रकार के मानसिक आघात होने से, शुक्र या आर्तव के दूषित होने से, समुचित आहार-विहार का सेवन न करने से, अकाल अर्थात् ऋतुकाल के अतिरिक्त समयम गर्भाधान होने से, रोगादि के कारण अथवा अधिक उपवास करने या कुपोषण आदि के कारण, शरीर के निर्बल हो जाने के कारण, एक बार संतान को जन्म दे चुकने वाली अबंध्या स्त्री भी देर से गर्भ धारण करती है।

बंध्यापन के कारणों का और अधिक स्पष्टीकरण करते हुए इसी में आगे कहा गया है-
विंशतिर्व्यापदो योनेर्निर्दिष्टा रोग सग्रहे।
न शुक्रं धारयत्येभिर्दोषेर्योनिरुपद्रुता तस्माद्गर्भे न गृह्वाति स्त्री...॥

आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार बंध्यापन तीन दोषों के कारण होता है-
(1) आधिदैविक,
(2) आधिभौतिक और
(3) आध्यात्मिक दोष। इनमें से अधिकाँश आधिदैविक दोषों का निराकरण यज्ञोपचार प्रक्रिया द्वारा किया जा सकता है,
जिसमें गायत्री महामंत्र या महामृत्युँजय का जप-अनुष्ठान भी सम्मिलित है।
यज्ञोपचार द्वारा बंध्यापन दूर करने एवं गर्भपुष्टि के लिए इसके विभिन्न कारणों,

दोषों एवं वात, पित्त, कफ आदि प्रकृति के अनुसार अलग-अलग वनौषधियां मिलाई और तदनुरूप हवन सामग्री तैयार की जाती है,
परन्तु यहाँ पर सामान्य रूप से संतानोत्पत्ति के मार्ग में उत्पन्न हुई रुकावट को दूर करने एवं बंध्यत्व दोष को मिटाने के लिए एक विशेष प्रकार की सर्वसुलभ एवं सर्वोपयोगी हवन सामग्री दी जा रही है,
जिसका हवन करने एवं खाने से मनोवाँछित सफलता मिल सकती है।

1. बंध्यापन दूर करने की विशेष हवन सामग्री- इसमें निम्नलिखित वनौषधियां मिलाई जाती हैं :–

सफेद फूलों वाली छोटी कंटकारी (लक्ष्मणा पंचाँग),
(2) जियापोता (पुत्रीजवा) के फल या मूल,
(3) शिवलिंगी के बीज,
(5) ब्रह्मदंडी पंचाँग,
(6) शरपुँखा की जड़,
(7) अपराजिता (विष्णुकाँता) पंचाँग,
(8) उलट-कंबल,
(9) अशोक छाल,
(10) लोध्र,
(11) देवदार,
(12) अश्वगंधा,
(13) जीवक,
(14) बरगद के अंकुर,
(15) चंदन,
(16) खस,
(17) पद्माख
(18) बच,
(19) दोनों सारिवा
(20) चमेली के फूल
(21) बालछड़
(22) कुमुदिनी
(23) नागबला (गंगेरन) की छाल या पत्ता
(24) नागकेशर
(25) जटामाँसी
(26) नागरमोथा
(27) पीपल के पके फल के बीज
(28) गूलर के पके फल
(29) पारस पीतल की जड़ या बीज,
(30) कौंच (केवाँच) की जड़ या बीज।

उक्त सभी 30 चीजों को बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर जौकुट चूर्ण बना लेते हैं और ‘हवन सामग्री क्र.
2’ का लेवल लगाकर एक बड़े पात्र में रख लेते हैं।
इन्हीं तीस चीजों के समग्र पाउडर की कुछ मात्रा को घोट-पीसकर, अधिक बारीक करके कपड़छन कर लिया जाता है और उसे खाने के लिए एक अलग सुरक्षित डिब्बे में रख लिया जाता है।
संतानोत्पत्ति की इच्छुक महिला को इसी बारीक पाउडर में से प्रतिदिन सुबह-शाम एक एक चम्मच चूर्ण घी-शक्कर या गोदुग्ध के साथ हवन करने के पश्चात खिलाया जाता है।
यह प्रयोग कम से कम तीन माह तक (ऋतुकाल के चौथे दिन के बाद) अपनाना होता है।
नित्य हवन करते समय उपयुक्त तैयार ‘हवन सामग्री क्र. 2’ में पहले से तैयार ‘कॉमन हवन सामग्री क्र. 1’ को भी बराबर मात्रा में मिला लेते हैं और तब हवन करते हैं।

इसे खाने के लिए उपयोग में नहीं लाते।
इस कॉमन हवन सामग्री में निम्नाँकित चीजें समभाग में मिली होती है-

अगर, तगर, देवदार, चंदन, लाल चंदन, जायफल, लौंग, गूगल, चिरायता और गिलोय। इसी में गोघृत, शक्कर जौ, और तिल मिलाकर सूर्य गायत्री मंत्र से हवन करते हैं।
सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार हैं- ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यो प्रचोदयात्।
अंत में ‘स्वाहा’ शब्द जोड़कर कम-से-कम चौबीस आहुतियाँ नित्य देते हैं।

संतति के लिए पीपल या पलाश की समिधा सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होती है।

इसी तरह काष्ठ पात्रों में उडुँबर (गूलर) का काष्ठपात्र अधिक लाभकारी होता है।

स्त्रियों में बंध्यत्व रोग की तरह ही पुरुषों में विविध कारणों से उत्पन्न दोष या क्लैव्यता भी संतानोत्पत्ति में एक बहुत बड़ी बाधा होती है। अतः इसके लिए अलग तरह की

क्लैव्Kयतानाशक हवन सामग्री का प्रयोग किया जाता है।
(2) क्लैव्यतानाशक विशिष्ट हवन सामग्री-

इसमें निम्नलिखित चीजें समभाग में मिलाई जाती हैं और उनका जौकुट पाउडर तैयार करके सूर्य गायत्री मंत्र बोलते हुए हवन करते हैं।

(1) गोक्षुर
(2) तालमखाना
(3) अकरकरा
(4) अश्वगंधा
(5) शतावर
(6) लौंग
(7) जायफल
(8) कपूर
(9) कौंच बीज
(10) श्वेत मूसली
(11) काली मूसली
(12) मुलहठी
(13) बला (खिरैटी)
(14) वनउड़द
(15) कदंब की गोंद
(16) कायफल
(17) भिलावा गिरी (शोधित)। हवन करते समय उक्त चीजों से तैयार जौकुट पाउडर में बराबर मात्रा में पूर्व वर्णित ‘कॉमन हवन सामग्री क्र. 1’ को मिला लेते हैं।

क्र. 1 से 17 तक की उपर्युक्त वर्णित वनौषधियों को हवन करने के साथ-ही-साथ खाने में भी प्रयुक्त करते हैं।
इसके लिए इनके सम्मिलित पाउडर को अधिक बारीक कूट-पीसकर कपड़छन चूर्ण तैयार कर लेते हैँ।
इस चूर्ण की एक चम्मच मात्रा सुबह एवं एक चम्मच शाम को दूध के साथ या घी एवं शक्कर के साथ खाते हैं।

भिलावा गिरी सदैव शोधन के बाद ही प्रयोग की जाती है।
इसे हवन सामग्री में न मिलाकर अलग से भी तीन गिरी की मात्रा में प्रतिदिन अकेले ही खाया जा सकता है।

शोधन करने के लिए पके हुए काले भिलावे लेकर एक बोरी में डालते हैं और उसी में इट या खपरे के छोटे छोटे टुकड़े डाल देते हैं।

इसके बाद बोरी को उठाकर आधे घंटे तक चारों तरफ उलट-पुलटकर पटकते हैं।

इससे भिलावे का विषैला रस इट या खपरे के टुकड़े सोख लेते हैं।

इसके उपराँत भिलाव निकालकर अंदर की गिरी निकालते हैं।

अंदर सफेद गिरी मिलेगी। इस बात का यहाँ विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि अगर किसी कारणवश हाथ में जलन होने लगे तो नारियल का तेल लगा लें या घी चुपड़ लें।

भिलावे के विषैले रस से बचने के लिए गिरी निकालते समय हाथ में कपड़ा लपेट लेना चाहिए।

क्लैव्यता मिटाने, आँतरिक दोषों को दूर करने में इस गिरी की विशेष भूमिका होती है।

(3) गर्भपुष्टि की विशेष हवन सामग्री इसमें निम्नलिखित चीजें मिलाई जाती हैं :-

(1) सौंप
(2) कासनी
(3) धनिया
(4) खस
(5) खसखस अर्थात् पोस्त बीज
(6) इंद्र जौ मीठा
(7) पलाश गोंद
(8) मुनक्का
(9) गुलाब के फूल
(10) ब्रह्मदंडी। इन सभी दस चीजों को बराबर मात्रा में लेकर जौकुट पाउडर बना लिया जाता है और एक पात्र में ‘गर्भपुष्टि की विशेष हवन सामग्री
क्र. 2 का लेवल लगाकर उसमें सुरक्षित रख लिया जाता है।
इन्हीं दस चीजों की सम्मिलित मात्रा का कुछ भाग बारीक कूट-पीस करके कपड़छन कर लिया जाता है और उसे नित्य हवन के साथ खाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

खाने के लिए मात्रा एक-एक चम्मच सुबह एवं शाम को गोदुग्ध अथवा घी एवं शक्कर के साथ है।
गर्भवती महिलाओं के लिए यह एक विशेष रूप से उपयोगी है।
इसको हवन करने और चूर्णरूप में खाने वाली माताओं की संतानें स्वस्थ, सुन्दर,हृष्ट पुष्ट एवं दीर्घजीवी होती है।

हवन करते समय पहले से तैयार की गई ‘कॉमन हवन सामग्री
क्र. 1 की बारबर मात्रा को उक्त ‘गर्भपुष्टि की विशेष हवन सामग्री क्र. 2 में मिलाकर तब सूर्य गायत्री मंत्र से हवन करते हैं।

यह हवन उपचार पूरे गर्भकाल तक करते रहने से जननी एवं शिशु दोनों के लिए विशेष लाभकारी सिद्ध होता है। प्रायः देखा जाता है कि कई बार गर्भवती महिलाओं को जी मिचलाने, चक्कर आने, उल्टी होने आदि से लेकर गर्भस्राव होने तक की अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
ऐसी स्थिति में उपर्युक्त हवनोपचार के साथ वर्णित चूर्ण के स्थान पर गर्भस्थापना के तीसरे-चौथे महीने से निम्नलिखित ‘गर्भरक्षक पौष्टिक चूर्ण’ का सेवन कराना चाहिए।
इसमें निम्न चीजें मिलाई जाती हैं-
1. अकरकरा-6 ग्राम
2. जायफल-7 ग्राम
3. जावित्री-7 ग्राम
4. चित्रक-7 ग्राम
5. कपूर कचरी-7 ग्राम
6. धाय के फूल-7 ग्राम
7. तुखमलंगा-7 ग्राम
8. तज-7 ग्राम
9. बड़ी इलायची-7 ग्राम
10. अश्वगंधा-7 ग्राम
11. छोटी पीपल-10 ग्राम,
12. काली मिर्च-10 ग्राम
13. बहमन सुर्ख-10 ग्राम
14. बहमन श्वेत-10 ग्राम
15. दालचीनी-18 ग्राम
16. ढाक (पलाश) के सूखे पत्ते-24 ग्राम
17. सौंठ-27 ग्राम
18. रुमी मस्तगी-27 ग्राम
19. मोती की सीप का चूर्ण (मुक्तिशुक्ति)-12 ग्राम एवं
20. मिश्री-360 ग्राम।

इन सभी 20 चीजों को कूट-पीसकर कपड़छन करके एकसार कर लेना चाहिए और हवन करने के बाद एक-एक चम्मच सुबह-शाम गोदुग्ध के साथ गर्भिणी को खिलाते रहना चाहिए।

डायबिटीज से ग्रस्त गर्भिणी को मात्र क्र. 1 से 19 तक की चीजों से बने पाउडर को ही चौथाई चम्मच की मात्रा में दोनों समय देना चाहिए। उसमें मिश्री नहीं मिलानी चाहिए।
यह गर्भस्थ शिशु की इंद्रियों को पुष्ट कर उसे स्वस्थ, सुन्दर और गर्भावस्था के समय होने वाले सभी उपद्रवों को शाँत करता है। प्रायः देखा जाता है कि किन्हीं-किन्हीं परिवारों में मात्र कन्या शिशु ही जन्मती है।

अतः जिन्हें बालक की चाहत हो, उन्हें चाहिए कि ‘गर्भपुष्टि की विशेष हवन सामग्री’ से हवन करने के साथ ही इच्छुक महिला को जियापोता के पके हुए चार फल प्रतिदिन अथवा शिवलिंगी के सात बीज और मोरपंखी का एक चंदोवा घोट-पीसकर प्रतिदिन अथवा

शिवलिंगी के बीज-10 ग्राम,

जियापोता के 21 फल,

सफेद फूलों वाली छोटी कंटकारी की जड़ या पंचाँग-10 ग्राम
और मोरपंख का चंदोवा-7 नग लेकर सबको अच्छी तरह खरल करके 30 ग्राम पुराने गुड़ के साथ मिलाकर, 21 गोलियाँ बनाकर खिलाएं।
इन तीनों में से किसी एक को प्रतिदिन प्रातःकाल खाली पेट बछड़े वाली गाय के दूध के साथ एक-एक मात्रा या एक-एक गोली ऋतुकाल के चौथे दिन के बाद सात दिन तक इन्हें खिलाना चाहिए।

इसी तरह अगले माह भी 7-7 दिन तक एक-एक खुराक खिलानी चाहिए।

इसको सेवन करने के बाद एक घंटे तक कुछ नहीं खाना चाहिए।

उपर्युक्त सभी उपचारों के साथ अत्यंत खट्टे, तीखे, चरपरे, खारे एवं गरम पदार्थों का परहेज करना आवश्यक है।