ज्योतिष समाधान

Tuesday, 30 May 2017

ज्योतिष शास्त्र में संतान योगों पर विचार ​गर्भ सम्भावना रविंदुशुक्रावनिजैः स्वभागगैः गुरौ त्रिकोणोदयसंस्थितेपि वा| भवत्यपत्यम् हि विबीजिमामिमे करा हिमांशोर्वीदृशामिवाफलाः - जातक पारिजात प्रश्न कुण्डली में सूर्य, शुक्र, चन्द्रमा और मंगल यदि अपने अपने नवमांश में स्थित हो अथवा वृहस्पति, लग्न या त्रिकोण (5/9) भावों में स्थित हो तो गर्भ सम्भव होता है| ये योग नपुंसक व्यक्ति के विषय में अन्धों के लिए चन्द्र रश्मि की शोभा के समान निष्फल होता है| चन्द्रमा और वृहस्पति यदि पापग्रह्युक्त हो और गुरु लग्न को न देखे चन्द्रमा क्षीण हो तो पर पुरुष द्धारा गर्भ होता है|

ज्योतिष शास्त्र में संतान योगों पर विचार ​गर्भ सम्भावना

रविंदुशुक्रावनिजैः स्वभागगैः गुरौ त्रिकोणोदयसंस्थितेपि वा| भवत्यपत्यम् हि विबीजिमामिमे करा हिमांशोर्वीदृशामिवाफलाः -

जातक पारिजात प्रश्न कुण्डली में सूर्य, शुक्र, चन्द्रमा और मंगल यदि अपने अपने नवमांश में स्थित हो अथवा वृहस्पति, लग्न या त्रिकोण (5/9) भावों में स्थित हो तो गर्भ सम्भव होता है|

ये योग नपुंसक व्यक्ति के विषय में अन्धों के लिए चन्द्र रश्मि की शोभा के समान निष्फल होता है| चन्द्रमा और वृहस्पति यदि पापग्रह्युक्त हो और गुरु लग्न को न देखे चन्द्रमा क्षीण हो तो पर पुरुष द्धारा गर्भ होता है|

गर्भस्य कुशल प्रश्ने पञ्चमे पापखेचरः स्वस्वामिदृष्टि रहिते तदा गर्भच्युतिर्भवेत्| गर्भ की कुशलता है या नहीं इस प्रश्न में यदि प्रश्न लग्न से पंचम भाव से पापग्रह हो और उस पंचम भाव पर यदि निजस्वामी की दृष्टि न हो तो गर्भ का पतन होता है|

पंचमे शुभसंयुक्ते स्वमिना च युतेक्षिते| गर्भस्य कुशलं ज्ञेयं मासपे सबले बुधैः|

यदि पंचम भाव शुभ ग्रह से युक्त हो अथवा पञ्चम भाव अपने स्वामी से युक्त या दृष्ट हो और मासेश (1 शुक्र, 2 मं. 3 बु. 4 र. 5 चं. 6 श. 7 बु. 8 लग्नेश, 9 चं. 10 र) अर्थात शुक्र आदि प्रथमादि मासेश ग्रह यदि बलयुक्त हो तो गर्भ की कुशलता होती है|

गर्भप्रश्ने क्षेपकस्तु षड् विंशत्कथितो बुधैः|
त्रिभिर्भागं समाहत्य गर्भो भूशेषके स्मृतः|
सन्देहस्तु द्धिशेषे स्याच्छून्ये नास्तीति निश्चयः|

गर्भ ज्ञान प्रश्न हो तो पिण्ड में 26 जोड़कर तीन का भाग देने से एक शेष बचे तो सन्देह और शून्य शेष बचे तो गर्भ नहीं है| ऐसा समझना चाहिए|

वारस्त्रिगुणितः कार्यस्थितिभिश्चैव संयुतः|
द्धाभ्यां भक्ते च यच्छेषंविषमेअस्ति समे न हि||

वार संख्या को 3 से गुणाकर तिथि संख्या को जोड़कर दो का भाग देने पर एक शेष बचे तो गर्भ नहीं है,कहना चाहिए|

तिथि-वारर्क्षयोगानां योगो नामअक्षरैर्युतः| सप्तभक्ताअवशेषेण समे कन्याअसमसुतः||

तिथि, वार, नक्षत्र और योग की संख्या को जोड़ उसमें प्रश्नकर्ता के नामाक्षर संख्या को जोड़कर सात का भाग देने से सम शेष बचे तो कन्या और विषम शेष बचे तो पुत्र का जन्म कहना चाहिए|

अथवा प्रश्न पिण्डांक में तीन का भाग देने से एक शेष में पुत्र, और दो शेष में कन्या तथा शून्य शेष में गर्भ का अभाव होता है| अथवा ओष्ठ, कण्ठ, गला, कान, मस्तक और नख का स्पर्श करता हुआ प्रश्न करे तो कन्या का जन्म समझना चाहिए|

यदि कोई प्रश्नकर्ता या गर्भिणी स्त्री पूछे कि क्या संतान होगी? तो पुरुष राशि (विषम राशि) का बलवान लग्न हो और उसके षडवर्ग निकालने से पुरुष राशि के वर्ग ज्यादा आवे और बली पुरुष (सूर्य, मंगल, गुरु) ग्रह उस लग्न को देखते हो तो उस गर्भवती स्त्री को पुत्र होगा और स्त्री राशि (समराशि) का लग्न हो और स्त्री राशि के वर्ग अधिक हो और बली स्त्री ग्रहों (चन्द्र, शुक्र) की दृष्टि उस लग्न में बुध हो तो स्त्री अभी तक गर्भवती है प्रसूति हुई नहीं ऐसा कहना चाहिए|

विषम राशि (1, 3, 7, 9, 11) में या विषम राशि के नवमांशो में यदि शनि वर्तमान हो तो गर्भ में कन्या होती है|

सूर्य सोमो गुरश्चैव विषमे पुत्रकारकः|
शुक्रमंगलचन्द्राणाम् यदि दृष्टिः सुते सुतः||

सूर्य चन्द्रमा और वृहस्पति यदि विषम राशि में वर्तमान रहे तो गर्भस्थित पुत्र होता है एवं यदि पंचम भाव में शुक्र, मंगल और चन्द्रमा, इन ग्रहों की दृष्टि हो तो भी गर्भ पुत्रोत्पत्ति होती है|

शुक्र चंद्रौ पञ्चमस्थौ कन्या जन्म कराविमौ|
पश्यतस्तौ सुतस्थानं पुत्रदौ-बलिना यदि||

शुक्र और चन्द्रमा यदि पंचम भाव में रहे तो कन्या की उत्पत्ति होती है| यदि बलवान शुक्र और चन्द्रमा पंचम भाव को देखे तो गर्भ से त्रोत्पत्ति होती है|

सन्तानभवनाधीशः प्रश्नलग्नाधिपस्तथा|
द्धावेव नरराशिस्थौ पुत्र स्त्री रशिगौ सुता||

पंचम भावेश और प्रश्नलग्नेश ये दोनों ग्रह यदि पुरुष राशि (1, 3, 5, 7, 9, 11) में गत हो तो गर्भस्थ पुत्र होता है| यदि वे दोनों स्त्री राशि (2, 4, 6, 8, 10, 12) में रहे तो गर्भस्थ कन्या होती है|

वह माना यदा नाड़ी दक्षिणा पुत्रसम्भवः|
वाम नाड़ी तदा पुत्री वहमाना विशेषतः||

प्रश्न समय में यदि दैवज्ञ का दक्षिणश्वास चले तो गर्भस्थ होता है| यदि वाम श्वाम चले तो गर्भस्थ कन्या होती है| लग्न में यदि पंचमेश हो, पञ्चम में यदि लग्नेश गत हो और बलवान चन्द्रमा से संयुत हो तो गर्भस्थ पुत्र होता है|

प्रश्न वर्णांक-मात्रांक स्थिति-वारर्क्ष-संयुतः| सप्तभक्ताअवशेषेण समे स्त्री विषमे पुमान्||

प्रश्न वर्णांक और मात्रावर्णांक में तिथि, नक्षत्र और वार की संख्या को जोड़कर सात का भाग देने से सम शेष बचे तो स्त्री और विषम शेष बचे तो पुरुष समझना चहिये|

लग्नात् विषमोपगतः श्नैश्चरः पुंजन्मकरो भवति|

प्रश्न लग्न से शनि यदि विषम स्थान में हो तो पुरुष (पुत्र) की प्राप्ति होती है और प्रश्न लग्न से यदि शनि सम स्थान में बैठा हो तो कन्या (स्त्री) की प्राप्ति होती है| इस के अलावा यदि प्रश्नकर्ता सू. मं. गु. वार को पुत्र सम्बन्धी प्रश्न पूछता है तो पुत्र होगा ऐसा कहना चाहिए और यदि पृच्छ्क च. बु. शु. को पुत्र सम्बन्धी प्रश्न करता है तो पुत्री की प्राप्ति होगी ऐसा दैवज्ञ को कहना चाहिए|

विवाह ज्ञान विवाह का कारक गुरुः होता है और विवाह- विवाह का कारक शुक्र भी होता है|

आदौ सम्पूज्य रत्नादिभिरथ गणकं वेदयेत् स्वस्थचित्तम् कन्योद् दिगीशानलहय विशिखे प्रश्नग्नाद् यदेन्दुः दृष्टो जीवने सद्दयः परिणय करो गोतुलाकर्कटाख्यः वा स्यात् प्रश्नस्य लग्नं शुभखचरयुतालोकितस्तद् विदध्यात्|

-मुहूर्त्तचिन्तामणि विवाहप्रकरण प्रश्न लग्न से चन्द्रमा

(10, 11, 3, 7, 5) मे हो तो विवाह क कारक होत है किन्तु अगर इन सभी स्थानों में यदि गुरु की दृष्टि पड़ती है तो सद्दयः शादि होती है| यदि च. (3, 7, 11, 5, 6) स्थों में वर्तमान हो और बुध रवि, वृहस्पति से देखा जाय तो विवाह कारक होता है वा वृहस्पति, बुध, शुक्र और चन्द्रमा यदि लग्न से त्रिकोण (1/5) व केंद्र (1, 4, 7, 10) स्थानों में रहे तो विवाह्कारक होते हैं|

प्रश्न पिण्डांक में आठ का भाग देकर एक शेष बचे तो बिना प्रयास से विवाह हो, दो शेष बचे तो यत्न से विवाह होता है|

तीन शेष बचे तो विवाह का अभाव, चार बचे तो कन्या मरण, पांच चाचा (पितृत्व) मरण, छः बचे तो राजभय, सात शेष बचे तो वर कन्या दोनों का मरण या श्वसुर का मरण तथा शून्य बचे तो संतान का मरण होता है|

यदि कोई पूछे कि विवाह होगा या नहीं? वहाँ प्रश्न लग्न से 3, 5, 6, 7 वें अथवा ग्यारहवें स्थान में चन्द्रमा और उसके ऊपर गु. सु. और बुध की दृष्टि हो तो विवाह अवश्य होगा| अथवा 5, 9 और केंद्र स्थान में शुभ-ग्रह हो तो भी विवाह अवश्य ही होगा ऐसा कहना चहिये|

Gurudev bhubneshwr
Kasturwa ngar
Parnkuti गुना
9893946810

काम शक्ति - काम इच्छा - और ज्योतिष काम शक्ति - काम इच्छा - और ज्योतिष हमारे पुरुष प्रधान समाज में पौरुष का आकलन व्यक्ति के लैंगिक प्रदर्शन पर अक्सर किया जाता रहा है. इस विषय पर लोग आज भी खुल कर बात नहीं करते किन्तु दबी जुबां में चर्चा समाप्त भी नहीं होती है. इस लेख में मैं प्रयास करूंगा की यदि आप यौन दुर्बलता आदि से ग्रस्त हैं तो उसके ज्योतिषीय उपाय क्या हो सकते हैं.

काम शक्ति - काम इच्छा - और ज्योतिष काम शक्ति - काम इच्छा - और ज्योतिष हमारे पुरुष प्रधान समाज में पौरुष का आकलन व्यक्ति के लैंगिक प्रदर्शन पर अक्सर किया जाता रहा है. इस विषय पर लोग आज भी खुल कर बात नहीं करते किन्तु दबी जुबां में चर्चा समाप्त भी नहीं होती है. इस लेख में मैं प्रयास करूंगा की यदि आप यौन दुर्बलता आदि से ग्रस्त हैं तो उसके ज्योतिषीय उपाय क्या हो सकते हैं.

ज्योतिष बहुत ही विस्तृत विज्ञान है और मनुष्य की हर बात को इस से समझा जा सकता है. आज के युग में जिसमें की शुक्र की प्रधानता बढती जा रही है , हम रोज़मर्रा के जीवन में देखते है की सम्भोग शक्ति से सम्बंधित दावा और मशीनें बढती जा रही है जो की कुछ नहीं है , लोगों की शर्म का मनोवैज्ञानिक आर्थिक दोहन है. सम्भोग की समयसीमा की अधिकता पौरुष का मार्का बन गयी है.

ज्योतिष में इन सबके लिए भी उपाय हैं जो की देर सबेर फायदा भी करते हैं और मनोवैज्ञानिक रूप से सहारा भी देते हैं.

सभी ग्रहों के लिंग ज्योतिष में निर्धारित है जो की निम्न हैं :

१) सूर्य : पुरुष २) चन्द्र : स्त्री ३) मंगल : पुरुष ४) बुध : नपुंसक , किन्तु अन्य ग्रहों की युति दृष्टि से अन्य योनी . ५) गुरु : पुरुष ६) शुक्र : स्त्री ७) शनि : नपुंसक ग्रहों के अनुसार ही राशियों का भी निर्धारण है जैसे हर दूसरी राशी स्त्री राशी है ,

अतः मेष पुरुष और वृषभ स्त्री राशी हुई , इसी प्रकार से मीन तक लीजिये. स्वाभाविक रूप से जब एक पुरुष गृह स्त्री राशी में या स्त्री गृह पुरुष राशी में विचरण करेगा तो भाव के फल में फर्क पड़ेगा. यह सामान्य बात है

. कुंडली के सप्तम और अष्टम भाव सेक्स के प्रकार और यौनांगों से सम्बंधित होते हैं.

नपुंसकता आमतौर पर मनोवैज्ञानिक दुर्बलता होती है और यह ठीक करी जा सकती है बशर्ते व्यक्ति के सम्बंधित अंग किसी बिमारी या दुर्घटना के कारण नष्ट न हो गए हों. कुछ योग जिनसे नपुंसकता आ सकती है ,

१) राहू या शनि द्वित्य भाव में हों , बुध अष्टम में तथा चन्द्रम द्वादश में हो ,

२) यदि चन्द्रमा पापकर्तरी में हो तथा अष्टम भाव में बुध या केतु हों ,

३) यदि शनि और बुध अष्टम भाव में हों तथा चन्द्र पाप कर्तरी में हो , यह कुछ योग हैं जिनसे यौन दुर्बलता आ सकती है किन्तु यह मनोवैज्ञानिक और अस्थिर होती है ना की सदा के लिए . इन अंगों की प्रकृति अश्तामाधिपति के अनुसार इस प्रकार हो सकती है ,

१) यदि सूर्य अष्टमेश है तो व्यक्ति के अंग अछे होंगे और ठीक से कार्य करेंगे ,

२) यदि चन्द्र है तो व्यक्ति के अंग अछे होंगे किन्तु वह सेक्स को लेकर मूडी होगा ,

३) यदि मंगल है तो व्यक्ति के अंग छोटे होंगे किन्तु वह बहुत ही कामुक होगा ,

४) यदि बुध है तो व्यक्ति सेक्स को लेकर हीन भावना से ग्रस्त होगा ,

५) यदि गुरु है तो व्यक्ति व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ होगा ,

६) यदि शुक्र है तो व्यक्ति के अंग सुंदर होंगे और उसकी काम क्रिया में तीव्र रूचि रहेगी ,

७) यदि शनि है तो व्यक्ति के अंग की लम्बाई अधिक होगी किन्तु क्रिया में शिथिलता और विकृति रह सकती है , अष्टम भाव में बैठे ग्रहों के अनुसार फल में परिवर्तन आ जायेगा, बुध यदि अष्टम में हो , स्वराशी का ना हो और उस पर कोई शुभ दृष्टि भी न हो तो व्यक्ति काम क्रिया में असफल रहता है, राहू के होने से व्यक्ति अत्यंत भोगवादी हो जाता है तथा केतु से उसके अन्दर तीव्र उत्कंठा बनी रहती है. व्यक्ति का यौन व्यवहार सप्तम भाव से प्रदर्शित होता है ,सप्तम भाव और उसमें बैठे ग्रहों के कारण फल में अंतर आता जाता है ,

१) सप्तम में यदि मंगल हो तो या दृष्टि हो तो व्यक्ति काम क्रिया में क्रोध का प्रदर्शन करता है और सारा आनंदं नष्ट कर देता है ,

२) यदि गुरु हो तो व्यक्ति आदर्श क्रिया संपन्न करता है ,

३) यदि शनि हो व्यक्ति का बहुत ही हीन द्रष्टिकोण होता है और वह जानवरों जैसा व्यवहार भी करता है ,

४) यदि राहू हो तो व्यक्ति ऐसे बर्ताव करता है जैसे कुछ चुरा रहा हो ,

५) यदि केतु हो तो व्यक्ति शीघ स्खलन से ग्रस्त होता है ,

६) यदि शुक्र हो तो व्यक्ति पूर्ण आनंद प्राप्त करता है ,

७) यदि बुध हो तो व्यक्ति नसों में दुर्बलता और जल्दी थक जाने से ग्रस्त होता है ,

८) यदि चन्द्र अष्टम मैं हो तो व्यक्ति काम क्रिया में बहुत आनंद देता है किन्तु चन्द्र की दृष्टि निष्प्रभावी होती है ,

९) यदि सूर्य हो तो व्यक्ति क्रिया में अति उत्तेजना का प्रदर्शन करता है ग्रहों की युति , दृष्टि , दशा , और गोचर के अनुसार व्रक्ति का प्रदर्शन बदलता चला जाता है और सभी तथ्यों को समक्ष रखने पर ही सही निर्णय पर आया जा सकता है.

यदि व्यक्ति किसी प्रकार की दुर्बलता या व्याधि से ग्रस्त है तो एक अछे यौन चिकिसक और मनोवैज्ञानिक का परामर्श लेना बेहतर है बजाय किसी पोस्टर पम्फलेट वाले झोला छाप गली मोहल्ले में में मिलने वाले स्वघोषित चिकित्सक अथवा फूटपाथ पर झुग्गी बना के बैठे हुए और्वेदाचार्यों से. ज्योतिषीय परामर्श से आप न सिर्फ अपनी दुर्बलता को दूर कर सकते है बल्कि जीवन में धनात्मक ऊर्जा का संचार भी कर सकते हैं. आपको वह रत्ना धारण करना चहिये जिससे आपकी शक्ति का विकास हो और योग मुद्रा में अश्विनी मुद्रा का अभ्यास करना चहिये. धूम्र पान को सदा के लिए त्यागना होगा क्योकि उस से बड़ा पौरुष शक्ति का शत्रु कोई दूसरा नहीं है. खान पान की आदतों में सुधार करना चहिये और शराब की मात्र संयमित होनी चहिये. इश्वर की प्रार्थना सर्वप्रथम है . एक अच्छा ज्योतिषी आपको आपकी दशा गृह गोचर आदि द्वारा उचित परामर्श दे सकता है और किस इश्वर की आराधन करनी चहिये वह भी बता सकता है . ज्योतिष की सहायता लेना दीर्घकाल में कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होगा बजाय इन सब वैद्य और झोला छाप चिकित्सकों के चक्कर लगाने से. साथ ही सही वास्तविक चिकित्सक और मनोवैज्ञानिक परामर्श का भी आपको सहारा लेना होगा.

Pandit
Bhubneshwar रामायणी
Kasturwanagar parnkuti guna

9893946810

ज्योतिष और यौन सुख : ज्योतिष विज्ञान के अनुसार शुक्र ग्रह की अनुकूलता से व्यक्ति भौतिक सुख पाता है। जिनमें घर, वाहन सुख आदि समिल्लित है। इसके अलावा शुक्र यौन अंगों और वीर्य का कारक भी माना जाता है। शुक्र सुख, उपभोग, विलास और सुंदरता के प्रति आकर्षण पैदा करता है। विवाह के बाद कुछ समय तो गृहस्थी की गाड़ी बढिय़ा चलती रहती है किंतु कुछ समय के बाद ही पति पत्नि में कलह झगडे, अनबन शुरू होकर जीवन नारकीय बन जाता है. इन स्थितियों के लिये भी जन्मकुंडली में मौजूद कुछ योगायोग जिम्मेदार होते हैं. अत: विवाह तय करने के पहले कुंडली मिलान के समय ही इन योगायोगों पर अवश्य ही दॄष्टिपात कर लेना चाहिये. सातवें भाव में खुद सप्तमेश स्वग्रही हो एवं उसके साथ किसी पाप ग्रह की युति अथवा दॄष्टि भी नही होनी चाहिये.

ज्योतिष और यौन सुख :

ज्योतिष विज्ञान के अनुसार शुक्र ग्रह की अनुकूलता से व्यक्ति भौतिक सुख पाता है।

जिनमें घर, वाहन सुख आदि समिल्लित है। इसके अलावा शुक्र यौन अंगों और वीर्य का कारक भी माना जाता है।

शुक्र सुख, उपभोग, विलास और सुंदरता के प्रति आकर्षण पैदा करता है। विवाह के बाद कुछ समय तो गृहस्थी की गाड़ी बढिय़ा चलती रहती है किंतु कुछ समय के बाद ही पति पत्नि में कलह झगडे, अनबन शुरू होकर जीवन नारकीय बन जाता है. इन स्थितियों के लिये भी जन्मकुंडली में मौजूद कुछ योगायोग जिम्मेदार होते हैं.

अत: विवाह तय करने के पहले कुंडली मिलान के समय ही इन योगायोगों पर अवश्य ही दॄष्टिपात कर लेना चाहिये. सातवें भाव में खुद सप्तमेश स्वग्रही हो एवं उसके साथ किसी पाप ग्रह की युति अथवा दॄष्टि भी नही होनी चाहिये.

लेकिन स्वग्रही सप्तमेश पर शनि मंगल या राहु में से किन्ही भी दो ग्रहों की संपूर्ण दॄष्टि संबंध या युति है तो इस स्थिति में दापंत्य सुख अति अल्प हो जायेगा. इस स्थिति के कारण सप्तम भाव एवम सप्तमेश दोनों ही पाप प्रभाव में आकर कमजोर हो जायेंगे. यदि शुक्र के साथ लग्नेश, चतुर्थेश, नवमेश, दशमेश अथवा पंचमेश की युति हो तो दांपत्य सुख यानि यौन सुख में वॄद्धि होती है वहीं षष्ठेश, अष्टमेश उआ द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है.

यदि सप्तम अधिपति पर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, सप्तमाधिपति से केंद्र में शुक्र संबंध बना रहा हो, चंद्र एवम शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखी और प्रेम पूर्ण होता है. लग्नेश सप्तम भाव में विराजित हो और उस पर चतुर्थेश की शुभ दॄष्टि हो, एवम अन्य शुभ ग्रह भी सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक को अत्यंत सुंदर सुशील और गुणवान पत्नि मिलती है जिसके साथ उसका आजीवन सुंदर और सुखद दांपत्य जीवन व्यतीत होता है. (यह योग कन्या लग्न में घटित नही होगा) सप्तमेश की केंद्र त्रिकोण में या एकादश भाव में स्थित हो तो ऐसे जोडों में परस्पर अत्यंत स्नेह रहता है.

सप्तमेश एवम शुक्र दोनों उच्च राशि में, स्वराशि में हों और उन पर पाप प्रभाव ना हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखद होता है.

सप्तमेश बलवान होकर लग्नस्थ या सप्तमस्थ हो एवम शुक्र और चतुर्थेश भी साथ हों तो पति पत्नि अत्यंत प्रेम पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं.

पुरूष की कुंडली में स्त्री सुख का कारक शुक्र होता है उसी तरह स्त्री की कुंडली में पति सुख का कारक ग्रह वॄहस्पति होता है.

स्त्री की कुंडली में बलवान सप्तमेश होकर वॄहस्पति सप्तम भाव को देख रहा हो तो ऐसी स्त्री को अत्यंत उत्तम पति सुख प्राप्त होता है.

जिस स्त्री के द्वितीय, सप्तम, द्वादश भावों के अधिपति केंद्र या त्रिकोण में होकर वॄहस्पति से देखे जाते हों, सप्तमेश से द्वितीय, षष्ठ और एकादश स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, ऐसी स्त्री अत्यंत सुखी और पुत्रवान होकर सुखोपभोग करने वाली होती है.

पुरूष का सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो वही राशि स्त्री की हो तो पति पत्नि में बहुत गहरा प्रेम रहता है.

वर कन्या का एक ही गण हो तथा वर्ग मैत्री भी हो तो उनमें असीम प्रम होता है. दोनों की एक ही राशि हो या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो भी जीवन में प्रेम बना रहता है.

अगर वर या कन्या के सप्तम भाव में मंगल और शुक्र बैठे हों उनमे कामवासना का आवेग ज्यादा होगा अत: ऐसे वर कन्या के लिये ऐसे ही ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी का चुनाव करना चाहिये. दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है.

एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नही हो तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता, अत: सगाई पूर्व माता पिता को निम्न स्थितियों पर ध्यान देते हुये किसी सुयोग्य और विद्वान ज्योतिषी से दोनों की जन्म कुंडलियों में स्वास्थ्य, आयु, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, संतान पक्ष इत्यादि का समुचित अध्ययन करवा लेना चाहिये सिफर् गुण मिलान से कुछ नही होता. वर वधु की आयु का अधिक अंतर भी नही होना चाहिये, दोनों का शारीरिक ढांचा यानि लंबाई उंचाई, मोटाई, सुंदरता में भी साम्य देख लेना चाहिये.

अक्सर कई धनी माता पिता अपनी काली कलूटी कन्या का विवाह धन का लालच देकर किसी सुंदर और गौरवर्ण लड़के से कर देते हैं जो बाद में जाकर कलह का कारण बनता है. कुल मिलाकर शिक्षा, खानदान, खान पान परंपरा इत्यादि की साम्यता देखकर ही निर्णय लेना चाहिये. इस सबके अलावा वर कन्या के जन्म लग्न एवन जन्म राशि के तत्वों पर भी दॄष्टिपात कर लेना चाहिये. दोनों के लग्न, राशि के एक ही ततव हों और परस्पर मित्र भाव वाले हों तो भी पति पत्नि का जीवन प्रेम मय बना रहता है.

इस मामले में विपरीत तत्वों का होना पति पत्नि में शत्रुता पैदा करता है यानि पति अग्नि तत्व का हो और पत्नि जल तत्व की हो तो गॄहस्थी की गाड़ी बहुत कष्ट दायक हो जाती है.

कुल मिलाकर एक ही तत्व वाले जोडे अधिक सुखद दांपत्य जीवन जीते हैं.. विवाह भाव में चन्द्र एवं अन्य ग्रहों की युति विवाह जीवन का एक महत्वपूर्ण फैसला होता है. विवाह को लेकर मन में उत्सुकता रहती है तो एक भय भी बना रहता है कि होने वाला जीवनसाथी कैसा होगा.

उनके साथ उनकी जिन्दग़ी कैसी गुजरेगी. परिवार में उनका आगमन किस प्रकार का परिवर्तन लएगा. ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न मन में आते-जाते रहते हैं.

अगर आपकी कुण्डली के सप्तम भाव में ग्रहों के मध्यम युति सम्बन्ध बन रहा है तो इस आलेख से जीवनसाथी के विषय में काफी कुछ जान सकते हैं.

सप्तम भाव में चन्द्र-मंगल युति

अगर कुण्डली में विवाह भाव में चन्द्र-मंगल दोनों की युति हो रही हो तो व्यक्ति के जीवनसाथी के स्वभाव में मृदुलता की कमी की संभावना बनती है.

इस योग के व्यक्ति के जीवनसाथी को सत्य धर्म का पालन करना चाहिए. जहां तक हो सके अपने स्वभाव में दया भाव बनाये रखना चाहिए.

सप्तम भाव में चन्द्र-बुध युति

कुण्डली में चन्द्र व बुध की युति होने पर व्यक्ति का जीवनसाथी यशस्वी, विद्वान व सत्ता पक्ष से सहयोग प्राप्त करने वाला होता है. इस योग के व्यक्ति को अपने जीवनसाथी के सहयोग से धन व मान मिलने की संभावना बनती है. योग की शुभ प्रभाव से वह प्रतिष्ठित भी होता है.

सप्तम भाव में चन्द्र व गुरु की युति

कुण्डली में विवाह भाव में जब चन्द्र व गुरु एक साथ स्थित हों तो व्यक्ति का जीवनसाथी कला विषयों मे कुशल होता है. उसके विद्वान व धनी होने कि भी संभावना बनती है.

इस योग के व्यक्ति के जीवनसाथी को सरकारी क्षेत्र से लाभ मिलता है. इन ग्रहों का योग व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में मधुरता में वृद्धि करने में सहयोग करता है. इसके विपरीत चन्द्र पर किसी पापी ग्रह का प्रभाव हो तो योग से मिलने वाले फल इसके विपरीत होते हैं.

सप्तम भाव में चन्द्र व शुक्र की युतीअगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्र व शुक्र की युति होने पर व्यक्ति का जीवनसाथी बुद्धिमान हो सकता है. उसके पास धन, वैभव होने कि भी संभावना बनती है.

व्यक्ति के जीवनसाथी के सुविधा संपन्न होने की भी संभावना बनती है. योग के कारण विवाह के बाद का जीवन सुखमय होता है. ऎसे व्यक्ति का जीवनसाथी शिल्प शिल्प कला का जानकार हो सकता है.

उसके जीवनसाथी के स्वभाव में मधुरता का भाव रहता है.

सप्तम भाव में चन्द्र-शनि की युती

कुण्डली के विवाह भाव में चन्द्र व शनि दोनों एक साथ स्थित हों तो व्यक्ति का जीवनसाथी प्रतिष्ठित परिवार से होता है.

सप्तम भाव में चन्द्र की अन्य ग्रहों से युति

जब चंद्रमा की युति सप्तम भाव में बुध, गुरु, शुक्र से हो रही हों तो व्यक्ति के वैवाहिक जीवन के शुभ फलों में वृद्धि होती है.

अगर चन्द्र की युति विवाह भाव में शनि, मंगल के साथ हो रही हो तो दाम्पत्य जीवन में परेशानियां आती है.

चन्द्र युति से बनने वाले उपरोक्त योगों पर जब अन्य ग्रहों का किसी भी तरह का प्रभाव आता है तो योगों से मिलने वाले फलों में भी परिवर्तन होने की गुंजाइश रहती है. स्वयं चन्द्र भी जब कुण्डली में कृष्ण पक्ष का या निर्बल हो तब भी चन्द्र से मिलने वाले फल बदल जाते हैं.

प्रभाव- ग्रहों की युति-प्रतियुति के -

भारती पंडित जब दो ग्रह एक ही राशि में हों तो इसे ग्रहों की युति कहा जाता है। जब दो ग्रह एक-दूसरे से सातवें स्थानपर हों अर्थात् 180 डिग्री पर हों, तो यह प्रतियुति कहलाती है। अशुभ ग्रह या अशुभ स्थानों के स्वामियों की युति-प्रतियुति अशुभ फलदायक होती है, जबकि शुभ ग्रहों की युति शुभ फल देती है। आइए देखें, विभिन्न ग्रहों की युति-प्रतियुति के क्या फल हो सकते हैं

- 1. सूर्य-गुरु :

उत्कृष्ट योग, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, यश दिलाता है। उच्च शिक्षा हेतु दूरस्थ प्रवास योग तथा बौद्धिक क्षेत्र में असाधारण यश देता है।

2. सूर्य-शुक्र :

कला क्षेत्र में विशेष यश दिलाने वाला योग होता है। विवाह व प्रेम संबंधों में भी नाटकीय स्थितियाँ निर्मित करता है।

3. सूर्य-बुध :

यह योग व्यक्ति को व्यवहार कुशल बनाता है। व्यापार-व्यवसाय में यश दिलाता है। कर्ज आसानी से मिल जाते हैं।

4. सूर्य-मंगल :

अत्यंत महत्वाकांक्षी बनाने वाला यह योग व्यक्ति को उत्कट इच्छाशक्ति व साहस देता है। ये व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने की योग्यता रखते हैं।

5.सूर्य-शनि :

अत्यंत अशुभ योग, जीवन के हर क्षेत्र में देर से सफलता मिलती है। पिता-पुत्र में वैमनस्य, भाग्य का साथ न देना इस युति के परिणाम हैं।

6. सूर्य-चंद्र :

चंद्र यदि शुभ योग में हो तो यह यु‍ति मान-सम्मान व प्रतिष्ठा की दृष्टि से श्रेष्ठ होती है, मगर अशुभ योग होने पर मानसिक रोगी बना देती है।

7. चंद्र-मंगल :

यह योग व्यक्ति को जिद्‍दी व अति महत्वाकांक्षी बनाता है। यश तो मिलता है, मगर स्वास्थ्‍य हेतु यह योग हानिकारक है। रक्त संबंधी रोग होते हैं। प्रभाव- ग्रहों की युति-प्रतियुति के

8. चंद्र-शुक्र :

वैवाहिक जीवन के लिए फलदायी योग, मनचाहा जीवनसाथी मिलता है, विवाह के बाद भाग्योदय, यश मिलता है। कला क्षेत्र में सफलता मिलती है। भाग्य साथ देता है।

9. चंद्र-गुरु :

शिक्षा, नौकरी, विवाह, संतति सभी दृष्टि से अत्यंत फलदायक योग, जीवन में धन, यश, सुख सब मिलता है।

10. चंद्र-बुध :

बुद्धि व वाक् चातुर्य बढ़ाने वाला योग है। ऐसे व्यक्ति व्यवहार कुशल व लोगों को जोड़ने वाले होते हैं। व्यवहार कार्य में यश मिलता है।

11. चंद्र-राहु :

ग्रहण योग, शरीर स्वास्थ्य हेतु हानिकारक, जीवन में रुकावटें आती हैं। पानी से, भूत-पिशाच बाधा से, गुप्त शत्रुओं से परेशानी आती है।

12. चंद्र-केतु :

निराशावादी व आलसी बनाने वाला योग है। विरक्ति व संन्यास की तरफ झुकाव, स्वास्थ्‍य की परेशानियाँ भी बनी रहती हैं।

13. चंद्र-शनि : वृषभ, तुला, मकर, कुंभ राशियों में यह योग शुभ है, जिसके फल 36 वर्ष के बाद मिलते हैं।

अन्य राशियों के लिए प्रतिकूल हर कार्य में विलंब, आर्थिक कष्ट तथा वाणी की कठोरता जैसे फल मिलते हैं। इसे विष योग भी कहते हैं।

14. गुरु-राहु :

यह चांडाल योग बनाता है। यह युति जिस भाव में हो, उसके फल का नाश करती है। आयु के उत्तरार्द्ध में ही सफलता मिलती है। जीवन निराशा, कष्ट व परेशानी में बीतता है।

15. शनि-मंगल :

यह युति जीवन में अनिश्चितता व आकस्मिकता लाती है। सप्तम भाव में होने पर वैवाहिक जीवन का नाश करती है। दुर्घटनाएँ, जीवन में अस्थिरता होती है। अचानक घटनाएँ घटती हैं।

चंद्र+मंगल-

शत्रुओं पर एवं ईर्ष्या करने वालों पर, सफलता प्राप्त करने के लिए एवं उच्च वर्ग (सरकारी अधिकारी) विशेषकर सैनिक व शासकीय अधिकारी से मुलाकात करने के लिए उत्तम रहता है।

चंद्र+बुध-

धनवान व्यक्ति, उद्योगपति एवं लेखक, सम्पादक व पत्रकार से मिलने या सम्बन्ध बनाने के लिए।

चंद्र+शुक्र

-प्रेम-प्रसंगों में सफलता प्राप्त करने एवं प्रेमिका को प्राप्त करने तथा शादी- ब्याह के समस्त कार्यों के लिए, विपरीत लिंगी से कार्य कराने के लिए।

चंद्र+गुरु-

अध्ययन कार्य, किसी नई विद्या को सीखने एवं धन और व्यापार उन्नति के लिए।

चंद्र+शनि-

शत्रुओं का नाश करने एवं उन्हें हानि पहुंचाने या उन्हें कष्ट पहुंचाने के लिए।

चंद्र+सूर्य-

राजपुरूष और उच्च अधिकारी वर्ग के लोगों को हानि या उसे उच्चाटन करने के लिए।

मंगल+बुध-

शत्रुता, भौतिक सामग्री को हानि पहुंचाने, तबाह-बर्बाद, हर प्रकार सम्पत्ति, संस्था व घर को तबाह-बर्बाद करने के लिए।

मंगल+शुक्र-

हर प्रकार के कलाकारों (फिल्मी सितारों) में डांस, ड्रामा एवं स्त्री जाति पर प्रभुत्व और सफलता प्राप्त करने के लिए।

मंगल+ गुरु-

युद्घ और झगड़े में या कोर्ट केस में, सफलता प्राप्त करने के लिए, शत्रु-पथ पर भी जनमत को अनुकूल बनाने के लिए।

मंगल+शनि-

शत्रु नाश एवं शत्रु मृत्यु के लिए एवं किसी स्थान को वीरान करने (उजाड़ने ) के लिए।

बुध+शुक्र-

प्रेम-सम्बन्धी सफलता, विद्या प्राप्ति एवं विशेष रूप से संगीत में सफलता के लिए।

बुध+गुरु-

पुरुष का पुरुष के साथ प्रेम और मित्रता सम्बन्धों में पूर्ण रूप से सहयोग के लिए एवं हर प्रकार की ज्ञानवृद्घि के ि‍लए नया पाठ, साइन्स सीखने के लिए।

बुध+शनि-

कृषि एवं मेवा, सब्जी एवं इसकी वृद्घि के लिए, अच्छी फसल एवं किसी वस्तु की या किसी रहस्य (चोरी या कांड) को गुप्त रखने के लिए।

शुक्र+गुरु-

प्रेम-सम्बन्धी आकर्षण एवं जनसमूह को अपने अनुकूल करने के लिए।

शुक्र+शनि-

स्त्री जाति को हानि, परेशानी, दुर्भाग्य के समस्त कार्य के लिए। (सिर्फ विपरीत लिंगी के लिए)

गुरू+ शनि-

हर प्रकार के विद्वानों के बुद्घिनाश हेतु, शास्त्रार्थ व विवाद पैदा करने हेतु एवं उनमें शत्रुता पैदा करने हेतु। ग्रहों के विशिष्ट योग

1. युति : दो ग्रह एक ही राशि में एक सी डिग्री के हों तो युति कहलाती है। अशुभ ग्रहों की युति अशुभ फल व शुभ ग्रहों की युति शुभ फल देती है। अशुभ व शुभ ग्रह की युति भी अशुभ फल ही देती है।

2. लाभ योग :

एक ग्रह दूसरे से 60 डिग्री पर हो या तीसरे स्थान में हो तो लाभ योग होता है। यह शुभ माना जाता है।

3. केंद्र योग :

दो ग्रह एक दूसरे से 90 डिग्री पर हो या चौथे व 10वें स्थान पर हो तो केंद्र योग होता है। यह योग शुभ होता है।

4. षडाष्टक योग :

दो ग्रह 150 डिग्री के अंतर पर हो या एक दूसरे से 6 या8 वें स्थान में हों तो षडाष्टक दोष या योग होता है। यह कष्‍टकारी होता है।

5. नवपंचम योग :

दो ग्रह एक दूसरे से 120 डिग्री पर अर्थात पाँचवें व नवें स्थान पर समान अंश में हो तो यह योग होता है। यह अति शुभ माना जाता है जैसे सिंह राशि का मंगल और धनु राशि का गुरु -

6. प्रतियुति :

इसमें दो ग्रह 180 डिग्री पर अर्थात एक दूसरे से सातवें स्थान पर होते हैं। विभिन्न ग्रहों के लिए इसके प्रभाव भिन्न-भिन्न होते हैं।

7. अन्योन्य योग :

जब ग्रह एक दूसरे की राशि में हो तो यह योग बनता है। (जैसे वृषभ का मंगल और वृश्चिक का शुक्र) इसके भी शुभ फल होते हैं।

8. पापकर्तरी योग :

किसी ग्रह के आजू-बाजू (दूसरे व व्यय में) पापग्रह हो तो यह योग बनता है। यह बेहद अशुभ होता है। उपाय --धन प्राप्ति के लिए किए :कमल गट्टे से धन/Upay, कमल गट्टे से धन धन प्राप्ति के लिए किए जाने वाले तंत्र प्रयोगों में कई वस्तुओं का उपयोग किया जाता है, कमल गट्टा भी उन्हीं में से एक है। कमल गट्टा कमल के पौधे में से निकलते हैं व काले रंग के होते हैं। यह बाजार में आसानी से मिल जाते हैं। मंत्र जप के लिए इसकी माला भी बनती है। इसके अलावा भी इसके कई प्रयोग हैं। इसके कुछ प्रयोग नीचे लिखे