ज्योतिष समाधान

Sunday, 11 December 2016

शनि का राशी परिबर्तन 2017 में आपकी राशि पर प्रभाव लिंक ओपन करे

गोचर मे शनि 26 जनवरी 2017 को लगभग 21:34 बजे वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश करेगा ।

वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश करने से मकर राशि के जातकों के लिए शनि की साढ़े साती प्रारम्भ हो जाएगी ।

वृश्चिक राशि वाले जातको के लिये यह अंतिम चरण की साढ़े साती होगी

तथा तुला राशि वाले जातक साढ़े साती से मुक्त हो जायेंगे।

शनि के धनु राशि मे आते ही कन्या राशि के जातको की लघु कल्याणि ढ्य्या आरम्भ होगी

तथा वृष राशि वाले जातको की अष्ठम शनि की ढ्य्या आरम्भ हो जायेगी।शनि को भय , रोग , कर्ज , दुख , दरिद्रता ,विपन्नता, असाध्य व लम्बे चलने वाले रोग , आयु , मृत्यु तथा बुढापे आदि का कारक ग्रह माना गया है ।

2017 वर्ष मे शनि का गोचर बहुत अस्थिर रहेने वाला है क्योकि यह कुछ समय के लिये वक्री हो कर पुनः वृश्चिक राशि मे आ जायेगा और दोबारा लगभग ऑक्तूबर तक मार्गी होकर धनु राशि मे प्रवेश करेगा ।

शनि का गोचर केवल चंद्र राशि से 3,6,11 भावो मे ही शुभ फल देता है इस प्रकार शनि के धनु राशि मे आने से कुम्भ ,वृष तथा तुला राशि के जातको को शुभ फल मिलने सम्भव है ।

शनि महाराज विभिन्न राशि वाले जातको को विभिन्न प्रकार के फल देंगे

:-मेष राशि-

मेष राशि वाले जातको को अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिये अन्यथा उन्हे स्वास्थ्य सम्बंधित समस्यायो का सामना करना पड सकता है । उच्च शिक्षा के क्षेत्र मे समस्याये आ सकती है अथवा जातक को कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है । आपको जीवन के किसी भी क्षेत्र मे मनचाही सफलता पाने के लिए अधिक परिश्रम और प्रयास करने पड सकते है । जातक को आर्थिक हानि सम्भव है ,उसके निर्णयो मे कमी होती है , मति भ्रम की स्थिति बनती है ‌तथा सरकार से भय रहता है । जातक की मित्रो से अनबन होती है, संतान से कष्ट सम्भव है सन्तान की तरफ से कष्ट प्राप्त होता है तथा भाग्य मे कमी आती है ।

वृष राशि ‌-

शनि के धनु राशि मे गोचर के कारण वृष राशि वाले जातको के लिये अष्टम शनि की ढैय्या आरम्भ हो जाएगी । शनि का यह गोचर विभिन्न प्रकार की कठिनाई लाता है। जातक को आर्थिक समस्यायो का सामना करना पड़ सकता है। स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याये उत्पन्न हो सकती है कोई लम्बी चलने वाली असाध्य बिमारी सम्भव है । यदि आप पहले से ही किसी रोग जैसे ह्रदय रोग आदि से पीडित है तो विशेषरूप से सावधान रहने की आवश्यकता है । जातक को यात्रायो मे साव्धानी बरतनी चाहिये । दुर्घटना आदि सम्भव हो सकती है अतः जातक को व्यर्थ की यात्राओ से बचना चाहिये । जातक की रुचि गूढ ज्ञान की तरफ हो सकती है । पारिवारिक सुख में कमी आती है व्यर्थ के मतभेद उत्पन्न हो सकते है भाग्य मे भी कमी होती है । नौकरी आदि के क्षेत्र मे कुछ समस्यायो के साथ प्रगती हो सकती है ।प्रेम सम्बंधो मे कमी होति है, संतान से वैचारिक मतभेद सम्भव है।जातक को चाहिये कि किसी भी प्रकार के महत्व्पूर्ण निर्ण्य इस समय मे नही ले ।

मिथुन राशि –

मिथुन राशि वाले जातको के लिये शनि का गोचर उनके जीवनसाथी के लिये स्वास्थ समस्याये ले कर आयेगा ।पति ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌पत्नि के बीच वैचारिक मतभेद भी सम्भव है । स्वय जातक को यात्राओ मे कष्ट होता है तथा शत्रुओ से समस्याये सम्भव है । जातक की कार्यक्षमता मे वृधि सम्भव है अतः किसी भी कार्य अथवा योजना को अत्यधिक उत्साह मे आ कर आरम्भ नही करे । यह समय जातक के कर्मो के फल मिलने का समय है अतः शुभ कर्म करे तथा धर्म व न्याय का साथ दे नही तो समाज मे बद्नामी सम्भव है । धन – सम्पत्ति ,जमीन- जायदाद आदि से सम्बंधित निर्ण्य सोच- समझ कर ले ।

कर्क राशि –

कर्क राशि के जातको के लिये शनि छटे भाव मे गोचर करेगा । चंद्र राशि से शनि का गोचर छटे भाव मे शुभ फल देने वाला कहा जाता है । जातक की आयु मे वृधि होती है । उसका गूढ ज्ञान एवम परा विढ्या मे भी रुचि बढती है । जातक की रुचि यात्राओ मे होती है । जातक के नौकरी से सम्बंधित कार्यो मे प्रगति होती है । पराक्रम मे वृधि होती है । वह अपने शत्रुओ पर विजय प्राप्त करता है ।

सिंह राशि ‌-

सिंह राशि वाले जातको के लिये शनि का गोचर उनके पंचम भाव मे होगा ।इस स्थिति मे जातक की बुधि भ्रमित रहती है , निर्णयो मे कमी आती है । धन का नाश होता है । जातक के परिवार से वैचारिक मतभेद हो सकते है । जातक के मित्रो और प्रियजनो को कष्ट होना सम्भव होता है । अपनी वाणी को संयम मे रखें तथा झूट बोलने से बचें । संतान सम्बंधित फैसले सोच- समझ कर लें । जातक व्यापार या विवाह से सम्बंधित कोइ महत्व्पूर्ण फैसला कर सकता है ।

कन्या राशि –

कन्या राशि वाले जातको के लिये शनि चतुर्थ भाव मे गोचर करेगा अर्थात कन्या राशि वालो की लघु कल्याणि ढैय्या आरम्भ हो जायेगी । यदि जातक का पहले से ही कोई पारिवारिक भूमि सम्पत्ति का मामला कोर्ट में चल रहा है तो उसके बढ़ने की सम्भावना है । जातक के शत्रुओ मे भी वृधि होती है । वाहन आदि सावधानी से चलायें अन्यथा दुर्घटना हो सकती है । साथ ही स्थान परिवर्तन और कार्य –व्यवसाय मे भी परिवर्तन हो सकता है । जातक को अपने स्वास्थ्य व अपनी माता के स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिये । आपको भूमि- सम्पत्ति से जुढे‌‌‌‌‌‌‌‌ फैसले सोच- समझ कर लेने चाहिये ।

तुला राशि ‌-

तुला राशि वाले जातको के लिये शनि का गोचर तीसरे भाव मे होगा ।चंद्र राशि से तीसरे भाव मे शनि का गोचर शुभ फल देने वाला होता है । परन्तु यदि आप सम्पत्ति बेचना चाहते है तो किसी प्रकार का फायदा नहीं होने की उम्मीद है । जातक को संतान की प्राप्ति होती है, विढ्या की प्राप्ति होती है , उसका भाग्य प्रबल होता है । जातक लम्बी दूरी की तथा कम दूरी की दोनों प्रकार की यात्राये तथा विदेश यात्राये करता है । जातक का अपने छोटे भाई – बहनों से लगाव बढ‌ जाता है । दूर-संचार के माध्यम से कोई शुभ सूचना प्राप्त होती है ।

वृश्चिक राशि ‌-

वृश्चिक राशि के जातकों के लिये शनि का गोचर धनु राशि मे द्वितिय भाव मे होगा । यह इनके लिये उतरती हुई साढ़े साती होगी । जातक के अपने छोटे भाई- बहनों से मतभेद रहेंगे तथा जातक अपने मित्रजनों व् प्रियजनो के साथ अन्याय करता है ।उसके अपने कुटुम्ब से वैचारिक मतभेद की स्थिति बनती है । जातक को धन संचय मे कठिनाई आती है । माता के स्वास्थय पर भी विपरीत प्रभाव देखने को मिलता है । इस समय जातक किसी प्रकार की कोई लम्बी investment नहीं करे तो अच्छा है । जातक को अनयास ही अपने कार्यों मे बाधायें व समस्यायें उत्पन्न हो जाती है । इस समय जातक को अपनी वाणी पर सयम रखना चाहिये

। धनु राशि –

धनु राशि वाले जातकों के लिये यह दूसरे चरण की साढ़े साती है । अग्नि तत्व होने के कारण इस राशि के जातकों को साढ़े साती ज्यादा परेशानी देने वाली होती है । इस समय जातक अपने काम में अत्यधिक व्यस्त होने के कारण परिवार से दूर हो जाता है ,जिस कारण कुटुम्ब को समय नही दे पाता । जीवनसाथी से अनबन होती है । जातक को कार्य के नये- नये अवसर प्राप्त होते हैं। जातक के स्वास्थ्य में कमी आती है तथा मानसिक चिंतायें बड़ जाती है । जातक को कार्य के सिलसिले मे यात्रायें करनी पड्ती है

। मकर राशि –

मकर राशि वाले जातकों के लिये यह प्रथम चरण की साढ़े साती होगी । यह शनि का ही लग्न है, परंतु चंद्र्मा से व्यय भाव में शनि का गोचर शुभ फल नही देता । जातक के रोग , शत्रु और ऋण आदि की स्थिति मे वृधि होती है । जातक के व्यय अधिक होते है और धन का संचय कम होता है । दुर्घटना की भी सम्भावना बनती है । जातक के पैरों मे चोट लग सकती है । भाग्य मे कमी आती है ,पिता को समस्यायें आती हैं । जातक को मानसिक कष्ट बड़ जाते है । व्यर्थ की लम्बी दूरी की यात्रायें करनी पड़्ती हैं ।

कुम्भ राशि-

कुम्भ राशि के जातकों के लिये शनि महाराज का गोचर एकादश भाव में हो रहा है जो आपके लिये लाभ की स्थिति बनाता है । जातक की किसी कार्य विशेष के लिये की गयी विदेश यात्रा शुभफलदायक होगी परंतु जातक के अपनी संतान से वैचारिक मतभेद हो सकते है । इस समय आप अपनी संतान के विषय में जो भी निर्ण्य लेंगे वह शुभ हो सकते हैं । विढ्यर्थियो के लिये लिये यह शुभ समय है । जातक को मान- सम्मान की प्राप्ति होती है । जातक को अचानक लाभ की सी स्थिति बनती है । आपकी रुचि गुप्त विढ्या की ओर हो सकती है तथा आपको पैतृक सम्पत्ति से भी लाभ प्राप्त होता है ।

मीन राशि-

मीन राशि के जातकों के लिये शनि का गोचर दशम भाव मे होगा जो जातक के कर्म मे परिवर्तन बताता है । यदि जातक कर्म /व्यवसाय से सम्बंधित विदेश यात्रायें करता है तो उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती है । आपका विदेश से सम्बंध बनता है । परंतु इस समय जातक को चहिये कि अपने पैसे कहीं ना फसायें अर्थात कोई investment ना करे । किसी प्रकार की भूमि – सम्पत्ति का क्रय –विक्रय नही करें । जातक के घर के सुखों मे कमी आती है ,माता व पिता के सुखों मे कमी आती है । जातक के पारिवारिक सम्बंधों मे भी कमी आती है । जीवनसाथी के स्वास्थय में कमी आती है अथवा उससे मतभेद की स्थिति बनती है ।

जब भी जीवन में शनि की दशा हो या शनि अगोच्रस्थ हो तो सुन्दर काण्ड का पाठ.हनुमान और शनि चालिसा का पाठ, दशरथ कृत शनि स्त्रोत्र का पाठ ,शनि मन्दिर मे पूजन दान,तिल, सरसो तेल से शिवलिगँ का अभिषेक , महामृत्युन्जय जप ,शनि के मँत्र का जप,माँ काली ,कालरात्री की पूजा,कुता , कोऑ, कबुतर, चीटीँ और गाय को नियमित भोजन दे ,श्री कृष्ण की पूजन , ,अमावस्या की पूजा की पूजा दान,छाता या जूते का दान करना इनमें से कोई भी उपाय नियमित रूप से करने

Pandit
bhubneshwar
Kasturwanagar parnkuti guna
Mo.9893946810

Monday, 5 December 2016

२०१७ के शुभ विबाह मुहूर्त देखे लिंक ओपन करे

विवाह के शुभ दिनशुभ विवाह मुहूर्तविवाह के लिये नक्षत्रविवाह के लिये तिथि

१५th जनवरी (रवि)११:३९ से २२:४४मघाचतुर्थी

१६th जनवरी (सोम)२३:१८ से ३१:१०+उत्तराफाल्गुनीपञ्चमी

१७th जनवरी (मंगल)०७:१० से १२:०४उत्तराफाल्गुनीपञ्चमी

२०th जनवरी (शुक्र)०७:१० से १२:३६स्वातीअष्टमी

२२nd जनवरी (रवि)२१:५९ से ३१:०९+अनुराधाएकादशी

२३rd जनवरी (सोम)०७:०९ से १३:५७अनुराधाएकादशी

०१st फरवरी (बुध)०७:०६ से ३१:०६+उत्तर भाद्रपद, रेवतीपञ्चमी, षष्ठी

०२nd फरवरी (गुरु)०७:०६ से १५:२५रेवतीषष्ठी

११th फरवरी (शनि)१४:५१ से २२:२४मघाप्रतिपदा

१३th फरवरी (सोम)०८:५९ से १६:४४उत्तराफाल्गुनीतृतीया

१४th फरवरी (मंगल)०६:५९ से १८:५७उत्तराफाल्गुनी, हस्तचतुर्थी

१६th फरवरी (गुरु)१९:०३ से ३०:५७+स्वातीषष्ठी

२१st फरवरी (मंगल)१८:४५ से २७:१८+मूलएकादशी

२३rd फरवरी (गुरु)२२:०४ से ३०:३०+उत्तराषाढात्रयोदशी

२८th फरवरी (मंगल)०६:४७ से ३०:४७+उत्तर भाद्रपद, रेवतीद्वितीया, तृतीया

०१st मार्च (बुध)०६:४७ से २१:३८रेवतीतृतीया, चतुर्थी

०४th मार्च (शनि)२२:२९ से ३०:४३+रोहिणीसप्तमी

०५th मार्च (रवि)१७:०२ से ३०:४२+रोहिणी, मॄगशिराअष्टमी, नवमी

०६th मार्च (सोम)०६:४२ से १९:४२मॄगशिरानवमी

१०th मार्च (शुक्र)२३:०१ से ३०:३७+मघाचतुर्दशी

११th मार्च (शनि)०६:३७ से १७:०७मघाचतुर्दशी

१३th मार्च (सोम)२६:१६+ से ३०:३४+हस्तद्वितीया

१७th अप्रैल (सोम)१२:४७ से १९:३३मूलषष्ठी

१८th अप्रैल (मंगल)२२:११ से २९:५९+उत्तराषाढासप्तमी, अष्टमी

१९th अप्रैल (बुध)०५:५९ से २४:२०+उत्तराषाढाअष्टमी

२८th अप्रैल (शुक्र)१३:३९ से २९:५०+रोहिणीतृतीया

०४th मई (गुरु)१०:३७ से २९:०२+मघानवमी, दशमी

०६th मई (शनि)२०:३० से २९:४५+उत्तराफाल्गुनीद्वादशी

०७th मई (रवि)०५:४५ से २९:४४+उत्तराफाल्गुनी, हस्तद्वादशी, त्रयोदशी

१४th मई (रवि)१०:१७ से २६:०८+मूलचतुर्थी

१६th मई (मंगल)०५:४० से २९:४०+उत्तराषाढापञ्चमी, षष्ठी

२१st मई (रवि)१६:४१ से २९:३८+उत्तर भाद्रपदएकादशी

२२nd मई (सोम)०५:३८ से २६:५१+उत्तर भाद्रपद, रेवतीएकादशी, द्वादशी

२६th मई (शुक्र)११:१५ से २९:३६+रोहिणी, मॄगशिराप्रतिपदा, द्वितीया

२७th मई (शनि)०५:३६ से १४:४१मॄगशिराद्वितीया

३१st मई (बुध)२३:४१ से २९:३५+मघासप्तमी

०२nd जून (शुक्र)१२:०१ से २९:३५+उत्तराफाल्गुनीनवमी

०३rd जून (शनि)०५:३५ से २१:३२उत्तराफाल्गुनी, हस्तनवमी, दशमी

०५th जून (सोम)१७:४८ से २२:१५स्वातीद्वादशी

०७th जून (बुध)२३:१९ से २९:३५+अनुराधाचतुर्दशी

०८th जून (गुरु)०५:३५ से १६:१६अनुराधाचतुर्दशी

१०th जून (शनि)११:५५ से २९:३५+मूलप्रतिपदा, द्वितीया

१७th जून (शनि)१८:४८ से २९:३६+उत्तर भाद्रपदअष्टमी

१८th जून (रवि)०५:३६ से २९:३६+उत्तर भाद्रपद, रेवतीनवमी, दशमी

१९th जून (सोम)०५:३६ से ११:४२रेवतीदशमी

२८th जून (बुध)०५:३८ से १९:१७मघापञ्चमी

३०th जून (शुक्र)०५:५४ से १८:००उत्तराफाल्गुनीसप्तमी

०२nd जुलाई (रवि)२४:००+ से २९:४०+स्वातीदशमी

११th नवम्बर (शनि)१७:४१ से २५:३८+मघानवमी

१३th नवम्बर (सोम)२२:४८ से ३०:३९+उत्तराफाल्गुनीएकादशी

१४th नवम्बर (मंगल)०६:३९ से ३०:४०+उत्तराफाल्गुनी, हस्तएकादशी, द्वादशी

१५th नवम्बर (बुध)०६:४० से १३:४६हस्तद्वादशी

२१st नवम्बर (मंगल)०७:३४ से २३:२६मूलतृतीया

२३rd नवम्बर (गुरु)२५:२४+ से ३०:४७+उत्तराषाढापञ्चमी, षष्ठी

टिप्पणी - २४ घण्टे की घड़ी गुना के स्थानीय समय के साथ और सभी विवाह मुहूर्त के समय के लिए डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है)। हिन्दु विवाह मुहूर्तों की गणना करने के लिये सर्वप्रथम पञ्चाङ्ग शुद्धि की जाती है।

पञ्चाङ्ग शुद्धि न केवल विवाह के शुभ दिन ज्ञात कराता है बल्कि विवाह के संस्कारों के लिये शुभ मुहूर्त भी उपलब्ध कराता है।

हिन्दु धार्मिक ग्रन्थों, मुहूर्त चिन्तामणि और धर्मसिन्धु के अनुसार शुक्र अस्त और गुरु अस्त के समय विवाह संस्कार नहीं किया जाना चाहिये। (अगर आप शुक्र अस्त और गुरु अस्त के दिनों को जानना चाहते हैं तो कृपया शुक्र अस्त और गुरु अस्त देखें।) अतः विवाह मुहूर्त निकालने के लिये जो पञ्चाङ्ग शुद्धि की जाती है वह शुक्र अस्त और गुरु अस्त के दिनों को त्यागने के पश्चात की जानी चाहिये।

इसके आलावा अधिक मास के दिनों को भी पञ्चाङ्ग शुद्धि से पहले त्याग देना चाहिये।

हम वर्ष के सभी शुभ मुहूर्तों की गणना करते हैं और जो मुहूर्त ४ घण्टे से कम समय के होते हैं उनको हम त्याग देते हैं। सभी मुहूर्तों के लिये गणना सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय के बीच के समय को लेकर की जाती है और जो मुहूर्त मध्यरात्रि के पश्चात तक का होता है उसे हम २४+ समय के प्रारूप में दर्शाते हैं।

इस पृष्ठ पर दिये हुये सभी विवाह मुहूर्त शहर की भूगोलिक स्थिति को लेकर निकाले गये हैं। अतः शुभ विवाह के दिन और मुहूर्त लेने से पहले यह सुनिश्चित कर ले कि मुहूर्त आपकी वर्तमान भूगोलिक स्थिति के लिये ही निकाले गये हैं। शुभ विवाह के दिन तय करने के लिये पञ्चाङ्ग शुद्धि पहला कदम है और शादी का दिन तय करने के लिये ज्योतिष विद्या में पारन्गत किसी विद्वान से विचार-विमर्श करना जरुरी है।

Pandit
Bhubneshwar
Kasturwanagar guna
०9893946810

Monday, 21 November 2016

पंचामृत और पञ्चगव्य और पंजीरी (कसार) बनाने की शास्त्रीय बिधि क्या है

पंचामृत का महत्व पंचामृत क्या हैंपंचामृत का
मतलब हैं पांच तरह के अमृत का मिश्रण

पंचामृत को घी + दुध + दही + शहद + शक्कर मिला कर बनता हैं।

तो कहीं पंचामृत को घी + दुध + दही + शहद + गुड मिला कर बनाते हैं।

आध्यात्मिक द्रश्टि कोण से देखे तो जो व्यक्ति पंचामृत से देवमूर्ति (प्रतिमा) का अभिषेक करता हैं, उसे मुक्ति प्रदान हो जाती हैं।

भारतीय सभ्यता में पंचामृत का जो महत्व बताय गया हैं वह हैं, श्रद्धापूर्वक पंचामृत का पान करने वाले व्यक्ति को जीवन में सभी प्रकार की सुख समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं, एवं उसका शरीर मृत्यु के पश्च्यात जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता हैं।

आवश्यक सामग्री - की मात्रा 

स्कन्द पुराण द्वारा प्र माणित्  निर्णय सिंधु

  पेज नंबर  ६९६पर 

दूध से दस गुणा  दही ,

दही से सौ गुणा  घृत ,

 घृत से दस गुणां मधु ,

 मधु से दस गुणा ईख का रस (या  शकर )


पंजीरी  या कसार बनाने की विधि

चरणामृ्त के साथ पंजीरी भी प्रसाद में बनायी जाती है. तो आइये वह पंजीरी भी बनाना शुरू करते हैं.

आवश्यक सामग्री -

गेहूं का आटा - 150 ग्राम (1 कप)

घी - 50 ग्राम (1/4 कप)

बूरा (पिसी चीनी) -

100 ग्राम(आधा कप) मखाने -

10 - 12 इलाइची - 2 (छील कर कूट लीजिये)

विधि - How to make Panjeeri

आटे को किसी बर्तन में छान कर निकालिये. भारे तले की कढाई गैस फ्लेम पर रखिये और कढाई में घी डालकर गरम कीजिये, गरम घी में आटा डालिये और मीडियम गैस फ्लेम पर करछी से चला चला कर भूनिये, जब आटे में महक आने लगे और कलर ब्राउन हो जाय तब गैस फ्लेम बन्द कर दीजिये. भुने आटे को ठंडा होने दीजिये. एक मखाने को 4-5 टुकड़े करते हुये काट लीजिये, छोटी कढ़ाई में 2 छोटी चम्मच घी डाल कर गरम कीजिये, कतरे हुये मखाने गरम घी में डालिये और ब्राउन होने तक चमचे से चलाते हुये भून लीजिये. इलाइची को छील कर पाउडर बना लीजिये. भुने हुये मखाने, बूरा, इलाइची पाउडर को आटे में मिलाइये, आह ये स्वादिष्ट पंजीरी तैयार है

पञ्चगव्य

.
तीन भाग देसी गांय का शकृत (गोबर) ,

तीन ही भाग देसी गांय का कच्चा दूध,

दो भाग देसी गांय के दूध की दधि,

एक भाग देसी गांय का घृत इन्हें मिश्रित कर लें

विष्णु धर्म में कहा गया है जितना पंचगव्य बनाना हो उसका आधा अंश गौमूत्र का होना चाहिए |

अर्थात उक्त मिश्रण जितनी मात्र में हो उतने ही मात्र में गौमूत्र होना चाहिए, शेष कुशाजल होना चाहिए ।

गोमूत्रं गोमय क्षीरं दधि सर्पि कुशोदकम् । पंचचगव्य मिदम् प्रोक्तम्महापातक नाशनम् ॥

पंडित
bhubneshwar
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Friday, 18 November 2016

हिंदू संस्कृति में प्रमुख रूप से 16 संस्कार माने गए हैं

हिंदू संस्कृति में प्रमुख रूप से 16 संस्कार माने गए हैं जो गर्भाधान से शुरू होकर अंत्येष्टी पर खत्म होते हैं।

व्यक्ति पर प्रभाव संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है। संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा, यज्ञ, मंत्रोच्चरण आदि होता है उसका वैज्ञानिक महत्व साबित किया जा चुका है।

कुछ जगह ४८ (48) संस्कार भी बताए गए हैं।

महर्षि अंगिरा ने २५ (25) संस्कारों का उल्लेख किया है।

वर्तमान में महर्षि वेद व्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार १६ (16) संस्कार प्रचलित हैं।

विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है,

लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में

१】गर्भाधान,

२】पुंसवन,

२】सीमन्तोन्नयन,

३】जातकर्म,

४】नामकरण,

५】निष्क्रमण,

६】अन्नप्राशन,

७】चूडाकर्म,

८】कर्णवेध,

९】विद्यारंभ,

१०】यज्ञोपवीत,

११】वेदारम्भ,

१२】केशान्त,

१३】समावर्तन,

१४】विवाह तथा

१५】अन्त्येष्टि ही मान्य है।

मनीषियों ने हमें सुसंस्कृत तथा सामाजिक बनाने के लिये अपने अथक प्रयासों और शोधों के बल पर ये संस्कार स्थापित किये हैं। इन्हीं संस्कारों के कारण भारतीय संस्कृति अद्वितीय है। हालांकि हाल के कुछ वर्षो में आपाधापी की जिंदगी और अतिव्यस्तता के कारण धर्मावलम्बी अब इन मूल्यों को भुलाने लगे हैं और इसके परिणाम भी चारित्रिक गिरावट, असामाजिकता या अनुशासनहीनता के रूप में हमारे सामने आने लगे हैं। आज के समय में काफी अधिक ऐसे लोग हैं जो इन संस्कारों के विषय में जानते नहीं हैं। तो आइए जानते हैं कि जीवन में इन सोलह संस्कारों को अनिवार्य बनाए जाने का क्या कारण था?

1. गर्भाधान संस्का

Garbhdharan Sanskar : –यह ऐसा संस्कार है जिससे योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान के लिए गर्भधारण किस प्रकार करें? इसका विवरण दिया गया है। हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था। शास्त्रों के अनुसार गर्भाधान संस्कार को अति महत्वपूर्ण माना गया है, क्योकि न केवल अपने कुल अपितु यह पूरे समाज व राष्ट्र के लिए भविष्य का निर्माण करने में सहायक है दम्पत्ति को अपना दायित्व बहुत साबधानी पूर्ण करना चाहिये . इस संस्कार में माता-पिता का तन व मन पूर्ण रूप से स्वस्थ व शुद्ध होना, शुभ समय,उचित स्थान, स्वस्थ आहार-विहार आवश्यक है। यहाँ पर क्लिक करके जाने! फैमिली प्लानिंग कैसे करे ?

2. पुंसवन संस्कार –

Punsvan Sanskar : गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाय ।हिन्दू धर्म में, संस्कार परम्परा के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह तथ्य समझाए जाते हैं कि शारीरिक, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान पैदा करने की पहल करें । उसके लिए अनुकूल वातवरण भी निर्मित किया जाता है। गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है, क्योंकि इस समय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है ।

3. सीमन्तोन्नयन संस्कार –

Simantonnyan Sanskar : सीमन्तोन्नयन संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में तृतीय संस्कार है | यह संस्कार पुंसवन का ही विस्तार है | इसका शाब्दिक अर्थ है- "सीमन्त" अर्थात् 'केश और उन्नयन' अर्थात् 'ऊपर उठाना' | संस्कार विधि के समय पति अपनी पत्नी के केशों को संवारते हुए ऊपर की ओर उठाता था, इसलिए इस संस्कार का नाम 'सीमंतोन्नयन' पड़ गया | यह संस्कार गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है | इस संस्कार का फल भी गर्भ की शुद्धि ही है | इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है | उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म आएं, इसके लिए माँ उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है | महाभक्त प्रह्लाद को देवर्षि नारद का उपदेश तथा अभिमन्यु को चक्रव्यूह प्रवेश का उपदेश इसी समय में मिला था | अतः माता-पिता को चाहिए कि वे इन दिनों विशेष सावधानी के साथ योग्य आचरण करें | सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं | सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना | गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है | इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं | सनातन धर्म में स्त्रियों को शिक्षित होना अनिवार्य है इसी समय गर्भिणी को वेद एवं शास्त्रों का अध्ययन कराया जाता है | जब गर्भिणी शिक्षित, मानसिक बल एवं सकारात्मक विचारों से युक्त होगी तभी शिशु भी शक्तिशाली व् विद्वान होगा क्योंकि शिशु का लगभग 90 % बौद्धिक विकास गर्भ में हो जाता है | इसमें कोई संदेह नहीं की गर्भस्थशिशु बहुत ही संवेदनशील होता है | सती मदालसा के बारे में कहा जाता है की वह अपने बच्चे के गुण, कर्म और स्वभाव की पूर्व घोषणा कर देती थी, फिर उसी प्रकार निरंतर चिंतन, क्रिया-कलाप, रहन-सहन, आहार-विहार और बर्ताव अपनाती थी, जिससे बच्चा उसी मनोभूमि ढल जाता है, जैसा कि वह चाहती थी | उदाहरण :- (क) भक्त प्रह्लाद की माता कयाधू को देवर्षि नारद भगवदभक्ति के उपदेश दिया करते थे, जो प्रहलाद ने गर्भ में ही सुने थे | (ख) व्यासपुत्र शुकदेव ने अपनी माँ के गर्भ में सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया था | (ग) अर्जुन ने अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूहभेदन की जो शिक्षा दी थी, वह सब गर्भस्थशिशु अभिमन्यु सीख ली थी | उसी शिक्षा के आधार पर सोलह वर्ष की आयु में ही अभिमन्यु ने अकेले सात महारथियों से युद्ध कर चक्रव्यूह-भेदन किया | अलग अलग जगह इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है जैसे छत्तीसगढ़ में इसे " सधौरी खवाना " कहते है।

4. जातकर्म –

Jatkarm Sanskar : जन्म के बाद नवजात शिशु के नालच्छेदन (यानि नाल काटने) से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधाoh, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत गुरु मंत्र के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है। ( यह स्तनपान विज्ञान के अनुसार जन्म होने के आधे घंटे अन्तर्गत कराये जाने वाला स्तनपान है, जिसको हिन्दू धर्म में हजारो वर्ष पहले से बताया जा चूका है। )

5. नामकरण संस्कार –

Namkaran Sanskar : कई जगह इसे "छठ्ठी" के नाम से जाना जाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य को जिस तरह के नाम से पुकारा जाता है, उसे उसी प्रकार की छोटी सी अनुभूति होती रहती है | यदि किसी को कूड़ेमल, घूरेमल, नकछिद्दा, नत्थो, घसीटा आदि नामों से पुकारा जायेगा, तो उसमें हीनता के भाव ही जाएगी | नाम सार्थक बनाने की कई हलकी, अभिलाषाएँ मन में जगती रहती है | पुकारने वाले भी किसी के नाम के अनुरूप उसके व्यक्तित्व की हल्की या भारी कल्पना करते हैं | इसलिए नाम का अपना महत्त्व है | उसे सुन्दर ही चुना और रखा जाए | बालक का नाम रखते समय निम्न बातों का ध्यान रखें | गुणवाचक नाम रखे जाएँ, पुत्र एवं पुत्री के नामों की एक बड़ी सूची बनाई जा सकती है | उसी में से छाँटकर लड़के और लड़कियों के उत्साहवर्धक, सौम्य एवं प्रेरणाप्रद नाम रखने चाहिए | समय-समय पर बालकों को यह बोध भी कराते रहना चाहिए कि उनका यह नाम है, इसलिए गुण भी अपने में वैसे ही पैदा करने चाहिए | नक्षत्र या राशियों के अनुसार नाम रखने से लाभ यह है कि इससे जन्मकुंडली बनाने में आसानी रहती है | नाम भी बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण रखना चाहिये | अशुभ तथा भद्दा नाम कदापि नहीं रखना चाहिये | शिशु कन्या है या पुत्र, इसके भेदभाव को स्थान नहीं देना चाहिए । भारतीय संस्कृति में कहीं भी इस प्रकार का भेद नहीं है । शीलवती कन्या को दस पुत्रों के बराबर कहा गया है । ‘दश पुत्र-समा कन्या यस्य शीलवती सुता ।’ इसके विपरीत पुत्र भी कुल धर्म को नष्ट करने वाला हो सकता है । ‘जिमि कपूत के ऊपजे कुल सद्धर्म नसाहिं ।’ आमतौर से यह संस्कार जन्म के दसवें दिन किया जाता है । उस दिन जन्म सूतिका का निवारण-शुद्धिकरण भी किया जाता है । यह प्रसूति कार्य घर में ही हुआ हो, तो उस कक्ष को लीप-पोतकर, धोकर स्वच्छ करना चाहिए । शिशु तथा माता को भी स्नान कराके नये स्वच्छ वस्त्र पहनाये जाते हैं । यदि दसवें दिन किसी कारण नामकरण संस्कार न किया जा सके । तो अन्य किसी दिन, बाद में भी उसे सम्पन्न करा लेना चाहिए । घर पर, प्रज्ञा संस्थानों अथवा यज्ञ स्थलों पर भी यह संस्कार कराया जाना उचित है । कई कर्मकांडी का मानना है कि जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं। नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है।

6. निष्क्रमण् –

Nishkraman Sanskar : निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।

7. अन्नप्राशन संस्कार –

Annaprashan Sanskar : सनातन धर्म संस्कारों में अन्नप्राशन संस्कार सप्तम संस्कार है | इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है | अब तक तो शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि को प्राप्त होता था, अब आगे स्वयं अन्न ग्रहण करके ही शरीर को पुष्ट करना होगा, क्योंकि प्राकृतिक नियम सबके लिये यही है | अब बालक को परावलम्बी न रहकर धीरे-धीरे स्वावलम्बी बनना पड़ेगा | केवल यही नहीं, आगे चलकर अपना तथा अपने परिवार के सदस्यों के भी भरण-पोषण का दायित्व संम्भालना होगा | यही इस संस्कार का तात्पर्य है | हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है। शास्त्रों में अन्न को प्राणियों का प्राण कहा गया है | गीता में कहा गया है कि अन्न से ही प्राणी जीवित रहते हैं | अन्न से ही मन बनता है | इसलिए अन्न का जीवन में सर्वाधिक महत्तव है | बच्चों को सफेद चीनी व् तामसिक भोजन नहीं खिलानी चहिए क्योंकि यह स्वास्थ के लिए हानि कारक है | यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात 6 –7 महीने की उम्र में किया जाता है अलग अलग जगह इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है , जैसे छत्तीसगढ़ में इसे " मुँह जुठारना " कहते है।

8 मुंडन/चूड़ाकर्म संस्कार –

Mundan/ Chudakarm Sanskar : चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार सम्पन्न होता है। यह समारोह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि मस्तिष्कीय विकास एवं सुरक्षा पर इस सयम विशेष विचार किया जाता है और वह कार्यक्रम शिशु पोषण में सम्मिलित किया जाता है, जिससे उसका मानसिक विकास व्यवस्थित रूप से आरम्भ हो जाए

9. कर्णवेध संस्कार –

Karnvedh Sanskar : इसका अर्थ है – कान छेदना। परंपरा में कान और नाक छेदे जाते थे। इसके दो कारण हैं, एक – आभूषण पहनने के लिए। दूसरा कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है। हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि ( बीमारी ) से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां ( बीमारी ) दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है। यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।

10.विद्यारंभ संस्कार –

Vidyarambh Sanskar : विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।

11.यज्ञोपवीत/उपनयन संस्कार –

Yagyopavit/ Upnayan Sanskar : यज्ञोपवीत (संस्कृत संधि विच्छेद= यज्ञ+उपवीत) उप यानी पास और नयन यानी ले जाना, गुरू के पास ले जाने का अर्थ है – उपनयन संस्कार। उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है । मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। इसमें सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं । ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

12. वेदारम्भ संस्कार –

Vedarambh Sanskar : इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है। ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।

13.केशान्त संस्कार –

Keshant Sanskar : केशांत संस्कार का अर्थ है – केश यानी बालों का अंत करना, गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

14.समावर्तन संस्कार –

Samavartan Sanskar : समावर्तन संस्कार का अर्थ है – फिर से लौटना। आश्रम में शिक्षा प्राप्ति के बाद ब्रहमचारी को फिर सांसारिक जीवन में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है ब्रहमचारी मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार है। गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

15.विवाह संस्कार –

Vivah Sanskar : प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था। यह भी पढ़े :- 7 फेरो के सातो वचन और महत्व हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनका स्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं । वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वाञ्छित सहयोग देते रहते हैं । ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्क है । युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं ।

16. अन्त्येष्टि संस्कार/श्राद्ध संस्कार –

Antyeshti/ Shraddha Sanskar : हिंदूओं में किसी की मृत्यु हो जाने पर उसके मृत शरीर को वेदोक्त रीति से चिता में जलाने की प्रक्रिया को अन्त्येष्टि क्रिया अथवा अन्त्येष्टि संस्कार कहा जाता है। यह हिंदू मान्यता के अनुसार सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है।

हिंदू संस्कृति में प्रमुख रूप से 16 संस्कार

हिंदू संस्कृति में प्रमुख रूप से 16 संस्कार माने गए हैं जो गर्भाधान से शुरू होकर अंत्येष्टी पर खत्म होते हैं।
व्यक्ति पर प्रभाव संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है। संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा, यज्ञ, मंत्रोच्चरण आदि होता है उसका वैज्ञानिक महत्व साबित किया जा चुका है।
कुछ जगह ४८ संस्कार भी बताए गए हैं। महर्षि अंगिरा ने २५ संस्कारों का उल्लेख किया है।

वर्तमान में महर्षि वेद व्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार १६ संस्कार प्रचलित हैं।

ये है भारतीय संस्कृति के 16 संस्कार

गर्भाधान संस्कार,
पुंसवन संस्कार,
सीमन्तोन्नयन संस्कार,
जातकर्म संस्कार,
नामकरण संस्कार,
निष्क्रमण संस्कार,
अन्नप्राशन संस्कार,
मुंडन संस्कार,
कर्णवेध संस्कार
, उपनयन संस्कार,
विद्यारंभ संस्कार,
केशांत संस्कार,
समावर्तन संस्कार,
विवाह संस्कार,
विवाहाग्नि संस्कार,
अंत्येष्टि संस्कार।

आइये अपने 16 संस्कारों के बारे में जानें ...
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1.गर्भाधान संस्कार -

ये सबसे पहला संस्कार है l बच्चे के जन्म से पहले माता -पिता अपने परिवार के साथ गुरुजनों के साथ यज्ञ करते हैं और इश्वर को प्रार्थना करते हैं की उनके घर अच्छे बचे का जन्म हो, पवित्र आत्मा, पुण्यात्मा आये l जीवन की शुरूआत गर्भ से होती है। क्योंकि यहां एक जिन्दग़ी जन्म लेती है। हम सभी चाहते हैं कि हमारे बच्चे, हमारी आने वाली पीढ़ी अच्छी हो उनमें अच्छे गुण हो और उनका जीवन खुशहाल रहे इसके लिए हम अपनी तरफ से पूरी पूरी कोशिश करते हैं। ज्योतिषशास्त्री कहते हैं कि अगर अंकुर शुभ मुहुर्त में हो तो उसका परिणाम भी उत्तम होता है। माता पिता को ध्यान देना चाहिए कि गर्भ धारण शुभ मुहुर्त में हो। ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि गर्भधारण के लिए उत्तम तिथि होती है मासिक के पश्चात चतुर्थ व सोलहवीं तिथि (Fourth and Sixteenth Day is very Auspicious for Garbh Dharan)। इसके अलावा षष्टी, अष्टमी, नवमी, दशमी, द्वादशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमवस्या की रात्रि गर्भधारण के लिए अनुकूल मानी जाती है। गर्भधारण के लिए उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, मृगशिरा, अनुराधा, हस्त, स्वाती, श्रवण, घनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र बहुत ही शुभ और उत्तम माने गये हैं l ज्योतिषशास्त्र में गर्भ धारण के लिए तिथियों पर भी विचार करने हेतु कहा गया है। इस संस्कार हेतु प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथि को बहुत ही अच्छा और शुभ कहा गया है l गर्भ धारण के लिए वार की बात करें तो सबसे अच्छा वार है बुध, बृहस्पतिवार और शुक्रवार। इन वारों के अलावा गर्भधारण हेतु सोमवार का भी चयन किया जा सकता है, सोमवार को इस कार्य हेतु मध्यम माना गया है। ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार गर्भ धारण के समय लग्न शुभ होकर बलवान होना चाहिए तथा केन्द्र (1, 4 ,7, 10) एवं त्रिकोण (5,9) में शुभ ग्रह व 3, 6, 11 भावों में पाप ग्रह हो तो उत्तम रहता है। जब लग्न को सूर्य, मंगल और बृहस्पति देखता है और चन्द्रमा विषम नवमांश में होता है तो इसे श्रेष्ठ स्थिति माना जाता है। ज्योतिषशास्त्र कहता है कि गर्भधारण उन स्थितियों में नहीं करना चाहिए जबकि जन्म के समय चन्द्रमा जिस भाव में था उस भाव से चतुर्थ, अष्टम भाव में चन्द्रमा स्थित हो। इसके अलावा तृतीय, पंचम या सप्तम तारा दोष बन रहा हो और भद्रा दोष लग रहा हो। ज्योतिषशास्त्र के इन सिद्धान्तों का पालन किया जाता तो कुल की मर्यादा और गौरव को बढ़ाने वाली संतान घर में जन्

2. पुंसवन संस्कार

- पुंसवन संस्कार के दो प्रमुख लाभ- पुत्र प्राप्ति और स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान है। पुंसवन संस्कार गर्भस्थ बालक के लिए किया जाता है, इस संस्कार में गर्भ की स्थिरता के लिए यज्ञ किया जाता है l

3. सीमन्तोन्नयन संस्कार-

यह संस्कार गर्भ के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्च सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म आएं, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है। भक्त प्रह्लाद और अभिमन्यु इसके उदाहरण हैं। इस संस्कार के अंतर्गत यज्ञ में खिचडी की आहुति भी दी जाती है l

4. जातकर्म संस्कार-

बालक का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से गर्भस्त्रावजन्य दोष दूर होते हैं। नालछेदन के पूर्व अनामिका अंगूली (तीसरे नंबर की) से शहद, घी और स्वर्ण चटाया जाता है। जब नवजात शिशु जन्म लेता है तब 1% घी, 4% शहद से शिशु की जीभ पर ॐ लिखते हैं ..

5. नामकरण संस्कार-

जन्म के बाद 11वें या सौवें या 101 वें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। सपरिवार और गुरुजनों के साथ मिल कर यज्ञ किया जाता है तथा ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष आधार पर बच्चे का नाम तय किया जाता है। बच्चे को शहद चटाकर सूर्य के दर्शन कराए जाते हैं। उसके नए नाम से सभी लोग उसके स्वास्थ्य व सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। वेद मन्त्रों में जो भगवान् के नाम दिए गए हैं, जैसे नारायण, ब्रह्मा, शिव - शंकर, इंद्र, राम - कृष्ण, लक्ष्मी, देव - देवी आदि ऐसे समस्त पवित्र नाम रखे जाते हैं जिससे बच्चे में इन नामों के गुण आयें तथा बड़े होकर उनको लगे की मुझे मेरे नाम जैसा बनना है l

6. निष्क्रमण संस्कार-

जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना ... बच्चे को पहली बार घर से बाहर खुली और शुद्ध हवा में लाया जाता है

7. अन्नप्राशन संस्कार-

गर्भ में रहते हुए बच्चे के पेट में गंदगी चली जाती है, उसके अन्नप्राशन संस्कार बच्चे को शुद्ध भोजन कराने का प्रसंग होता है। बच्चे को सोने-चांदी के चम्मच से खीर चटाई जाती है। यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात ६-७ महीने की उम्र में किया जाता है। इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है, इससे पहले बच्चा अन्न को पचाने की अवस्था में नहीं रहता l

8. चूडाकर्म या मुंडन संस्कार

- बच्चे की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारे जाते हैं और यज्ञ किया जाता है जिसे वपन क्रिया संस्कार, मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार कहा जाता है। इससे बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है।

9. कर्णभेद या कर्णवेध संस्कार-

कर्णवेध संस्कार इसका अर्थ है- कान छेदना। परंपरा में कान और नाक छेदे जाते थे। यह संस्कार जन्म के छह माह बाद से लेकर पांच वर्ष की आयु के बीच किया जाता था। यह परंपरा आज भी कायम है। इसके दो कारण हैं, एक- आभूषण पहनने के लिए। दूसरा- कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है। वर्तमान समय में वैज्ञानिकों ने भी कर्णभेद संस्कार का पूर्णतया समर्थन किया है और यह प्रमाणित भी किया है की इस संस्कार से कान की बिमारियों से भी बचाव होता है l सभी संस्कारों की भाँती कर्णभेद संस्कार को भी वेद मन्त्रों के अनुसार जाप करते हुए यज्ञ किया जाता है l

10. उपनयन संस्कार -

उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। उपनयन संस्कार बच्चे के 6 - 8 वर्ष की आयु में किया जाता है, इसमें यज्ञ करके बच्चे को एक पवित्र धागा पहनाया जाता है, इसे यज्ञोपवीत या जनेऊ भी कहते हैं l बालक को जनेऊ पहनाकर गुरु के पास शिक्षा अध्ययन के लिए ले जाया जाता था। आज भी यह परंपरा है। जनेऊ में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। फिर हर सूत्र के तीन-तीन सूत्र होते हैं। ये सब भी देवताओं के प्रतीक हैं। आशय यह कि शिक्षा प्रारंभ करने के पहले देवताओं को मनाया जाए। जब देवता साथ होंगे तो अच्छी शिक्षा आएगी ही। अब बच्चा द्विज कहलाता है, द्विज का अर्थ होता है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो, अब बच्चे को पढाई करने के लिए गुरुकुल भेजा जाता है l पहला जन्म तो हमारे माता पिता ने दिया लेकिन दूसरा जन्म हमारे आचार्य, ऋषि, गुरुजन देते हैं, उनके ज्ञान को पाकर हम एक नए मनुष्य बनते हैं इसलिए इसे द्विज या दूसरा जन्म लेना कहते हैं l यज्ञोपवीत पहनना गुरुकुल जाने, ज्ञानी होने, संस्कारी होने का प्रतीक है l कुछ लोगों को ग़लतफहमी है की यज्ञोपवीत का धागा केवल ब्राह्मण लोग ही धारण अक्र्ते हैं, वास्तब में आज कल केवल ब्राह्मण ही रह गए हैं जो सनातन परम्पराओं को पूर्णतया निभा रहे हैं, जबकि पुराने समय में सभी लोग गुरुकुल में प्रवेश के समय ये यज्ञोपवीत पवित्र धागा पहनते थे..... यानी की जनेऊ धारण करते थे l

11. वेदाररंभ या विद्यारंभ संस्कार

जीवन को सकारात्मक बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है। शिक्षा का शुरू होना ही विद्यारंभ संस्कार है। गुरु के आश्रम में भेजने के पहले अभिभावक अपने पुत्र को अनुशासन के साथ आश्रम में रहने की सीख देते हुए भेजते थे। ये संस्कार भी उपनयन संस्कार जैसा ही है, इस संस्कार के बाद बच्चों को वेदों की शिक्षा मिलना आरम्भ किया जाता है गुरुकुल में वर्तमान समय में हम जैसा अधिकाँश लोगों ने गुरुकुल में शिक्षा नहीं पायी है इसलिए हमे अपने ही धर्म के बारे में बहुत बड़ी ग़लतफ़हमियाँ हैं, और ना ही वर्तमान समय में हमारे माता-पिता को अपनी संस्कृति के बारे में पूर्ण ज्ञान है की वो हमको हमारे धर्म के बारे में बता सकें, इसलिए हमारे प्रश्न मन में ही रह जाते हैं l अधिकाँश अभिभावक तो बस कभी कभी मन्दिर जाने को ही "धर्म" कह देते हैं ये हमारा 11वां संस्कार है, अब जब गुरुकुल में बच्चे पढने जा रहे हैं और वो वहां पर वेदों को पढ़ना आरम्भ करेंगे तो बहुत ही आश्चर्य की बात है की हम वेदों को सनातन धर्म के धार्मिक ग्रन्थ मानते हैं और गुरुकुल में बच्चों को यदि धार्मिक ग्रन्थ की शिक्षा दी जाएगी तो वो इंजीनियर, डाक्टर, वैज्ञानिक, अध्यापक, सैनिक आदि कैसे बनेंगे ? वास्तव में हम लोगों को यह नहीं पता की जैसे अंग्रेजी डाक्टर होते हैं वैसे ही हमारे भारत वर्ष में भी वैद्य हैं l जैसे आजकल के डाक्टर रसायनों के अनुसार दवाइयां देते हैं खाने के लिए उसी प्रकार हमारे आचार्य और वैद्य शिरोमणी जड़ी बूटियों की औषधियां बनाते थे, जो की विश्व की सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धति है..... आयुर्वेद हमारे वेदों का ही एक अंश है l ऐसे ही वेद के अनेक अंश हैं जैसे ... "शस्त्र-शास्त्र" ...जो भारत की युद्ध कलाओं पर आधारित हैं l गन्धर्व-वेद ... संगीत पर आधारित है l ये सब उपवेद कहलाते हैं l हम सबको थोड़े अपने सामान्य ज्ञान या व्यवहारिक ज्ञान के अनुसार भी सोचना चाहिए की भारत में पुरानी संस्कृति जो भी थीं.... क्या वो बिना किसी समाज, चिकित्सक, इंजिनियर, वैज्ञानिक, अध्यापक, सैनिक आदि के बिना रह सकती थी क्या ...? बिलुल भी नहीं .... वेदों में समाज के प्रत्येक भाग के लिए ज्ञान दिया गया है l केशांत संस्कार- केशांत संस्कार का अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या अध्ययन से पूर्व भी केशांत किया जाता है। मान्यता है गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्ति के पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करे।

12. समवर्तन संस्कार -

समवर्तन का अर्थ है फिर से लौटना। आश्रम
में शिक्षा प्राप्ति के बाद ब्रह्मचारी को फिर दीन-दुनिया में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है ब्रह्मचारी को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षो के लिए तैयार करना। जब बच्चा (लडका या लड़की ) गुरुकुल में अपनी शिक्षा पूरी कर लेते हैं, अर्थान उनको वेदों के अनुसार विज्ञान, संगीत, तकनीक, युद्धशैली, अनुसन्धान, चिकित्सा और औषधी, अस्त्रों शस्त्रों के निर्माण, अध्यात्म, धर्म, राजनीति, समाज आदि की उचित और सर्वोत्तम शिक्षा मिल जाती है उसके बाद यह संस्कार किया जाता है l समवर्तन संस्कार में ऋषि, आचार्य, गुरुजन आदि शिक्षा पूर्ण होने के पच्चात अपने शिष्यों से गुरु दक्षिणा भी मांगते हैं l वर्तमान समय में इस संस्कार का एक विदूषित रूप देखने को मिलता है जिसे Convocation Ceremony कहा जाता है

l13. विवाह संस्कार-

विवास का अर्थ है पुरुष द्वारा स्त्री को विशेष रूप से अपने घर ले जाना। सनातन धर्म में विवाह को समझौता नहीं संस्कार कहा गया है। यह धर्म का साधन है। दोनों साथ रहकर धर्म के पालन के संकल्प के साथ विवाह करते हैं। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है। ये संस्कार बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है, ये भी यज्ञ करते हुए और वेदों पर आधारित मन्त्रों को पढ़ते हुए किया जाता है, वेद-मन्त्रों में पति और पत्नी के लिए कर्तव्य दिए गए हैं और इन को ध्यान में रखते हुए अग्नि के 7 फेरे लिए जाते हैं l जैसे हमारे माता पिता ने हमको जन्म दिया वैसे ही हमारा कर्तव्य है की हम कुल परम्परा को आगे बाधाएं, अपने बच्चों को सनातन संस्कार दें और धर्म की सेवा करें l विवाह संस्कार बहुत आवश्यक है ... हमारे समस्त ऋषियों की पत्नी हुआ करती थीं, ये महान स्त्रियाँ आध्यात्मिकता में ऋषियों के बराबर थीं l

14. वानप्रस्थ संस्कार

अब 50 वर्ष की आयु में मनुष्य को अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर जंगल में चले जाना चाहिए और वहां पर वेदों की 6 दर्शन यानी की षट-दर्शन में से किसी 1 के द्वारा मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, ये संस्कार भी यज्ञ करते हुए किया जाता है और संकल्प किया जाता है की अब मैं इश्वर के ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास करेंगे l

15. सन्यास संस्कार-

वानप्रस्थ संस्कार में जब मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर लेता है उसके बाद वो सन्यास लेता है, वास्तव में सन्यास पूरे समाज के लिए लिया जाता है , प्रत्येक सन्यासी का धर्म है की वो सारे संसार के लोगों को भगवान् के पुत्र पुत्री समझे और अपना बचा हुआ समय सबके कल्याण के लिए दे दे l सन्यासी को कभी 1 स्थान पर नही रहना चाहिए उसे घूम घूम कर साधना करते हुए लोगो के काम आना चाहिए, अब सारा विश्व ही सन्यासी का परिवार है, कोई पराया नही है l सन्यास संस्कार 75 की वर्ष की आयु में होता है पर अगर इस संसार से वैफाग्य हो जाए तो किसी भी आयु में सन्यास लिया जा सकता है l सन्यासी का धर्म है की वो धर्म के ज्ञान को लोगों को बांटे, ये उसकी सेवा है, सन्यास संस्कार करते समय भी यज्ञ किया जाता है वेद मन्त्र पढ़ते हुए और सृष्टि के कल्याण हेतु बाकी जीवन व्यतीत करने की प्रतिज्ञा की जाती है l

16. अंत्येष्टि संस्कार-

इसका अर्थ है अंतिम यज्ञ। आज भी शवयात्रा के आगे घर से अग्नि जलाकर ले जाई जाती है। इसी से चिता जलाई जाती है। आशय है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी उसी से उसके अंतिम यज्ञ की अग्नि जलाई जाती है। मृत्यु के साथ ही व्यक्ति स्वयं इस अंतिम यज्ञ में होम हो जाता है। हमारे यहां अंत्येष्टि को इसलिए संस्कार कहा गया है कि इसके माध्यम से मृत शरीर नष्ट होता है। इससे पर्यावरण की रक्षा होती है। अन्त्येष्टी संस्कार के समय भी वेद मन्त्र पढ़े जाते हैं, पुराने समय में "नरमेध यज्ञ" जिसका वास्तविक अर्थ अन्त्येष्टी संस्कार था.. उसका गलत अर्थ निकाल कर बलि मान लिया गया था l