ज्योतिष समाधान

Friday, 18 November 2016

विभिन्न लग्नों में शनि की स्थिति के शुभाशुभ फल-

विभिन्न लग्नों में शनि की स्थिति के शुभाशुभ फल-

मेष:

इस लग्न में शनि कर्मेश तथा लाभेश होता है। इस लग्न वालों के लिए यह नैसर्गिक रूप से अशुभ है, लेकिन आर्थिक मामलों में लाभदायक होता है।

वृष:

इस लग्न में केंद्र शनि तथा त्रिकोण का स्वामी होता है। उसकी इस स्थिति के फलस्वरूप जातक को राजयोग एवं संपŸिा की प्राप्ति होती है।

मिथुन:

इस लग्न में यदि शनि अष्टमेश या नवमेश होता है। यह जातक को दीर्घायु बनाता है।

कर्क:

इस लग्न में शनि अति अकारक होता है।

सिंह:

इस लग्न में यह षष्ठ एवं सप्तम घर का स्वामी होता है। इस स्थिति में यह रोग एवं कर्ज देता है तथा धन का नाश करता है।

कन्या:

इस लग्न में शनि पंचम् तथ षष्ठ स्थान का स्वामी होकर सामान्य फल देता है। यदि इस लग्न में अष्टम स्थान में नीच राशि का हो तो व्यक्ति को करोड़पति बना देता है।

तुला:

इस लग्न के लिए शनि चतुर्थेश तथा पंचमेश होता है। यह अत्यंत योगकारक होता है।

वृश्चिकः

इस लग्न में शनि तृतीयेश एवं चतुर्थेश होकर अकारक होता है, किंतु बुरा फल नहीं देता।

धनु:

इस लग्न के लिए शनि निर्मल होने पर धनदायक होता है, लेकिन अशुभ फल भी देता है।

मकर:

इस लग्न के लिए शनि अति शुभ होता है।

कुंभ:

इस लग्न के लिए भी यह अति शुभ होता है।

मीनः

शनि मीन लग्न वालों को धन देता है, लेकिन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

भाव के अनुसार शनि का फल-

प्रथम भाव में शनि तांत्रिक बनाता है, किंतु शारीरिक कष्ट देता है और पत्नी से मतभेद कराता है।

द्वितीय भाव में शनि संपŸिा देता है, लेकिन लाभ के स्रोत कम करता है तथा वैराग्य भी देता है।

तृतीय भाव में शनि पराक्रम एवं पुरुषार्थ देता है। शत्रु का भय कम होता है।

चतुर्थ भाव में शनि हृदय रोग का कारक होता है, हीन भावना से युक्त करता है और जीवन नीरस बनाता है

पंचम भाव में शनि रोगी संतान देता है तथा दिवालिया बनाता है।

षष्ठ भाव में शनि होने पर चोर, शत्रु या सरकार जातक का कोई नुकसान नहीं कर सकता है। उसे पशु-पक्षी से धन मिलता है।

सप्तम भाव में स्थित शनि जातक को अस्थिर स्वभाव का तथा व्यभिचारी बनाता है। उसकी स्त्री झगड़ालू होती है।

अष्टम भाव में स्थित शनि धन का नाश कराता है। इसकी इस स्थिति के कारण घाव, भूख या बुखार से जातक की मृत्यु होती है। दुर्घटना की आशंका रहती है।

नवम् भाव में शनि जातक को संन्यास की ओर प्रेरित करता है। उसे दूसरों को कष्ट देने में आनंद मिलता है। 36 वर्ष की उम्र में उसका भाग्योदय होता है।

दशम स्थान का शनि जातक को उन्नति के शिखर तक पहुंचाता है। साथ ही स्थायी संपŸिा भी देता है।

एकादश भाव में स्थित शनि के कारण जातक अवैध स्रोतों से धनोपार्जन करता है। उसकी पुत्र से अनबन रहती है।

द्वादश भाव में शनि अपनी दशा-अतंर्दशा में जातक को करोड़पति बनाकर दिवालिया बना देता है। लघु कल्याणी या ढैया जब शनि गोचर में जन्म राशि से चतुर्थ भाव में भ्रमण करता है तो इस अवधि को लघु कल्याणी ढैया कहा जाता है। दो वर्ष छः माह की इस अवधि में जातक को अधिक कष्ट नहीं होता है। थोड़ी मानसिक परेशानी होती है। किंतु यदि शनि तुला, धनु, मकर, कुंभ या मीन का हो तो भवन और वाहन देता है। ढैया के अन्य शुभाशुभ फल: जब शनि गोचर में जन्म राशि से अष्टम भाव में जाता है तो व्यक्ति वात रोग से ग्रस्त होता है। उसके पैरों में दर्द की संभावना होती है, लेकिन दशा एवं महादशा अच्छी हो तो दर्द का अनुभव नहीं होता है।
कन्या लग्न वाले को यह ढैया अपार संपŸिा देती है, क्योंकि द्वितीय भाव पर शनि की उच्च दृष्टि होती है।

शनि की साढ़े साती: दीर्घायु लोगों के जीवन में साढ़े साती तीन बार आती है।

प्रथमबार की साढे़ साती जातक के शरीर एवं मां-बाप को प्रभावित करती है।

द्वितीय साढ़े साती कार्य, रुचि, आर्थिक स्थिति एवं पत्नी पर प्रभाव डालती है।

तृतीय साढ़े साती जातक के स्वास्थ्य पर अत्यधिक प्रभाव डालती है। किसी-किसी जातक की मृत्यु भी हो जाती है।

साढ़े साती का भी अनुकूल प्रभाव: शनि की साढ़े साती हमेशा अशुभ ही हो, यह जरूरी नहीं।

अपने विभिन्न चरणों में यह शुभ फल भी देती है। विभिन्न राशियांे में इसके शुभ प्रभाव का विश्लेषण यहां प्रस्तुत है।

मेष:

इस राशि के लोगों को अंतिम ढाई वर्षों के दौरान शुभ फल मिलता है।

वृष:

इस राशि वालों के लिए मध्य तथा अंत के ढाई वर्ष शुभ होते हैं। इस दौरान जातक की उन्नति होती है और उस संपŸिा की प्राप्ति होती है।

मिथुन:

इस राशि के लिए आरंभ के ढाई वर्ष अनुकूल होते हैं। इस दौरान जातक की तीर्थ यात्रा होती है एवं शुभ कार्य पर धन खर्च होता है।

कर्क:

आरंभ के ढाई वर्ष शुभ होते हैं।

सिंह:

अंत के ढाई वर्ष शुभ होते हैं।

कन्या:

अंत के ढाई वर्ष शुभ होते हैं, आर्थिक कष्ट नहीं होता है।

तुला:

मध्य के ढाई वर्ष शुभ होते हंै।

वृश्चिक:

आरंभ के ढाई वर्ष शुभ होते हैं।

धनु:

मध्य के ढाई वर्ष शुभ होते हैं।

मकर:

आरंभ तथा अंत के ढाई वर्ष शुभ होते हंै।

कुंभ:

मध्य एवं अंत के ढाई वर्षों के दौरान सुख-शांति मिलती है।

मीन:

इस राशि के लिए मध्य के ढाई वर्ष शुभ होते हंै।
विशेष: इस तरह ढैया एवं साढ़े साती शुभ तथा अशुभ दोनों फल प्रदान करती हैं। लेकिन जब गोचर में शनि तृतीय, षष्ठ या एकादश भाव में प्रवेश करता है तो पूर्ण अनुकूल फल प्रदान करता है। शनि की कुछ अन्य स्थितियों के शुभाशुभ फल- तृतीय भाव का शनि स्वास्थ्य लाभ, आराम तथा शांति प्रदान करता है। साथ ही, शत्रु पर विजय दिलाता है। षष्ठ भाव का शनि सफलता, भूमि भवन, संपŸिा एवं राज्य लाभ कराता है। एकादश भाव का शनि पदोन्नति, लाभ तथा मान सम्मान में वृद्धि कराता है। साथ ही भूमि तथा मशीनरी का लाभ देता है। जिन जातकों के जन्म काल में शनि वक्री होता है वे भाग्यवादी होते हैं। उनके क्रिया-कलाप किसी अदृश्य भक्ति से प्रभावित होते हंै। वे एकांतवासी होकर प्रायः साधना में लगे रहते हैं। धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि में शनि वक्री होकर लग्न में स्थित हो, तो जातक राजा या गांव का मुखिया होता है और राजतुल्य वैभव पाता है। द्वितीय स्थान का शनि वक्री हो तो जातक को प्रदेश तथा विदेश से धन की प्राप्ति होती है। तृतीय भाव का वक्री शनि जातक को गूढ़ विद्याओं का ज्ञाता बनाता है, लेकिन माता के लिए अच्छा नहीं होता है। चतुर्थ भावस्थ शनि मातृ हीन, भवन हीन बनाता है। ऐसा व्यक्ति घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी नहीं निभाता और अंत में संन्यासी बन जाता है। लेकिन, चतुर्थ में शनि तुला, मकर या कुंभ राशि का हो तो जातक को पूर्वजों की संपŸिा प्राप्त होती है। पंचम भाव का वक्री शनि प्रेम संबंध देता है। लेकिन जातक प्रेमी को धोखा देता है। वह पत्नी एवं बच्चे की भी परवाह नहीं करता है। षष्ठ भाव का वक्री शनि यदि निर्बल हो तो रोग, शत्रु एवं ऋण कारक होता है। सप्तम भाव का वक्री शनि पति या पत्नी वियोग देता है। यदि शनि मिथुन, कन्या, धनु या मीन का हो तो एक से अधिक विवाहों अथवा विवाहेतर संबंधों कारक होता है। अष्टम भाव में शनि हो तो जातक ज्योतिषी दैवज्ञ, दार्शनिक एवं वक्ता होता है। ऐसा व्यक्ति तांत्रिक, भूतविद्या, काला जादू आदि से धन कमाता है। नवमस्थ वक्री शनि जातक की पूर्वजों से प्राप्त धन में वृद्धि करता है। उसे धर्म परायण एवं आर्थिक संकट आने पर धैर्यवान बनाता है। दशमस्थ शनि वक्री हो तो जातक वकील, न्यायाधीश, बैरिस्टर, मुखिया, मंत्री या दंडाधिकारी होता है। एकादश भाव का शनि जातक को चापलूस बनाता है। व्यय भावस्थ वक्री शनि निर्दयी एवं आलसी बनाता है। शनि दोष निवारण के सरल उपाय शनिवार को सूर्योदय से पूर्व स्नानादि से निवृŸा होकर गुड़ मिश्रित जल पीपल के वृक्ष की जड़ में दें एवं शाम को तिल के तेल का दीप पीपल के नीचे जलाएं। अगर जातक को कष्ट बहुत हो, तो उसे शनिवार को भोजन में नमक नहीं लेना चाहिए और आचरण पवित्र रखना चाहिए घर में दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ श्रद्धापूर्वक करें। जब तक शनि की महादशा अंतर्दशा, साढ़े साती अथवा ढैया का प्रकोप हो, तब तक मांस, मछली, शराब आदि का सेवन न करें। कौए एवं काले कुŸो को प्रति दिन एक बार भोजन दें। स काले घोड़े की नाल की अंगूठी सप्ताह भर गोबर में रखकर पवित्र करें और फिर उसे बायें हाथ की मध्यमा में शनिवार को धारण करें। यथाशक्ति काले उड़द, काले तिल, कुलथी, लोहा, काले कपड़े, जूते और छाते दक्षिणा सहित दान करें। शनिवार को ब्रह्मचर्य का पालन करें।

Thursday, 17 November 2016

विबाह के लिए लगने वाली आबश्यक सामग्री लिस्ट लिंक ओपन करे

पिली पत्रिका भेजनेका सामान
१】दो पीली पत्रिका
२】पांच हल्दी की गाँठ
३】पांच गोलसुपारि
४】 पिले चावल
५】गोबर के गणेश जी
६】बतासे
७】  दूर्वा
८】कलश एक मिटटी का
९】दीपक
१०】रुई
११】माचिस
पूजा की थाली सामग्री सहित 
नाई(खबॉस )को किराया बतौर दक्षिणा
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बत्तीसी की सामग्री-

32 लड़डू,
32 रुपया
मेवा,
शकर,
चावल,
गुड़ की भेली,
लाल कपड़ा,
हार,
फुल,
बताशा,
नारियल
और जवारी का रुपया।

विधि-

इसमे भाई पटिये पर बैठता है और बहन उसकी गोद मे पूरा सामान रख़कर आरती उतारती है सभी भाई अपनी बहन को साड़ी और जीजाजी को जवारी देकर बिदा करते है।

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सभी प्रकार की जटिल समस्याओ के समाधान हेतु   शीघ्र सम्पर्क करे एबम  अपनी कुंडली दिखाकर  उचित मार्ग दर्शन प्राप्त करे । 

सम्पर्क सूत्र

पंडित जी श्री परमेस्वर दयाल जी शास्त्री 

तिलकचोक मधुसुदनगण

मोबाइल नंबर 09893397835

(पूजन समग्री कम  और  ज्यादा कर  सकते है )

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श्री गणेश पूजन  सहित अन्य पूजन के लिए
सभी पूजन में उपयोग के लिए यही सामग्री में से ले सकते है
०】आटा चोक पुरने के लिए
1】हल्दीः--------------------------50 ग्राम
२】कलावा(आंटी)-------------100 ग्राम
३】अगरबत्ती-------------------     3पैकिट
४】कपूर-------------------------  - 50 ग्राम
५】केसर-------------------------   -1डिव्वि
६】चंदन पेस्ट --------------------- 50 ग्राम
७】यज्ञोपवीत ---------------------   11नग्
८】चावल-------------------------- 05 किलो
९】अबीर-----------------------------50 ग्राम
१०】गुलाल, ----------------------10 0ग्राम
११】अभ्रक---------------------------10ग्राम
१२】सिंदूर ------------------------100 ग्राम
१३】रोली, -------------------------100ग्राम
१४】सुपारी, ( बड़ी)-----------  200 ग्राम
१५】नारियल ----------------------  11 नग्
१६】सरसो--------------------------50 ग्राम
१७】पंच मेवा---------------------100 ग्राम 
१८】शहद (मधु)------------------ 50 ग्राम
१९】शकर-------------------------0 1किलो
२०】घृत (शुद्ध घी)--------------  01किलो
२१】इलायची (छोटी)--------------10ग्राम
२२】लौंग मौली---------------------10ग्राम
२३】इत्र की शीशी--------------------1 नग्
२४】तिली--------------------------२००ग्राम
२५】जौ-----------------------------१००ग्राम
२६】माचिस -------------------------१पैकिट
२७】रुई-------------------------------२०ग्राम
२८】नवग्रह समिधा------------------१पैकेट
२९】धुप बत्ती ------------------------२पैकिट
३०】लाल कपड़ा --------------------२मीटर
३१】सफेद कपडा-------------------२मीटर
३२】समिधा हवन के लिए ---------५किलो
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                     अन्य सामग्री

१】पान
२】 पुष्प
३】पुष्पहार
४】दूर्वा
५】विल्वपत्र
६】दोना गड्डी
७】बताशे या प्रशाद
८】फल
९】आम के पत्ते
१०】समिधा
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           माता पूजन सामग्री

१】झंडियां लाल
२】पूड़ी
३】ताव
४】खारक
५】बदाम
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               मंडप पूजन सामग्री

१】मानक खम्भ
२】पटली लकड़ी की
३】नींव में रखने का सामान
४】जैसे  लाख का टुकड़ा
५】सर के वाल
६】कोयला
=============================     तोरण लड़की वालो यहां लगेगा   बढई

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गंगाजली पूजन 

कही कही होती है ऊपर दी गयी पूजा  सामग्री में से लेबे 

१】खाजा
२】खारक
३】वादाम
४】लाल कपड़ा 3 मीटर
५】श्री फल (नारियल)
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          जनेऊ (यज्ञनोपवित) संस्कार

१】मूँज की जनेऊ
२】खड़ाऊ
३】डण्डा(दंड)
४】भिक्षा पात्र
५】गुरुपूजन की सामग्री
६】जैसे =बस्त्र नारियल जनेऊ गोलसुपारी आदि
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कन्या पक्ष द्वारा  द्वार पूजन सामग्री  (बारोटा)

१】बर के निमित्त बस्त्र
२】फल
३】नारियल
४】आभूषण आदि
५】जनेऊ
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गनाना 
पूजन सामग्री ऊपर दी गयी  उसी में से पूजन थाली तैयार होगी
लड़के वालो की तरफ से दुल्हन के निमित्त 
१】 बस्र
२】आभूषण
३】कुलदेवी प्रतिमा
४】मोहर दुल्हन के सर पर बाँधने का
५】पिछौड़ा 
६】सिंधोडा
७】सिंधोड़ि
८】कंकण
९】 बतासे
१०】नारियल या नारियल गोला
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फेरे के समय पूजन सामग्री ऊपर दी है उसके
अलावा

१】लाजा
२】सूप
३】मधुपर्क
४】हथलेवा
५】सिंदुर्दानी
६】डाभ
७】मधुपर्क 
८】गुड़
९】बतासे
१०】हल्दी पिसी पॉब पुजाई के लिए
११】समिधा हवन के लिए फेरे के समय
११】विछुड़ी

संपर्क
कस्तूरवानगर पर्णकुटी गुना
मो।९८९३९४६८१०

Monday, 14 November 2016

हिन्दू पर्बो पर तिथियों का निर्णय करने हेतु शास्त्रीय नियम क्या है

प्रश्नः हिंदू पर्वों के निर्णय हेतु कौन-कौन से शास्त्र प्रामाणिक हैं

निष्कर्ष यह है कि विद्यमान देश, काल और परिस्थिति में विषयान्तर्गत प्रामाणिकता की दृष्टि से सर्वधर्मशास्त्रों में ‘निर्णयसिंधु’ ही श्रेयस्कर है।

जन्माष्टमी पद्मपुराण-

उत्तराखंड श्रीकृष्णावतार की कथा में वर्णन मिलता है कि ‘‘दसवां महीना आने पर भादों मास की कृष्णा अष्टमी को आधी रात के समय श्री हरि का अवतार हुआ।’’

महाभारत खिलभाग हरिवंश-

विष्णु पर्व - 4/17 के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजित नामक मुहूत्र्त था, रोहिणी नक्षत्र का योग होने से अष्टमी की वह रात जयंती कहलाती थी और विजय नामक विशिष्ट मुहूत्र्त व्यतीत हो रहा था।’’

श्रीमद्भागवत- 10/3/1 के अनुसार

भाद्रमास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्द्ध रात्रि के समय भगवान् विष्णु माता देवकी के गर्भ से प्रकट हुए।

गर्ग संहिता गोलोकखंड-11/22-24 के अनुसार

‘‘भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण-योग, अष्टमी तिथि, आधी रात के समय, चंद्रोदय काल, वृषभ लग्न में माता देवकी के गर्भ से साक्षात् श्री हरि प्रकट हुए।’’

ब्रह्मवैवर्त पुराण- श्रीकृष्ण जन्मखंड-7 के अनुसार

आधी रात के समय रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग संपन्न हो गया था।

जब अर्ध चंद्रमा का उदय हुआ तब भगवान श्रीकृष्ण दिव्य रूप धारण करके माता देवकी के हृदय कमल के कोश से प्रकट हो गए।

ब्रह्मवैवर्त पुराण- श्रीकृष्ण जन्मखंड-8 के अनुसार

सप्तमी तिथि के दिन व्रती पुरुष को हविष्यान्न भोजन करके संयम पूर्वक रहना चाहिए।
सप्तमी की रात्रि व्यतीत होने पर अरुणोदय की बेला में उठकर व्रती पुरुष प्रातः कालिक कृत्य पूर्ण करने के अनंतर स्नानपूर्वक संकल्प करें। उस संकल्प में यह उद्देश्य रखना चाहिये कि आज मैं श्री कृष्ण प्रीति के लिये व्रत एवं उपवास करूंगा। मन्वादि तिथि प्राप्त होने पर स्नान और पूजन करने से वही फल कोटिगुना अधिक होता है। उस तिथि को जो पितरों के लिये जल मात्र अर्पण करता है, वह मानो लगातार सौ वर्षों तक पितरों की तृप्ति के लिये गया श्राद्ध का संपादन कर लेता है, इसमें संशय नहीं है।
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अतएव स्पष्ट है कि सप्तमीयुक्त अष्टमी को त्याग देना चाहिए और अष्टमी युक्त नवमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतोपवास करना चाहिये।

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निर्णय सिंधु में रचनाकार
श्री कमलाकर भट्टजी ने
वन्ही पुराण,
गरुड़ पुराण,
स्कंद पुराण,
भविष्य पुराण,
ब्रह्म पुराण,
ब्रह्मांड पुराण,
ब्रह्मवैवर्त पुराण,
पद्मपुराण,
विष्णु धर्म,
वशिष्ठ संहिता,
कल्पतरू,
हेमाद्रि,
व्यास,
माधव,
मदन-रत्न,
निर्णयामृत,
अनन्तभट्ट,
गौड़,मैथिल आदि ग्रंथों का परस्पर विरोधी मतों ने उल्लेख किया है। यहां भी और अन्यत्र भी साधारणतः इस व्रत के विषय में दो मत विद्यमान हैं।

स्मात्र्त लोग अर्द्ध रात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी के दिन भी व्रतोपवास करते हैं।

लेकिन वैष्णवों को सप्तमी का किंचित मात्र भी स्पर्श मान्य नहीं।

उनके यहां सप्तमी का स्पर्श होने पर द्वितीय दिवस ही व्रतोत्सव हेतु मान्य है।

चाहे उस दिन अष्टमी क्षण मात्र के लिये ही क्यों न हो।

वल्लभाचार्य,
चैतन्यमहाप्रभु,
निम्बार्काचार्य और रामानंद सम्प्रदायी वैष्णव तो पूर्व दिन अर्द्ध रात्रि से कुछ पल भी सप्तमी अधिक हो, तो भी अष्टमी को उपवास न करके नवमी को ही उपवास करते हैं।

रामानुज संप्रदाय वाले नक्षत्र को ही प्रधानता देते हैं।
उनके यहां तिथि का कोई महत्व नहीं।

शिव रात्रि:

शिव पुराण-विद्येश्वरसंहिता खंड-10 में भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के प्रश्न के उत्तर में भगवान महेश्वर के आदेश विद्यमान हैं कि ‘‘मेरे दर्शन-पूजन के लिये चतुर्दशी तिथि निशीथ व्यापिनी अथवा प्रदोष व्यापिनी (अर्द्धरात्रि व्यापिनी अथवा संध्याकाल व्यापिनी) लेनी चाहिये; क्योंकि परवर्तिनी तिथि से संयुक्त चतुर्दशी की ही प्रशंसा की जाती है।’’

‘‘निशीथसंयुता या तु कृष्णपक्षे च चतुर्दशी। उपोष्या सा तिथिः सर्वेः शिवसायुज्यकारिका।।’’

-स्कन्दपुराण- माहेश्वरखंड-केदारखंड-33/92

‘‘कृष्ण पक्ष में चतुर्दशी अर्धरात्रि व्यापिनी हो, उसमें सबको उपवास करना चाहिये।
वह भगवान् शिव का सायुज्य प्रदान करने वाली है।’
’ स्कंद पुराण- नागर खंड-उत्तरार्द्ध-221 में पृष्ठांकित है

कि ‘‘माघ मास के कृष्ण पक्ष में जो चतुर्दशी तिथि आती है, उसकी रात्रि ही शिव रात्रि है।’’ यहां अमावास्यान्त मास की दृष्टि से माघ मास कहा गया है। जहां कृष्ण पक्ष में मास का आरंभ और पूर्णिमा पर उसकी समाप्ति होती है, उसके अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी में यह शिवरात्रि का व्रत होता है।

निर्णय सिंधु में उद्धृत नारद संहिता और ईशान संहिता का उदाहरण भी यही समझना चाहिए। लिंगपुराण में भगवान् शिव का स्पष्ट कथन है

कि फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावधान होकर कृत्तिवासेश्वर लिंग में जो महादेव की पूजा करते हैं; उनको मैं सदैव मुक्त और रोगरहित परमस्थान देता हूं। निष्कर्ष यह है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अर्द्धरात्रिव्यापिनी चतुर्दशी ही मान्य है।

उदाहरणार्थ

दीपावली: ‘‘

कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को यदि अमावस्या भी हो और उसमें स्वाती नक्षत्र का योग हो तो उसी दिन दीपावली होती है।’’

यह निर्णय स्कंद पुराण-वैष्णवखंड कार्तिक मास-माहात्म्य-

त्रयोदशी से लेकर दीपावली तक के उत्सव कृत्य का वर्णन’

पद्मपुराण- उत्तरखंड-124 के अनुसार

कार्तिक कृष्णाचतुर्दशी को रात्रि के आरंभ में भिन्न-भिन्न स्थानों पर मनोहर दीप लगाने चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि मंदिरों में, गुप्त गृहों में, देववृक्षों के नीचे, सभाभवन में, नदियों के किनारे, चहारदीवारी पर बगीचे में, बावली के तट पर, गली-कूचों में, गृहोद्यान में तथा एकान्त अश्वशालाओं में एवं गजशालाओं में भी दीप जलाने चाहिये।

इस प्रकार रात व्यतीत होने पर अमावस्या को प्रातःकाल स्नान करें और भक्तिपूर्वक देवताओं तथा पितरों का पूजन करें।

निर्णयसिंधु-द्वितीय परिच्छेद के अनुसार

दिवोदासीय में ब्रह्मपुराण का कथन है कि कात्र्तिक की क्षमावस्था युक्त चतुर्दशी को दीपदान करने से मनुष्य यममार्ग के अंधकार से छूट जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस दिन सूर्यास्त पश्चात एक घड़ी अधिक तक अमावस्या रहे उस दिन दीपावली मानी जानी चाहिये।

दोनों दिन सायंकाल में हो तो दूसरे दिन और केवल पहले दिन ही सायंकाल में अमावस्या हो तो पहले दिन दीपावली मानना उचित है।

इस उत्सव के साथ स्वाति नक्षत्र का योग हो जाय तो सोने पर सुहागा माना गया है।

दशहरा:

हेमाद्रौ व्रतकाण्डे कश्यपः ‘‘उदये दशमी किंचित्संपूर्णोकादशी यदि।
श्रवणक्र्षे यदा काले सा तिथिर्विजयार्भिदा।। श्रवणक्र्षे तु पूर्णयां काकुत्स्थ पास्थतो यतः। उल्लंघयेयुः सीमानं तद्दिनक्र्षे न तो नराः ।।’’

-निर्णयसिन्धु-द्वितीय परिच्छेद हेमाद्रि के व्रतकाण्ड में कश्यप ने लिखा है

कि यदि उदयकाल में दशमी किंचित मात्र भी हो और आगे संपूर्ण एकादशी हो तब यदि अपराह्न समय पर श्रवण नक्षत्र हो तो वह विजयादशमी कहलाती है

जिससे श्रवण नक्षत्र में दशमी के दिन श्रीरामचंद्रजी ने प्रस्थान किया है।

इससे मनुष्य उस दिन श्रवण नक्षत्र में ग्राम की सीमा को लंघन करें।

विजयादशमी के विषय में अधिसंख्य लोगों का यह निराधार विचार है कि यह उत्सव भगवान् श्रीरामचंद्र जी के लंका-विजय के उलक्ष्य में प्रारंभ हुआ है,

लेकिन वेद-पुराणों एवं अन्य हिंदू धर्मशास्त्रों में भी कहीं ऐसा उल्लेख नहीं मिलता।

इसलिये इसे लंका विजय का दिन मानना तो कल्पना मात्र ही है।

निर्णय सिंधु के उपरोक्त उल्लेख से यह सिद्ध होता है कि भगवान श्रीरामचंद्रजी ने इस दिन लंका-विजय के लिये प्रस्थान किया था।

अतएव वास्तव में यह दिन लंका-विजय के लिये प्रस्थान दिवस है। भगवान् श्री रामचंद्रजी द्वारा लंका-विजय भारत वर्ष का एक सबसे बड़ा पराक्रम माना जाता है।

क्योंकि उनकी यह यात्रा इसी दिन प्रारंभ हुई थी इसलिये सदा के लिये यह दिन भारतवासियों के लिये विजय मुहूत्र्त बन गया। यही इस दशहरा उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता है।

आश्विन के शुक्ल पक्ष में सूर्योदय के समय यदि दशमी तिथि हो तो उसे पंडित विजयादशमी कहते हैं।

यहां यह मुख्य अर्थ है कि अपराह्न में पूजा आदि के कथन से कर्म में अपराह्न मुख्य समय है और प्रदोष गौण है।

होली:

फाल्गुन की पूर्णिमा को होली कहते हैं।

यह संध्याव्यापिनी ग्रहण करनी चाहिए।
निर्णय सिंधु-द्वितीय परिच्छेद के अनुसार ब्रह्मवैवर्तपुराण, भविष्यपुराण, निर्णयामृत, ज्योतिर्निबंध, हेमाद्रि, मदनरत्न और नारद के अनुसार

फाल्गुन मास की पूर्णिमा प्रदोष व्यापिनी लेनी चाहि

रक्षा बंधन:

निर्णय सिंधु- द्वितीय परिच्छेद के अनुसार भविष्यपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, कल्पतरू, हेमाद्रि, मदनरत्न और निर्णयामृत में पृष्ठांकित है

कि अपराह्न व्यापिनी श्रावण पूर्णिमा को रक्षाबंधन नामक व्रतोत्सव मनाना चाहिये।

यही सिद्ध है। रक्षाबंधन भद्रा (द्वितीय, सप्तमी, द्वादशी) में नहीं मनाना चाहिये।

भैया दूज:

निर्णय सिंधु द्वितीय परिच्छेद के अनुसार भैया दूज का व्रतोत्सव अपराह्नव्यापिनी कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को मनाना चाहिये।

अपने कथन की पुष्टि में रचयिता ने

भविष्य पुराण,
स्कंद पुराण,
ब्रह्मांड पुराण,
हेमाद्रि,
निर्णयामृत आदि का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

धनतेरस:

निर्णयसिंधु-द्वितीय परिच्छेद में उल्लेख मिलता है कि निर्णयामृत में स्कंद पुराण का वाक्य है कि कार्तिक वदी (कृष्ण पक्ष) तेरस को घर से बाहर प्रदोष के समय यमदीपक जलाये तो अकालमृत्यु नष्ट होती है;

उसका मंत्र यह है कि

मृत्यु, पाश, दंड, काल, श्यामासहित यमराज त्रयोदशी के दीपदान से मेरे उपर प्रसन्न हों।

अतएव कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, प्रदोषव्यापिनी त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाना चाहिये।

यद्यपि धनतेरस का व्रतोत्सव मूलतः यमराज को प्रसन्न करने हेतु इस दिन संध्याकाल में एक दीपक जलाकर मुख्य द्वार पर रखा जाता है तथा इसी भांति दीपावली महोत्सव का श्रीगणेश किया जाता है तथापि इसका नामकरण आयुर्वेद के आदि प्रवत्र्तक महर्षि अथवा अधिदेवता भगवान धन्वतरि के जयंती के कारण ही हुआ ऐसा प्रतीत होता है।

वर्तमान में यह धनतेरस औषधि खाद्यान्न पकाने का पात्र खरीदने वाला त्योहार का स्वरूप धारण कर लिया है।

अन्य पर्वों के तिथि निर्णय:
पद्म पुराण-उत्तरखंड के अनुसार यदि अमावस्या अथवा पूर्णिमा साठ दंड की होकर दिन रात अविकल रूप से रहे और दूसरे दिन प्रतिपदा में भी उसका कुछ अंश चला गया हो तो वह ‘पक्षवर्धिनी’ मानी जाती है।

उस पक्ष की एकादशी का भी यही नाम है। वह दस हजार अश्वमेध यज्ञों के समान फल देने वाली होती है।

जब शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘पुनर्वसु’, नक्षत्र हो तो ‘जया’, जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘श्रवण ‘नक्षत्र’ हो तो ‘विजया’, जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘रोहिणी’ नक्षत्र हो तो ‘जयंती’, जब शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘पुष्य’ नक्षत्र हो तो ‘पापनाशिनी’ तिथि कहलाती हैं।

ये सभी व्रतोत्सव पापनाशिनी हैं। जब एक ही दिन-रात (सूर्योदय से सूर्योदय तक) एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी हो तो उसे ‘त्रिस्पृशा’ समझना चाहिये।

उसमें दशमी का योग नहीं होना चाहिये। किसी भी महीने या किसी भी पक्ष में आये, यह ‘त्रिस्पृशा’ व्रत चारों पुरुषार्थों को देने वाली है। सभी मास की सभी पक्षों के एकादशी व्रत उनके नामानुकूल तथा चारों पुरुषार्थ फल प्रदान करने वाले हैं। ध्यान रहे कि कोई भी एकादशी व्रत एकादशी व्रतों का विवरण निम्नांकित हैं। मास का नाम कृष्णपक्ष शुक्ल पक्ष 1. मार्ग शीर्ष उत्पत्ति एकादशी मोक्षदा एकादशी 2.. पौष सफला ’’ पुत्रदा ’’ 3. माघ षट्तिला ’’ जया ’’ 4. फाल्गुन विजया ’’ आमलकी ’’ 5. चैत्र पापमोचिनी ’’ कामदा ’’ 6. वैशाख वरुथिनी ’’ मोहिनी ’’ 7. ज्येष्ठ अपरा ’’ निर्जरा ’’ 8. आषाढ़ योगिनी ’’ शयिनी ’’ 9. श्रावण कामिका ’’ पुत्रदा ’’ 10. भाद्रपद अजा ’’ पद्मा ’’ 11. आश्विन इंदिरा ’’ पापांकुश ’’ 12. कार्तिक रमा ’’ प्रबोधिनी ’’ 13. पुरुषोत्तम कमला ’’ कामदा ’’ (अधिक मास) निर्णय सिंधु - द्वितीय परिच्छेद के अनुसार पुराणसमुच्चय में लिखी हैं कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन मत्स्य, वैशाख अमावस्या- कूर्म, श्रावण शुक्ल षष्ठी वाराह, वैशाख शुक्ल चतुर्दशी- नृसिंह, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी-वामन, वैशाख शुक्ल तृतीया-परशुराम, चैत्र शुक्ल नवमी-श्रीरामचंद्र जी, भाद्रपदकृष्ण अष्टमी - श्रीकृष्णजी, आश्विन शुक्ल दशमी-बुध और श्रावण शुक्ल षष्ठी-कल्की अवतार हुए/होंगे। वामन, परशुराम और श्रीरामचंद्रजी मध्याह्न, मत्स्य और वाराह-अपराह्न, कूर्म, नरसिंह, बुध और कल्की-संध्याकाल तथा श्रीकृष्णचंद्रजी अर्द्ध रात्रि के समय अवतरित हुए।

सामान्यतः उपरोक्त पर्वों के जन्मकाल व्यापिनी तिथि को ही मनाया जाता है।

यही विधि का विधान है और यही तिथि निर्णय।