ज्योतिष समाधान

Saturday, 3 November 2018

दीपावली के पांचों दिनो के लिए लग्न औऱ चौघड़िया मुहूर्त हमारे ब्लाग को ओपन करे (((धनतेरस/ नरक चौदस【 काली चौदस】/ दीपावली=【 गादी स्थापना स्याही भरना क़लम दवात सवारना आदि 】/गोवर्धन पूजा / भैयादूज )) आदी के मुहूर्त हमारे ब्लाग से प्राप्त करे एबं आगे भी शेयर भी करे।।

  
【【【【  【【०१】】】】】】】】

दिनांक ०५/११/२०१८

धनतेरस पूजा मुहूर्त = ०६:०५ से ०८:०
प्रदोष काल = सायंकाल ०५:५०से ०८:१४
वृषभ काल = सायंकाल ०६:०५ से ०८:०१

शुभ ०९:२३से १०:४७
चंचल०१:३४ से ०२:५८
लाभ ०२:५८ से ०४ :२२
अमृत०४:२२ से ०५: ४५

त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ = ५/नवम्बर/२०१८ को  दोपहर ०१:२४ बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त = ५/नवम्बर/२०१८ को  रात्रि ११:४६ बजे

धनत्रयोदशी या धनतेरस के दौरान लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिए
जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है
और लगभग २ घण्टे २४ मिनट तक रहता है।

धनतेरस पूजा को करने के लिए हम चौघड़िया मुहूर्त को देखने की सलाह नहीं देते हैं
क्योंकि वे मुहूर्त यात्रा के लिए उपयुक्त होते हैं।

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【【【【【【०२】】】】】】】
दिनांक ०६/११/२०१८

काली चौदस निशिता पूजा का समय
= रात्रि ११:३८ से १२:३१+ त

चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ = ५/नवम्बर/२०१८ को रात्रि ११:४६ बजे
चतुर्दशी तिथि समाप्त = ६/नवम्बर/२०१८ को रात्रि१०:२७ बजे
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【【【【【【【【०३】】】】】】】

दिनांक ०७/११/२०१८

गादी स्थापना मुहूर्त /स्याही भरने का मुहूर्त / कलम दवात सवारने का मुहूर्त /

प्रता:०६:५४से०९:३८ तक

लाभ अमृत बेला/ दोपहर /११:००से१२:००/तक
दोपहर/ १२से१:३०/बजे तक राहु काल रहेगा
दोपहर /०३:०५से ०४/२७तक चंचल बेला
सायंकाल/ ०४:२७से०५:४८तक लाभ वेला

प्रदोष काल मुहूर्त

लक्ष्मी पूजा मुहूर्त = ०५:४८से ०८:१२
प्रदोष काल = सायंकाल ०५:२७ से ०८:०६
-------------------
वृषभ काल =सायंकाल०६:१९ /से०८:१५तक
----------------
सिंह लग्न=अर्ध रात्रि काल१२:४६से/०३:०२तक
--------------------
बृश्चिक लग्न=प्रता:०७:३८से/0९:५५ तक
----------------------
कुम्भ लग्न दोपहर   = ०१:४३ से  ०३:४३ तक भी उपयोग में ले सकते  है
--------------------

अमावस्या तिथि प्रारम्भ = ६/नवम्बर/२०१८ को रात्रि १०:२७ बजे
अमावस्या तिथि समाप्त = ७/नवम्बर/२०१८ को सायंकाल ०६:३१ बजे

महानिशिता काल  तंत्र साधना या विशेष पाठ के लिए  है।

रात्रि = ११:३८ से १२:३१+
सिंह काल
= रात्रि१२:४६+ से रात्रि०३:०२+

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लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिए जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है
और लगभग २ घण्टे २४ मिनट तक रहता है।
कुछ स्त्रोत लक्ष्मी पूजा को करने के लिए महानिशिता काल भी बताते हैं।
हमारे विचार में महानिशिता काल तांत्रिक समुदायों और पण्डितों, जो इस विशेष समय के दौरान लक्ष्मी पूजा के बारे में अधिक जानते हैं,
उनके लिए यह समय ज्यादा उपयुक्त होता है।

सामान्य लोगों के लिए हम प्रदोष काल मुहूर्त उपयुक्त बताते हैं।

लक्ष्मी पूजा को करने के लिए हम चौघड़िया मुहूर्त को देखने की सलाह नहीं देते हैं
क्योंकि वे मुहूर्त यात्रा के लिए उपयुक्त होते हैं।

लक्ष्मी पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है
जब स्थिर लग्नप्रचलित होती है।
ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान लक्ष्मी पूजा की जाये तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती है।
इसीलिए लक्ष्मी पूजा के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है।
 वृषभ लग्न को स्थिर माना गया है
और दीवाली के त्यौहार के दौरान यह
अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है। 
दिवाली की पूजा के लिए
प्रदोष काल एबं चार लग्न मुहूर्त होते है –

(१)वृश्चिक लग्न – यह दिवाली के दिन की सुबह का समय होता है. वृश्चिक लग्न में मंदिर, हॉस्पिटल, होटल्स, स्कूल, कॉलेज में पूजा होती है. राजनैतिक, टीवी फ़िल्मी कलाकार वृश्चिक लग्न में ही लक्ष्मी पूजा करते है.

(2)कुम्भ लग्न – यह दिवाली के दिन दोपहर का समय होता है. कुम्भ लग्न में वे लोग पूजा करते है, जो बीमार होते है, जिन पर शनि की दशा ख़राब चल रही होती है, जिनको व्यापार में बड़ी हानि होती है.

(३)वृषभ लग्न – यह दिवाली के दिन शाम का समय होता है. यह लक्ष्मी पूजा का सबसे अच्छा समय होता है.

(४)सिम्हा लग्न – यह दिवाली की मध्य रात्रि का समय होता है. संत, तांत्रिक लोग इस दौरान लक्ष्मी पूजा करते है.

महानिशिता काल में तांत्रिक और पंडित लोग पूजा करते है, ये वे लोग होते है, जिन्हें लक्ष्मी पूजा के बारे में अच्छे से जानकारी होती है.

लक्ष्मी प्राप्ति मंत्र : ॐ हिम् महालक्ष्मै च विदमहै, विष्णु पत्नये च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात

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【【【【【【【०४】】】】】】】】
दिनांक ०८/११/२०१८

वामन जो कि भगवान विष्णु के एक अवतार है,
उनकी राजा बलि पर विजय और बाद में बलि को पाताल लोक भेजने के कारण इस दिन उनका पुण्यस्मरण किया जाता है।
यह माना जाता है कि भगवान वामन द्वारा दिए गए वरदान के कारण असुर राजा बलि इस दिन पातल लोक से पृथ्वी लोक आता है।
इस दिन नया कार्य प्रारंभ किया जाता है

गोवर्धन पूजा प्रातःकाल मुहूर्त 
= ०६:५५ से ०८:१७
शुभ वेला दोपहर /११:००से१२:२१तक
चंचल वेला दोपहर/१२/से१२:४३तक अभिजित
लाभवेला दोपहर /१२:२१से १:३०/तक

गोवर्धन पूजा दोपहर वाद 

मुहूर्त = ०३:१८ से ०५:२७

प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ = ७/नवम्बर/२०१८ को ०६:३१ बजे
प्रतिपदा तिथि समाप्त = ८/नवम्बर/२०१८ को शाम ०६:०७ बजे

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【【【【【【【०५】】】】】】】】

दिनांक /०९/११/२०१८

भाई दूज तिलक का समय

भाई दूज टीका मुहूर्त  दोपहर = ०१:०९ से ०३:१७

द्वितीय तिथि प्रारम्भ = ८/नवम्बर/२०१८ को रात्रि ०९:०७ बजे
द्वितीय तिथि समाप्त = ९/नवम्बर/२०१८ को रात्रि ०९:२० बजे

भाई दूज के दिन का चौघड़िया मुहूर्त
चंचल ०६:३८ से ०८:०१ तक
लाभ ०८:०१से०९:२४ तक
अमृत ०९:२४से १०:४७ तक
शुभ १२:११ से०१:३४ तक

हमारी ओर से दीपावली की  ढेरसारी शुभकामनाओ  सहित  आपको दीपावली मंगलमय हो

मुहूर्त  बहुत ही सावधानी पूर्वक   बनाये गए है।
फिर भी अपने पण्डित जी का आशीर्वचन लेकर ही पूजन करे  ।

= आपके अपने=
गुरुदेव  भुबनेश्वर
[पर्णकुटी आश्रम गुना ]
{= संपर्क सूत्र =}
【०९८९३९४६८१०】
【०६२६२९४६८१०】

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Thursday, 11 October 2018

भगवती दुर्गा क्षमा प्रार्थना <<=1=<<<<<<<<<< ही मन्त्र तंत्र जानु जप योग पाठ पूजा । आहबान ध्यान का भी नही ख्याल और दूजा ।। उपचार और मुद्रा पूजा विधान मेरा । बस जानता यही हूँ अनुसरण माता तेरा 

समस्त मनोकामनाओ को पूरा करने वाली भगवती दुर्गा क्षमा प्रार्थना <<=1=<<<<<<<<<<

ही मन्त्र तंत्र जानु जप योग पाठ पूजा । आहबान ध्यान का भी नही ख्याल और दूजा ।। उपचार और मुद्रा पूजा विधान मेरा । बस जानता यही हूँ अनुसरण माता तेरा ।। >>>>>>>>>>>>>>=2=>>>>>>>>>>>>>> श्री चरण पूजने में धन शाडयता बनी हो । अल्पज्ञता से सेवा विधि हीन जो बनी हो ।। जगधारिणी शिवे माँ सब माफ करना गलती। सुत जो कपूत होवे माता नही बदलती ।। >>>>>>>>>>>>>=३=>>>>>>>>>>>>>>> जग में सुयोग्य सुन्दर सत्पुत्र माता तेरे । मुझसा कपूत पॉवर उनमे एक तेरे।। समुचित ना त्याग मेरा सब माफ करना गलती। सुत जो कपूत होवे माता नही बदलती।। >>>>>>>>>>>>>=४=>>>>>>>>>>>>>>> जगदम्ब पाँव पूजा मेने करी न तेरी । धन हिन् अर्चना में त्रुटिया भई घनेरी ।। फिर भी असीम अनुपम कर स्नेह माफ गलती। सुत जो कपूत होवे माता नही बदलती ।। >>>>>>>>>>>>>>=५=>>>>>>>>>>>>>> कुल देवतार्चना का परित्याग कर दिया है । यह धाम साधनो का बय ब्यर्थं खो दिया है।। अब भी कृपा करो न तब शरण पाहि पाहि । जगदम्ब छोड़ तेरा अबलम्बं और नाही।। >>>>>>>>>>>>>>=६=>>>>>>>>>>>>>> माँ पंगु तब सहारे गिरिबर शिखर को धावे । सिर छत्र धर के जग में निसंक रंक सोबे।। यह नाम जो अपर्णा विधि वेद में बखाने । बस धन्य जन्म उनका जो सार तेरा जाने ।। >>>>>>>>>>>>>>>=७=>>>>>>>>>>>>> तन भस्म कंठ नीला गाल मुण्ड माल धारी। है हार शेष जिनके सिर भूमि भार धारी।। तुजसी पतिब्रता से भूतेश जो कहाबे। पाणिग्रहण की महिमा संसार में सुहाबे।। >>>>>>>>>>>>>>=८=>>>>>>>>>>>>>> धन मोक्ष की न इच्छा बांछाँ न ज्ञान की है। शशी मुख सुलोचनि के सुख की न मान की है।। हिम शैल खण्ड पर जा जप साधना तुम्हारी। करता रहूँ भवानी जय जय शिबा तुम्हारी।। >>>>>>>>>>>>>>>=९=>>>>>>>>>>>>> उपचार सैकड़ो माँ मैंने किये नही है। रुखा है ध्यान मेरा धन पास में नही है।। इस दीन हीन पॉबर पर फिर भी स्नेह है तेरा। श्यामे सुअम्ब माता तू मानती है मेरा।। >>>>>>>>>>>>>=१०=>>>>>>>>>>>>>> जब जब तनिक भी दुर्गे जग आपदा सताबे। सुत बतस्ले भवानी तव तव तुम्हे मनाबै।। शठता न मान लेना दासानुदास तेरा। प्यासे दुर्भिक्षितो को विश्वाश एक तेरा।। >>>>>>>>>>>>>>=११=>>>>>>>>>>>>> करुणा मयी भुला कर त्रुटि दुःख टालती हो। घनघोर आपदायें झट् तोड़ डालती हो ।। आश्चर्य क्या करू में तुमको कहा सुनानी। परिपूर्ण तम हो जननी तेरी अखत कहानी।। >>>>>>>>>>>>><१२><>>>>>>>>>>>>> पापी न मुझसा कोई तुम पाप हारिणि हो। सब दुःख नाशनी हो सुखशांति कारणी हो।। तुम हो दयामयी माँ समुचित विचार करना। देकर प्रसाद मुझको भव सिंधु पार करना।। <<<>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> >>>>>>>>>>भैरव जी का ध्यान >>>>>>>>> >>>>>>><<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<< कर कलित कपाला कुंडली दंड पाणि। तरुण तिमिर नीलो व्याल यग्नोपबिती।। क्रतु समय सापर्या विग्नविच्छेदु हेतु। जयति जय बटुक नाथ:सिद्धिदा साधकानां।। >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> <<<<<<<<<<<<<<विशेष<<<<<>>>>>>>><<<<>>>>>><<<<-------->>>>>>>>>>>>> सभी प्रकार की जटिल समस्याओ का समाधान हेतु ज्योतिष द्वारा सन्तुष्टी पूर्वक उपाय जानने हेतु शीघ्र ही सम्पर्क करे । सभी प्रकार के धार्मिक आयोजन हेतु सम्पर्क करे जैसे ==सतचंडी पाठ ,महामृत्युंजय अनुष्ठान , मनोकामना पूर्ण अनुष्ठान ,विबाह में अड़चन के लिए सरल उपाय ,गृह प्रवेश,आदि । एबम संगीतमय श्री राम कथा ,श्री मद् भागवत कथा ============================= सम्पर्क सूत्र पंडित =परमेश्वर दयाल शास्त्री 09893397835 पंडित =भुबनेश्वर 09893946810 <<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>

Sunday, 7 October 2018

नवरात्रि पूजन सामग्री लग्नानुसार एबं चौघड़िया अनुसार पूजन मुहूर्त सहित नवरात्रि पूजन सामग्री एबम हवन सामग्री सहित

jशारदीय नवरात्र घटस्थापना

मुहूर्त लग्नानुसार      10 अक्टूम्बर 2018

प्रात : 4:40से -6.52तक कन्या 
प्रात : 09:08से 11.25 तक वृश्चिक
दोपहर : 3.:15 से 4.47 तक कुंभ
रात्रि : 7.52-9.50 तक वृषभ।

शारदीय नवरात्र घट स्थापना 
मुहूर्त चौघड़ियानुसार 10 अक्टूम्बर 2018

प्रता:6:23 से 9:18 तक
प्रता:10:46 से 12:14 तक 
शाम:03:09 से 06:05 तक
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लेकिन इस वर्ष सालों बाद ऐसे दुर्लभ योग बन रहे हैं जिससे बड़े परिवर्तन देखने को मिलेंगे।

इस नवरात्रि में माता पहले दिन यानि बुधवार को आएंगी,

बुधवार के कारण माता नाव पर आएंगी 
और शुक्रवार को हाथी पर प्रस्थान करेंगी। 
नाव और हाथी दोनों का योग शुभ है।

बनेगा महासंयोग
इस योग को हम इसलिए कल्याणकारी कह रहे हैं 
क्योंकि शास्त्रों में इसका वर्णन किया गया है ऐसा कहा गया है कि जनता और राज्य दोनों के लिए माता का ऐसा आगमन और प्रस्थान सदैव शुभ माना जाता है।
👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍
"शशि सूर्ये गजारुढ़ा शनिभौमे तुरंगमे।

गुरौ शुक्रे च दोलायां,बुधे नौका प्रकीर्तिता।।
👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍

ऐसे होगा भक्तों को लाभ ऐसा कहा गया है कि

💐"नौकायां सर्व सिद्धि: स्यात्" 💐
अर्थात् जब दुर्गा माता नाव पर चढ़कर आती हैं तो अपने भक्तों को हर प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं।
इस साल माता की कृपा से भक्तों को अपार सफलता की प्राप्ति होने वाली है।
माता का आगमन हर तरह से शुभ माना जा रहा है।
नाव पर आकर माता भक्तों का कल्याण करेंगी।

💐हाथी पर होगा प्रस्थान💐
जहां तक माता के प्रस्थान की बात रही तो

💐"बुध शुक्र दिने यदि सा विजया, 
गज वाहनगा शुभ वृष्टि करा"💐

अर्थात् जब माता का प्रस्थान बुधवार या शुक्रवार को होता है तो माता गज यानि हाथी पर प्रस्थान करती हैं।

ऐसी मान्यता है कि हाथी पर प्रस्थान होने के कारण माता समस्त संसार में कल्याण की वर्षा करती जाती हैं।

Gurudev
Bhubneshwar
Kasturwanagar
Parnkuti guna
9893946810
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नवरात्रि पूजन हवन सामग्री सहित

(पूजन समग्री कम और ज्यादा कर सकते है )

इस सामान की मात्रा केवल अनुष्ठान के लिए अगर छोटा कार्यक्रम है तो सामान कम कर सकते है
हमारा अगला ब्लाग दुर्गा हवन सामग्री लिस्ट उपलव्ध है लिंक ओपन करे
पर्णकुटी ज्योतिष केंद्र सब पर अपनी कुंडली दिखाकर उचित मार्ग दर्शन प्राप्त करे ।

सम्पर्क सूत्र Pandit : gurudevbhubneshwar
कस्तूरवानागर पर्णकुटी गुना
9893946810

(पूजन समग्री कम और ज्यादा कर सकते है ) इस सामान की मात्रा केवल अनुष्ठान के लिए अगर छोटा कार्यक्रम है तो सामान कम कर सकते है
============================
1हल्दीः--------------------------50 ग्राम
२】कलावा(आंटी)-------------100 ग्राम
३】अगरबत्ती------------------- 3पैकिट
४】कपूर------------------------- 50 ग्राम
५】केसर------------------------- 1डिव्वि
६】चंदन पेस्ट ------------------ 50 ग्राम
७】यज्ञोपवीत ----------------- 11नग्
८】चावल------------------------ 15 किलो
९】अबीर-------------------------50 ग्राम
१०】गुलाल, -----------------10 0ग्राम
११】अभ्रक-------------------
१२】सिंदूर --------------------100 ग्राम
१३】रोली, --------------------100ग्राम
१४】सुपारी, ( बड़ी)-------- 200 ग्राम
१५】नारियल ----------------- 15नग्
१६】सरसो----------------------50 ग्राम
१७】पंच मेवा------------------500 ग्राम
१८】शहद (मधु)--------------- 50 ग्राम
१९】शकर--------------------0 1किलो
२०】घृत (शुद्ध घी)------------ 02किलो २१】इलायची (छोटी)-----------10ग्राम
२२】लौंग -------------                 10 gram
२३】इत्र की शीशी----------------2 नग् २४】रंग लाल--------------------10ग्राम

२५】रंग काला --------------------10ग्राम

२६】रंग हरा ---------------------10ग्राम

२७】रंग पिला -------------------10ग्राम

२८】चंदन मूठा--------------------1 नग्
२९】धुप बत्ती ---------------------2 पैकिट
============================= अगर दासविधि स्नान करना हो तो ये मिट्टी लाना है
३०】सप्तमृत्तिका
1】 हाथी के स्थान की मिट्टि-----------50ग्राम
२】घोड़ा बांधने के स्थान की मिटटी--50ग्राम
३】बॉबी की मिटटी---------------------50ग्राम ४】दीमक की मिटटी-------------------50ग्राम ५】नदी संगम की मिटटी---------------50ग्राम ६】तालाब कीमिटटी-------------------50ग्रा ७】गौ शाला की मिटटी-----------------50ग्राम राज द्वार की मिटटी-----------------------50ग्राम दुर्गा प्रतिमाके लिए गंगा माटी ओर सोना गाची की मिट्टी

============================ अगर दासविधि स्नानं करना हो तो लआना है ३१】
पंचगव्य १】 गाय का गोबर -----------------50 ग्राम २】गौ मूत्र-----------------------------50ग्राम ३】गौ घृत------------------------------50ग्राम
4】गाय दूध----------------------------50ग्राम ५】गाय का दही ---------------------50ग्राम
============================= ३२】
सप्त धान्य-कुलबजन--------100ग्राम १】 जौ----------- २】गेहूँ- ३】चावल- ४】तिल- ५】काँगनी- ६】उड़द- ७】मूँग
============================= ३३】कुशा ३४】दूर्वा 35】पुष्प कई प्रकार के ३६】गंगाजल ३७】ऋतुफल पांच प्रकार के -----1 किलो
38】पंच पल्लव १】बड़, २】 गूलर, ३】पीपल, ४】आम ५】पाकर के पत्ते)
============================= ३९】बिल्वपत्र
४०】शमीपत्र
४१】सर्वऔषधि
४२】अर्पित करने हेतु पुरुष बस्त्र
४३】मता जी को अर्पित करने हेतु
सौभाग्यवस्त्र सौभाग्य सामग्री सहित
भैरव के लिए किसी बालक को सुंदर बस्त्र
एक 9 बर्ष की कन्या के लिए बस्त्र
44】जल कलश तांबे पीतल सहित 7 न

पूजन थाली कटोरी लोटा सहित

👍 कलश मिट्टी के 5 👍
👍 खप्पर 2👍

४५】 बस्त्र
१】सफेद कपड़ा दोमीटर)
२】लाल कपड़ा (2मीटर)
३】काला कपड़ा 2मीटर)
४】हरा कपड़ा 2मीटर)
5) पीला कपड़ा 2 मीटर

४६】पंच रत्न (सामर्थ्य अनुसार)
सिक्का चाँदी का सप्तघृत मातृका के लिए
४७】दीपक
४८】तुलसी दल
४८】केले के पत्ते
(यदि उपलब्ध हों तो खंभे सहित)

49】बन्दनवार
50】पान के पत्ते ------------11 नग
51】रुई
५२】भस्म
53】ध्वजालाल-1
पचरंगा -1
54】प्रसाद(अनुमानि)
============================ 55】 अगर ब्राहम्णो के द्वारा अनुष्ठान करवा रहे है तो उनके लिए नित्य उपयोगी सामान =============================सावुन नहाने के---------------10 सावुन
कपड़े धोने के --------10
सर्फ कपडे धोने का ---------1 किलो
मंजन -------------------------100ग्राम
तेल ----------------------------100ग्राम
------------------------------------------------------------- 56】========ब्राह्मण बरण सामग्र
1】धोती
२】दुपट्टा
३】आंगोछा
४】आसन
५】माला
६】गौमुखी
७】लोटा
८】पंचपात्र
९】चमची
१०】तष्टा
११】अर्घा
१२】 डाभ अंगूठी =============================
५७】=========नवग्रह समिधा======= १】आक
२】 छोला
३】खैर
४】आंधी झाड़ा
५】पीपल
६】उमर(गूलर)
७】शमी
८】दूर्वा
९】कुशा
============================ नवरात्र पूजा के लिए साधारण विशेष आहुतियों के लिए
जैसे हवन सामग्रि
तीली से आधा चावल
चावल से आधा जौ
जैसे तीली 3 किलो तो':
चावल 1 किलो 500 ग्राम
जौ 7500 ग्राम
शकर घी हवन सामग्री पैकिट अब बाकी सामग्री का विधान तो है पर अनुमानित ही करते है ।

कूष्माण्ड (पेठा),
15 पान,
15 सुपारी,
लौंग 15 जोड़े,
छोटी इलायची 15,
कमल गट्ठे 15,
जायफल 2,
मैनफल 2,
पीली सरसों,
पंच मेवा,
सिन्दूर,
उड़द मोटा,
शहद 50 ग्राम,
ऋतु फल 5,
केले,
नारियल 1,
गोला 2,
गूगल 20 0ग्राम,
लाल कपड़ा, चुन्नी,
गिलोय,
सराईं 5,
आम के पत्ते,
सरसों का तेल,
कपूर,
पंचरंग,
केसर,
लाल चंदन,
सफेद चंदन,
सितावर,
कत्था,
भोजपत्र,
काली मिर्च,
मिश्री,
अनारदाना ।
बूरा तथा सामग्री श्रद्धा के अनुसार।
अगर,
तगर,
नागर मोथा,
बालछड़,
छाड़छबीला,
कपूर कचरी,
भोजपत्र,
इन्द जौ,
सितावर,
आम या ढाक की सूखी लकड़ी 20 किलो।

सोनागाछी कोलकाता का रेडलाइट इलाका है। दुर्गा मां ने अपनी भक्त वेश्या को वरदान दिया था
कि तुम्हारे हाथ से दी हुई गंगा की चिकनी मिट्टी से ही प्रतिमा बनेगी।
उन्होंने उस भक्त को सामाजिक तिरस्कार से बचाने के लिए ऐसा किया।
तभी से सोनागाछी की मिट्टी से देवी की प्रतिमा बनाने की परम्परा शुरू हो गई।
महालया के दिन ही दुर्गा मां की अधूरी गढ़ी प्रतिमा पर आंखें बनाई जाती हैं,
जिसे चक्षु-दान कहते हैं।
इस दिन लोग अपने मृत संबंधियों को तर्पण अर्पित करते हैं और उसके बाद ही शुरू हो जाता है देवी पक्ष।
दुर्गा अपने पति शिव को कैलाश में ही छोड़ गणेेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ दस दिनों के लिए अपने पीहर आती है। ×××××××××××××××××××××××××××××× संपर्क -किसी भी प्रकार की पूजा जैसे - सतचण्डीपाठ , नवरात्रिपाठ , महामृत्यंजय , वास्तु पूजन, ग्रह प्रवेश , श्री मदभागवत कथा, श्री राम कथा , करवाने हेतु एबम ज्योतिष द्वारा समाधान,आदि की जानकारी के लिए ×××××××××××××××××××××××××××××× संपर्क सूत्र पंडित -परमेश्वर दयाल शास्त्री (मधुसुदनगड़) 09893397835 ============================= पंडित-भुबनेश्वर दयाल शास्त्री (पर्णकुटी गुना) 09893946810 ============================ पंडित -घनश्याम शास्त्री(parnkuti guna ) 09893983084

============================

💐💐💐💐💐विशेष संपर्क👍👍👍💐

कस्तूरवा नगर पर्णकुटी आश्रम 👍
गुना ऐ -बी रोड 👍
दा होटल सारा के सामने 👍
09893946810 ===========

अगर कोई समान छूट गया हो तो इसमें कॉमेंट बॉक्स में जरूर लिखे हमारा प्रयास प्रसिद्धि पाना नही केवल जन सहयोग की भावना है ।

Friday, 5 October 2018

इस नवरात्रि में माता पहले दिन यानि बुधवार को आएंगी, बुधवार के कारण माता नाव पर आएंगी और शुक्रवार को हाथी पर प्रस्थान करेंगी। नाव और हाथी दोनों का योग शुभ है। शारदीय नवरात्र घटस्थापना मुहूर्त लग्नानुसार      10 अक्टूम्बर 2018


शारदीय नवरात्र घटस्थापना

मुहूर्त लग्नानुसार      10 अक्टूम्बर 2018

प्रात : 4:40से -6.52तक कन्या
प्रात : 09:08से 11.25 तक वृश्चिक
दोपहर : 3.:15 से 4.47 तक कुंभ
रात्रि : 7.52-9.50 तक वृषभ।

शारदीय नवरात्र घट स्थापना
मुहूर्त चौघड़ियानुसार 10 अक्टूम्बर 2018

प्रता:6:23 से 9:18 तक
प्रता:10:46 से 12:14 तक
शाम:03:09 से 06:05 तक

लेकिन इस वर्ष सालों बाद ऐसे दुर्लभ योग बन रहे हैं जिससे बड़े परिवर्तन देखने को मिलेंगे।

इस नवरात्रि में माता पहले दिन यानि बुधवार को आएंगी,

बुधवार के कारण माता नाव पर आएंगी
और शुक्रवार को हाथी पर प्रस्थान करेंगी।
नाव और हाथी दोनों का योग शुभ है।

बनेगा महासंयोग
इस योग को हम इसलिए कल्याणकारी कह रहे हैं
क्योंकि शास्त्रों में इसका वर्णन किया गया है ऐसा कहा गया है कि जनता और राज्य दोनों के लिए माता का ऐसा आगमन और प्रस्थान सदैव शुभ माना जाता है।

"शशि सूर्ये गजारुढ़ा शनिभौमे तुरंगमे।

गुरौ शुक्रे च दोलायां,बुधे नौका प्रकीर्तिता।।

ऐसे होगा भक्तों को लाभ ऐसा कहा गया है कि

"नौकायां सर्व सिद्धि: स्यात्"
अर्थात् जब दुर्गा माता नाव पर चढ़कर आती हैं तो अपने भक्तों को हर प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं।
इस साल माता की कृपा से भक्तों को अपार सफलता की प्राप्ति होने वाली है।
माता का आगमन हर तरह से शुभ माना जा रहा है।
नाव पर आकर माता भक्तों का कल्याण करेंगी।

हाथी पर होगा प्रस्थान
जहां तक माता के प्रस्थान की बात रही तो

"बुध शुक्र दिने यदि सा विजया,
गज वाहनगा शुभ वृष्टि करा"

अर्थात् जब माता का प्रस्थान बुधवार या शुक्रवार को होता है तो माता गज यानि हाथी पर प्रस्थान करती हैं।

ऐसी मान्यता है कि हाथी पर प्रस्थान होने के कारण माता समस्त संसार में कल्याण की वर्षा करती जाती हैं।

Gurudev
Bhubneshwar
Kasturwanagar
Parnkuti guna
9893946810

Monday, 24 September 2018

श्राद्ध कितने प्रकार के होते है मत्स्य पुराण में तीन प्रकार के श्राद्ध बतलाए गए है, । यमस्मृतिमें पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। विश्वामित्र स्मृति, निर्णय सिन्धु तथा भविष्य पुराण में बारह प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता हैं

श्राद्ध के प्रकार

मत्स्य पुराण में तीन प्रकार के श्राद्ध बतलाए गए है, जिन्हें नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य के नाम से जाना जाता है।
यमस्मृतिमें पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। जिन्हें नित्य, नैमित्तिक,काम्य,वृद्धि और पार्वण के नाम से जाना जाता है।
विश्वामित्र स्मृति, निर्णय सिन्धु तथा भविष्य पुराण में बारह प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता हैं

1- नित्य श्राद्धः प्रतिदिन की क्रिया को ही 'नित्य' कहते हैं। अर्थात् रोज-रोज किए जानें वाले श्राद्ध को नित्य श्राद्ध कहते हैं। इस श्राद्ध में विश्वेदेव को स्थापित नहीं किया जाता। अत्यंत आवश्यकता एवं असमर्थावस्थामें केवल जल से इस श्राद्ध को सम्पन्न किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति अन्न, जल, दूध, कुशा, पुष्प व फल से प्रतिदिन श्राद्ध करके अपने पितरों को प्रसन्न कर सकता है।
2- नैमित्तक श्राद्ध- दूसरा नैमित्तिक श्राद्ध है जो किसी को निमित्त बनाकर जो श्राद्ध किया जाता है एक पितृ के उद्देश्य से किया जाता है, यह श्राद्ध विशेष अवसर पर किया जाता है। जैसे- पिता आदि की मृत्यु तिथि के दिन|इसे एकोदिष्ट भी कहा जाता है। एकोद्दिष्ट का मतलब किसी एक को निमित्त मानकर किए जाने वाला श्राद्ध जैसे किसी की मृत्यु हो जाने पर दशाह, एकादशाह आदि एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। इसमें भी विश्वेदेवोंको स्थापित नहीं किया जाता। इसमें विश्वदेवा की पूजा नहीं की जाती है, केवल मात्र एक पिण्डदान दिया जाता है।
3- काम्य श्राद्धः किसी कामना विशेष या सिद्धि की प्राप्ति के लिए यह श्राद्ध किया जाता है। जैसे- पुत्र की प्राप्ति आदि। वह काम्य श्राद्ध के अन्तर्गत आता है।
4- वृद्धि श्राद्धः यह श्राद्ध सौभाग्य वृद्धि के लिए किया जाता है। इसमें वृद्धि की कामना रहती है जैसे संतान प्राप्ति या परिवार में विवाह आदि मांगलिक कार्यो में । इसे नान्दीश्राद्धया नान्दीमुखश्राद्ध के नाम भी जाना जाता है।
5- सपिंडन श्राद्ध- सपिण्डन शब्द का अभिप्राय पिण्डों को मिलाना। दरअसल शास्त्रों के अनुसार जब जीव की मृत्यु होती है, तो वह प्रेत हो जाता है। प्रेत से पितर में ले जाने की प्रक्रिया ही सपिण्डन है। अर्थात् इस प्रक्रिया में प्रेत पिण्ड का पितृ पिण्डों में सम्मेलन कराया जा सकता है। इसे ही सपिण्डनश्राद्ध कहते हैं। मृत व्यक्ति के 12 वें दिन पितरों से मिलने के लिए किया जाता है। इसमें प्रेत व पितरों के मिलन की इच्छा रहती है। ऐसी भी भावना रहती है कि प्रेत, पितरों की आत्माओं के साथ सहयोग का रुख रखें। इसे स्त्रियां भी कर सकती है।
6- पार्वण श्राद्धः जो अमावस्या के विधानके अनुरूप किया जाता है। पिता, दादा, परदादा, सपत्नीक और दादी, परदादी, व सपत्नीक के निमित्त किया जाता है। किसी पर्व जैसे पितृपक्ष, अमावास्या अथवा पर्व की तिथि आदि पर किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है। यह श्राद्ध विश्वेदेवसहित होता है। इसमें दो विश्वदेवा की पूजा होती है।
7- गोष्ठी श्राद्धः गोष्ठी शब्द का अर्थ समूह होता है। जो श्राद्ध सामूहिक रूप से या समूह में सम्पन्न किए जाते हैं। उसे गोष्ठी श्राद्ध कहते हैं।
8- कर्मांग श्राद्धः यह श्राद्ध किसी संस्कार के अवसर पर किया जाता है। कर्मांग का सीधा साधा अर्थ कर्म का अंग होता है, अर्थात् किसी प्रधान कर्म के अंग के रूप में जो श्राद्ध सम्पन्न किए जाते हैं। उसे कर्मांग श्राद्ध कहते हैं। जैसे- सीमन्तोन्नयन, पुंसवन आदि संस्कारों के सम्पन्नता हेतु किया जाने वाला श्राद्ध इस श्राद्ध के अन्तर्गत आता है।
9- शुद्धयर्थ श्राद्धः शुद्धि के निमित्त जो श्राद्ध किए जाते हैं। उसे शुद्धयर्थश्राद्ध कहते हैं। जैसे शुद्धि हेतु ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। यह श्राद्ध परिवार की शुद्धता के लिए किया जाता है।
10- तीर्थ श्राद्धः यह श्राद्ध तीर्थ में जाने पर किया जाता है।
11- यात्रार्थ श्राद्धः यह श्राद्ध यात्रा की सफलता के लिए किया जाता है। यात्रा के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध यात्रार्थ श्राद्ध कहलाता है। जैसे- तीर्थ में जाने के उद्देश्य से या देशान्तर जाने के उद्देश्य से जिस श्राद्ध को सम्पन्न कराना चाहिए वह यात्रार्थश्राद्ध ही है। यह घी द्वारा सम्पन्न होता है। इसीलिए इसे घृतश्राद्ध की भी उपमा दी गयी है।
12- पुष्टयर्थ श्राद्धः पुष्टि के निमित्त जो श्राद्ध सम्पन्न हो, जैसे शारीरिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए किया जाना वाला श्राद्ध पुष्ट्यर्थश्राद्ध कहलाता है। शरीर के स्वास्थ्य व सुख समृद्धि के लिए त्रयोदशी तिथि, मघा नक्षत्र, वर्षा ऋतु व आश्विन मास का कृष्ण पक्ष इस श्राद्ध के लिए उत्तम माना जाता है।
सात से बारहवें प्रकार के श्राद्ध की प्रक्रिया सामान्य श्राद्ध जैसी ही होती है।

Gurudev
भुबनेश्वर पर्णकुटी गुना
9893946810

Saturday, 1 September 2018

वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी ०३/सितम्बर/२०१८ को वैष्णव जन्माष्टमी के लिये अगले दिन का पारण समय = ०६:०६ (सूर्योदय के बाद) व्रत-पर्वों का निर्णय सूर्योदय कालीन तिथि के आधार पर और कुछ का रात्रि व्यापिनी तिथि के आधार पर किया जाता है। यद्यपि उदया तिथि ही प्रधान होती है, तथापि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का निर्णय रात्रिव्यापिनी अष्टमी के आधार पर किया जाता है। सप्तमीयुक्त अष्टमी को त्याग देना चाहिए और अष्टमी युक्त नवमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतोपवास करना चाहिये। यहां भी और अन्यत्र भी साधारणतः इस व्रत के विषय में दो मत विद्यमान हैं। स्मात्र्त लोग अर्द्ध रात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी के दिन भी व्रतोपवास करते हैं। लेकिन वैष्णवों को सप्तमी का किंचित मात्र भी स्पर्श मान्य नहीं। उनके यहां सप्तमी का स्पर्श होने पर द्वितीय दिवस ही व्रतोत्सव हेतु मान्य है। चाहे उस दिन अष्टमी क्षण मात्र के लिये ही क्यों न हो।


वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी ०३/सितम्बर/२०१८ को
वैष्णव जन्माष्टमी के लिये अगले दिन का पारण समय = ०६:०६ (सूर्योदय के बाद)

पारण के दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से पहले समाप्त हो गये

दही हाण्डी - ३rd, सितम्बर को

अष्टमी तिथि प्रारम्भ = २/सितम्बर/२०१८ को २०:४७ बजे
मतलव :शाम को /8:47 मिनिट पर  प्रारम्भ

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अष्टमी तिथि समाप्त = ३/सितम्बर/२०१८ को १९:१९ बजे
मतलव:शाम को / 7:19 मिनिट पर समाप्त
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कुछ व्रत-पर्वों का निर्णय सूर्योदय कालीन तिथि के आधार पर और कुछ का रात्रि व्यापिनी तिथि के आधार पर किया जाता है।
यद्यपि उदया तिथि ही प्रधान होती है,

तथापि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का निर्णय रात्रिव्यापिनी अष्टमी के आधार पर किया जाता है।
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सप्तमीयुक्त अष्टमी को त्याग देना चाहिए और अष्टमी युक्त नवमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतोपवास करना चाहिये।

यहां भी और अन्यत्र भी साधारणतः इस व्रत के विषय में दो मत विद्यमान हैं।

स्मात्र्त लोग अर्द्ध रात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी के दिन भी व्रतोपवास करते हैं।

लेकिन वैष्णवों को सप्तमी का किंचित मात्र भी स्पर्श मान्य नहीं।

उनके यहां सप्तमी का स्पर्श होने पर द्वितीय दिवस ही व्रतोत्सव हेतु मान्य है। चाहे उस दिन अष्टमी क्षण मात्र के लिये ही क्यों न हो।

देश, काल और परिस्थिति में विषयान्तर्गत प्रामाणिकता की दृष्टि से सर्वधर्मशास्त्रों में ‘निर्णयसिंधु’ ही श्रेयस्कर है।

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Gurudev -bhubneshwar
Parnkuti guna
जन्माष्टमी पद्मपुराण-
उत्तराखंड श्रीकृष्णावतार की कथा में वर्णन मिलता है कि ‘‘दसवां महीना आने पर भादों मास की कृष्णा अष्टमी को आधी रात के समय श्री हरि का अवतार हुआ।’’

महाभारत -खिलभाग हरिवंश-

विष्णु पर्व - 4/17 के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजित नामक मुहूत्र्त था, रोहिणी नक्षत्र का योग होने से अष्टमी की वह रात जयंती कहलाती थी और विजय नामक विशिष्ट मुहूत्र्त व्यतीत हो रहा था।’’

श्रीमद्भागवत-

10/3/1 के अनुसार भाद्रमास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्द्ध रात्रि के समय भगवान् विष्णु माता देवकी के गर्भ से प्रकट हुए।

गर्ग संहिता गोलोकखंड-

11/22-24 के अनुसार ‘‘भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण-योग, अष्टमी तिथि, आधी रात के समय, चंद्रोदय काल, वृषभ लग्न में माता देवकी के गर्भ से साक्षात् श्री हरि प्रकट हुए।’’

ब्रह्मवैवर्त पुराण-

श्रीकृष्ण जन्मखंड-7 के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग संपन्न हो गया था।

जब अर्ध चंद्रमा का उदय हुआ तब भगवान श्रीकृष्ण दिव्य रूप धारण करके माता देवकी के हृदय कमल के कोश से प्रकट हो गए।

ब्रह्मवैवर्त पुराण-

श्रीकृष्ण जन्मखंड-8 के अनुसार सप्तमी तिथि के दिन व्रती पुरुष को हविष्यान्न भोजन करके संयम पूर्वक रहना चाहिए।

सप्तमी की रात्रि व्यतीत होने पर अरुणोदय की बेला में उठकर व्रती पुरुष प्रातः कालिक कृत्य पूर्ण करने के अनंतर स्नानपूर्वक संकल्प करें।

Gurudev
Bhubneshwar
Parnkuti guna
9893946810