ज्योतिष समाधान

Tuesday, 8 November 2016

एकादशी निर्णय कैसे करे लिंक ओपन करे

भगवदवतार जगद्गुरु आद्य रामानन्दाचार्य ने प्रपन्न भक्तों और वैष्णवों के कल्याणार्थ व्रतोपवासादि का भी विधान किया है

जिसमें एकादशी, रामनवमी, जानकीनवमी,
हनुमज्जन्मोत्सव, नृसिंहजयन्ती, कृष्णाष्टमी, वामनद्वादशी तथा रथयात्रादि व्रतों एवं उत्सवों में सम्मिलित होने का आदेश भी दिया है।

इन सारे व्रतोत्सवों को कैसे निर्णीत करें इस पर उनका आशीर्वचन भी उपलब्ध है।

परन्तु इस लेख में केवल एकादशी-निर्णय की चर्चा की जायेगी।

एकादशी को हरिवासर कहा गया है।

भविष्यपुराण का वचन है—
शुक्ले वा यदि वा कृष्णे विष्णुपूजनतत्परः।
एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ॥

अर्थात्, विष्णुपूजा परायण होकर दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की ही एकादशी में उपवास करना चाहिये। लिङ्गपुराण में तो और भी स्पष्ट कहा है—
गृहस्थो ब्रह्मचारी च आहिताग्निस्तथैव च। एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥

अर्थात्, गृहस्थ, ब्रह्मचारी, सात्त्विकी किसी को भी एकादशी [दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण)] के दिन भोजन नहीं करना चाहिये। अब प्रश्न उठता है कि एकादशी व्रत का निर्धारण कैसे हो?

वशिष्ठस्मृति के अनुसार दशमी विद्धा एकादशी संताननाशक होता है और विष्णुलोकगमन में बाधक हो जाता है।
यथा—
दशम्येकादशी यत्र तत्र नोपवसद्बुध:।
अपत्यानि विनश्यन्ति विष्णुलोकं न गच्छति॥

अतः यह परमावश्यक है कि एकादशी दशमीविद्धा (पूर्वविद्धा) न हो। हाँ द्वादशीविद्धा (परविद्धा) तो हो ही सकती है

क्योंकि

‘पूर्वविद्धातिथिस्त्यागो वैष्णवस्य हि लक्षणम्’
(नारदपाञ्चरात्र)।
लेकिन वेध-निर्णय का सिद्धान्त भी सर्वसम्मत नहीं है। निम्बार्क सम्प्रदाय में स्पर्शवेध प्रमुख है।उनके अनुसार यदि सूर्योदय में एकादशी हो परन्तु पूर्वरात्रि में दशमी यदि आधी रात को अतिक्रमण करे अर्थात् दशमी यदि सूर्योदयोपरान्त ४५ घटी से १ पल भी अधिक हो तो एकादशी त्याग कर महाद्वादशी का व्रत अवश्य करे।

यथा— अर्धरात्रमतिक्रम्य दशमी दृश्यते यदि। तदा ह्येकादशीं त्यक्त्वा द्वादशीं समुपोषयेत्॥

(कूर्मपुराण)। परन्तु कण्व स्मृति के अनुसार अरुणोदय के समय दशमी तथा एकादशी का योग हो तो द्वादशी को व्रत कर त्रयोदशी को पारण करना चाहिये। यथा—

अरुणोदयवेलायां दशमीसंयुता यदि ।
तत्रोपोष्या द्वादशी स्यात्त्रयोदश्यां तु पारणम्॥

यहाँ पुराण और स्मृति के निर्देश में भिन्नता पायी जा रही है अतः शास्त्र-सिद्धान्त से स्मृति-वचन ही बलिष्ठ होता है। अतः यही सिद्धान्त बहुमान्य है। अपने रामानन्द-सम्प्रदाय का मत है

कि वैष्णवों को वेध रहित एकादशी का व्रत रखना चाहिये।यदि अरुणोदय-काल में एकादशी दशमी से विद्धा हो तो उसे छोड़कर द्वादशी का व्रत करना चाहिये—

एकादशीत्यादिमहाव्रतानि कुर्याद्विवेधानि हरिप्रियाणि।
विद्धा दशम्या यदि साऽरुणोदये स द्वादशीन्तूपवसेद्विहाय ताम्॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ६७)।

उदाहरणार्थ,

भाद्रपद शु. ११ रविवार २०७० को उदया तिथि में एकादशी तो है पर पूर्ववर्ती दिन (शनिवार) दशमी की समाप्ति २८:४६ बजे हो रही है जो सूर्योदय (५:५२ बजे) से मात्र १घंटा ६ मि. अर्थात् पौने तीन घटी पहले है अतः अरुणोदय काल (२८:१६ बजे) में यह एकादशी दशमी-विद्धा है।

फलतः इसे त्यागकर भाद्रपद शु. १२ सोमवार को पद्मा एकादशी का व्रत विहित है।

यह वेध भी चार प्रकार का होता है-
(१) सूर्योदय से पूर्व साढ़े तीन घटी का काल अरुणोदय वेध है
(२) सूर्योदय से पूर्व २ घटी का काल अति-वेध है (३) सूर्य के आधे उदित हो जाने पर महावेध काल है तथा
(४) सूर्योदय में तुरीय योग होता है।

यथा—

घटीत्रयंसार्द्धमथारुणोदये वेधोऽतिवेधो द्विघटिस्तुदर्शनात्।
रविप्रभासस्य तथोदितेऽर्द्धे सूर्येमहावेध इतीर्यते बुधैः॥
योगस्तुरीयस्तु दिवाकरोदये तेऽर्वाक् सुदोषातिशयार्थबोधकाः।

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७१-७२)।

सूर्योदयकाल से पूर्व दो मुहुर्त संयुक्त एकादशी शुद्ध है और शेष सभी विद्धा हैं—

पूर्णेति सूर्योदयकालतः या प्राङ्मुहूर्तद्वयसंयुता च।
अन्या च विद्धा परिकीर्तिता बुधैरेकादशी सा त्रिविधाऽपि शुद्धा॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७३)।

शुद्धा एकादशी के भी तीन भेद हैं।
यथा—
एका तु द्वादशी मात्राधिका ज्ञेयोभयाधिका। द्वितीया च तृतीया तु तथैवानुभयाधिका॥
तत्राद्या तु परैवास्ति ग्राह्या विष्णुपरायणैः। शुद्धाप्येकादशी हेया परतो द्वादशी यदि ॥
उपोष्य द्वादशीं शुद्धान्तस्यामेव च पारणम्। उभयोरधिकत्वे तु परोपोष्या विचक्षणैः॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७४-७६)

अर्थात्, एक वह जिसमें केवल द्वादशी अधिक हो, दूसरी जिसमें दोनों अधिक हों तथा तीसरी जिसमें दोनों में कोई भी अधिक न हो। (अब इनमें से किसे ग्रहण किया जाय।

जगद्गुरु आद्य रामानन्दाचार्य-चरण का आदेश है –)
इनमें से वैष्णवों को प्रथम एकादशी अर्थात् द्वादशी मात्र का ग्रहण करना चाहिये, यदि परे द्वादशी की वृद्धि हो तो शुद्ध एकादशी भी छोड़ देनी चाहिये।

विज्ञ-जनों को एकादशीरहित शुद्ध षष्ठीदण्डात्मक द्वादशी में उपवास कर अगले दिन अवशिष्ट द्वादशी में ही पारण भी कर लेना चाहिये।

दोनों की अधिकता में पर का उपवास करना चाहिये।

आगे आचार्य-चरण ने अष्टविध एकादशी का वर्णन इस प्रकार किया है—

उन्मीलिनी वञ्जुलिनी सुपुण्याः सा त्रिस्पृशाऽथो खलु पक्षवर्द्धिनी ।
जया तथाऽष्टौ विजया जयन्ती द्वादश्य एता इति पापनाशिनी॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७७)

अर्थात्, उन्मीलिनी, वञ्जुलिनी, त्रिस्पर्शा, पक्षवर्द्धिनी, जया, विजया, जयन्ती और पापनाशिनी ये आठ द्वादशियाँ अत्यन्त पवित्र हैं।

पद्मपुराणानुसार भी—

एकादशी तु संपूर्णा वर्द्धते पुनरेव सा।
द्वादशी न च वर्द्धेत कथितोन्मीलिनीति सा॥ संपूर्णैकादशी यत्र द्वादशी च यथा भवेत्। त्रयोदश्यां मुहुर्त्तार्द्धं वञ्जुली सा हरिप्रिया॥ शुक्ले पक्षेऽथवा कृष्णे यदा भवति वञ्जुली। एकादशीदिने भुक्त्वा द्वादश्यां कारयेद्व्रतम्॥

यहाँ स्पष्टतः कहा गया है कि शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष को यदि वञ्जुली हो तो एकादशी को भोजन कर द्वादशी का व्रत करें।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी यह वर्णन आया है।
यथा—

एकादशी भवेत्पूर्णा परतो द्वादशी भवेत्।
तदा ह्येकादशीं त्यक्त्वा द्वादशीं समुपोषयेत्॥ पर्वाच्युतजयावृद्धौ ईश दुर्गान्तकक्षये। शुद्धाष्येकादशी त्याज्या द्वादश्यां समुपोषणम् ॥

इनमें चार तिथिजन्य और चार नक्षत्रजन्य हैं जो इस प्रकार हैं
- १. उन्मीलनी अरुणोदय काल में सम्पूर्ण एकादशी अगले दिन प्रातः द्वादशी में वृद्धि को प्राप्त हो परन्तु द्वादशी की वृद्धि किसी भी दशा में न हो।
२. वञ्जुली:- एकादशी की वृद्धि न होकर द्वादशी की वृद्धि हो अर्थात् त्रयोदशी में मुहुर्तार्ध द्वादशी हो। (पारण द्वादशी मध्य होनी चाहिये)। उदाहरणार्थ आश्विन कृष्ण ११ सोमवार २०७० को एकादशी रहते हुए भी द्वादशी की वृद्धि परिलक्षित हो रही है अतः इन्दिरा एकादशी व्रत को सोमवार को त्यागकर मंगलवार को वञ्जुली महाद्वादशी के रुप में की जायेगी।ध्यान रहे कि पारण द्वादशी मध्य विहित होने के कारण इसे ०६:०४ तक कर लेनी चाहिए।

३. त्रिस्पर्शा:- अरुणोदय काल में एकादशी, सम्पूर्ण दिन-रात्रि में द्वादशी तथा पर दिन त्रयोदशी हो, किन्तु किसी भी दशामें दशमीयुक्त नहीं हो।

४. पक्षवर्द्धिनी:- अमावस्या अथवा पूर्णिमा की वृद्धि ।यथा वैशाख कृष्ण ११ रविवार २०७० को एकादशी वर्तमान होते हुये भी अमावस्या की वृद्धि होने के कारण वैशाख कृष्ण १२ सोमवार (पक्षवर्द्धिनी महाद्वादशी) को वरुथिनी एकादशी का उपवास विहित है।

चार नक्षत्रयुक्त महाद्वादशी व्रत ये हैं

यदि शुक्लपक्षीय द्वादशी

१.पुनर्वसुयुता (जया)
२. श्रवणयुता (विजया)
३. रोहिणीयुता (जयन्ती) तथा
४. पुष्ययुता (पापनाशिनी)। एकादशी (महाद्वादशी) व्रतोपवास का अन्त पारण के साथ होता है।

कूर्मपुराणानुसार एकादशी को व्रत एवं द्वादशी को पारण होना चाहिए।

किन्तु त्रयोदशी को पारण नहीं होना चाहिए, क्योंकि वैसा करने से १२ एकादशियों के पुण्य नष्ट हो जाते हैं ।

उदाहरणार्थ

चैत्र शु. ११ सं. २०७० (२२ अप्रिल २०१३ सोमवार) के दिन कामदा एकादशी है
अतः परवर्ती दिन मङ्गलवार अर्थात् २३ अप्रिल २०१३ को पारण करना होगा।
परन्तु ध्यान रहे कि पारण सूर्योदयोपरान्त ७:४९ बजे के पहले ही कर लेना होगा।
परन्तु एक दिन पूर्व दशमीयुक्ता एकादशी हो और दूसरे दिन एकादशीयुक्ता द्वादशी तो उपवास तो द्वादशी को होता है, किन्तु यदि उपवास के बाद द्वादशी न हो तो त्रयोदशी के दिन पारण होगा।

उदाहरणार्थ

फाल्गुन कृष्ण ११ मंगलवार सं. २०७० (२५ फरवरी २०१४) के अरुणोदयकाल में दशमी है

और सूर्योदय में एकादशी है अतः आचार्य-चरण के अनुसार यह एकादशी दशमीविद्धा अतः अकरणीय है।
अतः विजया एकादशी का व्रतोपवास फाल्गुन कृष्ण १२ बुधवार सं. २०७० (२६ फरवरी २०१४) को होगा ।
परन्तु अगले दिन गुरुवार २७ फरवरी २०१४ को त्रयोदशी तिथि है अतः द्वादशी तिथि की अप्राप्ति में त्रयोदशी को ही पारण होगा।

जैसा कि वायुपुराण में कहा है-
कलाप्येकादशी यत्र परतो द्वादशी न चेत्।
पुण्यं क्रतुशतस्योक्तं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥

एक और भी बात। पारण में आचार्य-चरण ने यह भी आदेश किया है कि

आषाढ़भाद्रोर्जसितेषु संगता मैत्रश्रवोऽन्त्यादिगताद्व्युपान्त्यैः।
चेद्द्वादशी तत्र न पारणं बुधः पादैः प्रकुर्याद्व्रतवृंदहारिणी॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७८)।

अर्थात् यदि द्वादशी
आषाढ़,
भाद्र
और कार्तिक मास
शुक्ल पक्ष में अनुराधा, श्रवण, रेवती के आदि चरण, द्वितीय चरण और तृतीय चरण के साथ संयुक्त हो तो उसमें विद्वान् पारण न करे, क्योंकि वह समस्त व्रतों का नाशक है।

अतः व्रतोपवास हेतु एकादशी-निर्णय एवं व्रत-समाप्ति के लिए उसके पारण-काल का निर्णय एकादशी का परमावश्यक अङ्ग है।

यहाँ पर यह भी ध्यान देना गौरव की बात है

कि एकादशी-सम्बन्धी आचार्यचरणनिर्दिष्ट उपरोक्त व्यवस्था हेमाद्रि (चतुर्वर्ग चिन्तामणि के रचयिता, कालखंड १२६०-७०) तथा चंडेश्वर
(गृहस्थरत्नाकर आदि के रचयिता, कालखंड १३००-१३७०) के समकालीन है
जिसका बहुत से विज्ञजन व्यवहार कर रहे हैं परन्तु उनके लिए तो रौरव की बात है जो लोग इसे अपनी परम्परा द्वारा उपदिष्ट मान रहे हैं । धर्म की आड़ में सत्य को छिपाना भी महान अधर्म है जिससे वैष्णवों को बचना चाहिए। ॥




कौन सी एकादसी का क्या नाम है

एकादशी का नाममासपक्ष

१】कामदा एकादशीचैत्रशुक्ल
२】वरूथिनी एकादशीवैशाखकृष्ण
३】मोहिनी एकादशीवैशाखशुक्ल
४】अपरा एकादशीज्येष्ठकृष्ण
५】निर्जला एकादशीज्येष्ठशुक्ल
६】योगिनी एकादशीआषाढ़कृष्ण
७】देवशयनी एकादशीआषाढ़शुक्ल
८】कामिका एकादशीश्रावणकृष्ण
९】पुत्रदा एकादशीश्रावणशुक्ल
१०】अजा एकादशीभाद्रपदकृष्ण
११】परिवर्तिनी एकादशीभाद्रपदशुक्ल
१२】इंदिरा एकादशीआश्विनकृष्ण
१३】पापांकुशा एकादशीआश्विनशुक्ल
१४】रमा एकादशीकार्तिककृष्ण
१५】देव प्रबोधिनी एकादशीकार्तिकशुक्ल
१६】उत्पन्ना एकादशीमार्गशीर्षकृष्ण
१७】मोक्षदा एकादशीमार्गशीर्षशुक्ल
१८】सफला एकादशीपौषकृष्ण
१९】पुत्रदा एकादशीपौषशुक्ल
२०】षटतिला एकादशीमाघकृष्ण
२१】जया एकादशीमाघशुक्ल
२२】विजया एकादशीफाल्गुनकृष्ण
२३】आमलकी एकादशीफाल्गुनशुक्ल
२४】पापमोचिनी एकादशीचैत्रकृष्ण
२५】पद्मिनी एकादशीअधिकमासशुक्ल
२६】परमा एकादशीअधिकमासकृष्ण विधि

Sunday, 6 November 2016

अगर आप मंगली है तो मंगल और दाम्पत्य सुख जानने के लिए

ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणों को आधार मानकर हर एक भाव एवं राशि मंगल के भाव में विभिन्नता होती है| जिस कारण कुण्डलीगत मंगल की परिस्थितियां ही बदल जाती हैं| इस प्रकार कुंडली के अनुसार मंगल के नैसर्गिक प्रभावों का आंकलन करने से सहूलियत होती है| विचारणीय विषय हैं :

१. मंगल ग्रह की प्रकृति क्या है?
२. यह किस भाव में स्थित है और वह भाव शुभ है या अशुभ?
३. मंगल अपने उंच-नींच स्वराशी में तो नहीं है? अगर है तो इसके प्रभाव में क्या परिवर्तन होता है|
४.क्या मंगल सभी राशियों या भावों में एक जैसा ही पाप ग्रह होने के नाते पाप फल देता है? ५. मंगल चर-स्थिर-द्वीस्वभाव राशि हो तो क्या परिणाम एवं प्रभाव एक ही जैसे होंगे?
६. मंगल दोष केवल पति/पत्नी की मृत्यु तक ही सीमित है या दाम्पत्य जीवन में अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित करता है? उपयुक्त तथ्यों का सही सही ज्ञान कर ही कुण्डली को मांगलिक दावे से युक्त या मुक्त कर सकते हैं|

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार परिहार- यह शब्द पुलिंग है| बल पूर्वक छिनने की क्रिया अन्य या छुट माफ़ी आदि परिहार में आते है| अर्थात जो मंगल दोष पूर्ण भावों में रहते हुए भी अनिष्ट फल देने में रियायत या छुट फल देता हो उसे ही मांगलिक परिहार कहते हैं| इस तरह के निर्णय से कुण्डली में अन्य कोई दोष रह ही नहीं जाता और वह कुण्डली पूर्ण शुद्ध अर्थात निर्दोष हो जाती है| संक्षेप परिहार- मंगल दोष परिहार संबंधित जो भी प्रमाण प्रस्तुत किये जा रहे हैं वह सभी विभिन्न ग्रंथों में दिया जा चूका है| ये सर्वथा उपयुक्त तथा प्रमाणित है|

इन निम्नलिखित परिहों का उपयोग कर मांगलिक दोषजन्य उलझन से बहुत हद तक छुटकारा पाया जा सकता है|

१】स्त्रीणां वैधव्यदोयोगः पुंसां जन्मनिच्चेभ्वेत्|
तदा पत्नी विनाशः स्यादुभयोच्स्रेछुभं स्मृतम्|| ~बृहदपराशर स्त्रीजातक फलाध्याय श्लोक ५०-

अर्थ- स्त्रियों का वैधव्य योग कारक ग्रह पुरुष की कुण्डली में (१,४,७,८,१२)हो तो स्त्री का मरण होता है| अगर वर वधू दोनों की कुण्डली में यह स्थिति हो तो दोनों मांगलिक दोष से मुक्त होता है, तथा दोनों का कल्याण होता है|

२】कुज दोषवती देया कुजदोषवते किल| नास्तिदोषो न चानिष्टं दम्पत्योः सुख वर्धनम्| ~महूर्त चिंतामणि परिशिष्ट ५०-

अर्थ- मंगल दोष वाली कन्या, मंगल दोष वाले वर को देने से मंगल का दोष नहीं होता और कोई अनिष्ट भी नहीं होता| साथ ही वर वधू का दाम्पत्य सुख बढ़ता है|

३】भौमेन सदृशो भौमः पापो वा तादृशो भवेत्| विवाहः शुभदः प्रोक्ताञ्चिरायुः पुत्रपौत्रदः|| ~वृहद् ज्यौतिष पि. प्र. श्लोक १२

अर्थ- लड़का/लड़की की कुण्डली में मंगल या अन्य पापग्रह समान (दोनों कुण्डली के) भाव में स्थित हो तो विवाह शुभ तथा पुत्र पौत्रादि को देने वाला होता है|

४】शनि भौमोअथवा कश्चित्पापो वा तादृशो भवेत| तेष्वेव भवनेष्वेव भौमदोष विनाशकृत||
~मु. चि. न. सं. परिशिष्ट

अर्थ- किसी एक की कुण्डली में अनिष्ट (१/४/७/८/१२) स्थानस्थित शनि मंगल अथवा अन्य पाप ग्रह हो और दूसरे की कुण्डली में उसी स्थान में पापग्रह हो तो मांगलिक दोष नहीं होता| वैधव्य दोष का नाश होता है|

५】जन्म लग्ने यदा सौरी सप्तमे हिबुकेअथवा| अष्टमे द्वादशे वापि भौम दोष विनाशकृत|| ~चमत्कार चि. पृ. १८२ टीका

अर्थ- बड़े-बड़े आचार्यों का मत है कि वर वधू की किसी एक की कुण्डली में मंगल अनिष्ट स्थान में बैठा हो और दूसरी कुण्डली में शनि भी उक्त अनिष्ट में ही स्थित हो तो मांगलिक दोष नहीं होता|

६】सप्तमे च यदा सौरिर्लाग्ने वापि चतुर्थके|
अष्टमे द्वादशे चैव तदा भौमो न दोष कृत||
~बृहद ज्योतिष वि. प्र. श्लोक १३

अर्थ- यदि वर वधू में से किसी एक कुण्डली में मंगल सप्तम लग्न चतुर्थ अष्टम एवं द्वादश भावों में से किसी एक स्थान में हो और दूसरी कुण्डली में उक्त स्थान (१/४/७/८/१२) में से किसी भी स्थान में मंगल न हों किन्तु शनि हो तो परस्पर मंगल का दोष नहीं होता है|

७】उक्तस्थानेषु चन्द्राच्च गणयेत् पापखेचरान्| पापधिक्ये वरे श्रेष्ठं विवाहं प्रवदेद् बुधः||
~वृहद् ज्योतिष पि.प्र. श्लोक १४-

अर्थ- जिस तरह लग्न से (१/४/७/८/१२) वें भाव में मंगल या अन्य पाप ग्रह को अनिष्ट कहा गया है उसी तरह चन्द्र से भी उक्त स्थान में पाप ग्रह अनिष्ट होते हैं| इसलिए वर की कुण्डली में लग्न और चन्द्र से युक्त स्थान में पाप ग्रह की संख्या गिने और कन्या की कुण्डली में भी लग्न एवं चन्द्र से युक्त स्थानों में पाप ग्रह की संख्या समझें| यदि कन्या से वर की पाप ग्रह संख्या अधिक हो तो विवाह सम्बन्ध श्रेष्ठ होता है किन्तु कन्या की पाप संख्या अधिक होने पर अशुभ होता है|

८】वक्रिणी निचारिस्थे वार्कस्थे वा न कुजदोषः नीचराशिगतः सोअयं शत्रुक्षेत्रगतोअपि वा| शुभाशुभ फ़लं नैवं दद्यास्तंगतोअपि च|| ~ मु.चि.परि. प्र.पृ.१९६

अर्थ- जन्म समय में कुण्डलीगत मंगल नीच का कर्क राशि में या शत्रु राशि (मिथुन-कन्या में या वक्री अस्त वृद्धावस्था अथवा मृत अवस्था (२५ से ३० अंश पर) में हो तो शुभ या अशुभ फल देने में असमर्थ होता है| इस प्रकार मांगलिक दोष नहीं होता|

९】शुभ योगादिकर्तृत्वेअशुभं कुरुते कुजः ~मु.चि.परिशिष्ट प्र.पृ.१९५

अर्थ- शुभ ग्रहों के साथ शुभ सम्बन्ध करने वाला मंगल अशुभ कारक नहीं होता| लड़का/लड़की की कुण्डली में चन्द्र और शुक्र द्वितीय स्थान में हो या मंगल वृहस्पति के साथ में हो या वृहस्पति मंगल एवं राहू को पूर्ण दृष्टि से देखता हो या राहू केन्द्रस्थ होकर शुभ ग्रह के साथ हो या मंगल और राहू एक साथ किसी अनिष्ट स्थान में योग करता हो तो मांगलिक दोष नहीं होता है|

१०】लग्नाद्विधोर्वा यदि जन्म काले शुभग्रहो वा मदनाधिपश्च| द्युनस्थितो हन्त्यनपत्यदोषं वैधव्यदोषं च विषांगनाख्यम्||
~बृहत्पराशर स्त्री जातक फलाध्याय श्लोक ४६

अर्थ- यदि जन्म समय जातक/जातिका की कुण्डलीगत जन्म में चन्द्रमा हो तो सप्तम स्थान में शुभ ग्रह बैठें हों अथवा सप्तमेश सप्तम स्थान में ही बैठा हो तो ऐसी स्थिति में मंगलादि पापग्रहों की स्थिति किसी भी अनिष्ट स्थान में होने पर वैधव्ययोग और विष कन्या जन्य दोष नहीं होता है|

११】 बुधार्ययुक्तेअप्यथवा निरीक्षिते तद्योषनाशं प्रवदन्तिसन्तः|
~विवाह विमर्श द्वितीयाध्याय श्लोक १३

अर्थ- यदि मंगल बुध और वृहस्पति के साथ बैठा हो तो मंगल दोष नहीं होता अथवा मंगल बुध और वृहस्पति से दृष्ट हों तो भी मंगल दोष नहीं होता| उक्त परिहार में भाव इंगित नहीं किया गया है| इस हेतु द्वादश लग्न विमर्श का अध्ययन कर बुध एवं गुरु से मंगल का विचार करें-

१२】कुजः कर्क लग्नस्थो न कदाचन दोषकृत| ~मु.ची. परिषिष्ट प्र.पृ.१९६

अर्थ- यदि मंगल स्वग्रिहि (मेष-वृश्चिक) राशि का हो उच्चराशि (मकर) का हो अथवा मित्र गृही हो तो दोष कारक नहीं होता | उपरोक्त स्थिति द्वादश लग्न विमर्श में स्पस्ट किया गया है| इस कथन में भाव स्पस्ट नहीं है लग्नवश उक्त स्थिति में परिवर्तन हो सकता है |

१३】अजेलग्ने, व्ययेचापे पातालेव्रिश्चिके कुजे| द्यूनेमिने घटेचाष्टौ भौमदोषो न विद्दते ~मु.चि.परिषिष्त प्र.पृ.१९६ श्लोक ७

अर्थ- जातक/जतिका की कुण्डलीगत मेष राशि का मंगल लग्न में धनु राशि का मंगल द्वादश स्थान में वृश्चिक का मंगल चतुर्थ स्थान में मीन का मंगल सप्तम स्थान में और कुम्भ राशि का मंगल अष्टम स्थान में हो तो मंगल का दोष नहीं होता|

१४】कुजो जीवसमायुक्तो युक्तो वा शशिना यदा| चन्द्रःकेन्द्रगतो वापि तस्य दोषो न मङ्गली|| ~मु.चि.परिशिष्ट प्र.पृ१९६

अर्थ- जिस जातक/जातिका की कुण्डली में चौथे, सप्तम, अष्टम एवं बारहवें आदि अरिष्ट कारक स्थानों में से किसी एक स्थान में मंगल वृहस्पति के साथ अथवा चन्द्रमा के साथ बैठा हो किंवा चन्द्रमा केंद्र में स्थित हो तो वह कुण्डली मांगलिक नहीं होती|

१५】चतुः सप्तमगे भौमे मेष कर्कालिनक्रगे|
कुजदोषो न तत्र स्यात्स्वोच्चादिराशियोगतः| ~मु. चि.परिषिष्त प्र.पृ.१९६

अर्थ- लड़का/लड़की की कुण्डली गत केंद्र (१,४,७,१०) स्थान और त्रिकोण (९/५)स्थान में यदि शुभ ग्रह हों तथा (३/६/११) स्थान में पाप ग्रह हो और सप्तमेश सप्तम भाव में ही बैठे हो तो मांगलिक दोष नहीं होता है |

१६】 द्वितीये भौमदोषस्तु युग्मकन्यक योर्विना|| ~विवाह विमर्श श्लोक-२२

अर्थ- द्वीतीय भावास्थित मंगल मिथुन एवं कन्या राशि का हो तो मंगल दोष नहीं होता है |
द्वादशे भौमदोषस्तु मेशवृश्चिकयोर्विना| ~मु.चि.हिंदी टीका

अर्थ- स्वगृही (मेष-वृश्चिक)का मंगल कुण्डली में चतुर्थ भाव में हो तो मांगलिक नहीं होता |

१७】सप्तमे भौमदोषस्तु न कर्कटयोविना| ~मु.चि.हिंदी टिका

अर्थ- कुण्डलीगत मंगल कर्क और मकर राशि का होकर सप्तम भाव में बैठा हो तो मंगल का दोष नहीं होता |

१८】कुम्भे सिंहे न दोषः स्याद्विशेषेण कुजस्य च| ~मु.चि.हिंदी टीका

अर्थ- यदि जन्म कुण्डलीगत मंगल कुम्भ एवं सिंह राशि का होकर अनिष्ट स्थान (१/४/७/८/१२)में बैठा हो तो अनिष्ट फल नहीं देता है |

१९】सिंहे लग्ने व्ययेचापे पाताले वृश्चिके कुजः|
द्यूने मृगेकर्किणाष्टो भौम दोषो न विद्यते|| ~मु.चि. हिन्दी टीका

अर्थ- जातक/जातिका की कुण्डली में मंगल सिंह राशि का होकर लग्न में धनु राशि का द्वादश स्थान में वृश्चिक राशि का मंगल चतुर्थ स्थान में मकर राशि का सप्तम भाव में कर्क राशि का मंगल अष्टम में हो तो कुण्डली मांगलिक नहीं होती

मंगलदोष का अन्य परिहार
(१) चर राशि (मेष, कर्क, तुला और मकर) में स्थित होकर मंगल (१/२/४/८/१२) भावों में से किसी भी भाव में बैठा हो तो मांगलिक नहीं होता| परन्तु सप्तम में होता है| देखें लग्न विमर्श--

(२) मेष लग्न स्थित कुण्डली में मंगल किसी भी भाव में हो मांगलिक नहीं होता| कुण्डली शुद्ध होती है|

(३) सिंह लग्न की कुण्डली में मंगल किसी भी भाव में हो फिर भी मंगल का दोष नहीं होता है|

(४) मंगल कुण्डली में २२ अंश से ऊपर का होकर किसी अनिष्ट भाव में बैठा हो तो दोष नहीं होता|

(५) किसी भी अनिष्ट (१/४/७/८/१२)भाव में मंगल और शुक्र की युति हो अथवा शुक्र की दृष्टि अनिष्ट स्थित मंगल पर हो तो मंगल दोष नहीं होता|

(६) शुक्र और गुरु बलवान होकर सातवें स्थान में बैठे हों तो अनिष्ट स्थानिस्त मंगल का दोष नहीं होता|

(७) शुक्र अशुभ स्थान में पाप ग्रहों युक्त और पाप ग्रहों से दृष्ट न हो तो अनिष्ट स्थानस्थिति मंगल दोष नहीं होता|

(८) सातवें भाव में शुक्र और शनि की युति हो तो मंगल दोष नहीं होता|

(९) सातवें घर का स्वामी कोई भी ग्रह शुक्र के साथ हो और मंगल अनिष्ट स्थानास्थिति हो तो मंगल दोष नहीं होता|

(१०) सातवें घर का स्वामी वृहस्पति हो आयर केंद्र में स्थित हो तो मंगल का दोष नहीं होता| यह परिहार केवल सप्तमस्थ मंगल का है|

(११) मंगल जिस राशि में बैठा हो उसका स्वामी यदि कुण्डलीगत केन्द्र (१/४/७/१०) या त्रिकोण (५/९) में स्थित हो तो मंगल का दोष नहीं होता| इस तरह परिहार के अनेकों मत अपनायें गए हैं| इन में कहीं कहीं कुछ अधिक कह दिया गया है जो नहीं होना चाहिए ये विद्वानों का मानना है| उचित एवं सही परिहार जानने हितु पाठकगण पूर्ण लिखित द्वादश लग्न विमर्श से मिलान कर लेंगे| लग्न के आधार पर की गयी समीक्षा के अतिरिक्त अन्य स्थान स्थित मंगल दोष का परिहार भी यथोचित ही है| इसलिए अभिभावकों को कुण्डलीगत मंगल दोष उत्पन्न होने से निराश नहीं होना चहिये| मंगल दोष यदि बाधक हो तो स्थितिवश वही मंगलसाधक भी होता है| इससे सम्बन्धित अनेको उदहारण एवं प्रमाण प्रस्तुत किये जा चुके हैं|

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