ज्योतिष समाधान

Monday, 3 July 2017

मनपंसद संतान-प्राप्ति के योग— स्त्री के ऋतु दर्शन के सोलह रात तक ऋतुकाल रहता है,उस समय में ही गर्भ धारण हो सकता है,उसके अन्दर पहली चार रातें निषिद्ध मानी जाती है,कारण दूषित रक्त होने के कारण कितने ही रोग संतान और माता पिता में अपने आप पनप जाते है,इसलिये शास्त्रों और विद्वानो ने इन चार दिनो को त्यागने के लिये ही जोर दिया है।

मनपंसद संतान-प्राप्ति के योग—
स्त्री के ऋतु दर्शन के सोलह रात तक ऋतुकाल रहता है,उस समय में ही गर्भ धारण हो सकता है,उसके अन्दर पहली चार रातें निषिद्ध मानी जाती है,कारण दूषित रक्त होने के कारण कितने ही रोग संतान और माता पिता में अपने आप पनप जाते है,इसलिये शास्त्रों और विद्वानो ने इन चार दिनो को त्यागने के लिये ही जोर दिया है।

चौथी रात को ऋतुदान से कम आयु वाला पुत्र पैदा होता है,

पंचम रात्रि से कम आयु वाली ह्रदय रोगी पुत्री होती है,

छठी रात को वंश वृद्धि करने वाला पुत्र पैदा होता है,

सातवीं रात को संतान न पैदा करने वाली पुत्री,

आठवीं रात को पिता को मारने वाला पुत्र,

नवीं रात को कुल में नाम करने वाली पुत्री,

दसवीं रात को कुलदीपक पुत्र,

ग्यारहवीं रात को अनुपम सौन्दर्य युक्त पुत्री,

बारहवीं रात को अभूतपूर्व गुणों से युक्त पुत्र,

तेरहवीं रात को चिन्ता देने वाली पुत्री,

चौदहवीं रात को सदगुणी पुत्र,

पन्द्रहवीं रात को लक्ष्मी समान पुत्री,

और सोलहवीं रात को सर्वज्ञ पुत्र पैदा होता है।

इसके बाद की रातों को संयोग करने से पुत्र संतान की गुंजायश नही होती है।

इसके बाद स्त्री का रज अधिक गर्म होजाता है,और पुरुष के वीर्य को जला डालता है,

परिणामस्वरूप या तो गर्भपात हो जाता है,अथवा संतान पैदा होते ही खत्म हो जाती है।

शक्तिशाली व गोरे पुत्र प्राप्ति के लिए—

गर्भिणी स्त्री ढाक (पलाश) का एककोमल पत्ता घोंटकर गौदुग्ध के साथ रोज़ सेवन करे |

इससे बालक शक्तिशाली और गोरा होता है | माता-पीता भले काले हों, फिर भी बालक गोरा होगा |

इसके साथ सुवर्णप्राश की २-२ गोलियां लेने से संतान तेजस्वी होगी |

प्रश्‍न : पुत्र प्राप्ति हेतु किस समय संभोग करें ?

उत्तर : इस विषय में आयुर्वेद में लिखा है कि गर्भाधान ऋतुकाल की आठवीं, दसवी और बारहवीं रात्रि को ही किया जाना चाहिए।

जिस दिन मासिक ऋतुस्राव शुरू हो उस दिन व रात को प्रथम मानकर गिनती करना चाहिए।

छठी, आठवीं आदि सम रात्रियाँ पुत्र उत्पत्ति के लिए और सातवीं, नौवीं आदि विषम रात्रियाँ पुत्री की उत्पत्ति के लिए होती हैं।

इस संबंध में ध्यान रखें कि इन रात्रियों के समय शुक्ल पक्ष यानी चांदनी रात वाला पखवाड़ा भी हो, यह अनिवार्य है, यानी कृष्ण पक्ष की रातें हों।

प्रश्न : सहवास से विवृत्त होते ही पत्नी को तुरंत उठ जाना चाहिए या नहीं?इस विषय में आवश्यक जानकारी दें ?

उत्तर : सहवास से निवृत्त होते ही पत्नी को दाहिनी करवट से 10-15 मिनट लेटे रहना चाहिए, एमदम से नहीं उठना चाहिए।

पर्याप्त विश्राम कर शरीर की उष्णता सामान्य होने के बाद कुनकुने गर्म पानी से अंगों को शुद्ध कर लें या चाहें तो स्नान भी कर सकते हैं, इसके बाद पति-पत्नी को कुनकुना मीठा दूध पीना चाहिए।

प्रश्न : मेधावी पुत्र प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए ?

उत्तर : इसका उत्तर देना मुश्किल है,

प्रश्न : संतान में सदृश्यता होने का क्या कारण होता है ?

उत्तर : संतान की रूप रेखा परिवार के किसी सदस्य से मिलती-जुलती होती है, पुत्र प्राप्ति हेतु गर्भाधान का तरीका—- हमारे पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है।

धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है। यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।

* चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है। *

पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।

* छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा। *

सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी। *

आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।

* नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।

* दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।

* ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।

* बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।

* तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।

* चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।

* पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।

* सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।

व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ।

महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘संस्कार विधि’ में स्पष्ट रूप से कर दी है।

प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि पूर्णरूप से की है।

* दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है। * 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।

* प्राचीन संस्कृत पुस्तक ‘सर्वोदय’ में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।

* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।

* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।

* कुछ विशिष्ट पंडितों तथा ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य के उत्तरायण रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्र तथा दक्षिणायन रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्री जन्म लेती है। उनका यह भी कहना है कि मंगलवार, गुरुवार तथा रविवार पुरुष दिन हैं। अतः उस दिन के गर्भाधान से पुत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार कन्या दिन हैं, जो पुत्री पैदा करने में सहायक होते हैं। बुध और शनिवार नपुंसक दिन हैं। अतः समझदार व्यक्ति को इन दिनों का ध्यान करके ही गर्भाधान करना चाहिए।

* विश्वविख्यात वैज्ञानिक प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. लेण्डरम बी. शैटल्स ने हजारों अमेरिकन दंपतियों पर प्रयोग कर प्रमाणित कर दिया है कि स्त्री में अंडा निकलने के समय से जितना करीब स्त्री को गर्भधारण कराया जाए, उतनी अधिक पुत्र होने की संभावना बनती है।

उनका कहना है कि गर्भधारण के समय यदि स्त्री का योनि मार्ग क्षारीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्र तथा अम्लीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्री होने की संभावना बनती है।

पुत्र प्राप्ति का साधन है शीतला षष्ठी व्रत—–

माघ शुक्ल षष्ठी को संतानप्राप्ति की कामना से शीतला षष्ठी का व्रत रखा जाता है। कहीं-कहीं इसे ‘बासियौरा’ नाम से भी जाना जाता हैं। इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर मां शीतला देवी का षोडशोपचार-पूर्वक पूजन करना चाहिये। इस दिन बासी भोजन का भोग लगाकर बासी भोजन ग्रहण किया जाता है।

भविष्य विचार करते समय मुख्यतः निम्न चार बातों का ध्यान रखना चाहिये- प्रश्नकर्त्ता का स्थान श्वाँस पूरक है अथवा रोचक प्रश्नकर्त्ता के नाम या प्रश्न के शब्द तत्व :— अब इसमें से प्रत्येक बातों पर पृथक विचार किया जाती है। 1. जब कि प्रश्न विचारने वाले का इड़ा स्वर चलित हो और प्रश्न कर्त्ता ऊपर, सामने या बाईं ओर से प्रश्न करे अथवा प्रश्न विचारक के सूर्य स्वर में प्रश्न कर्त्ता नीचे, पीछे अथवा दाहिनी ओर से प्रश्न करे तो कार्य की सफलता है, इसके विपरीत हो तो असफलता समझना चाहिये।

भविष्य विचार करते समय मुख्यतः निम्न चार बातों का ध्यान रखना चाहिये-

प्रश्नकर्त्ता का स्थान श्वाँस पूरक है अथवा रोचक

प्रश्नकर्त्ता के नाम या प्रश्न के शब्द तत्व :—

अब इसमें से प्रत्येक बातों पर पृथक विचार किया जाती है।

1. जब कि प्रश्न विचारने वाले का इड़ा स्वर चलित हो और प्रश्न कर्त्ता ऊपर, सामने या बाईं ओर से प्रश्न करे अथवा प्रश्न विचारक के सूर्य स्वर में प्रश्न कर्त्ता नीचे, पीछे अथवा दाहिनी ओर से प्रश्न करे तो कार्य की सफलता है, इसके विपरीत हो तो असफलता समझना चाहिये।

2. विचारक के पूरक में प्रश्न करना शुभ है तथा रेचक में अशुभ—अर्थात् जिस समय प्रश्न कर्त्ता प्रश्न करें और विचारक श्वास भीतर खींचता हो तो शुभ और बाहर छोड़ता हो तो अशुभ।

3. शब्द गणना इस विषय पर मतभेद है। किसी का मत है कि प्रश्न कर्त्ता के नाम के शब्द गिने जावें और किसी का विचार है कि प्रश्न के शब्द गिने जावें, यदि चन्द्र स्वर चलता हो शब्दों की गणना सम हो अथवा सूर्य चलता हो और शब्दों की गणना विषम हो तो कार्य में सफलता होगी, इसके विपरीत हो तो अशुभ समझियेगा।

4. यह लिखा जा चुका है कि तत्व इस प्रयोग में कठिन विषय है जिसे तत्व पहचान का पूर्ण अभ्यास न हो उसके लिये एक दूसरा सरल प्रयोग लिखा जाता है जो इस प्रकार है—
प्रश्न विचारक श्वास लेकर कुम्भक (रुकी हुई श्वाँस) से एक पुष्य ऊपर फेंके, यदि पुष्प चलित स्वर की ओर गिरे तो प्रश्न की सफलता समझो और यदि अचलित स्वर की ओर गिरे तो असफलता समझना चाहिये। यदि योगी स्वतः अपने विषय में प्रश्न करना चाहे तो उसे स्वतः न विचारकर दूसरे से प्रयोग कराना चाहिये और उसे उपरोक्त बातों का ध्यान रखने समझा देना चाहिये—साथ ही इस बात पर विशेष ध्यान रखा जावे कि प्रश्न करने के बाद ही तत्व के विषय में विचार करने के लिये पुष्प दे देना चाहिये- जहाँ तक हो प्रश्न कर्त्ता को चाहिये कि प्रश्न विचारक के पास कोई पुष्प अथवा रक्त वर्ण कागज लाना चाहिये जिससे उसके आते ही स्वर योगी यह समझले कि आगन्तुक प्रश्न कर्त्ता है और स्वर आदि के विषय में सतर्क हो जावें, प्रश्न कर्त्ता के प्रश्न को ठीक उन्हीं शब्दों में लिख देना चाहिये ताकि शब्द गणना में भूल न हो।

यदि कोई पुत्र तथा कन्या जन्म विषय का प्रश्न पूछे

और उस समय सूर्य स्वर चलता हो तो पुत्र

तथा चन्द्र स्वर चलता हो तो कन्या

सुषुम्ना हो तो नपुँसक या अंग हानि संतान होना समझो।

जल तत्व हो तो पुत्र,
पृथ्वी या वायु तत्व हो तो कन्या,
तेज तत्व हो तो गर्भ हानि समझो—
आकाश तत्व हो तो बालक नपुँसक या अंग हीन होगा—

उपरोक्त चार प्रकार के प्रश्न विचार किया जाता है इन चार बातों में से अधिक बातें शुभ हैं या अशुभ उसी प्रकार प्रश्न फल कहना चाहिये—

कभी कभी यह भी हो सकता है कि चार बातों में से दो बातों से शुभ तथा दो से अशुभ फल प्रतीत हो सकता है ऐसी दशा में निम्न बात का भी विचार करना चाहिये—

प्रश्न कर्त्ता प्रश्न पूछने के समय यदि पूर्व तथा उत्तराभिमुख होवे और चन्द्र स्वर चलता हो अथवा दक्षिण या पश्चिम की ओर उसका मुख हो और सूर्य स्वर चलता हो तो शुभ समझो

अन्यथा अशुभ—रोग विषयक प्रश्न—यदि चलित स्वर की ओर से प्रश्न किया जावे तो रोग कैसा ही असाध्य हो लाभ होगा—चलित स्वर की ओर से कर्कश स्वर में प्रश्न किया जावे तो लाभ अवश्य होगा किन्तु कष्ट के साथ।

प्रश्न कर्त्ता की दृष्टि प्रश्न करते समय यदि किसी जीवित प्राणी पर हो तो रोगी को अवश्य लाभ होगा प्रश्न करते समय यदि प्रश्न विचारक की श्वाँस पूरक हो तो शुभ और रेचक हो तो अशुभ समझो यदि प्रश्न अचलित स्वर की ओर से किया जावे और प्रश्न शब्दों की संख्या विषम हो अथवा सुषुम्ना नाड़ी में प्रश्न हो तो रोग घातक है।

प्रश्न कर्त्ता यदि पहले अचलित स्वर से प्रश्न करे और फिर चलित स्वर की ओर आ बैठे तो रोगी को कष्ट होकर लाभ होगा—

प्रश्न कर्त्ता नीचे खड़ा होकर यदि नम्र वचन से प्रश्न करे तो रोगी को लाभदायक ऊपर की और से भयानक शब्दों का उच्चारण करे तो रोगी को घातक है

प्रश्न विचारक का प्राण वायु चन्द्र स्थान में हो और

प्रश्न कर्त्ता का प्राण वायु सूर्य स्थान में हो तो सैंकड़ों वैद्यों का उपचार भी रोगी के लिये निरर्थक है

काल ज्ञानः—

जिसकी श्वाँस वायु दिन रात एक ही स्वर में बहती हो उसकी तीन वर्ष से अधिक आयु न समझना चाहिये।

जिसकी दो दिन रात बराबर सूर्य नाड़ी चले उसकी आयु दो वर्ष की समझो

यदि एक ही स्वर तीन दिन रात बराबर चले तो उसकी आयु एक वर्ष की समझो,

यदि दिन में लगातार सूर्य तथा रात्रि में चन्द्र चले तो 6 मास में मृत्यु भय है।

यदि वर्ष, मास, अथवा पक्ष के आरंभ में ही 25 दिन तक लगातार सूर्य स्वर चले तो दूसरा मास देखना भी उसके लिये शंका का विषय है।

जिसे अपनी जीभ का छोर, नाक या भौं नहीं दिखती उसकी मृत्यु निकट समझो।

मैथुन करते समय आदि में, मध्य में और अंत में जिस मनुष्य को हिचकी लगती है उसका मरण निकट समझना।

जिस मनुष्य की बीच की तीन अंगुली टेढ़ी न होवे और बिना रोग कण्ठ सूखता हो उसका काल निकट है।

घी, तेल या पानी में जिसे अपना प्रतिबिम्ब देखते समय शिर न दिखे एक मास में उसकी मृत्यु समझो,

हाथ से कान के छिद्र बन्द करने पर जिसे एक प्रकार की आवाज हो जाती है, नहीं सुनाई दे उसके शिर पर काल समझो!

वैसे तो मौत के लक्षण जानने के लिए और भी इस प्रकार की कई बातें हैं,

काँसे की थाली में पानी भरकर उसमें सूर्य की छाया दिखावे यदि छाया दक्षिण दिशा में कटी हुई दिखे तो छः महीने में,

पश्चिम में कटी दिखे तो तीन महीने में,

उत्तर में कटी दिखे तो दो महीने में,

पूर्व में कटी दिखे तो एक महीने में,

और उसमें यदि छिद्र दिखे तो दस दिन में

धुएं से ढंकी हुई छाया दिखे तो उसी दिन मृत्यु का प्रमाण ऋषि वाक्य हैं।

यह प्राकृतिक नियम है कि दाहिने हाथ की मुट्ठी बाँध कर नाक के बराबर भौं के ऊपर माथे पर रखें और नाक के सामने कलाई करे तो दृष्टि करे तो हाथ बहुत पतला दिखता है

किन्तु यदि हाथ से मुट्ठी पृथक दिखे तो छः मास के अन्दर मृत्यु निश्चय जानो।

वर्ष फल—वर्ष फल जानने की सुगम विधि यह है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रभात के समय चन्द्र स्वर के साथ पृथ्वी, जल या वायुतत्त्व हो तो शुभदायक है अग्नि या आकाश तत्व हो तो भयदायक है।

Sunday, 2 July 2017

आओ जानते हैं कि हमें किन-किन लोगों से जिंदगी में बचकर रहना चाहिए। हमने इस तरह के ज्ञान को वर्तमान संदर्भ में लिखा है। हालांकि ऐसे और भी कुछ लोग हो सकते हैं लेकिन यहां प्रस्तुत है मात्र 10...

आओ जानते हैं कि हमें किन-किन लोगों से जिंदगी में बचकर रहना चाहिए। हमने इस तरह के ज्ञान को वर्तमान संदर्भ में लिखा है। हालांकि ऐसे और भी कुछ लोग हो सकते हैं लेकिन यहां प्रस्तुत है मात्र 10...

पहला व्यक्ति...

1 मूर्ख व्यक्ति : मूर्ख की पहचान क्या है? मूर्ख भी कई प्रकार के होते हैं। पढ़े-लिखे लोग भी मूर्ख होते हैं। यदि आप मूर्ख नहीं हैं तो आप मूर्खों से दूर रहेंगे तो लाभ में रहेंगे अन्यथा आपकी गिनती भी मूर्खों में होगी।
मूर्ख व्यक्ति को आप अपना दोस्त समझकर उसे कोई रहस्य बताएंगे, तो वह कभी भी राज नहीं रहेगा। आजकल फेसबुक और वॉट्सअप पर ऐसे लाखों मूर्ख पाए जाते हैं, जो अपनी और अपनों की जिंदगी को जगजाहिर करने में लगे हैं।
वे अपने जहरीले विचारों से अवगत कराते रहते हैं। वे इस माध्यम का सही उपयोग करना नहीं जानते हैं। मूर्खों की कोई निश्चित विचारधारा नहीं होती। यह भी कहा जाता है कि मूर्ख व्यक्ति से ज्ञान की बातें नहीं करना चाहिए।
वह कुछ का कुछ समझ लेगा।
मूर्ख व्यक्ति का आप कितना ही भला करें, वह कभी भी पलट जाएगा। मूर्ख व्यक्ति के साथ सोच-समझकर ही व्यवहार करना चाहिए। हो सके तो उससे बचकर निकल जाएं तो ही अच्छा है। यदि आप उसका विरोध करेंगे तो खुद भी मूर्ख साबित हो जाएंगे। पढ़े-लिखे मूर्खों से समाज और राष्ट्र का ज्यादा नुकसान होता है। हमारे देश में बहुत से राजनेता, अभिनेता, कलाकार, साहित्यकार और पत्रकार बंधु मूर्ख हैं। आप जरा इनसे बचकर ही रहें।

2शराबी व्यक्ति :

आप सोच रहे होंगे कि शराब पीने में क्या बुराई है। इस देश में सबसे ज्यादा अपराध शराब पीने वालों ने ही किए हैं। शराबी कई तरह के होते हैं- देवदास, औघड़, शौकिया, लती, अपराधी, राजसी आदि। इनमें से कुछ सही और कुछ गलत हैं। हो सकता है कि आप भी इनमें से एक हों।
आपके बहुत से दोस्त होंगे जो शराब, शबाब या कबाब के दीवाने होंगे। शराबी व्यक्ति के साथ रहकर आप कभी भी किसी ऐसी घटना-चक्र में फंस सकते हैं जिससे बाहर निकलने में आपकी जिंदगी के कई वर्ष और रुपए खर्च हो जाएंगे।
आपके लिए आपका परिवार, समय और रुपया कोई अहमियत नहीं रखता है, तो आप पीते रहें शराब!

. 3 मीठी छुरी या बगुला भगत :

क्या आप अपने दोस्तों की पहचान करना जानते हैं? आपके दोस्तों की फेहरिस्त में इस तरह के दोस्त हों तो सावधान रहें- दोहरे चरित्र वाले, हर बात बताओ का आग्रह करने वाले, मीठी छुरी और नकली मुस्कान वाले, बगुला भगत, जलन से भरे या ईर्ष्यालु, लगातार मुकाबला करने वाले या आपको प्रतिद्वं‍द्वी समझने वाले, हर बात पर फैसला सुनाने वाले, देवदास या लड़कीबाज, अपने अहं का प्यारा, धन के लालची, गप्पे मारने वाला आदि। हालांकि इन सभी से बचकर रहना चाहिए, लेकिन मीठी छुरी या बगुला भगत से तो हमेशा बचकर रहें। बहुत-सी लड़कियां इस तरह के लोगों का शिकार हो जाती हैं। ये लोग पहले भांप लेते हैं कि किसे क्या पसंद है और फिर वे उसी तरह की बातें करते हैं। वे हमेशा हंसते-मुस्कुराते और सकारात्‍मक सोच को प्रदर्शित करते हैं। दोस्‍ती करने का यह उनका तरीका होता है। ऐसे लोग बड़ी मासूमियत से आपकी जिंदगी का हिस्‍सा बनते हैं और आपकी अच्‍छाई का फायदा उठाते हैं और जब तक आपको होश आता है, वे आपका फायदा उठाकर निकल जाते हैं। हालांकि उनमें से कुछ का मकसद कुछ और भी रहता है। अच्छे विचारों में लिपटे ये लोग आपको आपके परिवार के प्रति विद्रोही भी बना सकते हैं या हो सकता है कि इनका मकसद आपसे शादी करना हो।

4 नकारात्मक व्यक्ति :

बहुत से लोग ऐसे होते हैं कि उनके समक्ष कुछ भी कहो, वे तर्क-वितर्क करके उसमें नकारात्मकता ही खोज लेंगे। ऐसे लोगों में संशय, संदेह, दुविधा, छल और डर रहता है। उनके मुंह से हमेशा नकारात्मक बातें ही निकलती रहती हैं। नकारात्मक लोगों की जुबान पर हमेशा 'नहीं' शब्द विराजमान रहता। ये काम तो हो नहीं सकता, वहां जाकर क्या करेंगे, ऐसा करने से कुछ हासिल नहीं होगा, इस कार्य में कभी सफलता नहीं मिलेगी, यदि तुमने ये किया तो तुम बर्बाद हो जाओगे... ऐसे हजारों वाक्य हैं, जो नकारात्मक व्यक्ति की जुबान पर होते हैं। नकारात्मक लोगों के साथ रहने से आपके भीतर निराशा, उदासी और तनाव का विकास होगा और आप भी खुद को जिंदगी में हारे हुए व्यक्ति समझेंगे। नकारात्मक दृष्टिकोण वाले लोग ब्लैक होल जैसे होते हैं, जो अचानक आकर हमारी पूरी ऊर्जा खींच लेते हैं। हम सकारात्मक बने रहने की कोशिश करते हैं, पर उनकी नकारात्मकता हावी हो जाती है। हम तनाव में हो जाते हैं, असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।

5 घमंडी :

ऐसे कई व्यक्ति हैं, जो कुछ नहीं होते फिर भी घमंड पाले रहते हैं और लोगों पर जबरन ही रौब झाड़ा करते हैं। ऐसे भी कुछ लोग हैं, जो बहुत-कुछ होते हैं। उनके पास धन, पद और सम्मान सब कुछ होते हैं और इसी से वे घमंड करते हैं। दोनों ही तरह के लोगों से बचकर रहेंगे तो फायदे में रहेंगे अन्यथा ये लोग आपको हीनता का बोध कराते रहेंगे और आपको हरदम नीचा दिखाते रहेंगे। हां, यह बात सही है कि हर व्‍यक्ति में थोड़ा-बहुत घमंड तो होता ही है, लेकिन कुछ ज्यादा ही घमंड है तो फिर वह आपका मित्र तो कतई नहीं बन सकता। अगर आपका कोई दोस्‍त आपसे पहले अपनी बात कहना चाहता है तथा वह आपकी बात सिर्फ इसलिए काट देता है, क्‍योंकि उसकी राय इससे जुदा है तो सही मायनों में आप अहंकारी व्‍यक्‍त‍ि से बात कर हैं। ऐसे लोग अपने अहं के लिए घंटों लड़ सकते हैं। उन्‍हें इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि आप क्‍या कह रहे हैं। उनकी नजर में सिर्फ वे ही सही होते हैं। वे किसी भी सूरत में अपनी गलती मानने को तैयार नहीं होते। ऐसे लोगों से व्‍यवहार रखने का एक ही तरीका होता है कि आप उनकी हां में हां मिलाते जाएं।

6 ईर्ष्यालु :

आपने देखे होंगे इस तरह के लोग, जो अक्सर आसपास मिल जाएंगे। जो आपसे ईर्ष्या रखते हैं, तो उनकी ईर्ष्या कभी भी दुश्मनी में बदल सकती है। वे हर वक्त आपके बारे में बुरा ही सोचेंगे। आपसे प्रतिद्वंद्विता की भावना रखने वाले भी अक्सर ईर्ष्यालु हो जाते हैं। ऐसे लोगों से बचकर दूर ही रहें अन्यथा आप भी उनके जैसे होकर अपने लक्ष्य से तो भटकेंगे ही, साथ ही समय और ऊर्जा भी नष्ट कर लेंगे। दोस्‍त आपकी खुशी में खुश होते हैं, आपको देखकर जलते नहीं हैं। समस्‍या यह है कि आपसे जलने वाले लोग आमतौर पर छुपे रहते हैं। वे ऊपर से तो हंसते रहते हैं, लेकिन उनके भीतर ही भीतर ईर्ष्‍या की अग्नि धधक रही होती है। आप उनकी आंखों में यह सब देख सकते हैं। कई बार उनके शब्‍द भी उनके राज जाहिर कर देते हैं।

7 झगड़ालू :

झगड़ा करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन किसी की आदत ही हो जाती है हर मुद्दे पर झगड़ते रहना। ऐसे लोगों को कब और कौन-सी बात चुभ जाए, कहा नहीं जा सकता। ऐसे लोग आपके जीवन को नर्क बना सकते हैं। बात-बात पर झगड़ते रहना या कुछ न कुछ चुभने वाली बातें बोलते रहने वाले से आप दूर रहेंगे तो ही शांतिपूर्वक प्रगति कर पाएंगे।

  8 राजा :

आजकल राजा तो रहे नहीं। पुराने समय में कहा जाता था कि राजा से दूरी बनाए रखना चाहिए अन्यथा कब राजदंड गले पड़ जाए, कोई नहीं जानता। यह भी हो सकता है कि फिर आपको जिंदगीभर अपने काम छोड़कर राजा के ही काम करना पड़े। हालांकि आजकल राजा तो रहे नहीं, हां राजाओं की जगह आजकल जनता द्वारा चुने गए शासक और प्रशासक ने ले ली है। यदि आप इनके समान नहीं हैं और आपकी इनसे दोस्ती है तो फिर आपको इन्हें हरदम खुश रखना होगा अन्यथा आप मुसीबत में पड़ जाएंगे। ये शासक और प्रशासक परजीवी होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि उनमें से कुछ दूसरों का समय और पैसा खाकर ही पलते और बढ़ते हैं।

. 9 दुष्ट या मूर्ख स्त्री :

दुष्ट स्त्री कई प्रकार की होती है। कर्कशा, चरित्रहीन या बुरे स्वभाव की स्त्री से दूर रहने में ही भलाई है अन्यथा आपका मान-सम्मान तो जाएगा ही, साथ में धन और कीमती समय भी जाता रहेगा। चाणक्य का मानना था कि सज्जन पुरुष अगर ऐसी ही किसी स्त्री के संपर्क में आते हैं तो उन्हें अपयश ही प्राप्त होता है।

10 बहुत से लोग हैं, जो बिना बात के ही दुखी रहते हैं। ऐसे लोगों से हमेशा दूर रहें। चाणक्य का कहना था कि कुछ लोग भगवान द्वारा बहुत कुछ दिए जाने के बाद भी हमेशा विलाप करते रहते हैं तथा अपना दुख प्रकट करते रहते हैं तो ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए। क्यों? दुखी लोगों के साथ रहकर अच्‍छे-भले सुखी लोग भी दुखी हो जाते हैं। बार-बार दुख पर चर्चा करना और दुख के बारे में ही सोचते रहने से एक दिन आपके जीवन में भी दुख प्रवेश कर जाएगा और आप भी दुखी ही रहेंगे। हंसना, रोना, सुखी रहना और दुखी रहना यह संक्रमण रोग की तरह होता है।

Pandit

Bhubnesh
Kasturwanagar parnkuti guna
९893946810