ज्योतिष समाधान

Friday, 12 September 2025

स्त्री से कथा

#ब्राह्मणेतर_व_स्त्री_से_कथा_श्रवण_व_दीक्षा_का_निषेध

" व्यासानोपवेशाच्य शूद्र चाण्डालतां व्रजेत् ।
  विप्रस्येवाधिकारोऽस्ति व्यासासन समागमे।।
  धर्माणां श्रुतिगीतानामुपदेशे तथा द्विजः।। " 
          यदि शूद्र व्यास पीठस्थ होते हैं तो चाण्डालवत् हो जाते हैं -- विप्राधिकार ही व्यासपीठ में श्रेयस्कर है -- धर्मशास्त्रों के प्रवचन का अधिकार मात्र ब्राह्मण को है ।

व्यासपीठ पर बैठे ब्राह्मण को नाचना - गाना निषेध है तो निकृष्ट योनि को प्राप्त होता है ।।
" तस्माद् ब्राह्मणे नैव गायन्नानृत्येनन्माग्लागृधः स्यात्। ( अथर्ववेद् )

      अब स्वाभाविक है कि ब्राह्मणेतर अगर व्यासपीठस्थ हो तो विप्र भी उसे प्रणाम करेगा और कितने ऐसे भी मूढचित्त हैं जो ब्राह्मणेतर से दीक्षा भी ग्रहण कर लेते हैं -- 

      महाभारत शांतिपर्व में कहा है :--
" अभार्या शयने विभ्रच्छूद्रं वृद्धं च वै द्विजः। 
  अब्राह्मणं मन्य मानस्तृणेष्वासीत पृष्ठतः।। " 
             यदि ब्राह्मण अपनी पत्नि सिवाय दुशरी स्त्री को शय्या पर बिठा ले अथवा बडे - बूढे शूद्र को या ब्राह्मणेतर क्षत्रीय या वैश्य को सम्मान देता हुआ ऊंचे आसन पर बैठाकर स्वयं चटाई पर बैठे अथवा उससे नीचे आसान पर बैठे तो वह ब्राह्मण ब्राह्मणत्व से गिर जाता है ।

शिवपुराण में भी कहा है :--
" अपूज्याः यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते। 
. त्रीणि तत्र प्रवर्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ।। "
         जहां अपूज्य की पूजा होती है - जो पूज्य हैं उनको सम्मान नहीं दिया जाता - तीन चीजें वहां अवश्य होती हैं - दुर्भिक्ष- मरण और भय । ( मौजूदा समय में ये तीनों ही चरम पर हैं - बाढ से अकाल की स्थिती - मारकाट और भय - जनता जनता के रक्षकों से ही भयभीत है )।

और ब्राह्मणेतर से मंत्र दीक्षा के लिए ब्रह्मपुराण में स्पष्ट शब्दों में कहा है :---
           " ब्राह्मणेतरान् वर्णान् गुरून् मोहात् करोति यः। 
             सयाति नरकं घोरं विपन्नोऽपि भवेद् ध्रुवम् ।। "
ब्राह्मण से अतिरिक्त अन्य से मंत्र लेने में शास्त्र ने कहा कि वह शिष्य सुनिश्चित् नरकगामी होता है तथा अनेक विपत्तियां आती है ।

स्कन्द पुराण क्या कहता है :---
            " यो नरः नीच वर्णेभ्यो मंत्र ग्रहणमाचरन्। 
              न मंत्रफलमाप्नोति श्वयोनि चाधिगच्छति।। "
जो मनुष्य निम्न वर्ण के मनुष्य से मंत्र ग्रहण करता है - न तो उसे मंत्र का कोई फल प्राप्त होता है उल्टा वह कुत्ते की योनि में जन्म लेता है ।

अब कोई कहे कि कर्म से ही ब्राह्मण होते हैं विश्वामित्र तप से ब्राह्मण हुए  :--- तो वो भी सुन लें ! 

           " कलौ ब्राह्मणवीर्यात् न तपश्चरणादिभिः।  
कलियुग में ब्राह्मण वीर्य से ब्राह्मण स्त्री से ही ब्राह्मण होता है - तपस्या आदि से नहीं ।

नापित जनेऊ धारण करने से ब्राह्मण नहीं बन जाता ।
         " न नापिती ब्राह्मणतां याति सूत्रादि धारणात्। "

वहीं स्त्री से भी मंत्र ग्रहण का निषेध है :---
          " दैवपित्र्यातिथेयानि तत्प्रधानानि यस्य तु ।
            नाश्नन्ति पितृदेवास्तन्न च स्वर्ग स गच्छति।। "
जिस व्यक्ति के घर में देवकार्य - यज्ञ - मंत्रदीक्षा - श्राद्ध --  स्त्री के द्वारा सम्पन्न होते हैं -- वहां से देवता तथा पितृगण सदा के लिए विदा हो जाते हैं ।

           " वर्णोत्कृष्टो हीनवर्ण गुरूमोहाद् यदाचरेत्। 
             प्रायश्चितं तदाकृत्वा गुरूमन्यं समाश्रयेत् ।। "
यदि उच्च वर्ण वालों ने अपने से नीच वर्ण या ब्राह्मण आचार्य के अतिरिक्त किसी से दीक्षा ली है तो वह प्रायश्चित् करे तथा श्रेष्ठ गुरू का वरण करे । ( विश्वामित्र संहिता )

      शूद्र से दीक्षित ब्राह्मण को शूद्र ही समझना चाहिए ( कौशिक संहिता)

और भी :---
        " नाश्रोत्रियतते यज्ञे ग्रामयाजिकृते तथा। 
          स्त्रिया क्लीवेन च हुते भुञ्जीत ब्राह्मणः क्वचित् ।। 
जिस यज्ञ में स्त्री हवन करती है - नपुंसक के द्वारा होम होता है - जो स्त्री से मंत्र लेता है - ऐसे घर या स्थल पर ब्राह्मण को कदापि भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिए। 

         " अश्लील मेत्तसाधूनां यत्र जुहत्य मी हविः। 
.           प्रतीप मेतद्देवानां तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ।। 
स्त्री को यज्ञ में पति के साथ मात्र बैठना चाहिए न कि आहुति देनी चाहिए-- व तो मात्र पति सुश्रुषा से ही मुक्ति पाती है ।

                   🚩 हर हर महादेव 🚩 ।। वशिष्ठ ।।

Wednesday, 10 September 2025

श्राद्ध

श्राद्ध में 'क्या करें' और 'क्या न करें'??

पितरों के कार्य में बहुत सावधानी रखनी चाहिए, अत: श्राद्ध में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए-

▪️वर्ष में दो बार श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जिस तिथि पर व्यक्ति की मृत्यु होती है, उस तिथि पर वार्षिक श्राद्ध करना चाहिए। पितृपक्ष में मृत व्यक्ति की जो तिथि आए, उस तिथि पर मुख्यरूप से पार्वणश्राद्ध करने का विधान है।

▪️मनु ने श्राद्ध में तीन चीजों को अत्यन्त पवित्र कहा है-

कुतप मुहूर्त (दोपहर के बाद कुल 24 मिनट का समय)-ब्रह्माजी ने पितरों को अपराह्नकाल दिया है। असमय में दिया गया अन्न पितरों तक नहीं पहुंचता है। सायंकाल में दिया हुआ कव्य राक्षस का भाग हो जाता है।तिल, श्राद्ध की जगह पर तिल बिखेर देने से वह स्थान शुद्ध व पवित्र हो जाता है।दौहित्र (लड़की का पुत्र)।

▪️पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र न हो तो पत्नी कर सकती है।

▪️श्राद्ध में पवित्रता का बहुत महत्व है। पितृकार्य में वाक्य और कार्य की शुद्धता बहुत जरुरी है और इसे बहुत सावधानी से करना चाहिए।

▪️श्राद्धकर्ता को क्रोध, कलह व जल्दबाजी नही करनी चाहिए।

▪️श्राद्धकर्म करने वाले को पितृपक्ष में पूरे पन्द्रह दिन क्षौरकार्य (दाढ़ी-मूंछ बनाना, नाखून काटना) नहीं करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

▪️श्राद्ध में सात्विक अन्न-फलों का प्रयोग करने से पितरों को सबसे अधिक तृप्ति मिलती है। काला उड़द, तिल, जौ, सांवा चावल, गेहूँ, दूध, दूध के बने सभी पदार्थ, मधु, चीनी, कपूर, बेल, आंवला, अंगूर, कटहल, अनार, अखरोट, कसेरु, नारियल, तेन्द, खजूर, नारंगी, बेर, सुपारी, अदरक, जामुन, परवल, गुड़, मखाना, नीबू आदि अच्छे माने जाते हैं।

▪️कोदो, चना, मसूर, कुलथी, सत्तू, काला जीरा, टेंटी, कचनार, कैथ, खीरा, लौकी, पेठा, सरसों, काला नमक व कोई भी बासी, गला-सड़ा, कच्चा व अपवित्र फल और अन्न श्राद्ध में प्रयोग नहीं करना चाहिए।

▪️श्राद्ध-कर्म में इन फूलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए-कदम्ब, केवड़ा, बेलपत्र, कनेर, मौलसिरी, लाल व काले रंग के पुष्प और तेज गंध वाले पुष्प। इन पुष्पों को देखकर पितरगण निराश होकर लौट जाते हैं।

▪️श्राद्ध में अधिक ब्राह्मणों को निमन्त्रण नहीं देना चाहिए। पितृकार्य में एक या तीन ब्राह्मण पर्याप्त होते हैं। ज्यादा ब्राह्मणों को निमन्त्रण देकर यदि उनके आदर-सत्कार में कोई कमी रह जाए तो वह अकल्याणकारी हो सकता है।

▪️श्राद्ध के लिए उत्तम ब्राह्मण को निमन्त्रित करना चाहिए जो योगी, वैष्णव, वेद-पुरान का ज्ञाता, विद्या, शील व तीन पीढ़ी से ब्राह्मणकर्म करने वाला व शान्त स्वभाव का हो। श्राद्ध में केवल अपने मित्रों और गोत्र वालों को खिलाकर ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए।

▪️अंगहीन, रोगी, कोढ़ी, धूर्त, चोर, नास्तिक, ज्योतिषी, मूर्ख, नौकर, काना, लंगड़ा, जुआरी, अंधा, कुश्ती सिखाने वाले व मुर्दा जलाने वाले ब्राह्मण को श्राद्ध-भोजन के लिए नहीं बुलाना चाहिए।

▪️श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मण को आदर से बैठाकर पाद-प्रक्षालन (पैर धोना) चाहिए।

▪️श्राद्धकर्ता हाथ में पवित्री (कुशा से बनाई गई अंगूठी) धारण किए रहे।

▪️ब्राह्मण-भोजन से श्राद्ध की सम्पन्नता-ब्राह्मणों को भोजन कराने से वह पितरों को प्राप्त हो जाता है। मृत व्यक्तियों की तिथियों पर केवल ब्राह्मण-भोजन कराने की परम्परा है। किसी कारणवश ब्राह्मण-भोजन न करा सकें तो मन में संकल्प करके केवल सूखे अन्न, घी, चीनी, नमक आदि वस्तुओं को श्राद्ध-भोजन के निमित्त किसी ब्राह्मण को दे दें। यदि इतना भी न कर सकें तो कम-से-कम दो ग्रास निकालकर गाय को श्राद्ध के निमित्त खिला देना चाहिए।

▪️श्राद्ध में हविष्यान्न के दान से एक मास तक और खीर के दान से एक वर्ष तक पितरों की तृप्ति बनी रहती है।

▪️यदि कुछ भी न बन सके तो केवल घास ले आकर पितरों की तृप्ति के निमित्त से गौओं को अर्पित करे या जल और तिल से पितरों का तर्पण करे।

▪️यदि पत्नी रजस्वला है तो ब्राह्मण को केवल दक्षिणा देकर श्राद्ध-कर्म करे।

▪️तुलसी से पिण्डार्चन करने पर पितरगण प्रलयपर्यन्त तृप्त रहते हैं।

▪️भोजन करते समय ब्राह्मणों से 'भोजन कैसा बना है?' यह नहीं पूछना चाहिए; इससे पितर अप्रसन्न होकर चले जाते हैं।

▪️श्राद्ध में भोजन करने व कराने वाले को मौन रहना चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण उस समय हंसता या बात करता है तो वह हविष्य राक्षस का भाग हो जाता है।

▪️श्राद्ध-कर्म में ताम्रपात्र का बहुत महत्व है। परन्तु लोहे के पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। केवल रसोई में फल, सब्जी काटने के लिए उनका प्रयोग कर सकते हैं।

▪️श्राद्ध में भोजन कराने के लिए चांदी, तांबे और कांसे के बर्तन उत्तम माने जाते है। इन बर्तनों के अभाव में पत्तलों में भोजन कराना चाहिए किन्तु केले के पत्ते पर श्राद्धभोजन नहीं कराना चाहिए।

▪️श्राद्ध की रात्रि में यजमान और ब्राह्मण दोनों को ब्रह्मचारी रहना चाहिए।

पितरों से क्या मांगना चाहिए?

महर्षि वेदव्यास ने 'पितरों से क्या-क्या मांगना चाहिए' का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। श्राद्ध के अंत में पितररूप ब्राह्मणों से यह आशीर्वाद मांगना चाहिए-

दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदा: सन्ततिरव च। 
श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति।। (अग्निपुराण)

अर्थात्-'पितरगण आप ऐसा आशीर्वाद प्रदान करें कि हमारे कुल में दान देने वाले दाताओं की वृद्धि हो, नित्य वेद और पुराण का स्वाध्याय करने वालों की वृद्धि हो, हमारी संतान-परम्परा लगातार बढ़ती रहे, सत्कर्म करने में हमारी श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दान देने के लिए बहुत-सा धन-वैभव हो।
 ❗जय महादेव❗
 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

Tuesday, 9 September 2025

गया श्राद्ध के बाद श्राद्ध करें या नहीं करें

गया -----गया--- गया ,,गया पिण्ड दान पर शास्त्र सम्मत विचार <--------    ********    ---- >>>>>>>>

आजकल प्रचलन में.. ...
एक नया विषय जोरों से चलरहा है ----------------- प्रेत- विद्या या वैज्ञानिक अंग्रेजी कृत शव्द कहैं  प्रेतोलोजी,  बाजार वाद , मीडिया, एजेंटशिप सब शामिल है इसमें ----,
यद्यपि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है  कि प्रेत होते हैं मृत व्यक्ति को निःसंदेह शास्त्र प्रेत ही स्वीकार करते हैं क्यों कि किस के कर्म का क्या फल है  यह अवस्था न्याय संदिग्ध अवस्था रहती है।
 उत्तम षोडशी से, सपिण्डन से पूर्व नामरहित गोत्र रहित संस्कार किया जाना पद्धति कार संकलित करते हैं ,इस कर्म में वेदादि मंत्र व्यवहार से अधिक, लौकिक क्रिया  संकल्प प्रधानता रखी गई है  ,प्रेत यानि आपके मृत परिजन की द्वादश दिवसीय क्रिया हो जाने के वाद वह  अस्थिर पितर बनकर हमारे अन्य श्राद्ध के प्रति आशान्वित रहता है  जीव की मुक्ति के शास्त्र सम्मत दो  नियम बताये हैं------------- सद्यः मुक्ति  और क्रम मुक्ति  ,
सद्यः मुक्ति जीव के स्वप्रयत्न यानि कृत शुभ कर्म से मिल ही जाती है  क्रम मुक्ति में स्वकर्म के अलावा परिजन पुत्र आदि के सहयोग की अपेक्षा रहती है।  
ज्योतिष में व्यक्ति की जन्म कुण्ड ली का सविस्तार अवलोकन करने पर यह स्थिति अवश्य मालूम पड़ जाती है किन्तु  यह विषय इतना सरल नहीं है,  पीड़ित व्यक्ति पीड़ा से मुक्ति चाहता है  वह जिसे भी जानकार  समझता है पूछता है,  कुछ लोग  प्रेत या तुम्हारे पितर परेशान कर रहे हैं ऐसा कहकर सलाह दे देते हैं  
-गया जी में पिण्ड दान करो,
--------------
गया कर आओ--------
 या गयाजी में छोड़ आओ, ------
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बात एक जैसी लगती है ----पर कुछ भेद  है
पैसे की ,साधन की, साथ जाने बालों की  ,सलाह कारों की  अब कोई कमी नहीं रही है सब व्यवस्था हो ही जाती है, कार्य बहुत महत्वपूर्ण है  श्राद्ध -ग्रंथ कहते हैं गया श्राद्ध सामर्थ्य वान पुत्र का प्रथम कर्तव्य है पितर उस के इस कार्य  को अधिकार पूर्वक ग्रहण कर प्रसन्न होते हैं, 
गया श्राद्ध करना ही चाहिये  एक वार नहीं अधिक वार भी यदि मौका मिले..,
गया विहार में है  ,वर्तमान में  शास्त्र नियमों की अवहेलना देखी सुनी जा ही रही है विषय विज्ञ जनों का मुंह बंद करने की कोशिश कानून या संविधान की आड़ लेकर विज्ञ जनों पर कतिपय धर्म वेत्ता हावी हो रहे हैं  वर्तमान में वेदार्थ का सदाशयी शुद्ध रूप छुपाकर मनमाना दुराशयी प्रयोग देखा जा रहा है  ऐसे में  वौद्धिक ग्लानि, मनो मालिन्य, धर्म ग्लानि  ,,सब कुछ स्पष्ट दिखाई दे रहा है  ।
मतलब की बात यह है  कि  कुछ लोग गया जाते हैं पंडों से मिलते हैं पितर कृपा से मुझे भी  दो वार जाने का सौभाग्य मिलाहै  पंडों से परिचय हुआ है आगे कुछ कहने योग्य बात लगती नहीं  है  विषय की बात करते हैं, ----बहां  केवल परंपरागत व्यवस्था अधिक  शास्त्र विहित  व्यवस्था  कम दिखाई देती है  ,ब्राह्मण के स्थान पर कार्यकर्ता प्रशिक्षित  तोता पाठी मिलते हैं " नंगे न रहना भूंखे न रहना  "हिन्दी में एक पाठ्यक्रम क्रम तैयार कराया जाता है वही श्राद्ध कर्ता से कहलवा कर कह देते हैं अब घर जाकर श्राद्ध, तर्पण ,ब्राह्मण भोजन कुछ मत करना  ।
जबकि  ऐसा  संबंधित शास्त्रों  में लिखा  ही  नहीं  है ,
श्राद्ध दो प्रकार से  किया जाता है  ------------पिण्डदान  युक्त श्राद्ध  और पिण्ड दान मुक्त श्राद्ध  ।

वारहमासी और कहीं कहीं  पटा करने के बाद  कोई भी  पिण्ड युक्त श्राद्ध करते  देखा पाया ही  नहीं  जाता  है  ,जब कि  प्रथम पक्ष है करना चाहिये  श्राद्ध अच्छे बुरे सभी अवसरों पर करने का विधान है  कहीं भी किसी भी अवसर पर पितरों की अवहेलना श्राद्ध का त्याग लिखा ही  नहीं  है  ,
गयाश्राद्धं अंतिम श्राद्धम्, गयान्तिंश्राद्धम्,,आदि वचन स्वयं द्वारा पिण्ड दान करने के विषय में है  ,
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गया में पिण्ड दान यानि दान किया जाना चाहिए पितरों को भार समझ कर पिण्ड छुड़ाना नहीं  ।
लोग समझ लेते हैं  चलो  अच्छा  रहेगा  पिण्ड छूट जायेगा , न पानी  देना  न ब्राह्मण भोजन कराना,  न अछूता  निकालना  सारे झंझट खतम  .----,जबकि ऐसा होता  नहीं  है  पिण्डदान एक  दान है  दान पवित्र कर्तव्य  है  जिसे  धर्म ग्रंथ कहते हैं जीवन रहते  बारबार  हजार वार करते रहना  चाहिये  वर्तमान मे दान की  परिभाषा ही  वदल ग ई है  दान सच्ची कमाई का  ह्रदय से, मन से,  मुक्त हस्त से, त्याग  दान है  ठेके पर भोजन तैयार करबाकर,भाढ़े पर  परोसगार भेजकर भंडार दे देना  शुचिता का विचार किये बिना लोक दिखावे के लिये, वीडियो बनाने केलिए अन्न, वस्त्र  ,फल का  त्याग दान  नहीं  बल्कि  हमारे द्वारा धनी बनने की होड़ में नैतिक- अनैतिक रीति से कमाये गये धन के बीच  भय की आशंका से  धन शुद्धि के विचार से  शास्त्र अनुशीलन का वहाना  है  यह दान नहीं कहा  जा  सकता  ।
यही बात पिण्ड दान में लागू होती है  ,
दान है तो एकबार  फंद क्यों  काटा  जाय  बारबार क्यों नहीं
,रही बात गया जी की  तो अच्छी उचित जगह पर की गई सहायता  उत्तम है  कहते हैं  भगवान गदाधर वहां नित्य विराजमान हैं  प्रथ्वी का ऐसा भौगोलिक केन्द्र है जहां बृह्माण्ड नायक का  पत्निरूप से  अति प्रेम पूर्ण समन्वित स्थान है  ,गदाधर ने  वाराह रूप लेकर ,लोभ अहंकार, रुपी हिरण्याक्ष से मुक्त कर वसुधा को वसु यानि हमारे पितरों को धारण करने योग्य बनाया  ,वसु जीवन रहते मनुष्य रूप से जीवन के बाद पितर रूप से  वसुधा से संवंध रखते हैं  ,जो वसु ओं को धारण करती है  वह वसुधा  है जो  धर्म को धारण कर वसुधा को धैर्य, बल, साहस, धारणा शक्ति प्रदान करते हैं वह  वसु हैं  ,यह विश्व ऐसा ही कुटुम्ब है  इसमें बिना किसी भेदभाव , शास्त्र धर्म का अनुपालन ही वसुधैव कुटुम्बकम् का पवित्र भाव है  ।

Monday, 8 September 2025

स्त्रीके श्राद्धमें सौभाग्यवती स्त्रीको,विधवा स्त्रीके श्राद्धमें विधवा स्त्री

श्राद्ध---कई क्षेत्रोंमें देखा/सुना जाता है कि प्रायः लोग सौभाग्यवती स्त्रीके श्राद्धमें सौभाग्यवती स्त्रीको,
विधवा स्त्रीके श्राद्धमें विधवा स्त्री को,
तथा बालकोंके श्राद्धमें बालकोंको निमंत्रित करते हैं
 परंतु यह परंपरा अशास्त्रीय है/ गलत है ऐसा नहीं करना चाहिए।

माता-पिता, सधवा, विधवा,  बालकादिके सभी प्रकारके श्राद्धोंमें वेदज्ञ, श्रेष्ठ, सदाचारी, सत्कुलोत्पन्न, श्रोत्रिय, सन्ध्या गायत्रीसे युक्त, पुरुष ब्राह्मणोंको ही निमंत्रित करनेका शास्त्रोंमें विधान है।*

शास्त्रोंमें कहीं भी स्त्रियोंके लिए श्राद्धमें निमंत्रण करनेका विधान नहीं है इसलिए माता बहनोंका श्राद्धमें जाना, उन्हें निमंत्रित करना दोनों ही अपराध हैं।

हां शास्त्रोंमें इतना जरूर कहा गया है कि सौभाग्यवती स्त्रीके श्राद्धमें अथवा सती ( पतिके साथ जलने वाली स्त्री) के श्राद्धमें ब्राह्मणोंके साथमें ब्राह्मणीका भी (जोड़े से) निमंत्रण करे—

*#भर्तुरग्रे_मृता_नारी_सहदाहेन_वा_मृता।*
*#तस्याः_स्थाने_नियुञ्जीत_विप्रैः_सह_सुवासिनीम्।।*
                                       (मार्कण्डेय)

*#श्राद्धमें_विहित_उत्तम_ब्राह्मण—*

*श्रोत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दातृभिः।*
*अर्हत्तमाय विप्राय तस्मै दत्तं महाफलम्।।*
               (#मनुस्मृति- 3/128)

*#अर्थ—* देवताओंसे संबंधित अन्नको और पितरों से संबंधित अन्नको श्रोत्रिय (वेदपाठी) कुलाचारसे भी योग्यतम ब्राह्मण को ही देना चाहिए, इस प्रकारके श्रेष्ठ ब्राह्मणको दिया गया हव्य तथा कव्य महाफलको देने वाला होता है।

*सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुञ्जते।*
*एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति धर्मः।।*
          (#मनुस्मृति–3/ 131)

*#अर्थ—*  जहां वेदोंको न जानने वाले 1000000 ब्राह्मण भोजन करें ,वहां वेद मन्त्रज्ञ एक ही ब्राह्मण धर्मफल देनेमें उन सबके तुल्य होता है इसलिए उन सबके स्थानमें एक ही वेदज्ञ योग्य होता है।

*#अश्रोत्रिय_ब्राह्मणोंको_श्राद्धादिमें_भोजन_नहीं_कराना_चाहिए—*

*यावतो ग्रसते ग्रासान् हव्यकव्येष्वमंत्रवित्।*
*तावतो ग्रसते  प्रेत्य दीप्तशूलरष्ट्ययोगुडान्।।*

*#अर्थ—* वेदमंत्र न जाने वाला ब्राह्मण देवकार्यमें और पितृकार्यमें जितने ग्रास खाता है , तो उसको खिलाने वा ला मनुष्य उतने ही जलते हुए शूल और लोहे के पिण्डों को मरने कर नरकमें जाकर खाता है।

*#सुयोग्य_श्रोत्रिय_आदि_ब्राह्मणोंके_न_मिलने_पर_श्राद्धके_लिए_मध्यम_ब्राह्मण—*

मातामहादि संबंधियोंको ही श्राद्धमें निमंत्रित करना चाहिए—

#एतान्_मातामहादीन्_दश_मुख्यश्रोत्रियाऽऽद्यसम्भवे_भोजयेत्।
               (#मन्वर्थमुक्तावल्याम्)

*मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम्।*
*दौहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत्।।*
               (#मनुस्मृति- 3/148)

*#अर्थ—*  नाना,  मामा, भांजे,  ससुर, गुरु, दौहित्र (पुत्रीका पुत्र), दामाद, बंधु , ऋत्विक  और अपने यजमानको भी देवकार्य एवं पितृ कार्यमें भोजनीय ब्राह्मणके रूपमें भोजन करावे।

श्राद्धमें भोजनके लिए यदि #भानजा मिले तो दस ब्राह्मणोंसे श्रेष्ठ है ।
#दौहित्र सौ ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है।
#जीजा हजार ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताया गया है। 
और #जमाई सबसे श्रेष्ठ बताया गया है—

*भागिनेयो दशविप्रेण*
        *दौहित्र शतमुच्यते।*
*भगिनीभर्ता सहस्रेषु*
      *अनन्तं दुहितापति:।।*
                (#व्याघ्रपाद_स्मृतिः)

उपर्युक्त संबंधियोंका श्राद्धादिमें भोजन कराना केवल ब्राह्मणोंके लिए ही विहित हैं।
क्षत्रिय आदि तो केवल ब्राह्मणोंका ही निमंत्रण करें, क्योंकि उनके संबंधी तो ब्राह्मण है नहीं इस दृष्टि से।

*#श्राद्धमें_वर्ज्य_ब्राह्मण*

 *#धर्मसिंधुके_आधार_पर—*
क्षय आदि  महारोगोंसे युक्त
विकलांग, काणा, बहरा, गूंगा, दुश्मन, जुआरी
द्रव्य लेकर पढ़ाने वाला
मित्रद्रोही, निंदक,  
कुत्सित नखों वाला 
काले दांतों वाला, हिजड़ा 
माता, पिता, गुरुको त्यागने वाला 
चोर, नास्तिक,
पाप कर्म करने वाला 
स्नान संध्यादि कर्मोंको त्यागने वाला 
नक्षत्रविद्यासे उपजीविका चलाने वाला 
वैद्य, राजाका नौकर, गायक, 
लिखने वाला (पैसा लेकर जो टाइपिंग करते हैं )
ब्याज लेने वाला 
वेद बेचने वाला 
कविता करके उपजीविका करने वाला 
पुजारी, 
कला प्रदर्शन करने वाला 
समुद्र यात्रा करने वाला 
शस्त्र बनाने वाला 
पक्षियोंको पालने वाला 
परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करने वाला)
शिल्प कर्म करनेवाला 
शूद्र से होम करानेवाला 
जटा वाला, दया से रहित 
रजस्वला स्त्रीका पति 
गर्भिणी स्त्री का पति 
कूबड़ा, वोंना, व्यापारी 
जिसकी स्त्री मर गई हो 
शूद्रका गुरु 
शूद्रका शिष्य 
पाखंडी, गायोंको बेचने वाला 
रस बेचने वाला 
वेदकी निंदा करनेवाला 
कृपण, पतित
मेंढा़ और भैंसा पालनेवाला 
वेदको भूलनेवाला
ऐसे ब्राह्मणोंको देवकर्ममें और पितृकर्ममें वर्जित करना चाहिए।

*#विद्याशीलादिगुणत्वे_कुष्ठित्वकाणत्वादिशारीरदोषाणां_न_दूषकत्वम्।*
                           (#धर्मसिंधौ)

*#अर्थ—* विद्या, शीलादि गुणोंसे युक्त ब्राह्मण कुष्ठी और काणादि  होने पर भी त्याज्य नहीं है।

श्राद्ध आदिमें यथोक्त गुण संपन्न ब्राह्मण न मिलने पर उपर्युक्त अवगुणों वाला तो नहीं ही लेना चाहिए ।

यथोचित गुणोंसे रहित तथा वर्ज्य अवगुणों से भी रहित ब्राह्मण  मध्यम श्रेणी के कहे गए हैं।

श्राद्धमें कहीं भी स्त्री आदिको निमंत्रित करनेकी आज्ञा नहीं दी गई है। इससे सुस्पष्ट है कि श्राद्धमें ब्राह्मणी स्त्रियां भी वर्जित हैं।

• यदि सभी भाई इकट्ठे रहते हों तो मिलकर ज्येष्ठ भाईके हाथसे श्राद्धादि करें।
यदि अलग-अलग हों तो अलग-अलग ही श्राद्ध करें—

*भ्रातॄणामविभक्तानां*
               *एक: धर्म प्रवर्तते।*
*विभागे सति धर्मोपि*
       *भवेत्तेषां पृथक् पृथक्।।*
                             (#नारद०)

• कूष्मांड/कुमहडा़/पेठा, भैंसका दूध, बेलपत्र और मगद्विज(पर्वतीय ब्राह्मण विशेष)
इनके होने से पितर निराश होकर चले जाते हैं—

*कुष्मांडं महिषीक्षीरं*
            *बिल्वपत्रमगद्विजा:।*
*श्राद्धकाले समुत्पन्ने*
    *पितरो यान्ति निराश्रया:।।*    
                            (#कृत्यसार)

गुरुदेव 
Bhubneshwar 
पर्णकुटी आश्रम 
9893946810

श्राद्ध

#श्राद्ध_कर्म_क्या_हैं :??
मृत्यु के बाद 10 दिन तक जो दैनिक श्राद्ध होता है उसे “नव श्राद्ध”दशगात्र  (एकादशाह)ग्यारहवे दिन का श्राद्ध”नव मिश्र श्राद्ध” और बाहरवें का श्राद्ध द्वादशाह “सपिण्डी श्राद्ध” कहलाता है ऐसा कहा जाता है इन सब कर्मो के बाद मृतक प्रेत योनि से छूटकर देव योनि में जाता है।मृत्युं के बारह महीने बाद उसी तिथि को जो श्राद्ध किया जाता है उसे पार्वण श्राद्ध कहते है उसी तिथि को हर वर्ष जो क्रिया की जाती है उसे “संवत्सरी”और हर वर्षकन्याचलित सूर्य अर्थात् आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में किया जाने वाला कर्म कनागत या श्राद्ध कहलाता है। कनागत भाद्रपद की पूर्णिमा से लेकर आश्विन की अमावस्या तक अर्थात् 16 दिन तक चलते है।पितृ कर्म के अलावा देव कर्म में भी एक श्राद्ध किया जाता है जिसे नान्दी श्राद्ध कहते है।ये शब्द अक्सर अपने आस-पास होने वाली बड़ी-बड़ी देव प्रतिष्ठाओं और धार्मिक आयोजनों में सुना होगा।श्राद्ध करना इंसान की श्रद्धा का विषय है लेकिन कई लोग इसे एक ढोँग भी मानते है,उनके हिसाब से मौत के बाद कौन देखता है की हमने मृतात्मा के लिए क्या किया? उन विद्वानोँ से मैं कहना चाहूँगा की हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करता है और ये एक आत्मावादी धर्म है।हमें पितृ ऋण से मुक्ति प्राप्त करने के लिए श्राद्ध करना ही होता है,सच कहा जाये तो ये संतति का कर्तव्य है की हम अपने पितरो के नाम से ये कर्म करें,,,,,

अश्रद्धा से किया गया हवन ,तप अथवा कुछ आर्य असत् कहलाता है । हे अर्जुन उसका फल न तो मृत्यु के उपरान्त मिलता है और न इस जन्म में ही ।
” अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ।।(भगवद्गीता १७/२८) इसीलिए जिन्हें हमारे स्मृति-पुराण ग्रन्थों पर श्रद्धा नहीं है , पितरोंके श्राद्ध-पिण्डदान आदि पर श्रद्धा नहीं है ,उनके श्राद्ध-पिण्डदान करने पर भी उनका यह पितरों के निमित्त किया गया कव्य कर्म निष्फल ही है,,,,,
. श्रुति स्मृति आदि किसी भी शास्त्र में मृत्युभोज ऐसे किसी शब्द का उल्लेख भी नहीं है,,, 
केवल श्राद्ध का उल्लेख है जैसा मैंने पहले पैरा में लिखा है,,,,
 अब मुख्य तथ्य यह है कि किसी भी शास्त्र ने वर्तमान में प्रचलित प्रकार के भोज करने कराने का कोई निर्देश बतौर अनिवार्यता भी नहीं किया है,,,,
वरन् विषम संख्या में ब्राह्मणों को ही भोजन का संकेत है वह भी श्रद्धा व अभिरुचि अनुसार ही,,,

 #शास्त्रोंमें विषम संख्या में ब्राह्मणों को भोजन कराने का नियम है ,लेकिन देवकर्म और पितृकर्म में एक भी विद्वान् ब्राह्मण भोजन कराने से जो विशेष फल प्राप्त होता है , वह देव विद्या से विहीन बहुत ब्राह्मणों को खिलाने से भी नहीं होता 
एकैकमपि विद्वांसं दैवे पित्र्यै च भोजयेत् ।

पुष्कलं फलमाप्नोति नामन्त्रज्ञान बहूनपि ।।(मनु ०३/१२९)

#भीष्म पितामह का भी ऐसा ही ही वचन है , ‘ भारत ! वेदज्ञ पुरुष अपना प्रिय हो या अप्रिय इसका विचार न करके उसे श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये । जो दस लाख अपात्र ब्राह्मणको भोजन कराता है ,उसके यहाँ उन सबके बदले एक ही सदा संतुष्ट रहने वाला वेदज्ञ ब्राह्मण भोजन करने का अधिकारी है ,अर्थात् लाखों मूर्खकी अपेक्षा एक सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराना उत्तम है ।।’

प्रियो वा यदि वा द्वेष्यस्तेषां तु श्राद्धमावपेत् ।
य: सहस्रं सहस्राणां भोजयेदनृतान् नर: ।
एकस्तन्मत्रवित् प्रीति: सर्वानर्हति भारत ।।(अनुशासन पर्व ९०/५४)
#इसलिए हजारों-लाखों को अन्त्येष्टि-श्राद्धमें खिलाना आवश्यक नहीं है ,अपितु एक ही वेदज्ञ ब्राह्मण को खिलाने से सर्वसिद्धि हो जाती है,,,

#क्या ब्राह्मण भोज मृतक परिवार पर अतिरिक्त बोझ है ? जो अपने देवताओं और पितरोंको हव्य-कव्य देने में सर्व समर्थ हैं ,उन्हें अवश्य वेदकी आज्ञा का पालन करना चाहिये , 
#श्रुतिका वचन है ,देवपितृकार्य में प्रमाद नहीं करना चाहिये

 देवपितृकार्याभ्यां न प्रमादितव्यम् ।(तै०उ०१/११/१) । 
#मृतकके लिये श्रुतिका वचन है –
अपुपापिहितान्कुम्भान् यास्ते देवा अधारयन् ।
ते ते सन्तु स्वधावन्तो मधुमन्तो घृतश्च्युत: ।। (अथर्ववेद १८/४/२५) 
अर्थ -‘हे पितृदेवो ! (यान्) जो अपूपापिहितान् ) मालपूवोंसे ढके (कुम्भान् ) घट (ते) आपके लिये (देवा:) अग्नि,विश्वदेवा आदि श्राद्ध देवताओने (अधारयन् ) धारण किये हैं , (ते ते ) वे वे सब (मधुमन्त:) मधुसे युक्त और (घृतश्च्युत:) जिनसे घी चू रहा हो ऐसे पदार्थ आपके लिए (स्वधावन्तः) तृप्ति करने वाले (सन्तु) हों ।’
#अब लोग कहते हैं ,जो समर्थ नहीं हैं ,उन पर तो अतिरिक्त बोझ नहीं है ? गरीब कहाँ से करेगा इतना व्यय ? तो इस पर 
#शास्त्रका वचन है , जो श्राद्ध करने में समर्थ नहीं है ,वह फल-मुल-शाकादि से श्राद्ध करे !

#अपि मूलैर्फलर्वापि प्रकुर्याभिर्धनो द्विजः ।
तिलोदकै:स्तर्पयेद् वा पितृन् स्नात्वा समाहिताः ।।( #कूर्मपुराण २२/८६)
#यदि फल-मूल-शाक खिलाने में भी समर्थ नहीं है तो #खुले में जाकर अपने दोनों हाथ #ऊपर करके #पितरों से कहे -‘ हे मेरे पितृगण ! मेरे पास श्राद्धके उपयुक्त न तो धन है ,न धान्य आदि । हाँ ,मेरे पास आपके लिये #श्रद्धा #और #भक्ति है । मैं इन्हीके द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूँ । आप तृप्त हो जाएँ । मैंने (शास्त्रकी आज्ञाके अनुरूप) दोनों भुजाओंको आकाशमें उठा रखा है ।

न मेऽस्ति वित्तं न धनं च नान्यच्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितृन्नतोऽस्मि ।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य ।। (#विष्णुपुराण ३/१४/३०)

#श्राद्ध किसे खिलाएँ ? इस पर मनुजी का वचन है –

यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बह्वृचं वेदपारगम् ।
शाखान्तगमथाध्वर्यु छन्दोगं तु समाप्तिकम् ।। (#मनु०३/१४५)

अर्थात् श्राद्धमें यत्नपूर्वक ऐसे ब्राह्मण को जो बहुत ऋचाओंको जानने वाला वेदपारंगत हो अथवा जिसने वेद की कोई #शाखा पूरी पढ़ी हो , या जिसने #सम्पूर्ण वेद पढ़ा हो भोजन करावे,,,,

 #श्रीमद्वाल्मीकिरामायण और #महाभारत भारतवर्षके दो प्राचीन आर्ष ऐतिहासिक ग्रन्थ हैं । रामायण-महाभारत में भी मृत्योपरान्त १२वे दिन #पिण्डीकरण श्राद्धका स्पष्ट वर्णन मिलता ही है , महाराज दशरथजी का दाह संस्कार करके भरतजीने १२वे दिन ब्राह्मणों को दान और #श्राद्धमें भोजन कराया था –
ततो दशाहेऽतिगते कृतशौचो नृपात्मज: ।
द्वादशेऽहनि सम्प्राप्ते श्राद्धकर्माण्यकारयत् ।।
ब्राह्मणेभ्यो धनं रत्नं ददावन्नं च पुष्कलम् ।(अयोध्याकाण्ड ७७/१-२)
#भगवान् श्रीरामने वनवास में पिताकी मृत्यु का जब ज्ञात हुआ ,तब उन्होंने वन में ही ,इङ्गुदी के गूदे में बेर मिलाकर उसका पिण्ड तैयार किया और बिछे हुए कुशोंपर उसे रखकर अत्यन्त दुःखसे आर्त हो रोते हुए यह बात कही महाराज ! प्रसन्नतापूर्वक यह भोजन स्वीकार कीजिए ; क्योंकि आजकल यही हम लोगोंका आहार है । मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है ,वही उसके देवता भी ग्रहण करते हैं ।।

“ऐङ्गुदं बदरैर्मिश्रं पिण्याकं दर्भसंस्तरे ।
न्यस्य राम: सुदु:खार्तो रुदन् वचनमब्रवीत् ।।

इदं भुङ्क्ष्व महाराज प्रीतो यदशना वयम् ।
इदन्न: पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवता: ।।

श्राद्ध श्रद्धा का विषय है -प्रदर्शन का नही!!

स्त्रियां भी पितरों का पिण्डदान कर सकती हैं?

क्या स्त्रियां भी पितरों का पिण्डदान कर सकती हैं?
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क्या सीताजी के अलावा किसी और स्त्री द्वारा पिण्ड दान की चर्चा आती है  ? 
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मझला बेटा  पिता माता का श्राद्ध कर्म,  पिण्डदान, अन्य  धार्मिक कृत्य अधिकारिक तौर पर कर सकता है  या  नहीं?,  

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क्या पितर पक्ष में  श्राद्ध करना चाहते हैं और तिथि आदि पता  नहीं  तो अमावस या पूनम को छोड़कर अन्य किसी दिनभी श्राद्ध किया जा सकता है?------------
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क्या,  ज्ञात होने पर भी  यदि आज के  भागमभाग बाले  जीवन में  बेटे वहू पैसा कमाने में व्यस्त रहते हैं  समय नहीं मिल पाता पर फिर भी  मनरहता है तो क्या पितर पक्ष में सभी पितरों का सम्मिलित एक यादो तीन दिन के अवकाश में सम्पन्न कर सकते हैं  ?
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पटा क्या है..?

क्या इसे किये बिना  श्राद्ध तर्पण नहीं किया जा सकता है?क्या  मृतव्यक्ति के  पटा न होने तक  पानी नहीं देना चाहिए?
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आड़ा पानी होना क्या है?
क्या घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर तर्पण नहीं करना चाहिये,?
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क्या श्राद्ध भोज की प्रशंशा करना चाहिए या सुनना चाहिये?श्राद्ध में व्रत करना चाहिए या नहीं?
------क्याअपने घर में श्राद्ध होने पर किसी  दूसरे के घरभी भोजन किया जा सकता है  ?
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क्या परस्पर परिवार, मित्र जन, समाज में व्यवहारिक तौर पर वदले की नीयत से एक-दूसरे को भोजन कराना श्राद्ध कहा जा  सकता है?
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क्या श्राद्ध में मांगकर लाई  गयी  सामग्री  उपयोग में लायी जा सकती है?
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क्या श्राद्ध के दिन बिना मूल्य के प्राप्त की गई सामग्री से श्राद्ध की सफलता संभव हो सकती है ?
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क्या श्राद्ध में मौसा, मामा, फूफा  ,दामाद, काभोजनश्राद्धनियम से विहित  है?
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क्या कन्या का भोजन श्राद्ध  में श्राद्ध पूर्ति के उद्देश्य से  उचित है?----

 क्या पितर पक्ष में या अन्य किसी  श्राद्ध में  श्राद्ध पूर्ति के उद्देश्य से  स्त्री जाति  विधवा श्राद्ध  में विधवा,   सौभाग्य वती  श्राद्ध में  सौभाग्य वती  अविवाहित बालक  बालिका  श्राद्ध में बालक बालिका  भोजन से ही श्राद्ध पूर्ति कही  जा सकती है?----'
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पंचबलि( अछूते ) में  कितने  भाग  बनाने  चाहिए?
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क्या अतिथि का  भाग  कन्या को  दिया  जाना  चाहिए?
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क्या पति के अलावा  श्राद्ध आदिक कर्म में स्त्री को  भोजन करने का  अधिकार है?
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ऐसे और भी अनेक प्रश्न हैं  जिनके उत्तर जानने की  जिज्ञासा  होती  है  और होना भी चाहिए  .कुछ विषय ऐसे है  जिनमें केवल लौकिक परंपरा या हठधर्मिता कारण है,  कुछ में अपना प्रभाव और वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं शास्त्र अभ्यास बिना  जान बुझक्कढ़ न्याय  से निर्णय  दे दिया  जाता  है  जिस का  नियम धर्म  शास्त्र  मत से  कहीं तक संबंध ही  नहीं  होता  है  .,हम करना चाहें  कर्म का परिणाम न हो तो परिणाम रहित कर्म का  कोई औचित्य  नहीं  अतः करना न करना  बराबर है  ,,कभी कभी  हम नियम नहीं  मानना चाहते और वह नियम होते ही नहीं  केवल समाज में फैला दी गई भ्रांतियां हैं  और हम बाधामानकर कर्म करने से दूर हो जातेहैं  ऐसे में हम अकारण दोष के भागीदार हो जाते हैं ।कुछ कहते हैं कुछ नहीं  होता  सब ब्राह्मणों के खाने के तरीके हैं ढकोसले हैं  कितनी मूर्ख ता की  बात है  पशु पक्षी अन्य मनुष्य ब्राह्मण इतर लोगों को दे रहा है  आपको खुद पता हीं कि आप कहां से आया खारहे हो  कल कहां का खायेंगे पता नहीं पर ब्राह्मण पर आरोप है वह भूंखा है आधीन है  ?क्या आप जो करते हैं सब का परिणाम मिलता है  क्या जो चाहिए वही  मिलता है  तमाम तर्क है  पूरे जीवन भर केवल तर्क ही....?
अंत में निवेदन कि परीक्षा किसी की करना मेरा  अधिकार  नहीं  किसी को छोटा  बड़ा समझना नहीं  विद्वानों के  मत  सुझाव  समाधान आमंत्रित हैं  कुतर्क करने बाले कृपया  अपना मत न रखें।
जय श्रीमन्नारायण जय बद्रीविशाल

Friday, 5 September 2025

पूर्णिमा श्राद्ध

पितृ पक्ष (पूर्णिमा श्राद्ध) 
❀ पितृ पक्ष जिसे श्राद्ध या कानागत भी कहा जाता है, श्राद्ध पूर्णिमा के साथ शुरू होकर सोलह दिनों के बाद सर्व पितृ अमावस्या के दिन समाप्त होता है। हिंदू अपने पूर्वजों (अर्थात पितरों) को विशेष रूप से भोजन प्रसाद के माध्यम से सम्मान, धन्यवाद व श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

पितृ पक्ष का महाभारत से एक प्रसंग

❀ श्राद्ध का एक प्रसंग महाभारत महाकाव्य से इस प्रकार है, कौरव-पांडवों के बीच युद्ध समाप्ति के बाद, जब सब कुछ समाप्त हो गया, दानवीर कर्ण मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुंचे। उन्हें खाने मे सोना, चांदी और गहने भोजन के जगह परोसे गये। इस पर, उन्होंने स्वर्ग के स्वामी इंद्र से इसका कारण पूछा।

❀ इस पर, इंद्र ने कर्ण को बताया कि पूरे जीवन में उन्होंने सोने, चांदी और हीरों का ही दान किया, परंतु कभी भी अपने पूर्वजों के नाम पर कोई भोजन नहीं दान किया। कर्ण ने इसके उत्तर में कहा कि, उन्हें अपने पूर्वजों के बारे मैं कोई ज्ञान नही था, अतः वह ऐसा करने में असमर्थ रहे।

❀ तब, इंद्र ने कर्ण को पृथ्वी पर वापस जाने के सलाह दी, जहां उन्होंने इन्हीं सोलह दिनों के दौरान भोजन दान किया तथा अपने पूर्वजों का तर्पण किया। और इस प्रकार दानवीर कर्ण पित्र ऋण से मुक्त हुए।

पितृ पक्ष में पूर्वज़ों का श्राद्ध कैसे करें?

❀ जिस पूर्वज, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि अगर याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली उसी तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिये। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जा सकता है, जिसे सर्वपितृ अमावस्या को महालय अमावस्या भी कहा जाता है। समय से पहले यानि कि किसी दुर्घटना अथवा आत्मदाह आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।

❀ श्राद्ध तीन पीढि़यों तक करने का विधान बताया गया है। यमराज हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में सभी जीवों को मुक्त कर देते हैं, जिससे वह अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। तीन पूर्वज में पिता को वसु के समान, रुद्र देवता को दादा के समान तथा आदित्य देवता को परदादा के समान माना जाता है। श्राद्ध के समय यही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं।

श्राद्ध अनुष्ठानों के लिए भारत के पवित्र स्थान

❀ हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भारत में कुछ महत्वपूर्ण जगहें हैं जो निर्वासित आत्माओं की शांति और खुश रहने के लिए श्रद्धा अनुष्ठान करने के लिए प्रसिद्ध हैं।

❀ पितृ पक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में जाना जाता है। महालया अमावस्या पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। जिन व्यक्तियों को अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि की सही तारीख / दिन नहीं पता होता, वे लोग इस दिन उन्हें श्रद्धांजलि और भोजन समर्पित करके याद करते हैं।

भरणी श्राद्ध

❀ भरणी श्राद्ध पितृ पक्ष के दौरान एक बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है और इसे 'महाभरणी श्राद्ध' के नाम से भी जाना जाता है। भरणी श्राद्ध में अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पूजा की जाती है। जो लोग अपने पूरे जीवन में कोई तीर्थ यात्रा नहीं कर पाते हैं। ऐसे लोगों की मृत्यु के बाद भरणी श्राद्ध किया जाता है ताकि उन्हें मातृगया, पितृ गया, पुष्कर तीर्थ और बद्री केदार आदि तीर्थों पर किए गए श्राद्ध का फल मिले।

❀ भरणी श्राद्ध पितृ पक्ष के भरणी नक्षत्र में किया जाता है। किसी की मृत्यु के पहले वर्ष में भरणी श्राद्ध नहीं किया जाता क्योंकि प्रथम वार्षिक वर्ष श्राद्ध करने तक मृत व्यक्ति की आत्मा जीवित रहती है। लेकिन प्रथम वर्ष के बाद भरणी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

भरणी श्राद्ध के दौरान अनुष्ठान:

❀ पवित्र ग्रंथों के अनुसार, भरणी श्राद्ध को गया, काशी, प्रयाग, रामेश्वरम आदि पवित्र स्थानों पर करने का सुझाव दिया गया है।

❀ भरणी श्राद्ध करने का शुभ समय कुतप मुहूर्त और रोहिणा आदि मुहूर्त है, उसके बाद दोपहर का त्योहार समाप्त होने तक। श्राद्ध के अंत में तर्पण किया जाता है।

❀ भरणी श्राद्ध के दिन कौओं को भी भोजन खिलाना चाहिए, क्योंकि उन्हें भगवान यमराज का दूत माना जाता है। कौवे के अलावा कुत्ते और गाय को भी भोजन कराया जाता है।

❀ ऐसा माना जाता है कि भरणी श्राद्ध अनुष्ठान को धार्मिक और पूरी श्रद्धा के साथ करने से मुक्त आत्मा को शांति मिलती है और वे बदले में अपने वंशजों को शांति, सुरक्षा और समृद्धि प्रदान करते हैं।

भरणी श्राद्ध का महत्व:

❀ कहा गया है कि भरणी श्राद्ध के गुण गया श्राद्ध के समान होते हैं इसलिए इसकी बिल्कुल भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यह दिन महालया अमावस्या के बाद पितृ श्राद्ध अनुष्ठान के दौरान सबसे अधिक मनाया जाता है।