ज्योतिष समाधान

Tuesday, 27 June 2017

काम और क्रोध से जुडी 18 बुरी आदतें, इनसे रहना चाहिए बच  कर रन चाहिए भी इंसान कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो, उसकी कुछ न कुछ बुरी आदतें जरूर होती हैं। यही बुरी आदतें उसके पतन का कारण बनती हैं। आज हम आपको मनु स्मृति में बताई गई कुछ बुरी आदतों के बारे में बता रहे हैं। मनु स्मृति के अनुसार काम से संबंधित 10 तथा क्रोध से संबधित 18 बुरी आदतें होती हैं- श्लोक दश काम समुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च। व्यसनानि दुरंतानि प्रयत्नेन विवर्जयेत्।।

काम और क्रोध से जुडी 18 बुरी आदतें, इनसे रहना चाहिए बच  कर रन चाहिए

कोई भी इंसान कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो, उसकी कुछ न कुछ बुरी आदतें जरूर होती हैं। यही बुरी आदतें उसके पतन का कारण बनती हैं।

आज हम आपको मनु स्मृति में बताई गई कुछ बुरी आदतों के बारे में बता रहे हैं।

मनु स्मृति के अनुसार काम से संबंधित 10
तथा क्रोध से संबधित 18 बुरी आदतें होती हैं-

श्लोक

दश काम समुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च।
व्यसनानि दुरंतानि प्रयत्नेन विवर्जयेत्।।

अर्थ-

काम वासना से पैदा होने वाले 10
तथा क्रोध से पैदा होने वाले 8, अर्थात् कुल 18 व्यसनों पर विजय पाना तथा उनसे मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए।

श्लोक
मृगयाक्षदिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियों मदः।
तौर्यत्रिकं वृथाद्या च कामजो दशको गणः।।

अर्थ-

काम के कारण जन्म लेने वाली 10 बुरी आदतें हैं-

1. शिकार खेलना,
2. जुआ खेलना,
3. दिन में अर्धनिद्रित रहते हुए कपोल कल्पनाएं करना,
4. परनिंदा करना,
5. स्त्रियोंं के साथ रहना,
6. शराब पीना,
7. नाचना,
8. श्रृंगारिक कविताएं, गीत आदि गाना,
9. बाजा बजाना,
10. बिना किसी उद्देश्य के घूमना।

श्लोक
पैशुन्यं साहसं मोहं ईर्ष्यासूयार्थ दूषणम्।
वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोपिगणोष्टकः।।

अर्थ-
क्रोध से पैदा होने वाली 8 बुरी आदतें हैं-

1. चुगली करना,
2. साहस,
3. द्रोह,
4. ईर्ष्या करना,
5. दूसरों में दोष देखना,
6. दूसरों के धन को छीन लेना,
7. गालियां देना,
8. दूसरों से बुरा व्यवहार करना।

जानिए काम से जुड़ी 10 बुरी आदतों के बारे में-

1. शिकार खेलना जो लोग काम वासना से ग्रसित होते हैं, शिकार खेलना उनकी एक बुरी आदत होती है। इसके कारण कई बार मनुष्य को अनेक कष्ट उठाने पड़ सकते हैं।

2. जुआ खेलना जुआ खेलने से एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक संपूर्ण परिवार नष्ट हो सकता है। यह एक सामाजिक बुराई है। अतः इससे बचकर रहने में ही भलाई है।

3. दिन में सोते हुए कपोल कल्पनाएं करना काम वासना से ग्रसित लोग दिन में सोते हुए कुछ भी सोचा करते हैं। इनकी कल्पनाएं भी वासना से लिप्त रहती हैं व स्वयं के हित से जुड़ी होती हैं। ऐसे लोग जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते। इसलिए इस बुरी आदत से बचना चाहिए।

4. परनिंदा करना परनिंदा यानी दूसरों की बुराई करना। कुछ लोगों की आदत होती है कि वे हमेशा दूसरों लोगों की बुराई करते रहते हैं। ऐसे लोग यदि आपके सामने दूसरों की बुराई करते हैं तो यह समझना चाहिए कि दूसरों के सामने वह आपकी भी बुराई अवश्य करते होंगे।

5. स्त्रियों के साथ रहना अनेक स्त्रियों के साथ रहना भी काम वासना से जुड़ी एक बुरी आदत है। इसके कारण शरीर, यश, कीर्ति आदि सभी नष्ट हो जाता है। व्यक्ति को परिवार व समाज में भी बुरी नजर से देखा जाता है।

6. शराब पीना शराब पीने से व्यक्ति दुःसाहसी हो जाता है। उसे अपने-पराए, भले-बुरे का भान नहीं रहता। ऐसी अवस्था में वह कुछ ऐसे काम भी कर जाता है जिससे परिवार व समाज में उसे अपयश मिलता है। कई बार उसका परिवार भी नष्ट हो जाता है।

7. नाचना बेमतलब नाचना भी काम वासना से जुड़ी एक बुरी आदत है। जो मनुष्य इस आदत का शिकार होता है, उसे समाज में अच्छा नहीं माना जाता। ऐसे लोगों को समाज से दूर ही रखा जाता है। हालांकि वर्तमान समय में इसे बुरा नहीं माना जाता बल्कि इसे एक कला के रूप में देखा जाता है।

8. बाजा बजाना बिना किसी विशेष उद्देश्य के वाद्य यंत्र बजाना भी काम से जुड़ी बुरी आदत है परंतु वर्तमान समय में इसे बुरा नहीं माना जाता।

9. श्रृंगारिक कविताएं, गीत आदि गाना पारिवारिक जिम्मेदारी छोड़कर श्रृंगार रस की कविताएं लिखना व गाना भी काम से जुड़ी बुरी आदत मानी गई है। पुराने समय में ऐसे व्यक्ति को भी समाज में स्थान नहीं मिलता था, लेकिन वर्तमान समय में इसे बुरा नहीं माना जाता।

10. बिना किसी उद्देश्य के घूमना बिना किसी काम के दिन-भर इधर-उधर भटकते रहना भी एक बुरी आदत है। ऐसे लोग न तो परिवार के काम आते हैं और न ही समाज के। इनके जीवन का कोई लक्ष्य भी निर्धारित नहीं होता।

क्रोध से उत्पन्न होने वाली 8 बुरी आदतें इस प्रकार हैं

1. चुगली करना मनु स्मृति के अनुसार चुगली करना क्रोध से उत्पन्न 8 बुरी आदतों में से एक मानी गई है। चुगली करने से मान-सम्मान में कमी आ सकती है। कई बार अपमान का सामना भी करना पड़ सकता है।

2. साहस साहसी होना अच्छी बात है, लेकिन कुछ लोग क्रोध में आकर दुःसाहसी हो जाते हैं और ये ऐसा काम कर जाते हैं, जिसकी इनसे उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे लोग कई बार अन्य लोगों के गुस्से का शिकार भी हो सकते हैं।

3. द्रोह क्रोध में आकर बिना कुछ सोचे-समझे द्रोह करना यानी विरोध करना भी एक बुरी आदत है। बाद में स्थिति सामान्य होने पर आपको स्वयं पर शर्मिंदा भी होना पड़ सकता है।

4. ईर्ष्या करना कुछ लोगों की आदत होती है दूसरों से ईर्ष्या करने की। ऐसे लोग दूसरों की तरक्की देखकर जलते हैं और उन्हें हमेशा भला-बुरा कहते हैं। ऐसे लोगों को जीवन में कभी संतोष नहीं मिलता।

5. गालियां देना गाली देकर बात करने वाले लोगों को सभ्य नहीं माना जाता। ये भी क्रोध से उत्पन्न होने वाली एक बुराई ही है। क्रोध में आकर किसी को गाली देते समय व्यक्ति अपने आपे में नहीं रहता और बड़े बूढ़ों का लिहाज भी नहीं करता। इसलिए ऐसी स्थिति से बचना चाहिए।

6. दूसरों में दोष देखना कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें अन्य लोगों में सिर्फ दोष ही नजर आते हैं। ऐसे लोग सामाजिक नहीं कहे जाते। लोग इनके साथ घुलना-मिलना पसंद नहीं करते। ऐसे लोग को परिवार व समाज में भी उचित स्थान नहीं मिलता। अतः इस बुरी आदत से बचना चाहिए।

7. दूसरों के धन को छीन लेना जो लोग दूसरों के धन को बलपूर्वक छिन लेते हैं, वे सभी की निंदा के पात्र होते हैं। ऐसे लोग निजी हित के लिए अपनों का नुकसान करने से भी नहीं चूकते। इसलिए इन लोगों से कोई मेल-जोल नहीं बढ़ाता। सभी बच कर रहने की कोशिश करते हैं।

8. दूसरों से बुरा व्यवहार करना कुछ लोगों का स्वभाव बहुत ही बुरा होता है। ऐसे लोग दूसरों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं। वे अपने-पराए में भेद नहीं कर पाते। इसलिए परिवार व समाज में इन्हें उचित स्थान नहीं मिलता।

मनु स्मृति के अनुसार, विद्या यानी ज्ञान जहां से भी, जिस किसी भी व्यक्ति से, चाहे वो अच्छा हो या बुरा लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। ज्ञान से हम अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। ज्ञान प्राप्त होने पर हमारे लिए कुछ भी पाना ज्यादा कठिन नहीं रह जाता, लेकिन इसके लिए जरूरी है उस ज्ञान को अपने चरित्र में उतारना। ज्ञान सिर्फ सुनने तक ही सीमित नहीं है, उसे अपने आचार-विचार, व्यवहार व जीवन में उतारने पर ही हम अपने लक्ष्य को आसानी से पा सकते हैं। ज्ञान ही हमें देश-दुनिया में लगातार हो रहे बदलावों के बारे में बताता है। इन बातों को जानकर ही हमारी मानसिकता भी बड़ी होती है। इसलिए विद्या जहां से भी मिले, उसे लेने का प्रयास करना चाहिए।

श्लोक
स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम्।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः।।

अर्थ-

जहां कहीं या जिस किसी से (अच्छे या बुरे व्यक्ति, अच्छी या बुरी जगह आदि पर ध्यान दिए बिना)
1. सुंदर स्त्री, 2. रत्न, 3. विद्या, 4. धर्म, 5. पवित्रता, 6. उपदेश तथा 7. भिन्न-भिन्न प्रकार के शिल्प मिलते हों, उन्हें बिना किसी संकोच से प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

1. रत्न रत्न बहुत प्रकार के होते हैं जैसे- मोती, पन्ना, माणिक, मूंगा, हीरा, पुखराज आदि। इनकी कीमत बहुत अधिक होती है। इनमें से कुछ रत्न ग्रह दोष को कम कर शुभ परिणाम देते हैं। हीरा भी एक बहुमूल्य रत्न है, लेकिन यह कोयले की खान में मिलता है। उसी प्रकार मोती व मूंगा समुद्र की गहराइयों से प्राप्त होता है। देखा जाए तो कोयले की खान व समुद्र की तलहटी को साफ-स्वच्छ स्थान नहीं कहा जा सकता, लेकिन फिर भी यहां से प्राप्त होने वाले रत्न बेशकीमती होते हैं और हम इन्हें धारण भी करते हैं। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि रत्न किसी भी स्थान से मिले, उसे लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।

2. विद्या मनु स्मृति के अनुसार, विद्या यानी ज्ञान जहां से भी, जिस किसी भी व्यक्ति से, चाहे वो अच्छा हो या बुरा लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। ज्ञान से हम अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। ज्ञान प्राप्त होने पर हमारे लिए कुछ भी पाना ज्यादा कठिन नहीं रह जाता, लेकिन इसके लिए जरूरी है उस ज्ञान को अपने चरित्र में उतारना। ज्ञान सिर्फ सुनने तक ही सीमित नहीं है, उसे अपने आचार-विचार, व्यवहार व जीवन में उतारने पर ही हम अपने लक्ष्य को आसानी से पा सकते हैं। ज्ञान ही हमें देश-दुनिया में लगातार हो रहे बदलावों के बारे में बताता है। इन बातों को जानकर ही हमारी मानसिकता भी बड़ी होती है। इसलिए विद्या जहां से भी मिले, उसे लेने का प्रयास करना चाहिए।

3. धर्म धर्म एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है धारण करना। धर्म का अर्थ बहुत विशाल है, इसे कुछ शब्दों में स्पष्ट करना मुश्किल है। धर्म हमें अपना काम जिम्मेदारी से करना सिखाता है। दूसरों की भलाई करना, किसी भी परिस्थिति में अपने चरित्र को बेदाग बनाए रखना, पूरी ईमानदारी से अपने परिवार का पालन-पोषण करना व हमेशा सच बोलना भी धर्म का ही एक रूप है। जहां कहीं से भी हमें सादा जीवन-उच्च विचार जैसे सिद्धांत मिले, उसे ग्रहण करने की कोशिश करनी चाहिए। यही धर्म का सार है।

4. पवित्रता पवित्रता का संबंध सिर्फ शरीर से ही नहीं बल्कि आचार-विचार, व्यवहार व सोच से भी है। जब तक हमारा व्यवहार व सोच पवित्र नहीं होंगे, हम जीवन में उन्नति नहीं कर सकते। इसलिए यदि हमें कोई कठिन लक्ष्य प्राप्त करना है तो हमें अपने विचार शुद्ध रखने होंगे। साथ ही, चरित्र यानी व्यवहार भी साफ रखना होगा। जब हमारा व्यवहार व मानसिकता पवित्र होगी, तभी हम बिना झिझक अपना काम जिम्मेदारी से कर पाएंगे और अपना लक्ष्य पाने में सफल भी होंगे। मनु स्मृति के अनुसार, जहां से हमें पवित्र यानी साफ विचार मिले, उसे तुरंत ग्रहण कर लेना चाहिए। यही पवित्र विचार हमें हमारे लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद करते हैं।

5. उपदेश यदि आप कहीं से गुजर रहे हों और कोई संत या महात्मा उपदेश दे रहे हों तो थोड़ी देर वहां रुकने में संकोच नहीं करना चाहिए। किसी संत का उपदेश आपको नया रास्ता दिखा सकता है। संतों के उपदेश में ही मन की शांति, लक्ष्य की प्राप्ति, परिवार की संतुष्टि व समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अहम सूत्र आपको मिल सकते हैं। जब आप संतों व महात्माओं के उपदेशों को अपने जीवन में उतारेंगे तो आपकी अनेक परेशानियां अपने आप ही समाप्त हो जाएंगी। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि जहां कहीं भी या जिस किसी से भी उपदेश मिले, बिना संकोच के उसे लेने का प्रयास करना चाहिए।

मनु स्मृति के अनुसार कुछ लोगों को कभी मेहमान नहीं बनाना चाहिए और यदि ऐसे लोग दिख भी जाएं तो उनसे नमस्ते भी नहीं करना चाहिए। ये लोग कौन हैं और इन्हें क्यों मेहमान नहीं बनाना चाहिए, जानिए-

भारतीय संस्कृति के अनुसार अगर कोई अनजान व्यक्ति भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए।

मनु स्मृति के अनुसार कुछ लोगों को कभी मेहमान नहीं बनाना चाहिए और यदि ऐसे लोग दिख भी जाएं तो उनसे नमस्ते भी नहीं करना चाहिए। ये लोग कौन हैं और इन्हें क्यों मेहमान नहीं बनाना चाहिए, जानिए-

श्लोक पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकांछठान्। हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाड्मात्रेणापि नार्चयेत्।।

अर्थात्-

1. पाखंडी, 2. दुष्ट कर्म करने वाला, 3. दूसरों को मूर्ख बनाकर उनका धन लूटने वाला, 4. दूसरों को दुख पहुंचाने वाला व 5. वेदों में श्रद्धा न रखने वाला।

इन 5 लोगों को अतिथि नहीं बनाना चाहिए और इनका शिष्टाचार पूर्वक स्वागत भी नहीं करना चाहिए।

1. पाखंडी जो लोग अपने मूल स्वभाव को छुपाकर स्वयं को सज्जन दिखाने का प्रयास करते हैं, ऐसे लोग पाखंडी होते हैं। ऐसे लोग धर्म के नाम पर लोगों के साथ छल करते हैं और उनका धन, वैभव आदि छिन लेते हैं। ऐसे लोग अपने निजी हितों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और अपने परिवार, मित्र, हितैशी आदि का भी नुकसान कर सकते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पाखंडी लोगों को कभी मेहमान नहीं बनाना चाहिए।

2. दुष्ट कर्म करने वाला ऐसे लोग जो लूट-पाट, डकैती, चोरी आदि बुरे काम करते हैं तथा बलपूर्वक लोगों की संपत्ति पर अधिकार करते हैं, को कभी अतिथि नहीं बनाना चाहिए। ऐसे लोग अपना हित साधने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अतिथि बनकर आने पर यह आपकी संपत्ति पर भी हाथ साफ कर सकते हैं। ऐसे लोग योजनाबद्ध तरीके से आपके घर व जमीन आदि पर कब्जा भी कर सकते हैं। अगर आप इनकी योजना जान जाएं तो ये आपका अहित करने से भी चूकते। इसलिए दुष्ट कर्म करने वाले लोगों को कभी अतिथि नहीं बनाना चाहिए

3. दूसरों को मूर्ख बनाकर उनका धन लूटने वाला जो लोग दूसरों को अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में उलझाकर उनका धन हड़प लेते हैं, ऐसे लोगों को भी कभी अतिथि नहीं बनाना चाहिए। ऐसे लोग खास तौर पर महिलाओं व बुजुर्गों को अपना शिकार बनाते हैं और रुपया-पैसा दोगुना करने का लालच देकर उनका माल हड़प लेते हैं। यदि इनकी नजर आपकी धन-संपत्ति पर पड़ जाए तो ये आपको भी बहला-फुसलाकर अपना हित साध सकते हैं। ऐसे लोग समय आने पर अपने-पराए का भेद भी भूल जाते हैं और जान-माल का नुकसान भी कर सकते हैं। इसलिए दूसरों को मूर्ख बनाकर उनका धन लूटने वालों को कभी अतिथि नहीं बनाना चाहिए।

4. दूसरों को दुख पहुंचाने वाला आमतौर पर लोग दूसरों का दुख बांटने की कोशिश करते हैं मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें दूसरों को दुखी देखकर आनंद आता है। ऐसे लोग अक्सर अन्य लोगों को किसी न किसी रूप में दुख पहुंचाने की कोशिश करते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति को अगर घर पर अतिथि बनाकर बुलाया जाए तो निश्चित रूप से ये आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को दुख पहुंचाने की कोशिश करेंगे। महिलाओं व बच्चों का स्वभाव पुरुषों की अपेक्षा कुछ नरम होता है। ये लोग इस बात का फायदा उठाकर उन्हें भी दुख पहुंचा सकते हैं। इसलिए ऐसे लोग जो दूसरों को दुख पहुंचाते हों, को कभी अतिथि नहीं बनाना चाहिए।

5. वेदों में श्रद्धा न रखने वाला जो व्यक्ति वेदों में श्रद्धा नहीं रखता, वह नास्तिक होता है। ऐसे लोगों अधार्मिक कार्यों को करने वाले हो सकते हैं। इन्हें सामाजिक व पारिवारिक मूल्यों का ज्ञान नहीं होता। अनजाने में ही कई बार ऐसी बातें कह जाते हैं जो परिवार के सामने नहीं कहनी चाहिए या जिससे किसी का मन दुख सकता है। ऐसी स्थिति में वाद-विवाद होने की संभावना अधिक रहती है। ऐसे लोगों के घर में आने से नकारात्मक ऊर्जा (नेगेटिव एनर्जी) अधिक हो जाती है व सकारात्मक ऊर्जा (पॉजिटिव एनर्जी) का स्तर कम हो सकता है। अतः जो व्यक्ति वेदों में श्रद्धा न रखता हो, उसे कभी अतिथि नहीं बनाना चाहिए।

मनुस्मृति के एक श्लोक में बताया गया है कि किन लोगों के सामने आ जाने पर स्वयं मार्ग से हटकर इन्हें पहले जाने देना चाहिए।

मनुस्मृति के एक श्लोक में बताया गया है कि किन लोगों के सामने आ जाने पर स्वयं मार्ग से हटकर इन्हें पहले जाने देना चाहिए।

श्लोक

चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः।
स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च।।

अर्थात-

रथ पर सवार व्यक्ति, वृद्ध, रोगी, बोझ उठाए हुए व्यक्ति, स्त्री, स्नातक, राजा तक वर (दूल्हा)। इन आठों को आगे जाने का मार्ग देना चाहिए और स्वयं एक ओर हट जाना चाहिए।

1- रथ पर सवार व्यक्ति मनुस्मृति के अनुसार यदि कहीं जाते समय सामने रथ पर सवार कोई व्यक्ति आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर उसे मार्ग दे देना चाहिए। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो रथ पर सवार व्यक्ति किसी ऊंचे राजकीय पद पर हो सकता है या वह राजा के निकट का व्यक्ति भी हो सकता है। मार्ग न देने की स्थिति में वह आपका नुकसान भी कर सकता है। इसलिए कहा गया है कि रथ पर सवार व्यक्ति को तुरंत रास्ता दे देना चाहिए। वर्तमान में रथ का स्थान दो व चार पहिया वाहनों ने ले लिया है।

2- वृद्ध अगर रास्ते में कोई वृद्ध स्त्री या पुरुष आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर उसे पहले मार्ग दे देना चाहिए। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार वृद्ध लोग सदैव सम्मान के पात्र होते हैं, उन्हें किसी भी स्थिति में अपमानित नहीं करना चाहिए। यदि वृद्ध को रास्ता न देते हुए हम पहले उस मार्ग का उपयोग करेंगे तो यह वृद्ध व्यक्ति का अपमान करने जैसा हो जाएगा। वृद्ध के साथ ऐसा व्यवहार करने के कारण समाज में हमें भी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा। सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि परिवार को भी हीन समझा जाएगा। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि स्वयं पीछे हटकर वृद्ध को पहले मार्ग देना चाहिए।

3- रोगी रोगी व्यक्ति दया व स्नेह का पात्र होता है। यदि रास्ते में कोई रोगी सामने आ जाए तो उसे पहले जाने देना ही शिष्टता है। संभव है रोगी उपचार के लिए जा रहा हो अगर हम उसे मार्ग न देते हुए पहले स्वयं रास्ते का उपयोग करेंगे तो हो सकता है रोगी को उपचार मिलने में देरी हो जाए। उपचार में देरी से रोगी को किसी विकट परिस्थिति का सामना भी करना पड़ सकता है। रोगियों की सेवा करना बड़ा ही पुण्य का काम माना गया है। इसलिए रोगी व्यक्ति के लिए स्वयं मार्ग से हट जाना चाहिए।

4- बोझ उठाए हुआ व्यक्ति यदि मार्ग पर एक ही व्यक्ति के निकलने का स्थान हो और सामने बोझ उठाए हुआ व्यक्ति आ जाए तो पहले उसे ही जाने देना चाहिए। ऐसा हमें मानवीयता के कारण करना चाहिए। जिस व्यक्ति के सिर या हाथों में बोझ होता है वह सामान्य स्थिति में खड़े मनुष्य से अधिक कष्ट का अनुभव कर रहा होता है। ऐसी स्थित में हमें मानवीयता का भाव मन में रखते हुए उसे ही पहले जाने देना चाहिए। यही शिष्टता है। ऐसा करने से समाज में आपका सम्मान और भी बढ़ेगा।

5- स्त्री मनुस्मृति के अनुसार यदि मार्ग में कोई स्त्री आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर पहले उसे ही जाने देना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदू धर्म में स्त्री को बहुत ही सम्माननीय माना गया है। किसी भी तरीके से स्त्री का अनादर नहीं करना चाहिए। स्त्री को मार्ग न देते हुए स्वयं पहले उस रास्ते का उपयोग करना स्त्री का अनादर करने जैसा ही है। स्त्री का अनादर करने से धन की देवी लक्ष्मी व विद्या की देवी सरस्वती दोनों ही रूठ जाती हैं और ऐसा करने वाले के घर में कभी निवास नहीं करती। इसलिए स्त्री के मार्ग से स्वयं पीछे हटकर उसे ही पहले जाने देना चाहिए।

6- स्नातक ब्रह्मचर्य आश्रम में रहते हुए गुरुकुल में सफलता पूर्वक शिक्षा पूरी करने वाले विद्यार्थी को एक समारोह में पवित्र जल से स्नान करा कर सम्मानित किया जाता था। इन्हीं विद्वान विद्यार्थी को स्नातक कहा जाता था। वर्तमान परिदृश्य में स्नातक को वेद व शास्त्रों का ज्ञान रखने वाला विद्वान माना जा सकता है। यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसे वेद-वेदांगों का संपूर्ण ज्ञान हो और वह सामने आ जाए तो उसे पहले जाने देना चाहिए। क्योंकि ऐसा ही व्यक्ति समाज में ज्ञान की रोशनी फैलाता है। इसलिए वह हर स्थिति में आदरणीय होता है।

7- राजा राजा प्रजा का पालन-पोषण करने वाला व विपत्तियों से उनकी रक्षा करने वाला होता है। राजा ही अपनी प्रजा के हित के लिए निर्णय लेता है। राजा हर स्थिति में सम्माननीय होता है। अगर जिस मार्ग पर आप चल रहे हों, उसी पर राजा भी आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर राजा को जाने देना चाहिए। ऐसा न करने पर राजा आपको दंड भी दे सकता है। अगर आप दंड नहीं पाना चाहते तो पहले राजा को ही आगे जाने का मार्ग देना चाहिए।

8- दूल्हा मनुस्मृति के अनुसार दूल्हा यानी जिस व्यक्ति का विवाह होने जा रहा हो वह आपके मार्ग में आ जाए तो पहले उसे ही जाने देना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि दूल्हा बना व्यक्ति भगवान शिव का स्वरूप होता है इसलिए वह भी सम्मान करने योग्य कहा गया है। इसलिए यदि रास्ते में दूल्हा आ जाए तो पहले ही उसे मार्ग देना चाहिए। यही शिष्टाचार भी है।

Monday, 26 June 2017

विद्यार्थी के पाँच लक्षण होते हैं : कौवे जैसी दृष्टि , बकुले जैसा ध्यान , कुत्ते जैसी निद्रा , अल्पहारी और गृहत्यागी । अनभ्यासेन विषम विद्या । बिना अभ्यास के विद्या बहुत कठिन काम है सुखार्थी वा त्यजेत विद्या , विद्यार्थी वा त्यजेत सुखम ।सुखार्थिनः कुतो विद्या , विद्यार्थिनः कुतो सुखम ॥


स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान सर्वत्र पूज्यते ।
राजा अपने देश में पूजा जाता है , विद्वान की सर्वत्र पूजा होती है

काकचेष्टा वकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च |
अल्पहारी गृह्त्यागी विद्यार्थी पंचलक्षण्म् ।|

विद्यार्थी के पाँच लक्षण होते हैं :

1कौवे जैसी दृष्टि ,
2बकुले जैसा ध्यान ,
3कुत्ते जैसी निद्रा ,
4अल्पहारी और
5गृहत्यागी ।

अनभ्यासेन विषम विद्या ।

बिना अभ्यास के विद्या बहुत कठिन काम है

सुखार्थी वा त्यजेत विद्या , विद्यार्थी वा त्यजेत सुखम ।सुखार्थिनः कुतो विद्या , विद्यार्थिनः कुतो सुखम ॥

विद्यार्थी’ के गुण –
विद्यार्थी का पहला और सबसे आवश्यक गुण है

1– जिज्ञासा |

जिसे कुछ जानने की इच्छा ही न हो, उसे कुछ भी पढ़ाना व्यर्थ होता है | जिज्ञासा-शून्य छात्र उस औंधे घड़े के समान होता है जो बरसते जल में भी खाली रहता है |

2 लगन और परिश्रम –

विद्यार्थी का दूसरा महत्वपूरण गुण है – परिश्रमी होना | परिश्रम के बल पर मंध्बुधि छात्र भी अच्छे-अच्छे बुद्धिमान छात्रों को पछाड़ देते हैं | इसलिए छात्र को परिश्रमी होना अवश्य होना चाहिए | जो परिश्रम की वजाय सुख-सुविधा, आराम और विलास में रूचि लेता है, वह दुर्भगा कभी सफल नहीं हो सकता |

3 सादा जीवन, उच्च विचार –

विद्यार्थी के लिए आवश्यक है कि वह आधुनिक फैशनपरस्ती, फ़िल्मी दुनिया या अन्य रंगीन आकर्षणों से बचे | विद्यार्थी को इसे मित्रों के साथ संगति करनी चाहिए, जो उसी के समान शिक्षा का उच्च लक्ष्य लेकर चले हों |

4 श्रद्धावान एवं बिनयी –

संस्कृत की एक शुक्ति का अर्थ है – श्रद्धावान को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है | जिस छात्र के चित में अपने ज्ञानी होने का घमंड भरा रहता है, वह कभी गुरुओं की बात नहीं सुनता | जो छात्र अपने अध्यापकों तथा अपने से बुद्धिमान छात्रों का सम्मान नहीं करता, वह कभी फल-फूल नहीं सकता |

5 अनुशासनप्रिय –

छात्र के लिए, अनुशासनप्रिय होना आवश्यक है | अनुशासन के बल पर ही छात्र अपने व्यस्त समय का सही सदुपयोग कर सकता है | मनचाही गति से चलने वाले छात्र अपना समय इधर-उधर व्यर्थ करते हैं, जबकि अनुशासित छात्र समय पर पड़ने के साथ-साथ हँस-खेल भी लेते हैं |

6 स्वस्थ तथा बहुमुखी प्रतिभावान –

आदर्श छात्र पढाई के साथ-साथ खेल-व्ययाम और अन्य गतिविधियों में भी बराबर रूचि लेता है | कहलों से उसका शरीर स्वस्थ बना रहता है | अन्य गतिविधियों-भाषण, नृत्य, संगीत, कविता-पाठ, एन.सी.सी. आदि में भाग लेने से उसका जीवन विकसित होता है |

7 उच्च लक्ष्य –

आदर्श छात्र वाही है जो अपनी विद्या-बुद्धि का उपयोग अपने तथा अपने समाज के विकास के लिए करना चाहता हो | सुभाष चंद्र बोस कहा करते थे—‘’विदेयार्थियों का जीवन-लक्ष्य न केवल परीक्षा में उतीर्ण होना या स्वर्ण-पदक प्राप्त करना है अपितु देश-सेवा की क्षमता एवं योग्यता प्राप्त करना भी है |”

कामधेनुगुणा विद्या ह्ययकाले फलदायिनी।

प्रवासे मातृसदृशा विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥

विद्या कामधेनु के समान गुणोंवाली है, बुरे समय में भी फल देनेवाली है, प्रवास काल में माँ के समान है तथा गुप्त धन है।

रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥

रूप और यौवन से सम्पन्न, उच्च कुल में उत्पन्न होकर भी विद्याहीन मनुष्य सुगन्धहीन फूल के समान होते हैं और शोभा नहीं देते |

शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना।
न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे॥

जिस प्रकार कुत्ते की पुंछ से न तो उसके गुप्त अंग छिपते हैं और न वह मच्छरों के काटने से रोक सकती है, इसी प्रकार विद्या से रहित जीवन भी व्यर्थ है । क्योंकि विद्याविहीन मनुष्य मूर्ख होने के कारण न अपनी रक्षा कर सकते है न अपना भरण- पोषण ।

किं कुलेन विशालेन विद्याहीने च देहिनाम्।
दुष्कुलं चापि विदुषी देवैरपि हि पूज्यते॥

विद्याहीन होने पर विशाल कुल का क्या करना? विद्वान नीच कुल का भी हो, तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है । विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्वया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥ विद्वान की लोक में प्रशंसा होती है, विद्वान को सर्वत्र गौरब मिलता है, विद्या से सब कुछ प्राप्त होता है और विद्या की सर्वत्र पूजा होती है ।

धनहीनो न च हीनश्च धनिक स सुनिश्चयः।
विद्या रत्नेन हीनो यः स हीनः सर्ववस्तुषु॥

धनहीन व्यक्ति हीन नहीं कहा जाता, उसे धनी ही समझना चाहिए । जो विद्यारत्न से हीनहै, वस्तुतः वह सभी वस्तुओं में हीन है ।

यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।
न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत् ॥

जिस देश में सम्मान न हो, जहाँ कोई आजीविका न मिले , जहाँ अपना कोई भाई-बन्धु न रहता हो और जहाँ विद्या-अध्ययन सम्भव न हो, ऐसे स्थान पर नहीं रहना चाहिए ।

बलं विद्या च विप्राणां राज्ञः सैन्यं बलं तथा।
बलं वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां च कनिष्ठता ॥

विद्या ही ब्राह्मणों का बल है । राजा का बल सेना है । वैश्यों का बल धन है तथा सेवा करना शूद्रों का बल है ।

आयुः कर्म वित्तञ्च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥

आयु, कर्म, वित्त, विद्या, निधन ये पांचों चीजें प्राणी के भाग्य में तभी लिख दी जाती हैं, जब वह गर्भ में ही होते है ।

त्यजेद्धर्म दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखी भार्या निःस्नेहान्बान्धवांस्यजेत्॥

धर्म में यदि दया न हो तो उसे त्याग देना चाहिए । विद्याहीन गुरु को, क्रोधी पत्नी को तथा स्नेहहीन बान्धवों को भी त्याग देना चाहिए ।

जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति।
अन्नदाता भयत्राता पञ्चैता पितरः स्मृताः॥

जन्म देनेवाला, उपनयन संस्कार करनेवाला, विद्या देनेवाला, अन्नदाता तथा भय से रक्षा करनेवाला, ये पांच प्रकार के पिता होते हैं ।

आलस्योपहता विद्या परहस्तं गतं धनम्।
अल्पबीजहतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥

आलस्य से विद्या नष्ट हो जाती है । दूसरे के हाथ में धन जाने से धन नष्ट हो जाता है । कम बीज से खेत तथा बिना सेनापति वाली सेना नष्ट हो जाती है ।

अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्य कोपो नेत्रेण गम्यते॥

अभ्यास से विद्या का, शील-स्वभाव से कुल का, गुणों से श्रेष्टता का तथा आँखों से क्रोध का पता लग जाता है । यह भी पढ़िए चाणक्य नीति - शत्रु (शत्रुता) पर चाणक्य के अनमोल विचार

विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥

घर से बाहर विदेश में रहने पर विद्या मित्र होती है , घर में पत्नी मित्र होती है , रोगी के लिए दवा मित्र होती है तथा मृत्यु के बाद व्यक्ति का धर्म ही उसका मित्र होता है |

सुखार्थी चेत् त्यजेद्विद्यां त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी चेत् त्यजेत्सुखम्।

सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्॥

यदि सुखों की इच्छा है, तो विद्या त्याग दो और यदि विद्या की इच्छा है, तो सुखों का त्याग कर दो । सुख चाहनेवाले को विद्या कहां तथा विद्या चाहनेवाले को सुख कहां ।

येषां न विद्या न तपो न दानं न चापि शीलं च गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरुपेण मृगाश्चरन्ति॥

जिनमें विद्या, तपस्या, दान देना, शील, गुण तथा धर्म में से कुछ भी नहीं है, वे मनुष्य पृथ्वी पर भार हैं । वे मनुष्य के रूप में पशु हैं, जो मनुष्यों के बीच में घूमते रहते हैं ।

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

एक-एक बूंद डालने से क्रमशः घड़ा भर जाता है । इसी तरह विद्या, धर्म और धन का भी संचय करना चाहिए ।

अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पं च कालो बहुविघ्नता च । आसारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥

शास्त्र अनेक हैं, विद्याएं अनेक हैं, किन्तु मनुष्य का जीवन बहुत छोटा है, उसमें भी अनेक विघ्न हैं । इसलिए जैसे हंस मिले हुए दूध और पानी में से दूध पि लेता है और पानी को छोड़ देता है उसी तरह काम की बातें ग्रहण कर लो तथा बाकी छोड़ दो