ज्योतिष समाधान
Sunday, 11 April 2021
नक्षत्रो के स्वामी ग्रह
Saturday, 10 April 2021
किस भाव से क्या देखे कुंडली परिक्षण
कुंडली के सभी बारह भावों से जीवन के विभिन्न विषयों की जानकारी ली जा सकती है। इसका विस्तार में वर्णन निम्नलिखित हैं-
प्रथम भाव (लग्न भाव)
प्रथम भाव से निम्नलिखित विषयों का विचार किया जाता है-
देह, तनु, शरीर रचना, व्यक्तित्व, चेहरा, स्वास्थ्य, चरित्र, स्वभाव, बुद्धि, आयु, सौभाग्य, सम्मान, प्रतिष्ठा और समृद्धि।
द्वितीय भाव (धन / कुतुम्ब भाव)
संपत्ति, परिवार, वाणी, दायीं आंख, नाखून, जिह्वा, नासिका, दांत, उद्देश्य, भोजन, कल्पना, अवलोकन, आभूषण, कीमती पत्थर, अप्राकृतिक मैथुन, ठगना और जीवनसाथियों के बीच हिंसा।
तृतीय भाव (पराक्रम / सहोदर भाव)
छोटे भाई और बहन, सहोदर भाई बहन, संबंधी, रिश्ते, पड़ोसी, साहस, निश्चितता, हमुरी, सीना, दाएं कान, हाथ, लघु यात्राएं, नाड़ी तंत्र, संचरण, संप्रेषण, लेखन, पुस्तक लेखन, समाचार पत्रों की सूचना, संवाद इत्यादि लिखें, शिक्षा, बुद्धि इत्यादि।
चतुर्थ भाव (सुख / मातृ भाव)
माता, संबंधी, वाहन, घरेलू वातावरण, सौन्दर्य, भूमि, आवास, शिक्षा, जमीन-जायदाद, वंशावली प्रकृति, जीवन का उत्तरार्ध भाग, छिपा हुआ, गुप्त प्रेम संबंध, सीना, वैवाहिक जीवन में ससुराल पक्ष और परिवार के हस्तक्षेप, गहने, कपड़े।
पंचम भाव (संतान / शिक्षा भाव)
संतान, बुद्धि, प्रसिद्धि, श्रेणी, उदर, प्रेम संबंध, आनंद, मनोरंजन, सट्टा, पूर्व जन्म, आत्मा, जीवन स्तर, पद, प्रतिष्ठा, कलात्मकता, हृदय, पीठ, खेल में निपुणता, प्रतियोगिता में सफलता।
षष्ठ भाव (रिपु भाव)
रोग, ऋण, विवाद, अभाव, अंक, मामा, मामी, शत्रु, सेवा, भोजन, कपड़े, चोरी, बदनामी, पालतू पशु, सरकारी कर्मचारी, मनोहर कर्मचारी, कमर
सप्तम भाव (कलत्र भाव)
पति / पत्नी का व्यक्तित्व, जीवनसाथी के साथ संबंध, इच्छाएं, काम शक्ति, साझेदारी, प्रत्यक्ष श्रतु, मुआवजा, यात्रा, कानून, जीवन के लिएone, विदेशों में प्रभाव और प्रतिष्ठा, जनता के साथ संबंध, यौन रोग, मूत्र रोग।
अष्टम भाव (आयु / मृत्यु भाव)
आयु, मृत्यु का प्रकार अर्थात मृत्यु कैसे होगी, जननांग, बाधाएं, दुर्घटना, आकस्मिक की संपत्ति, विरासत, बपति, पैतृक संपत्ति, वसीयत, पेंशन, परिधान, चोरी, डकैती, चिंता, रूकावट, युद्ध, शत्रु, विरासत में मिला धन, मानसिक वेदना, वैवाहिक जीवन।
नवम भाव (भाग्य / धर्म भाव)
सौभाग्य, धर्म, चरित्र, दादा-दादी, लंबी यात्राएं, पोता, बुजुर्गों और देवताओं के प्रति श्रद्धा व भक्ति, आध्यात्मिक उन्नति, स्वप्न, उच्च शिक्षा, पत्नी का छोटा भाई, भाई की पत्नी, तीर्थयात्रा, दर्शन, संपर्क से संपर्क करें।
दशम भाव (कर्म भाव)
व्यवसाय, कीर्ति, शक्ति, अधिकार, नेतृत्व, अधिकार, सम्मान, सफलता, रूतबा, स्नेह, चरित्र, कर्म, उद्देश्य, पिता, मालिक, नियोजक, अधिकारी, अधिकारियों से संबंध, व्यापार में सफलता, नौकरी में तरक्की, सरकार से सम्मान।
एकादश भाव (लाभ भाव)
लाभ, समृद्धि, कामनाओं की पूर्ति, मित्र, बड़ा भाई, तखने, बायां कान, परामर्शदाता, प्रिय, रोग मुक्ति, प्रत्याशा, पुत्रवधू, इच्छाएं, कार्यों में सफलता।
द्वादश भाव (व्यय भाव)
हानि, दण्ड, कारावास, व्यय, दान, विवाह, जलाश्रयों से संबंधित कार्य, वैदिक यज्ञ, अदा किया गया, विवाहेत्तर काम क्रीड़ा, काम क्रीड़ा और यौन संबंधों सेtyन्न रोग, काम क्रीड़ा, कमजोरी, शयन सुविधा, ऐय्याशी, भोग विलास , पत्नी की हानि, शादी में नुकसान, नौकरी छूटना, अपने लोगों से सिपाही, संबंध विद्या, लंबी यात्रा, विदेश में सुरक्षा।
Gurudev bhubneshwar
Parnkuti guna
9893946810
Thursday, 8 April 2021
गर्भधारण विकार में शिवलिंगी का सेवन लाभदायक
गर्भधारण विकार में शिवलिंगी का सेवन लाभदायक (Shivlingi Seed Powder Helps in Pregnancy Disorder in Hindi)
प्रजनन का सीधा संबंध अंडाणुओं और शुक्राणुओं की संख्या और स्वास्थ्य से है। शिवलिंगी के बीज (Shivlingi Beej) ओवेरियन रिजर्व (Ovarian Reserve) जैसी समस्याओं को दूर करते हैं और मासिक धर्म को नियमित करते हैं। इसके बीज चूर्ण का प्रयोग (Shivlingi Beej Uses in Hindi) गर्भधारण हेतु किया जाता है।
कई महात्मा लोग स्त्री या पुरुष को संतान की प्राप्ति के लिए मासिक धर्म के 4 दिन बाद से 1 माह तक सुबह-शाम शिवलिंगी के बीज एक ग्राम की मात्रा में खाली पेट दूध के साथ सेवन कराते हैं।
जिनको पुत्र प्राप्ति (Shivlingi Beej For Male Child In Hindi) की कामना है, उन्हें बछिया वाली गाय के दूध के साथ सेवन करना अच्छा होता है। जिन्हें स्त्री संतान यानी लड़की प्राप्ति की कामना है उन्हें बछड़ी वाली गाय के दूध के साथ इसका सेवन करना होता है।
जिन महिलाओं को गर्भ न ठहरता हो अर्थात बार-बार गर्भ गिर जाता हो, वे मासिक धर्म के बाद शिवलिंगी के एक बीज से शुरुआत करके प्रत्येक दिन एक बीज बढ़ाते हुए 21 दिन तक सेवन करें। इससे गर्भ ठहर जाता है एवं गर्भ नहीं गिरता।
शिवलिंगी बीज आधा ग्राम तथा पुत्रजीवक बीज एक ग्राम (Shivlingi Beej And Putrajeevak Benefits In Hindi) दोनों को मिला लें। इसे पीसकर बराबर भाग में मिश्री मिलाकर सुबह और शाम सेवन करने से बांझपन की समस्या में लाभ होता है तथा स्त्री गर्भ-धारण के योग्य बन जाती है। (अनेक बार चिकित्सकीय परीक्षण सही होने पर भी गर्भ धारण नहीं हो पाता; उनके लिए यह एक सैंकड़ों बार परीक्षण किया गया प्रयोग है)।
Gurudev
Bhubneshwar
Parnkuti guna
9893946810
Monday, 5 April 2021
प्रमादी नाम सम्बत्सर क्षय क्योकी प्रमादी नाम के वाद आनन्द सम्बत्सर होना चाहिये ३
| क्रमांक | नाम | वर्तमान चक्र | पूर्व चक्र 1 |
|---|---|---|---|
| 1 | प्रभव | 1974-1975ई. | 1914-1915 |
| 2 | विभव | 1975-1976ई. | 1915-1916 ई. |
| 3 | शुक्ल | 1976-1977 ई. | 1916-1917 ई. |
| 4 | प्रमोद | 1977-1978 ई. | 1917-1918 ई. |
| 5 | प्रजापति | 1978-1979 ई. | 1918-1919 ई. |
| 6 | अंगिरा | 1979-1980 ई. | 1919-1920 ई. |
| 7 | श्रीमुख | 1980-1981 ई. | 1920-1921 ई. |
| 8 | भाव | 1981-1982 ई. | 1921-1922 ई. |
| 9 | युवा | 1982-1983 ई. | 1922-1923 ई. |
| 10 | धाता | 1983-1984 ई. | 1923-1924 ई. |
| 11 | ईश्वर | 1984-1985ई. | 1924-1925 ई. |
| 12 | बहुधान्य | 1985-1986 ई. | 1925-1926 ई. |
| 13 | प्रमाथी | 1986-1987 ई. | 1926-1927 ई. |
| 14 | विक्रम | 1987-1988ई. | 1927-1928 ई. |
| 15 | वृषप्रजा | 1988-1989 ई. | 1928-1929 ई. |
| 16 | चित्रभानु | 1989-1990 ई. | 1929-1930 ई. |
| 17 | सुभानु | 1990-1991 ई. | 1930-1931 ई. |
| 18 | तारण | 1991-1992 ई. | 1931-1932 ई. |
| 19 | पार्थिव | 1992-1993 ई. | 1932-1933 ई. |
| 20 | अव्यय | 1993-1994 ई. | 1933-1934 ई. |
| 21 | सर्वजीत | 1994-1995 ई. | 1934-1935 ई. |
| 22 | सर्वधारी | 1995-1996 ई. | 1935-1936 ई. |
| 23 | विरोधी | 1996-1997 ई. | 1936-1937 ई. |
| 24 | विकृति | 1997-1998 ई. | 1937-1938 ई. |
| 25 | खर | 1998-1999 ई. | 1938-1939 ई. |
| 26 | नंदन | 1999-2000 ई. | 1939-1940 ई. |
| 27 | विजय | 2000-2001 ई. | 1940-1941 ई. |
| 28 | जय | 2001-2002 ई. | 1941-1942 ई. |
| 29 | मन्मथ | 2002-2003 ई. | 1942-1943 ई. |
| 30 | दुर्मुख | 2003-2004 ई. | 1943-1944 ई. |
| 31 | हेमलंबी | 2004-2005 ई. | 1944-1945 ई. |
| 32 | विलंबी | 2005-2006 ई. | 1945-1946 ई. |
| 33 | विकारी | 2006-2007 ई. | 1946-1947 ई. |
| 34 | शार्वरी | 2007-2008 ई. | 1947-1948 ई. |
| 35 | प्लव | 2008-2009 ई. | 1948-1949 ई. |
| 36 | शुभकृत | 2009-2010 ई. | 1949-1950 ई. |
| 37 | शोभकृत | 2010-2011 ई. | 1950-1951 ई. |
| 38 | क्रोधी | 2011-2012 ई. | 1951-1952 ई. |
| 39 | विश्वावसु | 2012-2013 ई. | 1952-1953 ई. |
| 40 | पराभव | 2013-2014 ई. | 1953-1954 ई. |
| 41 | प्ल्वंग | 2014-2015ई. | 1954-1955 ई. |
| 42 | कीलक | 2015-2016 ई. | 1955-1956 ई. |
| 43 | सौम्य | 2016-2017 ई. | 1956-1957 ई. |
| 44 | साधारण | 2017-2018 ई. | 1957-1958 ई. |
| 45 | विरोधकृत | 2018-2019 ई. | 1958-1959 ई. |
| 46 | परिधावी | 2019-2020 ई. | 1959-1960 ई. |
| 47 | प्रमादी | 2020-2021 ई. | 1960-1961 ई. |
| 48 | आनंद | 2021-2022 ई. | 1961-1962 ई. |
| 49 | राक्षस | 2022-2023 ई. | 1962-1963 ई. |
| 50 | आनल | 2023-2024 ई. | 1963-1964 ई. |
| 51 | पिंगल | 2024-2025 ई. | 1964-1965 ई. |
| 52 | कालयुक्त | 2025-2026 ई. | 1965-1966 ई. |
| 53 | सिद्धार्थी | 2026-2027 ई. | 1966-1967 ई. |
| 54 | रौद्र | 2027-2028 ई. | 1967-1968 ई. |
| 55 | दुर्मति | 2028-2029 ई. | 1968-1969 ई. |
| 56 | दुन्दुभी | 2029-2030 ई. | 1969-1970 ई. |
| 57 | रूधिरोद्गारी | 2030-2031 ई. | 1970-1971 ई. |
| 58 | रक्ताक्षी | 2031-2032 ई. | 1971-1972 ई. |
| 59 | क्रोधन | 2032-2033 ई. | 1972-1973 ई. |
| 60 | क्षय | 2033-2034 ई. | 1973-1974 ई |
Friday, 26 March 2021
कार्य सिध्द होगा या नही 9893946810
प्रश्न कर्ता के मुख से निकाले शब्द
मे 6 से गुणा उसमे 8 जोडना
उसमे नो का भाग
1 मे नही होगा
2 मे होगा
3 मे मरण समान
4 मे आनन्द से होगा
5:6 मे होगा
7:8:9: मे नही होगा
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रोग प्रश्न
तिथी संख्याऔर
तिथी की घड़ी
को दुगनी करके उसमे चार जोडना तीन से भाग देना
1 बचे तो तुरंत ठीक
0 बचे तो तुरंत मरण
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जन्म नक्षत्र से,
जिस नक्षत्र में कार्य का आरंभ होना हो,
वह नक्षत्र ले।
जन्म नक्षत्र से अमुक नक्षत्र को गिन ले।
जो संख्या आए,
उसमें 9 से भाग दें।
शेष के अनुसार फलकथन निम्न होगा।
यदि-
1 शेष आए तो शारीरिक कष्ट।
2 शेष आए तो उन्नति।
3 शेष आए तो नुकसान
4 शेष आए तो विशेष उन्नति।
5 शेष आए तो बाधा।
6 शेष आए तो कार्य सिद्धि।
7 शेष आए तो अत्यंत अशुभ।
8 शेष आए तो मिलन तथा
9 शेष आए तो अत्यंत शुभ होता है।
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प्रेत बाधा केसे दूर करे 9893946810
प्रेत बाधा निवारक मंत्र- ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच शाकिनी डाकिनी यक्षणी पूतना मारी महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम् क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर हुं फट् स्वाहा। इस हनुमान मंत्र का पांच बार जाप करने से कभी भूत निकट नहीं आ सकते।
आप ऊपरी बाधा हटाने के उपाय के अंतर्गत ये उपाय करना न भूलें| काली सरसों, काले बकरे का दायाँ सींग, सर्प की केंचुली, गुग्गुल, नीम के पत्ते, अपामार्ग के पत्ते और बच को लेकर अच्छे से कूट पीस लें| इस चूर्ण को जलते कंडे पर डालकर धूनी करें और पीड़ित व्यक्ति को धूनी दें| ऐसा करने से प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है|
| आप 5 ग्राम कपूर, 5 ग्राम काली मिर्च और 5 ग्राम हींग ले लें| इसको पीसकर इसका पाउडर बनायें और फिर इसकी छोटी छोटी गोलियां बना लें| इन गोलियों को 2 बराबर भागों में बाँट दें और फिर एक हिस्से को सुबह और दूसरे को शाम को घर में जलाएं|
शनिवार के दिन इस प्रयोग को करें| इस दिन काले धतूरे की जड़ लेकर आयें और पीड़ित की भुजा पर बांध दें| ऐसा करने से भूत, प्रेत और पिशाच उसका पीछा करना छोड़ देंगे| यदि पीड़ित स्त्री है तो जड़ को उसकी बायीं भुजा में बांधना चाहिए, यदि वह पुरुष है तो उसे उसकी दाहिनी भुजा में बांधना चाहिए
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।
तू है वीर बड़ा हनुमान |
लाल लंगोटी मुख में पान |
ऐर भगावै |
बैर भगावै |
अमुक में शक्ति जगावै |
रहे इसकी काया दुर्बल |
तो माता अंजनी की आन |
दुहाई गौरा पार्वती की |
दुहाई राम की |
दुहाई सीता की |
ले इसके पिण्ड की खबर |
ना रहे इसमें कोई कसर |
यदि कोई अकारण ही दुर्बल होता जा रहा हो और कारण समझ में नहीं आये तो इस मंत्र का 7 बार जाप करते हुए प्रत्येक मंत्र के बाद रोगी पर फूँक लगाए और यही रोगी स्वयं करता है तो रोगी खुद को फूक लगाए इसके साथ ही रोगी को हनुमान जी के मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा से उनके चरणों का सिन्दूर लाकर तिलक भी करें | रोगी किसी भी रोग से पीड़ित हो उसे स्वास्थ्य लाभ अवश्य मिलेगा ||
चोरि की दिशा का ज्ञान केसे करे
1. मेष लग्न मेष वस्तु चोरी हुई हो प्रश्नकाल में मेष लग्न हो तो चोरी गई वस्तु पूर्व दिशा में होती है। चोर ब्राह्मण वर्ग का व्यक्ति होता है और उसका नाम स अक्षर से प्रारंभ होता है। नाम में दो या तीन अक्षर होते हैं।
होता है
1. मेष लग्न मेष वस्तु चोरी हुई हो प्रश्नकाल में मेष लग्न हो तो चोरी गई वस्तु पूर्व दिशा में होती है। चोर ब्राह्मण वर्ग का व्यक्ति होता है और उसका नाम स अक्षर से प्रारंभ होता है। नाम में दो या तीन अक्षर होते हैं।
2. वृषभ लग्न में वस्तु चोरी हुई हो तो वस्तु पूर्व दिशा में होती है और चोर क्षत्रिय वर्ण का होता है। उसके नाम में आदि अक्षर म रहता है तथा नाम चार अक्षरों वाला होता है।
3. मिथुन लग्न में चोरी गई वस्तु आग्नेय कोण में होती है। चोरी करने वाला व्यक्ति वैश्य वर्ण का होता है और उसका नाम क ककार से प्रारंभ होता है। नाम में तीन अक्षर होते हैं।
4. कर्क लग्न में वस्तु चोरी होने पर दक्षिण दिशा में मिलती है और चोरी करने वाला शूद्र होता है। उसका नाम त अक्षर से प्रारंभ होता है और नाम में तीन वर्ण होते हैं।
वस्तु नैऋत्य कोण में होती है
5. सिंह लग्न में चोरी हो तो वस्तु नैऋत्य कोण में होती है। चोरी करने वाला नौकर, सेवक होता है। चोर का नाम न से प्रारंभ होता है और नाम तीन या चार अक्षरों का होता है।
6. प्रश्नकाल या चोरी के समय कन्या लग्न हो तो चोरी गई वस्तु पश्चिम दिशा में होती है। चोरी करने वाली कोई स्त्री होती है और उसका नाम म से प्रारंभ होता है। नाम में कई वर्ण हो सकते हैं।
7. चोरी के समय तुला लग्न हो तो वस्तु पश्चिम दिशा में जानना चाहिए। चोरी करने वाला पुत्र, मित्र, भाई या अन्य कोई संबंधी होता है। इसका नाम म से प्रारंभ होता है और नाम में तीन वर्ण होते हैं। तुला लग्न में गई वस्तु बड़ी कठिनाई से प्राप्त होती है।
वस्तु नैऋत्य कोण में होती है
8. वृश्चिक लग्न में चोरी गई वस्तु पश्चिम दिशा में होती है। चोर घर का नौकर ही होता है और उसका नाम स अक्षर से प्रारंभ होता है। नाम चार अक्षरों वाला होता है। चोरी करने वाला उत्तम वर्ण का होता है।
9. प्रश्नकाल या चोरी के समय धनु लग्न हो तो चोरी गई वस्तु वायव्य कोण में होती है। चोरी करने वाली कोई स्त्री होती है और उसका नाम स अक्षर से प्रारंभ होता है। नाम में चार वर्ण पाए जाते हैं।
10. चोरी के समय मकर लग्न हो तो चोरी गई वस्तु उत्तर दिशा में समझनी चाहिए। चोरी करने वाला वैश्य जाति का होता है। नाम चार अक्षरों का होता है और वह स से प्रारंभ होता है।
11. प्रश्नकाल या चोरी के समय कुंभ लग्न हो तो चोरी गई वस्तु उत्तर या उत्तर-पश्चिम दिशा में होती है। इस प्रश्न लग्न के अनुसार चोरी करने वाला व्यक्ति कोई मनुष्य नहीं होता बल्कि चूहों या अन्य जानवरों के द्वारा इधर-उधर कर दी जाती है।
12. मीन लग्न में वस्तु चोरी हुई हो तो वस्तु ईशान कोण में होती है। चोरी करने वाला निम्न जाति का व्यक्ति होता है। वह व्यक्ति चोरी करके वस्तु को जमीन में छुपा देता है। ऐसे चोर का नाम व अक्षर से प्रारंभ होता है और उसके नाम में तीन अक्षर रहते हैं। चोर कोई परिचित महिला या नौकरानी भी हो सकती है।