ज्योतिष समाधान

Wednesday, 2 November 2016

विबाह कितने प्रकार के होते है

1.】 ब्रह्म विवाह दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "Arranged Marriage" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।

2.】 दैव विवाह किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।

3. 】आर्श विवाह कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है।

4.】 प्रजापत्य विवाह कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।

5. 】गंधर्व विवाह परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से 'गंधर्व विवाह' किया था. उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम "भारतवर्ष" बना।

6.】 असुर विवाह कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।

7.】 राक्षस विवाह कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।

8】. पैशाच विवाह कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है।

सात फेरो के सात बचन क्या है

सात फेरों के सात वचन विवाह के बाद कन्या वर के वाम अंग में बैठने से पूर्व उससे सात वचन लेती है। कन्या द्वारा वर से लिए जाने वाले सात वचन इस प्रकार है।

१】प्रथम वचन तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!

(यहाँ कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।) किसी भी प्रकार के धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य माना गया है। जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है। पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है।

२】द्वितीय वचन पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!

(कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।) यहाँ इस वचन के द्वारा कन्या की दूरदृष्टि का आभास होता है। आज समय और लोगों की सोच कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि अमूमन देखने को मिलता है--गृहस्थ में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद की स्थिति उत्पन होने पर पति अपनी पत्नि के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देता है। उपरोक्त वचन को ध्यान में रखते हुए वर को अपने ससुराल पक्ष के साथ सदव्यवहार के लिए अवश्य विचार करना चाहिए।

३】तृतीय वचन जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात, वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!

(तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ।)

४】चतुर्थ वचन कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!

(कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ।) इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती है। विवाह पश्चात कुटुम्ब पौषण हेतु पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऐसी स्थिति में गृहस्थी भला कैसे चल पाएगी। इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हो सके। इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो, पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे।

५】पंचम वचन स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!

(इस वचन में कन्या जो कहती है वो आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है। वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।) यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है। बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नी से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते। अब यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नी से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नी का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है।

६】षष्ठम वचनः न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत, वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!

(कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।) वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं। विवाह पश्चात कुछ पुरुषों का व्यवहार बदलने लगता है। वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नी को डाँट-डपट देते हैं। ऐसे व्यवहार से पत्नी का मन कितना आहत होता होगा। यहाँ पत्नी चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्हीं दुर्व्यसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले।

७】सप्तम वचनः परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!

(अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें। यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।) विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है। इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है।

लक्ष्मी जी की बड़ी बहन*( दरिद्रा )* किसके यहा रहती है

लक्ष्मीजी की बडी बहन दरीद्रा (ज्येष्ठा) का निवास एवं कथा :--

कार्तिक मास की द्वादशी तिथि को पिता समुद्र ने दरिद्रा देवी का कन्यादान कर दिया। विवाह के बाद दु:सह ऋषि जब दरिद्रा को लेकर अपने आश्रम पर आए तो उनके आश्रम में वेदमन्त्र गुंजायमान हो रहे थे। वहां से ज्येष्ठा दोनों कान बंद कर भागने लगी। यह देखकर दु:सह मुनि उद्विग्न हो गये क्योंकि उन दिनों सब जगह धर्म की चर्चा और पुण्यकार्य हुआ करते थे। सब जगह वेदमन्त्रों और भगवान के गुणगान से बचकर भागते-भागते दरिद्रा थक गई। तब दरिद्रा ने मुनि से कहा– ’जहां वेदध्वनि, अतिथि-सत्कार, यज्ञ-दान, भस्म लगाए लोग आदि हों, वहां मेरा निवास नहीं हो सकता। अत: आप मुझे किसी ऐसे स्थान पर ले चलिए जहां इन कार्यों के विपरीत कार्य होता हो। दु:सह मुनि उसे निर्जन वन में ले गए। वन में दु:सह मुनि को मार्कण्डेय ऋषि मिले।

दु:सह मुनि ने मार्कण्डेय ऋषि से पूछा कि ‘इस भार्या के साथ मैं कहां रहूं और कहां न रहूं?’

दरिद्रा के प्रवेश करने के स्थान :- ********************** मार्कण्डेय ऋषि ने दु:सह मुनि से कहा–

जिसके यहां शिवलिंग का पूजन न होता हो तथा जिसके यहां जप आदि न होते हों बल्कि रुद्रभक्ति की निन्दा होती हो, वहीं पर तुम निर्भय होकर घुस जाना। जहा पति-पत्नी परस्पर झगड़ा करते हों, घर में रात्रि के समय लोग झगड़ा करते हों, जो लोग बच्चों को न देकर स्वयं भोज्य पदार्थ खा लेते हों, जो स्नान नहीं करते, दांत-मुख साफ नहीं करते, गंदे कपड़े पहनते, संध्याकाल में सोते व खाते हों, जुआ खेलते हों, ब्राह्मण के धन का हरण करते हों, परायी स्त्री से सम्बन्ध रखते हों, हाथ-पैर न धोते हों, उस घर में तुम दोनों घुस जाओ।

दरिद्रा के प्रवेश न करने के स्थान :- ************************* मार्कण्डेयजी ने दु:सह मुनि को कहा–जहां नारायण व रुद्र के भक्त हों, भस्म लगाने वाले लोग हों, भगवान का कीर्तन होता हो,घर में भगवान की मूर्ति व गाये हों उस घर में तुम दोनों मत घुसना। जो लोग नित्य वेदाभ्यास में संलग्न हों, नित्यकर्म में तत्पर हों तथा वासुदेव की पूजा में रत हों, उन्हें दूर से ही त्याग देना। तथा जो लोग वैदिकों, ब्राह्मणों, गौओं, गुरुओं, अतिथियों तथा रुद्रभक्तों की नित्य पूजा करते हैं, उनके पास मत जाना। यह कहकर मार्कण्डेय ऋषि चले गए। तब दु:सह मुनि ने दरिद्रा को एक पीपल के मूल में बिठाकर कहा कि मैं तुम्हारे लिए रसातल जाकर उपयुक्त आवास की खोज करता हूँ। दरिद्रा ने कहा–’तब तक मैं खाऊंगी क्या?’ मुनि ने कहा–’तुम्हें प्रवेश के स्थान तो मालूम हैं, वहां घुसकर खा-पी लेना। लेकिन जो स्त्री तुम्हारी पुष्प व धूप से पूजा करती हो, उसके घर में मत घुसना।’ यह कहकर मुनि बिल मार्ग से रसातल में चले गए। लेकिन बहुत खोजने पर भी उन्हें कोई स्थान नहीं मिला। कई दिनों तक पीपल के मूल में बैठी रहने से भूख-प्यास से व्याकुल होकर दरिद्रा रोने लगीं। उनके रुदन से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। उनके रोने की आवाज को जब उनकी छोटी बहन लक्ष्मीजी ने सुना तो वे भगवान विष्णु के साथ उनसे मिलने आईं। दरिद्रा ने भगवान विष्णु से कहा–’मेरे पति रसातल में चले गए है, मैं अनाथ हो गई हूँ, मेरी जीविका का प्रबन्ध कर दीजिए।’ भगवान विष्णु ने कहा–’हे दरिद्रे! जो माता पार्वती, शंकरजी व मेरे भक्तों की निन्दा करते हैं, शंकरजी की निन्दा कर मेरी पूजा करते हैं, उनके धन पर तुम्हारा अधिकार है। तुम सदा पीपल (अश्वत्थ) वृक्ष के मूल में निवास करो। तुमसे मिलने के लिए मैं लक्ष्मी के साथ प्रत्येक शनिवार को यहां आऊंगा और उस दिन जो अश्वत्थ वृक्ष का पूजन करेगा, मैं उसके घर लक्ष्मी के साथ निवास करुंगा।’ उस दिन से दरिद्रादेवी पीपल के नीचे निवास करने लगीं।

देवताओं द्वारा दरिद्रा को दिए गए निवास योग्य स्थान :-

पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में बताया गया है–जिसके घर में सदा कलह होता हो, जो झूठ और कड़वे वचन बोलते हैं, जो मलिन बुद्धि वाले हैं व संध्या के समय सोते व भोजन करते हैं, बहुत भोजन करते हैं, मद्यपान में लगे रहते हैं, बिना पैर धोये जो आचमन या भोजन करते हैं, बालू, नमक या कोयले से दांत साफ करते हैं, जिनके घर में कपाल, हड्डी, केश व भूसी की आग जलती हो, जो छत्राक (कुकुरमुत्ता) तथा सड़ा हुआ बेल खाते हैं, जहां गुरु, देवता, पितर और अतिथियों का पूजन तथा यज्ञदान न होता हो, ब्राह्मण, सज्जन व वृद्धों की पूजा न होती हो, जहां द्यूतक्रीडा होती हो, जो दूसरों के धन व स्त्री का अपहरण करते हों, वहां अशुभ दरिद्रे तुम सदा निवास करना।

देव उठनी ग्यारस महुर्त एबं आबस्यक सामग्री लिंक ओपन करे


हल्दी powder
2 चन्दन powder या चंदन मूठा  बिष्णु जी के तिलक के लि
3 अक्षत
4 रोली
5 धुप
6 अगरबत्ती
7 कपूर
8 पान का पत्ता
9 सुपारी /
घी
10 मोली धागा
11 आम का पत्ता
12 फल
13 फूल व माला
14 तुलसी पत्ता
15 मोदक / लड्डू
16 नारियल
17 गंगा जल
18 बैठने के लिए आसन
19 लाल कपड़ा
20 गणेश भगवान की प्रतिमा लड्डू गोपाल जी की प्रतिमा  तुलसी का गमला
21 चौकी
22 चौकी पर बिछाने के लिए आसन
23 दीपक
24 बाती
25 कलश
26जनेऊ 
चोक पूरणे के लिए रंगोली या आटा 
गन्ने
ज्वार की भुठीया
सिंघाड़ा
भाजी
मूली
भटे
होम करने के लिए गाय के गोबर के कंडी

=================================

देव उठनी एकादशी प्रबोधिनी एकादशी पारण ११th को, पारण


(व्रत तोड़ने का) समय = १३:०९ से १५:२० पारण तिथि के दिन


हरि वासर समाप्त होने का समय = १४:३०

 दूजी देवुत्थान एकादशी = ११/११/२०१६ 

१२th को, दूजी एकादशी के लिए पारण
(व्रत तोड़ने का) समय = ०६:३८ से ०८:४९ 

पारण के दिन द्वादशी सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी 


एकादशी तिथि प्रारम्भ = १०/नवम्बर/२०१६ को ११:२१ बजे एकादशी


तिथि समाप्त = ११/नवम्बर/२०१६ को ०९:१२ बजे

=======


प्रबोधिनी एकादशी के दिन का पञ्चाङ्ग प्रबोधिनी एकादशी के दिन का चौघड़िया मुहूर्त टिप्पणी - २४ घण्टे की घड़ी गुना मध्य प्रदेसके स्थानीय समय के साथ और सभी मुहूर्त के समय है 

==================================

एकादशी प्रबोधिनी एकादशी को देव उठनी एकादशी और देवुत्थान एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है। एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए। कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।.

मान्यतानुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन विष्णु के शलिग्राम रूप और देवी तुलसी के विवाह की सालगिरह मनार्ई जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस अवसर पर भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराना बड़ा ही पुण्यदायी होता है।जो व्यक्ति तुलसी के साथ शालिग्राम का विवाह करवाता है उनके दांपत्य जीवन में आपसी सद्भाव बना रहता है और मृत्यु के पश्चात उत्तम लोक में स्थान मिलता है।इस दिन शालिग्राम और तुलसी जी का विवाह कराकर पुण्यात्मा लोग कन्या दान का फल प्राप्त करते है । तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है। तुलसी की नियमित पूजा से हमें सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।कार्तिक पूर्णिमा को श्रीहरि को तुलसी चढ़ाने का फल दस हज़ार गोदान के बराबर माना जाता ।नये घर में तुलसी का पौधा, श्रीहरि नारायण का चित्र या प्रतिमा और जल भरा कलश लेकर प्रवेश करने से नये घर में संपत्ति की कमी  नही रहती

तुलसी विवाह की विधि और शुभ मुहर्त —-

इस वर्ष तुलसी विवाह का शुभ दिन 11 नवंबर 2016 को है। पद्म पुराण के अनुसार तुलसी विवाह का कार्य एकादशी को करना शुभ होता है। तुलसी विवाह संपन्न कराने के लिए एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए और तुलसी जी के साथ विष्णु जी की मूर्ति घर में स्थापित करनी चाहिए।शालिग्राम मूर्ति यानि विष्णु जी की काले पत्थर की मूर्ति मिलना दुर्लभ होता है। इसके ना मिलने पर विष्णु जी की मूर्ति या तस्वीर को भी इस्तेमाल कर सकते हैं। शाम के समय सारा परिवार इसी तरह तैयार हो जैसे विवाह समारोह के लिए होते हैं। तुलसी का पौधा एक चोकी पर आंगन, छत या पूजा घर में बिलकुल बीच में रखें। तुलसी के पौधे और विष्णु जी की मूर्ति को पीले वस्त्रों से सजाना चाहिए। पीला विष्णु जी की प्रिय रंग है।देव प्रबोधिनी एकादशी से कुछ वस्तुएं खाना आरंभ किया जाता है। अत: भाजी, मूली़ बेर और आंवला जैसी सामग्री बाजार में पूजन में चढ़ाने के लिए मिलती है वह लेकर आएं। तुलसी और सालिग्राम जी पर दूध में भीगी हल्दी लगाएं।तुलसी विवाह के लिए तुलसी के पौधे को सजाकर उसके चारों तरफ गन्ने का मंडप बनाना चाहिए। तुलसी जी के पौधे पर चुनरी या ओढ़नी चढ़ानी चाहिए। इसके बाद जिस प्रकार एक विवाह के रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह की भी रस्में निभानी चाहिए। गन्ने के मंडप पर भी हल्दी का लेप करें और उसकी पूजन करें।गमले में सालिग्राम जी रखें सालिग्राम जी पर चावल नहीं चढ़ते हैं उन पर तिल चढ़ाई जा सकती है। तुलसी विवाह के दिन व्रत रखने का बड़ा ही महत्व है। इस दिन श्रद्धा-भक्ति और विधिपूर्वक व्रत करने से इस जन्म के साथ-साथ पूर्वजन्म के भी सारे पाप मिट जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।11 बार तुलसी जी की परिक्रमा करें। प्रसाद को मुख्य आहार के साथ ग्रहण करें।पूजा समाप्ति पर घर के सभी सदस्य चारों तरफ से चोकी को उठा कर भगवान विष्णु से जागने का आह्वान करते है ।

इस मंत्र का उच्चारण करते हुए भी देव को जगाया जा सकता है-

‘(उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्‌ सुप्तं भवेदिदम्‌॥’)

‘(उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।
गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥’)

‘शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।’

अगर चाहें तो पंडित या ब्राह्मण की सहायता से भी विधिवत

रूप से तुलसी विवाह संपन्न कराया जा सकता है अन्यथा मंत्रोच्चारण (ऊं तुलस्यै नम:) के साथ स्वयं भी तुलसी विवाह किया जा सकता है।

तुलसी और शालिग्राम विवाह की कथा

एक समय जलंधर नाम का एक पराक्रमी असुर हुआ। इसका विवाह वृंदा नामक कन्या से हुआ। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी। इसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था। इसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। अपने अजेय होने पर इसे अभिमान हो गया और स्वर्ग की कन्याओं को परेशान करने लगा। दुःखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे। भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलांधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गयी और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया। लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे अतः वृंदा के शाप को जिवित रखने के लिए उन्होनें अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया। शालिग्राम पत्थर नर्मदा नदी से प्राप्त होता है। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा। मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है। बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं। भगवान विष्णु को दिया शाप वापस लेने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गयी। वृंदा के राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाये रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया।

Tuesday, 1 November 2016

सुखी दाम्पत्य के लिये कंप्यूटर से मिलान न मिलवाये

आज कम्पयूटर का जमाना है जिसे देखो अपने अपने कम्पयूटर में कोई न कोई सोफ़्टवेयर ज्योतिष वाला डालकर बैठा है,जैसे ही किसी भी वर कन्या की विवाह वाली बात की जाती है सीधे से वर और कन्या की जन्म तारीख समय आदि के साथ कुंडली बना ली जाती है और उन्हे सीधे से विवाह मिलान के लिये देखा जाता है,गुण चक्र नाडी दोष और भकूट दोष आसानी से कम्पयूटर का सोफ़्टवेयर निकाल कर दे देता है,मंगल चाहे वक्री हो अस्त हो कम डिग्री का हो उसे मंगली दोष लगाते देर नही लगती है,चन्द्रमा चाहे बाल हो वृद्ध हो अस्त हो नीच हो उसे राशि मिलान करते देर नही लगती है,कन्या का गुरु बल चाहे बहुत ही कमजोर हो वर का सूर्य बल चाहे बिलकुल ही नही मिलता हो लेकिन कम्पयूटर के अनुसार गुण चक्र बताने मे कतई देर नही लगती है और फ़टाफ़ट फ़ैसला भी हो जाता है,चाहे दोनो का चन्द्र बल बहुत ही अच्छा हो। इस प्रकार से कितने अर्थ के अनर्थ हो जाते है जिन लोगों को वास्तव मे कतई ज्योतिष की जानकारी नही है वे आसानी से वर-कन्या के गुण दोष बताने लगते है और जब उनसे कोई बात पूँछी जाती है तो वे अपने गुण को सर्वोच्च बताने की आशा मे अपने अनाप सनाप वाचाली नीति को अपनाने लगते है।
अत:विबाह मिलान किसी योग्य ज्योतिषि से ही करवाये

१】विबाह में विसेष् रूप से  मान्य नक्षत्र 

मूल
अनुराधा
मृगशिरा
रेवती
हस्त
उत्तराफ़ाल्गुनी
उत्तराषाढा
उत्तराभाद्रपत
स्वाति
मघा
रोहिणी इन नक्षत्रो मे

२】विबाह में मान्य महीने
और ज्येष्ठ
माघ
फ़ाल्गुन
बैशाख
मार्गशीर्ष
आषाढ
इन महीनो मे विवाह करना शुभ है।

३】कन्या के लिये गुरुबल वर के लिये सूर्य बल दोनो के लिये चन्द्रबल देख लेना चाहिये।

गुरुबल विचार:-

गुरु कन्या की राशि से नवम एकादश द्वितीय और सप्तम राशि मे शुभ होता है

दसम तृतीय छठा और प्रथम राशि मे दान देने से शुभ

और चौथे आठवे बारहवी राशि मे अशुभ होता है।

४】सूर्य बल विचार:-

सूर्य वर की राशि से तीसरा छठा दसवा ग्यारहवा शुभ होता है,

दूसरा पांचवा सातवा और नवां दान देने से शुभ माना जाता है,

चौथा आठवां बारहवां सूर्य अशुभ होता है।

५】चन्द्रबल विचार:-

चन्द्रमा वर और कन्या की राशि से तीसरा छठा सातवां दसवा ग्यारहवां शुभ

पहला दूसरा पांचवां नौवां दान से शुभ

और चौथा आठवां बारहवां अशुभ होता है।

६】विवाह मे त्यागने वाली लगनें:-

दिन मे तुला वृश्चिक और रात्रि में मकर राशि बधिर है,

दिन मे सिंह मेष वृष और रात्रि में कन्या मिथुन कर्क अन्धी है,

दिन मे कुंभ और रात्रि मे मीन दोनो लगने पंगु है,

सिंह मेष वृष मकर कुम्भ मीन ये लगन सुबह और शाम के समय कुबडे होते है.

७】 त्यागने वाली लगनों का फ़ल:-

अगर विवाह बधिर लगन मे होता है तो वर कन्या चाहे कुबेर के खजाने से लदे हुये जाये लेकिन दरिद्र हो जायेंगे,

दिन की अन्धी लगनो मे विवाह किया जाता है तो कन्या को वर से दूरी मिलनी ही है,

रात्रि की अन्धी लगन मे विवाह होता है तो संतति होने का सवाल ही नही होता है और होती भी है तो जिन्दा नही रहती है,

लगन पंगु होती है तो धन नाश और परिवार की मर्यादा का नाश होने लगता है।

८】लगन शुद्धि:-

लगन से बारहवे शनि दसवे मंगल तीसरे शुक्र लग्न मे चन्द्रमा और क्रूर ग्रह अच्छे नही होते है

लगनेश और सौम्य ग्रह आठवें भाव मे अच्छे नही होते है सातवे भाव मे कोई भी ग्रह शुभ नही होता है।

९】 ग्रहों का बल:-

पहले चौथे पांचवे नवें और दसवे स्थान मे गुरु सब दोषों को नष्ट करने वाला होता है,

सूर्य ग्यारहवे स्थान स्थिति तथा चन्द्रमा वर्गोत्तम लगन मे स्थिति नवांश दोष को नष्ट करता है बुध लगन से चौथे पांचवे नौवें और दसवे स्थान मे हो तो अक्सर खराब से खराब दोष को शुभ करता है। लगन का स्वामी और नवांश का स्वामी एक ही भाव राशि के हों तो भी अक्सर दोष शांति को माना जाता है.

विबाह मुहूर्त बनाने में किन किन दस दोषो को देखना चाहिए

विवाह मुहूर्त प्रश्न: विवाह मुहूर्त में किन-किन दोषों पर विचार किया जाना चाहिए? विवाह संस्कार मानव जीवन का एक प्रमुख और सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह संस्कार शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का पालन करते हुए विधि विधानपूर्वक करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर और कन्या की जन्म कुंडलियां मिलाकर किए जाने वाले विवाह के मुहूर्त में प्रमुख दोषों का विवेचन प्रस्तुत है। सामान्य रूप से सभी शुभ कार्यों में वर्जित 


21 प्रमुख दोष - पंचांग शुद्धि अभाव, 

सूर्योदयास्त या गुरु, शुक्रास्त विभिन्न देश के रीति रिवाज को छोड़कर,

 संक्रांति दिन, 

पाप षडवर्ग में लग्न होना, 

विवाह लग्न में छठे शुक्र व अष्टम में मंगल, 

त्रिविध गणांत, लग्न कर्Ÿारी योग,

 विकंगत चंद्रमा, 

वर-वधू की राशि से अष्टम लग्न, 

विषघटी, 

दुर्मुहूर्त पाप ग्रह वार दोष,

 लतादि दोष,

 ग्रहण नक्षत्र,

 उल्पात नक्षत्र, 

पाप विद्ध नक्षत्र, 

पाप युत नक्षत्र, 

पाप नवांश व क्रांतिसाम्य (महापाप)।

 विवाह मास सूर्य संक्रमण की मेष, वृष, मिथुन

 तिथियां द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी एवं त्रयोदशी तिथियां विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं।

 प्रतिपदा (कृष्ण), षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी एवं पूर्णिमा तिथियां विवाह के लिए उत्तम हैं। 

विवाह वार सोमवार, बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं।

 रविवार विवाह के लिए उत्तम हैं। विवाह नक्षत्र रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्र एवं रेवती नक्षत्र विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। 

अश्विनी, चित्रा, श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र विवाह के लिए उत्तम हैं।

 विवाह योग प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, धु्रव, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल एवं ब्रह्म योग विवाह के लिए प्रशस्त हैं। 

विवाह करण बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर और वणिज विवाह के लिए प्रशस्त हैं। शकुनि, चतुष्पद, नाग एवं किंस्तुघ्न करण विवाह के लिए सामान्य हैं। 

विष्टि करण विवाह के लिए सर्वथा त्याज्य है। 

गुरु/शुक्र अस्त विचार गुरु और शुक्र ग्रह यदि अस्त चल रहे हों, तो उसे तारा डूबा कहते हैं। 

इसलिए गुरु-शुक्र का अस्त काल विवाह मुहूर्त के लिए त्याज्य है।

 देव शयन विचार जब सूर्य उत्तरायण होता है, उस काल को देवताओं का दिन माना जाता है। 

सूर्य दक्षिणायन काल देवताओं की रात्रि मानी जाती है। यही काल देवताओं का शयन काल कहलाता है। 

देव शयन काल में भी विवाह मुहूर्त त्याज्य होता है।

विवाह में विशेष लत्तादि दोष विवाह लग्न में मुख्य रूप से 10 दोष वर्जित हैं, जो इस प्रकार हैं-
लत्ता
पात
युति
वेध
जामित्र
बाणपंचक
एकार्गल
उपग्रह
क्रांतिसाम्य
दग्धा।
इनमें वेध व क्रांतिसाम्य अति गंभीर दोष हैं,

अतः विवाह लग्न में इनका त्याग अवश्य करना चाहिए।
1. लत्ता दोष:

लत्ता दोष एक गंभीर दोष है जिसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। इसकी दो स्थितियां होती हैं। एक स्थिति में विवाह नक्षत्र के दायीं

2. पात दोष:

सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसी नक्षत्र में यदि फेरों का समय आ जाए तो पात दोष होता है। मघा, आश्लेषा, चित्रा, अनुराधा, रेवती और श्रवण ये 6 पातकी नक्षत्र हैं। ये सभी सूर्य के संयोग से पतित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त साध्य, हर्षण, शूल, वैधृत, व्यतिपात व गंड इन योगों का अंत यदि उस दिन के नक्षत्र में हो, तो पात दोष होता है। इसे चंडायुध दोष भी कहते हैं। यह प्रायः सभी शुभ कार्यों में वर्जित है।

3. युति दोष:

विवाह नक्षत्र में पाप ग्रह का विचरण या युति हो, तो युति दोष होता है। सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु पाप ग्रह हैं। यदि चंद्र षडवर्ग में श्रेष्ठ, उच्च, स्वक्षेत्री या मित्र हो, तो युति दोष का परिहार हो जाता है। शुभ ग्रहों में बुध और गुरु यदि चंद्र के नक्षत्र में हों और मित्र राशि में हों, तो भी युति दोष नहीं माना जाता। शुक्र की युति को शुभ माना गया है, इसका दोष नहीं लगता है। युति दोष के शुभ-अशुभ फल इस प्रकार हैं-

4. वेध दोष:

विवाह नक्षत्र का जिस नक्षत्र में वेध हो, उसमें कोई क्रूर या पाप ग्रह चल रहा हो, तो वेध दोष ओर के 12 वें नक्षत्र को सूर्य, तीसरे को मंगल, छठे को बृहस्पति और आठवें को शनि लात मारता है। दूसरी स्थिति में बायीं ओर के सातवें नक्षत्र को बुध, नौवें को राहु, पांचवें को शुक्र और 22 वें को पूर्ण चंद्र लात मारता है। इसका फल इस प्रकार है। पंचशलाका चक्र में एक रेखा पर पड़ने वाले निम्न नक्षत्रों में ग्रह होने से नक्षत्रों का परस्पर वेध हो जाता है। रोहिणी-अभिजित, भरणी-अनुराधा, उŸाराषाढ़ा-मृगशिरा, श्रवण-मघा, हस्त-उŸाराभाद्रपद, स्वाति-शतभिषा मूल-पुनर्वसु, र े व त ी - उ Ÿ ा र ा फ ा ल् ग ु न ी , चित्रा-पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा-पुष्य, पूर्वाषाढ़-आद्र्रा, धनिष्ठा-अश्लेषा, अश्विनी-पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा-कृ त्तिका का आपस में वेध होता है यदि विवाह नक्षत्र में शुभ ग्रह का वेध हो तो ‘पादवेध’ होता है। पादवेध में पूरा नक्षत्र दूषित नहीं होता, सिर्फ चरण दूषित होता है। यदि नक्षत्र के चतुर्थ चरण पर ग्रह हो, तो सामने वाले नक्षत्र के प्रथम चरण पर वेध होगा। यदि ग्रह द्वितीय चरण पर हो, तो सामने वाले नक्षत्र के तृतीय चरण पर वेध होगा। विवाह मुहूर्त में पादवेध के काल का ही त्याग करना चाहिए, संपूर्ण नक्षत्र का नहीं। पापग्रहों द्वारा भोगकर छोड़े हुए नक्षत्र को यदि चंद्र भोग ले, तो नक्षत्र शुद्ध होकर वेध दोष दूर हो जाता है। ‘रवि वेधे च वैधकं, पुत्रशोको भवेत कुजे।’ अर्थात सूर्य के वेध में विवाह करने से कन्या विधवा हो जाती है और मंगल वेध से पुत्रशोक होता है। शनि के वेध से मृतसंतान उत्पन्न होती है तथा राहु के वेध से स्त्री व्यभिचारिणी हो जाती है। अतः लग्न में इसका परित्याग अवश्य ही करना चाहिए।

5. यामित्र दोष:

विवाह नक्षत्र से 14 वें नक्षत्र पर कोई ग्रह हो, तो यामित्र या जामित्र दोष लगता है। जामित्र अर्थात सप्तम स्थान। विवाह के समय चंद्र या लग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह हो, तो यह दोष होता है। अतः सप्तम स्थान की शुद्धि आवश्यक होती है। पूर्ण चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र के होने से जामित्र शुभ तथा पाप ग्रहों के होने से अशुभ फलदायक होता है। सप्तम अशुभ ग्रह व्याधि और वैधव्य का कारक होता है।

6. बाण पंचक दोष: संक्रांति के व्यतीत दिनों (लगभग 16 दिन) में 4 जोड़कर 9 का भाग देने पर शेष 5 रहे तो मृत्यु पंचक दोष होता है।
यदि गतांश में 6 जोड़कर 9 का भाग देने 5 शेष बचे, तो रोग पंचक,
3 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो अग्नि पंचक,
यदि 1 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो राज पंचक
और यदि 8 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो चोर पंचक दोष होता है।
यदि शेष 5 नहीं रहे, तो बाण दोष नहीं होगा।

यदि रविवार को रोग पंचक लगे तो सोमवार को राज पंचक, मंगल को अग्नि पंचक, शुक्र को चोर पंचक और शनि को मृत्यु पंचक होता है। ये सभी दोष विवाह में वर्जित हैं।

रोग और चोर पंचक रात्रि में,
राज और अग्नि पंचक दिन में
और दोनों की संधि में मृत्यु पंचक वर्जित है।

मृत्यु पंचक को छोड़ कर 4 पंचकों में दोष का निर्वाह हो जाता है। लेकिन मृत्यु पंचक सर्वथा वर्जित है। इसमें विवाह नहीं करना चाहिए।

7. एकार्गल दोष:

विष्कंुभ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिघ, वैधृति ये अशुभ योग विवाह के दिन हों तथा सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र विषम हो तो एकार्गल दोष होता है। इसमें नक्षत्र गणना 28 मानकर की जाती है। इस दोष में खोड़ी (ऽ) लगती है दोष नहीं हो तो रेखा (।) लगाते हैं।

8. उपग्रह दोष:

सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र तक गणना में 5, 7, 8, 10, 14, 15, 18, 19, 21, 22, 23, 24 या 25वें नक्षत्र में कोई ग्रह आए, तो उपग्रह दोष होता है।

9. क्रांतिसाम्य दोष:

जब स्पष्ट चंद्रक्रांति सूर्य क्रांति के बिल्कुल समान हो तब क्रांतिसाम्य दोष होता है। एक ही अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 360 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर वैधृति नामक महापात होता है। विभिन्न अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 180 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर यह व्यतिपात संज्ञक होता है। क्रांतिसाम्य काल का निर्धारण गणित विधि से सिद्धांतोक्त पाताध्यायों के अनुसार किया जाता है।

साधारण तौर पर मेष-सिंह, वृष-मकर, तुला-कुंभ, कन्या-मीन, कर्क-वृश्चिक और धनु-मिथुन इन राशि युग्मों में, एक में सूर्य व एक में चंद्र हो, तो क्रांतिसाम्य दोष संभावित होता है।

क्रांतिसाम्य दोष शुभ कार्यों में सभी शुभ गुणों को नष्ट कर देता है। विवाह पटल के अनुसार शस्त्र से कटा, अग्नि में जला या सर्प के विषदंश से पीड़ित व्यक्ति तो जीवित बच सकता है, किंतु क्रांतिसाम्य में विवाह करने पर वर-वधू दोनों ही जीवित नहीं रहते।

अतः लग्न शुभ (शुद्ध) होने पर भी उक्त दोषों (क्रांतिसाम्य, वेधदोष) में विवाह नहीं करना चाहिए। सूक्ष्म क्रांति साम्य (महापात) की गणित गणना होती है। इसमें सभी शुभ कार्य वजिर्त हं।ै

10.दग्धा तिथि:

सूर्य राशि से तिथि को वर्जित माना गया है। नीचे दिए गए तिथि चक्र में जिस माह के सूर्य के नीचे जो तिथि लिखी गई है, वह दग्धा तिथि मानी जाती है। इसमें विवाहादि शुभ कार्य वर्जित हैं।

विशेष रूप से त्याज्य चार दोष विवाह लग्न में निम्नोक्त 4 दोष भी त्याज्य हंै।

मर्म वेध:

लग्न में पाप ग्रह होने से मर्म वेध होता है।

कंटक दोष:

त्रिकोण में पाप ग्रह होने से कंटक दोष होता है।

शल्य दोष:

चतुर्थ और दशम में पाप ग्रह होने से शल्य दोष होता है।

छिद्र दोष:

सप्तम भाव में पाप ग्रह होने से छिद्र दोष होता है।

ज्येष्ठा विचार ज्येष्ठ मास में उत्पन्न व्यक्ति का ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित होता है। वर और कन्या दोनों का जन्म ज्येष्ठ मास में हुआ हो, तो इस स्थिति में भी ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित है। विवाह के समय तीन ज्येष्ठों का एक साथ होना वर्जित है।

दो या चार या छह ज्येष्ठा होने से विवाह हो सकता है।

सिंह-गुरु वर्जित:

सिंह राशि में गुरु हो तो विवाह वर्जित होता है।

लेकिन मेष का सूर्य रहे तो सिंह के गुरु में विवाह हो सकता है।

होलाष्टक:

फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में होलिका दहन से 8 दिन पहले अर्थात् शुक्लाष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक रहते हैं जो कि शतरुद्रा, विपाशा, इरावती और तीनों पुष्कर को छोड़कर सर्वत्र शुभ हंै,
इसलिए इन स्थानों के अतिरिक्त सर्वत्र विवाहादि शुभ कार्य हो सकते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रमुख दोषों का फल इस प्रकार है।

व्यतिपात में विवाह होने पर मृत्यु और वंश नाश की संभावना रहती है।

गंडांत में विवाह होने पर मृत्यु,

वज्र में विवाह होने पर अग्निदाह,

गंड में रोग, वैधृति म ंे वध्ै ाव्य,

विष्कभ्ं ा म ंे कामातरु ता, पा्र ण सश्ं ाय

, अतिगंड में धातुक्षय,

व्याघात में मृतवत्सा और व्याधि,

परिघ म ंे कन्या क े पर्राइ दासी होने की संभावना

और शूल में विवाह होने पर घाव होता है।

विवाह में लग्न शुद्धि दिन और रात के 24 घंटों में 12 राशियों के 12 लग्न होते हैं। सभी मुहूर्तों में लग्न की सर्वाधिक प्रधानता होती है। विवाह आदि शुभ कार्यों में लग्न का शोधन गंभीरता से किया जाता है।

विवाह हेतु वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु लग्न शुभ कहे गए हैं,

इन लग्नों में विवाह उŸाम फलदायी होता है। अलग-अलग भावों में स्थित ग्रह विवाह लग्न हेतु अशुभ होते हैं। इस संदर्भ में एक संक्षिप्त विवरण नीचे की सारणी में दी गई है। इनमें से कुछ ग्रहों की पूजा कराकर लग्न शुद्धि की जा सकती है। इनकी शांति के उपरांत विवाह में तथा दाम्पत्य जीवन में बाधाएं नहीं आतीं।

विवाह लग्न में शुभ ग्रह केंद्र, त्रिकोण या द्वितीय, द्वादश में हों और पाप ग्रह भाव 3, 6 या 11 में स्थित हों तो शुभफल देते हैं।

लग्न (प्रथम भाव) से षष्ठ में शुक्र व अष्टम में मंगल अशुभ होता है।

सप्तम भाव ग्रह रहित हो, विवाह लग्न से चंद्र भाव 6, 8 या 12 में न हो, तो लग्न शुभ होता है।

लग्न भंग-मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के लग्न के व्यय भाव में शनि हो, तो उस लग्न में विवाह नहीं करना चाहिए।

दशम में मंगल, तृतीय में शुक्र, लग्न में चंद्र या पाप ग्रह हो, लग्नेश, सूर्य, चंद्र छठे भाव में हो अथवा चंद्र, लग्न का स्वामी या कोई शुभ ग्रह आठवंे भाव में हो अथवा सप्तम भाव में कोई भी ग्रह हो, तो लग्न भंग होता है।

विवाह लग्न में कन्या, मिथुन, धनु का पूर्वाधि नवांश शुभ होता है, बशर्ते ये अंतिम नवांश में न हो।

उक्त राशियों का नवांश हो, तो दम्पति को पुत्र, धन व सौभाग्य की प्रप्ति होती है।

वर और कन्या की जन्म राशियों या लग्नों से अष्टम या द्वादश भाव का नवांश यदि अनेक गुणों से युक्त हो तो त्याज्य है।

श्री रामदैवज्ञ के अनुसार, लग्न का स्वामी लग्न में स्थित हो या उसे देखता हो, अथवा नवांश का स्वामी नवांश में स्थित हो या उसे देखता हो, तो वह वर को शुभफल प्रदान करता है।

इसी प्रकार नवांश का सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो, तो वधू के लिए शुभ फलदायक होता है।

कर्तरी दोष एवं परिहार:

विवाह लग्न से दूसरे या 12वें भाव में यदि पाप ग्रह हो, तो कर्तरी दोष होता है, जो कैंची की तरह दोनों ओर से लग्न की शुभता को काटता है।

लग्न से द्वितीय स्थान में पापग्रह वक्री और द्वादश में पाप ग्रह मार्गी हो, तो यह दोष महाकर्तरी होता है, इसका सर्वथा त्याग करना चाहिए।

लग्न में बलवान शुभग्रह हो, तो कर्तरी दोष भंग हो जाता है।

केंद्र या त्रिकोण में गुरु, शुक्र या बुध हो, या कर्तरीकारक ग्रह नीचस्थ अथवा शत्रुक्षेत्री हो, तो कर्तरी दोष होता है।

पंगु, अंध, बधिर लग्न:

तुला और वृश्चिक दिन में तथा धनु एवं मकर रात्रि में बधिर (बहरी) होते हैं।

बधिर लग्न में विवाह करने से जीवन दुखमय होता है।

मेष, वृष और सिंह दिन में तथा मिथुन, कर्क और कन्या रात्रि में अंधे होते हैं।

दिन में कुंभ एवं रात्रि में मीन लग्न पंगु (विकलांग) होता है।

पंगु लग्न में विवाह होने पर धन का नाश होता है।

दिवा अंध लग्न में कन्या विधवा हो जाती है,

जबकि रात्रि अंध लग्न संतान के लिए मृत्युकारक होता है। इसलिए इन दोषपूर्ण लग्नों से बचना चाहिए।

किंतु, यदि लग्न का स्वामी या गुरु लग्न को देखता हो, तो पंगु, बधिर आदि लग्न दोष नहीं होते हैं।

त्रिबल शुद्धि विचार

वर व कन्या की जन्मराशि से सूर्य, चंद्र व गुरु का गोचर नाम त्रिबल विचार है।

विवाह मुहूर्त के दिनों में से जिस दिन त्रिबल शुद्धि बन जाए, उसी दिन विवाह निश्चय करके बता देना चाहिए।

कन्या के लिए गुरुबल व वर के लिए सूर्यबल का विचार और चंद्रबल का विचार दोनों के लिए करना चाहिए।

सूर्य, चंद्र और गुरु की शुिद्ध होने पर ही विवाह शुभ होता है।

वरस्य भास्कर बलं: विवाह के समय वर के लिए सूर्य का बलवान और शुभ होना अति आवश्यक है। सूर्य के बलवान होने से दाम्पत्य जीवन में पति का पत्नी पर प्रभाव व नियंत्रण रहता है। दोनों में वैचारिक सामंजस्य रहता है एवं जीवन के कठिन समय में संघर्ष करने की क्षमता भी सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य की शुभता से संपूर्ण वैवाहिक जीवन सुखमय होता है।

विवाह के समय वर की जन्म राशि से तीसरे, छठे, 10वें और 11वें भाव में सूर्य का गोचर श्रेष्ठ

किंतु चैथे, आठवें और 12वें भाव में अनिष्ट होने के कारण त्याज्य है।

पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें और नौवें भाव का सूर्य पूजनीय है अर्थात विवाह से पहले सूर्य की पूजा व लाल दान करने से ही विवाह शुभ हो पाता है।

इनमें पहले और सातवें स्थान का सूर्य वर द्वारा विशेष पूज्य माना गया है।

दाम्पत्य जीवन में वर के वर्चस्व के लिए यह आवश्यक है कि सूर्य के उŸारायण काल, शुक्ल पक्ष व दिवा लग्न में ही विवाह करे। दिवा लग्न में भी अभिजित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ है।

सूर्य जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि का लग्न अभिजित लग्न कहलाता है। यह स्थानीय मध्याह्न काल (दोपहर) में पड़ता है। स्थानीय समयानुसार दिन के 12 बजने से 24 मिनट पूर्व 24 मिनट पश्चात तक 48 मिनट का अभिजित मुहूर्त होता है। उŸाम जाति ब्राह्मण व क्षत्रियों के लिए यह विवाह लग्न श्रेष्ठ कही गया है।

दक्षिण भारतीय ब्राह्मण अभिजित लग्न में ही विवाह करते हैं और यही कारण है कि उŸार भारतीयों की अपेक्षा उनका वैवाहिक जीवन अधिक सफल रहता है।

जन्मगत जाति के आधार पर ही नहीं बल्कि जन्म नक्षत्र के अनुसार यदि वर का वर्ण ब्राह्मण या क्षत्रिय हो, तो भी अभिजित लग्न में ही विवाह शुभफलदायी होता है।

विवाह लग्न में सूर्य यदि एकादश भाव में हो, तो यह सोने में सुहागा होता है। विवाह हेतु अन्य लग्न शुद्धि न हो सके, तो अभिजित मुहूर्त या लग्न में विवाह सभी वर्गों के लिए शुभ होता है।

कन्यायां गुरौ बलं: कन्या के दाम्पत्य सुख व पति भाव का कारक गुरु है, इसलिए गुरु की शुद्धि में कन्या का विवाह शुभ होता है।

कन्या की जन्म राशि से दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें या 11वें में स्थित गुरु विवाह हेतु शुभ माना जाता है, क्योंकि इन स्थानों में गुरु बलवान होता है।

पहले, तीसरे, छठे या 10वें में स्थित गुरु मध्यम होता है, जो पूजा से शुभ हो जाता है।

कन्या से पीला दान करा कर विवाह करना चाहिए।

चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु अशुभ होता हैं, यह पूजा से भी शुभ नहीं होता। अतः कन्या की जन्म राशि से चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु विवाह हेतु वर्जित है।

इन स्थानों में गुरु का गोचर वैधव्यप्रद होता है। मिथुन या कन्या राशि में हो, तो कन्या की हानि होती है।

कर्क या मकर राशि में हो, तो कन्या के लिए दुखदायी होता है।

किंतु उक्त स्थानों में स्वराशि या परमोच्च हो, तो शुभ होता है।

सिंह राशि के नवांश में गुरु हो, तो विवाह नहीं करना चाहिए।

कन्या के विवाह हेतु गुरु शुद्धि का इतना गहन विचार तो उस समय किया जाता था जब उसका विवाह दस वर्ष या इससे भी कम की आयु में होता था। आजकल तो लड़की का विवाह सोलह वर्ष के बाद ही होता है। इस उम्र तक वह कन्या नहीं रहती, वह तो रजस्वला होकर युवती हो जाती है। इसलिए गुरुबल शुद्धि रहने पर भी पूजा देकर लड़की का विवाह कराना शास्त्रसम्मत है।

ऐसे में विवाह लग्न शुद्धि के लिए चंद्रबल देखना ही अनिवार्य है।

विवाहे चंद्रबलं:

श्री बादरायण के अनुसार गुरु और शुक्र के बाल्य दोष में कन्या का और वृद्धत्व दोष में पुरुष का विनाश होता है।

गुरु अस्त हो तो पति का, शुक्रास्त हो, तो कन्या का तथा चंद्रास्त हो, तो दोनों का अनिष्ट होता है। अतः विवाह के समय वर और कन्या दोनों के लिए चंद्रबल शुद्धि आवश्यक है।

चंद्र का गोचर दोनों की जन्म राशियों से तीसरे, छठे, सातवें, 10वें या 11वें भाव में शुभ (उŸाम) होता है।

पहले, दूसरे, पांचवें, नौवें या 12वें में चंद्रमा पूज्य है।

चैथे, आठवें या 12वें स्थान का चंद्र दोनों के लिए अशुभ होता है।

विवाह पटल के अनुसार चैथा और 12वां चंद्र ही अशुभ होने के कारण त्याज्य है।

एकार्गलादि विवाह संबंधी दोष चंद्र एवं सूर्य के बलयुक्त होने के कारण नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् दोनों उच्चस्थ या मित्र क्षेत्री होकर विवाह लग्न में बैठे हांे, तो समस्त दोष दूर हो जाते हैं।

चंद्र बुध के साथ शुभ और गुरु के साथ सुखदायक होता है। 

विवाह लग्न में चंद्र की निम्नलिखित युतिस्थितियां दोषपूर्ण होती हैं, इनका त्याग करना चाहिए।

सूर्य-चंद्र की युति -

यह युति दंपति को दारिद्र्य दुख देती है।

चंद्र-मंगल की युति -

इस युति के फलस्वरूप मरणांतक पीड़ा होती है।

चंद्र-शुक्र की युति -

इस युति के फलस्वरूप पति पराई स्त्री से प्रेम करता है, अर्थात् पत्नी को सौतन का दुख झेलना पड़ता है।

चंद्र-शनि की युति -यह युति वैराग्य देती है

चंद्र-राहु की युति - राहु से युत चंद्र कलहकारी होता है।

चंद्र-केतु की युति - यह युति कष्ट प्रदान करती है।

इसके अतिरिक्त यदि विवाह लग्न में चंद्र दो पाप ग्रहों से युत हो तो मृत्यु का कारक होता है।

विवाह में गोधूलि विचार भी किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें सभी दोष त्याज्य हैं।

विशेष मत तो यह है कि वर और कन्या की कुंडली का समग्र रूप से मिलान किया जाए, जिसमें मंगल दोष, संतान, आयु, आपसी तालमेल, वैधव्य स्थिति, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति, शिक्षा के स्तर इत्यादि पर विशेष विचार करने के उपरांत शुभ नक्षत्र और समय में विवाह किया जाना चाहिए। s सब्सक्राइब अंक के और लेख